Thursday, October 4, 2012

रेप के लिए क्या लड़की खुद दोषी है?




मित्रों, बात किसी एक समाज और उसकी सोच की नहीं है। यह व्यक्तिगत सोच का मामला है जो अंतत: समाज की सोच बनती है। यह बहस का विषय हो सकता है कि व्यक्ति की सोच से समाज की सोच बनती है या समाज की सामूहिक राय व्यक्तिगत धारणा बनाती है लेकिन कठघरे में तो दोनों ही की पक्षपाती सोच है। क्या कोई लड़की खुद अपने बलात्कार के लिए अकेली जिम्मेदार है? ऐसा इसलिए पूछ रहा हूँ कि किसी भी बलात्कार के बाद थोड़ी सहानुभूति दिखलाने के तुरंत बाद कमेंट होता है -'वह थी ही ऐसी। कोई ऐसे कपड़े पहनता है भला?" या कहेंगे 'खूब हवा में उड़ती थी अब भुगतो।" अगर हम पीड़ित को जानते हैं तो कहेंगे-'बेचारी। उसे शाम को घर के बाहर निकलना ही न था। क्या जरूरत थी नौकरी करने की।" खूब दुख जताते हुए यहाँ तक कह देगें कि माँ-बाप की बात मान कॉलेज न जा कर शादी कर लेती तो यह न भोगना पड़ता। या यह निष्कर्ष हवा में उछाल देते हैं कि लड़कियों को तो पढ़ाना ही पाप है।
अब आप ही बताइये क्या यह हमारी पक्षपात और एकतरफा क्रर सोच नहीं है? लड़की का शारीरिक बलात्कार तो एक बार हुआ लेकिन मानसिक बलात्कार इस तरह पल-प्रतिपल होता है। ऐसी सहानुभूति दिखला कर हम उसका भला नहीं  कर रहे होते बल्कि समूची स्त्री समाज की प्रगति में बाधा  बन रहे होते हैं। एक साथ घटना घटी तो उसकी हमउम्र हजारों लड़कियों को घर में रहने की नसीहतों और दर्जनों पाबंदियों से गुजरना पड़ता है। क्या बलात्कार के लिए लड़की के कपड़ें या उसका काम के लिए घर से बाहर निकलना दोषी है? क्या वह निठल्ला आवारा दोषी नहीं है जो रात दिन कुत्सित विचारों के साथ जीता है? पहले मानस में और फिर शारीरिक तौर पर किसी मासूम को हवस का शिकार बनाता है? फिर घर में रहने या रखने की सलाह लड़कियों को ही क्यों  दी जाती है? क्या ऐसे पुरूषों को खुले रहने का हक है? क्या हम अब भी रेप के लिए लड़की को ही दोष देंगे?

Wednesday, October 3, 2012

आखिर लड़कियों पर ही पाबन्दी क्यों?


गुना के जैन समाज ने फैसला किया है कि मंदिरों में जींस पहन कर नहीं आया जा सकेगा। इस निर्णय का दूसरा पहलू यह कि यह सख्ती केवल युवतियों के लिए है। सवाल यह कि पाबंदी केवल लड़कियों के लिए ही क्यों? मंदिर में अगर अनुशासन चाहिए तो यह नियम सब पर लागू होना चाहिए लेकिन घेरे में आयीं केवल लड़कियाँ। मुझे  यकीन है यह फैसला लेने वालों में स्त्रियाँ होती तो वे पुरुषों को इस दायरे से बाहर नहीं रखती। यहाँ यह बताना जरूरी है कि इनदिनों भागीदारी के नाम पर महिलाओं को शामिल किया तो जाता है लेकिन ये भागीदारी महज दिखावा साबित होती है क्योंकि साजिशन उन्हीं महिलाओं को रखा  जाता है जो हर बात पर सहमति जताए। असहमति जता सकने वाली महिलाओं को फैसला लेने कि स्थिति तक साथ रखा ही नहीं जाता। यह केवल एक समाज में नहीं होता बल्कि हर जगह का यही आलम है। 
तो बात पाबंदी कि गुना ही नहीं समाज कहीं का भी हो वह ऐसे फैसले लेता है और महिलाओं पर दबाव बनाता है कि वे बिना जिरह हर बात मान लें। खैर, फतवे हर बार ही बहस को जन्म देते हैं लेकिन हरबार ही एक बड़े वर्ग की स्वतंत्रता पर आदेश की बेड़ियाँ लगा दी जाती है। अनुशासन तोड़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती लेकिन अनुशासन के नाम पर तानाशाही या पक्षपात कैसे सहन हो? क्या यह उचित है कि पुरूष अधनंगे हो कर घूमते रहे लेकिन उनकी गलत दृष्टि से बचने के लिए महिलाएँ स्वयं को लबादे में ढ़ँक कर रखे? क्या महिलाएँ यह माँग नहीं कर सकती कि पुरूष अपनी हद में रहे, यह हद कपड़े पहनने से लेकर चौराहों पर घंटों टाइम पास करने तक की है। लेकिन ऐसा होगा नहीं। फतवे जारी करने वाला समाज भी युवकों के आगे नतमस्तक है। वह लड़कों के मोबाइल प्रयोग करने पर पाबंदी नहीं लगा सकता क्योंकि जानते है कि लड़के उसकी बातें हवा में उड़ा देंगे और इस तरह खुद का मखौल बनना किसी समाज को पसंद नहीं आता। वह तो उसी पर लगाम कसता है जो उसकी सुनता है।
क्या किसी व्यक्ति को अपनी पसंद के कपड़े पहनने का भी अधिकार नहीं है? जरा गहराई से विचार करें तो व्यक्ति अपने कपड़ों सहित रोजमर्रा के साधनों  का चयन अपनी सुविधा  के मद्देनजर करता है। इसीलिए लगभग हर काम के लिए स्वत: ही परिधान  तय से हो गए हैं। दूसरा, व्यक्ति चाहता है कि वह ज्यादा खूबसूरत दिखने के लिए परिधान का  एक टूल के रूप में इस्तेमाल करे। वैश्विकरण के साथ हर तरह के परिधान  हमारी पहुँच  में आ गए हैं और लोग फैशन के बहाने कई तरह के प्रयोग अपनी रोजमर्रा के परिधान में भी कर रहे हैं। यह बहस शाश्वत है कि वेस्टर्न ठीक है या भारतीय लेकिन कमोबेश अधिकांश  लोग जानते हैं कि उन्हें कब क्या पहनना है। बेडोल शरीर को अगर वेर्स्टन नहीं फब्ता तो वह कुछ प्रयोग के बाद इस तरह के कपड़े पहनना बंद कर देता है। यानि पूरा मामला व्यक्तिगत पसंद और नापसंद का है। कुछ नियम स्वत: तैयार हो जाते हैं और लोगों पर निर्भर करता है कि वह कपड़े पहनने के अघोषित नियमों का पालन करता है या नहीं। 
मेरी आपत्ति केवल इतनी है कि युवतियों के मोबाइल प्रयोग, जींस पहनने, बुरका न पहनने, जोर से हँसने, देर रात बाहर घूमने जैसे कामों पर प्रतिबंध लगाने वाला समाज जरा युवकों की हरकतों पर भी लगाम लगाने का साहस दिखाए, और अगर वह यह नहीं कर सकता तो  कम से कम जो उसकी बात सुन-मान रहा है उस महिला वर्ग पर बेवजह की पाबंदियाँ लादना बंद करे। 
सुन रहे हैं आप?
क्रमश:

Monday, September 17, 2012

मालिक से नौकर बना देगा एफडीआई



खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश के निर्णय से स्वरोजगार के जरिए अपने कारोबार के मालिक बन गए छोटे-छोटे व्यापारियों का नुकसान ही होगा। उनके मालिक से नौकर बन जाने का खतरा है। क्या यह लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति जैसा नहीं है जिसने बाबूओं की फौज खड़ी की? हम कैसे मानलें कि रोजगार बढ़ाने का ख्वाब दिखा कर एफडीआई की पैरवी कर रही सरकार इस बात को सुनिश्चित करेगी कि यह रोजगार बढ़ाएगा लेकिन स्वरोजगार खत्म नहीं करेगा।?
पिछली बार जब सरकार ने खुदरा व्यवसाय में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से कदम पीछे ले लिए थे तो तत्काल बाद अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय ने एक रिपोर्ट जारी कर दावा किया था कि एफडीआई की मंजूरी से कृषि वस्तुओं की खरीद और भंडारण व्यवस्था में सुधार होगा और इससे मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। चीन का उदाहरण देते हुए कहा गया था कि वहाँ ने खुदरा क्षेत्र में एफडीआई की मंजूरी 1992 में दी। उसके बाद से वहां खुदरा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ, लेकिन इसका छोटे या घरेलू खुदरा श्रृंखला पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा। इस अमेरिकी स्वार्थ वाले शोध के पीछे हम यह कैसे भूल जाएँ कि चीन ने अपने उत्पादों के लिए विश्व बाजार में गहरी जड़ें जमा ली है। चीनी सामान हमारे अपने देशी उत्पादों के लिए खतरा बन गए हैं। जीएम फूड और विदेशी का आगमन हमारे देशी उत्पादों को खत्म करके ही दम लेगा। जैसे मालवा गेहूँ, देशी टमाटर, मक्का जैसी तमाम फसलें हमारी कृषि का हिस्सा नहीं रही।
भारत में एफडीआई जरूरी है लेकिन बड़ा सवाल होगा कि किस क्षेत्र में? क्या हम अपनी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले स्थानीय और ग्रामीण अर्थतंत्र को तोड़ने की कीमत पर एफडीआई मंजूर करें? यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि पिछली वैश्विक आर्थिक मंदी में जब अमेरिका जैसा सूरमा ध्वस्त हो गया था, भारत अपनी इसी अर्थतंत्र की खासीयत के कारण अप्रभावित रहा था।
भारतीय खुदरा कारोबार का तंत्र अनोखा है। यह किराना दुकानों से लेकर कपड़े-जूते और दैनिक जीवन की जरूरी तमाम चीजों तक फैला है। यही कारण है कि कृषि पर निर्भर भारत दुकानदारों का देश बन गया। किराना में इक्यावन फीसदी विदेशी निवेश से करीब डेढ़ करोड़ खुदरा कारोबारियों के काम पर विदेशी चकाचौंध का संकट है। ये कुल बिक्री का 94 सामान अपनी छोटी-मोटी दुकानों से बेचते है। डिपार्टमेंटल स्टोर संस्कृति ने नुक्कड़ की दुकानों का कारोबार समेटा। अब डिर्पाटमेंटल स्टोर पर विदेशी कम्पनियों का कब्जा होगा। अभी भारत में बिग बाजार, रिलायंस, मोर और स्पेंसर जैसी कंपनियां किराना स्टोर का कारोबार कर रही हैं। जाहिर है किराना में विदेशी निवेश का रास्ता खुलने से इन कंपनियों को फायदा होगा न कि छोटे दुकानदारों को।
विमानन जैसे क्षेत्र में एफडीआई फायदेमंद हो सकता है लेकिन यह भी तब जब इसे लागू करने के तौर तरीके सही हों। सरकार को अगर विदेशी कंपिनयों को बुलाना ही है टेक्नीकल और इन्फ्रास्ट्रचर क्षेत्र में बुलाए। न कि उन कम्पनियों को जो हमारे उत्पादों को खत्म कर दे और मालिक दुकानदारों को सेल्समेन बना दे।




Wednesday, August 22, 2012

बड़े दिनों बाद मिली ऐसी ईदी


हर साल ईद आती है लेकिन ऐसी ईदी तो कभी-कभार ही मिलती है जब अतुल जलराशि छलक उठती है और भदभदा के गेट को खोलना पड़ता है...। हर साल मेघ आते हैं, छा कर हर्षाते हैं लेकिन जी भर कर बरसते नहीं। मन और धरा, कुछ प्यासे रह जाते हैं। ऐसे ही अतृप्त रह जाता है अपना बड़ा ताल। पहले तो ये मौके बहुत आते थे। हर साल बार-बार आते थे लेकिन जब से इंसान ने अपनी दुनिया का विस्तार किया है बड़ा तालाब छोटा होता गया है। मानो अग्रज ने अनुजों के लिए अपना विस्तार समेट लिया। राजा भोज के ताल ने अपनी प्रजा के 'सुख" के लिए खुद को छोटा कर लिया जैसे। 
हर साल ताल के साथी बादल आते तो है लेकिन वे भी इसे रीता ही छोड़ जाते हैं। मेघ अपना नेह बरसाते ही नहीं और हमारे ताल की लहरें लचकती भी नहीं। न धरती वैसी हरियाती है, जैसी इस बार धानी  चादर ओढ़ हर्षित वसुंधरा इठला रही है। मेघ कलश से बरसे नीर ने तालाब को यौवन दे दिया है। लहरें बल खाने लगी हैं और दौड़-दौड़ कर शहर की ओर आने लगी है। जैसे हमें बुलाती हो अपने उत्सव में शामिल होने...।
प्रकृति के इस मुखर निमंत्रण को कौन संवेदनशील मन ठुकरा सकता है भला? तभी तो जब पता चला कि अपना ताल छलक उठा है और वह भदभदा के तटबंध तोड़ने को आतुर है, लोग टूट पड़े इस खूबसूरत नजारे को अपनी स्मृतियों में कैद करने। छह बरस बाद आया ऐसा मौका, जब बड़े तालाब के पानी ने भदभदा का दायरा लांघा है। 
कितना मनोरम दृश्य...तालाब की सीमाओं में उफनती जल राशि को ज्यों ही मार्ग मिला वे किलक उठीं। छन-छन छमकती, बूँदें उड़ाती लहरें अपना रास्ता तलाशती दौड़ पड़ी कलिया सोत की ओर। भदभदा के पुल के एक ओर मर्यादा में भोजताल और दूसरी तरफ कूदती-फांदती लहरें। पहाड़ों की फुनगी पर टीकी रूई जैसे बादल और हरी धरती के बीच ताल की रजत संपदा। ऐसे दृश्यों को देख चिहुँकते-मुस्काते चेहरे और उनकी तृप्त आत्मा। 
हे मेघ, तुम हर साल ऐसे बरसो कि मरूथल मेरा, मधुवन हो जाए। 

 

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