Saturday, June 3, 2023

विश्‍व साइकिल दिवस: अनूठी है यह 'साइकिल' और इसकी सवारी


आज जब सड़क पर अपनी गाड़ी से गुजरता हूं और किसी साइकिल सवार को पास से गुजरते देखता हूं तो अपनी गाड़ी जरा स्‍लो कर उसके लिए रास्‍ता बना देता हूं. मुझे वे दिन याद आ जाते हैं जब साइकिल चलाया करता था और किसी गाड़ी को राह देने के फेर में ब्रेक लगाने के बाद फिर साइकिल चलाने के लिए पूरी ताकत लगानी पड़ती थी. यह आदत मुझ में तब से आ गई है जब बाइक चलानी सीखी थी. बाइक से कार तक की यात्रा तो हुई मगर साइकिल की सवारी आज भी जेहन में सुहानी याद की तरह बसी हुई है. हममें से कई के जीवन में साइकिल आज भी बनी हुई लेकिन अब सेहत की फिक्र लिए वजन घटाने और फिट बनने के उपक्रम के रूप में.

यही वजह है कि हर साल 3 जून को साइकिल दिवस मनाने की शुरुआत की गई. ज्‍यादा दिन नहीं हुए हैं, इस दिन को मनाने की शुरुआत 2018 में हुई है और वजह भी वहीं है, लोगों को अपनी सेहत व पर्यावरण के प्रति सजग करना. विश्व साइकिल दिवस 2023 की थीम है, ‘सतत भविष्य के लिए एक साथ सवारी’ Riding Together for a Sustainable Future. एक साथ साइकिल की सवारी, जब यह वाक्‍य पढ़ा और लिख रहा हूं तो कल्‍पना में जाने कितनी छवियां तैर गई हैं जब साथ-साथ साइकिल चलाई गई थी. स्‍कूल के दिनों में दोस्‍तों के समूह के साथ साइकिल की रोमाचंक यात्राएं तो कभी मौजी मन के साथ अकेले में घंटी की ट्रीन-ट्रीन बजाते हुए की गई साइकिल की सवारी याद हो आई. अपने कपड़ों पर दाग मंजूर मगर साइकिल पर निशान भी मंजूर नहीं. चैन चढ़ाने का हुनर. फिल्‍मों के वे दृश्‍य याद हो आए जब नायक-नायिकाओं ने साइकिल की सवारी की, गीत गाएं. जाने कितनी यादें.

फिर धीरे-धीरे सुविधाएं बदली और साइकिल की भूमिका भी. तब साइकिल के कुछ प्रकार थे. आज साइकिल कई-कई प्रकार और डिजाइन में उपलब्‍ध है. बड़े समाज के लिए साइकिल आज भी आजीविका उपार्जन का सहायक साधन है और लगभग उतना ही बड़ा समाज है जिसके लिए साइकिल सेहत पाने का साधन. इस तरह समाज का एक और बंटवारा हुआ है.

लेकिन आज जब हम विश्‍व साइकिल दिवस पर भविष्‍य की बात कर रहे हैं तो मुझे एक दूसरी ‘साइकिल’ की याद आ रही है. यह ‘साइकिल’ है इकतारा प्रकाशन भोपाल की बाल पत्रिका. बच्‍चों को इसका परिचय देते हुए इसके बारे में क्या खूब कहा गया है, ये साइकिल भी तुम्हारी साइकिल की ही तरह है. इसमें भी दो पहिए हैं. एक में अपने आसपास की हवा है जिसमें हम साँस लेते हैं. उसमें धूल है, धुंआ है और मोगरे की खुशबू भी है. दूसरे पहिए में चिड़िया के पंखों से टकराकर लौटी हवा है. इसमें उड़ानें हैं, सपने हैं. यह तुम्हारी भाषा में बोलती है. तुम्हारी भाषा जानती है. इसमें तुम्हारे ठीक पास की अनदेखी दुनिया की कहानी है. जो बार-बार हमारे घर की घंटियां बजाती है मगर अनजान रहती है. ठीक वैसे जैसे जागने से पहले एक लड़का पेपर फेंक जाता है, चुपचाप. साइकिल जागी हुई तथा चुपचाप दोनों, दुनिया की पड़ताल करती है.

कितनी सुंदर बात है कि यह ‘साइकिल’ बच्‍चों से जागी और चुप दोनों तरह की दुनिया की बात करती है. मोबाइल के संसार में कैद बच्‍चों को कल्‍पना के आकाश में ले जाती है. पत्रिका का रंग-रूप, संयोजन, सामग्री इतनी प्रभावी कि बच्‍चे तो ठीक बड़े भी इसे एकबार हाथ में ले लें तो पूरी पढ़े बिना रखते नहीं है. सामग्री की विशिष्‍ट के बारे में क्‍या ही कहा जा सकता है? इस बारे में वरिष्‍ठ साहित्‍यकार कवि, उपन्यासकार, कथाकार विनोद कुमार शुक्ल का यह कहना ही काफी है: साहित्य इत्यादि की पत्रिकाओं में मैंने अब तक जो लिखा पाठकों को सोचकर नहीं लिखा. जो लिख सकता था वही लिखा. इसे कौन पढ़ेगा? या कोई पढ़ेगा! के सुनसान में यह लिखा हुआ छोड़ देता था. साइकिल में यह सोचकर लिखता हूं कि बच्चे पढ़ेंगे. ‘साइकिल’ ने मुझे इस उम्र में पास और दूर के बच्चों तक पहुंचने में मदद की.

इस साइकिल की अपनी दुनिया है. अपने रंग है. इसका हैंडल बच्‍चों का सर्जन और रचनात्‍मकता के आमसान की ओर ले जाता है. इसकी यात्रा करते हुए आनंद की घंटियां बजती हैं. इसकी पुर्जे-पुर्जे में मनभावन संग बसता है. यह बच्‍चों के विकास मार्ग को न अवरूद्ध करती है और किसी दिशा में मोड़ती है. वास्‍तव में यह पंख फैलाती है और एक सुहानी उड़ान के लिए आमंत्रित व तैयार करती है.

अधिक गहराई की बात करूं तो कक्षा 4 से 8 तक के बच्‍चों को ध्‍यान में रखकर प्रकाशित की जा रही यह पत्रिका बच्‍चों को भाषा का अभ्‍यास करवाती है. भाषा के नए रंग-रूप, नए मुहावरों से परिचित करवाती है. यह दायरों को बांधती नहीं, तोड़ती है. यहां कविता अपने भाव में हैं, छंद और तुकबंदी के विन्‍यास में सिमटी नहीं हैं. तय करना मुश्किल होता है कि चित्र अधिक प्रभावी या लेखन और अंत में हम पाते हैं कि दोनों लाजवाब. यानी तो है न साथ-साथ विकास का दृष्टिकोण?

‘साइकिल’ और ऐसी ही कई बेजोड़ पुस्‍तकें तैयार कर रहे इकतारा के सुशील शुक्‍ला और चंदन यादव की यह राय मायने रखती है कि ‘साइकिल’ में हमारी कोशिश रहती है कि उसकी सामग्री बच्चों को एक पाठक के रूप में तैयार कर सके. पढ़ने के प्रति उनकी रुचि जागे. इसके लिए कई चीजें जरूरी हैं मसलन, विविधता से भरी सामग्री मसलन, उसकी प्रस्तुति सामग्री की प्रस्तुति पाठक को आकर्षित करती है कि नहीं? जिस भाषा में सामग्री पेश की जाती है वह पुरानी धूल खाई भाषा तो नहीं है? वह आज की और बोलचाल की भाषा है कि नहीं? उसमें जीवन झलकता है कि नहीं या वह सिर्फ किताबी भाषा है.

बेहद कल्पनाशील, सवाली और जिज्ञासु बच्‍चों और उनके आसपास फैली दुनिया के बीच बने एक पुल का नाम है ‘साइकिल’ जहां से वे अपनी तरह से, अपनी भाषा और अपने रंग में दुनिया को देखते हैं. ‘साइकिल’ के जरिए वे ऐसी जगह पर पहुंचते हैं जहां बराबरी से बात की जाती है, जहां सीमा रेखाएं नहीं खींची जाती बल्कि कल्पनाओं में एक पंख और जोड़ दिया जाता है. बच्चों को रट्टू तोता बनाए रखने की मुहिम पर प्रहार है यह ‘साइकिल’.

और जब इकतारा कहता है कि ‘साइकिल’ बच्‍चों को अनुयायी, संकीर्ण और कूपमंडूक बनाए रखने के चक्र के खिलाफ एक जुगनू बराबर प्रस्ताव है तो हम पाते हैं यह जुगनू भर नहीं है, भोर की किरण है और इसका उजास सब बच्‍चों तक पहुंचना चाहिए. विश्‍व साइकिल दिवस पर इस ‘साइकिल’ की ट्रिन-ट्रिन भी सुनिए, अपना भविष्‍य बेहतर बनाने के लिए सृजन संसार साथ-साथ सवारी के लिए बुला रहा है.

(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 


Thursday, May 25, 2023

दाग देहलवी: जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं

 


हजारों काम मोहब्बत में हैं मजे के दाग

जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं.

मोहब्‍बत दाग देहलवी ने जब यह शेर कहा तो बहुत मशहूर हुआ क्‍योंकि उनके पहले मिर्जा गालिब कह चुके थे, ‘इश्क ने ‘गालिब’ निकम्मा कर दिया, वर्ना हम भी आदमी थे काम के.’ अपनी शायरी से मिर्जा गालिब, मौमिन, जौक जैसे बुजुर्ग शायरों की तारीफ पाने वाले दाग देहलवी ने उर्दू का इतना सहज इस्‍तेमाल किया कि अवाम के प्रिय शायर हो गए. उनकी शायरी मोहब्‍बत की शायरी मानी जाती है मगर उनके जीवन का भी अजीब रंग था कि मोहब्‍बत पाने के लिए उन्‍होंने तवायफे काम पर रखी हुई थी.

दाग देहलवी का असली नाम नवाब मिर्जा खां था. उनका जन्‍म 25 मई 1831 को दिल्ली में हुई था. दाग देहलवी के पिता शम्सुद्दीन खां ने नाइंसाफी के लिए अंग्रेजों के खि‍लाफ आवाज उठाई. ब्रिटिश रेजिडेंट के कत्ल की भी साजिश के आरोप में उसे 1835 फांसी दे दी गई. पिता की फांसी के समय दाग देहलवी मात्र चार साल और चार महीने के थे. अंग्रेजों के भय से दाग देहलवी की मां वजीर बेगम कई वर्षों तक छिप कर रहीं और इस दौरान दाग देहलवी अपनी मौसी के यहां रहे.

संदर्भ बताते हैं कि कई वर्षों के भटकाव के बाद जब दाग की मां वजीर बेगम ने आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के पुत्र और उत्तराधिकारी मिर्जा फखरू से विवाह कर लिया. इस शादी के बाद दाग देहलवी भी लाल किले में आ गए यहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई. मिर्जा फखरू के देहांत के बाद इन्‍हें लाल किले से बाहर कर दिया गया. लेकिन लाल किले में बीते 12-14 सालों में दाग देहलवी ने उर्दू शायरी में नाम पा लिया था. ऐसे समय में जब फारसी में शायरी की जा रही थी तब दाग ने उर्दू को खास अंदाज से अपनी शायरी में आजमाया. लाल किले से निकलने के अगले साल ही 1857 की क्रांति हो गई. आशियाना बिखरने के बाद वे दर-बदर के हो गए. दिल्‍ली से वे रामपुर पहुंचे और कुछ बरस बाद वहां से हैदराबाद.

हैदराबाद का शुरुआती जीवन तकलीफों में गुजरा फिर नवाब से राहत मिली. बीवी के देहांत के बाद दाग अकेले हो गए थे और मन बहलाने के लिए उन्होंने एक साथ कई तवायफों को नौकर रखा था. दाग देहलवी से इन तवायफों का रिश्ता शाम की महफिलों तक ही था. दाग देहलवी की गज़लों की शौहरत में इन सुरीली आवाज़ों का भी बड़ा योगदान था. दाग देहलवी की शायरी के प्रसिद्ध होने का एक और कारण था कि उन्‍होंने वक्‍त के हिसाब से न केवल गजलें लिखी, बल्कि धुन तैयार कर उन्‍हें तब की नामचीन तवायफों और कोठेवालियों को याद करवाया. इस तरह अगले ही दिन उनकी गजलें शहर में मशहूर हो जाती. उस वक्‍त की मशहूर गायिकाओं से चर्चित हुई दाग की गजलों का कारवां समकालीन गजल गायकों नूरजहां, बेगम अख्तर, फरीदा खानम, आबिदा परवीन, गुलाम अली, मेहदी हसन, जगजीत सिंह, पंकज उधास की आवाज के जरिए हम तक पहुंचा है. हैदराबाद में ही साल 17 मार्च 1905 में उनका देहांत हो गया.

दाग देहलवी ने अपने जीवन में खूब लिखा है. बताते हैं कि उनका एक ‘दीवान’ 1857 में लूट लिया गया था, जिसकी कोई खबर नहीं मिली. जब वे हैदराबाद में रह रहे थे तब दूसरा दीवान कोई चुरा ले गया मगर इसके बावजूद दाग देहलवी के पांच दीवान ‘गुलजारे दाग’, ‘महताबे दाग’, ‘आफ़ताबे दाग’, ‘यादगारे दाग’, ‘यादगारे दाग- भाग-2’ प्रकाशित हुए जिनमें 1038 से ज्‍यादा गजलें, रुबाईयां, सलाम मर्सिये आदि शामिल हैं. उन्होंने कम से कम फारसी लफ्जों का इस्तेमाल करके उर्दू शेर लिखे. दाग को अपने वक्त का सबसे बेहतरीन रोमांटिक शायर कहते हुए माना जाता है कि दाग वो शायर हैं जिन्होंने उर्दू गजल को निराशा से निकाल कर मोहब्बत के रास्ते पर ला खड़ा किया. उनके बहुचर्चित कुछ शेर यूं हैं:

आप पछताएं नहीं जौर से तौबा न करें

आप के सर की कसम ‘दाग’ का हाल अच्छा है.

आशिकी से मिलेगा ऐ जाहिद

बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता.

अभी आई भी नहीं कूचा-ए-दिलबर से सदा

खिल गई आज मेरे दिल की कली आप ही आप.

अदम की जो हकीकत है वो पूछो अहल-ए-हस्ती से

मुसाफिर को तो मंजिल का पता मंजिल से मिलता है.

इलाही क्यूं नहीं उठती कयामत माजरा क्या है

हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं.

राह पर उनको लगा लाए तो हैं बातों में

और खुल जाएंगे दो-चार मुलाकातों में.

ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा

ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा.

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं

हम देखने वालों की नजर देख रहे हैं.

ये तो कहिए इस खता की क्या सजा

मैं जो कह दूं आप पर मरता हूं मैं.

जिन को अपनी खबर नहीं अब तक

वो मिरे दिल का राज क्या जानें.

आइना देख के कहते हैं संवरने वाले

आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले.

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे

जो रंज की घड़ी भी खुशी से गुजार दे.

वफा करेंगे, निबाहेंगे, बात मानेंगे

तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था.

मिलाते हो उसी को खाक में जो दिल से मिलता है

मिरी जां चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है.

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता

वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता.

फलक देता है जिन को ऐश उन को गंम भी होते हैं

जहां बजते हैं नक़्क़ारे वहां मातम भी होता है.


(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 


Wednesday, May 17, 2023

फड़के स्‍टूडियो: अंग्रेज पत्रकार के कमेंट ने मोम को पत्‍थर में बदल दिया

मांडव जा रहे हो तो धार के फड़के स्‍टूडियो जरूर जाना. बाज बहादुर और रानी रूपमति के प्रेम के किस्‍सों के लिए मशहूर मांडू जाने वाले हर शख्‍स को यह सलाह जरूर दी जाती है. बचपन में हमें भी मिली थी जब कक्षा पांचवी के बच्‍चों को स्‍कूल की ओर से शैक्षणिक भ्रमण पर ले जाया गया था. खांडेराव पहाड़ी पर बना तीन कमरों का स्‍टूडियो जहां के बारे में कुछ पता नहीं था मगर ज्‍यों ही दरवाजा खुला हम बच्‍चों की आंखें फटी की फटी रह गईं. रोशन केबिन में रखी मूर्तियां इतनी सजीव की आंखों को मल-मल कर देखा गया वाकई में मूर्तियां हैं या किसी को बुत बना कर बैठा दिया गया है. बोलती सी आंखें, मुस्‍कुराने को तत्‍पर होंठ, उम्र की गवाह झुर्रियां, कपड़ों पर सिलवटों की तराश ऐसी कि मन करें हथेली घूमा कर ठीक कर दें. सब यूं खामोश की यदि गलत हरकत हुई तो बुजुर्ग जो मूर्ति बने बैठे हैं बोल ही पड़ेंगे एकदम.



वह 80 के दशक की बात थी जब पहली बार फड़के स्‍टूडियो गया था और आज 21 वीं सदी के 22 साल गुजर गए हैं. फड़के स्‍टूडियो का रंग रोगन जरूर बदल गया है मगर जो नहीं बदला वह है इन प्रतिमाओं का जीवंत होने का अहसास. पत्‍थरों में प्राण फूंक देना यदि कहावत है तो दावे से कहा जा सकता है कि यह कहावत ऐसी शिल्‍प को देख कर कही गई होगी.

धार के फड़के स्‍टूडियो जो भी गया है वह ऐसे मनोभावों और इन प्रतिमाओं के रचियता के प्रति श्रद्धा भाव से भरे बिना नहीं लौटा है. इन प्रतिमाओं के शिल्‍पकार रघुनाथ कृष्ण फड़के की 17 मई को पुण्‍यतिथि है. रघुनाथ कृष्ण फड़के का जन्‍म 27 जनवरी 1884 को मुंबई के पास वसई में एक साधारण परिवार में हुआ था. उनके पिता कृष्णा जी वसई के दरबार में कार्यरत थे. साधारण परिवार में जन्‍मे रघुनाथ के मूर्तिकार होने के पीछे की कहानी भी दिलचस्‍प है. रघुनाथ‍ को बचपन से ही मूर्तिकला का शौक था. पेंटर श्रीनिवासराव हरपनहल्ली उनके पहले शिक्षक थे. उन्होंने रघुनाथ में मूर्तिकला की गुणवत्ता को पहचाना. उनके प्रोत्साहन से फड़के ने एक बूढ़े आदमी की पहली मूर्ति बनाई. उसी मूर्ति को बॉम्बे आर्ट सोसाइटी प्रदर्शनी में राज्यपाल द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था. फड़के की इसी मूर्ति को बाद में भारत सरकार ने इंग्लैंड के वेम्बली और अमेरिका के फिलाडेल्फिया में प्रदर्शनियों के लिए भेजा था.

मराठी विश्‍वकोश के अनुसार  1917 के दौरान रघुनाथ फड़के ने मुंबई में ‘मूविंग वैक्स पेंटिंग्स’ की एक प्रदर्शनी आयोजित की. इस चित्र प्रदर्शनी को काफी प्रतिसाद मिला. उन्हें अच्छी आमदनी भी हुई. उन्होंने अपने मोम के पुतलों को 1925 में वेम्बली इंग्लैंड में प्रदर्शनी के लिए भेजा. प्रदर्शनी भी वहां बहुत लोकप्रिय हुई. उन्होंने 1917 से 1927 तक दस वर्षों तक ऐसी प्रदर्शनियों का आयोजन किया. भारत की आजादी के दौर में भी उन्‍होंने अपनी प्रदर्शनियों में उन्होंने हिंदमाता के शोक, लाला लाजपतराय, लोकमान्य तिलक, दादाभाई नवरोजी और उनके आसपास के अन्य नेताओं के साथ-साथ महात्मा गांधी की कैद आदि विषयों को प्रस्तुत किया. मोम के इन पुतलों को देखकर लोग हैरान रह जाते थे. अंग्रेजी अखबार हेराल्ड ने भी उनकी कला की प्रशंसा की लेकिन ब्रिटिश पत्रकार और द बॉम्बे क्रॉनिकल के संपादक बीजी हॉर्निमैन की टिप्‍पणी ने उनकी जिंदगी बदल दी. पत्रकार हॉर्निमैन ने फड़के के  एक मोम शिल्पकार होने पर उपहास करते हुए सुझाव दिया कि उन्हें तो मूर्तिकार बनना चाहिए. इस आलोचना से रघुनाथ फड़के का दिल टूट गया. इतना उदास हुए कि मोम की प्रतिकृति की अपनी प्रदर्शनी को सफलता की ऊंचाई पर बंद कर दिया.

तभी लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी से उनकी पहचान हुई. लोकमान्य तिलक ने उन्हें पुणे में शिवाजी मंदिर के लिए शिव छत्रपति की एक प्रतिमा बनाने का काम सौंपा. शिव राय की यह पहली संगमरमर की स्मारक मूर्ति 1923 में शिवाजी मंदिर में स्थापित की गई थी. फिर 1932 में फड़के को गिरगांव चौपाटी पर लोकमान्य तिलक की आदमकद मूर्ति लगाने का काम मिला. लोकमान्य तिलक की इस मूर्ति को देखने के बाद ब्रिटिश पत्रकार बीजी हॉर्निमैन ने मूर्तिकार के रूप में फड़के की भी प्रशंसा की. जिस पत्रकार से आलोचना मिली थी उसी से मूर्तिकार के रूप में तारीफ सुन कर रघुनाथ कृष्‍ण फड़के किस संतोष का अनुभव किया होगा समझा जा सकता है.

वे केवल मूर्तिकार नहीं थे बल्कि संपूर्ण सर्जक थे. उन्‍होंने रत्नाकर पत्रिका के अप्पासाहेब गोखले के कारण साहित्य की ओर रुख किया. उन्होंने रत्नाकर, नवनीत, मनोरंजन पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया; और वे ‘टीकाकर फड़के’ के नाम से प्रसिद्ध हुए. 1937 में वे धार में आयोजित मध्य भारतीय साहित्य सम्मेलन की कला और कविता परिषद के अध्यक्ष थे. साहित्य के साथ-साथ उन्होंने संगीत, नाटक, ज्योतिष में भी रुचि ली. फड़के का नाट्यपरमर्ष संग्रह बहुत लोकप्रिय हुआ. उन्होंने तरुण साहित्य माले (1937) द्वारा प्रकाशित हास्य रचनाओं की एक पुस्तक ‘स्वालविराम’ भी लिखी. उन्होंने तबले पर भास्करबुवा बखले, बालकृष्णबुवा इचलकरंजीकर, अमन अली खान जैसे प्रसिद्ध गायकों के साथ संगत की.

जब उनकी मूर्तिकला की प्रशंसा धार तक पहुंची तो धार नरेश उदाजीराव पवार की घुड़सवारी की मूर्ति का काम मिला. यह प्रतिमा धार के प्रवेश द्वार पर स्थापित है. कहा तो यह भी जाता है कि 1930 में धार के महाराज उदाजीराव ने अपनी मां लक्ष्मीबाई की प्रतिमा बनाने के लिए उन्हें धार बुलाया था. 1933 में धार में स्टूडियो बनाकर उन्होंने मूर्तिकला का प्रशिक्षण देना शुरू किया. शिष्यों शंकरराव दवे, दिनकरराव दवे, राजाभाऊ मेहुणकर और श्रीधर मेहुणकर ने अपने गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाया है. 1961 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया. 1971 में उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई. 17 मई 1972 को धार के खांडेराव हिल स्थित अपने स्‍टूडियो में उनका निधन हो गया.

कलामर्मज्ञ रघुनाथ कृष्ण फड़के के निधन को 51 बरस हो गए हैं मगर उनके शिल्‍प आज भी दर्शकों को वैसा ही अचंभित, चमत्‍कृत और स्‍तब्‍ध करते हैं जैसा निर्माण के वक्‍त करते थे. राजा भोज की नगरी धार इतने बरसों से रघुनाथ कृष्ण फड़के के शिल्‍प के कारण भी ख्‍यात है.


(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 


Wednesday, March 22, 2023

हमारी लापरवाहियों से ऐसे ही गहराएगा जल संकट

 ‘सर्दी के बाद सीधे बारिश, ओले गिरने लगे हैं। लगता है डायरेक्‍ट मानसून आ गया है। गर्मी छुट्टी पर गई है जैसे।’ 

बीते दिनों जब मध्‍य प्रदेश और देश के अन्‍य हिस्‍सों में औचक बारिश और ओलावृष्टि हुई तो सोशल मीडिया पर ऐसे ही मैसेज चल पड़े। कुछ ने इस मैसेज पर ठहाका मार दिया, कुछ किसानों की दशा पर अफसोस जता कर रह गए। किसी ने गर्मी से राहत महसूस की तो किसी को लगा कि बर्फ से भी सड़क देखने के लिए कश्‍मीर, शिमला जाने की जरूरत नहीं है। प्रकृति ने हमें यही यह दृश्‍य उपलब्‍ध करवा दिया है। बहुत कम लोगों ने ठहर कर एक पल सोचा होगा कि प्रकृति का यह बदला व्‍यवहार उनका कंठ सूखा देगा।

बहुत कम लोग इसलिए कह रहा हूं क्‍योंकि अधिकांश यह मानते हैं कि जितना पानी बरसेगा उतना धरती के नीचे और ऊपर जमा हो जाएगा। इस तरह हमारे लिए आवश्‍यक पानी की आपूर्ति सतत होती रहेगी। इसी सोच के तहत लोग मानते हैं कि ग्‍लेशियर का पिघलना भी तो अच्‍छा है, ग्‍लेशियर से पिघला पानी हमारे जलस्रोतों में जल स्‍तर बढ़ाएगा ही। कितनी मासूम है यह सोच? या कह लीजिए कितनी आपराधिक है यह सोच कि हम अपने अज्ञान, लापरवाही, स्‍वार्थ और लालच में समूची धरती को नष्‍ट कर रहे हैं। उसके पानी के खत्‍म कर रहे हैं और यह भूले जा रहे हैं कि पानी नहीं होगा तो कुछ नहीं रहेगा। 

पानी की बात इसलिए क्‍योंकि आज विश्‍व जल दिवस है। आज के दिन भी अगर हम पानी की बात नहीं करेंगे तो कब करेंगे? आज से यदि हम पानी के प्रति सजग नहीं होगे तो कब होंगे? अगर आपने यह पढ़ा है कि धरती पर 70 फीसदी पानी है और जल संकट भोगने के बाद भी यह सोचते हैं कि यह जो 70 फीसदी पानी है यह आपकी प्‍यास बुझा देगा या आपकी जान बचा लेगा तो आप सबसे ज्‍यादा भ्रम में है। रहीम तो बरसों पहले कह गए थे, ‘बिन पानी सब सून’ मगर हमने बस इस दोहे को रटा भर है, इससे सीखा नहीं है। परिणाम यह हुआ कि अब बार-बार वैज्ञानिक चेता रहे हैं कि धरती पानी खत्‍म हो रहा है। जितना पानी खत्‍म हो रहा है, हमारे गले के आसपास मृत्‍यु का घेरा उतना ही कस रहा है। 

पानी का संकट कितना गहरा है, इसे दो बातों से समझते हैं। एक हमारे अनुभव और दूसरे वैज्ञानिक शोध और चेतावनियां। पहले अपने अनुभव की बात। हममें से कई लोग यह जानते हैं कि कुछ बरस पहले नलकूप की संख्‍या बहुत कम हुआ करती थी। तब 50-60 फीट की गहराई पर भूजल मिल जाया करता था। अब लगभग हर घर में अपना निजी बोरवेल है और पानी 300 से 600 फीट नीचे तक पहुंच गया है। तब आमतौर बरसाती नदियां ही गर्मियों में सूखा करती थी। अब सदानीरा कही जाने वाली नदियां भी आधे साल तक सूखी रहती हैं। तब नदी की रेत को जरा सा हटाने पर पानी की झिरी फूट पड़ती थी। अब तो नदियों को रेत से भी खाली कर दिया गया है। अधिकांश नदियों को हमारे कारखानों, उद्योगों और सीवेज का पानी ने जहरीला बना दिया है। तब हमारे आसपास पेड़ हुआ करते थे। अब हमने पेड़ काट दिए और सीमेंट कांक्रीट का जंगल खड़ा का दिया है। धरती को सीमेंट-कांक्रीट से इतना ढ़ंक दिया कि सतह का पानी रीस कर भूगर्भ में पहुंच भी नहीं पाता है। 

अलग-अलग तरह की मिट्टी की जलग्रहण क्षमता अलग-अलग होती है। हमारे शहरों का नियोजन तथा घरों की डिजाइन उस मिट्टी के अनुरूप होनी चाहिए लेकिन हमने नकल कर करके एक जैसे निर्माण कर लिए हैं। भोपाल के वाटर रिचार्जिंग पैटर्न पर पीएचडी करने वाली टाउन प्‍लानर डॉ. शीतल शर्मा भोपाल का ही उदाहरण देते हुए बताती हैं कि हरियाली और खुलापन लिए आर्किटेक्‍ट भोपाल की पहचान हुआ करते थे। फिर हमने आंगन और खुली जमीन को खत्‍म कर सीमेंट-कांक्रीट की इमारतें बनानी शुरू की। खुला हिस्‍सा छोड़ना लगभग खत्‍म हो गया है। हर जगह सीमेंट-कांक्रीट या फर्शी-टाइल्‍स बिछा दी गई है। कुछ समय पहले बरसात का 70 फीसदी तक पानी जमीन में जाता था। अब बारिश का 10-15 फीसदी भी भूगर्भ में नहीं जा पता है। अधिकांश पानी सतह पर रह जाता है और इस पानी से नदी, नाले  उफन जाते हैं। थोड़ी सी बरसात से सड़कों पर पानी भर जाता है और हम समझते हैं कि बहुत बारिश हो गई, जबकि धरती तो प्‍यासी ही रह जाती है। यदि नालों के आसपास पेड़ लगाए जाएं और नालों को नीचे से पक्का नहीं किया जाए तो बारिश का 70 फीसदी से अधिक पानी जमीन में जा सकता है। हमने नालों के आसपास पेड़ तो काटे ही नालो को भी पक्‍का कर दिया है। यहां तक कि पेड़ के तने के आसपास भी पक्‍का कर दिया है ताकि उसकी जड़ों तक भी पानी नहीं पहुंच पाए। 

नल जल योजनाएं भी पर्याप्‍त पानी देने में सफल नहीं हो रही है। जबकि एक इंसान को अपनी दैनिक आवश्‍यकताओं के लिए प्रतिदिन कम से कम 20 लीटर पानी तो चाहिए ही। कुछ लोग हर‍ दिन 200 लीटर से भी ज्‍यादा पानी अपनी लापरवाही से बर्बाद कर रहे हैं। कुछ दशक पहले तक यदि कोई कहता था कि पानी खरीद कर पीना पड़ेगा तो उसे हैरत से देखा जाता था। तब प्‍याऊ खोलना धर्म का काम समझा जाता था। अब देश में बोतलबंद पानी का कारोबार ही 21 हजार करोड़ से ज्‍यादा का है। टेंकर, नल जल और अन्‍य साधनों से पानी पाने का खर्च तो अलग है।  

अब बात वैज्ञानिकों द्वारा दी जा रही चेतावनियों की। वैज्ञानिक समय समय पर बता रहे हैं कि पर्यावरण असंतुलन नहीं रोका गया और पानी का सही प्रबंधन नहीं किया तो दुनिया की बड़ी आबादी को पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलेगा। इसी चिंता के तहत 50 साल के इतिहास में पहली बार इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इस सम्‍मेलन में 6500 से ज्यादा विशेषज्ञ और अलग-अलग देशों के राष्ट्राध्यक्ष और मंत्री मिल कर पानी को बचाने की बात करेंगे। यह सम्‍मेलन आयोजित करना बेहद आवश्‍यक हो गया है क्‍योंकि संयुक्त राष्ट्र की ही ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के दो अरब लोगों यानी 26 फीसदी आबादी को साफ और सुरक्षित पेयजल नहीं मिल रहा है। रिपोर्ट बताती है कि ग्लोबल वॉर्मिंग की समस्या और बढ़ने वाली है। जहां पानी का संकट है, उन इलाकों में पानी की ज्‍यादा कमी होगी। 

ग्लेशियर से जुड़े एक अध्ययन में बताया गया है कि बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर अभूतपूर्व तरीके से पिघल रहे हैं और इस सदी के अंत तक दुनिया के दो-तिहाई ग्लेशियर गायब हो सकते हैं। ग्‍लेशियर पिघलेंगे तो बेमौसम पानी मिलेगा और समुद्र का जलस्‍तर बढ़ने से कई क्षेत्र डूब जाएंगे जबकि गर्मियों में भीषण जल संकट खड़ा हो जाएगा। ग्‍लेशियर के पिघलने की तो जो यह कुतर्क देते हैं कि ग्‍लेशियर पिघलेंगे तो पानी तो हमारी नदियों में ही आएगा, उन्‍हें जरा हिमालय के तराई वाले क्षेत्र तथा लेह लद्दाख जा कर देखना चाहिए। बुंदेलखंड में यदि जलसंकट के कारण पलायन होता है तो लेह जैसे क्षेत्र में भी पानी के संकट के कारण पलायन होता है। यहां ग्‍लेशियर के पिघलने के कारण ठंडे मौसम में हर तरफ पानी होता है तो गर्मियों में जब पानी की आवश्‍यकता होती है तब ग्‍लेशियर वाला पानी भी सूख जाता है। यह ठीक वैसा है कि अभी वसंत और चैत्र माह में बारिश और ओले गिर रहे हैं और मानसून में बारिश हो ही नहीं या कुछ घंटों की भारी बारिश के बाद हफ्तों आसमान से बूंद भी न टपके। एक साथ गिरे पानी को संभालने के हमारे पास संसाधन नहीं है और पानी के रीस कर धरती में समाने के सारे रास्‍ते हमने लगभग बंद कर दिए हैं। 

सिर्फ इसलिए पानी की चिंता नहीं करनी चाहिए क्‍योंकि धरती के भीतर और ऊपर का पानी सूख रहा है बल्कि अपने स्‍वार्थ से संचालित हम इंसानों को अपने और आने वाली पीढ़ी के बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य के लिए भी पानी की फिक्र करनी होगी। क्‍योंकि आंकड़ें बताते हैं कि भारत में हर रोज पांच साल से कम उम्र के 500 बच्‍चों की मौत डायरिया के कारण होती है। पीने को साफ पानी नहीं मिलना डायरिया का प्रमुख कारण है। 21 फीसदी संक्रामक रोग गंदे पानी के कारण होते हैं। आबादी और पेयजल स्रोत का आकलन करें तो हमारे देश में दुनिया की कुल आबादी के 18 फीसदी लोग रहते हैं लेकिन पूरी दुनिया के कुल जल स्रोतों में से मात्र 4 फीसदी स्रोत ही हमारे देश में हैं। हमें यह समझ लेना चाहिए कि साफ पेयजल बता कर बेचा जा रहा पानी भी शुद्ध हो इसकी गारंटी नहीं है। अपने घर में जिस वॉटर प्‍यूरीफायर का आप उपयोग कर रहे हैं वह पानी के कई महत्‍पूर्ण खनिज को भी खत्‍म कर देता है जिसके परिणामस्‍वरूप बी 12 जैसे सुक्ष्‍म पोषक तत्‍वों की कमी हम सभी भोग रहे हैं।      

हमारी कृषि मुख्‍यत: बारिश के पानी पर ही निर्भर है। तथ्‍य बताते हैं कि दुनिया जितनी गर्म हो रही है, जितना कोयला, तेल, गैस, बिजली म जला रहे हैं, जितना प्रदूषण हम फैला रहे हैं, जितना वन क्षेत्र हम नष्‍ट कर रहे हैं, उतना ही बारिश का पैटर्न भी बदलेगा। बारिश का तरीका बदलेगा तो हमारी कृषि कैसे सुरक्षित रह पाएगी? उपज से हमारा भोजन भी तैयार होता है और खेती कार्य लाखों लोगों की आमदनी और आजीविका का सबसे प्रमुख साधन है।

जल संरक्षण, जल प्रबंधन और जल शोधन पर कार्य नहीं करना आत्‍मघाती समाज और तंत्र तैयार करना है। पानी की फिक्र करना सरकार, विश्‍व समुदाय या निकायों की जिम्‍मेदारी ही नहीं है, यह समाज, परिवार और व्‍यक्तिगत हमारा भी दायित्‍व है। बेहतर होगा कि इस जल दिवस पर हम स्‍वयं अपने आसपास गहराते जल संकट को महसूस कर केवल अपने स्‍तर पर पानी का संरक्षण शुरू कर दें। यह व्‍यक्तिगत पहल सरकारी स्‍तर पर नीतिगत पहल करने के लिए तंत्र को मजबूर कर देगी। वरना जैसा जन होंगे वैसा तंत्र होगा। जो चल रहा है वही चलता रहा तो वह स्थिति ज्‍यादा दूर नहीं है जैसा सैमुअल टेलर कोलरिज ने अपनी कविता में कहा है,

पानी, पानी, हर जगह, पीने के लिए एक बूंद नहीं! 

(water water everywhere not a drop to drink) 

(हमसमवेत में 22 मार्च को प्रकाशित)