पानीदार लोग
पानी बचाने का संकल्प भी कैसा है, जैसे खराब परीक्षा परिणाम के बाद अगले सत्र के पहले दिन से हाड़तोड़ पढ़ाई का संकल्प... जैसे बीमारी के बाद संयमित जीवन का संकल्प...दफ्तर में समय पर आने का संकल्प...नशे की लत को छोड़ देने का संकल्प...।
जल संकट के दिनों में हर कोई सोचता हैं कि अब पानी की बर्बादी न होने देंगे। चिंता ऐसी दिखाई जाती है कि जैसे इस बार तो बारिश की बूँद-बूँद सहेज ली जाएगी। लेकिन गर्मियाँ जाते ही पानी बचाने का संकल्प भी हवा हो जाता है। सहज पानी मिलता है तो संकट के दिनों को बिसरा कर इंसान पानी का दुरूपयोग शुरू कर देता है।
संकल्प की इस कमजोरी के बीच दृढ़ इरादों के धनी भी मौजूद हैं। राजस्थान के भादरा रेलवे स्टेशन पर बाल्टी लेकर यात्रियों को पानी पिला रहे नन्दलाल सिंह राठौड़ हो या एक खुरपी से तालाब खोद लेना का हौंसला रखने वाले बिहार के कमलेश्वरी सिंह, समाज में पानीदार लोगों की कमी नहीं हैं जो अपने संकल्प को निभा लेने की अनूठी मिसाल हैं। श्री राठौड़ बीते 60 सालों से रेलवे स्टेशन पर पानी पिला कर यात्रियों की प्यास बुझा रहे हैं तो कमलेश्वरी सिंह ने बुढ़ापे में सात सालों तक अकेले खुरपी के सहारे तालाब खोद दिया। इटारसी के पास तारमखेड़ा में आदिवासियों ने बहते पानी को रोक कर अपने लिए जलाोत तैयार कर लिया। ये गाथाएँ इतिहास के पन्नाों से नहीं ली गई है, बल्कि ये हमारे आसपास के लोगों के शौर्य का वृतांत हैं। खामोशी से काम कर रहे ये पानीदार लोग असल में उस संकल्प को जी रहे हैं जिसे हम समस्या से मुक्त होते ही भूला देते हैं।
खुरपी से खोदा तालाब
बूंद-बूंद से सागर कैसे भरता है इसकी मिसाल बिहार के माणिकपुर गांव में देखी जा सकती है। पटना से करीब सौ किलोमीटर दूर इस गांव के कमलेश्वरी सिंह ने सात साल तक अकेले ही खुरपी और बाल्टी की मदद से 60 फीट लंबा-चौड़ा और 25 फीट गहरा तालाब खोद डाला। 63 साल के कमलेश्वरी की तुलना दशरथ मांझी से होने लगी है जिन्होंने अकेले ही पहाड़ काटकर सड़क बनाने का असाधारण कारनामा कर दिखाया था।
कमलेश्वरी की उपलब्धि कई मायनों में असाधारण है। तेज धूप में पसीने से तरबतर एक इंसान को छोटी सी खुरपी के साथ खुदाई करते देखकर पूरा गांव हंसता था। 15 साल पहले उनके पास 12 बीघा जमीन हुआ करती थी। लेकिन गैंगवार में उनके बड़े बेटे की हत्या कर दी गई और उसके बाद कमलेश्वरी कानूनी लड़ाई के जाल में कुछ ऐसा उलझे कि इसका खर्च उठाने के लिए उन्हें सात बीघा जमीन बेचनी पड़ी। अदालतों के च-र से उकताए कमलेश्वरी ने एक दिन अचानक फैसला किया कि केस रफादफा कर किसी रचनात्मक चीज पर ध्यान लगाया जाए। क्या करना है ये सोचने में देर नहीं लगी और 1996 की गर्मियों में कमलेश्वरी ने घर के पास अपने खेत में तालाब के लिए खुदाई शुरू कर दी। खुदाई के लिए उन्होंने खुरपी इसलिए चुनी क्योंकि फावड़ा भारी होने के कारण उससे काम करना मुश्किल था। खुरपी से मिट्टी खोदी जाती और बाल्टी में भरकर उसे फेंका जाता। सुबह छह बजे से शाम के सात बजे तक काम चलता रहता था।
सात साल की मेहनत के बाद आखिरकार तालाब तैयार हो ही गया। आज गर्मियों में भी तालाब में इतना पानी रहता है कि गांव को नहाने, कपड़े धोने और जानवरों के लिए पानी का इंतजाम करने की चिंता नहीं होती।
60 सालों से जलसेवा
'जल पी लो, जल पी लो" की मनुहार राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के भादरा रेलवे स्टेशन पर हर गाड़ी के आने पर सुनाई देती है। तपती दोपहरी मंे लू भरे थपेड़े हों या हाड़ कंपा देने वाली सर्दी या फिर बारिश- स्काउट की वेषभूषा में बाल्टी लिए एक बुजुर्ग यहाँ हर मौसम में नजर आ जाएंगे। पड़ोसी गंाव सिकरोड़ी के 83 वर्षीय पूर्व जिला स्काउट मास्टर नन्दलाल सिंह राठौड़ यह जल सेवा पिछले 60 वर्षों से करते आ रहे हंै। उन्होंने कस्बे मंे संैकड़ों पौधों को पनपाया है। 1957 मंे सरकारी शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए नंदलालजी के जीवन मंे जल सेवा प्रारम्भ होने के पीछे की कहानी भी दिलचस्प है। वे बताते हंै वर्ष 1951 मंे श्र्ाीगंगानगर से वे स्काउटिंग का प्रशिक्षण लेकर लौट रहे थे। स्टेशन पर खाना खाकर जल्दबाजी मंे गाड़ी पर चढ़े तो पानी पीना भूल गए। अगले छह-सात स्टेशनों पर कहीं भी पानी नहीं मिला। प्यास से बुरा हाल हो गया। उन्होंने उसी दिन प्रण लिया कि जब तक वे स्वस्थ और जीवित रहंेगे, भादरा स्टेशन से किसी यात्री को प्यासा नहीं गुजरने दंेगे।
शिक्षण कार्य और जल सेवा का जज्बा उनके लिए घ्ारेलू जिम्मेदारियों से कम महत्त्व का नहीं रहा। इसका अनुपम उदाहरण देखने को मिला उनकी बेटी की शादी के दौरान। 22 फरवरी 1979 की शाम को उनकी पुत्री मोहन कंवर की बारात पहुंचने वाली थी। तभी शाम 7 बजे स्टेशन पर ट्रेन पहुंचने का समय भी हो गया। नन्दलाल सिंह तो बेटी की शादी छोड़कर मानव सेवा के निर्वहन के लिए चल पड़े। उनके छोटे भाई नारायण सिंह ने बारात आने की बात कह कर उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन वे यह कह कर चले गए कि बारात को कुछ समय इन्तजार कर सकती है लेकिन ट्रेन तो नहीं रूकेगी।
Monday, May 3, 2010
Monday, April 26, 2010
पानी गए न ऊबरे
दो घूँट पानी
'पानी पिलाया?" दो शब्दों का यह छोटा सा सवाल अपने भीतर ग्रंथों के बराबर का जवाब समेटे हुए हैं। एक 'हाँ" सुनते ही प्यासे कंठ के तृप्त होने के बाद चेहरे पर उभरे भाव याद हो आते हैं और जब इसका प्रयोग मुहावरे के रूप में हो तो जवाब सुन दूसरे पक्ष की हार सुकून देती है। पानी है ही ऐसी चीज। निर्जीव में प्राणों का संचार कर देने वाला पानी असल आब है। आजकल तो नहीं दिखता लेकिन कुछ बरस पहले तक पानी पिलाने का सुकून हर गली-चौराहे पर दिखाई देता था। लाल कपड़ों से ढँक की करीने से सजे मटके, जमीन में आधी गढ़ी काली नांद ताकि हरदम पानी ठंडा रहे। 9 बजते-बजते जब दिन चढ़ने लगता प्याऊ पर शीतलता बढ़ती जाती। चाहे खरीदी करने निकलो, यात्रा पर या यूँ ही मटरगश्ती करने, प्यास की क्या फिक्र? कहीं दो पल रूक कर मीठा पानी पी लेंगे। कहीं रंग-बिरंगे प्लास्टिक के गिलास, तो कहीं लोहे की सांकल से बँधा स्टील का गिलास। कहीं तो गिलास का सुख केवल कुछ खास लोगों को ही नसीब होता था बाकि तो थोड़ा झुक कर हाथ की ओक से तृप्त होते थे। क्या दृश्य होता था। पतलून या साड़ी को भीगने से बचाने के लिए पैरों में दबा लिया जाता था फिर भी पैर तो भीग ही जाते थे। पानी पी कर गीले हाथों को सिर पर फेर कर आनंद की अभिव्यक्ति होती थी। क्या अद्भुत अनुभव होता था शिख से नख तक शीतलता पाने का।
आज घर से निकलते वक्त पहली चिंता होती है साथ में पानी लेने की। अधिकांश तो यह चिंता नहीं करते। कदम-कदम पर पाऊच, बोतल और शीतल पेय की उपलब्धता है। सीधे मुँह से लगा कर पिए जा रहे पेय में मेरा दिल प्याऊ सी शीतलता खोजता है, नख से शीश को तृप्त करने वाली शीतलता।
चिंता केवल इतनी ही नहीं है कि बाजार शीतलता बेच रहा है, बड़ी चिंता यह है कि हमारे समाज से प्याऊ खत्म हो रहे हैं और खत्म हो रहे हैं पानी पिलाने वाले। सब चलता है कहने वाले लोगों में कहाँ वह साहस जो गलत काम पर किसी को पानी पिला दे या किसी के कंठ को तर करने के लिए 'कमाने के समय" में प्याऊ पर जलसेवा करे?
किस्सा है कि गुरू गोविंद सिंह के भाई घनैयाजी संघर्ष के दिनों में गुरू सेना को पानी पिलाया करते थे। इस दौरान जब विरोधी सेना का प्यासा सिपाही मिल जाता तो वे उसे भी पानी पिला देते थे। गुरू गोविंदसिंह से शिकायत हुई तो भाई घनैयाजी ने जवाब दिया मुझे तो प्यासा दिखाई देता है। अपने या दुश्मन में भेद कैसे करूँ?
1929 में जब महात्मा गाँधी ने जातीय भेदभाव को खत्म करने की ठानी तो कहा कि उच्च वर्ग के लोग हरिजनों को अपने कुएँ की पाल पर बुलाकर पानी पिलाएँ। यह आह्वान जन चेतना का कारक बन गया था। कितना अच्छा हो कि ऐसे ही किरदार बाजार में खड़े हों लेकिन उनके हाथ में लुकाठी नहीं पानी से भरा पात्र हो।
'पानी पिलाया?" दो शब्दों का यह छोटा सा सवाल अपने भीतर ग्रंथों के बराबर का जवाब समेटे हुए हैं। एक 'हाँ" सुनते ही प्यासे कंठ के तृप्त होने के बाद चेहरे पर उभरे भाव याद हो आते हैं और जब इसका प्रयोग मुहावरे के रूप में हो तो जवाब सुन दूसरे पक्ष की हार सुकून देती है। पानी है ही ऐसी चीज। निर्जीव में प्राणों का संचार कर देने वाला पानी असल आब है। आजकल तो नहीं दिखता लेकिन कुछ बरस पहले तक पानी पिलाने का सुकून हर गली-चौराहे पर दिखाई देता था। लाल कपड़ों से ढँक की करीने से सजे मटके, जमीन में आधी गढ़ी काली नांद ताकि हरदम पानी ठंडा रहे। 9 बजते-बजते जब दिन चढ़ने लगता प्याऊ पर शीतलता बढ़ती जाती। चाहे खरीदी करने निकलो, यात्रा पर या यूँ ही मटरगश्ती करने, प्यास की क्या फिक्र? कहीं दो पल रूक कर मीठा पानी पी लेंगे। कहीं रंग-बिरंगे प्लास्टिक के गिलास, तो कहीं लोहे की सांकल से बँधा स्टील का गिलास। कहीं तो गिलास का सुख केवल कुछ खास लोगों को ही नसीब होता था बाकि तो थोड़ा झुक कर हाथ की ओक से तृप्त होते थे। क्या दृश्य होता था। पतलून या साड़ी को भीगने से बचाने के लिए पैरों में दबा लिया जाता था फिर भी पैर तो भीग ही जाते थे। पानी पी कर गीले हाथों को सिर पर फेर कर आनंद की अभिव्यक्ति होती थी। क्या अद्भुत अनुभव होता था शिख से नख तक शीतलता पाने का।
आज घर से निकलते वक्त पहली चिंता होती है साथ में पानी लेने की। अधिकांश तो यह चिंता नहीं करते। कदम-कदम पर पाऊच, बोतल और शीतल पेय की उपलब्धता है। सीधे मुँह से लगा कर पिए जा रहे पेय में मेरा दिल प्याऊ सी शीतलता खोजता है, नख से शीश को तृप्त करने वाली शीतलता।
चिंता केवल इतनी ही नहीं है कि बाजार शीतलता बेच रहा है, बड़ी चिंता यह है कि हमारे समाज से प्याऊ खत्म हो रहे हैं और खत्म हो रहे हैं पानी पिलाने वाले। सब चलता है कहने वाले लोगों में कहाँ वह साहस जो गलत काम पर किसी को पानी पिला दे या किसी के कंठ को तर करने के लिए 'कमाने के समय" में प्याऊ पर जलसेवा करे?
किस्सा है कि गुरू गोविंद सिंह के भाई घनैयाजी संघर्ष के दिनों में गुरू सेना को पानी पिलाया करते थे। इस दौरान जब विरोधी सेना का प्यासा सिपाही मिल जाता तो वे उसे भी पानी पिला देते थे। गुरू गोविंदसिंह से शिकायत हुई तो भाई घनैयाजी ने जवाब दिया मुझे तो प्यासा दिखाई देता है। अपने या दुश्मन में भेद कैसे करूँ?
1929 में जब महात्मा गाँधी ने जातीय भेदभाव को खत्म करने की ठानी तो कहा कि उच्च वर्ग के लोग हरिजनों को अपने कुएँ की पाल पर बुलाकर पानी पिलाएँ। यह आह्वान जन चेतना का कारक बन गया था। कितना अच्छा हो कि ऐसे ही किरदार बाजार में खड़े हों लेकिन उनके हाथ में लुकाठी नहीं पानी से भरा पात्र हो।
Monday, April 19, 2010
पानी गए न ऊबरे
'ब" से बावड़ी
बीचों बीच में एक बिंदु/ जो जीवन का प्रतीक है/ मुख्य आयत के भीतर लहरें हैं/ बाहर हैं सीढ़ियाँ। चारों कोनों पर फूल हैं/ जो जीवन को सुगंध से भर देते हैं। पानी पर आधारित/ एक पूरे जीवन दर्शन को/ इतने सरल सरस ढंग से/ आठ-दस रेखाओं में/उतार पाना कठिन काम है/ लेकिन हमारे समाज का बड़ा हिस्सा/ बहुत सहजता के साथ/ इस बावड़ी को/ गुदने की तरह/ अपने तन पर उकेरता है।
अनुपम मिश्र जी की ये पंक्तियाँ दरअसल उन लोगों का रेखांकन है जिनके जीवन में पानी घुलामिला था।
अब तो यह किस्से कहानी सा लगता है लेकिन उम्रदराज लोग जानते हैं, गाँव के बाहर एक बावड़ी हुआ करती थी। बच्चों के लिए कौतूहल, महिलाओं के लिए आस्था का केन्द्र, बुजुर्गों के लिए यादों का दस्तावेज। जितने लोग उतनी कहानियाँ। एकांत में पेड़ों की शाखों से ढँकी बावड़ियों के कई किस्से मशहूर हैं। कई यहाँ भूतों का ठिकाना मानते हैं तो देवता भी इसी की पाल पर बसते हैं। हर कोई इस बात से सहमत कि बावड़ी में बारह मास पानी रहता है। पानी भी इतना मीठा कि आत्मा तृप्त हो जाए।
बावड़ी, इहलोक में परलोक सुधारने का मौका भी थी। कहा जाता था कि बावड़ी खुदवाना सौ योग्य पुत्रों के बराबर पुण्य देता है। शासक चाहे कोई रहे, एक काम जरूर हुआ, जगह-जगह धर्मशालाएँ बनी, धर्म स्थल बने और खोदी गई बावड़ियाँ। बावड़ियाँ आस्था से जुड़ी तो राजाओं के सुकून का ठौर भी बनी। पानी के संग शीतलता पाने की ही चाह थी कि जयपुर के आभानेरी में राजा चाँद ने विश्व की सबसे बड़ी बावड़ी बनवाई। इसका नाम ही 'चाँद बावड़ी" है। श्री कृष्ण के ब्रज में आज भी आधा दर्जन बावड़ियाँ हैं। लखनऊ के बाड़ा इमामबाड़ा में 5 मंजिला बावड़ी है। शाही हमाम नाम से प्रसिद्ध इस बावड़ी की तीन मंजिलें आज भी पानी में डूबी रहती हैं। किस्सा तो यह भी है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह में एक ऐसी बावड़ी भी है जिसके पानी से दिये जल उठे थे। सात सौ साल पहले जब गयासुद्दीन तुगलक तुगलकाबाद के निर्माण में व्यस्त था तब श्रमिक हजरत निमाजुद्दीन के लिए काम करते थे। तुगलक ने तब तेल की बिक्री रोक दी तो श्रमिकों ने तेल की जगह पानी से दिये जलाए और बावड़ी का निर्माण किया। अब लोग मानते हैं कि इस पानी से मर्ज दूर होते हंै। माना जाता है कि मंदसौर के पास भादवामाता की बावड़ी में नहाने से लकवा दूर हो जाता है!
आस्था से अलग वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह कि बावड़ी के प्रति पुण्य और अमरता का भाव जगा कर जल संचय के लिए लोक मानस तैयार किया गया। लोक ने बावड़ी को किस्सों, कहावतों और गोदने में शामिल कर जन संचार के माध्यम के रूप में अपना लिया। नई पीढ़ी ने इस संदेश को सुनना बंद कर दिया तो बावड़ियाँ खोने लगी। इनका पानी वृक्षों की शाखाओं के बीच ओझल होता गया। पानी के किनारे रह कर भी लोग प्यासे होते गए।
हर शहर-गाँव में मौजूद बावड़ियों की सुध ले ली जाए तो किस्से भी जीवंत हो उठेंगे और सूखे कंठ भी। जरूरत ककहरे में 'ब" से बावड़ी पढ़ाने की ही है। प्रशासन और बच्चों दोनों के लिए।
बीचों बीच में एक बिंदु/ जो जीवन का प्रतीक है/ मुख्य आयत के भीतर लहरें हैं/ बाहर हैं सीढ़ियाँ। चारों कोनों पर फूल हैं/ जो जीवन को सुगंध से भर देते हैं। पानी पर आधारित/ एक पूरे जीवन दर्शन को/ इतने सरल सरस ढंग से/ आठ-दस रेखाओं में/उतार पाना कठिन काम है/ लेकिन हमारे समाज का बड़ा हिस्सा/ बहुत सहजता के साथ/ इस बावड़ी को/ गुदने की तरह/ अपने तन पर उकेरता है।
अनुपम मिश्र जी की ये पंक्तियाँ दरअसल उन लोगों का रेखांकन है जिनके जीवन में पानी घुलामिला था।
अब तो यह किस्से कहानी सा लगता है लेकिन उम्रदराज लोग जानते हैं, गाँव के बाहर एक बावड़ी हुआ करती थी। बच्चों के लिए कौतूहल, महिलाओं के लिए आस्था का केन्द्र, बुजुर्गों के लिए यादों का दस्तावेज। जितने लोग उतनी कहानियाँ। एकांत में पेड़ों की शाखों से ढँकी बावड़ियों के कई किस्से मशहूर हैं। कई यहाँ भूतों का ठिकाना मानते हैं तो देवता भी इसी की पाल पर बसते हैं। हर कोई इस बात से सहमत कि बावड़ी में बारह मास पानी रहता है। पानी भी इतना मीठा कि आत्मा तृप्त हो जाए।
बावड़ी, इहलोक में परलोक सुधारने का मौका भी थी। कहा जाता था कि बावड़ी खुदवाना सौ योग्य पुत्रों के बराबर पुण्य देता है। शासक चाहे कोई रहे, एक काम जरूर हुआ, जगह-जगह धर्मशालाएँ बनी, धर्म स्थल बने और खोदी गई बावड़ियाँ। बावड़ियाँ आस्था से जुड़ी तो राजाओं के सुकून का ठौर भी बनी। पानी के संग शीतलता पाने की ही चाह थी कि जयपुर के आभानेरी में राजा चाँद ने विश्व की सबसे बड़ी बावड़ी बनवाई। इसका नाम ही 'चाँद बावड़ी" है। श्री कृष्ण के ब्रज में आज भी आधा दर्जन बावड़ियाँ हैं। लखनऊ के बाड़ा इमामबाड़ा में 5 मंजिला बावड़ी है। शाही हमाम नाम से प्रसिद्ध इस बावड़ी की तीन मंजिलें आज भी पानी में डूबी रहती हैं। किस्सा तो यह भी है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह में एक ऐसी बावड़ी भी है जिसके पानी से दिये जल उठे थे। सात सौ साल पहले जब गयासुद्दीन तुगलक तुगलकाबाद के निर्माण में व्यस्त था तब श्रमिक हजरत निमाजुद्दीन के लिए काम करते थे। तुगलक ने तब तेल की बिक्री रोक दी तो श्रमिकों ने तेल की जगह पानी से दिये जलाए और बावड़ी का निर्माण किया। अब लोग मानते हैं कि इस पानी से मर्ज दूर होते हंै। माना जाता है कि मंदसौर के पास भादवामाता की बावड़ी में नहाने से लकवा दूर हो जाता है!
आस्था से अलग वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह कि बावड़ी के प्रति पुण्य और अमरता का भाव जगा कर जल संचय के लिए लोक मानस तैयार किया गया। लोक ने बावड़ी को किस्सों, कहावतों और गोदने में शामिल कर जन संचार के माध्यम के रूप में अपना लिया। नई पीढ़ी ने इस संदेश को सुनना बंद कर दिया तो बावड़ियाँ खोने लगी। इनका पानी वृक्षों की शाखाओं के बीच ओझल होता गया। पानी के किनारे रह कर भी लोग प्यासे होते गए।
हर शहर-गाँव में मौजूद बावड़ियों की सुध ले ली जाए तो किस्से भी जीवंत हो उठेंगे और सूखे कंठ भी। जरूरत ककहरे में 'ब" से बावड़ी पढ़ाने की ही है। प्रशासन और बच्चों दोनों के लिए।
Thursday, April 15, 2010
बलात्कार...फिर भी जलाया...
बैतूल जिले से अपने परिवार के साथ गेहूं कटाई के लिए इटारसी आई आदिवासी युवती को बलात्कार के बाद जला दिया गया। यह घटना इटारसी के पड़ोसी गांव सोमलवाड़ा कला में बुध्ावार की सुबह हुई।
सरकारी अस्पताल में भर्ती थाना सारणी निवासी 18 वर्षीय युवती उसके ही मुंह बोले जीजा जीलू की हवस का शिकार बन गई । युवती अपने परिजनों के साथ 15 दिन पूर्व सोमलवाड़ा कला गांव में गेहूं कटाई के लिए आई थी। पुलिस के अनुसार बुधवार की सुबह 5 बजे युवती अपने तीन साथियों सविता, विनोद और जीलू के साथ ट्रेक्टर-ट्राली पर सवार होकर राजकुमार माल्हा के खेत मंे पहुंचे। जहां चारों ने ट्राली में भूसा भरा, सविता और विनोद तो ट्रेक्टर-ट्राली के साथ वापस लौट आए। जीलू ने खेत में अकेला पाकर युवती से जोर जबरदस्ती की और जब युवती ने यह बात अपने परिवार को बताने की धमकी दी तो उसके मुंहबोले जीजा और एक और साथी ने खेत की नरवाई में आग लगाकर बलात्कार की शिकार युवती को आग में धकेल दिया। युवती बुरी तरह झुलस गई ।
पुलिस ने आरोपी के खिलाफ धारा 376, 307 का अपराध दर्ज किया है । आरोपी की तलाश में पुलिस दल को उसके गांव और अन्य संभावित ठिकानों पर भेजा गया है।
एक ओर युवती पुरूष हैवानियता का शिकार हुई। मध्यप्रदेश में युवतियों, बच्चियों से पहले छेड़छाड़ और विरोध्ा करने पर उन्हें जला देने की घटनाएँ तेजी से बढ़ती जा रही है। नेशनल क्राइम ब्यूरो की माने तो साल 2007 में सबसे ज्यादा 3010 बलात्कार मध्यप्रदेश में हुए थे। बच्चों के साथ बलात्कार में भी मध्यप्रदेश ही अव्वल (892)है। अब मामले बढ़ रहे हैं जब जोर जर्बदस्ती किसी के साथ बलात्कार का प्रयास करो, और वह जब इंकार कर दे तो उसे आग के हवाले कर दो। वाह रे पुरूष !!!
आज तो शहर में बेटी का होना माता-पिता के लिए (अफसोस) सबसे बड़ा बोझ हो गया है। पहले तो बेटी के जन्म पर लोग दुख मनाते थे कि दहेज देना होगा। इस ध्ाारणा को बदलने में कितना ही जोर लगाया लेकिन हम पूरी तरह कामयाब नहीं हुए और अब... माता पिता बेटी के जन्म पर सोचते हैं कि इसकी सुरक्षा कैसे करेंगे?
कितना त्रासद होता होगा उन बेटियों के लिए जिन्हें केवल इसलिए घर में कैद कर दिया जाता है कि उनके काका, मामा, भाई, कोई सगा या कोई परिचित या कोई 'आँखवाला" (जिनकी बुरी नजर इन पड़ जाए) इन्हें अपनी हवस का शिकार बना सकते हैं। मासूम बच्चियाँ आँगन में खेल नहीं सकती, फूदक नहीं सकती और अपने भाई जितने बड़े सपने नहीं देख सकती। सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हक उन्हें प्रकृति ने दिया है, संविध्ाान भी इसकी पुष्टि करता है लेकिन समाज उन्हें बराबरी का यह अध्ािकार नहीं दे पाया। मैं ऐसे कई परिवारों को जानता हूँ जो बेटियों कैद में रखने के हिमायती हैं। पहले वेे पराया ध्ान मान कर सहेजते थे अब बदनामी और असुरक्षा के भय से
ये हाल तो शहरों के हैं। गाँव अभी भी शहरों की तुलना में कई बुराइयों से बचे हुए लेकिन लड़कियाँ यहाँ भी बदकिस्मत निकली। उनके लिए गाँव में भी वैसे ही हालात हैं जैसे शहरों में। यानि पढ़ाई-लिखाई का कोई असर नहीं। हम किसी के स्वाभिमान को कुचलेंगे सो कुचलेंगे। अगर लड़की ने इच्छा का पालन नहीं किया तो सभी जगह एक ही कानून- उसे जला दो।
ऐसी घटनाएँ पीड़ा देती है। दुख है कि समाज में लिंगानुपात का अंतर बढ़ रहा है और लड़कियों की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं।
मुझे एक साथी ने आपबीती बताई थी- मैंने कक्षा सातवीं की किताब में एक कहानी पढ़ी थी-'लड़की हूँ ना। इस कहानी में पढ़ा था कि एक लड़की को उसकी माता लड़की होने के लिए प्रताड़ित करती थी। सारा दोष उसकी कहा जाता था। भाई फेल हो तो भी दोषी वह, भाई का पेट दुखे तो भी दोषी वह। एक दिन किसी ने पूछ लिया- तुम्हे दुख नहीं होता तुम्हारी माँ तुम्हें पिटती है और भाई को दुलार करती है। लड़की ने जवाब दिया-नहीं। मैं लड़की हूँ ना।
कहानी सुनाने के बाद उस युवती ने बताया कि उसने भी घर जा कर अपनी माँ के कार्य व्यवहार को गौर से देखा था और यह जानने का प्रयास किया था कि उसके भाई को लड़का होने के क्या फायदे मिल रहे हैं और उसे लड़की होने के क्या नुकसान हैं।"
इस आपबीती से इतना तो पता चलता है कि घटनाएँ बहुत देर तक पीछा करती हैं। उन बच्चियों का क्या होता होगा जिनकी इच्छा को रौंद दिया जाता है, बेरहमी से।
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वर्ष 2007 में बलात्कार-नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो
3010-मध्यप्रदेश
2106-प बंगाल
1648-उत्तर प्रदेश
11555-बिहार
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बाल अपराध दर्ज मामले-2007, नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो
मध्यप्रदेश-4290
महाराष्ट्र-2707
उत्तप्रदेश-2248
दिल्ली-2019
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बच्चों के साथ बलात्कार-2008, गृह मंत्रालय के आंकड़े
मध्यप्रदेश-892
महाराष्ट्र-690
राजस्थान-420
आंध्रप्रदेश-412
छत्तीसगढ़-411
दिल्ली-301
सरकारी अस्पताल में भर्ती थाना सारणी निवासी 18 वर्षीय युवती उसके ही मुंह बोले जीजा जीलू की हवस का शिकार बन गई । युवती अपने परिजनों के साथ 15 दिन पूर्व सोमलवाड़ा कला गांव में गेहूं कटाई के लिए आई थी। पुलिस के अनुसार बुधवार की सुबह 5 बजे युवती अपने तीन साथियों सविता, विनोद और जीलू के साथ ट्रेक्टर-ट्राली पर सवार होकर राजकुमार माल्हा के खेत मंे पहुंचे। जहां चारों ने ट्राली में भूसा भरा, सविता और विनोद तो ट्रेक्टर-ट्राली के साथ वापस लौट आए। जीलू ने खेत में अकेला पाकर युवती से जोर जबरदस्ती की और जब युवती ने यह बात अपने परिवार को बताने की धमकी दी तो उसके मुंहबोले जीजा और एक और साथी ने खेत की नरवाई में आग लगाकर बलात्कार की शिकार युवती को आग में धकेल दिया। युवती बुरी तरह झुलस गई ।
पुलिस ने आरोपी के खिलाफ धारा 376, 307 का अपराध दर्ज किया है । आरोपी की तलाश में पुलिस दल को उसके गांव और अन्य संभावित ठिकानों पर भेजा गया है।
एक ओर युवती पुरूष हैवानियता का शिकार हुई। मध्यप्रदेश में युवतियों, बच्चियों से पहले छेड़छाड़ और विरोध्ा करने पर उन्हें जला देने की घटनाएँ तेजी से बढ़ती जा रही है। नेशनल क्राइम ब्यूरो की माने तो साल 2007 में सबसे ज्यादा 3010 बलात्कार मध्यप्रदेश में हुए थे। बच्चों के साथ बलात्कार में भी मध्यप्रदेश ही अव्वल (892)है। अब मामले बढ़ रहे हैं जब जोर जर्बदस्ती किसी के साथ बलात्कार का प्रयास करो, और वह जब इंकार कर दे तो उसे आग के हवाले कर दो। वाह रे पुरूष !!!
आज तो शहर में बेटी का होना माता-पिता के लिए (अफसोस) सबसे बड़ा बोझ हो गया है। पहले तो बेटी के जन्म पर लोग दुख मनाते थे कि दहेज देना होगा। इस ध्ाारणा को बदलने में कितना ही जोर लगाया लेकिन हम पूरी तरह कामयाब नहीं हुए और अब... माता पिता बेटी के जन्म पर सोचते हैं कि इसकी सुरक्षा कैसे करेंगे?
कितना त्रासद होता होगा उन बेटियों के लिए जिन्हें केवल इसलिए घर में कैद कर दिया जाता है कि उनके काका, मामा, भाई, कोई सगा या कोई परिचित या कोई 'आँखवाला" (जिनकी बुरी नजर इन पड़ जाए) इन्हें अपनी हवस का शिकार बना सकते हैं। मासूम बच्चियाँ आँगन में खेल नहीं सकती, फूदक नहीं सकती और अपने भाई जितने बड़े सपने नहीं देख सकती। सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हक उन्हें प्रकृति ने दिया है, संविध्ाान भी इसकी पुष्टि करता है लेकिन समाज उन्हें बराबरी का यह अध्ािकार नहीं दे पाया। मैं ऐसे कई परिवारों को जानता हूँ जो बेटियों कैद में रखने के हिमायती हैं। पहले वेे पराया ध्ान मान कर सहेजते थे अब बदनामी और असुरक्षा के भय से
ये हाल तो शहरों के हैं। गाँव अभी भी शहरों की तुलना में कई बुराइयों से बचे हुए लेकिन लड़कियाँ यहाँ भी बदकिस्मत निकली। उनके लिए गाँव में भी वैसे ही हालात हैं जैसे शहरों में। यानि पढ़ाई-लिखाई का कोई असर नहीं। हम किसी के स्वाभिमान को कुचलेंगे सो कुचलेंगे। अगर लड़की ने इच्छा का पालन नहीं किया तो सभी जगह एक ही कानून- उसे जला दो।
ऐसी घटनाएँ पीड़ा देती है। दुख है कि समाज में लिंगानुपात का अंतर बढ़ रहा है और लड़कियों की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं।
मुझे एक साथी ने आपबीती बताई थी- मैंने कक्षा सातवीं की किताब में एक कहानी पढ़ी थी-'लड़की हूँ ना। इस कहानी में पढ़ा था कि एक लड़की को उसकी माता लड़की होने के लिए प्रताड़ित करती थी। सारा दोष उसकी कहा जाता था। भाई फेल हो तो भी दोषी वह, भाई का पेट दुखे तो भी दोषी वह। एक दिन किसी ने पूछ लिया- तुम्हे दुख नहीं होता तुम्हारी माँ तुम्हें पिटती है और भाई को दुलार करती है। लड़की ने जवाब दिया-नहीं। मैं लड़की हूँ ना।
कहानी सुनाने के बाद उस युवती ने बताया कि उसने भी घर जा कर अपनी माँ के कार्य व्यवहार को गौर से देखा था और यह जानने का प्रयास किया था कि उसके भाई को लड़का होने के क्या फायदे मिल रहे हैं और उसे लड़की होने के क्या नुकसान हैं।"
इस आपबीती से इतना तो पता चलता है कि घटनाएँ बहुत देर तक पीछा करती हैं। उन बच्चियों का क्या होता होगा जिनकी इच्छा को रौंद दिया जाता है, बेरहमी से।
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वर्ष 2007 में बलात्कार-नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो
3010-मध्यप्रदेश
2106-प बंगाल
1648-उत्तर प्रदेश
11555-बिहार
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बाल अपराध दर्ज मामले-2007, नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो
मध्यप्रदेश-4290
महाराष्ट्र-2707
उत्तप्रदेश-2248
दिल्ली-2019
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बच्चों के साथ बलात्कार-2008, गृह मंत्रालय के आंकड़े
मध्यप्रदेश-892
महाराष्ट्र-690
राजस्थान-420
आंध्रप्रदेश-412
छत्तीसगढ़-411
दिल्ली-301
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