Sunday, July 1, 2012



कम्प्यूटर पर रोजाना
घंटों अपनी ऊँगलियाँ थिरकाने वाले
क्यों जिंदगी के साफ्टवेयर से परेशान हो?
क्या तुम नहीं जानते
 ऐसे तो हार्डवेयर को होगा नुकसान?

क्यों भूल जाते हो
केवल रीबूट करने से नहीं चलता काम
जिंदगी के सिस्टम को भी करना होता है फार्मेट
सिस्टम की रफ्तार को बढ़ाने के लिए
बेवजह जमा कूकीज को करना होता है डिलिट।
क्यों भूल जाते हो
हटा दी गई ड़वी बातें
जमा हो जाती है रीसाइकल बीन में
समय-समय पर खाली करना होता है
रीसाइकिल बीन भी।

जानते हो ना
अपनी अच्छाइयों को बार-बार सेव करते रहना जरूरी है
तभी अचानक हेंग हुआ जीवन
बिगाड़ नहीं पाएगा कोई फाइल।
निराशाओं को शिफ्ट के साथ डिलिट करोगे
तो नहीं बची रहेंगी ये किसी भी जगह।
क्यों भूल जाते हो कि
कम्प्यूटर सी हो गई जिंदगी में
कुछ कीज को याद रखना जरूरी है
जैसे कंट्रोल, अल्टर और डिलिट को एक साथ दबाए
बिना शुरू नहीं होता कोई भी सिस्टम


वैसे ही अपने जीवन का पीसी भी
खुद पर कंट्रोल, अल्टर और डिलिट
के बगैर शुरू नहीं हो सकता।

बोर्ड पर इन तीनों की दो-दो कीज होने का अर्थ भी यही है
जीवन के दायें रहो या बायें
जब भी पहुँच में होगीं ये तीन कीज
बहुत मुश्किल नहीं रह जाएगा कुछ भी।
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Monday, April 2, 2012

...और साँसें बची रह गईं


फिर हटा लेना मिरे माथे से तू भी अपना साथ
मैं भी चुप हो जाऊँगा बुझती हुई शम्ओं के साथ
और कुछ लम्हें ठहर ! ऐ जिंदगी ! ऐ जिंदगी !


मकबूल शायर अहमद फराज की ये पंक्तियाँ अकसर याद आ जाती है जब जिंदगी को जीतते देखता हूँ। वो कहते हैं ना कि मौत तो महबूबा है संग लेकर जाती है। बहुत बार मौत को देखा है मेरे अपनों को संग ले जाते हुए। कभी सीना तान कर तो कभी चकमा दे कर चोरों की तरह...कभी मौत ने बाज की मानिंद ऐसा झपटा मारा कि कोई  संभल तक ना पाया। लेकिन जनाब, जिंदगी तो जिंदगी है। वह जब बचती है तो देखने वाले स्तब्ध रह जाते हैं। समझ ही नहीं पाते कौन ताकतवर है- जिंदगी या मौत? 


बात हाल ही की एक  रात  की है। रात गहराए कुछ  ही वक्त हुआ था। भोपाल की व्यस्त सड़कों पर गाड़ियाँ रोज  ही की भाँति तेज रफ्तार भागी जा  रही थीं, उतनी ही तेज जितनी रफ्तार से दौड़ रही थी जिंदगी। मैं भी  इस कारवाँ का एक हिस्सा था तभी नजर पड़ी सड़क पार  करने की कोशिश कर रहे एक पिल्ले पर। ख्याल आया, ये नादान क्या जाने सड़क पार करने की भी कुछ नियम होते हैं। दूसरे ही पल विचार आया जिन्हें पता है वे भी कहाँ पालन  करते हैं नियमों का। इसी उधेड़बुन में खोया था कि अचानक एक कार से किसी के टकराने की आवाज आई।  पें-पें-पें की कातर आवाज सुनते ही माजरा समझ में आ गया। कार से  वह कुत्ता टकराया था। पूरे वातावरण में टक्कर की आवाज  के बाद उस कुत्ते की कराह भर कायम थी जो वाहनों के हार्न  के शोर में भी रह-रह कर दबी नहीं थी। मेरे साथ कुछ और लोगों ने जगह बना कर सड़क किनारे गाड़ियाँ लगाई बाकी गाड़ियों को दौड़ना था सो वे दौड़ती रही। हादसे की जगह देखने पर पाता हूँ कि टक्कर मारने वाली गाड़ी जा चुकी थी लेकिन बीच सड़क पर प्राणहीन प्राणी दिखाई दे रहा था। मन में ढ़ेरों विचार...कसक... दुख... पीड़ा और मौत की जीत का दर्द।
 कितनी ही बातें याद हो आई, कितने ही अपने चेहरे याद हो  आए जिन्हें मौत यूँ ही ले गई थी अपने साथ झपट कर। कुछ साथी कुत्ते उसके पास गए और कुछ सूँघ कर भाग गए। तभी क्या देखता हूँ उस पिल्ले ने अपनी गर्दन  उठाई। हे भगवान! ये क्या? क्या इसका केवल पिछला हिस्सा कुचला है? ओह!  दारूण रूदन कब  थमेगा? क्या कोई और वाहन इसे कुचलेगा तब तक... ख्याल मेरे कदमों से तेज चल रहे थे। मैं कुछ कदम पीछे रह गया था तभी एक  मिनी बस सड़क पर पड़े कुत्ते के करीब जाती दिखाई दी। अरे! अब तो कोई बचा नहीं सकता। रात के अंधेरे में तो वह मिनी बस इसे जरूर कुचलेगी। तभी जैसे एक देवदूत प्रकट हुआ। मुझ से पहले दौड़ कर एक छात्र उस कुत्ते के पास पहुँच चुका था। उसके वहाँ पहुँचते ही मिनी बस चालक ने गाड़ी काटी और रवाना हो  गया। लगा मौत दूसरी बार हार गई। पर ख्याल आया, क्या पता पहली टक्कर में कितना शरीर बचा होगा। अच्छा होता कुचल ही गया होता तो इतनी पीड़ा तो नहीं होती। इसके कितने ही वंशज ऐसे ही तो गए हैं। यह क्यूँ रह गया? लगा कुछ पल पहले सड़क पर दिखे एक प्राणी से जैसे मुझे लगाव हो गया। 
तभी क्या देखता हूँ उस छात्र ने जैसे ही हाथ बढ़ाया वह पिल्ला तो खड़ा हो गया...एक बार  फिर चौंकने की बारी थी...अरे! यह तो बच गया! चोट लगी होगी, शायद। उसके बच जाने की खुशी के बीच मैं, वह छात्र और कुछ  लोग उसके शरीर पर घाव खोजने लगे। उस सहमे प्राणी को सड़क किनारे ले गए। देखा तो पाया कि मामूली रगड़ के अलावा उसे कोई बाहरी चोट नहीं लगी थी।  पास की ही दुकान से पानी लेकर उसे दिया गया। कुछ मिनटों बाद वह अपने साथी कुत्ते के साथ उछलकूद कर रहा था। 
मैं सुखद आश्चर्य में खो गया...जिंदगी ऐसी ही होती है। जब जीतती है तो पूरी शान से जीतती है। 


एक बात सच है, चाहे मौत जीते या जिंदगी, आँसू दोनों ही बार आते हैं फर्क केवल इतना है कि जिंदगी की जीत के बाद निकले आँसू खारे नहीं होते। 

Monday, February 13, 2012


कहाँ मिलेगा अलखजी जैसा गुरु
अलखजी नहीं रहे...यह खबर एक बेहतर इंसान के जाने की सूचना ही नहीं है बल्कि संभावनाशील कलाकारों के लिए सफलता का एक द्वार बंद होने जाने की अनचाही घटना है। अलखजी के रूप में एक और 'गुरु" का चले जाना है जो सीखने के लिए शिष्य को पूरी स्वतंत्रता देता था। जो पल भर में शिष्य की पूरी क्षमताओं का आकलन कर लेता था और फिर उसे अभिव्यक्ति के आकाश पर सबसे ऊँचा उड़ने की आजादी दे देता था।
अलखजी के व्यक्तित्व के अनगिनत पहलू हैं जिन पर बात की जानी चाहिए लेकिन उनका 'गुरु" पद ही इतना विराट है कि उसका 'खो जाना" समाज के लिए प्राणतत्व का मिट जाना है। वे सही मायनों में उस गुरु की तरह से थे जो बाहर से कठोर और भीतर से नर्म दिल होता है। खरी-खरी कहने वाला 'दबंग" गुरु। शिष्यों से पूछिए, वे बताएँगे कि अलखजी का गुरुरूप कितना विराट था-'दादा, तब तक अभ्यास करवाते थे जब तक कि अभिनय से संतुष्ट नहीं हो जाते... वे फटकारते थे और तब तक मेहनत करते जब तक कि मनचाहा काम पा न लेते... तारीफ भले कम मिले लेकिन अलखजी की डाँट जरूर मिल जाती थी...।"
इसी रूप ने 'नट बुंदेले" खड़ा किया। संगीतकार ओमप्रकाश चौरसिया, इरफान सौरभ जैसे वरिष्ठ सर्जकों से लेकर उनके पुत्र अंशपायन और हेमंत देवलेकर जैसे नवागत कलाकारों ने अलखजी में कोई एक बात समान पाई तो वो थी शिष्यों को खुलापन देने वाला रूप। पं. चौरसिया ने अलखजी के साथ तब काम किया था जब अलखजी भोपाल आए थे यानि 1983-86 के दौरान। इसी दौरान इरफान सौरभ भी जुड़े जो कारंतजी के बाद 'महानिर्वाण" का चर्चित पात्र 'भाऊराव" के लिए अलखजी की पहली पसंद बन गए थे। दोनों बताते हैं कि अलखजी ने कभी हमारे काम में दखल नहीं दिया। वे इतनी आजादी देते थे कि आप कम से समझौता नहीं कर पाते और यादगार सृजन हो जाता। नए कलाकारों ने उनके संग पिछले नवंबर में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं को मंचित किया था। वे अलखजी की शिक्षा कभी भूल नहीं पाएँगे।
नए और पुराने की साझेदारी के हिमायती अलखजी ने भोपाल में तीन दशकों की यात्रा में कई पड़ाव रचे हैं। शिष्यों के रूप में खड़े किए गए उनके 'माइलस्टोन" उनकी इस यात्रा की गवाही देते रहेंगे। 'नट बुंदेले" के जरिए रंग जगत में लोक संस्कृति को स्पंदन करने वाला 'कबीरा" अपने 'महानिर्वाण" के बाद बहुत याद आएगा...।

Tuesday, November 15, 2011

ख्याल

आज थोड़ा उदास था, दर्द से परेशान भी तभी एक शेर सुना जिसकी कहन कुछ यूँ थी-बचपन के वे दिन कितने मासूम थे, हर बात पर यकीं हो जाता था। हम मान लेते थे कि जाने वाले आसमान में तारे बन जाते हैं।" अचानक सुनाई दिया यह शेर मुझे अतीत में ले गया और यादों में खोने के बाद दर्द कम और दर्शन बढ़ गया।
मुझे याद आया बात 1985 की रही होगी। उस वक्त मेरी उम्र करीब 9 साल। दाँत टूट नहीं रहे थे। हर बच्चे की तरह मेरी भी इच्छा थी कि मैं जल्दी से बढ़ा हो जाऊँ। दूध के दाँतों का न टूटने का अर्थ था मेरा बच्चा रह जाना। जबकि कुछ दोस्तों के दाँत टूटना शुरू हो गए थे। मैं इसी चिंता में रहता कि कम दाँत टूटना शुरू हों और कब में बढ़ा कहलाऊँ। तभी आगे के एक दाँत ने हिलना शुरू किया। रोमांचक था दाँत गिरने का ख्याल। लेकिन अंदर एक भय भी दाँत दर्द होगा। इसी ऊहापोह में पता चला कि मेरे गृह नगर में एक शिविर लगने वाला है जहाँ एक सज्जन किसी वैकल्पिक पद्धति से दाँत निकालेंगे। चूँकि पैसे लगना नहीं थे तो मुझे किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहीं था। फिर क्या था, मैंने यह सोच कर बिना दर्द के दाँत निकाल दिया जाएगा और मेरी हसरत भी पूरी हो जाएगी बिना समय गँवाए पंजीयन करवा दिया। इंतजार के बाद वह दिन आ ही गया जब शिविर का आयोजन हुआ। मैं स्कूल जाने के लिए समय के पहले तैयार हो गया। बस्ता टाँग निकल रही था कि अपनी नानी (जो माँ ही है) को न बताने की हिम्मत न कर पाया। याद नहीं उन्होंने क्या कहा लेकिन मैं कुछ देर में शिविर स्थल पर था। कई बड़े लोगों की कतार में एक मैं ही बच्चा था जो 'बड़ा" होने आया था। इर घड़ी 11 बजे की सूचना दे रही थी उधर स्कूल की घंटी बजने और देर होने पर सर की फटकार का डर हावी हो रहा था। लेकिन इस सब पर भारी था दाँत निकलवाने की खुशी। 
आखिर मेरा नंबर भी आ गया। चिकित्सक सज्जन ने देखा और कहा-दाँत तो हिल ही रहा है। जल्दी उखड़ जाएगा। इसे निकालने की जरूरत नहीं है। मैं रूँआसा हो गया और जिद कर बैठा कि नहीं आप तो निकाल दो। मुझे दर्द होगा। वे मुस्कुराए और अपनी कला से बिना दर्द दिए मुझे 'बड़ा" बनाने की प्रक्रिया की ओर भेज दिया।
उस दिन खुशी-खुशी अपना दाँत लिए घुमता रहा। फिर किसी बुजुर्ग के कहने पर दाँत किसी मकान की छत पर फेंक दिया बेहतरी की कामना के साथ। 
करीब 27 साल बाद ऐसा ही मौका मेरे जीवन में फिर आया जब एक दाँत निकलवाने जाना पड़ा। आज बड़े होने की खुशी नहीं बल्कि ज्यादा ही बड़े हो जाने का भय सता रहा था। शरीर के कमजोर होने की शुरूआत भीतर ही भीतर खाए जा रही थी। आज ज्यों ही चिकित्सक ने कहा-'दाढ़ निकाल देते हैं।" मैं चुप हो गया। जीभ फेर कर दाढ़ को अलविदा कहते इतना साथ देने के लिए शुक्रिया कहना चाहा। आखिर इसी के कारण में इतना रस प्राप्त कर पाया था। 
खैर, दो दाँतों के जाने के बीच में मैं भरपूर जिया लेकिन इस उम्र में एक दाँत का साथ छोड़ कर जाना मुझे दार्शनिक बना रहा है। कुछ यूँ कि उम्र खत्म होने की चिंता होने लगी है और लगता है क्या कुछ कर पाया अब तक।
बचपन में सीखाया जाता था-जीभ नम्र होती है और दाँत सख्त। इसलिए जीभ अंत तक बनी रहती है और दाँत विदा हो जाते हैं असमय। सोचता हूँ, मैं कितना 'जीभ" हुआ और कितना 'दाँत"। कितना चला अब तक और कितना रहा बाकी। एक साथी के जाने का दुख तो है ही।