Monday, April 29, 2013

आग तो कभी की लग चुकी, कुँआ खोदना कब शुरू करेंगे?

गर्मी आते ही जलसंकट गहराने लगा है। भोपाल के सबसे तेजी से बढ़ते और सबसे महंगे इलाकों में शुमार होने वाले कोलार में जल संकट से निपटने के लिए कलेक्टर ने निजी नलकूपों को अधिग्रहित करने को कहा है। सभी जानते हैं कि कोलार में हर साल भीषण जल संकट होता है। इतना कि लोग अपने लाखों के घरों को छोड़ कर समीप के उन क्षेत्रों में किराए से रहने तक चले जाते हैं जहां पानी उपलब्ध हो। यहां अलसभोर से शुरू हुई पानी जुटाने कि चिंता देर रात तक खत्म नहीं होती। इतनी परेशानी है तो सवाल उठता है कि यहां के लोग पानी के संरक्षण को लेकर बेहद सजग होंगे? लेकिन रेन वाटर हार्वेस्टिंग के आंकड़ों को देख कर तो ऐसा नहीं लगता। नगर पालिका के पास ऐसी कोई साफ-साफ जानकारी नहीं है कि कितने घरों में रैन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लागू हैं। आकलन हो तो यह सिस्टम लगवाने वालों की संख्या 1 फीसदी के करीब ही होगी। यह है पानी का लेकर हमारी फिक्र। 
भोपाल के कोलार जैसे ही हालात लगभग पूरे प्रदेश में हैं। जल संकट का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसे बेहतर जल प्रबंधन से दूर किया जा सकता है, लेकिन हमारे पास यह व्यवस्था ही नहीं है। जल कानून, जल संरक्षण, पानी के कुशल उपयोग, जल रीसाइकिलिंग और आधारभूत संसाधनों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। हमारे यहां जमीन का पानी खत्म और प्रदूषित हो रहा है लेकिन भूजल के दोहन का कोई कानून नहीं है। कम से कम पानी लिया जा रहा है तो उतना या ज्यादा पानी जमीन को लौटाने की जिम्मेदारी तय होना चाहिए। गौरतलब है कि देश में हर साल औसतन चार हजार अरब घन मीटर बारिश होती है लेकिन केवल 48 फीसद बारिश का जल नदियों में पहुंचता है। भंडारण और संसाधनों की कमी के चलते इसका केवल 18 फीसदी जल का उपयोग हो पाता है।
पानी बचाने के लिए सामाजिक चेतना नहीं आती तो इसे कानून की सख्ती से लागू करन होगा। वैसे पिछले दिनों भोपाल से अच्छी खबर आई कि शहर की तमाम मस्जिदों में नमाज से पहले वुजू करने में रोजाना खर्च हो रहे लाखों लीटर पानी को जाया होने से बचाने के लिए मसाजिद कमेटी मस्जिदों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगवाना चाहती है। कमेटी चाहती है कि यह काम राज्य सरकार व स्वयं सेवी संस्थाओं की आर्थिक मदद से हो। पहल अच्छी है और यह सभी जगह लागू होना चाहिए। सवाल धन जुटाने का है तो सरकार के साथ धनिकों को भी आगे आना होगा। पहले कुँए-बावड़ी-धर्मशाला बनवाने का रिवाज था अब पानी बचाने के लिए धन की कमी को दूर करने रईस समाजसेवियों को आगे आना होगा।
इससे सबके साथ व्यक्तिगत जिम्मेदारी कभी खत्म नहीं हो जाती। घर बनाने की पूरी प्लानिंग में अगर रैन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का उल्लेख नहीं है तो प्लान खारिज हो जाना चाहिए।
आमतौर पर हम आग लगने पर ही कुँआ खोदते हैं तो आग लग चुकी है...जल संकट दिन-ब-दिन गहरा रहा है। सवाल यही है कि आप कुँआ कब खोदना शुरू करेंगे?
पानी बचाने के लिए सामाजिक चेतना नहीं आती तो इसे कानून की सख्ती से लागू करन होगा। वैसे पिछले दिनों भोपाल से अच्छी खबर आई कि शहर की तमाम मस्जिदों में नमाज से पहले वुजू करने में रोजाना खर्च हो रहे लाखों लीटर पानी को जाया होने से बचाने के लिए मसाजिद कमेटी मस्जिदों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगवाना चाहती है। कमेटी चाहती है कि यह काम राज्य सरकार व स्वयं सेवी संस्थाओं की आर्थिक मदद से हो। पहल अच्छी है और यह सभी जगह लागू होना चाहिए। सवाल धन जुटाने का है तो सरकार के साथ धनिकों को भी आगे आना होगा। पहले कुँए-बावड़ी-धर्मशाला बनवाने का रिवाज था अब पानी बचाने के लिए धन की कमी को दूर करने रईस समाजसेवियों को आगे आना होगा।इससे सबके साथ व्यक्तिगत जिम्मेदारी कभी खत्म नहीं हो जाती। घर बनाने की पूरी प्लानिंग में अगर रैन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का उल्लेख नहीं है तो प्लान खारिज हो जाना चाहिए।आमतौर पर हम आग लगने पर ही कुँआ खोदते हैं तो आग लग चुकी है...जल संकट दिन-ब-दिन गहरा रहा है। सवाल यही है कि आप कुँआ कब खोदना शुरू करेंगे?पानी बचाने के लिए सामाजिक चेतना नहीं आती तो इसे कानून की सख्ती से लागू करन होगा। वैसे पिछले दिनों भोपाल से अच्छी खबर आई कि शहर की तमाम मस्जिदों में नमाज से पहले वुजू करने में रोजाना खर्च हो रहे लाखों लीटर पानी को जाया होने से बचाने के लिए मसाजिद कमेटी मस्जिदों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगवाना चाहती है। कमेटी चाहती है कि यह काम राज्य सरकार व स्वयं सेवी संस्थाओं की आर्थिक मदद से हो। पहल अच्छी है और यह सभी जगह लागू होना चाहिए। सवाल धन जुटाने का है तो सरकार के साथ धनिकों को भी आगे आना होगा। पहले कुँए-बावड़ी-धर्मशाला बनवाने का रिवाज था अब पानी बचाने के लिए धन की कमी को दूर करने रईस समाजसेवियों को आगे आना होगा।इससे सबके साथ व्यक्तिगत जिम्मेदारी कभी खत्म नहीं हो जाती। घर बनाने की पूरी प्लानिंग में अगर रैन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का उल्लेख नहीं है तो प्लान खारिज हो जाना चाहिए।आमतौर पर हम आग लगने पर ही कुँआ खोदते हैं तो आग लग चुकी है...जल संकट दिन-ब-दिन गहरा रहा है। सवाल यही है कि आप कुँआ कब खोदना शुरू करेंगे?पानी बचाने के लिए सामाजिक चेतना नहीं आती तो इसे कानून की सख्ती से लागू करन होगा। वैसे पिछले दिनों भोपाल से अच्छी खबर आई कि शहर की तमाम मस्जिदों में नमाज से पहले वुजू करने में रोजाना खर्च हो रहे लाखों लीटर पानी को जाया होने से बचाने के लिए मसाजिद कमेटी मस्जिदों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगवाना चाहती है। कमेटी चाहती है कि यह काम राज्य सरकार व स्वयं सेवी संस्थाओं की आर्थिक मदद से हो। पहल अच्छी है और यह सभी जगह लागू होना चाहिए। सवाल धन जुटाने का है तो सरकार के साथ धनिकों को भी आगे आना होगा। पहले कुँए-बावड़ी-धर्मशाला बनवाने का रिवाज था अब पानी बचाने के लिए धन की कमी को दूर करने रईस समाजसेवियों को आगे आना होगा।इससे सबके साथ व्यक्तिगत जिम्मेदारी कभी खत्म नहीं हो जाती। घर बनाने की पूरी प्लानिंग में अगर रैन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का उल्लेख नहीं है तो प्लान खारिज हो जाना चाहिए।आमतौर पर हम आग लगने पर ही कुँआ खोदते हैं तो आग लग चुकी है...जल संकट दिन-ब-दिन गहरा रहा है। सवाल यही है कि आप कुँआ कब खोदना शुरू करेंगे?

Saturday, April 20, 2013

बोल खुद के तो ठिकरा मीडिया पर क्यों फूटे?

अगर सवाल पूछा जाए कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद, बेनी प्रसाद और रेणुका चौधरी, कांग्रेस नेता शकील अहमद, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार, मप्र के पूर्व मंत्री विजय शाह, आध्यात्मिक गुरु आसाराम में क्या समानता है तो जवाब मिलेगा कि इन सभी में विवादास्पद बयान देने की समानता है। विचारधारा और कार्यक्षेत्र भले ही अलग है लेकिन आचरण और नजरिया समान है। इनमें से अधिकांश अपने बयान पर विवाद उठ खड़ा होने के बाद मीडिया को दोष देते हैं और उसे तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाते हैं। क्या इतने ऊंचे स्थान तक पहुंच गए ये लोग अपरिपक्व हैं कि रिकार्डेड बयान को भी तोड़ा-मरोड़ा जा सके या बच निकलने के लिए मीडिया को दोष देने से बेहतर कोई गली नहीं?
कांग्रेस नेता शकील अहमद ने यह कहकर बवाल खड़ा कर दिया कि कर्नाटक में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दफ्तर के पास हुए बम विस्फोट से अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को मदद मिलेगी। हालांकि कांग्रेस को तुरंत समझ आ गया कि बोल बवाल पैदा करेंगे सो कांग्रेस महासचिव जर्नादन द्विवेदी ने सफाई दी कि आतंकवाद की कोई भी घटना चिंता की बात है। देश के समक्ष यह एक चुनौती के समान है। इसे किसी तरह के राजनीतिक फायदे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। कांग्रेस ने हालांकि अहमद के बयान से खुद को अलग बताया और कहा कि यह उनके व्यक्तिगत विचार हैं, इसका पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है।  आतंकी हमले, महिला पर अत्याचार, बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार जैसे मामलों में राजनीति नहीं होना चाहिए लेकिन अफसोस तो यही है कि हर जगह राजनीतिक फायदा ही देखा जाता है। हल्के बोल कह कर मुद्दों को कमजोर कर दिया जाता है। आपको याद हो जब केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे तब एक अन्य केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने कहा था-‘केंद्रीय मंत्री के लिए 71 लाख बहुत छोटी राशि होती है। 71 करोड़ का आंकड़ा होता तो गंभीर मसला होता। सलमान 71 लाख के लिए कोई घपला नहीं कर सकते।’
कमोबेश यही हालत महिला हिंसा के मामले में भी है। हरियाणा में कांग्रेस नेता धर्मवीर गोयत कहते हैं कि हरियाणा में बलात्कार के 90 फीसदी मामलों में लड़कियों की मर्जी होती है।  संघ प्रमुख मोहन भागवत बलात्कार को भारत और इंडिया में बांट कर देखते हैं। आध्यात्मिक गुरु आसाराम तो  सलाह देते हैं कि बलात्कारियों के पैर पकड़ना चाहिए और गिड़गिड़ा कर दया याचना की जाना चाहिए। 
हमारे नेतृत्वकतार्ओं के बयान व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोपों में तो और भी निम्न स्तर पर चले जाते हैं। मसलन, बाबा रामदेव के हमलों से परेशान केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी कहती हैं -‘रामदेव पागल हो गए हैं। वो एकदम नोनसेंस हैं, जो ऐसा बयान देने में लगे हैं। रामदेव पहले अपनी शक्ल तो ठीक करें, फिर बोलें। ’ या बतौर प्रवक्ता दिया लुधियाना सांसद मनीष तिवारी का बयान जिसमें उन्होंने अण्णा हजारे पर खीज जाहिर करते हुए कहा था- ‘मैं किशन बाबू राव अण्णा हजारे से सवाल पूछता हूं कि जो खुद भ्रष्टाचार में सिर से पैर तक डूबा हुआ है वो कैसे किसी से सवाल कर सकता है। अण्णा हजारे फौज से भागे हुए हैं।’ याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि इस बयान के बाद प्रवक्ता पद से हटाए गए तिवारी कुछ ही समय बाद केंद्रीय मंत्री के रूप में ज्यादा ताकतवर बन कर लौटे। इसका क्या मतलब निकाला जाए?
अधिकांश नेता बयान देने के बाद बेशर्मों की तरह कह देते हैं कि मीडिया ने गलत मतलब निकाला। वे यह भूल जाते हैं कि उनके बोल रिकार्ड किए गए हैं। लगभग हर विवादास्पद बयान के बाद पार्टियां उसे नेता की व्यक्तिगत राय बताते हुए खुद को अलग कर लेती हैं लेकिन क्या हम नहीं जानते कि यह व्यक्तिगत राय ही सामुहिक राय में परिवर्तित हो जाती है। अफसोस तो यही है कि हमारे नेताओं की ऐसी व्यक्तिगत सोच है। जब नेतृत्व ऐसी सोच रखेगा तो क्रियान्वयन भी तो ऐसी ही सोच का होगा। यहां अब कितने अलगू चौधरी रह गए हैं जो निर्णय का वक्त आने पर पंच परमेश्वर हो जाते हैं? यह नहीं भूलना चाहिए कि जिन जुमलों पर ठहाके लगते हैं वे दिल भी तोड़ते हैं और महाभारत भी रचते हैं। बेहतर है कि नेता विजय शाह जैसे मामलों से सबक लें और अव्वल तो बदजुबानी से बचें। अगर नेताओं की  आदत ही ऐसी हो ही जाएं तो उन्हें माकूल जवाब भी मिले। 66  साल के लोकतंत्र से ऐसी उम्मीद तो की जा सकती है।  

Monday, April 15, 2013

क्या आप अपने नेताओं को सुन रहे हैं ?


कोई सोच भी नहीं सकता है कि चुनावी सभा में दिया गया कोई भाषण किसी नेता को इतना भारी पड़ेगा और उसकी विधायकी जाती रहेगी। ऐसा अचरज पैदा करने वाला कार्य पिछले हफ्ते हुआ जब इंदौर हाईकोर्ट ने रतलाम विधायक पारस सकलेचा का निर्वाचन रद्द कर दिया क्योंकि सकलेचा अपने प्रतिद्वंद्वी हिम्मत कोठारी पर लगाए भ्रष्टाचार के आरोप साबित नहीं कर पाए। सकलेचा ने ये आरोप एक चुनावी सभा में लगाए थे। ये एक फैसला नजीर है जो बोलने पर नेताओं की जिम्मेदारी तय करता है। कोर्ट ने करीब चार साल लंबी जिरह के बाद ही सही फैसला तो दिया, सवाल तो जनता की अदालत से है जो नेताओं को रोज बोलते सुन रही है। क्या वह कभी कुछ भी बोलने को अपना अधिकार समझने  वाले नेताओं को अपना फैसला सुनाएगी?
कभी कोई नेता किसी सार्वजनिक सभा में किसी महिला अफसर की सुंदरता के गुणगान करने लगता है तो कभी कोई नेता किसी समुदाय विशेष के खिलाफ जहर उगलता है। कुछ बोल पर ठहाके लगते हैं तो कुछ पर तलवारें निकल आती है। जानें चली जाती हैं। कहने वाले इसे राजनीति कहते हैं। साम-दाम-दंड-भेद का पालन कर किसी तरह अपना मतलब निकालने का नाम ही राजनीति नहीं है। शब्दार्थ में राज करने की नीति को राजनीति कहा जाता है। वैदिक काल से लेकर आज तक देख लीजिए अपने शासन को नीतिपूर्वक चलाने वाले शासक भी हुए हैं और राज के लिए नीतियों का चौपट करने वाले शासक भी। तब भी जनता सब देखती-समझती थी। आज भी जनता सब देखती-समझती है। अंतर इतना है कि तब शासक  मजबूरी था और आज हमारा अपना चुनाव। तो फिर अगर शासन में अनीति है तो उसके दोषी हम हुए क्योंकि हमने कभी राजनीति को गंभीरता से लिया ही नहीं। तभी तो नेता ऐसे बोल बोलते हैं और जनता ठहाके लगा कर चुप रह जाती है। 
अमेरिका हास्य अभिनेता विली रोजर्स ने कहा था कि कैसा वक्त आ गया है जब हास्य अभिनेताओं को गंभीरता से लिया जाने लगा है और नेताओं को मजाक में। यह व्यंग्य जनता पर था। हिम्मत कोठारी ने अदालती लड़ाई लड़ी तो यह फैसला हुआ। हजारों मामलों में कोई अदालत के पास नहीं जाता तो फैसला नहीं हो पाता लेकिन जनता तो खुद पक्ष भी है और अदालत भी। उसकी अदालत में सुनवाई के लिए कौन अपील करे? जनता को खुद ही सोचना होगा। अपने नेताओं के बोलों को याद रखना होगा। वे कोई कॉमेडियन नहीं है जो हमें हंसाने के लिए रूप-स्वांग करें। असल में जो मसखरे से दिखते हैं वे नेता ज्यादा चालक होते हैं। वे जनता को बहला कर अपना घर भर रहे होते हैं। अच्छा लगता है जब अदालतें ऐसे फैसले देती हैं। कभी आप-हम भी तो अपने जागृत होने का परिचय दें। नहीं तो प्लेटो बरसों पहले कह गए थे कि राजनीति में हिस्सा नहीं लेने का यह खामियाजा होगा कि घटिया लोग हम पर शासन करेंगे। 

Monday, February 25, 2013

जाति के अहम् में खोता व्यक्तिगत स्वाभिमान

 क्या हम मूलत: अवसरवादी लोग हैं? ताकतवरों के सामने कायर और कमजोरों के सामने शेर? क्या हम सिर्फ  सत्ता को पूजना जानते हैं? क्या समाज के अहम् के आगे व्यक्ति का स्वाभिमान कोई मायने नहीं रखता? ये सब सवाल इसलिए, क्योंकि आज चाहे देश या राज्य पर शासन की हो या समाज में अधिकार ध्रुवीकरण करना मजबूरी नहीं सुविधा हो गया है। 

खबर है कि मंडला जिले की एक महिला को इसलिए जाति के बाहर कर दिया गया क्योंकि वह अपने से छोटी जाति के लोगों से पिट गई थी!  सवाल यह है कि क्या एक निजी झगड़े से सामुदायिक अहम् को इतनी ठेस लगती है कि परिवार को जाति से बाहर कर देने जैसे कार्रवाई अनिवार्य हो गई? इससे भी बड़ा अचरज  यह है कि समाज कह रहा है कि यह बहिष्कार सामूहिक भोज के बाद ही खत्म होगा यानि पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे परिवार पर बड़े भोज की मार पड़ेगी। किसी से प्रेम विवाह कर लेने या किसी अन्य समाज के व्यक्ति से मारपीट कैसे पूरे समाज के प्रतिष्ठा का प्रश्न हो सकता है? यह तो व्यक्तिगत मामला है लेकिन हकीकत यह है कि कमजोरों का व्यक्तिगत हित जब ताकतवरों के निजी स्वार्थ से टकराता है तो यह व्यक्तिगत मामला समाज की नाक का सवाल बन जाता है।
जाति से बाहर करना और हुक्का-पानी बंद कर प्रताड़ित करना तथा फिर समाज मे वापसी के लिए तगड़ा आर्थिक जुर्माना और सामूहिक भोज करवाने की कुप्रथा कई समाजों में सदियों से जारी है।  कोई व्यक्ति चाहे जितना उन्नत हो जाए लेकिन जब वह समाज के प्रतिनिधि की भूमिका में आता है तो उसकी सोच आधुनिक से कई कदम पीछे पुरातनपंथी हो जाती है। समाज के पंच बन कर बैठे लोग सदियों पुरानी नीतियों की बेड़ियों को काटना नहीं चाहते क्योंकि इन्हीं के भरोसे उनका वर्चस्व कायम है। ऐसे ही कट्टरता काबिज होती है। आप देखिएगा,  विचार विमर्श के दौरान भी ज्यों ही धर्म,  जाति या समाज की किसी रूढ़ी का जिक्र होगा, आधुनिक विचार रखने वाले लोग भी अचानक सख्त हो जाएंगे और कट्टरता का आवरण ओढ़ लेते हैं।  
अफसोस है कि 21 वीं सदी में पहुंचा विज्ञान और हाईटेक हुई राजनीति भी इस कुपरंपरा को खत्म नहीं कर पाई है। चुनाव करीब है और जातीय समीकरणों को साधने की राजनीति एकबार फिर सारे सरोकारों और जिम्मेदारियों पर भारी पड़ेगी। असल में राजनीति कभी नहीं चाहेगी कि समाज में जातियों को वर्चस्व और भेदभव कभी खत्म हो। देश को जातियों में तोड़ कर और फिर जातियों को ताकतवरों और कमजोरों में बांट कर राज करने की नीति ही सिद्ध नीति मानी गई है। सभी जानते हैं कि हमारे राजनेता वोट भले विकास के नाम पर मांगें लेकिन टिकट वितरण का बड़ा आधार जाति समीकरण होता है और जब तक यह निर्धारक रहेगा समाज में राजनीतिक बराबरी की उम्मीद करना व्यर्थ होगी।