Wednesday, June 22, 2022

केदारनाथ अग्रवाल, तुम्हें भला क्या पहचानेंगे बांदावाले


तुम्हें भला क्या पहचानेंगे साहब काले!

तुम्हें भला क्या पहचानेंगे आम मुवक्किल!

तुम्हें भला क्या पहचानेंगे शासन की नाकों पर के तिल!

तुम्हें भला क्या पहचानेंगे ज़िला अदालत के वे हाकिम!

तुम्हें भला क्या पहचानेंगे मात्र पेट के बने हुए हैं जो कि मुलाज़िम!

प्यारे भाई, मैंने तुमको पहचाना है

समझा-बुझा है, जाना है…

यह लिखा है कवि नागार्जुन ने. वही बाबा नागार्जुन जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके रचना संसार में समूची भारतीय काव्‍य परंपरा स्‍पंदित होती दिखाई देती है. उन बाबा नागार्जुन ने यह किसके लिए कहा है? कौन होगा जिसकी प्रशंसा में नागार्जुन ने कविता लिखी, ऐसा काव्‍य विशेषण जो उस व्‍यक्तित्‍व का समग्र परिचय ही बन गया. कौन है जिसके लिए नागार्जुन ने कहा –

मैं बड़भागी, क्योंकि प्राप्त है मुझे तुम्हारा

निश्छल-निर्मल भाईचारा

मैं बड़भागी, तुम जैसे कल्याण मित्र का जिसे सहारा

नागार्जुन ने यह लिखा था प्रगतिशील चेतना के पर्याय कवि केदारनाथ अग्रवाल के बारे में. केदारनाथ अग्रवाल जिनकी 22 जून को पुण्‍यतिथि है. वे केदारनाथ अग्रवाल जो इलाहाबाद में पढ़े, जिन्‍होंने बांदा में उम्र भर वकालात की और जीवन भर साहित्‍य सृजन किया. नागार्जुन ने यह रचना बांदा यात्रा के बाद लिखी है. इसके पहले केदारनाथ अग्रवाल एक कविता लिख चुके थे- ‘नागार्जुन के बांदा आने पर’.

ये दोनों कविताएंं आज हिंदी के दो बड़े कवियों के संवाद के बहाने साहित्‍य परंपराऔर इन दो कवियों के व्‍यक्तित्‍व को जानने का बेहतर माध्‍यम बनी हैं. ये कविताएं मिसाल हैं कि एक कवि अपने समकालीन साथी कवि को कैसे देखता है, उसके कृतित्‍व और व्‍यक्तित्‍व पर कैसे प्रतिक्रिया देता है. पहले देखते हैं, केदारनाथ अग्रवाल की रचना ‘नागार्जुन के बांदा आने पर’. इसमें केदार जी लिखते हैं :

यह बांदा है

सूदख़ोर आढ़त वालों की इस नगरी में,

जहां मार, काबर, कछार, मड़ुआ की फ़सलें,

कृषकों के पौरुष से उपजा कन-कन सोना,

लढ़ियों में लद-लद कर आ-आ कर,

बीच हाट में बिक कर कोठों-गोदामों में,

गहरी खोहों में खो जाता है जा-जा कर,

न्याय यहाँ पर अन्यायों पर विजय न पाता,

सत्य सरल होकर कोरा असत्य रह जाता,

न्यायालय की ड्योढ़ी पर दब कर मर जाता,

यहाँ हमारे भावी राष्ट्र-विधाता,

युग के बच्चे,

विद्यालय में वाणी-विद्या-बुद्धि न पाते,

विज्ञानी बनने से वंचित रह जाते,

केवल मिट्टी में मिल जाते.

यह बांदा है,

और यहाँ पर मैं रहता हूँ,

जीवन-यापन कठिनाई से ही करता हूं,

कभी काव्य की कई पंक्तियां,

कभी आठ-दस बीस पंक्तियां,

और कभी कविताए लिखकर,

प्यासे मन की प्यास बुझा लेता हूं रस से,

शायद ही आता है कोई मित्र यहां पर,

शायद ही आती हैं मेरे पास चिट्ठियां.

अहोभाग्य है जो तुम आए मुझसे मिलने,

इस बांदा में चार रोज़ के लिए ठहरने,

अहोभाग्य है स्वयं उगे इन सब पेड़ों का,

जिनके द्रुम-दल झरते फिर-फिर नए निकलते.

अहोभाग्य है हर छोटी चंचल चिड़िया का,

जिनका नीड़ बिगड़ते-बनते देर न लगती.

अहोभाग्य है बंबेश्वर की चौड़ी-चकली चट्टानों का,

जिनको तुमने प्यार किया है, सहलाया है.

अहोभाग्य है केन नदी के इस पानी का,

जिसकी धारा बनी तुम्हारे स्वर की धारा.

अहोभाग्य है बांदा की इस कठिन भूमि का,

जिसको तुमने चरण छुला कर जिला दिया है.

अतिथि के आने पर कवि मित्र का यूं व्‍यक्‍त होना स्‍वाभाविक है. मगर प्रत्‍युत्‍तर में जो रचना आई वह अद्भुत है. नागार्जुन ने बांदा यात्रा के बाद ओ ‘जन-मन के सजग चितेरे’ कविता में केदार जी के बारे में लिखा है-

मैं बोला : केदार, तुम्हारे बाल पक गए!

‘चिंताओं की घनी भाफ में सीझे जाते हैं बेचारे’-

तुमने कहा, सुनो नागार्जुन,

दुख-दुविधा की प्रबल आंच में

जब दिमाग़ ही उबल रहा हो

तो बालों का कालापन क्या कम मखौल है?

ठिठक गया मैं, तुम्हें देखने लगा ग़ौर से…

गौर-गेहुँआ मुख-मंडल चाँदनी रात में चमक रहा था

फैली-फैली आँखों में युग दमक रहा था

प्यारे भाई, मैंने तुमको पहचाना है

केन कूल की काली मिट्टी, वह भी तुम हो!

कालिंजर का चौड़ा सीना, वह भी तुम हो!

जनगण-मन के जाग्रत शिल्पी,

तुम धरती के पुत्र : गगन के तुम जामाता!

नक्षत्रों के स्वजन कुटुंबी, सगे बंधु तुम नद-नदियों के!

झरी ऋचा पर ऋचा तुम्हारे सबल कंठ से

स्वर-लहरी पर थिरक रही है युग की गंगा

अजी, तुम्हारी शब्द-शक्ति ने बाँध लिया है भुवनदीप कवि नेरूदा को … 

यह थे केदारनाथ अग्रवाल जिन्‍हें बाबा नागार्जुन ने जनगण मन का जाग्रत शिल्‍पी कहा. 1 अप्रैल 1911 को उत्तर-प्रदेश के बांदा जनपद के कमासिन गांव में जन्मे केदारनाथ ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान ही उन्होंने कविताएं लिखने की शुरुआत की. उनका पहला काव्य-संग्रह ‘युग की गंगा’ मार्च, 1947 में प्रकाशित हुआ था. हिंदी साहित्य के इतिहास को समझने के लिए यह संग्रह एक बहुमूल्य दस्तावेज़ है. गुलमेंहदी, हे मेरी तुम, जमुन जल तुम, जो शिलाएँ तोड़ते हैं, कहें केदार खरी खरी, खुली आँखें खुले डैने, कुहकी कोयल खड़े पेड़ की देह, मार प्यार की थापें, फूल नहीं, रंग बोलते हैं-1, फूल नहीं रंग बोलते हैं-2, आग का आइना, पंख और पतवार, अपूर्वा, नींद के बादल, आत्म गंध, बम्बई का रक्त स्नान, युग-गंगा, बोले बोल अबोल, लोक आलोक, चुनी हुयी कविताएँ, पुष्पदीप, वसंत में प्रसन्न पृथ्वी, अनहारी हरियाली उनकी प्रमुख कृतियां हैं. उनकी अनूदित रचनाओं का संग्रह ‘देश-देश की कविता’.

अपनी लंबी रचनमात्मक यात्रा के लिए उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिंदी संस्थान पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार जैसे सम्मानों से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है. 22 जून 2000 को उन्‍होंने देहत्‍याग दी.

वे पूर्णकालिक कवि नहीं थे बल्कि बांदा में वकालत करने के दौरान उन्‍होंने कविताएं लिखी हैं. काव्‍य संकलन ‘अपूर्वा’ की भूमिका में केदार जी लिखते हैं :

‘लोग कहते हैं पेशेवर कवि हो जाना और हर-हमेश कविता लिखते जाना अच्छा नहीं होता. ऐसे में जो लिखा जाता है वह घटिया होता है, चालू होता है, कविता के अच्छे पाठक उसे स्वीकार नहीं करते. लेकिन यह धारणा ठीक हो ही, यह मान लेना गलत होगा. देखा यह भी गया है कि कम लिखने वाले भी घटिया कृतियां देते रहते हैं. इसलिए आग्रह यही करता हूँ कि मेरी कविताओं को जांचें-परखें और इसकी चिन्ता न करें कि इतने लम्बे अरसे में मैंने इतना कम क्यों लिखा. देखें कि ये कैसी हैं!’

आलोचकों ने केदार जी के सृजन संसार का आकलन करते हुए उन्‍हें यथार्थ का कवि कहा है. किसी ने उन्‍हें मनुष्यता विरोधी शक्तियों के मुकाबले उठी चेतना फैलाने वाली और संघर्ष करने वाली आवाज कहा है. जबकि उनकी प्रकृति प्रेम कविताओं को अलग स्‍वर की रचनाएं निरूपित करते हुए कहा गया कि जहां अन्‍य कवियों की कविताओं में किसान की दुर्दशा की करूण गाथा कही गई हैं वहीं, केदार जी ने अपने समकालीन प्रगतिशील कवियों की तरह उजले पक्ष के साथ किसान जीवन का यथार्थ चित्रण किया. ‘खेत का दृश्य’ कविता में वे लिखते हैं–

“आसमान की ओढ़नी ओढ़े,

धानी पहने

फसल घंघरिया,

राधा बन कर धरती नाची,

नाचा हंसमुख

कृषक संवरिया.”  

अपने रचना पक्ष पर चर्चा करते हुए ‘अपूर्वा’ की भूमिका में ही केदार जी लिखते हैं कि एक बात ध्यान में रखने की है. वह यह है कि जहाँ अन्य कवियों का अपना-अपना अलग सच होता है, जो बराबर उन्हीं उन्हीं का बना रहता है, किसी दूसरे का सच नहीं बन पाता, वहाँ प्रगतिशील कवि का सच दूसरों का सच बन जाता है. उसकी मानसिकता दूसरों की मानसिकता बन जाती है. प्रगतिशील कवि जो कुछ लिखता है, वह उसका होकर भी सहज साधारण आदमी की मानसिकता का हो जाता है. इसकी वजह है. जहाँ दूसरे व्यक्तिवादी (अहंवादी) कवि वस्तुनिष्ठता से मुँह चुराये स्वयं में लीन होते हैं, वहाँ प्रगतिशील कवि वस्तुनिष्ठता से ही अपनी आत्मनिष्ठता बनाता है और इस यौगिक संहति को सबको समर्पित कर देता है. तभी तो कविता की निरंतरता कायम रहती है और सांस्कृतिक एकता की अवधारणा सम्भव होती है. मैं कविता की सांस्कृतिक सार्थकता का समर्थक कवि रहा हूँ और अब भी हूं. इससे मेरी कविता उतनी ही मेरी है जितनी दूसरों की.

तभी तो जब हम केदारनाथ अग्रवाल की बरसों पहले लिखी रचनाओं को पढ़ते हैं तो हमें आज का अपना ही सच लगता है. ऐसी ही कुछ रचनाओं की बानगी :

तुम्हारे पांव

देवताओं के पांव हैं

जो जमीन पर नहीं पड़ते

हम वंदना करते हैं तुम्हारी

नेता! (कविता : नेता)

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कोई नहीं सुनता

झरी पत्तियों की झिरझिरी

न पत्तियों के पिता पेड़

न पेड़ों के मूलाधार पहाड़

न आग का दौड़ता प्रकाश

न समय का उड़ता शाश्वत विहंग

न सिंधु का अतल जल-ज्वार

सब हैं –

सब एक दूसरे से अधिक

कनबहरे,

अपने आप में बंद, ठहरे. (कविता: कनबहरे)

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मैंने उसको

जब-जब देखा

लोहा देखा

लोहे जैसा-

तपते देखा-

गलते देखा-

ढलते देखा

मैंने उसको

गोली जैसा

चलते देखा. (कविता : वीरांगना)

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अच्छा होता

अगर आदमी

आदमी के लिए

परार्थी –

पक्का –

और नियत का सच्चा होता

न स्वार्थ का चहबच्चा

न दगैल-

दागी न

चरित्र का कच्चा होता

अच्छा होता

अगर आदमी

आदमी के लिए

दिलदार

और हृदय की थाती होता,

न ईमान का घाती- 

ठगेत ठाकुर न

मौत का बराती होता. (कविता: अच्‍छा होता)

Wednesday, January 25, 2017

ऐसे तंग तंत्र में कैसे बना रहे गण राज

यह महज संयोग ही है कि 68 वें गणतंत्र के पूर्व दिवस पर मंत्रालय में समीक्षा बैठक करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सवाल उठाया कि इंसान का बोझ इंसान क्यों ढो रहा है? वे हाथ रिक्शा। और साइकिल रिक्‍शा की बात कर रहे थे, लेकिन बात दूर तक जानी चाहिए। हमें गणतंत्र मिले सात दशक होने को आए हैं, इस उम्र में व्यक्ति इहलोक छोड़ने की तैयारी कर चुका होता है, लेकिन बतौर एक राष्ट्र अभी हम कई मामलों में घुटनों चलने की स्थिति में ही हैं। तकनीक में हम समृद्ध हो रहे हैं, लेकिन प्राथमिक‍ शिक्षा में हमारा स्तर ‘बालवाड़ी’ सा ही है। शिक्षा, स्वास्‍थ्‍य  और सुरक्षा के तमाम आंकड़ों पर हम वर्ष भर बात करते हैं। इसमें किसान मृत्यु‍ के आंकड़ों को ही देखें। ताजा जानकारी बताती है कि भारत में वर्ष 2015 में खेती से जुड़े 12602 व्यक्तियों ने आत्महत्या की। इनमें 4595 खेती पर निर्भर मजदूर शामिल हैं। सबसे ज्यादा महाराष्ट्र (1261) और उसके बाद अपना मप्र (709)। देश में 2013 में 11771, 2014 में 12360 और फिर 2015 में कृषि से जुड़े 12602 लोगों ने आत्महत्या की है। इसे क्या कहा जाना चाहिए? कृषि की तरक्कीइ? विरोधाभास यह है कि सड़क किनारे जमीनों के भाव आसमान पर पहुंचे और कई किसान जमीन बेच-बेच कर करोड़पति हो गए। लेकिन इनके लिए जमीन सौदा थी। वे जिनके लिए खेती जीवन है वे जमीन बेच तो नहीं पाए लेकिन कर्जदार हो गए। कर्ज भर नहीं पाए और दिमागी संतुलन खो बैठे। पैसे थे नहीं तो झाड़-फूंक में इलाज खोजा गया और इसी अवस्था में हुई आत्महत्या के बाद पुलिस डायरी में दर्ज किया जाता है कि किसान की मौत फसल की बर्बादी, उसके सही दाम न मिलने या कर्ज न चुका पाने के कारण नहीं बल्कि अंधविश्वास (याद कीजिए मप्र के गृहमंत्री ने विधानसभा में बयान दिया था कि सीहोर जिले में किसानों की मृत्यु भूत-प्रेत के कारण हुई है) के कारण हुई है। यह असल में व्यवस्था की खामी है, जहां इंसान ही जब अपने परिवार पर बोझ बन जाता है तो जीवन त्याग देता है।
कर्ज को बढ़ावा देने वाले तंत्र को सोचना होगा कि वह आत्म निर्भर नहीं सरकार पर निर्भर समाज का निर्माण कर रहा है, जिसका एक छोर आत्महत्या की ओर जाता है। यह समझना होगा कि ऐसी व्यवस्था बाजार को तो पोषित कर सकती है, लेकिन बराबरी के गणतंत्र का निर्माण नहीं कर सकती। अभी तो हम एक ऐसे तंग समाज का निर्माण कर रहे हैं जहां संवेदनशीलता, परस्पर सहकार और सदाशयता का भाव तिरोहित हो रहा है। ऐसे सीमित समाज में जहां लोक कल्याण नहीं पूंजी का विधान है, भारत स्पंदित नहीं हो सकता है।

 

Saturday, May 21, 2016

सचमुच सुखी हो ?

वहां कोई तुम्हारा अपना रहा करता था खूब गुजारते थे वक्त उसके पहलू में।
उसी का आंचल सुख देता था उसी का सत मिटाता था भूख। उसी के आश्रय में खेल, उसी के साये में चैन। तुम भूल गए। फिर वो दरख्त भी कहां रहा जो याद दिलाता। वो दिन क्या गुजरे फूल खिलना बंद हो गए नहीं मिलती छांव न रस ही मिलता किसी को तुमसे। वो पेड़ क्‍या सूखा सूख गया तुम्‍हारा साया। गांव किनारे की ही नहीं, नदी तो भीतर की भी सूखी है। खरी कहो क्या छई छप्पा छई के बिना तुम सचमुच सुखी हो ?

Saturday, February 27, 2016

मप्र के 42 फीसदी बच्चे बौने, आखिर खाते क्या हैं?

आपने एक प्रख्यात हेल्थ ड्रिंक का टीवी विज्ञापन देखा होगा जिसमें बच्चे पूछते हैं कि उनका साथी साथ इत्तू सा था, इतनी जल्दी इतना लंबा कैसा हो गया? आखिर खाता क्या है? ऐसे विज्ञापनों ने बच्चों और उनके माता-पिता में लंबाई को लेकर प्रतिस्पर्धा और हीनता का बोध जगाया लेकिन क्या आपको पता है कि कुपोषण मप्र के बच्चों को दुर्बल
और कमजोर ही नहीं बना रहा बल्कि यह उनके नाटे रहने का कारण भी है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण के कारण राज्य के 42 प्रतिशत बच्चे नाटे रह जाते हैं। मप्र के बच्चे पूरी तरह स्वस्थ्य नहीं हैं क्योंकि जन्म के दो दिन के अंदर 82 फीसदी बच्चों को डॉक्‍टरों से उपचार नहीं मिलता। उन्हें पोषण आहार नहीं मिलता। इस कारण 60 फीसदी बच्चों में खून की कमी है और इन शारीरिक दुर्बलताओं के कारण बच्चे पढ़ाई में कमजोर रह जाते हैं। इस तरह कुपोषण के कारण बच्चों का कम शारीरिक और मानसिक विकास अंततः प्रदेश की विकास दर को भी प्रभावित कर रहा है। मप्र के नाटे बच्चों को देख कर बार-बार पूछा जाना चाहिए कि आखिर ये खाते क्या हैं? ताकि सरकार और समाज ध्यान दे कि हमारे प्रदेश के बच्चे खा क्या रहे हैं?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2015-16 का प्रतिवेदन कई खुलासे करता है। इन आंकड़ों को जानने के बाद कुपोषण के प्रति अधिक व्यापक रूप से सोचने की आवश्‍यकता महसूस होती है। यदि कुपोषण को बच्चों के कम वजन या कमजोरी के रूप में ही देखा जाता है तो अब यह समझना होगा कि बच्चों का कद न बढ़ना और उनका नाटा रह जाना भी कुपोषण का ही दुष्परिणाम है। यह सर्वे बताता है कि राज्य में 100 में से 40 बच्चे आज भी कुपोषण से ग्रस्त हैं। 13 राज्यों और 2 केन्द्र शासित प्रदेशों के लिए जारी एनएचएफएस 4 के आंकड़ों के अनुसार मप्र में 5 साल से कम उम्र के 40 फीसदी से ज्‍यादा बच्चों का विकास ठीक से नहीं हो पाता है यानि उनकी ऊँचाई और वजन सामान्य से कम रह जाता है। जबकि 5 साल से कम उम्र के 42.8 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से कम (अंडरवेट) होता है। सामान्य से कम वजन वाले बच्चों की प्रतिशतता के आंकड़े 35 फीसदी से कम होकर 25.8 फीसदी पर आ गए हैं लेकिन विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के मानदण्डों के अनुसार यह संख्या अब भी बहुत ज्यादा है।

यहां ध्यान दे सरकार:
जन्म के बाद बच्चों की मृत्यु रोकने के लिए जन्म के तुरंत बाद प्रसव के पहले और बाद में सही उपचार आवश्‍यक है। खासतौर पर तब, जब बड़ी संख्या में बच्चे गांवों एवं आदिवासी इलाकों में रहते हैं। इन बच्चों को आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य सेवाएं एवं पोषण सुविधाएं सीमित मात्रा में उपलब्ध हो पाती हैं। स्तनपान एवं अर्द्ध ठोस आहार पाने वाले दो साल से कम उम्र के बच्चों की प्रतिशतता यानी पर्सेंटाइल 6.6 फीसदी है। ऐसे में बाल मृत्यु और कुपोषण से बचाव के लिए गांवों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य और पोषण सुविधाएं पहुंचाना आवश्‍यक है।
आंकड़ें बताते हैं कि राज्य के 50 फीसदी बच्चों को निवारणीय रोगों की रोकथाम के लिए पर्याप्त टीकाकरण तक उपलब्ध नहीं हो पाता है। 2014 में राज्य सरकार ने मिशन इन्द्र धनुष आरंभ किया है। उम्मीद है कि अगले सर्वेक्षण में आंकड़ों में सुधार होगा। प्रसवपूर्व देखभाल, नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य एवं जीवित रहने तथा कुपोषण से लड़ने के लिए आवश्‍यक है। राज्य सरकार को इस ओर ध्यान देना होगा।

गणित में होगा कमजोर
बच्चों के स्वास्थ्य का उनके भावी जीवन में भी बड़ा असर देखा गया है। अध्‍ययनों में बताया गया है कि अस्वस्थ्य या कुपोषित बच्चा अपने जीवन में आगे चल कर कई अन्य बीमारियों से परेशान होता है। इतना ही नहीं, यह कमजोरी उसकी शिक्षा को भी प्रभावित करती है। बचपन में यदि कोई गेंद पकड़ने या फेंकने जैसा काम ठीक से नहीं कर पाता तो माना जाना चाहिए कि आगे चल कर वह गणित में कमजोर होगा। स्टेवांगर यूनिवर्सिटी के नार्वेजियन रीडिंग सेंटर के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर एलिन रेइकेरस ने इस अध्ययन के आधार पर दावा किया कि दो साल के बच्चों के पेशी कौशल (मोटर स्किल) और गणितीय कौशल के बीच रिश्ता होता है। पेशी कौशल किसी खास कार्य के लिए शरीर की मांसपेशियों की होने वाली सटीक गतिविधि को कहते हैं।

मप्र के बच्चे शिक्षा में पहले ही कमजोर
नेशनल अचीवमेंट सर्वे (नास) में शिक्षा के मामले में प्रदेश दूसरे राज्यों की तुलना में तीन पायदान फिसला है। कक्षा तीन के बच्चों पर किए गए सर्वे में भाषा के मामले में मप्र 25वें से 28वें नंबर पर आ गया है। वहीं गणित में 23वें नंबर पर है। भाषा का स्तर जानने के लिए सर्वे के तीन आधार रखे गए थे। सर्वे शब्दों को सुनकर समझने, पढ़कर समझने और लिखकर बताने व समझने के बिंदुओं पर किया गया। सर्वे बताता है कि मप्र के बच्चे सुनकर समझने के मामले में 62 प्रतिशत तक शिक्षित हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 65 प्रतिशत है। यदि लिखने व लिखे शब्दों को पहचानने की बात करें तो मप्र के बच्चे 83 प्रतिशत पर हैं, जबकि देश का औसत 86 प्रतिशत है। पढ़कर समझने के मामले में मध्यप्रदेश के बच्चे देश में 28वें नंबर पर हैं। यह 52 प्रतिशत है और यही सबसे खराब स्थिति है। राष्ट्रीय औसत 59 प्रतिशत है।

गणित के मामले में दस बिंदुओं पर सर्वे किया गया। संख्या को जोडने के मामले में मध्यप्रदेश के बच्चे देश में 21वें नंबर पर हैं, जो राष्ट्रीय औसत 69 प्रतिशत से पीछे हैं। घटाने के मामले में मध्यप्रदेश के बच्चे सबसे बेहतर हैं। राष्ट्रीय औसत 65 प्रतिशत है, जबकि मप्र का औसत 68 है। गुणा करने पर मप्र देश में 28वें नंबर पर है। देश का औसत 63 प्रतिशत है, जबकि मप्र 59 प्रतिशत पर है।

आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं
- 5 साल से कम उम्र के प्रत्येक 100 में से 40 से ज्यादा बच्चों का विकास ठीक से नहीं हो रहा।
- 5 साल से कम उम्र के 100 में से 40 बच्चों का वजन सामान्य से कम है।
पांच साल से कम उम्र के 60 फीसदी से ज्यादा बच्चों में खून की कमी है।
केवल 55 प्रतिशत बच्चों का ही सम्पूर्ण टीकाकरण होता है।