Monday, June 10, 2013

क्यों इतने मुतमईन हो कि वापस भी आओगे?

इनदिनों के राजनीतिक हालात देख कर एक शेर बार-बार याद आ रहा है-‘घर से निकल रहे हो, कफन साथ ले लो/ क्यूं इतने मुतमईन हो कि वापस भी आओगे?’ क्या यह सवाल भाजपा और कांग्रेस को अपने आप से पूछना चाहिए कि वे किस आधार पर यह यकीन रखे हुए है कि वे सत्ता में वापसी कर रहे हैं? भाजपा में नेतृत्व को लेकर जो घमासान मचा है उसे देख कर यही लगता है कि सारी लड़ाई सिंहासन पर बैठने की है, सिंहासन पाने के लिए की जाने वाली कवायद की चिंता किसी को नहीं है। केंद्र में
सत्ता पाने को आतुर भाजपा को मोदी में वह सारथी नजर आ रहा है जो उसके रथ को सिंहासन के करीब ले जा सकता है और इस यकीन की छांव में वह अपने सबसे अनुभवी नेता लालकृष्ण आडवाणी और सहयोगी दलों को भी किनारा करने को बेताब है। टीम मोदी यह साबित करने पर जुटी है कि मोदी के अलावा कोई और भाजपा का मसीहा है ही नहीं।  वे यह मानकर चल रहे हैं कि जनता केंद्र की कांग्रेस सरकार से नाराज है और बस मोदी का चेहरा देख कर उन्हें चुन लेने को आतुर हैं। पार्टी यह क्यों भूल रही है कि उसका अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन 1998  और 99 में मिली 182 सीट ही है। देश पर राज  करना है तो उसे 272 सीट पर ‘अपने’ सांसद चाहिए।  जब ‘अपने’ की रूठ जाएंगे तो ये आंकड़ा कैसे पूरा होगा? मोदी की कट्टर छवि एक वर्ग को पसंद आ सकती है लेकिन यह वर्ग भाजपा को कुछ हिस्सों में  एकतरफा जीत भले ही दिला दे, देशभर में 272 सीट दिलाने की ताकत नहीं रखता। पार्टी ने छह राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में अपनी राज्य इकाइयों को अकेला छोड़ दिया है। मप्र में शिवराज सिंह चौहान का जिम्मा है कि वे तीसरी बार सरकार बनवाएं, लेकिन पार्टी के अंदरूनी मसलों को हल करने में केंद्रीय नेतृत्व सहयोग में रूचि नहीं दिखाएगा फिर चाहे वह हार सकने वाले विधायकों के टिकट काटने की बात हो या नेताओं में तालमेल न होने का मसला। यही बात छत्तीसगढ़ में भी लागू होती है। कुछ यही हाल मप्र कांग्रेस का भी है। बड़े नेता एकजुट हो रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया सारे मतभेद भूला कर अपनी कार्यकारिणी में दूसरे गुट के नेताओं को जिम्मेदारियां दे रहे हैं लेकिन पदाधिकारी हैं कि काम करने को तैयार नहीं। क्यों भूरिया को बार-बार फटकारना पड़ता है कि मैदान में जाओ वरना कुंडली बिगाड़ दूंगा? असल में दोनो दलों को भरोसा है कि जनता सरकारों से नाराज है और वह उन्हें ही चुनेगी। क्या इतना भरोसा जायज है?

Tuesday, June 4, 2013

सफलता की दौड़ में हार कर आउट होने लगी जिंदगी

फिल्मी दुनिया का एक और सितारा जिया खान निराशा के काले अंतरिक्ष में डूब गया। फिल्मी दुनिया जिसे सिल्वर स्क्रीन भी कहा जाता है, सुनहरे सपने दिखलाती है। यह ख्वाब बेचती और ख्वाबों की स्पर्धा भी करवाती है। चकाचौंध और सफलता के ‘नवाब’ अपने आनंद के लिए कलाकारों के स्वप्नों के ‘ग्लेडिएटर्स’ लड़ाते हैं और आगे निकल जाने के संघर्ष में उनको रक्तरंजित देख सुख उठाते हैं। ख्वाब सजाने वाली इस दुनिया में सपनों का संतुलन बेहद जरूरी है वरना जीवन की डोर टूट जाती है।
एक जिया ही क्यों, हमारी दुनिया में ऐसे हजारों उदाहरण मौजूद है जहां हमने सपनों के पथरीली राह पर इंसानी इरादों को दम तोड़ते देखा है। कई बेहतरीन गानों के लिए अपनी आवाज देने वाले गायक शान ने अपने खाली होने पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि अब निर्माता और संगीतकार उनकी आवाज को अपनी फिल्मों में जगह नहीं देना चाहते। शान इनदिनों कोई गाना नहीं गा रहे हैं। वे एक डांस रियलिटी शो में आने वाले हैं। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि मैं गीत नहीं चुन रहा या मैंने अपना मेहनताना बढ़ा दिया है। यदि लोग मुझे प्रस्ताव ही नहीं दे रहे तो क्या किया जा सकता है? यह अकेले शान का दर्द नहीं है। पूरी फिल्म इंडस्ट्री और हमारे आसपास का समाज इसी ‘सिंड्रोम’ से पीड़ित है।
जरा याद कीजिए, पिछले एक दशक में कितने कलाकार आए और गुमनामी के अंधेरे में खो कर रह गए। आप अगर योग्य है तो यह काफी नहीं हैं। इतना ही बल्कि इससे ज्यादा जरूरी है कि आप अपनी योग्यता और जरूरत साबित करें। यह आज के समय की सच्चाई है और इसे या तो कोई मस्त मौला ही झूठला  सकता है या वो जिसके पास अदम्य इच्छाशक्ति है। कहते हैं फिल्मी दुनिया बेहद निर्मम है। फिल्मी दुनिया की यह निर्ममता हमारे जीवन में अतिक्रमण करती जा रही है। अब जरा सी असफलता से हमारे हौंसले टूटने लगते हैं क्योंकि सफलता को ही एकमात्र उद्देश्य मान लिया गया है। हार बर्दाश्त नहीं होती क्योंकि हमारे पास हार से उबर जाने का जज्बा नहीं है। पराजय के क्षणों में कमजोर मन को कोई सहारा नहीं मिलता क्योंकि हमारे आसपास मौजूद हर इंसान सफलता की दौड़ में भाग रहा है और अगर वह किसी को सहारा देने रूकेगा तो कार्पोरेट की शब्दावली में यह समय का दुरूपयोग होगा। आज इसी में समझदारी मानी जाती है कि कोई गिर भी रहा है तो उसे उठाओ मत। ऐसा करने में आपका समय बर्बाद होगा और क्या पता आपका यही साथी कल प्रतिस्पर्धी बन जाएं! जब तक ऐसी सोच कायम रहेगी निराशा हमारे समाज की प्रतिभाओं को डसती रहेगी। 

Friday, May 24, 2013

सैयां के ‘बेलगाम’ कोतवाल बनने से डर लगता है जी

एक बड़ी प्रचलित कहावत है कि सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का। ये कहावत इनदिनों बहुत याद आ रही है खास कर तब जब भांजा अपने मामा के कोतवाल (रेलमंत्री) बनने पर ऐसा निडर हुआ कि मामा की कुर्सी ही खा गया। शनिवार को एक खबर मिली कि सीबीआई मुख्यालय के बाहर एक सीबीआई अधिकारी सात लाख की रिश्वत लेते पकड़ा गया। ऐसे बेलगाम कोतवाल सैंया और उसके निडर परिजनों के कृत्य डराते हैं।
यह डर तब और भारी हो जाता है जब सीबीआई की स्वायत्ता की बात होती है और उसे पूरी आजादी देने की मांग की जाती है। यहां कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की यह बात याद आती है कि हम सीबीआई अधिकारी जो एक इंस्पेक्टर या उप पुलिस अधीक्षक को पूरी स्वायत्ता देना चाहते हैं, लेकिन उन्हें किसी के प्रति जिम्मेदार नहीं बनाना चाहते हैं। सारी समस्या यहीं है। अंग्रेजी इतिहासकार लार्ड एक्शन ने कहा था- ‘पॉवर करप्टस एंड एब्स्योलूट पॉवर करप्टस एब्स्योल्यूटली’। यानि ताकत भ्रष्ट बनाती है और असीमित ताकत असीमित रूप से भ्रष्ट बनाती है। असल में जब भ्रष्टाचार की बात आती है तो पूरी उम्मीदें अंतत: व्यक्तिगत शुचिता और मूल्यों पर आकर टिक जाती है अन्यथा तो पूरा माहौल आदमी को भ्रष्ट बनाने पर आमादा है। तमाम शोध और दृष्टिकोण बताते हैं कि ताकत मिलने के बाद व्यक्ति भ्रष्ट होता है। यही वजह है कि अपने पक्ष में निर्णय करवाने के लिए किसी भी हद तक भ्रष्टाचार किया जा सकता है। तो क्या सीबीआई जैसी ताकतवर जांच संस्था को पूरी स्वायत्ता देने के विरोध के  पीछे ये डर काम नहीं कर रहा है? जो सरकार अभी सीबीआई का प्रयोग अपने हित में करती है वह इसलिए भी डर रही है कि कहीं सीबीआई स्वायत्त हो गई तो निरंकुश हो जाएगी जैसे पाकिस्तान में सेना है जो सरकार की नहीं सुनती।
यही डर लोकपाल की नियुक्ति में भी है और भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए बनने वाले हर ताकतवर संस्थान से भी है, क्योंकि अपनी गलती छिपाने के लिए इन संस्थानों में और बड़े भ्रष्टाचार की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता है। तो फिर, इसका समाधान क्या? बार-बार समाधान संविधान में ही नजर आता है। अगर लोकतंत्र के चारों स्तंभों में से एक ज्यादा ताकतवर और अधिकार संपन्न होगा तो लोकतंत्र लड़खड़ा जाएगा। लोकतंत्र की बेहतरी के लिए जरूरी है कि चारों स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया स्वतंत्र भी रहें और एक-दूसरे पर एक-दूसरे की निगाह भी रहे। तभी जवाबदेही भी तय होगी और कार्य भी। वरना अभी की तरह होगा कि कहीं नेताओं पर अधिकारी भारी हैं तो कहीं प्रशासन नेताओं को पिछलग्गू है। न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका से असंतुष्टि है तो ये दोनों न्यायपालिका की टिप्पणियों से हैरान-परेशान।
                

Sunday, May 12, 2013

ऐसा ‘बाहरी’ अंदर न आने पायें जो घर तोड़े


घोटालों, विरोध और अपराध की खबरों को देख-सुन कर आजिज आ गए हम लोग। कहीं से कोई अच्छी खबर नहीं आती। माटिवेशन के लिए भी एकल प्रयास ही नजर आते हैं। डर लगता है कि हमारी सामूहिकता क्यों कुछ ऐसा नहीं रच रही जिस पर नाज किया जा सके। तभी एक खबर आई। ऐसे मुद्दे पर खबर जिसने पिछले ढ़ाई दशकों से देश की राजनीति को गर्मा रखा है और जिसके कारण कई जानें गर्इं, कई परिवार उजड़े। खबर हजारों लोगों की रगों में सांप्रदायिकता का जहर भर देने वाले अयोध्या मसले पर है। समाधान संबंधी समिति की उपसमिति ने तय किया है कि अयोध्या में जहां राम प्रतिमा है वहीं मंदिर बनेगा और अधिग्रहित परिसर के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में मस्जिद निर्माण किया जाएगा। सबसे खास बात यह है कि  चार सूत्रीय इस प्रस्ताव के पहले बिंदु में कहा गया है कि इसमें अयोध्या-फैजाबाद के लोग ही शामिल हो सकेंगे। बाहरी व्यक्ति, संस्था आदि की इसमें कोई भागीदारी स्वीकार नहीं की जाएगी।
पिछले ढ़ाई वर्षों की कवायद के बाद इस प्रस्ताव पर सहमति बनना सुखद है। इतना ही सुखद यह है कि वहां के लोगों को समझ में आ  गया कि अयोध्या की शांति क्यों भंग हुई थी। घर के मामलों में जब-जब बाहरी व्यक्ति दखल देगा तो घर टूटेगा ही। इसे थंब रूल ही मानिए। यह सभी जगह लागू होता है। घर ही क्यों बाहरी का दखल परिवार, समाज, कॉलोनियों की समितियां, दफ्तर से लेकर राज्य और देश सभी का तोड़ता है। पराई पीर में शरीक होने वाले लोग अब कहां बचे हैं? लेकिन दूसरों के दर्द में अपना सुख खोजने वाले रायचंद रक्तबीज से बढ़े जा रहे हैं। कुछ पल सोचेंगे तो कई किस्से याद आ जाएंगे जब ‘बाहरी’ के आ जाने से बनता काम बिगड़ गया था। जिस समस्या का समाधान करीब था वह और विकराल हो गई थी।
मंदिर विवाद पर अगर ‘बाहरी’ अपनी रोटियां न सेंकते तो अयोध्या-फैजाबाद के लोग कभी का इसका समाधान निकाल चुके होते। कमोबेश यही हालत हमारे प्रदेश के भोजशाला विवाद या हमारे शहर-कस्बे में विकास कार्यों में बाधा बन रहे धार्मिक स्थलों के बारे में निर्णय करने की है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर समेत सभी जगहों पर किसी न किसी धार्मिक स्थल को लेकर विवाद चल रहा है। ये विवाद उस स्थान विशेष के लोगों ने पैदा नहीं किए। ये विवाद तो ‘बाहरी’ तत्वों की देन हैं जो दूसरी बस्ती, कॉलोनी,गांव या शहर से आते हैं और विवाद की आग जला कर रवाना हो जाते हैं। वे नजर रखते हैं कि किसी सूरत में से आग ठंडी न पड़ जाए। इन लोगों के हथियार फरसे, तलवार, बल्लम या बंदूक-तमंचे नहीं है। ये जाति,धर्म, संप्रदाय के नाम पर अपना हित साधते हैं। परिवार हो या मोहल्ला या शहर, हम तभी बंटते हैं जब कोई ‘बाहरी’ हमारे मामलों में घुस आता है। हम अपनी समस्या को खत्म करने के लिए  कई बार कुछ हित छोड़ने को तैयार भी हो जाते हैं ताकि परेशानी का कांटा निकले। सड़क को चौड़ा किया जाना है। स्थानीय रहवासी जाम से मुक्ति के लिए बाधा बन रहे धार्मिक स्थल को हटा कर दूसरी जगह ले जाने को तैयार हैं लेकिन ये ‘बाहरी’ ही हैं जो ऐसा होने नहीं देते। वे विवाद खड़ा करते हैं और स्थानीय लोग उसका परिणाम भोगते हैं।
हम बड़ी मुश्किल से पंछी की तरह एक-एक तिनका  जुटा कर अपना घरोंदा, कॉलोनी, समाज बुनते हैं और ये ‘बाहरी’ आंधी की तरह आ कर सबकुछ उजाड़ कर चले जाते हैं। क्यों न ऐसे ‘बाहरी’ को बाहर ही रखा जाए। कड़ी नजर रखी जाए कि ये ‘बाहरी’ हमारे मसलों में ‘अंदर’ न आने पाएं। आज अयोध्या-फैजाबाद के कुछ लोगों ने ये बात समझी है। कल पूरा फैजाबाद-अयोध्या  मानेगा और दुआ करें कि समझदारी की ये आग पूरे देश में फैलेगी। ये काम हमें ही करना होगा क्योंकि कोई ‘बाहरी’ तो ये काम नहीं करेगा।