Sunday, January 12, 2014

कैग की रिपोर्ट में खुलासा : मप्र राज्य पर्यटन निगम प्रदेश को हॉट टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाने में असफल

 हिंदुस्तान का दिल दिखाने के लिए न बनी योजना, न खर्च हुआ पूरा पैसा

 ‘सतपुड़ा की रानी देखो, भोपाल राजधानी देखो, राजधानी में झील देखो, बहता पानी झिलमिल देखो, धर्मों की महफिल देखो, हिंदुस्तान का दिल देखो... कहते हुए मप्र राज्य पर्यटन निगम के प्रदेश को हॉट टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाने की कोशिशें तो खूब की लेकिन कैग का मानना है कि ये कोशिशें केवल दिखावा है। निगम ने न तो प्रदेश के पर्यटन के विकास के लिए ठोस योजना बनाई न इस कार्य के लिए मिली अनुदान राशि का  उपयोग किया। यहां तक कि पर्यटकों के आने के आंकड़े भी अविश्सनीय थे।  कैग ने कंवेंशन निर्माण पर किए गए 37.47 लाख का व्यय भी निरर्थक माना।
मप्र राज्य पर्यटन विकास निगम लिमिटेड की निष्पादन लेखा परीक्षा के बाद भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कैग) ने कई कड़ी टिप्पणियां की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने 2010 में नई पर्यटन नीति बनाई लेकिन निगम ने राज्य में पर्यटन के विकास के लिए कोई योजना नहीं बनाई। वह संयुक्त उपक्रमों के माध्यम से निजी क्षेत्र को आमंत्रित करने में भी असफल  रहा है।
 किराए में ज्यादा बढ़ोतरी घट गए यात्री
कैग ने निगम की 9 होटलों में की गई टैरिफ बढ़ोतरी पर भी सवाल उठाए। निगम ने वर्ष 2007-08 से 2011-12 के दौरान 9 होटलों की टैरिफ दरों में 27 से 102 प्रतिशत की वृद्धि की गई। कैग ने कहा है कि उस होटलों में कम यात्री आ रहे थे। इन होटलों की भरने की दर 15 से 44 प्रतिशत के बीच थी। किराए में वृद्धि करते समय इस कम यात्री संख्या को ध्यान में नहीं रखा गया। इसके कारण पांच होटलों की यात्री संख्या में कमी आ गई और शेष चार में कम वृद्धि हुई। निगम 32 ईकाइयों में चालन अनुपात लक्ष्य के अनुसार नहीं रख पाई और न ही खाद्यान्न सीमा को मेंटेन कर सकी। इसके कारण खाद्यान्न लागत 2.81 करोड़ अधिक रही।
खराब वित्तीय प्रबंधन
कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि निगम को वर्ष 2007-08 से 2011-12 के दौरान केंद्र व राज्य सरकार तथा वित्त आयोग से 248.94 करोड़ का अनुदान मिला लेकिन इस दौरान अनुदान की उपयोगिता का अनुपात 42.52 से 56.32 प्रतिशत के बीच ही रहा। कंपनी ने खर्च किए बिना वित्त आयोग की 10 योजनाओं में 3.12 करोड़, केंद्र सरकार की 7 योजनाओं में 4.90 करोड़ तथा प्रदेश सरकार की 4 योजनाओं में 93 लाख का खर्च किए बिना उपयोगिता प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर दिए।


Thursday, January 9, 2014

कांग्रेस को चमत्कारी चेहरा चाहिए या परिवर्तन करने वाला नेतृत्व ?

क्या यह प्रश्न अब उत्तर पाने को है कि क्या प्रियंका गांधी कांग्रेस की कमान संभाल रही है? विधानसभा चुनावों की करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस और कांग्रेस कार्यकर्ता ऐसी ही किसी ‘जड़ी’ की तलाश में है जो बूढ़ी हो चली पार्टी में युवकोचित सामर्थ्य का संचार कर दे। यह उम्मीद कुछ बरस पहले तक राहुल गांधी से की जा रही थी लेकिन राहुल गांधी ने डायलिसिस पर पड़ी कांग्रेस की संजीवनी का जो रास्ता चुना वह संगठनात्मक बदलाव की जटिलताओं से घिरा है। वैकल्पिक चिकित्सा की तरह इस बदलाव के परिणाम देर से दिखाई देंगे लेकिन कांग्रेस को तो ऐसा रसायन चाहिए जो तुरंत ही उसकी मूर्च्छा दूर कर सके। देश में नरेंद्र मोदी की  लहर सी है।
अधिकांश कांग्रेसी पहले यह स्वीकार नहीं कर रहे थे लेकिन खुले तौर पर स्वीकारने लगे हैं कि मोदी एक मुद्दा है। अब तो दिल्ली में सत्ता संभाल रही ‘आप’ भी खतरा बन गई  है। ऐसे में राहुल के नेतृत्व को क्या फिर से प्रियंका का साथ मिलेगा जैसा वे बहन होने के नाते उत्तर प्रदेश के चुनावों के दौरान देती रही हैं या वे और बड़ी भूमिका संभाल  कर उन लाखों कांग्रेस कार्यकर्ताओं की उम्मीदों को पूरा करेंगी जो कांग्रेस के कर्ताधर्ताओं के तौर-तरीकों को देख कर त्रस्त हो चुके हैं? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रियंका के आने से कांग्रेस जी उठेगी या जनता चेहरे  के करिश्मे की तुलना में योजनाओं और काम को महत्व देने वाली राजनीति का समर्थन करेगी? सवाल बड़े हैं और इनके जवाब खुद कांग्रेस के पहले गांधी परिवार को खोजना है।
कांग्रेस भले ही देश की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी हो। भले ही इसमें कितने ही गुणी और क्षमतावान नेता हों लेकिन कांग्रेस की शुरुआत तो गांधी-नेहरू परिवार से ही होती है। बाकी का नंबर इनके बाद आता है। यही कारण है कि पार्टी ने इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद पार्टी ने उनके बेटे राजीव गांधी की ओर देखा। जब राजीव गांधी नहीं रहे तो सोनिया गांधी, प्रियंका और राहुल गांधी की ओर टकटकी लगाई गई। कहते हैं सोनिया अपने पति को राजनीति में नहीं आने देना चाहती थी लेकिन ऐसा हो न सका। जब स्वयं की बारी आई तो सोनिया ने कांग्रेस की कमान तो संभाली लेकिन प्रधानमंत्री के पद से स्वयं को दूर ही रखा। तब  प्रियंका की तुलना इंदिरा गांधी से की गई और उन पर दबाव बनाया कि वे कांग्रेस की पतवार थाम लें। यही कारण था कि 2004 में राहुल गांधी के चुनावी राजनीति में प्रवेश से भी पहले प्रियंका गांधी के राजनीति में सक्रिय होने की चर्चाएं होती थी। खासकर 1999 में रायबरेली के चुनाव में उनके द्वारा भाजपा प्रत्याशी अरुण नेहरु पर किए गए भावुक हमले की जिसने उस चुनाव का रुख बदल दिया। कांग्रेस प्रत्याशी कैप्टन सतीश शर्मा के समर्थन में प्रियंका ने एक सभा में कहा था-  ‘मुझे रायबरेली के लोगों से एक शिकायत है कि जिसने मेरे पिता के मंत्रिमंडल में रहते उनसे गद्दारी की, जिसने भाई की पीठ में छुरा घोपा, आपने उसे रायबरेली में घुसने कैसे दिया?’ प्रियंका के इतना कहने के बाद अरुण नेहरु न केवल हारे बल्कि चौथे स्थान पर पहुंच गए।
कांग्रेस को प्रियंका में वह सब नजर आया जो जनता को लुभा सकता था और उनकी भावुकता को वोट में बदल सकता था। प्रियंका ने राजनीति से दूरी बनाने का फैसला किया तो सारी उम्मीदें राहुल तक आ कर टिक गई। राहुल पार्टी में आए जरूर लेकिन उन्होंने पद पहले संगठन को सुधारने का काम चुना। यह ऐसी राह थी जो  कई कांग्रेसियों को पसंद नहीं आ रही है। राहुल आम आदमी और कार्यकर्ता की बात कर रहे हैं और नेताओं को तो ऐसे नेता की तलाश है जो केवल पार्टी का ‘चेहरा’ हो। वह पार्टी की ‘मांसपेशियों’ से छेड़छाड़ न करे। यही कारण है कि प्रत्यक्ष रूप से राहुल की बातों को स्वीकारने वाले नेता उन निर्णयों को लागू ही नहीं होने देते जो उन्हें पसंद नहीं है या जो उनकी राह में बाधा बनते हैं। यही कारण है कि राहुल के ‘आॅपरेशन कांग्रेस’ से अलग बड़ी संख्या में नेता ‘करिश्माई चेहरा’ प्रियंका की सक्रियता से आस लगाए बैठे हैं। मंगलवार को प्रियंका द्वारा कांग्रेस के बड़े नेताओं के साथ बैठक  का यही अर्थ निकाला गया कि वह खुलकर बड़ी भूमिका में आने की तैयारी में है। 
मोदी और ‘आप’  के दौर में प्रियंका में अपना भविष्य खोजने वाली कांग्रेस को सोचना होगा कि क्या सच में प्रियंका कांग्रेस के लिए तुरुप का इक्का  है? कांग्रेस बार-बार यह खारिज करती रही है कि प्रियंका राजनीति में आ रही है। अभी भी उसके बड़े नेता प्रियंका के बैठक लेने को सामान्य घटना ही मान रहे है लेकिन आम कांग्रेसी के लिए प्रियंका का कांग्रेस की कमान संभालना आम बात नहीं है। यह उसके लिए उसकी पंसदीदा पार्टी के जीवन मरण का प्रश्न है।  भीतर ही भीतर यह भय भी है कि कहीं प्रियंका भी असफल हो गई तो? इस तो का जवाब है कि तब पार्टी को चेहरे के करिश्मे पर निर्भरता को खत्म करना होगा। यह निर्भरता आज से नहीं है, बरसों पुरानी है। अगर पार्टी को चेहरे पर निर्भरता को खत्म करके ही आगे बढ़ना है  तो वह आज राहुल-प्रियंका के साथ ही यह कदम क्यों नहीं उठाती है? चेहरों पर निर्भरता खत्म करना ही तो आखिर पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी का एजेंडा है।

Friday, January 3, 2014

‘आप’ की वजह से बढ़ गई अन्य दलों की चुनौतियां

आम आदमी पार्टी के मुखिया से दिल्ली के मुख्यमंत्री बने अरविंद केजरीवाल ने आखिरकार अपनी सरकार का विश्वास जीत लिया। साल 2014 का दूसरा ही दिन इस ऐतिहासिक पल का गवाह बना जब एक साल पुरानी पार्टी का मुखिया देश का दिल कही जाने वाली दिल्ली का शासक बना। वह दिल्ली जो बहादुर शाह जफर की दिल्ली कही जाती है। ‘आप’ का उदय और ‘आप’ का बहुमत साबित करना कई मायनों में ऐतिहासिक है। इस सफलता को बहुत सतही शब्दों में कहा जाए तो ‘आप’ की यह सफलता कांग्रेस सरकार के कामकाज से नाराजी का परिणाम है। ईमानदारी के पक्ष में टीम केजरीवाल के काम और कहे पर लोगों ने भरोसा जताया। यह बहुत बड़ा विरोधाभास है कि जिस कांग्रेस की सरकार को कोस कर केजरीवाल ने वोट हासिल किए, वही कांग्रेस विश्वास मत हासिल करने में ‘आप’ की सीढ़ी बनी।
शपथ के पहले 48 घंटों में केजरीवाल ने उन सारे वादों को पूरा कर दिया जिनके बल पर वे सरकार में आए थे। इसके पीछे यह उद्देश्य भी था कि अगर सदन में विश्वास मत हासिल न हो तो कम से कम यह तो कहा जा सके कि हमारा मंतव्य था, कांग्रेस ने वादा खिलाफी की। अब सरकार भरोसा जीत चुकी है तो उसके पास काम करने के छह माह हैं। इन छह माह में उसके खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव नहीं आ सकता। यही छह माह अब सदन के बाद अपने विश्वास मत को साबित करने का सुनहरा अवसर और सबसे बड़ी चुनौती है। चुनौती यह भी कि लोकलुभावन बातें करना आसान हैं और उनको यर्थाथ में पूरा करना अलग बात है। कांग्रेस ने शायद यही सोच कर ‘आप’ को समर्थन भी दिया है कि बाहर रह कर बहुत विरोध किया, अब सरकार चला कर दिखाओ। इस लिहाज से वही कांग्रेस ‘आप’ की सबसे बड़ी चुनौती है जो सदन में उसके साथ बैठी है।
जनता के समर्थन के बाद मेट्रो यात्रा, लालबत्ती का तिरस्कार, मुफ्त पानी और सस्ती बिजली, मीटरों और खातों की जांच माहौल ‘आप’ के पक्ष में था। अब तो उसके साथ सदन में विश्वास भी है। अब सवाल यह है कि इस विश्वास मत के बाद अब आगे क्या? असल में दिल्ली की ‘आप’ की सरकार एक फिल्मी प्रेम कहानी के त्रिकोण की तरह है। यहां ‘सत्ता’(पॉवर) अगर प्रेमिका है तो ‘आप’ अपने उद्देश्यों और अपने वादों को साबित करने के लिए उसे पाना चाहती थी। भाजपा वह प्रेमी है जिसके हाथ प्रेमिका के पास पहुंच कर भी रीते हैं। वह विपक्ष में है और उसके दुश्मन कांग्रेस ने विरोधी से हाथ मिला कर सत्ता रूपी प्रेमिका तक उसके पहुंचने की राह रोक दी। कांग्रेस,‘आप’ और भाजपा के इस प्रेम त्रिकोण के कई कोण है। यहां पर्याप्त ईर्ष्या भी है और अबूझ सा नाता भी जिसके कारण कांग्रेस उस पार्टी का साथ दे रही है जिसका हाथ उसकी पराजय का सबब बना। ‘आप’ की ओर से बार-बार कहा गया कि हम सरकार बनाने के इच्छुक नहीं हैं। हमने किसी से समर्थन नहीं मांगा। जनता ने सरकार बनाने का आदेश दिया। हम अपना काम कर रहे हैं। विश्वासमत पर बहस के दौरान भाजपा विधायक दल के नेता हर्षवर्धन ने ‘आप’ के पहले दोनों फैसलों की आलोचना के साथ-साथ पार्टी की फंडिंग और दूसरे मसले भी उठाए। यह भाजपा की नाराजी की पहली अभिव्यक्ति थी। साफ जाहिर होता है कि अब तक चुप रही भाजपा अब तीखी प्रतिक्रिया देने से नहीं चुकेगी। यानि कि जन आशीर्वाद के नाम पर ‘आप’ का सम्मान विराम लेगा और ताकतवर विपक्ष खुल कर सत्ताधारी ‘आप’ पर हमले करेगा।
इस प्रेम तिकोण में कांग्रेस तीसरा और सबसे कमजोर पक्ष है। वह सत्ता से सबसे दूर होनी था लेकिन वही सत्ता पाने का जरिया बनी। कांग्रेस ने ‘आप’ सरकार को समर्थन देने का फैसला जिस इरादे से किया था, वह पूरा नहीं हुआ। बल्कि पार्टी ने खुद को फंसा लिया है। वह सोच रही थी कि ‘आप’ की अनुभवहीनता उसके लिए लाभदायक होगा लेकिन केजरीवाल सरकार ने जिस तेजी से शुरूआती फैसले किए हैं, उसके निहितार्थ को भी समझना चाहिए। ये फैसले विश्वासमत हासिल करने के बाद भी किए जा सकते थे। विश्वास मत गुरुवार को था, पर अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार को कहा कि मेरे पास केवल 48 घंटे का समय है क्योंकि कांग्रेस को लेकर चल रही अटकलों के कारण उनके मन में संदेह उपज चुका था। लिहाजा, कांग्रेस के पास पलटने का कोई मौका नहीं था। ‘आप’ को प्रचलित राजनीति नहीं आती, मगर उसने सबसे शातिर राजनीति का पैंतरा चला है। असल में ‘आप’ दिल्ली के बहाने दिल्ली (संसद) तक पहुंचना चाहती है। इसलिए अगले छह माह वह जनता के भरोसे पर खरा उतरने के लिए पूरे प्रयत्न करेगी। सबसे बड़ी बात यह है कि उसकी नकल के तौर पर ही सही लेकिन अन्य दलों को भी अपने कामकाज का तौर तरीका बदलना होगा। ‘आप’ की सफलता इसमें भी है कि वह देश की राजनीति की चाल बदल रही है। उसकी चुनौतियां अपनी जगह है लेकिन इससे अन्य दलों की चुनौतियां खत्म नहीं हो जाती।

Saturday, November 23, 2013

‘आप’ का स्टिंग और नैतिकता का तकाजा

भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर मैदान में उतरी आम आदमी पार्टी (आप) अब खुद भ्रष्टाचार के आरोप झेल रही है। गुरुवार को समाचार चैनलों पर स्टिंग आॅपरेशन के फुटेज सामने आए। इसमें ‘आप’ के प्रमुख नेताओं समेत सात उम्मीदवारों पर अवैध तरीके से पैसा जुटाने के खुलासे का दवा किया गया है। स्टिंग आॅपरेशन न्यूज पोर्टल ‘मीडिया सरकार’ ने किया है। जिन प्रत्याशियों पर अवैध तरीके से फंड जुटाने का आरोप लगा है उनमें ‘आप’ की आरकेपुरम से उम्मीदवार शाजिया इल्मी और प्रमुख कार्यकर्ता कुमार विश्वास भी शामिल हैं। आरोप है कि ये लोग गलत तरीके से पार्टी के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे थे।
उधर, एक चैनल ने अरविंद केजरीवाल के बारे में खुलासा किया है कि उन्होंने नौकरी में रहते हुए दो जगहों से तनख्वाह ली। हालांकि ‘आप’ का कहना है कि फुटेज में घालमेल किया गया है। कुमार विश्वास का कहना है कि मैं कवि हूं।  पैसे कमाता हूं, अपनी प्रतिभा से कमाता हूं। मैं बिजनेस क्लास में सफर करता हूं तो रामलीला मैदान में जाकर डंडे भी खाता हूं। आमदनी पर टैक्स देता आया हूं। कवि सम्मेलन के लिए अपनी फीस वह कैश और चेक दोनों तरीकों से लेता हूं और अगर इस देश में कैश से पैसे लेना अपराध है तो मैं आज ही सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लूंगा।
यह सब तब हुआ है जब मीडिया में ‘आप’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल और अण्णा हजारे के बीच विवाद की खबरें प्रसारित हुई थीं और केजरीवाल पर स्याही फेंकी गई। दिल्ली सहित देश के पांच राज्यों में चुनाव है और किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल नहीं है कि दिल्ली का यह घटनाक्रम क्यों हो रहा है। बार-बार के सर्वे और रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ‘आप’ का राजनीतिक अवतरण इस बार दिल्ली के चुनावी समीकरण बिगाड़ेगा। पार्टी बनने के पहले अण्णा के नेतृत्व में हुए आंदोलन में टीम केजरीवाल को मिला जनसमर्थन उनकी लोकप्रियता का गवाह है। ‘आप’ भले सरकार न बनाए या उसके प्रत्याशी न जीते लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि वह खेल बिगाड़ने वाली है। किसी तीसरे का मुकाबले में आ जाना दो बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा को नागवार  गुजरना लाजमी है। इस लिए ‘आप’ के साथ हो रहे ताजा घटनाक्रमों में राजनीतिक साजिश के शक को खारिज नहीं किया जा सकता है।
‘आप’ के साथ जो हो रहा है वह किसी फिल्मी घटनाक्रम सा लगता है जिसमें हीरो और उसके सहायक अपनी नादानियों के कारण विलेन के षड्यंत्रों में उलझ जाते हैं और एक समय लगने लगता है कि विलेन की साजिशें सफल हो जाएंगी और सच्चा होने के बाद भी हीरो का समूह हार जाएगा। यहां ‘आप’  या किसी और पार्टी को हीरो या विलेन नहीं बताया जा रहा है बल्कि यह रेखांकित करना चाहता हूं कि कोई भी राजनेता हो वह एक बड़े समूह का हीरो होता है। उसकी ‘कारगुजारियों’ के बाद भी उसके समर्थक उसे पाक साफ ही मानते हैं और यही सोचते हैं कि उसके विरोधियों ने साजिश कर उसे फंसाया है। हर नेता के लिए समर्थकों का यह विश्वास बड़ी पूंजी होता है लेकिन विडंबना है कि नेता हर बार इस पूंजी को दांव पर लगाते हैं। ‘आप’ राजनीति में नई पार्टी है और इसके कार्यकर्ताओं को अभी ‘राजनीति’ का  उतना अनुभव नहीं है वरना वे दूसरे शातिर नेताओं की तरह फंसते नहीं। दरअसल, ‘आप’ पर ताजा हमलों या खुलासों के बहाने हमें देश की राजनीति के तौर-तरीकों पर सोचने-विचारने का मौका मिल गया है। जिस आंदोलन के पीछे देश के लाखों लोग खड़े हों उसके कर्ताधर्ताओं पर नैतिक जिम्मेदारी ओर लोगों की तुलना में ज्यादा होती है।
इसे यूं समझा जा सकता है। हम सामान्य तौर पर मानते हैं कि नेताओं को काली कमाई नहीं करनी चाहिए। उन्हें जीतने के लिए आपराधिक हथकंडों को नहीं आजमाना चाहिए। भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। अपना घर चमकाने के बदले जनता की पीड़ा हरनी चाहिए। उन्हें सेवक होना चाहिए, शासक नहीं। लेकिन अधिकांश नेता इन मान्यताओं को तोड़ते है और भरपूर तोड़ते हैं। वे अपने पद और पॉवर का खूब इस्तेमाल करते हैं। जनता सब जान कर भी सहती रहती है। मान लेती है कि यही राजनीति का रूप-रंग है। लेकिन जब ‘आप’  जैसी पार्टी  के ऊपर ऐसे आरोप लगते हैं तो उसके हजारों समर्थकों का मन बुझने लगता है। वह मायूस होने लगती है। अभी आरोपों का सिद्ध होना बाकि है। अगर ये सिद्ध हो जाएंगे तो कई दिल टूटेंगे। आरोप सिद्ध न हुए तो विश्वास सुदृढ़ होगा।
यही कारण है कि न केवल ‘आप’ के सदस्य बल्कि जीवन में हर उन लोगों के ऊपर यह विशेष जिम्मेदारी है कि वे जिन सिद्धांतों की पैरवी कर रहे हैं उनके पालन के लिए अतिरिक्त रूप से सतर्क रहें। या जिनकी वे मुखालफत कर रहे हैं उन सिद्धांतों का भूले से भी समर्थन न हो जाए। जब कोई कार्य मिशन हो जाता है तो वहां निजी और सार्वजनिक मूल्यों में कोई अंतर नहीं रह जाता। व्यक्तिगत और व्यवसायिक सिद्धांतों में फर्क नहीं होता। जैसे आप होते हैं वैसे दिखना भी पड़ता है और जैसे दिखते हैं वैसा होना भी पड़ता है। ‘गाइड’ फिल्म का मुख्य किरदार राजू गाइड इस रूपांतरण का सबसे बड़ा उदाहरण है। नैतिकता का यही तकाजा गुजरे जमाने से हमारी बाध्यता रही है और इस 21 वीं सदी में भी यही एक सीमा रेखा है। जिसके एक तरफ  विश्वास है दूसरी तरफ  दरका हुआ भरोसा।