Saturday, February 27, 2016

मप्र के 42 फीसदी बच्चे बौने, आखिर खाते क्या हैं?

आपने एक प्रख्यात हेल्थ ड्रिंक का टीवी विज्ञापन देखा होगा जिसमें बच्चे पूछते हैं कि उनका साथी साथ इत्तू सा था, इतनी जल्दी इतना लंबा कैसा हो गया? आखिर खाता क्या है? ऐसे विज्ञापनों ने बच्चों और उनके माता-पिता में लंबाई को लेकर प्रतिस्पर्धा और हीनता का बोध जगाया लेकिन क्या आपको पता है कि कुपोषण मप्र के बच्चों को दुर्बल
और कमजोर ही नहीं बना रहा बल्कि यह उनके नाटे रहने का कारण भी है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण के कारण राज्य के 42 प्रतिशत बच्चे नाटे रह जाते हैं। मप्र के बच्चे पूरी तरह स्वस्थ्य नहीं हैं क्योंकि जन्म के दो दिन के अंदर 82 फीसदी बच्चों को डॉक्‍टरों से उपचार नहीं मिलता। उन्हें पोषण आहार नहीं मिलता। इस कारण 60 फीसदी बच्चों में खून की कमी है और इन शारीरिक दुर्बलताओं के कारण बच्चे पढ़ाई में कमजोर रह जाते हैं। इस तरह कुपोषण के कारण बच्चों का कम शारीरिक और मानसिक विकास अंततः प्रदेश की विकास दर को भी प्रभावित कर रहा है। मप्र के नाटे बच्चों को देख कर बार-बार पूछा जाना चाहिए कि आखिर ये खाते क्या हैं? ताकि सरकार और समाज ध्यान दे कि हमारे प्रदेश के बच्चे खा क्या रहे हैं?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2015-16 का प्रतिवेदन कई खुलासे करता है। इन आंकड़ों को जानने के बाद कुपोषण के प्रति अधिक व्यापक रूप से सोचने की आवश्‍यकता महसूस होती है। यदि कुपोषण को बच्चों के कम वजन या कमजोरी के रूप में ही देखा जाता है तो अब यह समझना होगा कि बच्चों का कद न बढ़ना और उनका नाटा रह जाना भी कुपोषण का ही दुष्परिणाम है। यह सर्वे बताता है कि राज्य में 100 में से 40 बच्चे आज भी कुपोषण से ग्रस्त हैं। 13 राज्यों और 2 केन्द्र शासित प्रदेशों के लिए जारी एनएचएफएस 4 के आंकड़ों के अनुसार मप्र में 5 साल से कम उम्र के 40 फीसदी से ज्‍यादा बच्चों का विकास ठीक से नहीं हो पाता है यानि उनकी ऊँचाई और वजन सामान्य से कम रह जाता है। जबकि 5 साल से कम उम्र के 42.8 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से कम (अंडरवेट) होता है। सामान्य से कम वजन वाले बच्चों की प्रतिशतता के आंकड़े 35 फीसदी से कम होकर 25.8 फीसदी पर आ गए हैं लेकिन विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के मानदण्डों के अनुसार यह संख्या अब भी बहुत ज्यादा है।

यहां ध्यान दे सरकार:
जन्म के बाद बच्चों की मृत्यु रोकने के लिए जन्म के तुरंत बाद प्रसव के पहले और बाद में सही उपचार आवश्‍यक है। खासतौर पर तब, जब बड़ी संख्या में बच्चे गांवों एवं आदिवासी इलाकों में रहते हैं। इन बच्चों को आंगनवाड़ी, स्वास्थ्य सेवाएं एवं पोषण सुविधाएं सीमित मात्रा में उपलब्ध हो पाती हैं। स्तनपान एवं अर्द्ध ठोस आहार पाने वाले दो साल से कम उम्र के बच्चों की प्रतिशतता यानी पर्सेंटाइल 6.6 फीसदी है। ऐसे में बाल मृत्यु और कुपोषण से बचाव के लिए गांवों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य और पोषण सुविधाएं पहुंचाना आवश्‍यक है।
आंकड़ें बताते हैं कि राज्य के 50 फीसदी बच्चों को निवारणीय रोगों की रोकथाम के लिए पर्याप्त टीकाकरण तक उपलब्ध नहीं हो पाता है। 2014 में राज्य सरकार ने मिशन इन्द्र धनुष आरंभ किया है। उम्मीद है कि अगले सर्वेक्षण में आंकड़ों में सुधार होगा। प्रसवपूर्व देखभाल, नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य एवं जीवित रहने तथा कुपोषण से लड़ने के लिए आवश्‍यक है। राज्य सरकार को इस ओर ध्यान देना होगा।

गणित में होगा कमजोर
बच्चों के स्वास्थ्य का उनके भावी जीवन में भी बड़ा असर देखा गया है। अध्‍ययनों में बताया गया है कि अस्वस्थ्य या कुपोषित बच्चा अपने जीवन में आगे चल कर कई अन्य बीमारियों से परेशान होता है। इतना ही नहीं, यह कमजोरी उसकी शिक्षा को भी प्रभावित करती है। बचपन में यदि कोई गेंद पकड़ने या फेंकने जैसा काम ठीक से नहीं कर पाता तो माना जाना चाहिए कि आगे चल कर वह गणित में कमजोर होगा। स्टेवांगर यूनिवर्सिटी के नार्वेजियन रीडिंग सेंटर के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर एलिन रेइकेरस ने इस अध्ययन के आधार पर दावा किया कि दो साल के बच्चों के पेशी कौशल (मोटर स्किल) और गणितीय कौशल के बीच रिश्ता होता है। पेशी कौशल किसी खास कार्य के लिए शरीर की मांसपेशियों की होने वाली सटीक गतिविधि को कहते हैं।

मप्र के बच्चे शिक्षा में पहले ही कमजोर
नेशनल अचीवमेंट सर्वे (नास) में शिक्षा के मामले में प्रदेश दूसरे राज्यों की तुलना में तीन पायदान फिसला है। कक्षा तीन के बच्चों पर किए गए सर्वे में भाषा के मामले में मप्र 25वें से 28वें नंबर पर आ गया है। वहीं गणित में 23वें नंबर पर है। भाषा का स्तर जानने के लिए सर्वे के तीन आधार रखे गए थे। सर्वे शब्दों को सुनकर समझने, पढ़कर समझने और लिखकर बताने व समझने के बिंदुओं पर किया गया। सर्वे बताता है कि मप्र के बच्चे सुनकर समझने के मामले में 62 प्रतिशत तक शिक्षित हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 65 प्रतिशत है। यदि लिखने व लिखे शब्दों को पहचानने की बात करें तो मप्र के बच्चे 83 प्रतिशत पर हैं, जबकि देश का औसत 86 प्रतिशत है। पढ़कर समझने के मामले में मध्यप्रदेश के बच्चे देश में 28वें नंबर पर हैं। यह 52 प्रतिशत है और यही सबसे खराब स्थिति है। राष्ट्रीय औसत 59 प्रतिशत है।

गणित के मामले में दस बिंदुओं पर सर्वे किया गया। संख्या को जोडने के मामले में मध्यप्रदेश के बच्चे देश में 21वें नंबर पर हैं, जो राष्ट्रीय औसत 69 प्रतिशत से पीछे हैं। घटाने के मामले में मध्यप्रदेश के बच्चे सबसे बेहतर हैं। राष्ट्रीय औसत 65 प्रतिशत है, जबकि मप्र का औसत 68 है। गुणा करने पर मप्र देश में 28वें नंबर पर है। देश का औसत 63 प्रतिशत है, जबकि मप्र 59 प्रतिशत पर है।

आंकड़े जो चिंता बढ़ाते हैं
- 5 साल से कम उम्र के प्रत्येक 100 में से 40 से ज्यादा बच्चों का विकास ठीक से नहीं हो रहा।
- 5 साल से कम उम्र के 100 में से 40 बच्चों का वजन सामान्य से कम है।
पांच साल से कम उम्र के 60 फीसदी से ज्यादा बच्चों में खून की कमी है।
केवल 55 प्रतिशत बच्चों का ही सम्पूर्ण टीकाकरण होता है।

Sunday, February 7, 2016

मप्र के विकास की अधूरी कहानी : असफल हो गई शिव 'राज' की सामाजिक नीतियां

हमें गर्व होता है कि राज्‍य सरकार ने मप्र को विकास की पटरी पर दौड़ाने के सारे जतन किए है। इसी का परिणाम है कि बीते नौ सालों में हमारा सकल राज्‍य घरेलू उत्‍पाद 5.3 से बढ़ कर 11.1 प्रतिशत हो गया। कृषि और संबंधित क्षेत्र की विकास दर 7 से बढ़ कर 23.3 प्रतिशत हो गई। प्रति व्‍यक्ति आय भी 3.1 से बढ़ कर 9.6 प्रतिशत हुई। लेकिन, साहब, विकास की इस गाथा का एक दूसरा चेहरा भी है। यह चेहरा इस उजली इबारत से अधिक स्‍याह और निराशाजनक है। तथ्‍य बताते हैं कि मप्र में नवजात मृत्‍यु दर 54 है जबकि देश में यह दर 40 है। प्रदेश में मातृ मृत्‍यु दर 221 है जबकि राष्‍ट्रीय औसत 167 है। प्रदेश में 3 साल से कम उम्र के 57.9 बच्‍चे कुपोषित हैं। देश में यह संख्‍या 40.4 प्रतिशत ही है। प्रदेश की विकास की रोशनी को झुठलाती ये तस्‍वीर इसलिए है क्‍योंकि सामाजिक क्षेत्र में प्रदेश सरकार की प्रमुख नीतियां अपना लक्ष्‍य पाने में चूक गई हैं।

 आपको याद होगा सन् 2000 में भारत सहित 189 देशों ने वादा किया था कि वे अपने निवासियों को गरीबी से मुक्ति दिलाएंगे। उन्‍हें बेहतर शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, स्‍वच्‍छता और पेयजल का हक देंगे। इस आशय के आठ संकल्‍प सहस्राब्‍दी विकास लक्ष्‍य यानी मिलेनियम डेवलपमेंट गोल के रूप में जाने गए। तय किया गया था कि 2015 तक इन लक्ष्‍यों को पा लिया जाएगा। लेकिन यूनिसेफ और एनपीएफपी की मप्र राज्‍य एमडीजी रिपोर्ट 2014-15 बताती है कि मप्र अपनी जनता को गरीबी, अशिक्षा, खराब स्‍वास्‍थ्‍य स्थिति, महिलाओें के लिए प्रतिकूल वातावरण को दूर करने के अपने वादे से चूक गया। खास बात यह है कि राज्‍यों के लिए ये लक्ष्‍य यहां की सरकार ने ही तय किए थे, लेकिन सरकार के पास ऐसी कोई व्‍यवस्‍था ही नहीं है जिसके द्वारा वह अपनी नीतियों की सफलता और उपलब्धियों का आकलन कर सके।
आर्थिक तरक्‍की का विरोधाभास
वर्ष 2013-14 में मप्र की सकल राज्‍य घरेलू उत्‍पाद वृद्धि दर 11.1 प्रतिशत थी। यह देश में सबसे अधिक वृद्धि में से एक है लेकिन जहां देश में गरीबों की संख्‍या में 1993-94 से 2011-12 के बीच 23.4 प्रतिशत की गिरावट हुई वहीं मप्र में यह दर मात्र 13 प्रतिशत रही। सहस्राब्‍दी विकास लक्ष्‍यों में भी ऐसा ही हुआ। यह मप्र की तरक्‍की की गाथा का विरोधाभास है।
ये करें उपाय
रिपोर्ट में सुझाया गया है कि इस अंतर को कम करने के लिए राज्‍य को अपने सामाजिक क्षेत्र का बजट कम से कम 30 प्रतिशत तक बढ़ाना होगा। 12 जिलों में इस बजट को कम से कम दोगुना करना होगा, ताकि एमडीजी लक्ष्‍यों को हासिल किया जा सके। ये जिले हैं – डिंडोरी, सीधी, सिंगरौली, पन्‍ना, उमरिया, सतना, शहडोल, आलीराजपुर, अनूपपुर, दमोह, श्‍योपुर और मंडला।

क्‍या कहती है रिपोर्ट

भूख और गरीबी का खात्‍मा
मप्र में गरीबी में तो गिरावट आई है लेकिन हम एमडीजी लक्ष्‍य पाने में पीछे ही रहे। गरीबी रेखा के आंकड़े बताते हैं गरीबों में कुछ तो बहुत गरीब हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की स्थिति में सुधार के लिए बेहतर नीतियों की आवश्‍यकता है। पोषण में सुधार के मामले में एमडीजी लक्ष्‍य और 2015-16 की आकलित उपलब्धि में 13 फीसदी का अंतर है। मप्र ने अपने विकास के लिए कृषि और इससे जुड़े क्षेत्र में सार्वजनिक वितरण के सहयोग वाली वृद्धि उन्‍मुख रणनीति का चयन किया है। कृषि आधारित विकास और मनरेगा गरीबी खत्‍म करने की प्रमुख रणनीति है। बच्‍चों में कुपोषण खत्‍म करने में नीतियां असफल हुई हैं।

सभी को प्राथमिक शिक्षा
एमडीजी 2 में तय किया गया था कि 6-14 वर्ष तक के सभी बच्‍चों को शिक्षा का हक दिया जाएगा। मप्र इस आसान लक्ष्‍य को भी प्राप्‍त नहीं कर सका है। नेट नामांकन 95 प्रतिशत के शीर्ष को छू कर कुछ‍ गिर गया। मप्र में बच्‍चों के स्‍कूल में बने रहने की दर 75 फीसदी से अधिक नहीं हो सकी। यह दर बच्‍चों की स्‍कूल में बने रहने की स्थिति को इंगित करती है। 15 से 24 साल के युवाओं में साक्ष्‍ारता दर बहुत कम गति से आगे बढ़ी। इन आंकड़ों को देखते हुए साफ था कि मप्र 100 फीसदी साक्षरता के लक्ष्‍य को प्राप्‍त नहीं कर सकता था। मप्र में शिक्षकों की भारी कमी और असं‍तुलित वितरण के कारण मप्र में शिक्षा की गुणवत्‍ता में सुधार संभव नहीं हुआ।

लैंगिक समानता और महि‍ला सशक्तिकरण  
2007-08 में जेंडर बजट लागू करने वाला मप्र देश का पहला राज्‍य है। तब से लेकर अब तक केवल इतना हुआ कि 2013-14 तक जेंडर बजट बनाने वाले विभागों की संख्‍या 13 से बढ़ कर 25 हुई लेकिन इस तरक्‍की के सिवाय बाकी सभी क्षेत्रों में मप्र पिछड़ा ही है। जैसे, बाल लिंगानुपात, प्राथमिक और माध्‍यमिक कक्षाओं में लिंग समानता सूचकांक, गैर कृषि क्षेत्रों में महिला कर्मचारियों की संख्‍या इस दौरान घटी ही है। राज्‍य में जेंडर बजट की निगरानी के लिए प्रभावी तंत्र का भी अभाव है।
बाल मृत्‍यु दर में कमी
बाल मृत्‍यु दर में कमी लाने के लक्ष्‍य के सारे संकेतकों में मप्र पीछे ही दिखाई दे रहा है। पांच वर्ष से कम उम्र की मृत्‍यु दर और नवजात मृत्‍यु दर में गिरावट हुई है, लेकिन गिरावट की दर काफी कम है। इन दोनों ही संकेतकों में प्रदर्शन देखें तो विशेष ध्‍यान देने वाले राज्‍यों में मप्र दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला राज्‍य है। 2012-13 के आंकड़ों के अनुसार पूरे देश की बाल मृत्‍यु में से 10.5 प्रतिशत बाल मृत्‍यु मप्र में होती है। पांच वर्ष से कम उम्र की मृत्‍यु दर तथा नवजात मृत्‍यु दर का लैंगिक व क्षेत्रीय विश्‍लेषण बताता है कि मप्र के ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों की तुलना में बालिका मृत्‍यु दर अधिक है।

पर्यावरण सुधार

मप्र में वनों का प्रतिशत घटा है हालांकि पिछले कुछ वर्षों में स्थितियां सुधरी हैं। कई योजनाओं के बाद भी मप्र में ठोस ईंधन जैसे कोयले और लकड़ी का उपयोग करने वाले परिवारों का प्रतिशत राष्‍ट्रीय औसत से अधिक है। परिसर में जलस्रोत और नल जल पाने वाले परिवारों का प्रतिशत 2001 से 2011 की अवधि में घटा है। 2015 में भी प्रदेश में करीब 70 प्रतिशत परिवारों को उपयुक्‍त स्‍वच्‍छता सुविधा उपलब्‍ध नहीं है। देश के शहरी क्षेत्रों में झुग्गियों की संख्‍या घट रही है जबकि मप्र में बढ़ रही है। 

Wednesday, November 25, 2015

विश्लेषण : झाबुआ की जीत जंगल की आग नहीं जिसका फैलना तय हो...

लम्बे अर्से बाद कांग्रेस के खेमे में खुशियों का डेरा है, वरना तो पिछले कई चुनाव और उपचुनाव में भाजपा ही जश्न मनाती रही है। झाबुआ लोकसभा उप चुनाव में हार से भाजपा संगठन में जितनी हताशा है उससे कहीं अधिक प्रसन्नता कांग्रेसी कैम्प में है। इसकी वजहें हैं जिन पर आगे बात की जाएगी, लेकिन कांग्रेस को झाबुआ में अपनी इस जीत पर फूल कर कुप्पा होने की आवश्यकता नहीं है। असल में, झाबुआ की जीत मैदान की ‘सूखी’ घास में लगी आग की तरह है जो स्थानीय मुद्दों व नाराजी की ‘चिंगारी’ के कारण लगी है। यह आग जल्द ही ठंडी भी पड़ जाएगी। कांग्रेस को इसे ‘जंगल की आग‘ मान कर यह मंसूबा नहीं बनाना चाहिए कि वह इस अग्नि में भाजपा को खाक कर देगी। विधानसभा और लोकसभा के मुख्य चुनावों में अभी कई महीने हैं और इस दौरान राजनीतिक ‘गर्मी’, ‘सर्दी’ और ‘बारिष’ के कई मौसम आना षेष हैं। कोई कह नहीं सकता कि इन मौसमों की आवाजाही में राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा। जाहिर है, भाजपा के पास सुधार के उतने ही दिन हैं जितने कांग्रेस के पास एकजुट बने रहने के अवसर। इसलिए इस एक जीत या हार से न भाजपा को डरने की आवष्यकता है और न कांग्रेस के लिए निष्क्रिय होने का सबब। 
झाबुआ की सीट खोकर भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देष में पहली बार लोकसभा का चुनाव हारा है। यह सीट जाने से लोकसभा में उसका संख्या बल 280 से घट कर 279 रह गया और कांग्रेस के खेमे की संख्या 44 से बढ़ कर 45 हो गई। इस एक सीट के खोने के कई संदेष हैं। खास कर बिहार के संदर्भ में इस हार के लिए कहा जाएगा कि यह सरकार की नीतियों के खिलाफ जनादेश है। लेकिन बात केवल इतनी ही नहीं है। यदि ऐसा होता तो यह परिणाम देवास में दिखाई देना था और मणिपुर में भी महसूस होना था जहां भाजपा ने चौंकाते हुए अपना खाता खोला है। असल में, झाबुआ-रतलाम हारने के कई कारण हैं। वहां के स्थानीय मुद्दे, स्थानीय राजनीति और स्थानीय आक्रोश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब स्थानीय ताकत कमजोर पड़ रही थी तभी भोपाल को अपना ‘पैर’ वहां जमाना पड़ा। भाजपा के ही बड़े नेता प्रचार के दौरान स्वीकारने लगे थे कि निर्मला भूरिया ने अपने ही क्षेत्र में वैसी साख नहीं बनाई जैसी उनके पिता की थी। यही कारण है कि आज निर्मला अपनी विधानसभा सीट में भी जीत हासिल नहीं कर पाई हैं। ऐसी ही षिकायत अन्य विधायकों को लेकर भी है। जबकि इसके उलट कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया ने पूरा ध्यान अपने क्षेत्र पर लगाया। पिछले चार-पांच माह से वे झाबुआ से बाहर तक नहीं निकले। ऐसा नहीं है कि निर्मला के लिए ही पूरी पार्टी लगी थी। कांतिलाल के लिए भी हर विधानसभा में अलग-अलग नेताओं ने मोर्चे संभाले थे। यही कारण है कि रतलाम ग्रामीण और सैलाना में कांग्रेस को महत्वपूर्ण लीड मिली। 
इस एक हार से सरकारों को फर्क नहीं पड़ता लेकिन ऐसी ही हार-जीत आंतरिक अवलोकन का अवसर देती है। मैंने कहा है कि झाबुआ की जीत दावानल नहीं है जो भाजपा को खाक कर देगी तो इसके पीछे कई तर्क हैं। संगठन के पैमाने पर देखें तो भाजपा आज कांग्रेस से कई मामलों में आगे हैं। भाजपा के पास संगठन है। उसके पास बूथ स्तर तक के कार्यकर्ता हैं। उसके पास नेतृत्व में आस्था है। गुटबाजी पार्टी के हितों पर हावी नहीं होती। भाजपा के पास लक्ष्य है। भाजपा के पास रणनीति है। भाजपा के पास समर्पित कार्यकर्ता हैं जो वोट में तब्दील होते हैं। भाजपा के पास कार्यक्रम है, वह अपने नेताओं को खाली नहीं बैठने देती। और इस सबके बाद भी उसके पास सरकार और समय है। 
कांग्रेस ने अपने शासनकाल में नीतियों की समीक्षा कर न सत्ता का कार्य व्यवहार सुधारा और न संगठन को खड़ा किया। उसके नेताओं का विभाजित होना तथा खेमेबंद होना साफ नजर आता है। शिवराज सिंह चौहान, सरकार और भाजपा संगठन के लिए लोकसभा उपचुनाव चुनौती थी और उन्होंने इसे हारा है, लेकिन यह सिलसिला नहीं है। भाजपा के पास समय है कि वह वास्तव में आकलन करे और अपने नेताओं, विधायकों-सांसदों की कार्यप्रणाली में सुधार करे। ठीक ऐसा ही मौका कांग्रेस के पास भी है। इसके लिए कांग्रेस को उस व्यवहार को छोड़ना होगा जो उसका स्वभाव बन गया है। 
क्या संघ की निष्क्रियता भारी पड़ी?
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान ने कहा है कि पार्टी झाबुआ में हार की समीक्षा करेगी। यह तो सोचा ही जाएगा कि इतना भारी लाव लश्कर लगाने के बाद भी सीट क्यों हाथ से गई लेकिन यह तय है कि पार्टी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की निष्क्रियता भारी पड़ी है। संघ पदाधिकारी कहते हैं कि उप चुनाव में उनकी भूमिका नहीं होती। झाबुआ में प्रचार के दौरान ऐसा दिखाई भी दिया। अब तो परिणाम इसकी पुष्टि भी कर रहे हैं। रतलाम विधानसभा क्षेत्र भाजपा का तुरूप का इक्का है। इस बार यहां मात्र 52 फीसदी ही मतदान हुआ, जबकि 2014 में यहां 65 फीसदी मतदान हुआ था। इसी तरह आलीराजपुर भी संघ का गढ़ है। यहां भी इस बार 44 फीसदी मतदान हुआ जबकि 2014 में यहां 62 प्रतिषत मतदान हुआ था। कांग्रेस ने रतलाम ग्रामीण और सैलाना में धुंआधार वोट अर्जित किए तथा भाजपा संघ के प्रभाव वाले क्षेत्रों में 31 प्रतिशत कम वोटिंग का खामियाजा भोग कर रह गई। 

Thursday, October 29, 2015

- तर्क का उत्तर प्रतितर्क से दिया जा सकता है... लात तो गधे भी मारते हैं : अशोक वाजपेयी


साहित्यकार, कला-साहित्य आलोचक, ब्यूरोक्रेट और भारत भवन के शिल्पकार अशोक वाजपेयी पिछले दिनों फिर चर्चा में आये जब उन्होंने साहित्य अकादेमी अवार्ड लौटाते हुए असहमति की स्वंतत्रता पर आसन्न खतरे का विरोध किया। यह सम्मान उन्हे 1994 में मिला था। वे मानते हैं कि असहिष्णुता इस देश का चरित्र नहीं है। भोपाल प्रवास पर आये वाजपेयी ने चर्चा करते हुए साहित्यकारों के विरोध और इस विरोध की आलोचना में उठे स्वरों पर विस्तार से बात की। वाजपेयी ने कहा कि यह संघर्ष यात्रा बहुत लंबी है। ये उन सामाजिक तत्वों से भी संघर्ष है जिनको सत्ता का मौन समर्थन प्राप्त है। उनको इतनी आसानी से अपदस्थ नहीं किया जा सकता। सत्ता तो फिर भी बदली जा सकती है लेकिन जो सामाजिक वृत्तियां विकसित हो गई हैं उन्हें एकदम से नहीं बदल सकते। वाजपेयी से दृढ़ता सेे कहा कि भाजपा की समस्या यह है कि इनकी विचार दृष्टि इतनी बांझ और अनउर्वर है कि उससे उत्कृष्टता निकल ही नहीं सकती। इस बातचीत के प्रमुख अंश: 

सम्मान लौटाने के पीछे दो चीजें थी। एक तो यह कि लोगों का ध्यान इस आकर्षित हो कि देश में सामाजिक समरसता, परस्पर संवाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि क्षेत्रों में क्या हो रहा है और उसके दूरगामी परिणाम क्या होने वाले हैं। इसतरह एक तरफ तो सरकार को चेताना था और उससे ज्यादा लोगों को बताना था कि इस समय सावधानी और सतर्कता की आवष्यकता थी। लेखक लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं? एक तो वे लिख कर सकते हैं जो दूरगामी प्रोजेक्ट होता है। पहले भी लिखते रहे हैं और अभी भी लिख रहे हैं सम्मान लौटाने जैसा कुछ नाटकीय भी करना आवष्यक है। चूंकि ऐसा निजी फैसले थे, आपस में मिल कर तय नहीं हुई थी। मुझे उदय प्रकाश ने फोन किया था। उदय प्रकाश साहित्य अकादेमी के लिए मुझ पर एक फिल्म बना रहे हैं तो मुझे लगा कि मैं साथ जाऊंगा तो सम्मान लौटाने को उस फिल्म से जोड़ा जायेगा। लेकिन जब नयनतारा सहगल जैसी साहित्यकार ने सम्मान लौटाया और फिर जब अंग्रेजी साहित्यकारों ने भी सम्मान लौटाये तो मैंने इस पर विचार किया। आमतौर पर अंग्रेजी के साहित्यकार ऐसे कार्यों में हिन्दी वालों का साथ नहीं देते हैं। लेकिन ये नहीं सोचा था कि इनका इतना व्यापक असर होगा। अब तो वैज्ञानिकों-कलाकारों ने भी इस विरोध में साझा करना आरंभ कर दिया है। 

भाजपा सरकारों ने संस्थाओं को नष्ट ही किया : 

विरोध में यदि में वैकल्पिक दृष्टि लायें तो ठीक है लेकिन भाजपा की समस्या यह है कि इनकी विचार दृष्टि इतनी बांझ और अनउर्वर है कि उससे उत्कृष्टता निकल ही नहीं सकती। ये लोग चुन-चुन कर बौनों को रख रहे हैं जैसे राष्ट्रीय पुस्तक न्यास में किसी को नियुक्त कर दिया। ये इसलिये सुनियोजित हैं कि जहां-जहां भाजपा सत्तारूढ़ हैं वहां इन्होंने संस्थाओं को नष्ट ही किया है। कोई नई संस्था नहीं बनाई। भोपाल में बनाया गया आदिवासी संग्रहालय एकमात्र अपवाद है लेकिन इसे भी आप भारत भवन से प्रेरित कह सकते हैं। पूरे देश  में उनका काम संस्थाओं को नष्ट करना, उन्हें हथियाना, उनका कद गिराना। यही हो सकता है क्योंकि उनके पास उत्कृष्ट विकल्प है ही नहीं। जब आप रोमिला थापर और इरफान हबीब के मुकाबले दीनानाथ बत्रा को खड़ा करेंगे तो सारे बौद्धिक जगत में आपकी जग हंसाई होगी। वामपंथी इतिहासकारों ने ज्यादती की है तो उनके तर्क को काटने के लिए उस स्तर के लोग को चाहिये जो उसी दर्जे का तर्क दे सकें।  

बाइबल-कुरान एक, हमारे पास 4 वेद : 

अब तो मैं कहता हूं कि आरएसएस और भाजपा से हिन्दुत्व पर बहस की जाये। हम उनसे कहें कि हमारी दृष्टि में हिन्दू धर्म क्या है और हमारी समझ क्या है। आप लाइये साक्ष्य और हम देते हैं साक्ष्य। जिस धर्म में स्वयं देवताओं, भाषा, खानपान की इतनी बहुलता है। जिसमें 33 करोड़ देवी देवता हैं। उस धर्म में बहुलता के खिलाफ आप तर्क देते हैं। कुरान और बाइबिल के मुकाबले हमारे पास चार वेद हैं, उपनिषद अठारह हैं, दो महाकाव्य हैं। इन सबके बीच षैव और षाक्य के बीच, षैव और सांख्य के बीच झगड़े भी होते रहे हैं। जिस धर्म में एक आदिवासी महिला को भगवान को झूठे बैर खिलाने का सौभाग्य प्राप्त है, जिस धर्म में उडू़पी में एक दलित को मंदिर में प्रवेश  न देने पर भगवान कृष्ण की प्रतिमा का मुख उस ओर पलट गया जिस ओर दलित पूजा कर रहा था। ये हिन्दू धर्म है। इसे एक ही में कैसे बदल सकते हैं? हमारे तर्क का जवाब प्रतितर्क से दीजिये। ये कहिये कि यह प्रतितर्क है। आप कहेंगे कि हम उल्लू है तो यह तो गाली हुई। तर्क का उत्तर प्रतितर्क से दिया जा सकता है। लात तो गधे भी मारते हैं। 

विरोध का स्तर ही विरोधियों का चरित्र : 

आप जिसका विरोध करते हैं वह क्या प्रत्युत्तर में क्या कर रहा है इससे सामने वाले की गुणवत्ता और स्तर भी पता चलता है। मैं तो सोशल मीडिया देखता नहीं हूं लेकिन सुनता हूं कि उसमें बहुत घटिया स्तर पर चरित्र हनन की कोषिषें की गई। ठीक है। यह बताता है कि हमारे विरोधी किस स्तर पर हैं। 

आपातकाल या 1984 में क्यों नहीं लौटाया : 

ऐसा है कि कोई कब विरोध करे, यह तो उसका निर्णय है। आप तो तय नहीं कर सकते कि कोई कब विरोध किया जाये। यह तो पहली बात। दूसरी बात यह कि 1984 या आपातकाल के दौरान इन साहित्यकारों को पुरस्कार मिला ही नहीं था। वे सारी घटनायें निंदनीय थीं लेकिन वे वैसी सुनियोजित नहीं थीं जैसी आज की घटनायें हैं। ये हर क्षेत्र में धीरे-धीरे फैल रही हैं। तीन लेखक और बुद्धिजीवी तो जान से मारे गये हैं लेकिन इसके अलावा भी काफी काम हो रहे हैं। संस्थाओं का अधिग्रहण हो रहा है। ललित कला अकादेमी को भंग कर दिया गया। जवाहर लाल नेहरू स्मारक पुस्तकालय में घुसपैठ की गई है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास का अध्यक्ष अज्ञात कुलशील व्यक्ति को बना दिया गया है। आईआईटी में सामिष भोजन मांगने पर छात्रों को देशद्रोही तथा हिन्दुद्रोही कहा गया। इस तरह का वातावरण फैलेगा तो विरोध तो होगा। ये भी तर्क दिया गया कि ये घटनायें तो उन राज्यों में हुई जहां कांग्रेस या सपा जैसे दलों की सरकारें थीं। सही है। हमें भी पता है। लेकिन ये सारी सरकारें भी इन चीजों के प्रति असंवेदनषील भाव रख रही हैं। हमारा उद्देष्य किसी एक सरकार की निंदा करना नहीं है। जब इतने बहुमत से आई सरकार केन्द्र में है तो उसकी जिम्मेदारी बनती है। 
मुखर प्रधानमंत्री चुप क्यों?
जिस दिन हमने सम्मान लौटाया उसी दिन राष्ट्रपति ने इस देश की एकता के खतरे पर ध्यान आकृष्ट किया। उसी दिन प्रधानमंत्री ने भी राष्ट्रपति की चेतावनी पर ध्यान देने की बात कही थी। हम सिर्फ विरोध के लिए तो विरोध नहीं कर रहे हैं। आपके आचरण से भी पता चला रहा है कि यह हो रहा है। फिर आप चुप क्यों हैं? एक इतना मुखर-वाचाल प्रधानमंत्री जिसकी हर छोटी-बड़ी चीज पर अपना मत प्रकट कर रहा है, वो फिर क्यों चुप है? छोटी-छोटी बातों पर आप एडवाइजरी जारी करते हैं तो फिर ये तो उनसे बड़ा खतरा है। ये तो देष के टूटने का खतरा है। एक तरह से असहमति के असम्मान का खतरा है। इसकी ओर क्यों ध्यान आकर्षित नहीं कर रहे? 

सरकार कैसे बतायेगी कि हम क्या करें?

सरकार ने एक नया तरीका अपनाया है। राजनीतिक दृष्टि से उचित, संवैधानिक दृष्टि से वैध वक्तव्य देना। कहो कि हम देश की एकता पर किसी भी खतरे का मुकाबला डट कर करेंगे जैसा कि वित्तमंत्री अरूण जेटली ने कहा। लेेकिन अपने आचरण में प्रकट मत होने दो। अब यदि यह सरकार तय करने लगे कि हम क्या सोचें और क्या न सोचें, क्या लिखें और क्या न लिखें, क्या खायें और क्या न खायें तो सोचना चाहिये कि हम कहां जा रहे हैं। ये न तो हमारे संविधान से निकलती हुई दृष्टि है और न हमारी परम्परा से निकलती हुई दृष्टि है। यह तो हमारी परम्परा का घोर अपमान है। हमारी परम्परा में शास्त्रार्थ जैसी सामाजिक संस्था थी। किसी नये विचार को तब तक प्रतिष्ठित तथा स्थापित नहीं किया जा सकता था जब तक कि खुले वाद-विवाद में उसे सिद्ध न कर दें। जिस देष में यह परम्परा रही है, उस देश में क्या आप ये कहेंगे कि जो हमसे अलग है, वह देशद्रोही है, जो हमारे धर्म को नहीं मानेगा वो हमारे धर्म का विरोधी है? फिर वो किसी भी तरह के अल्पसंख्यक सिर्फ धर्म के ही अल्पसंख्यक नहीं आप अगर विचार में अल्पसंख्यक, आप अगर मूल्य दृष्टि में अल्पसंख्य है तो क्या देष में जगह नहीं रहेगी? फिर लोकतंत्र क्या है?

आगे क्या?

ये एक लम्बी संघर्ष यात्रा है। ये उन सामाजिक तत्वों से भी संघर्ष है जिनको सत्ता का मौन समर्थन प्राप्त है। उनको इतनी आसानी से अपदस्थ नहीं किया जा सकता। सत्ता तो फिर भी बदली जा सकती है लेकिन जो सामाजिक वृत्तियां विकसित हो गई हैं उन्हें एकदम से नहीं बदल सकते। दूसरी तरफ, मंत्रियों के इस तरह से गैर जिम्मेदार, बचकाना बयान आते रहते हैं, एक के बाद एक। उनको आप चुप नहीं करवा सकते? हम 1 नवंबर को दिल्ली में एक राष्ट्रीय अधिवेशन कर रहे हैं। इसमें बड़ी संख्या में लेखकों-कलाकारों के भाग लेने की उम्मीद है। फिर सोचेंगे कि क्या किया जाना चाहिये।

भारत भवन को स्थानीय संस्था बना दिया : 

भारत भवन मेरी दुखती रग है। वो इसलिये कि इसे बनाने में, दस साल तक इसे चलाने में, इसको अंतराष्ट्रीय कीर्ति के षिखर तक पहुंचाने में हम लोगों की भूमिका रही है। हमने अबाध ढंग से यह काम किया था। कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं था। कोई नौकरशाही या प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं था। हमें पूरी तरह स्वतंत्रता थी और हमने एक बहुलतावादी परिसर बनाया था। उसमें वो लोग भी बुलाते थे जो हमारी दृष्टि से सहमत नहीं थे। जैसे विद्यानिवास मिश्र, निर्मल वर्मा आदि। कह सकते हैं कि ये भाजपा की विचारधारा से अधिक निकट माने जाते थे। हम उन्हें भी आदर से बुलाते थे क्योंकि वे जिम्मेदार लोग थे। वे अपने से अलग दृष्टि का भी सम्मान करने वाले लोग थे। अब धीरे-धीरे जिस तरह से हस्तक्षेप बढ़ते गये हैं, भारत भवन एक स्थानीय संस्था बन कर रह गया है। यह भाजपा सरकार के पहले एक-दो वर्षों में बन गई थी।