Monday, February 13, 2012


कहाँ मिलेगा अलखजी जैसा गुरु
अलखजी नहीं रहे...यह खबर एक बेहतर इंसान के जाने की सूचना ही नहीं है बल्कि संभावनाशील कलाकारों के लिए सफलता का एक द्वार बंद होने जाने की अनचाही घटना है। अलखजी के रूप में एक और 'गुरु" का चले जाना है जो सीखने के लिए शिष्य को पूरी स्वतंत्रता देता था। जो पल भर में शिष्य की पूरी क्षमताओं का आकलन कर लेता था और फिर उसे अभिव्यक्ति के आकाश पर सबसे ऊँचा उड़ने की आजादी दे देता था।
अलखजी के व्यक्तित्व के अनगिनत पहलू हैं जिन पर बात की जानी चाहिए लेकिन उनका 'गुरु" पद ही इतना विराट है कि उसका 'खो जाना" समाज के लिए प्राणतत्व का मिट जाना है। वे सही मायनों में उस गुरु की तरह से थे जो बाहर से कठोर और भीतर से नर्म दिल होता है। खरी-खरी कहने वाला 'दबंग" गुरु। शिष्यों से पूछिए, वे बताएँगे कि अलखजी का गुरुरूप कितना विराट था-'दादा, तब तक अभ्यास करवाते थे जब तक कि अभिनय से संतुष्ट नहीं हो जाते... वे फटकारते थे और तब तक मेहनत करते जब तक कि मनचाहा काम पा न लेते... तारीफ भले कम मिले लेकिन अलखजी की डाँट जरूर मिल जाती थी...।"
इसी रूप ने 'नट बुंदेले" खड़ा किया। संगीतकार ओमप्रकाश चौरसिया, इरफान सौरभ जैसे वरिष्ठ सर्जकों से लेकर उनके पुत्र अंशपायन और हेमंत देवलेकर जैसे नवागत कलाकारों ने अलखजी में कोई एक बात समान पाई तो वो थी शिष्यों को खुलापन देने वाला रूप। पं. चौरसिया ने अलखजी के साथ तब काम किया था जब अलखजी भोपाल आए थे यानि 1983-86 के दौरान। इसी दौरान इरफान सौरभ भी जुड़े जो कारंतजी के बाद 'महानिर्वाण" का चर्चित पात्र 'भाऊराव" के लिए अलखजी की पहली पसंद बन गए थे। दोनों बताते हैं कि अलखजी ने कभी हमारे काम में दखल नहीं दिया। वे इतनी आजादी देते थे कि आप कम से समझौता नहीं कर पाते और यादगार सृजन हो जाता। नए कलाकारों ने उनके संग पिछले नवंबर में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं को मंचित किया था। वे अलखजी की शिक्षा कभी भूल नहीं पाएँगे।
नए और पुराने की साझेदारी के हिमायती अलखजी ने भोपाल में तीन दशकों की यात्रा में कई पड़ाव रचे हैं। शिष्यों के रूप में खड़े किए गए उनके 'माइलस्टोन" उनकी इस यात्रा की गवाही देते रहेंगे। 'नट बुंदेले" के जरिए रंग जगत में लोक संस्कृति को स्पंदन करने वाला 'कबीरा" अपने 'महानिर्वाण" के बाद बहुत याद आएगा...।

Tuesday, November 15, 2011

ख्याल

आज थोड़ा उदास था, दर्द से परेशान भी तभी एक शेर सुना जिसकी कहन कुछ यूँ थी-बचपन के वे दिन कितने मासूम थे, हर बात पर यकीं हो जाता था। हम मान लेते थे कि जाने वाले आसमान में तारे बन जाते हैं।" अचानक सुनाई दिया यह शेर मुझे अतीत में ले गया और यादों में खोने के बाद दर्द कम और दर्शन बढ़ गया।
मुझे याद आया बात 1985 की रही होगी। उस वक्त मेरी उम्र करीब 9 साल। दाँत टूट नहीं रहे थे। हर बच्चे की तरह मेरी भी इच्छा थी कि मैं जल्दी से बढ़ा हो जाऊँ। दूध के दाँतों का न टूटने का अर्थ था मेरा बच्चा रह जाना। जबकि कुछ दोस्तों के दाँत टूटना शुरू हो गए थे। मैं इसी चिंता में रहता कि कम दाँत टूटना शुरू हों और कब में बढ़ा कहलाऊँ। तभी आगे के एक दाँत ने हिलना शुरू किया। रोमांचक था दाँत गिरने का ख्याल। लेकिन अंदर एक भय भी दाँत दर्द होगा। इसी ऊहापोह में पता चला कि मेरे गृह नगर में एक शिविर लगने वाला है जहाँ एक सज्जन किसी वैकल्पिक पद्धति से दाँत निकालेंगे। चूँकि पैसे लगना नहीं थे तो मुझे किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहीं था। फिर क्या था, मैंने यह सोच कर बिना दर्द के दाँत निकाल दिया जाएगा और मेरी हसरत भी पूरी हो जाएगी बिना समय गँवाए पंजीयन करवा दिया। इंतजार के बाद वह दिन आ ही गया जब शिविर का आयोजन हुआ। मैं स्कूल जाने के लिए समय के पहले तैयार हो गया। बस्ता टाँग निकल रही था कि अपनी नानी (जो माँ ही है) को न बताने की हिम्मत न कर पाया। याद नहीं उन्होंने क्या कहा लेकिन मैं कुछ देर में शिविर स्थल पर था। कई बड़े लोगों की कतार में एक मैं ही बच्चा था जो 'बड़ा" होने आया था। इर घड़ी 11 बजे की सूचना दे रही थी उधर स्कूल की घंटी बजने और देर होने पर सर की फटकार का डर हावी हो रहा था। लेकिन इस सब पर भारी था दाँत निकलवाने की खुशी। 
आखिर मेरा नंबर भी आ गया। चिकित्सक सज्जन ने देखा और कहा-दाँत तो हिल ही रहा है। जल्दी उखड़ जाएगा। इसे निकालने की जरूरत नहीं है। मैं रूँआसा हो गया और जिद कर बैठा कि नहीं आप तो निकाल दो। मुझे दर्द होगा। वे मुस्कुराए और अपनी कला से बिना दर्द दिए मुझे 'बड़ा" बनाने की प्रक्रिया की ओर भेज दिया।
उस दिन खुशी-खुशी अपना दाँत लिए घुमता रहा। फिर किसी बुजुर्ग के कहने पर दाँत किसी मकान की छत पर फेंक दिया बेहतरी की कामना के साथ। 
करीब 27 साल बाद ऐसा ही मौका मेरे जीवन में फिर आया जब एक दाँत निकलवाने जाना पड़ा। आज बड़े होने की खुशी नहीं बल्कि ज्यादा ही बड़े हो जाने का भय सता रहा था। शरीर के कमजोर होने की शुरूआत भीतर ही भीतर खाए जा रही थी। आज ज्यों ही चिकित्सक ने कहा-'दाढ़ निकाल देते हैं।" मैं चुप हो गया। जीभ फेर कर दाढ़ को अलविदा कहते इतना साथ देने के लिए शुक्रिया कहना चाहा। आखिर इसी के कारण में इतना रस प्राप्त कर पाया था। 
खैर, दो दाँतों के जाने के बीच में मैं भरपूर जिया लेकिन इस उम्र में एक दाँत का साथ छोड़ कर जाना मुझे दार्शनिक बना रहा है। कुछ यूँ कि उम्र खत्म होने की चिंता होने लगी है और लगता है क्या कुछ कर पाया अब तक।
बचपन में सीखाया जाता था-जीभ नम्र होती है और दाँत सख्त। इसलिए जीभ अंत तक बनी रहती है और दाँत विदा हो जाते हैं असमय। सोचता हूँ, मैं कितना 'जीभ" हुआ और कितना 'दाँत"। कितना चला अब तक और कितना रहा बाकी। एक साथी के जाने का दुख तो है ही। 

Sunday, November 6, 2011

ये क्या बात हुई, आप रोज गाड़ी चलाते हैं?

एक सरकारी टाइप बयान- 
फिर पेट्रोल के दाम बढ़े और आप लगे चिल्लाने। ये क्या बात हुई? आपको लगता है, सरकार के पास और कोई काम नहीं रह गया है जो वह हर माह-पन्द्रह दिन में पेट्रोल के दाम बढ़ाने लगती है। जनाब, गाड़ी आप चलाएँ, ईधन आप फूँकें और दाम बढ़े तो सरकार को कोसें। यह तो ठीक नहीं है। भले आप सोचते रहें कि केन्द्र सरकार के करोड़पति मंत्रियों को गरीबों की फिक्र नहीं है। सरकार को केवल तेल कम्पनियों के घाटे को ही कम नहीं करना आता बल्कि वह आम आदमी की चिंता भी करती है, तभी तो जब भी कीमतें बढ़ती है कोई जिम्मेदार व्यक्ति चिंता जताने जरूर सामने आता है। उनकी फिक्र उनके बयान से ज्यादा चेहरे पर झलकती है। फिर क्या दोष अगर यह चिंता काम में नहीं दिखती।

 फिर आप भी दोष तो केवल केन्द्र सरकार को देते हैं, कभी राज्य सरकार से भी तो पूछिए। केवल हम ही थोड़े हैं जिसके खजाने में दाम बढ़ते ही पहले से ज्यादा कर आता है। राज्य सरकारें भी बैठे-ठाले मलाई खाती हैं। ईधन का दाम बढ़ा कर कोप हम झेलें और विपक्षी पार्टी की राज्य सरकारें हमारे खिलाफ पलट वार भी करें। 
वाह, भई वाह। यह क्या बात है? थोड़ी नाराजी उधर भी तो जाहिर कीजिए।

फिर हमें तो देश चलाना है। आप को क्या पता, यूरोपीय देशों में क्या हो रहा है। हमारी हिम्मत देखिए कि हम मँहगाई रोकने की चिंता तो जताते हैं। आखिर हम भी कम तक घाटा सहें? क्या कहा, इतनी रकम तो घोटालों में स्वाहा हो जाती है। देखिए, अभी आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं। अगर हुए तो हम कोशिश करेंगे कि यह राशि लौटा दी जाए।

आप भी तो अपना आकलन कीजिए। सेहत बनाने को पैदल चलेंगे। जिम में घंटों वॉकर पर दौड़ेगे। साइकिलिंग करेंगे, लेकिन 
ईधन बचाने कभी पैदल नहीं चलेंगे। ये क्या,आपको सुविधा मिली तो रोज गाड़ी चलाने लगे। कभी पैदल भी जाइए। देशहित और जेब हित में पेट्रोल बचाइए।


याद रखिए, हमसे सवाल मत कीजिए। 
हमें याद है, हम जनता के सेवक है। तभी तो उसकी फिक्र में मँहगाई के पर कतरने की बातें करते हैं। हम पर भरोसा रखिए। एक बार घाटा कम हो जाए, कीमतें जरूर घटेंगी।

Tuesday, October 11, 2011

मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो मेरी तरह तुम भी झूठे हो



बात जब जगजीत की हो तो क्यूँ न उन्हीं के शब्दों में बयाँ की जाए? आज जगजीत हमारे बीच में नहीं है लेकिन-
 'जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया/
उम्र भर दोहराऊंगा ऐसी कहानी दे गया।?"
उम्र चाहे जो हो, शायद ही कोई होगा जिसने कभी जगजीत की गजल को न सुना हो या कभी गुनगुनाया न हो। कई हैं जिन्होंने अपने प्रेम का इजहार करने के लिए जगजीत की गाई गजलों का ही सहारा लिया है। हमारे जीवन में कितनी यादें, कितनी बातें। फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई जगजीत को भूला दे-
'कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे/
मैं उतना याद आउंगा मुझे जितना भुलाओगे।"

यादें कितनी अजीब हैं...बिन बुलाए आ धमकती हैं, कहीं भी कभी भी...। जगजीत की आवाज की ऊँगली पकड़ कर कोई भी अपने बचपन में चला जाता है और कहने लगता है-
'ये दौलत भी ले लो ये शौहरत भी ले लो.../
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी.../
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन.../
वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी....।"
 उम्र के किस मोड़ पर जगजीत साथ नहीं होते? उस मकाम पर भी जहाँ सबसे ज्यादा मुश्किल होती है। जगजीत जैसे हमारी ही बात तो कह रहे थे-
'प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है।
नये परिन्दों को उड़ने में वक्त तो लगता है।
जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था/
लम्बी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है।"

जिंदगी का कोई सिरा जब उलझता है तो जगजीत राह सुझाने चले आते हैं-
'धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो/ 
जिंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो।"

जीवन की साँझ ढ़ले जब गुजरा वक्त चुभने लगता है तो 'माँ" ही राहत देती है।

वो आवाज जो कदम-कदम पर साथ निभाया करती थी, वो अब नए लिबास में सामने नहीं आएगी। काश! ऐसा हो जाए-
'कभी यूँ भी तो हो/परियों की महफिल हो/
कोई तुम्हारी बात हो/और तुम आओ। कभी यूँ भी तो हो
/सूनी हर मंजिल हो/कोई न मेरे साथ हो/और तुम आओ।"

यादें अनगिनत हैं। जो कभी जगजीत से मिले भी नहीं, उनका भी जगजीत की आवाज से गहरा नाता है। आज लगता है कितना मुश्किल रहा होगा अपने बेटे के बेवक्त चले जाने के गम को भूला कर यह गाना-'चिट्ठी न कोई संदेश, जाने कौन सा है वो देश/ कहाँ तुम चले गए।" आखिर 'कोई ये कैसे बताए कि वह तन्हा क्यूँ हैं?"जगजीत बहुत याद आएँगे।
'वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफत भी अता करे/
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो।"