Monday, June 5, 2023

विश्‍व पर्यावरण दिवस: प्‍लास्टिक प्रदूषण से हमें एक ही शक्ति बचा सकती है

दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्‍ट हो या हमारे रक्‍त का हिस्‍सा वह सर्वशक्तिमान ही होना चाहिए जो सर्वाधिक ऊंचाई और सबसे सूक्ष्‍म रूप में विद्यमान होगा. ऐसा ही सर्वशक्तिमान है प्‍लास्टिक जो दुनिया को संवार नहीं बल्कि खत्‍म कर रहा है. सर्वविनाशक साबित हो रहा है. और यही कारण है कि दैनिक उपयोग में सबसे बड़ा सहायक प्‍लास्टिक आज पर्यावरण और सेहत के लिए उतना ही बड़ा और व्‍यापक खतरा बन कर डरा रहा है. इसी घातक ताकत के कारण दुनिया ने आह्वान किया है कि सब मिलकर इस प्‍लास्टिक से पृथ्‍वी को बचाएं.

कितना आसान होता है, किसी पॉलीथिन, किसी प्‍लास्टिक के टुकड़े को गुड़ीमुड़ी कर झट से फेंक देना. कितना आसान होता है, कोल्‍ड ड्रिंक और पानी की बोतल, किसी पैकिंग का प्‍लास्टिक रैपर को यहां-वहां फेंक देना. यहां-वहां मतलब माउंट एवरेस्‍ट जैसे गगनचुंबी पहाड़ पर तो समुद्र की तलहटी जैसी गहराई पर. अपने आसपास भी, नदी और पहाड़ पर भी. खेत में, चलती ट्रेन से, जहां मन किया वहां. क्‍या आपने सोचा है, कि बड़े प्‍लास्टिक के कचरे को तो चलो कोई साफ कर भी देगा मगर बोतल के ढक्‍कन को बंद करने के लिए लगाई गई सील या उससे भी छोटे प्‍लास्टिक के टुकड़े को हम जो फेंक देते हैं, लापरवाही से, उसे कोई उठाने आने वाला नहीं है. वह तो जमीन में, पानी में, पहाड़ पर, खाई में, जंगल में पड़ा रहेगा, बरसों बरस और धरती को, इसके पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता रहेगा. वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब खेत में हल चला कर मिट्टी की पलटी करने पर पॉलीथिन भी निकला करेगा. यह तो साबित ही हो चुका है कि हमारे द्वारा फेंका गया प्‍लास्टिक का कूड़ा शहरों में सीवेज को जाम कर जलभराव का कारण बनता है.

यही कारण है कि गुजरात के अहमदाबाद में प्लास्टिक के साथ ही कागज के कप में चाय-काफी परोसने पर रोक लगा दी गई है क्‍योंकि वहां एक दिन में 20 लाख से ज्यादा प्लास्टिक और पेपर कप कचरे में फेंके जाते हैं. चंडीगढ़ में प्‍लास्टिक की तमाम तरह की पैकिंग पर भी रोक है. सरकार सिंगल यूज प्‍लास्टिक को प्रतिबंधित कर ही चुकी है. इसके बाद भी हालात क्‍या हैं, यह जानना बेहद जरूरी है.

हाल ही में एक फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था इसमें बताया गया था कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवेरेस्ट असल में ‘कूड़े के पहाड़’ बन रहा है. बेस कैंप के पास सैकड़ों खाली पड़े फूड कंटेनर, ऑक्‍सीजन टैंक, रैपर बिखरे नजर आ रहे हैं. 29 मई 2053 को तेनजिंग नोर्गे और एडमंड हिलेरी ने माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचकर दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ को विजय किया था. इस घटना के सत्‍तर साल बाद आज उस चोटी पर कचरे का पहाड़ हमारी लापरवाही का सबूत है. पहाड़ पर चढ़ कर रिकार्ड अपने नाम करने वाले पर्वतारोह उस पहाड़ के पर्यावरण को लेकर बिल्कुल सतर्क नहीं हैं. नेशनल ज्योग्राफिक का अनुमान है हक एवरेस्ट पर जाने वाला हर पर्वतारोही लगभग आठ किलोग्राम कचरा पैदा करता है. इनमें फूड कंटेनर, टेंट और खाली ऑक्सीजन टैंक शामिल होते हैं. वे कचरा साथ नहीं लाते और इसकी सफाई के लिए सरकारों को अलग से पैसा खर्च करना पड़ता है. जबकि कितना बेहतर हो कि जो सामान ले जा रहा है वही कचरा अपने साथ लाए भी? लेकिन ऐसा होता कहां है?

चिंता का कारण यह कि सूक्ष्‍म रूप में प्‍लास्टिक ध्रुवों पर जलचर के रक्‍त में भी पहुंच चुका है. यह प्‍लास्टिक हमारे रक्‍त में भी है. यह समय उन चेतावनियों को याद करने का भी है जब शोध बताते हैं कि प्‍लास्टिक खाद्य सामग्री के साथ हमारे पेट में जा रहा है.

आज जब प्‍लास्टिक के समाधान की चिंता और आह्वान के साथ विश्‍व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है तो हमारे लिए यह जान लेना भी आवश्‍यक है कि दुनिया फिलहाल हर साल 35 करोड़ टन प्लास्टिक का कचरा फैला रही है. यह कचरा जैवविविधता, हमारी सेहत और खेती यानी हमारे आहार के लिए खतरा बन चुका है. जब हम प्‍लास्टिक के इन खतरों की बात करते हैं तो कुछ आविष्‍कार याद आते हैं. जैसे वह एंजाइम जो सदियों में नष्‍ट होने वाले प्‍लास्टिक को चंद घंटों में खत्‍म कर सकता है. मगर यह एंजाइम भी प्‍लास्टिक के बेतहाशा उपयोग की छूट नहीं देता है क्‍योंकि हमारी लापरवाही तब भी भारी है.

प्‍लास्टिक के इन्‍हीं खतरों को देखते हुए संयुक्‍त राष्‍ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम ने एक रोडमैप तैयार किया है. बीते सप्‍ताह जारी हुई यह रिपोर्ट 2040 तक दुनिया भर में प्लास्टिक प्रदूषण को 80 प्रतिशत तक कम करने का आह्वान करती है. इसमें कहा गया है कि सबसे पहले प्‍लास्टिक के कचरे का कम करना होगा. इसके लिए प्‍लास्टिक के फिर से उपयोग, रीसाइकल करना और उत्पादों में विविधता लाने के सुझाव दिए गए हैं. आकलन है कि फिर से उपयोग के प्‍लास्टिक को बढ़ावा देकर 2040 तक 30 प्रतिशत प्लास्टिक प्रदूषण को कम किया जा सकता है. प्लास्टिक रैपर, पाउच और पै‍क आइटम जैसे उत्पादों में प्‍लास्टिक के बदले अन्य सामग्रियों को अपनाने से प्लास्टिक प्रदूषण में 17 प्रतिशत की कमी लाई जा सकती है. चुनौती यह है कि यदि प्लास्टिक उत्पादन पर लगाम लगाने में पांच साल की देरी होती है तो 2040 तक 80 मिलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक प्रदूषण बढ़ सकता है.

इसी आह्वान के बीच ग्रीनपीस ने चेताया है कि रीसाइक्लिंग प्लास्टिक प्रदूषण का रामबाण इलाज नहीं है. इसपर हुआ अध्ययन बताता है कि रीसाइकिल करने से वास्तव में प्लास्टिक का जहरीलापन बढ़ जाता है. ‘फॉरएवर टॉक्सिक: द साइंस ऑन हेल्थ थ्रेट्स फ्रॉम प्लास्टिक रीसाइक्लिंग’ बताती है कि खतरे से निपटना है तो प्लास्टिक उत्पादन को सीमित और कम करने के ही प्रयास होने चाहिए. यह रिपोर्ट बताती है कि प्लास्टिक में 13,000 से अधिक केमिकल्स होते हैं जिनमें से 3,200 इंसानी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माने जाते हैं. रीसायकल प्लास्टिक में बहुत ज्यादा मात्रा में केमिकल होते हैं जो लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं.

ये सभी रिपोर्ट हमें आगाह कर रही हैं कि प्‍लास्टिक के उपयोग को कम करने को लेकर हमने बड़े कदम नहीं उठाए तो 2060 तक प्लास्टिक उत्पादन तिगुना करना पड़ेगा और इतना प्‍लास्टिक कितना नुकसान पहुंचाएगा, समझा जा सकता है. हमें यह समझ लेना होगा कि फिलहाल ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो प्‍लास्टिक को खत्‍म कर दे या उसके नुकसान से हमें बचा ले. यह ताकत हमारे पास ही हैं कि हम खुद अपनी सुरक्षा करें और प्‍लास्टिक के प्रति बेपरवाही का व्‍यवहार छोड़ें. ऐसे मनाएंगे तो पर्यावरण दिवस तो हमारी पृथ्‍वी और मन का पर्यावरण अच्‍छा बना रहेगा.




(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 


Saturday, June 3, 2023

विश्‍व साइकिल दिवस: अनूठी है यह 'साइकिल' और इसकी सवारी


आज जब सड़क पर अपनी गाड़ी से गुजरता हूं और किसी साइकिल सवार को पास से गुजरते देखता हूं तो अपनी गाड़ी जरा स्‍लो कर उसके लिए रास्‍ता बना देता हूं. मुझे वे दिन याद आ जाते हैं जब साइकिल चलाया करता था और किसी गाड़ी को राह देने के फेर में ब्रेक लगाने के बाद फिर साइकिल चलाने के लिए पूरी ताकत लगानी पड़ती थी. यह आदत मुझ में तब से आ गई है जब बाइक चलानी सीखी थी. बाइक से कार तक की यात्रा तो हुई मगर साइकिल की सवारी आज भी जेहन में सुहानी याद की तरह बसी हुई है. हममें से कई के जीवन में साइकिल आज भी बनी हुई लेकिन अब सेहत की फिक्र लिए वजन घटाने और फिट बनने के उपक्रम के रूप में.

यही वजह है कि हर साल 3 जून को साइकिल दिवस मनाने की शुरुआत की गई. ज्‍यादा दिन नहीं हुए हैं, इस दिन को मनाने की शुरुआत 2018 में हुई है और वजह भी वहीं है, लोगों को अपनी सेहत व पर्यावरण के प्रति सजग करना. विश्व साइकिल दिवस 2023 की थीम है, ‘सतत भविष्य के लिए एक साथ सवारी’ Riding Together for a Sustainable Future. एक साथ साइकिल की सवारी, जब यह वाक्‍य पढ़ा और लिख रहा हूं तो कल्‍पना में जाने कितनी छवियां तैर गई हैं जब साथ-साथ साइकिल चलाई गई थी. स्‍कूल के दिनों में दोस्‍तों के समूह के साथ साइकिल की रोमाचंक यात्राएं तो कभी मौजी मन के साथ अकेले में घंटी की ट्रीन-ट्रीन बजाते हुए की गई साइकिल की सवारी याद हो आई. अपने कपड़ों पर दाग मंजूर मगर साइकिल पर निशान भी मंजूर नहीं. चैन चढ़ाने का हुनर. फिल्‍मों के वे दृश्‍य याद हो आए जब नायक-नायिकाओं ने साइकिल की सवारी की, गीत गाएं. जाने कितनी यादें.

फिर धीरे-धीरे सुविधाएं बदली और साइकिल की भूमिका भी. तब साइकिल के कुछ प्रकार थे. आज साइकिल कई-कई प्रकार और डिजाइन में उपलब्‍ध है. बड़े समाज के लिए साइकिल आज भी आजीविका उपार्जन का सहायक साधन है और लगभग उतना ही बड़ा समाज है जिसके लिए साइकिल सेहत पाने का साधन. इस तरह समाज का एक और बंटवारा हुआ है.

लेकिन आज जब हम विश्‍व साइकिल दिवस पर भविष्‍य की बात कर रहे हैं तो मुझे एक दूसरी ‘साइकिल’ की याद आ रही है. यह ‘साइकिल’ है इकतारा प्रकाशन भोपाल की बाल पत्रिका. बच्‍चों को इसका परिचय देते हुए इसके बारे में क्या खूब कहा गया है, ये साइकिल भी तुम्हारी साइकिल की ही तरह है. इसमें भी दो पहिए हैं. एक में अपने आसपास की हवा है जिसमें हम साँस लेते हैं. उसमें धूल है, धुंआ है और मोगरे की खुशबू भी है. दूसरे पहिए में चिड़िया के पंखों से टकराकर लौटी हवा है. इसमें उड़ानें हैं, सपने हैं. यह तुम्हारी भाषा में बोलती है. तुम्हारी भाषा जानती है. इसमें तुम्हारे ठीक पास की अनदेखी दुनिया की कहानी है. जो बार-बार हमारे घर की घंटियां बजाती है मगर अनजान रहती है. ठीक वैसे जैसे जागने से पहले एक लड़का पेपर फेंक जाता है, चुपचाप. साइकिल जागी हुई तथा चुपचाप दोनों, दुनिया की पड़ताल करती है.

कितनी सुंदर बात है कि यह ‘साइकिल’ बच्‍चों से जागी और चुप दोनों तरह की दुनिया की बात करती है. मोबाइल के संसार में कैद बच्‍चों को कल्‍पना के आकाश में ले जाती है. पत्रिका का रंग-रूप, संयोजन, सामग्री इतनी प्रभावी कि बच्‍चे तो ठीक बड़े भी इसे एकबार हाथ में ले लें तो पूरी पढ़े बिना रखते नहीं है. सामग्री की विशिष्‍ट के बारे में क्‍या ही कहा जा सकता है? इस बारे में वरिष्‍ठ साहित्‍यकार कवि, उपन्यासकार, कथाकार विनोद कुमार शुक्ल का यह कहना ही काफी है: साहित्य इत्यादि की पत्रिकाओं में मैंने अब तक जो लिखा पाठकों को सोचकर नहीं लिखा. जो लिख सकता था वही लिखा. इसे कौन पढ़ेगा? या कोई पढ़ेगा! के सुनसान में यह लिखा हुआ छोड़ देता था. साइकिल में यह सोचकर लिखता हूं कि बच्चे पढ़ेंगे. ‘साइकिल’ ने मुझे इस उम्र में पास और दूर के बच्चों तक पहुंचने में मदद की.

इस साइकिल की अपनी दुनिया है. अपने रंग है. इसका हैंडल बच्‍चों का सर्जन और रचनात्‍मकता के आमसान की ओर ले जाता है. इसकी यात्रा करते हुए आनंद की घंटियां बजती हैं. इसकी पुर्जे-पुर्जे में मनभावन संग बसता है. यह बच्‍चों के विकास मार्ग को न अवरूद्ध करती है और किसी दिशा में मोड़ती है. वास्‍तव में यह पंख फैलाती है और एक सुहानी उड़ान के लिए आमंत्रित व तैयार करती है.

अधिक गहराई की बात करूं तो कक्षा 4 से 8 तक के बच्‍चों को ध्‍यान में रखकर प्रकाशित की जा रही यह पत्रिका बच्‍चों को भाषा का अभ्‍यास करवाती है. भाषा के नए रंग-रूप, नए मुहावरों से परिचित करवाती है. यह दायरों को बांधती नहीं, तोड़ती है. यहां कविता अपने भाव में हैं, छंद और तुकबंदी के विन्‍यास में सिमटी नहीं हैं. तय करना मुश्किल होता है कि चित्र अधिक प्रभावी या लेखन और अंत में हम पाते हैं कि दोनों लाजवाब. यानी तो है न साथ-साथ विकास का दृष्टिकोण?

‘साइकिल’ और ऐसी ही कई बेजोड़ पुस्‍तकें तैयार कर रहे इकतारा के सुशील शुक्‍ला और चंदन यादव की यह राय मायने रखती है कि ‘साइकिल’ में हमारी कोशिश रहती है कि उसकी सामग्री बच्चों को एक पाठक के रूप में तैयार कर सके. पढ़ने के प्रति उनकी रुचि जागे. इसके लिए कई चीजें जरूरी हैं मसलन, विविधता से भरी सामग्री मसलन, उसकी प्रस्तुति सामग्री की प्रस्तुति पाठक को आकर्षित करती है कि नहीं? जिस भाषा में सामग्री पेश की जाती है वह पुरानी धूल खाई भाषा तो नहीं है? वह आज की और बोलचाल की भाषा है कि नहीं? उसमें जीवन झलकता है कि नहीं या वह सिर्फ किताबी भाषा है.

बेहद कल्पनाशील, सवाली और जिज्ञासु बच्‍चों और उनके आसपास फैली दुनिया के बीच बने एक पुल का नाम है ‘साइकिल’ जहां से वे अपनी तरह से, अपनी भाषा और अपने रंग में दुनिया को देखते हैं. ‘साइकिल’ के जरिए वे ऐसी जगह पर पहुंचते हैं जहां बराबरी से बात की जाती है, जहां सीमा रेखाएं नहीं खींची जाती बल्कि कल्पनाओं में एक पंख और जोड़ दिया जाता है. बच्चों को रट्टू तोता बनाए रखने की मुहिम पर प्रहार है यह ‘साइकिल’.

और जब इकतारा कहता है कि ‘साइकिल’ बच्‍चों को अनुयायी, संकीर्ण और कूपमंडूक बनाए रखने के चक्र के खिलाफ एक जुगनू बराबर प्रस्ताव है तो हम पाते हैं यह जुगनू भर नहीं है, भोर की किरण है और इसका उजास सब बच्‍चों तक पहुंचना चाहिए. विश्‍व साइकिल दिवस पर इस ‘साइकिल’ की ट्रिन-ट्रिन भी सुनिए, अपना भविष्‍य बेहतर बनाने के लिए सृजन संसार साथ-साथ सवारी के लिए बुला रहा है.

(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 


Thursday, May 25, 2023

दाग देहलवी: जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं

 


हजारों काम मोहब्बत में हैं मजे के दाग

जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं.

मोहब्‍बत दाग देहलवी ने जब यह शेर कहा तो बहुत मशहूर हुआ क्‍योंकि उनके पहले मिर्जा गालिब कह चुके थे, ‘इश्क ने ‘गालिब’ निकम्मा कर दिया, वर्ना हम भी आदमी थे काम के.’ अपनी शायरी से मिर्जा गालिब, मौमिन, जौक जैसे बुजुर्ग शायरों की तारीफ पाने वाले दाग देहलवी ने उर्दू का इतना सहज इस्‍तेमाल किया कि अवाम के प्रिय शायर हो गए. उनकी शायरी मोहब्‍बत की शायरी मानी जाती है मगर उनके जीवन का भी अजीब रंग था कि मोहब्‍बत पाने के लिए उन्‍होंने तवायफे काम पर रखी हुई थी.

दाग देहलवी का असली नाम नवाब मिर्जा खां था. उनका जन्‍म 25 मई 1831 को दिल्ली में हुई था. दाग देहलवी के पिता शम्सुद्दीन खां ने नाइंसाफी के लिए अंग्रेजों के खि‍लाफ आवाज उठाई. ब्रिटिश रेजिडेंट के कत्ल की भी साजिश के आरोप में उसे 1835 फांसी दे दी गई. पिता की फांसी के समय दाग देहलवी मात्र चार साल और चार महीने के थे. अंग्रेजों के भय से दाग देहलवी की मां वजीर बेगम कई वर्षों तक छिप कर रहीं और इस दौरान दाग देहलवी अपनी मौसी के यहां रहे.

संदर्भ बताते हैं कि कई वर्षों के भटकाव के बाद जब दाग की मां वजीर बेगम ने आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के पुत्र और उत्तराधिकारी मिर्जा फखरू से विवाह कर लिया. इस शादी के बाद दाग देहलवी भी लाल किले में आ गए यहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई. मिर्जा फखरू के देहांत के बाद इन्‍हें लाल किले से बाहर कर दिया गया. लेकिन लाल किले में बीते 12-14 सालों में दाग देहलवी ने उर्दू शायरी में नाम पा लिया था. ऐसे समय में जब फारसी में शायरी की जा रही थी तब दाग ने उर्दू को खास अंदाज से अपनी शायरी में आजमाया. लाल किले से निकलने के अगले साल ही 1857 की क्रांति हो गई. आशियाना बिखरने के बाद वे दर-बदर के हो गए. दिल्‍ली से वे रामपुर पहुंचे और कुछ बरस बाद वहां से हैदराबाद.

हैदराबाद का शुरुआती जीवन तकलीफों में गुजरा फिर नवाब से राहत मिली. बीवी के देहांत के बाद दाग अकेले हो गए थे और मन बहलाने के लिए उन्होंने एक साथ कई तवायफों को नौकर रखा था. दाग देहलवी से इन तवायफों का रिश्ता शाम की महफिलों तक ही था. दाग देहलवी की गज़लों की शौहरत में इन सुरीली आवाज़ों का भी बड़ा योगदान था. दाग देहलवी की शायरी के प्रसिद्ध होने का एक और कारण था कि उन्‍होंने वक्‍त के हिसाब से न केवल गजलें लिखी, बल्कि धुन तैयार कर उन्‍हें तब की नामचीन तवायफों और कोठेवालियों को याद करवाया. इस तरह अगले ही दिन उनकी गजलें शहर में मशहूर हो जाती. उस वक्‍त की मशहूर गायिकाओं से चर्चित हुई दाग की गजलों का कारवां समकालीन गजल गायकों नूरजहां, बेगम अख्तर, फरीदा खानम, आबिदा परवीन, गुलाम अली, मेहदी हसन, जगजीत सिंह, पंकज उधास की आवाज के जरिए हम तक पहुंचा है. हैदराबाद में ही साल 17 मार्च 1905 में उनका देहांत हो गया.

दाग देहलवी ने अपने जीवन में खूब लिखा है. बताते हैं कि उनका एक ‘दीवान’ 1857 में लूट लिया गया था, जिसकी कोई खबर नहीं मिली. जब वे हैदराबाद में रह रहे थे तब दूसरा दीवान कोई चुरा ले गया मगर इसके बावजूद दाग देहलवी के पांच दीवान ‘गुलजारे दाग’, ‘महताबे दाग’, ‘आफ़ताबे दाग’, ‘यादगारे दाग’, ‘यादगारे दाग- भाग-2’ प्रकाशित हुए जिनमें 1038 से ज्‍यादा गजलें, रुबाईयां, सलाम मर्सिये आदि शामिल हैं. उन्होंने कम से कम फारसी लफ्जों का इस्तेमाल करके उर्दू शेर लिखे. दाग को अपने वक्त का सबसे बेहतरीन रोमांटिक शायर कहते हुए माना जाता है कि दाग वो शायर हैं जिन्होंने उर्दू गजल को निराशा से निकाल कर मोहब्बत के रास्ते पर ला खड़ा किया. उनके बहुचर्चित कुछ शेर यूं हैं:

आप पछताएं नहीं जौर से तौबा न करें

आप के सर की कसम ‘दाग’ का हाल अच्छा है.

आशिकी से मिलेगा ऐ जाहिद

बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता.

अभी आई भी नहीं कूचा-ए-दिलबर से सदा

खिल गई आज मेरे दिल की कली आप ही आप.

अदम की जो हकीकत है वो पूछो अहल-ए-हस्ती से

मुसाफिर को तो मंजिल का पता मंजिल से मिलता है.

इलाही क्यूं नहीं उठती कयामत माजरा क्या है

हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं.

राह पर उनको लगा लाए तो हैं बातों में

और खुल जाएंगे दो-चार मुलाकातों में.

ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा

ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा.

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं

हम देखने वालों की नजर देख रहे हैं.

ये तो कहिए इस खता की क्या सजा

मैं जो कह दूं आप पर मरता हूं मैं.

जिन को अपनी खबर नहीं अब तक

वो मिरे दिल का राज क्या जानें.

आइना देख के कहते हैं संवरने वाले

आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले.

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे

जो रंज की घड़ी भी खुशी से गुजार दे.

वफा करेंगे, निबाहेंगे, बात मानेंगे

तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था.

मिलाते हो उसी को खाक में जो दिल से मिलता है

मिरी जां चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है.

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता

वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता.

फलक देता है जिन को ऐश उन को गंम भी होते हैं

जहां बजते हैं नक़्क़ारे वहां मातम भी होता है.


(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 


Wednesday, May 17, 2023

फड़के स्‍टूडियो: अंग्रेज पत्रकार के कमेंट ने मोम को पत्‍थर में बदल दिया

मांडव जा रहे हो तो धार के फड़के स्‍टूडियो जरूर जाना. बाज बहादुर और रानी रूपमति के प्रेम के किस्‍सों के लिए मशहूर मांडू जाने वाले हर शख्‍स को यह सलाह जरूर दी जाती है. बचपन में हमें भी मिली थी जब कक्षा पांचवी के बच्‍चों को स्‍कूल की ओर से शैक्षणिक भ्रमण पर ले जाया गया था. खांडेराव पहाड़ी पर बना तीन कमरों का स्‍टूडियो जहां के बारे में कुछ पता नहीं था मगर ज्‍यों ही दरवाजा खुला हम बच्‍चों की आंखें फटी की फटी रह गईं. रोशन केबिन में रखी मूर्तियां इतनी सजीव की आंखों को मल-मल कर देखा गया वाकई में मूर्तियां हैं या किसी को बुत बना कर बैठा दिया गया है. बोलती सी आंखें, मुस्‍कुराने को तत्‍पर होंठ, उम्र की गवाह झुर्रियां, कपड़ों पर सिलवटों की तराश ऐसी कि मन करें हथेली घूमा कर ठीक कर दें. सब यूं खामोश की यदि गलत हरकत हुई तो बुजुर्ग जो मूर्ति बने बैठे हैं बोल ही पड़ेंगे एकदम.



वह 80 के दशक की बात थी जब पहली बार फड़के स्‍टूडियो गया था और आज 21 वीं सदी के 22 साल गुजर गए हैं. फड़के स्‍टूडियो का रंग रोगन जरूर बदल गया है मगर जो नहीं बदला वह है इन प्रतिमाओं का जीवंत होने का अहसास. पत्‍थरों में प्राण फूंक देना यदि कहावत है तो दावे से कहा जा सकता है कि यह कहावत ऐसी शिल्‍प को देख कर कही गई होगी.

धार के फड़के स्‍टूडियो जो भी गया है वह ऐसे मनोभावों और इन प्रतिमाओं के रचियता के प्रति श्रद्धा भाव से भरे बिना नहीं लौटा है. इन प्रतिमाओं के शिल्‍पकार रघुनाथ कृष्ण फड़के की 17 मई को पुण्‍यतिथि है. रघुनाथ कृष्ण फड़के का जन्‍म 27 जनवरी 1884 को मुंबई के पास वसई में एक साधारण परिवार में हुआ था. उनके पिता कृष्णा जी वसई के दरबार में कार्यरत थे. साधारण परिवार में जन्‍मे रघुनाथ के मूर्तिकार होने के पीछे की कहानी भी दिलचस्‍प है. रघुनाथ‍ को बचपन से ही मूर्तिकला का शौक था. पेंटर श्रीनिवासराव हरपनहल्ली उनके पहले शिक्षक थे. उन्होंने रघुनाथ में मूर्तिकला की गुणवत्ता को पहचाना. उनके प्रोत्साहन से फड़के ने एक बूढ़े आदमी की पहली मूर्ति बनाई. उसी मूर्ति को बॉम्बे आर्ट सोसाइटी प्रदर्शनी में राज्यपाल द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था. फड़के की इसी मूर्ति को बाद में भारत सरकार ने इंग्लैंड के वेम्बली और अमेरिका के फिलाडेल्फिया में प्रदर्शनियों के लिए भेजा था.

मराठी विश्‍वकोश के अनुसार  1917 के दौरान रघुनाथ फड़के ने मुंबई में ‘मूविंग वैक्स पेंटिंग्स’ की एक प्रदर्शनी आयोजित की. इस चित्र प्रदर्शनी को काफी प्रतिसाद मिला. उन्हें अच्छी आमदनी भी हुई. उन्होंने अपने मोम के पुतलों को 1925 में वेम्बली इंग्लैंड में प्रदर्शनी के लिए भेजा. प्रदर्शनी भी वहां बहुत लोकप्रिय हुई. उन्होंने 1917 से 1927 तक दस वर्षों तक ऐसी प्रदर्शनियों का आयोजन किया. भारत की आजादी के दौर में भी उन्‍होंने अपनी प्रदर्शनियों में उन्होंने हिंदमाता के शोक, लाला लाजपतराय, लोकमान्य तिलक, दादाभाई नवरोजी और उनके आसपास के अन्य नेताओं के साथ-साथ महात्मा गांधी की कैद आदि विषयों को प्रस्तुत किया. मोम के इन पुतलों को देखकर लोग हैरान रह जाते थे. अंग्रेजी अखबार हेराल्ड ने भी उनकी कला की प्रशंसा की लेकिन ब्रिटिश पत्रकार और द बॉम्बे क्रॉनिकल के संपादक बीजी हॉर्निमैन की टिप्‍पणी ने उनकी जिंदगी बदल दी. पत्रकार हॉर्निमैन ने फड़के के  एक मोम शिल्पकार होने पर उपहास करते हुए सुझाव दिया कि उन्हें तो मूर्तिकार बनना चाहिए. इस आलोचना से रघुनाथ फड़के का दिल टूट गया. इतना उदास हुए कि मोम की प्रतिकृति की अपनी प्रदर्शनी को सफलता की ऊंचाई पर बंद कर दिया.

तभी लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी से उनकी पहचान हुई. लोकमान्य तिलक ने उन्हें पुणे में शिवाजी मंदिर के लिए शिव छत्रपति की एक प्रतिमा बनाने का काम सौंपा. शिव राय की यह पहली संगमरमर की स्मारक मूर्ति 1923 में शिवाजी मंदिर में स्थापित की गई थी. फिर 1932 में फड़के को गिरगांव चौपाटी पर लोकमान्य तिलक की आदमकद मूर्ति लगाने का काम मिला. लोकमान्य तिलक की इस मूर्ति को देखने के बाद ब्रिटिश पत्रकार बीजी हॉर्निमैन ने मूर्तिकार के रूप में फड़के की भी प्रशंसा की. जिस पत्रकार से आलोचना मिली थी उसी से मूर्तिकार के रूप में तारीफ सुन कर रघुनाथ कृष्‍ण फड़के किस संतोष का अनुभव किया होगा समझा जा सकता है.

वे केवल मूर्तिकार नहीं थे बल्कि संपूर्ण सर्जक थे. उन्‍होंने रत्नाकर पत्रिका के अप्पासाहेब गोखले के कारण साहित्य की ओर रुख किया. उन्होंने रत्नाकर, नवनीत, मनोरंजन पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया; और वे ‘टीकाकर फड़के’ के नाम से प्रसिद्ध हुए. 1937 में वे धार में आयोजित मध्य भारतीय साहित्य सम्मेलन की कला और कविता परिषद के अध्यक्ष थे. साहित्य के साथ-साथ उन्होंने संगीत, नाटक, ज्योतिष में भी रुचि ली. फड़के का नाट्यपरमर्ष संग्रह बहुत लोकप्रिय हुआ. उन्होंने तरुण साहित्य माले (1937) द्वारा प्रकाशित हास्य रचनाओं की एक पुस्तक ‘स्वालविराम’ भी लिखी. उन्होंने तबले पर भास्करबुवा बखले, बालकृष्णबुवा इचलकरंजीकर, अमन अली खान जैसे प्रसिद्ध गायकों के साथ संगत की.

जब उनकी मूर्तिकला की प्रशंसा धार तक पहुंची तो धार नरेश उदाजीराव पवार की घुड़सवारी की मूर्ति का काम मिला. यह प्रतिमा धार के प्रवेश द्वार पर स्थापित है. कहा तो यह भी जाता है कि 1930 में धार के महाराज उदाजीराव ने अपनी मां लक्ष्मीबाई की प्रतिमा बनाने के लिए उन्हें धार बुलाया था. 1933 में धार में स्टूडियो बनाकर उन्होंने मूर्तिकला का प्रशिक्षण देना शुरू किया. शिष्यों शंकरराव दवे, दिनकरराव दवे, राजाभाऊ मेहुणकर और श्रीधर मेहुणकर ने अपने गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाया है. 1961 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया. 1971 में उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई. 17 मई 1972 को धार के खांडेराव हिल स्थित अपने स्‍टूडियो में उनका निधन हो गया.

कलामर्मज्ञ रघुनाथ कृष्ण फड़के के निधन को 51 बरस हो गए हैं मगर उनके शिल्‍प आज भी दर्शकों को वैसा ही अचंभित, चमत्‍कृत और स्‍तब्‍ध करते हैं जैसा निर्माण के वक्‍त करते थे. राजा भोज की नगरी धार इतने बरसों से रघुनाथ कृष्ण फड़के के शिल्‍प के कारण भी ख्‍यात है.


(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)