Thursday, October 29, 2015

- तर्क का उत्तर प्रतितर्क से दिया जा सकता है... लात तो गधे भी मारते हैं : अशोक वाजपेयी


साहित्यकार, कला-साहित्य आलोचक, ब्यूरोक्रेट और भारत भवन के शिल्पकार अशोक वाजपेयी पिछले दिनों फिर चर्चा में आये जब उन्होंने साहित्य अकादेमी अवार्ड लौटाते हुए असहमति की स्वंतत्रता पर आसन्न खतरे का विरोध किया। यह सम्मान उन्हे 1994 में मिला था। वे मानते हैं कि असहिष्णुता इस देश का चरित्र नहीं है। भोपाल प्रवास पर आये वाजपेयी ने चर्चा करते हुए साहित्यकारों के विरोध और इस विरोध की आलोचना में उठे स्वरों पर विस्तार से बात की। वाजपेयी ने कहा कि यह संघर्ष यात्रा बहुत लंबी है। ये उन सामाजिक तत्वों से भी संघर्ष है जिनको सत्ता का मौन समर्थन प्राप्त है। उनको इतनी आसानी से अपदस्थ नहीं किया जा सकता। सत्ता तो फिर भी बदली जा सकती है लेकिन जो सामाजिक वृत्तियां विकसित हो गई हैं उन्हें एकदम से नहीं बदल सकते। वाजपेयी से दृढ़ता सेे कहा कि भाजपा की समस्या यह है कि इनकी विचार दृष्टि इतनी बांझ और अनउर्वर है कि उससे उत्कृष्टता निकल ही नहीं सकती। इस बातचीत के प्रमुख अंश: 

सम्मान लौटाने के पीछे दो चीजें थी। एक तो यह कि लोगों का ध्यान इस आकर्षित हो कि देश में सामाजिक समरसता, परस्पर संवाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि क्षेत्रों में क्या हो रहा है और उसके दूरगामी परिणाम क्या होने वाले हैं। इसतरह एक तरफ तो सरकार को चेताना था और उससे ज्यादा लोगों को बताना था कि इस समय सावधानी और सतर्कता की आवष्यकता थी। लेखक लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं? एक तो वे लिख कर सकते हैं जो दूरगामी प्रोजेक्ट होता है। पहले भी लिखते रहे हैं और अभी भी लिख रहे हैं सम्मान लौटाने जैसा कुछ नाटकीय भी करना आवष्यक है। चूंकि ऐसा निजी फैसले थे, आपस में मिल कर तय नहीं हुई थी। मुझे उदय प्रकाश ने फोन किया था। उदय प्रकाश साहित्य अकादेमी के लिए मुझ पर एक फिल्म बना रहे हैं तो मुझे लगा कि मैं साथ जाऊंगा तो सम्मान लौटाने को उस फिल्म से जोड़ा जायेगा। लेकिन जब नयनतारा सहगल जैसी साहित्यकार ने सम्मान लौटाया और फिर जब अंग्रेजी साहित्यकारों ने भी सम्मान लौटाये तो मैंने इस पर विचार किया। आमतौर पर अंग्रेजी के साहित्यकार ऐसे कार्यों में हिन्दी वालों का साथ नहीं देते हैं। लेकिन ये नहीं सोचा था कि इनका इतना व्यापक असर होगा। अब तो वैज्ञानिकों-कलाकारों ने भी इस विरोध में साझा करना आरंभ कर दिया है। 

भाजपा सरकारों ने संस्थाओं को नष्ट ही किया : 

विरोध में यदि में वैकल्पिक दृष्टि लायें तो ठीक है लेकिन भाजपा की समस्या यह है कि इनकी विचार दृष्टि इतनी बांझ और अनउर्वर है कि उससे उत्कृष्टता निकल ही नहीं सकती। ये लोग चुन-चुन कर बौनों को रख रहे हैं जैसे राष्ट्रीय पुस्तक न्यास में किसी को नियुक्त कर दिया। ये इसलिये सुनियोजित हैं कि जहां-जहां भाजपा सत्तारूढ़ हैं वहां इन्होंने संस्थाओं को नष्ट ही किया है। कोई नई संस्था नहीं बनाई। भोपाल में बनाया गया आदिवासी संग्रहालय एकमात्र अपवाद है लेकिन इसे भी आप भारत भवन से प्रेरित कह सकते हैं। पूरे देश  में उनका काम संस्थाओं को नष्ट करना, उन्हें हथियाना, उनका कद गिराना। यही हो सकता है क्योंकि उनके पास उत्कृष्ट विकल्प है ही नहीं। जब आप रोमिला थापर और इरफान हबीब के मुकाबले दीनानाथ बत्रा को खड़ा करेंगे तो सारे बौद्धिक जगत में आपकी जग हंसाई होगी। वामपंथी इतिहासकारों ने ज्यादती की है तो उनके तर्क को काटने के लिए उस स्तर के लोग को चाहिये जो उसी दर्जे का तर्क दे सकें।  

बाइबल-कुरान एक, हमारे पास 4 वेद : 

अब तो मैं कहता हूं कि आरएसएस और भाजपा से हिन्दुत्व पर बहस की जाये। हम उनसे कहें कि हमारी दृष्टि में हिन्दू धर्म क्या है और हमारी समझ क्या है। आप लाइये साक्ष्य और हम देते हैं साक्ष्य। जिस धर्म में स्वयं देवताओं, भाषा, खानपान की इतनी बहुलता है। जिसमें 33 करोड़ देवी देवता हैं। उस धर्म में बहुलता के खिलाफ आप तर्क देते हैं। कुरान और बाइबिल के मुकाबले हमारे पास चार वेद हैं, उपनिषद अठारह हैं, दो महाकाव्य हैं। इन सबके बीच षैव और षाक्य के बीच, षैव और सांख्य के बीच झगड़े भी होते रहे हैं। जिस धर्म में एक आदिवासी महिला को भगवान को झूठे बैर खिलाने का सौभाग्य प्राप्त है, जिस धर्म में उडू़पी में एक दलित को मंदिर में प्रवेश  न देने पर भगवान कृष्ण की प्रतिमा का मुख उस ओर पलट गया जिस ओर दलित पूजा कर रहा था। ये हिन्दू धर्म है। इसे एक ही में कैसे बदल सकते हैं? हमारे तर्क का जवाब प्रतितर्क से दीजिये। ये कहिये कि यह प्रतितर्क है। आप कहेंगे कि हम उल्लू है तो यह तो गाली हुई। तर्क का उत्तर प्रतितर्क से दिया जा सकता है। लात तो गधे भी मारते हैं। 

विरोध का स्तर ही विरोधियों का चरित्र : 

आप जिसका विरोध करते हैं वह क्या प्रत्युत्तर में क्या कर रहा है इससे सामने वाले की गुणवत्ता और स्तर भी पता चलता है। मैं तो सोशल मीडिया देखता नहीं हूं लेकिन सुनता हूं कि उसमें बहुत घटिया स्तर पर चरित्र हनन की कोषिषें की गई। ठीक है। यह बताता है कि हमारे विरोधी किस स्तर पर हैं। 

आपातकाल या 1984 में क्यों नहीं लौटाया : 

ऐसा है कि कोई कब विरोध करे, यह तो उसका निर्णय है। आप तो तय नहीं कर सकते कि कोई कब विरोध किया जाये। यह तो पहली बात। दूसरी बात यह कि 1984 या आपातकाल के दौरान इन साहित्यकारों को पुरस्कार मिला ही नहीं था। वे सारी घटनायें निंदनीय थीं लेकिन वे वैसी सुनियोजित नहीं थीं जैसी आज की घटनायें हैं। ये हर क्षेत्र में धीरे-धीरे फैल रही हैं। तीन लेखक और बुद्धिजीवी तो जान से मारे गये हैं लेकिन इसके अलावा भी काफी काम हो रहे हैं। संस्थाओं का अधिग्रहण हो रहा है। ललित कला अकादेमी को भंग कर दिया गया। जवाहर लाल नेहरू स्मारक पुस्तकालय में घुसपैठ की गई है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास का अध्यक्ष अज्ञात कुलशील व्यक्ति को बना दिया गया है। आईआईटी में सामिष भोजन मांगने पर छात्रों को देशद्रोही तथा हिन्दुद्रोही कहा गया। इस तरह का वातावरण फैलेगा तो विरोध तो होगा। ये भी तर्क दिया गया कि ये घटनायें तो उन राज्यों में हुई जहां कांग्रेस या सपा जैसे दलों की सरकारें थीं। सही है। हमें भी पता है। लेकिन ये सारी सरकारें भी इन चीजों के प्रति असंवेदनषील भाव रख रही हैं। हमारा उद्देष्य किसी एक सरकार की निंदा करना नहीं है। जब इतने बहुमत से आई सरकार केन्द्र में है तो उसकी जिम्मेदारी बनती है। 
मुखर प्रधानमंत्री चुप क्यों?
जिस दिन हमने सम्मान लौटाया उसी दिन राष्ट्रपति ने इस देश की एकता के खतरे पर ध्यान आकृष्ट किया। उसी दिन प्रधानमंत्री ने भी राष्ट्रपति की चेतावनी पर ध्यान देने की बात कही थी। हम सिर्फ विरोध के लिए तो विरोध नहीं कर रहे हैं। आपके आचरण से भी पता चला रहा है कि यह हो रहा है। फिर आप चुप क्यों हैं? एक इतना मुखर-वाचाल प्रधानमंत्री जिसकी हर छोटी-बड़ी चीज पर अपना मत प्रकट कर रहा है, वो फिर क्यों चुप है? छोटी-छोटी बातों पर आप एडवाइजरी जारी करते हैं तो फिर ये तो उनसे बड़ा खतरा है। ये तो देष के टूटने का खतरा है। एक तरह से असहमति के असम्मान का खतरा है। इसकी ओर क्यों ध्यान आकर्षित नहीं कर रहे? 

सरकार कैसे बतायेगी कि हम क्या करें?

सरकार ने एक नया तरीका अपनाया है। राजनीतिक दृष्टि से उचित, संवैधानिक दृष्टि से वैध वक्तव्य देना। कहो कि हम देश की एकता पर किसी भी खतरे का मुकाबला डट कर करेंगे जैसा कि वित्तमंत्री अरूण जेटली ने कहा। लेेकिन अपने आचरण में प्रकट मत होने दो। अब यदि यह सरकार तय करने लगे कि हम क्या सोचें और क्या न सोचें, क्या लिखें और क्या न लिखें, क्या खायें और क्या न खायें तो सोचना चाहिये कि हम कहां जा रहे हैं। ये न तो हमारे संविधान से निकलती हुई दृष्टि है और न हमारी परम्परा से निकलती हुई दृष्टि है। यह तो हमारी परम्परा का घोर अपमान है। हमारी परम्परा में शास्त्रार्थ जैसी सामाजिक संस्था थी। किसी नये विचार को तब तक प्रतिष्ठित तथा स्थापित नहीं किया जा सकता था जब तक कि खुले वाद-विवाद में उसे सिद्ध न कर दें। जिस देष में यह परम्परा रही है, उस देश में क्या आप ये कहेंगे कि जो हमसे अलग है, वह देशद्रोही है, जो हमारे धर्म को नहीं मानेगा वो हमारे धर्म का विरोधी है? फिर वो किसी भी तरह के अल्पसंख्यक सिर्फ धर्म के ही अल्पसंख्यक नहीं आप अगर विचार में अल्पसंख्यक, आप अगर मूल्य दृष्टि में अल्पसंख्य है तो क्या देष में जगह नहीं रहेगी? फिर लोकतंत्र क्या है?

आगे क्या?

ये एक लम्बी संघर्ष यात्रा है। ये उन सामाजिक तत्वों से भी संघर्ष है जिनको सत्ता का मौन समर्थन प्राप्त है। उनको इतनी आसानी से अपदस्थ नहीं किया जा सकता। सत्ता तो फिर भी बदली जा सकती है लेकिन जो सामाजिक वृत्तियां विकसित हो गई हैं उन्हें एकदम से नहीं बदल सकते। दूसरी तरफ, मंत्रियों के इस तरह से गैर जिम्मेदार, बचकाना बयान आते रहते हैं, एक के बाद एक। उनको आप चुप नहीं करवा सकते? हम 1 नवंबर को दिल्ली में एक राष्ट्रीय अधिवेशन कर रहे हैं। इसमें बड़ी संख्या में लेखकों-कलाकारों के भाग लेने की उम्मीद है। फिर सोचेंगे कि क्या किया जाना चाहिये।

भारत भवन को स्थानीय संस्था बना दिया : 

भारत भवन मेरी दुखती रग है। वो इसलिये कि इसे बनाने में, दस साल तक इसे चलाने में, इसको अंतराष्ट्रीय कीर्ति के षिखर तक पहुंचाने में हम लोगों की भूमिका रही है। हमने अबाध ढंग से यह काम किया था। कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं था। कोई नौकरशाही या प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं था। हमें पूरी तरह स्वतंत्रता थी और हमने एक बहुलतावादी परिसर बनाया था। उसमें वो लोग भी बुलाते थे जो हमारी दृष्टि से सहमत नहीं थे। जैसे विद्यानिवास मिश्र, निर्मल वर्मा आदि। कह सकते हैं कि ये भाजपा की विचारधारा से अधिक निकट माने जाते थे। हम उन्हें भी आदर से बुलाते थे क्योंकि वे जिम्मेदार लोग थे। वे अपने से अलग दृष्टि का भी सम्मान करने वाले लोग थे। अब धीरे-धीरे जिस तरह से हस्तक्षेप बढ़ते गये हैं, भारत भवन एक स्थानीय संस्था बन कर रह गया है। यह भाजपा सरकार के पहले एक-दो वर्षों में बन गई थी। 

Sunday, October 11, 2015

किसान मर रहे थे कृषि मंत्री माला पहन रहे थे...

रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था...बहुत साल हुए हम शासकों की लापरवाही, जनता के मुद्दों के प्रति गंभीरता को इसी कहावत से व्यक्त करते आ रहे हैं। लेकिन अब इस कहावत को बदल लीजिए। हमें कहना चाहिए जब मध्यप्रदेश में किसान फसलों की बर्बादी से निराश, हताश हो कर अपनी जान दे रहे हैं तब कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन उद्घाटन कार्यक्रमों, जिला सहकारी बैंक के कर्मचारियों के अभिनंदन और सम्मान समारोह में मालाएं पहनने में व्यस्त थे। उनके पास समय नहीं था कि वे किसानों की समस्यायें जानने के लिए अधिकारियों के साथ बैठक करते। 30 सितंबर से लेकर 8 अक्टूबर तक बिसेन अपने गृह क्षेत्र बालाघाट में रहे। वे 9 अक्टूबर को भोपाल तब आए जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी विदेश यात्रा से लौट कर फसलों की बर्बादी पर आपात बैठक बुलाई। किसान इस बात से आहत हैं कि मुख्यमंत्री के आने तक राहत मिलने का इंतजार क्यों करवाया गया? कृषि मंत्री स्वयं भी अपने स्तर पर भी कुछ पहल कर सकते थे। लेकिन वे जिलों से कलेक्टरों की रिपोर्ट आने का इंतजार करते रहे यहां तक कि उन्होंने मीडिया के सवालों के जवाब में यही कहा कि प्रदेश में सारे किसान फसलों के खत्म होने से नहीं मर रहे हैं। यह उस प्रदेष के कृषि मंत्री का गैर जिम्मेदारा बयान ही कहा जाना चाहिए जहां के 23 जिलों कि 114 तहसीलों के 19 हजार 951 गांवों की फसलों को विभिन्न कारणों से क्षति पहुंची है। मुख्यमंत्री स्वयं को किसान हितैषी बताने में चूक नहीं करते लेकिन उनके मंत्री अपने-अपने क्षेत्रों के मंत्री ही बन कर रह गए हैं। कृषि मंत्री के भी यही हाल हैं। वे बालाघाट के आगे प्रदेश को पहचानते ही नहीं है। लेकिन बात इतनी सी नहीं है। वे उस बरघाट में अब तक दौरा करने नहीं गए हैं जहां के वे प्रभारी मंत्री है और जहां 5 अक्टूबर को साम्प्रदायिक हिंसा के बाद अब तक कर्फ्यू लगा है। जबकि 4 अक्टूबर को वे बरघाट में ही थे। और तो और 2 अक्टूबर को बालाघाट का जिला अस्पताल में लगने वाले स्वास्थ्य षिविर में भी वे नहीं पहुंचे। यहां उन्हें सुबह 9 बजे महिला स्वास्थ्य शिविर का  उद्घाटन करना था लेकिन मंत्रीजी 1 बजे तक नहीं पहुंचे। मरीज महिलाओं की नाराजगी देख स्वास्थ्य विभाग ने बिना उद्घाटन के शिविर शुरू किया। मंत्रियों का ऐसा बर्ताव मुख्यमंत्री और भाजपा के अंत्योदय सेवा के संकल्प का मखौल उड़ाता है। पार्टी गरीब वर्ष मना रही है और उसकी सरकार के मंत्री गरीबों की भावनाओं से अनजान है। साफ है, सरकार चलाने, बचाने और उसी प्रतिष्ठा का जिम्मा मुखिया पर आ टिका है, मंत्रियों पर नहीं। किसी भी पार्टी के भविष्य के लिए यह संकेत अच्छे नहीं हैं। 

Thursday, September 17, 2015

बाघ का समय के पहले मरना तय!

बाघों की लगातार घटती संख्या से चिंतित पर्यावरणविदों के लिए यह अच्छी खबर है कि भोपाल के आसपास बाघों का कुनबा बढ़ता जा रहा है। समरधा रेंज में करीब 10 बाघ देखे जा रहे हैं। लेकिन वन विभाग इस सूचना पर प्रसन्न होने की अधिक गुंजाइश नहीं दे रहा है। वन विभाग की रीति-नीति यही रही तो इन बाघों का समय के पहले मरना तय है। मानव द्वारा शिकार, मानव-बाघ संघर्ष, बाघ का आमदखोर हो जाना, बाघों का आपसी क्षेत्र विवाद, भोजन की कमी, शिकार से फैले संक्रमण आदि के कारण बाघों की सर्वाधिक मौत होती है। बाघ शर्मिला प्राणी है और वह बूढ़ा, भूखा या चोटिल हो तभी इंसानी इलाकों में आता है। भोपाल में बाघ इंसानी क्षेत्र में आ रहा है तो इसके कारणों को जान कर उपाय करना अनिवार्य है। वन विभाग ने इन सभी कारणों को रोकने के लिए कोई अहम् कदम नहीं उठाए तो स्वाभाविक है कि इन बाघों को समय के पहले मरना होगा। 
बाघ की समय मौत होने की आशंका है क्यूंकि 
1. बाघों की बढ़ती आमद और रिहायशी इलाके में इजाफे से सीधे-सीधे मानव और बाघों के संघर्ष की स्थितियां बन गई है। इस संघर्ष को टालने के लिए हाथी के जरिए हाका लगाया जाता है। बाघ का अपना इलाका तय होता है इसलिए उसके क्षेत्र में इंसानों की आमदरफ्त को रोका जा सकता है। भौगोलिक स्थितियों के कारण हाथी से हाका लगाना संभव नहीं है तो वन विभाग ने लोगों को लाठी लेकर मैदान में उतार दिया। ये लाठियां इस संघर्ष को कैसे रोकेंगी?
2. भोपाल में बाघ यदि रातापानी अभयारण्य से केरवा की तरफ अपने क्षेत्र का विस्तार कर रहे हैं तो विभाग को पता लगाना चाहिए कि ऐसा कुनबा बढ़ने के ही कारण हो रहा है या वहां उनका आहार कम हो गया है। केरवा क्षेत्र में बाघ का प्राकृतिक आहार हिरण, चीतल आदि नहीं है तो स्वाभाविक है कि वह गाय, सुअर आदि पर हमला करेगा। जैसा वह कर रहा है। पालूत पशुओं पर यह हमला मानव से उसका संघर्ष बढ़ाएगा।
3. बाघ अपना शिकार कभी एक बार में पूरा नहीं खाता और वह खाने के लिए शिकार तक लौटता है। इसी का लाभ उठा कर शिकारी बाघ के शिकार में जहर मिला कर बाघ को मार देते हैं। भोपाल के आसपास बाघ पालतू पशुओं का शिकार कर रहा है। ऐसे में उसके शिकार में जहर मिला दिया गया तो बाघ का मरना तय है। शिकारियों से सुरक्षा के लिए बाघ संरक्षित क्षेत्र का नोटिफिकेषन होना चाहिए जो अब तक नहीं हुआ है।
4. सर्वोच्च न्यायालय के आदेष हैं कि बाघ संरक्षित क्षेत्र के आसपास के 5 किमी दायरे के पालतू पशुओं का टीकाकरण किया जाना चाहिए ताकि बाघ उन पशुओं की बीमारी से संक्रमित हो कर न मरे। पूरे देश में यह काम होता भी है। लेकिन भोपाल में बाघ संरक्षित क्षेत्र घोषित न होने के कारण केरवा के आसपास पालूत पशुओं का टीकाकरण नहीं हुआ है। यदि इन पशुओं का शिकार हुआ तो बाघ को संक्रमण होने की पूरी आशंका है। 

Monday, September 14, 2015

वे पूछ रहे हैं- अपने की मृत्यु तो नहीं हुई, कैसे कहूं सब मेरे ही थे?

पेटलावद से वाट्सएप पर दोस्त मनीष अग्रवाल के संदेश ने मुझे मुश्किल में डाल दिया है। उसने लिखा है-‘विस्फोट के बाद लोग मुझसे पूछ रहे हैं हादसे का शिकार कोई मेरा अपना तो नहीं हुआ? क्या जवाब दूं?’ सच ही कह रहा है मनीष। ऐसे कई लोग होंगे जिनका कोई अपना सगा उस हादसे का शिकार नहीं हुआ होगा। लेकिन जो हताहत हुए हैं, वे भी तो किसी सगे से कम नहीं थे। जो घायल हुए हैं उनका दर्द भी उतना ही परेशान कर रहा है जितना किसी मेरे अपने का दर्द मुझे परेशान करता। कोई कैसे समझेगा उस पीड़ा को जो पेटलावद में या उसके बाहर बसे पेटलावद के बाशिंदों को महसूस हो रही है। जिनके किसी अपने की मौत नहीं हुई लेकिन जिनकी हुई है, वे भी तो अपनों से बढ़कर अपने थे। 
पेटलावद... मेरे दिल के सबसे करीब का कस्बा। जहां मेरा जन्म हुआ और जीवन के पूरे सत्रह साल गुजरे। वहां की एक-एक गलियां से मैं वाकिफ हूं। सिरवी मोहल्ला, झंडा बाजार, गांधी चौक, नया बस स्टैण्ड, माही काॅलोनी...। इन मोहल्लों के जितने घर, जितने लोग। सब अपने। हर गली में दोस्त। हर चैराहे की एक बिरली याद। मेरे साथ कई दोस्त अपना कॅरियर बनाने पेटलावद से निकले थे। हमारी यादों में बचपन का सुहाना पेटलावद है। लेकिन, अब शनिवार, 12 सितंबर की सुबह के बाद से एक खौफनाक मंजर आंखों में तैर रहा है। उस दिन अमावस्या थी। मैं नहीं मानता कि कोई दिन या कोई तिथि बुरी होती है लेकिन वह तारीख तो सचमुच काली ही साबित हुई। विस्फोट का शिकार हुए करीब सौ लोग अब इस दुनिया में नहीं है। लगभग इतने ही गंभीर रूप से घायल हुए हैं। इन लोगों के अलावा पेटलावद में सैकड़ों लोग जिंदा हैं, उनके शरीर पर कोई जख्म नहीं है लेकिन उनके दिल और दिमाग के घाव गहरे हैं। जो दुनिया से चले गए उनके साथ गुजारे पलों की यादें रिस रही हैं। उस दिन क्षतविक्षत अंगों को समेटने का जुनून था, आज वह खौफनाक मंजर रोंगटे खड़े कर रहा है। 
एक ओर संदेश मिला। मेरे मामा अशोक त्रिवेदी ने मुझसे पूछा - ‘‘तुझे दीपावली के बाद की पड़वा याद है?’ याद क्यों नहीं है? सब याद है। हम दीपावली के अगले दिन, जिसे पड़वा कहा जाता है, शुभ की कामना के साथ घर-घर जाते हैं और प्रणाम कर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं। छोटे हमें प्रणाम करते हैं। सुबह 5 बजे से लेकर रात 10-11 बजे तक, पूरे दिन हर घर में यही गहमा-गहमी रहती है। लगभग सभी घरों में जाने की जल्दी, सभी से मिलने की ललक। पकवानों के स्वाद के साथ पूरा उत्सव। थक कर चूर हो जाएं, निढाल हो जाएं, तभी याद आता है-अरे, फलां घर चूक गया। फिर निकल पड़ते हैं, आशीर्वाद लेने। पड़वा का यह सिलसिला बरसों से चल रहा है। पीढ़ी दर पीढ़ी, इस परम्परा को निभाया जा रहा है। 
पड़वा की याद दिलाते हुए मामा ने लिखा कि यह एक दूसरी ही तरह की पड़वा है। जहां उत्सव नहीं मौत का मातम पसरा है। वे लिखते हैं- 58 साल की मेरी उम्र हुई। जब से समझ आई है, तब से दीपावली के दूसरे दिन हर पड़वा पर जाने-अनजाने घरों में गया हूं। कोई परिचित हो या अनजान, उम्र में बड़ा हुआ तो उसे प्रणाम किया। छोटा हुआ तो आशीर्वाद दिया। हमउम्र हुआ तो गले मिले, हाथ मिलाया, शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया। उस दिन जैसे पूरा पेटलावद अपना। न कोई पराया, न कोई अनजाना। एक यह अमावस की पड़वा है। इस पड़वा को मैं अपने पड़ोसी के साथ लोगों के घर शोक व्यक्त करने गया था। मुझे नहीं मालूम कितनी जगह गया, क्योंकि जिस गली से गुजरा, जिस घर के सामने से निकला, उनका कोई अपना, कोई जानने वाला, कोई सगे से भी सगा, इस हादसे का शिकार हुआ था। फिर भी कुछ घर छूट गए...।

अगली पड़वा कैसी होगी...

अंदाजा लगाया जा सकता है कि पेटलावद में इस बार दीवाली के बाद वाली पड़वा कैसी होगी? कितने ही घरों में ‘चिराग’ के बुझ जाने का गम हावी होगा। जिन घरों में दीये की लौ टिमटिमाएगी वहां उल्लास नहीं बिखरा होगा। मिठाइयां भी बनेंगी लेकिन जो भी इस पड़वा को याद करेगा, उसके मुंह में मिठास कैसे घुल पाएगी? दीवाली तो होगी लेकिन खुशियां नहीं होगी। 
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संवेदनाओं की धारा के विपरीत बहा राजनीति का ‘गंदी नहर’

पेटलावद में जहां मातम पसरा है, घटना के अनेकानेक कारणों, लापरवाहियों, चूकों के प्रति गुस्सा है, वहीं संवेदना और करूणा के इस पूरे परिदृश्य के विपरीत राजनीति का काला खेल भी जारी है। झाबुआ में लोकसभा उपचुनाव होना है। कांग्रेस और भाजपा दोनों जानते हैं कि गुजरात से सटी इस सीट पर जीत के क्या मायने हैं। यही कारण है कि दोनों दलों ने इस घटना के बाद अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। घटना का मुख्य आरोपी व उसके परिजन भाजपा से जुड़े रहे हैं। उसके करीबी रिश्तेदार नगर पंचायत के मुखिया हैं। आरंभ में नेताओं ने आरोपी राजेंद्र कासवा और उसके भाइयों को बचाने के प्रयास भी किए। उसकी मौत की खबरें भी दी गईं। साफ है, आरोपों से भाजपा का दामन दागदार है। कांग्रेस ने हाथ आई विस्फोट की इस चिंगारी से भाजपा की जीत के मंसूबों में ‘आग लगाने’ की तैयारी कर ली है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस बात को अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए वे कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। वे अपने साथ झाबुआ जिले के प्रभारी मंत्री अंतर सिंह आर्य और क्षेत्र के सभी विधायकों निर्मला भूरिया, कलसिंह भाबर, शांतिलाल बिलवाल, नागर सिंह चैहान, माधोसिंह डाबर, वेलसिंह भूरिया, रतलाम विधायक चेतन कश्यप के साथ पीडि़त परिवारों से मिलने गांव-गांव पहुंचे। वहीं कांग्रेस नेता कांतिलाल भूरिया और समर्थक सरकार की लापरवाही उजागर करने की कोषिषों में लगे हैं। वे बता रहे हैं कि हमारी सरकार होती तो हम आरोपी को पकड़ लेते। ये घटना नहीं होने देते। कांग्रेस के इन आरोपों का जवाब शिवराज जनता की हर मांग को पूरा कर दे रहे हैं।