Tuesday, October 18, 2022

पहली मुलाकात में अज्ञेय को देख निराला क्‍यों बोले, जरा सीधे खड़े हो जाओ


पग-पग विष पान किया, हारे नहीं बने महाप्राण निराला’ पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के समूचे जीवन वृत को एक वाक्‍य में कहना हो तो यही पंक्ति सूझेगी. छायावादी कविता के एक स्‍तंभ निराला केवल कविताओं के लिए याद किए जाएं तो यह उनके साथ अन्‍याय होगा. उन्‍होंने हिंदी कविता को छंदमुक्‍त करने का ऐतिहासिक कार्य तो किया लेकिन गद्य को पढ़ेंगे तो जानेंगे कि अपने समय को किस तरह उन्‍होंने देखा और किस आशावाद के साथ साहित्‍य में रच दिया. तकलीफें जिनका स्‍वभाव न बदल सकीं. जीवन का विष पान करते रहे मगर दुनिया को देते रहे.


15 अक्‍टूबर उन्‍हीं निराला की पुण्‍यतिथि है. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म बंगाल की महिषादल रियासत (जिला मेदिनीपुर) में 21 फरवरी 1899 में हुआ था. जीवन का उत्तरार्द्ध इलाहाबाद में बीता. जहां 15 अक्टूबर 1961 को उन्‍होंने देह त्‍यागी. माता ने पुत्र-प्राप्ति की कामना से सूर्य का व्रत किया था और संयोग से उनका जन्म भी रविवार को हुआ था, अतः उनका नाम सूर्यकुमार रखा गया. इनकी मां तीन वर्ष की आयु में ही उन्हें असहाय छोड़कर परलोक सिधार गई. परिस्थितियों के कारण निराला नवीं कक्षा से आगे शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके. स्वाध्याय के बल पर ही उन्होंने बांग्‍ला, संस्कृत और अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया.


तेरह-चौदह वर्ष की आयु में निराला का विवाह मनोहरा देवी से हुआ, परंतु दाम्पत्य सुख का भाग्‍य नहीं था. सन् 1918 में फैली महामारी में पत्‍नी का देहांत हो गया. उस समय उनकी दो संतान थीं. एक पुत्री और दूसरा पुत्र. थोड़े दिनों बाद पुत्र की भी मृत्यु हो गई. बेटी सरोज 19 वर्ष की अवस्था में सन् 1935 में चल बसी. स्वजनों की मृत्यु विशेषतः पुत्री वियोग के आघात ने उन्हें फक्कड़ और दार्शनिक बना दिया. बेटी के निधन पर लिखा गया ‘सरोज स्‍मृति’ हिंदी का सर्वश्रेष्‍ठ शोक गीत माना गया है. यही समय निराला के लेखन में दिशा परिवर्तन का प्रस्‍थान बिंदु भी माना जाता है.


निराला स्वभाव से उन्मुक्त और किसी भी प्रकार का प्रतिबंध न मानने वाले कवि थे. अतः उन्होंने काव्य के लिए छंद को आवश्यक नहीं माना. विरोध सहते हुए भी उन्होंने मुक्त छंद का प्रयोग किया. हिंदी कविता को छंद मुक्त करने का श्रेय निराला को ही है. जिस समय हिंदी लेखक समाज मात्रिक और वर्णिक छंद रच रहे थे तब निराला ने काव्‍य को छंद मुक्‍त्‍ किया. बिना छंद को साधे छंद मुक्ति कहां संभव हो सकती थी भला?

लेकिन निराला महाप्राण क्‍यों हुए यह जानना है तो आपको उनका गद्य भी पढ़ना चाहिए. उन्होंने कविता के अलावा काफी कुछ लिखा है- कहानी, उपन्यास, आत्मकथात्मक गद्य, निबंध. निराला ने गद्य को जीवन संग्राम की भाषा कहा था. और उनके लेखों, संपादकीय टिप्पणियों और उपन्यासों में जाति-व्यवस्था, किसान आंदोलन, स्त्रियों की दशा आदि पर उनके विचारों को पढ़ कर निराला को जाना जा सकता है. टैगोर, गांधी, नेहरू से असहमति जताना हो साहित्‍यकारों की आलोचना निराला का अंदाज ही निराला था.


कैसा था यह अंदाज यह साहित्‍यकारों के संस्‍मरणों से समझा जा सकता है. अज्ञेय अपने संस्मरण ‘वसंत का अग्रदूत’ में लिखते हैं, ‘मैं निराला के पहले दर्शन के लिए इलाहाबाद में पंडित वाचस्पति पाठक के घर जा रहा था तो देहरी पर ही एक सींकिया पहलवान के दर्शन हो गए जिसने मेरा रास्ता रोकते हुए एक टेढ़ी उंगली मेरी ओर उठाकर पूछा, ”आपने निरालाजी के बारे में ‘विश्वभारती’ पत्रिका में बड़ी अनर्गल बातें लिख दी हैं.” यों ‘रिपोर्टें’ सही थीं. ‘विश्वभारती’ पत्रिका में मेरा एक लंबा लेख छपा था. आज यह मानने में भी मुझे कोई संकोच नहीं है कि उसमें निराला के साथ घोर अन्याय किया गया था. अब यह भी एक रोचक व्यंजना-भरा संयोग ही है कि सींकिया पहलवान से पार पाकर मैं भीतर पहुंचा तो देखा कि एक चौकी के निकट आमने-सामने निराला और ‘उग्र’ बैठे थे.


उग्रजी से मिलना पहले भी हो चुका था; मेरे नमस्कार को सिर हिलाकर स्वीकार करते हुए उन्होंने निराला से कहा, ”यह अज्ञेय है.”


निराला ने एक बार सिर से पैर तक मुझे देखा. मेरे नमस्कार के जवाब में केवल कहा, ”बैठो.”

मैं बैठने ही जा रहा था कि एक बार फिर उन्होंने कहा, ”जरा सीधे खड़े हो जाओ.”

मुझे कुछ आश्चर्य तो हुआ, लेकिन मैं फिर सीधा खड़ा हो गया. निराला भी उठे और मेरे सामने आ खड़े हुए. एक बार फिर उन्होंने सिर से पैर तक मुझे देखा, मानो तौला और फिर बोले, ”ठीक है.” फिर बैठते हुए उन्होंने मुझे भी बैठने को कहा. मैं बैठ गया तो मानो स्वगत-से स्वर में उन्होंने कहा, ”डौल तो रामबिलास जैसा ही है.”


रामविलास (डॉ. रामविलास शर्मा) पर उनके गहरे स्नेह की बात मैं जानता था, इसलिए उनकी बात का अर्थ मैंने यही लगाया कि और किसी क्षेत्र में न सही, एक क्षेत्र में तो निरालाजी का अनुमोदन मुझे मिल गया है. मैंने यह भी अनुमान किया कि मेरे लेख की ‘रिपोर्टें’ अभी उन तक नहीं पहुंची या पहुंचाई नहीं गई हैं.


शिवमंगल सिंह सुमन के साथ निराला से हुई भेंट का जिक्र करते हुए अज्ञेय लिखते हैं कि दोनों के मन में यह ग्‍लानि थी कि निराला अपने लिए जो भोजन बना रहे थे वह सारा का सारा उन्होंने हमारे सामने परोस दिया और अब दिन-भर भूखे रहेंगे. लेकिन में यह भी जानता था कि हमारा कुछ भी कहना व्यर्थ होगा- निराला का आतिथ्य ऐसा ही जालिम आतिथ्य है. सुमन ने कहा, निरालाजी, आप नहीं खाएंगे तो हम भी नहीं खाएंगे.”


निरालाजी ने एक हाथ सुमन की गर्दन की ओर बढ़ाते हुए कहा, “खाओगे कैसे नहीं? हम गुद्दी पकड़कर खिलाएंगे.”

सुमन ने फिर हठ करते हुए कहा, “लेकिन, निरालाजी, यह तो आपका भोजन था. अब आप क्या उपवास करेंगे?’ निराला ने स्थिर दृष्टि से सुमन की ओर देखते हुए कहा, “तो भले आदमी, किसी से मिलने जाओ तो समय असमय का विचार भी तो करना होता है.” और फिर थोड़ा घुड़ककर बोले “अब आए हो तो भुगतो.”


अज्ञेय लिखते हैं, हम दोनों ने कटहल की वह भुजिया किसी तरह गले से नीचे उतारी. बहुत स्वादिष्ट बनी थी, लेकिन उस समय स्वाद का विचार करने की हालत हमारी नहीं थी.जब हम लोग बाहर निकले तो सुमन ने खिन्न स्वर में कहा, “भाई, यह तो बड़ा अन्याय हो गया.”


अज्ञेय ने कहा, “इसीलिए मैं कल से कह रहा था कि सवेरे जल्दी चलना है, लेकिन आपको तो सिंगार-पट्टी से और कोल्ड क्रीम में फुरसत मिले तब तो.”

निराला के निराले आतिथ्‍य के बारे में महादेवी वर्मा ने लिखा है, ऐसे अवसरों की कमी नहीं जब वे अकस्मात् पहुंच कर कहने लगते थे कि इक्के पर कुछ लकड़ियां, थोड़ा घी आदि रखवा दो. अतिथि आए हैं, घर में सामान नहीं है. उनके अतिथि यहां भोजन करने आ जाएं, सुनकर उनकी दृष्टि में बालकों जैसा विस्मय छलक आता है. जो अपना घर समझकर आए हैं, उनसे यह कैसे कह दें कि उन्हें भोजन के लिए दूसरे घर जाना होगा. भोजन बनाने से लेकर जूठे बर्तन मांजने तक का काम वे अपने अतिथि देवता के लिए सहर्ष करते हैं.


संवेदनशीलता ऐसी कि सुमित्रानंदन पंत दिल्ली में टाइफाइड ज्वर से पीड़ित थे. इसी बीच किसी समाचार पत्र ने उनके स्वर्गवास की झूठी खबर छाप डाली. निराला जी यह समाचार जान कर लड़खड़ा कर सोफे पर बैठ गए. महादेवी लिखती हैं, उनकी झुकी पलकों से घुटनों पर चूने वाली आंसू की बूंदें बीच-बीच में ऐसे चमक जाती थीं मानो प्रतिमा से झड़े जूही के फूल हों. यह सुनकर कि मैंने ठीक समाचार जानने के लिए तार दिया है, वे व्यथित प्रतीक्षा की मुद्रा में तब तक बैठे रहे जब तक रात में मेरा फाटक बंद होने का समय न आ गया.


सबेरे चार बजे फाटक खटखटा कर जब उन्होंने तार के उत्तर के संबंध में पूछा तब महादेवी को पता चला कि वे रात भर पार्क में खुले आकाश के नीचे ओस से भीगी दूब पर बैठे सवेरे की प्रतीक्षा करते रहे हैं.


एक बार निराला ने गेरू मंगवाया तो महादेवी कारण पूछ बैठीं. उन्‍होंने जवाब दिया ‘अब हम सन्यास लेंगे.’ महादेवी कहती हैं, इस निर्मम युग ने इस महान कलाकार के पास ऐसा क्या छोड़ा है जिसे स्वयं छोड़कर यह त्याग का आत्मतोष भी प्राप्त कर सके. तभी वसंत ने परिहास की मुद्रा में कहा, ‘तब तो आपको भिक्षा मांगने की आवश्यकता पड़ेगी.’


खेद, अनुताप या पश्चात्ताप की एक भी लहर से रहित विनोद की एक प्रशांत धारा पर तैरता हुआ निराला का उत्तर आया, ‘भिक्षा में मिला तो अब भी खाते हैं.’


धनाभाव निराला के जीवन का विशिष्‍ट कष्‍ट कहा जाना चाहिए. वे फक्‍कड़ स्‍वभाव के थे, जो मिलता था वह औरों को देने में पल का समय न लगाते. क्‍या कोई जान पाएगा कि पैसा कमाने के लिए अनुवाद करने वाले, बिना नाम औरों के लेख सुधारने वाले निराला के मन में जीवन के ये कड़वे अनुभव तिल भर भी कड़वाहट नहीं भर पाए थे. बल्कि उनकी रचनाधर्मिता से साहित्‍य समृद्ध ही हुआ है. तभी तो महादेवी वर्मा ने लिखा है, जिसकी निधियों से साहित्य का कोश समृद्ध है उसने ‘भिक्षाटन’ कर जीवन-निर्वाह किया है, इस कटु सत्य पर, आने वाला युग विश्वास कर सकेगा, यह कहना कठिन है.


(न्‍यूज 18 हिंदी ब्‍लॉग में प्रकाशित)

Friday, October 7, 2022

वयं रक्षाम: रावण होने, न होने के बीच


दशहरे पर शुभकामनाएं देते हुए हमें राम और रावण के चरित्र याद आते हैं. प्रतापी बताते हुए रावण के पांडित्‍य और पौरूष के प्रति हम चमत्‍कृत भी होते हैं. श्री राम द्वारा की गई रामेश्‍वर पूजा में बतौर आचार्य स्‍वयं पहुंचने, मृत्‍यु के पूर्व श्री राम के उद्घोष और लक्ष्‍मण द्वारा शिक्षा लेने जाने जैसी विशेषताओं के माध्‍यम से ग्रंथों, श्रुति कथाओं में रावण के व्‍यक्तित्‍व की प्रशंसा भी हुई है. यह मानव स्‍वभाव ही है कि वह बुराई में कुछ अच्‍छाई खोज ही लेता है. या यूं जानिए कि सबकुछ ब्‍लेक एंड व्‍हाइट नहीं होता है. धवल व स्‍याह के बीच धूसर भी होता है. रावण के चरित्र में भी दुर्गुण थे तो विशेषताएं भी. रावण होने न होने के बीच एक महीन सी रेखा है. हम किस बात से मुग्‍ध होते हैं और किस का अनुसरण करते हैं यह हमारे विवेक निर्भर करता है.


रावण के चरित्र निर्माण के पीछे क्‍या पोषण था, कौन सी संस्‍कृति थी यह जानना दिलचस्‍प हो सकता है. तमाम ग्रंथों के अध्‍ययन के अलावा आचार्य चतुरसेन शास्‍त्री द्वारा लिखा गया उपन्‍यास ‘वयं रक्षाम:’ इस कार्य में बड़ी सहायता कर सकता है. यह उपन्‍यास इतिहास नहीं है लेकिन किसी शोध ग्रंथ से कम नहीं है. इसकी भूमिका में आचार्य चतुरसेन शास्‍त्री ने जो लिखा है, वह समझना बेहद महत्‍वपूर्ण है. वे लिखते हैं,

मेरे हृदय और मस्तिष्क में भावों और विचारों की जो आधी शताब्दी की अर्जित प्रज्ञा-पूंजी थी, उस सबको मैंने ‘वयं रक्षामः’ में झोंक दिया है. अब मेरे पास कुछ नहीं है. लुटा-पिटा-सा, ठगा-सा श्रांत-क्लांत बैठा हूं. चाहता हूं, अब विश्राम मिले. चिर न सही, अचिर ही. गत ग्यारह महीनों में दो-तीन घंटों से अधिक नहीं सो पाया. संभवतः नेत्र भी इस ग्रंथ की भेंट हो चुके हैं. शरीर मुर्झा गया है, पर हृदय आनंद के रस में सराबोर है. यह अभी मेरा पैंसठवां ही तो वसंत है. फिर रावण जगदीश्वर मर गया तो क्या? उसका यौवन, तेज़ दर्प, दुस्साहस, भोग और ऐश्वर्य, जो मैं निरंतर इन ग्यारह मासों में रात-दिन देखता रहा हूं, उसके प्रभाव से कुछ-कुछ शीतल होते हुए रक्तबिंदु अभी भी नृत्य कर उठते हैं. गर्म राख तो है.


बकौल, आचार्य चतुरसेन शास्‍त्री, ‘वयं रक्षामः’ में प्राग्वेदकालीन जातियो के संबंध में सर्वथा अकल्पित-अतर्कित नई स्थापनाएं हैं, मुक्त सहवास है, विवसन विचरण है, हरण और पलायन है. सत्य की व्याख्या साहित्य की निष्ठा है. उसी सत्य की प्रतिष्ठा में मुझे प्राग्वेदकालीन नृवंश के जीवन पर प्रकाश डालना पड़ा है. अनहोने, अविश्रुत, सर्वथा अपरिचित तथ्य आप मेरे इस उपन्यास में देखेंगे; जिनकी व्याख्या करने के लिए मुझे उपन्यास पर तीन सौ से अधिक पृष्ठों का भाष्य भी लिखना पड़ा है. फिर भी आप अवश्य ही मुझसे सहमत न होंगे. परंतु आपके ग़ुस्से के भय से तो मैं अपने मन के सत्य को मन में रोक रखूंगा नहीं. अवश्य कहूंगा और सबसे पहल आप ही से.


वे लिखते हैं, ‘वैशाली की नगरवधू’ लिखकर मैंने हिंदी उपन्यासों के संबंध में एक यह नया मोड़ उपस्थित किया था कि अब हमारे उपन्यास केवल मनोरंजन की तथा चरित्र-चित्रण भर की सामग्री न रह जाएंगे. अब यह मेरा नया उपन्यास ‘वयं रक्षामः’ इस दिशा में अगला कदम है. इस उपन्यास में प्राग्वेदकालीन नर, नाग, देव, दैत्य, दानव, आर्य, अनार्य आदि विविध नृवंशों के जीवन के वे विस्मृत पुरातन रेखाचित्र हैं, जिन्हें धर्म के रंगीन शीशे में देखकर सारे संसार ने उन्हें अंतरिक्ष का देवता मान लिया था. मैं इस उपन्यास में उन्हें नर-रूप में आपके समक्ष उपस्थित करने का साहस कर रहा हूं. ‘वयं रक्षामः’ एक उपन्यास तो अवश्य है; परंतु वास्तव में वह वेद, पुराण, दर्शन और वैदेशिक इतिहास-ग्रंथों का दुस्सह अध्ययन है. संक्षेप में मैंने सब वेद, पुराण, दर्शन, ब्राह्मण और इतिहास के प्राप्तों की एक बड़ी-सी गठरी बांधकर इतिहास-रस में एक डुबकी दे दी है. सबको इतिहास-रस में रँग दिया. फिर भी यह इतिहास-रस का उपन्यास नहीं ‘अतीत-रस’ का उपन्यास है. इतिहास-रस का तो इसमें केवल रंग है, स्वाद है अतीत-रस का.


अब बात उपन्‍यास की. यह कहानी किशोरवय के रावण से शुरू होती है. वह ऋषि पुलस्‍त्‍य का पौत्र और ऋषि विश्रवा का पुत्र था. धनपति कुबेर का मौसेरा भाई. राक्षसों में मातृसत्ता पद्धति चलती थी, इसलिए रावण में उसके नाना और मामा के राक्षस संस्कार थे. वह अपने नाना सुमाली और मामा प्रहस्‍त के कहने और निर्देश पर ही लंका व उसके आसपास के द्वीपों को जीतने के लिए निकला. रावण राक्षस धर्म को मानता था और चाहता था कि पृथ्वी पर जितनी भी जातियां है जैसे वे सब राक्षस धर्म को स्‍वीकार कर ले. राक्षस धर्म को स्वीकार करवाने के लिए रावण का एक ही नारा था- वयं रक्षामः (हम रक्षा करेंगे). जो राक्षस धर्म स्वीकार कर लेते थे, रावण उनकी रक्षा करता था जो उसकी बात नहीं मानते थे वह उनका वध कर देता था.


जैसे, दानेंद्र मकराक्ष पर विजय के बाद रावण खड्ग हवा में ऊंचा उठा कर कहा – “वयं रक्षामः. सब कोई सुनो, आज से यह सुम्बा द्वीप और दानवों के सब द्वीपसमूह रक्ष संस्कृति के अधीन हुए. हम राक्षस इसके अधीश्वर हुए. जो कोई हम से सहमत है उसे अभय, जो सहमत नहीं है, उसका इसी क्षरण शिरच्छेद हो.”



अशोक वाटिका का एक संवाद जरूर पढ़ना चाहिए. मिलने आए रावण से सीता कहती हैं, आप त्रिलोक के स्वामी और सब विद्याओं के भंडार हैं. आपको ज्ञात है कि मैं वरिष्ठ कुल की कन्या और वधू हूं. मैं आर्य कुलवधू हूं. फिर भला मैं, लोकनिन्दित आचरण कैसे कर सकती हूं? आप सद्धर्म का विचार कीजिए और सज्जनों के मार्ग का अनुसरण कीजिए. आप रक्षपति हैं. ‘वयं रक्षाम:’ आपका व्रत है. आपको स्त्रियों की सर्वप्रथमा रक्षा करनी चाहिए.


सीता की बात सुन कर रावण ने कहा, “भद्रे, सीते, मैंने तेरे साथ कोई अधर्माचरण नहीं किया है. राक्षस धर्म को मर्यादा के अनुसार ही तेरा हरण किया है, क्योंकि तेरा पति मेरा बैरी है. उसने अकारण मेरी बहिन सूर्पनखा का अंगभंग किया और उसकी रतियाचना की अवज्ञा की. इसलिए मैंने उसकी स्त्री का हरण कर लिया. इसमें दोष कहां है? फिर तो तुम पर अधिक सह्रदय हूं. मैंने तुमसे बलात्कार नहीं किया. तुमसे दासीकर्म नहीं कराया. तेरा वध भी नहीं किया, न तुझे विक्रय किया अपितु सादर सयत्न रानी की भांति रखा है.


सीता ने कहा, “क्या आपने मेरे पति को युद्ध में जीत कर मेरा हरण किया है? आपने तो छल करके, भिक्षु वनकर, चोर की भांति मुझे चुराया है. आपने पुरुष-सिंह राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति मे मेरा हरण किया, आपका यह कार्य कितना कलंकित था. आपका यह कार्य न धर्म-सम्मत है, न वीरोचित. फिर मैं तो आपको स्वीकार करती नहीं. मेरे यशस्वी पति राज्य-भ्रष्ट नहीं हैं. उन्होने तो स्वेच्छा से राज्य त्यागा है, अभी भी वे ही अवध के स्वामी हैं. अभी भी वे सात अक्षोहिणी सेना के अधिनायक हैं. परंतु इससे भी क्या? आर्यपुत्र का बल उनकी सेना में नहीं; उनकी भुजा में है.


है न बारीक सी बात. अपने धर्म के प्रति निष्‍ठ रावण का आचरण धर्म सम्‍मत नहीं था. यहां निष्‍ठा से बड़ी बात आचरण की है. उसे अपनी रक्ष संस्‍कृति से अलग कोई और धर्म, कोई और संस्‍कृति पसंद नहीं थी. यह भाव ही दानव और देव के मध्‍य संघर्ष का मूल था.


सहज जिज्ञासा होती है, रावण के बाद लंका का क्‍या हुआ? वैसा ही हाल हुआ जैसा राम के बाद अयोध्‍या का हुआ था. लंका विजय के बाद विभीषण राजा बने और लंका में केवल विधवाएं, बच्चे और बूढ़े ही बचे. वे विभीषण को तिरस्कार की दृष्टी से देखने लगे. मंदोदरी ने विभीषण की पत्नी बनना स्वीकार किया लेकिन विभीषण अधिक दिन जी नहीं पाए. उनके वंशज कमजोर निकले. लंका विस्‍तार सिमट गया.


कथा का अंत हुआ. नायकों, खलनायकों का अंत हुआ. जय-पराजय के किस्‍से लिखे गए. सुने गए. काल की गति ज्‍यों कि त्‍यों हैं. गाथाएं भी वैसी ही रची, लिखी जा रही हैं. जब भी नीर क्षीर विवेक वांच्छित था, आज भी यही विवेक प्रणम्‍य है. विजयादशमी पर शुभकामनाएं.

(न्‍यूज 18 हिंदी ब्‍लॉग में प्रकाशित) 

Wednesday, September 21, 2022

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला उस उस राही को धन्यवाद

हमें शुक्रगुजार होना चाहिए. हर उस शै के प्रति जो हमें मिली है. हर उस बात के लिए जिससे हमारे जीवन में सुविधाएं है. हर उस व्‍यक्ति के लिए जिसके होने से हमारे जीवन में आसानियां हैं. हर उस पल के लिए जिसके होने से हमारा होना मायने रखता है. हमें बचपन से सिखाया जाता है कृतज्ञ होना. अध्‍यात्‍म भी वही मार्ग दिखाता है जो तनावरहित जीवन प्रबंधन का सूत्र है, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना. हमें बार-बार कहा जाता है कि सोते वक्‍त आभार व्‍यक्‍त करो कि आज का दिन बेहतर गुजरा. अगले दिन जागो तो इस कृतज्ञता के साथ कि एक और दिन मिला है. मगर हम शायद कृतज्ञता व्‍यक्‍त करने में सबसे अधिक कंजूस हैं. प्रकृति के प्रति कम ही आभारी होते हैं. देवस्‍थान पर मन्‍नत मानते हुए झुकने वाले सिर अक्‍सर आभार जताना चूक जाते हैं. हमारे जीवन में ऐसे बहुसंख्‍य किरदार हैं जो खामोशी से हमारी जिंदगी को गुलजार किए हुए हैं, हम उनके प्रति कृतज्ञ होना भूल ही जाते हैं.


कृतज्ञता की बात इसलिए कि हमें आभार व्‍यक्‍त करना याद दिलाने के लिए एक दिन तय किया गया है और वह दिन आज 21 सितंबर को है. विश्व आभार दिवस मनाने के बारे में जो जानकारी उपलब्‍ध है वह बताती है कि वर्ष 1965 में अमेरिका के हवाई प्रांत में आभार जताने के लिए प्रति वर्ष एक दिन मनाने का निर्णय लिया गया. 1966 से 21 सितंबर को ‘विश्व आभार दिवस’ के रूप में मनाना शुरू किया गया. जब दिन है तो इसे किसी तरह मनाया भी जाएगा. अन्‍यथा तो हमें प्रायमरी की किताबों से लेकर धर्म ग्रंथों तक धन्‍यवाद का महत्‍व बताया गया है. छुटपन में सिखाया जाता है कि प्‍लीज, सॉरी और थैंक्‍यू जैसे तीन मेजिकल वर्ड्स से हर कार्य संभव है. धर्म कोई रहा हो, संस्‍कृ‍ति कोई भी हो, हर जगह सर्वशक्तिमान के प्रति आभार व्‍यक्‍त करने का विधान तो किया ही गया है. हमारी भारतीय संस्‍कृति परम सत्‍ता से इतर कण मात्र के प्रति भी कृतज्ञ रहने को निर्देशित करती है. शास्‍त्र न भी पढ़े हों तो भी गुरुओं ने हमें कृतज्ञता भाव सिखलाया है. तभी तो कबीर कह गए हैं:


गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय

बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय.


यानि गुरु और गोविंद (भगवान) एक साथ खड़े हों तो हमें बिना संकोच गुरु के चरणों में शीश झुकाना चाहिए क्‍योंकि गोविंंद  का दर्शन करवाने का कार्य तो गुरु ने ही किया है. मगर हमें हैं कि नाशुक्रा ही रह जाते हैं. जब कृतघ्‍नता की बात होती है तो बरबस नरेश मेहता की एक कविता याद हो आती है:


पसीने से लथपथ

वह उस वृक्ष की छाया तले पहुंचा.

छाया क्या थी

जल था,


टिका दी तने से कुल्हाड़ी

और गमछा बिछा लेट गया

निश्चिंत.


नींद जब खुली

पहर ढल रहा था,

वह हड़बड़ाता उठा

और लगा पेड़ काटने.


कृतघ्‍न के लिए इससे तीखा  तंज और क्‍या होगा? कृतज्ञ भाव अपना कर विराट हो जाने के हमारे मार्ग सबसे बड़ी बाधा अहम् की लघुता है. स्‍वयं को शक्तिमान समझ लेने का जवाब है कि हमारा मन प्रकृति के प्रति कृतज्ञ भाव से भरा होना चाहिए. उस वायु के लिए जिसके होने से हम सांस ले पा रहे हैं. उस जल के लिए जो हर बार हमारी प्‍यास बुझाता है. उस अग्नि के लिए जो हमारा भोजन पकाती है. उस आकाश के लिए जो हमारी विस्‍तार की सीमा है. उस धरती के लिए जो हमारे अस्तित्‍व का आधार है. जैसे, प्रियंकर अपनी एक कविता में कहते हैं:


कृतज्ञ हूं मैं

जैसे आसमान की कृतज्ञ है पृथ्वी

जैसे पृथ्वी का कृतज्ञ है किसान.


कृतज्ञ हूं मैं

जैसे सागर का कृतज्ञ है बादल

जैसे नए जीवन के लिए

बादल का आभारी है नन्हा बिरवा.


कृतज्ञ हूं मैं

जिस तरह कृतज्ञ होता है

अपने में डूबा ध्रुपदिया

सात सुरों के प्रति

जैसे सात सुर कृतज्ञ हैं

सात हजार वर्षों की काल-यात्रा के.


कृतज्ञ हूं मैं

जैसे सभ्यताएं कृतज्ञ हैं नदी के प्रति

जैसे मनुष्य कृतज्ञ है अपनी उस रचना के प्रति

जिसे उसने ईश्वर नाम दिया है.


मगर हम कृतज्ञ होना हर बार भूल जाते हैं. अपनों के प्रति सर्वाधिक धन्‍यवादविहीन होते हैं हम. बड़ों के प्रति श्रद्धानवत हो भी सकते हैं, समवय के प्रति कुछ न्‍यून तथा छोटों के प्रति अल्‍प कृतज्ञ ही होते हैं. हां, आजकल शब्दावली में थैंक्‍यू, सॉरी और प्‍लीज शब्‍दों ने कुछ ज्‍यादा जगह घेर ली है मगर वह केवल कहने तक ही सीमित है. व्‍यवहार में कृतज्ञता का भाव दुर्लभ श्रेणी का ही है.


कुछ लोग, कुछ घटनाएं हमें आभारी बने रहने को प्रेरित करती हैं. मजबूर करती हैं कि हमारी संवेदना जागृत हो. जैसे ‘धन्यवाद’ कविता में लीलाधर जगूड़ी लिखते हैं:


भिखारी

बच्‍चों को सड़कों पर छोड़ देते हैं

रेलवे स्‍टेशनों पर छोड़ देते हैं

ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों को

वे दिख सकें


भिखारी

सोते हुए भी अपने को नहीं ढँकते

ताकि निर्लज्‍ज दया आती रहे

सलज्‍ज लोगों को


भिखारी दया और दान का गुण

बचाए हुए हैं पूरी मानवता में

भिखारियों को दिया जाए

या मानवता को दिया जाए धन्‍यवाद.


जरा याद कीजिए, कितने ही किरदार होते हैं हमारे जीवन में, दिन में कितने ही लोग मिलते हैं, जिनके होने से हमारे जीवन में मायने हैं, आसानियां हैं, खुशियां हैं, मगर जान कर भी इनके महत्‍व को, उनके होने के प्रति अपनी कृतज्ञता को व्‍यक्‍त करने में हम पीछे ही रह जाते हैं. कभी संकोच में, कभी बाद में कह देंगे के भरोसे के फेर में. और जो कभी दुर्भाग्‍य से हमें आभार जताने का अवसर न मिले तो नाशुक्रा रह जाने की पीड़ा संग हो जाती है.

यहां शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की कविता रह-रह कर याद आती है:


जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद.


जीवन अस्थिर अनजाने ही

हो जाता पथ पर मेल कहीं

सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल

तय कर लेना कुछ खेल नहीं


दाएं-बाएं सुख-दुख चलते

सम्मुख चलता पथ का प्रमाद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद.


सांसों पर अवलम्बित काया

जब चलते-चलते चूर हुई

दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली

नव स्फूर्ति थकावट दूर हुई


पथ के पहचाने छूट गए

पर साथ-साथ चल रही याद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद.


जो साथ न मेरा दे पाए

उनसे कब सूनी हुई डगर

मैं भी न चलूं यदि तो भी क्या

राही मर लेकिन राह अमर


इस पथ पर वे ही चलते हैं

जो चलने का पा गए स्वाद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद.


कैसे चल पाता यदि न मिला

होता मुझको आकुल-अन्तर

कैसे चल पाता यदि मिलते

चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर


आभारी हूं मैं उन सबका

दे गए व्यथा का जो प्रसाद

जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला

उस उस राही को धन्यवाद.


थैंक्‍यू, मेहरबानी, शुक्रिया, धन्‍यवाद जैसे शब्‍दों का अपने जीवन में होना वैसी औपचारिकता नहीं हैं जैसी किसी समारोह के अंत में आभार प्रदर्शन एक औपचारिकता है. धन्‍यवाद कह देना हमें जरा विनम्र बना देता है. धन्‍यवाद भाव हमें अधिक मानव बना देता है. कृतज्ञता हमें अधिक तरल बना देती है. सोचिए, कितने लोगों को जाने कब से कहना है धन्‍यवाद. जाने कब से स्‍थगित है अपनी कृतज्ञता को व्‍यक्‍त करना. आज के दिन आभार जता देना, थोड़ा अधिक सुखी होने का मार्ग है. ज्ञानीजनों की बात मानिए, आज से ही इस राह पर चल दीजिए.

Saturday, September 17, 2022

Cheetah is Back: इतिहास रच दिया, चिंता है इतिहास खुद को दोहराए नहीं

17 सितंबर 2022। आज मध्‍य प्रदेश ही नहीं समूचे देश के लिए ऐतिहासिक दिन है। वह दिन जब करीब सात दशक बाद भारत में चीतों का आगमन हुआ है। अब हम ‘टाइगर इज बैक’ कहे या न कहे लेकिन ‘चीता इज बैक’ तो कह ही सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन के मौके पर तीन चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा और एक इतिहास रच दिया। अब चीता प्रोजेक्‍ट के ‘जिंदा’ रहने की चिंता है। चीता के खत्‍म होने से भारत के घास के मैदानी क्षेत्र की ईकोलॉजी बुरी तरह बिगड़ी है। खुशी है कि चीता की वापसी से फुड चेन कायम की जा सकेगी। इस खुशी की बेला में आशंका का कुहांसा भी है। बिग कैट यानी बिल्‍ली वर्ग के इस सबसे नाजुक प्रकृति के प्राणी के लिए मुफीद वातावरण तैयार करना उतना मुश्किल नहीं है जितना दुरूह इसे मौत की परिस्थितियों से बचाना है। 

भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर 1952 में चीता को देश में विलुप्त घोषित किया था। माना जाता है कि इसके पहले देश में करीब 1000 चीते थे। मध्‍य प्रदेश के सरगूजा (अब छत्तीसगढ़ में) के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह देव ने 1947 में देश के अंतिम तीन चीतों को मार डाला था। उसके बाद से देश में चीता देखा नहीं गया। सार्वजनिक रूप से उपलब्‍ध तथ्‍य बताते हैं कि 70 के दशक में ईरान से एशियाई चीतों को भारत लाने का प्रयास किया गया था। वर्ष 2000 में हैदराबाद में 'सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी' ने ईरान से एशियाई चीतों का क्लोन बनाने का प्रस्ताव रखा, लेकिन यह प्रस्ताव भी असफल रहा। फिर केंद्र सरकार के निर्देश पर वर्ष 2009 में देहरादून में 'इंडियन वाइल्ड लाइफ सोसाइटी' और 'वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया' ने चीते को अफ्रीका से भारत लाने का प्रस्ताव तैयार किया।

वर्ष 2009 में भी चीता आयात करने के निर्णय का विरोध हुआ था। तब वर्ष 2012 में यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। इस बीच मध्‍य प्रदेश के कूनो में गुजरात से एशियाई सिंह यानी लायन लाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी। गुजरात की अस्मिता से शेर को जोड़ दिए जाने की राजनीति का परिणाम यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी 2013 से अब तक गुजरात सरकार ने मध्‍य प्रदेश को सिंह लाने की इजाजत नहीं दी। वर्ष 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को विदेश से चीता लाने की अनुमति दी तो सिंह के लिए तैयार कूनो को चीता पुनर्वास के लिए उपयुक्‍त पाया गया। कूनो में चीता ला कर सिंह के पुनर्वास की तैयारी पर किए गए खर्च और सिंह को न भेजने से उपजे दाग को कम करने का प्रयत्‍न किया गया है। 

वैसे, चीता पुनर्वास के लिए भारत सरकार की मंशा ईरान से एशियाई चीतों को लाने की थी। अभी ईरान के पास लगभग 20 एशियाई चीते ही बचे हैं और इस कारण उसने भारत का आग्रह नहीं माना। ईरान के इंकार के बाद सरकार ने अफ्रीका की तरफ देखा। अफ्रीका में लगभग 7 हजार चीते हैं। 12 साल से अधिक की बातचीत के बाद नामीबिया अगले पांच सालों में 50 चीते भारत भेजने के लिए राजी हो गया है। नामीबिया से भारत लाए गए चीतों पर पांच सालों में कुल 75 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके लिए इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के बीच अनुबंध हुआ है। 

अफ्रीका महाद्वीप से चीतों को लाकर रक्षित करने का प्रयोग पूर्वी अफ्रीकी देश मलावी में सफल रहा है। वहां 1980 के दशक के अंत तक चीता विलुप्त हो गया था। वर्ष 2017 में दक्षिण अफ्रीका से चार चीतों को मलावी में लाया गया था। अब वहां 24 चीते हैं। इसी प्रयोग से प्रेरित होकर चीतों को अफ्रीका महाद्वीप से भारत लाने का निर्णय लिया गया है।  भारत में चीता संरक्षण के लिए कई जगहों का चयन किया गया है। चीतों को रखने के लिए उपयुक्त स्‍थानों में गुरु घासीदास नेशनल पार्क छत्तीसगढ़, बन्नी ग्रासलैंड्स गुजरात, डुबरी वाइल्डलाइफ सेंचुरी, संजय नेशनल पार्क, बागडारा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी, नौरादेही वाइल्ड लाइफ सेंचुरी और कूनो नेशनल पार्क मध्यप्रदेश, डेजर्ट नेशनल पार्क वाइल्ड लाइफ सेंचुरी, शाहगढ़ ग्रासलैंड्स राजस्थान और कैमूर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी उत्तर प्रदेश शामिल हैं। चीता प्रोजेक्‍ट के तहत पहले चरण में आठ चीतों को मध्य प्रदेश के मिश्रित वन और घास के मैदान के 730 वर्ग किलोमीटर में फैले कूनो पार्क में लाया गया है। इसके बाद अगले चरण में मध्य प्रदेश के नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य और राजस्थान के जैसलमेर जिले के शाहगंज में भी चीतों को लाया जाएगा। 

वैसे देश में चीता की वापसी 2011 से कर्नाटक के मैसूर शहर के श्री चमाराजेंद्र जूलॉजिकल पार्क में हुई थी। यहां जर्मनी से लाए गए चार चीता की मौत हो चुकी है। फिर 2020 में अफ्रीका से चीते लाए गए। इन 1 नर और 2 मादा चीतों को बाड़े में रखा गया है। आज उनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। मैसूर में बाड़े में चीता रखने के प्रयोग के विपरीत कूनो में चीते को अपने प्राकृतिक आवास घास के मैदान में रखा गया है। 

एक तरफ यह उम्‍मीद है कि चीतों को कूनो में उन परेशानियों का जिनका सामना नहीं करना पड़ेगा जो वे मैसूर के बाड़ों या पिंजड़े में कर रहे हैं। लेकिन घास के मैदान वैसे नहीं है जैस बरसों पहले हुआ करते थे या अफ्रीकी देशों में अभी है। यही कारण है कि भारत में चीता आने के बाद चीतों के संरक्षण और पुनर्वास को लेकर संदेह गहरा गया है। खासकर तब जब देश में चीते का परंपरागत आवास घास के मैदान सिमट रहे हैं। चीता बिग कैट फैमिली का सबसे तेज रफ्तार जानवर है। तीन सेकंड में 100 किमी प्रति घंटे तक की रफ्तार हासिल कर लेता है। यह सवाल उठ रहे हैं कि अफ्रीकी महाद्वीप के लंबे-लंबे घास के मैदानों में फर्राटा भरने वाले चीते भारत के माहौल में कैसे ढलेंगे? घास के बड़े मैदानों के बिना चीतों के संरक्षण और पुनर्वास की योजना कैसे संचालित की जा सकती है?

चीता दहाड़ नहीं सकता है 

चीता बिग कैट फैमिली का अकेला ऐसा सदस्य है जो दहाड़ नहीं सकता। वह सिर्फ गुर्राता है। 96 प्रतिशत शावक बड़े होने से पहले ही मर जाते हैं। तेंदुआ, जंगली कुत्‍ते सहित अन्‍य जानवर चीते के बच्‍चों का शिकार कर लेते हैं। पारिस्थिति असंतुलन, नाजुक प्रकृति और ऐसे अन्‍य कारणों के चलते चीता के बच्‍चों के जिंदा रहने की दर 36 फीसदी के आसपास ही है। यही कारण है कि कूनो से सारे तेंदुओं को हटाया गया है। यहां उनके खाने की कमी को दूर करने के लिए चीतल लाए गए हैं। पेंच नेशनल पार्क को कुल 500 चीतल कूनो में शिफ्ट करने का टारगेट दिया गया है। चीतों के आगमन के बाद सांभर हिरणों के झुंड को छोड़ा जाएगा। 

वहीं, कई विशेषज्ञों का आरोप है कि वन्यजीवों और पक्षियों के संरक्षण या पुनर्वास को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता है। हमने जब वन्‍यप्राणी विशेषज्ञों से बात कि तो उन्‍होंने चीता के आहार को लेकर बड़ी आशंका व्‍यक्‍त की है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीता का जीवन चक्र उनके दौड़ने पर निर्भर करता है। जितना तेज वह दौड़ता है उसका पसंदीदा शिकार सांभर, ब्लैक बक आदि तेजी से भागते हैं। जबकि चीतल कम गति से भागता है। उसे शिकार करने में चीता को अधिक मेहनत नहीं करनी होगी। ऐसे में मात्र 12 किलोमीटर के बाड़े में रहना उसके लिए अनुकूल नहीं होगा। चीतों के लिए चीतल का शिकार करना नया अनुभव होगा क्योंकि चीतल अफ्रीका में नहीं पाए जाते हैं। 

इस बात की फिक्र है कि नामीबिया के और भारत के जंगलों और जानवरों दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। बाघ को बचाने के तमाम उपायों के बाद भी टाइगर स्‍टेट में बाघों का शिकार आम बात है। इस कारण स्‍थानीय जानवर और फिर भारत का मौसम भी चीतों के लिए मुश्‍किल खड़ी कर सकता है। मानव-वन्यजीवों के बीच बढ़ता संघर्ष और चीतों के लिए भोजन की अनुपलब्धता जैसे कारणों के चलते इस दिशा में कई स्तरों पर चुनौतीपूर्ण स्थितियां बनी हुई हैं।

चीता संरक्षण के लिए बनाई गई कार्य योजना में कहा गया है कि यदि पांच वर्ष की अवधि के दौरान चीता जीवित रहने या प्रजनन करने में विफल रहते हैं तो ऐसी स्थिति में एक वैकल्पिक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा या फिर पूरे कार्यक्रम की ही समीक्षा की जा सकती है। यदि लगा कि कार्यक्रम बंद किया जा सकता है तो कार्यक्रम को बंद कर दिया जाएगा। 

चीतों को भारत लाए जाने के मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा है कि चीतों को भारत लाना उन गलतियों को सुधारने की दिशा में एक कदम है, जिनकी वजह से कभी भारत में यह जीव विलुप्त हो गए थे। पिछले कुछ सालों में भारत ने शेर, एशियाई हाथी, घड़ियाल और एक सींग वाले गैंडे जैसे विलुप्‍त होने की कगार पर पहुंच चुके कई प्राणियों को बचाया है। उन्होंने कहा कि चीतों को भारत लाना देश में ऐतिहासिक विकासवादी संतुलन को बनाए रखने की ओर अहम कदम साबित होगा।

हम उम्‍मीद भी यही करते हैं कि यह प्रयास सफल हों मगर वन्‍य प्राणी विशेषज्ञों की चिंताओं को नजरअंदाज करने से बात नहीं बनेगी। अगर इन चिंताओं का निराकरण नहीं किया गया तो देश के चीता विहीन होने का इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराएगा। 

(17 सितंबर 2022 को https://www.humsamvet.com में प्रकाशित)