Wednesday, August 9, 2023

अगस्‍त क्रांति: गांधी जी रोक दिया था भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लेने से

9 अगस्‍त भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह ऐतिहासिक दिन है जब देश ने एक हो कर हुंकार भरी थी- क्विट इंडिया, अंग्रेजों भारत छोड़ो. ब्रिटिश साम्राज्‍य को उखाड़ फेंकने की जो कोशिश कई-कई आंदोलनों के जरिए की जा रही थी वह अंतत: उस आंदोलन पर आ कर टिक गई जिसे में अगस्‍त क्रांति कहते हैं. गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा देकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए पूरे भारत के युवाओं का आह्वान किया था.

साल था 1942 और स्‍थान था मुंबई का गोवालिया पार्क जिसे बाद में अगस्‍त क्रांति मैदान नाम दिया गया. इस आंदोलन की नींव 4 जुलाई 1942 को पड़ी थी जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर निर्णय लिया कि कि दूसरे विश्‍व युद्ध के समय किया वादा पूरा नहीं होता है और अंग्रेज भारत छोड़ कर नहीं जाते हैं तो देश भर में नागरिक अवज्ञा आंदोलन किया जाएगा. तथ्‍य बताते हैं कि इस निर्णय पर कांग्रेस में दो मत थे. कांग्रेसी नेता चक्रवर्ती गोपालाचारी इसके पक्ष में नहीं थे. विरोध करते हुए उन्‍होंने पार्टी छोड़ दी. वहीं सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अशोक मेहता और जयप्रकाश नारायण ने इस प्रस्‍ताव का समर्थन किया. मुस्लिम लीग, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा इस आंदोलन में कांग्रेस के साथ नहीं आए.

गांधी जी द्वारा तय दिशा के अनुसार आंदोलन की रूपरेखा बनी और 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू करने का निर्णय ले लिया. 9 अगस्‍त की सुबह से ही कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं मगर गांधी जी के भाषण से मिली ऊर्जा पूरे देश में फैल गई और लगभग पूरे देश ने एक स्‍वर में कहा, अंग्रेजों भारत छोड़ो.कांग्रेस समिति में दिया गया गांधी जी का भाषण इस‍ लिहाज से बेहद महत्‍वपूर्ण है. गांधी जी ने अपने भाषण में कुछ बातें साफ करना चाही थीं और कहा था कि कई लोग मुझसे यह पूछते है की क्या मैं वही इंसान हूं जो मैं 1920 में हुआ करता था, और क्या मुझमे कोई बदलाव आया है. मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि मैं वही मोहनदास गांधी हूं जैसा मैं 1920 में था.

गांधी जी ने 1920 का जिक्र इसलिए किया क्‍योंकि 1 अगस्‍त 1920 को असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ था. इसके पहले 1919 में जलियांवाला बाग हत्‍याकांड हो चुका था. कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 4 सितंबर 1920 को आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ. जनता से आग्रह किया गया था कि वे स्कूलो, कॉलेजो और न्यायालय न जाएं तथा अंग्रेजों का कर न चुकाएं. सभी अंग्रेज सरकार के साथ असहयोग करें. गांधी जी का मानना था कि यदि असहयोग का ठीक ढंग से पालन किया जाए तो भारत एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त कर लेगा. लेकिन फरवरी 1922 में किसानों के एक समूह ने गौरखपुर जिले के चौरी चौरा में एक पुलिस थाने में आग लगा दी. इस अग्निकांड में कई पुलिस वालों की जान चली गई. हिंसा भड़कने पर गांधी जी ने असहयोग आंदोलन तत्काल वापस लेना पड़ा. उन्होंने जोर दिया कि, ‘किसी भी तरह की उत्तेजना को निहत्थे और एक तरह से भीड़ की दया पर निर्भर व्यक्तियों की घृणित हत्या के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है’.

इसीलिए 1920 का जिक्र कर भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान करते हुए गांधी जी ने साफ किया था कि वे हिंसा से उतनी ही नफरत करता हैं जितनी 1920 में किया करते थे. उन्‍होंने कहा कि मेरे वर्तमान प्रस्ताव और पहले के लेख और स्वभाव में कोई विरोधाभास नही है. मैं चाहता हूं कि आप सभी इस बात को जाने कि अहिंसा से ज्यादा शुद्ध और कुछ नहीं है, इस बात को मैं आज कह भी रहा हूं और अहिंसा के मार्ग पर चल भी रहा हूं. हमारी कार्यकारी समिति का बनाया हुआ प्रस्ताव भी अहिंसा पर ही आधारित है और हमारे आंदोलन के सभी तत्व भी अहिंसा पर ही आधारित होंगे. भगवान ने मुझे अहिंसा के रूप में एक मूल्यवान हथियार दिया है. मैं और मेरी अहिंसा ही आज हमारा रास्ता है. यदि आप में से किसी को भी अहिंसा पर भरोसा नहीं है तो कृपया करके इस प्रस्ताव के लिये वोट ना करें.

‘करो या मरो’ का नारा देते हुए गांधी जी ने कहा था कि अब मुझे डरने की बजाए आगे देखकर बढ़ना होगा. हमारी यात्रा ताकत पाने के लिए नहीं बल्कि भारत की आजादी के लिए अहिंसात्मक लड़ाई के लिए है. हिंसात्मक यात्रा में तानाशाही की संभावनाएं ज्यादा होती है जबकि अहिंसा में तानाशाही के लिए कोई जगह ही नही है. एक अहिंसात्मक सैनिक खुद के लिये कोई लोभ नही करता, वह केवल देश की आजादी के लिये ही लड़ता है. कांग्रेस इस बात को लेकर बेफिक्र है की आजादी के बाद कौन शासन करेगा. आजादी के बाद जो भी ताकत आएगी उसका संबंध भारत की जनता से होगा और भारत की जनता ही ये निश्चित करेंगी की उन्हें ये देश किसे सौपना है. हो सकता है कि भारत की जनता अपने देश को पेरिस के हाथों सौंपे. कांग्रेस सभी समुदायों को एक करना चाहती है ना कि उनमें फुट डालकर विभाजन करना चाहती है.

आजादी के बाद भारत की जनता अपनी इच्छानुसार किसी को भी अपने देश की कमान संभालने के लिये चुन सकती है और चुनने के बाद भारत की जनता को भी उसके अनुरूप ही चलना होंगा. मैं जानता हूं कि अहिंसा परिपूर्ण नहीं है और ये भी जानता हूं कि हम अपने अहिंसा के विचारों से फि‍लहाल कोसों दूर है लेकिन अहिंसा में ही अंतिम असफलता नहीं है. मुझे पूरा विश्वास है, छोटे-छोटे काम करने से ही बड़े-बड़े कामों को अंजाम दिया जा सकता है.

गांधी जी ने कार्यसमिति में कहा था कि मेरा इस बात पर भरोसा है कि दुनिया के इतिहास में हमसे बढ़कर और किसी देश ने लोकतांत्रिक आजादी पाने के लिये संघर्ष किया होगा. मेरा इस बात पर पूरा विश्वास है की जब हिंसा का उपयोग कर आजादी के लिये संघर्ष किया जाएगा तब लोग लोकतंत्र के महत्त्व को समझने में असफल होंगे. जिस लोकतंत्र का मैंने विचार कर रखा है, उस लोकतंत्र का निर्माण अहिंसा से होगा, जहां हर किसी के पास समान आजादी और अधिकार होंगे. जहां हर कोई खुद का शिक्षक होंगा और इसी लोकतंत्र के निर्माण के लिए आज मै आपको आमंत्रित करने आया हूं. एक बार यदि आपने इस बात को समझ लिया तब आप हिंदू और मुस्लिम के भेदभाव को भूल जाओगे. तब आप एक भारतीय बनकर खुद का विचार रखोगे और आजादी के संघर्ष में साथ दोगे.

गांधी जी यह विचार भी बेहद महत्‍वपूर्ण था कि कुछ लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद और ब्रिटिश लोगों के बीच के अंतर को भूल चुके है. उन लोगों के लिए दोनों ही एक समान है. उनकी यह घृणा जापानियों को आमंत्रित कर रही है. यह काफी खतरनाक होगा. इसका मतलब वे एक गुलामी की दूसरी गुलामी से अदला बदली करेंगे. हमें इस भावना को अपने दिलो दिमाग से निकाल देना चाहिए. हमारा झगडा ब्रिटिश लोगों के साथ नही हैं बल्कि हमें उनके साम्राज्यवाद से लड़ना है. ब्रिटिश शासन को खत्म करने का मेरा प्रस्ताव गुस्से से पूरा नही होने वाला. हम हमारे महापुरुषों के बलिदानों को नही भूल सकते हैं. मैं जानता हूं की ब्रिटिश सरकार हमसे हमारी आजादी छीन नहीं सकती लेकिन आजादी के लिए हमें एकजुट होना होगा. हमें खुद को घृणा से दूर रखना चाहिए.

इस तरह भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई. पूरे देश ने ही गांधी जी के आह्वान को स्‍वीकार किया और अंतत: ब्रिटिश सरकार को देश छोड़ना पड़ा। लेकिन जाते-जाते वे घृणा और विद्वेष का ऐसा बीज बो गए जिसने देश को विभाजन की कगार पर पहुंचा दिया.

(न्‍यूज 18 पर 9 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित) 

Sunday, August 6, 2023

हिरोशिमा दिवस 2023: जापान और ओपेनहाइमर के सबक को भूला बैठी दुनिया

 

यह 1945 की बात है. 6 अगस्त 1945 की सुबह. वह सुबह जापान के शहर हिरोशिमा में रोज की तरह थी. मगर कुछ घंटों बाद यह सुबह और शहर दोनों ही दुनिया के सबसे त्रासद वक्‍त में तब्‍दील हो गए. मारियाना द्वीप से उड़ान भरकर पहुंचे अमेरिकी विमान ने जापान के इस शहर पर परमाणु बम गिरा दिया. यह दुनिया का पहला परमाणु बम विस्‍फोट था. 10 सेकंड में खुशहाल हिरोशिमा आग के शहर में बदल गया. 70,000 से अधिक लोग भस्‍म हो गए. दुनिया के इस कोने में मानवता का चीत्‍कार रही थी तो अमेरिका में बैठे रॉबर्ट ओपेनहाइमर जरूर खुश हुए होंगे. लेकिन अपने बम की सफलता की यह खुशी लाखों प्राणियों और प्रकृति के उजाड़ होने पर टिकी थी. कितने दिन टिकी रहती? वे कुछ ही समय में ग्‍लानि से भर गए और जब राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन से मिले तो ग्‍लानि में कहा मेरे हाथ खून से रंगे हुए हैं.

6 अगस्‍त को हिरोशिमा दिवस है और हिरोशिमा को तबाह करने वाला परमाणु बम बनाने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपेनहाइमर पर बनी फिल्‍म सफलता के कीर्तिमान छू रही है. इस बहाने से दोनों पर बात की जा सकती है और इस निष्‍कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि आविष्‍कार कितना ही अच्‍छा क्‍यों न हो यदि उसका उपयोग मानवता, प्रकृति और मूल्‍यों के खिलाफ हुआ है तो वह निकृष्‍टतम है.

जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर का जन्म न्यूयॉर्क में 22 अप्रैल 1904 को हुआ था. महज 9 साल की उम्र से वह अलग-अलग भाषाओं के साहित्य पढ़ने लगे. विज्ञान में रूचि ने उन्‍हें वैज्ञानिक बना दिया. 1939 में जब दूसरा विश्‍व युद्ध शुरू हुआ तो सेकंड्स में विध्‍वंस के ख्‍याल ने जोर पकड़ा और इस दौड़ में आगे निकलने के लिए परमाणु बम की कोशिशें तेज हो गईं.

1942 में अमेरिका ने मैनहट्टन जिले में परमाणु बम बनाने का कार्य ‘मैनहट्टन प्रोजेक्ट’ के नाम से शुरू किया. इस प्रोजेक्‍ट का नेतृत्‍व वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने किया. वैज्ञानिकों की रात दिन की मेहनत का परिणाम था कि तीन साल बाद अमेरिका परमाणु बम के पहले परीक्षण में सफल हुआ. 16 जुलाई 1945 की सुबह दुनिया का पहला परमाणु बम परीक्षण हुआ.

इस परीक्षण के 22वें दिन अमेरिका ने जापान को कमजोर करने के लिए हिरोशिमा पर पहला परमाणु बम गिरा दिया. असल में, 1939 में शुरू हुए दूसरे विश्व युद्ध को छह साल हो चुके थे, लेकिन लड़ाई का अंत नजर नहीं आ रहा था. युद्ध में अमेरिका लगातार जापान पर बम गिरा रहा था. अगस्त 1945 तक अमेरिकी द्वारा की गई बममारी से 3 लाख से ज्‍यादा लोगों ने अपना जीवन खो दिया था. जापान लगातार हमले कर रहा था तब अमेरिका ने ये मान लिया कि सिर्फ पारंपरिक बमबारी के जरिए जापान झुकने वाला नहीं है तो जापान को क्षण में ध्‍वस्‍त करने के लिए परमाणु बम गिरा दिया.

हिरोशिमा पर हमले के तीसरे दिन अमेरिका ने 9 अगस्त 1945 की सुबह 11 बजे जापान के नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया था. हजारों लोगों की जान एक क्षण में चली गई और भारी क्षति उठा कर जापान ने झुकना स्‍वीकार कर लिया. अमेरिका का प्रभुत्‍व स्‍थापित हुआ और दूसरा विश्व युद्ध समाप्‍त हुआ. परमाणु हमले के कई सालों बाद तक जापान के इन शहरों के आसपास के शहरों में परमाणु विकिरण के कारण दिव्‍यांग बच्चे पैदा होते रहे.

परमाणु विभीषिका झेलने के बाद जापान ने परमाणु शक्ति के शांतिपूर्ण इस्तेमाल और कभी परमाणु बम नहीं बनाने का संकल्प लिया, लेकिन दुनिया के तमाम दूसरे देशों ने परमाणु ताकत जुटाने की होड़ जगजाहिर है. 2020 में दुनियाभर में 3,720 परमाणु बम तैनात थे. 2021 में ये बढ़कर 3,825 हो गए थे. मतलब दुर्भाग्‍य से अब जो भी हिरोशिमा-नागासाकी होगा वह अधिक तबाही का गवाह बनेगा.

अब बात करते हैं ओपेनहामइर की. परमाणु बम से हुई मानवता की क्षति का दोष ओपेनहाइमर ने स्‍वयं पर लिया. इस आत्‍मग्‍लानि से उभरने में ‘भगवद् गीता’ उनका संबल बनी. उन्होंने एक बार कहा था कि परमाणु बम बनाते समय नतीजों को सोचकर जब वह डर जाते थे तो उनकी उलझन गीता से कम हो जाती थी. गीता में लिखी इस बात ने उन्हें काफी प्रोत्साहित किया कि- ‘कर्म किए जाओ फल की चिंता मत करो.’

संदर्भ बताते हैं कि 1929 में ओपेनहाइमर जब अपने देश अमेरिका लौटे तो वह साहित्य और दर्शन की किताबें पढ़ने लगे थे. इसी समय उन्होंने भगवद् गीता भी पढ़ी थी. ओपेनहाइमर गीता पढ़कर काफी प्रभावित हुए थे. वह मानते थे कि इस किताब से उन्हें दार्शनिक सोच की बुनियाद मिली थी. वह जब भी उलझन में होते थे तो इससे उन्हें शांति मिलती थी.

तथ्‍य यह भी कि परमाणु हमले के बाद जब अमेरिकी राष्ट्रपति के बुलावे पर ओपेनहाइमर उनसे मिलने राष्ट्रपति भवन गए तो ओपेनहाइमर ने राष्‍ट्रपति से कहा था कि वे महसूस करते हैं कि उनके हाथ खून से रंगे हुए हैं. हालांकि, राष्‍ट्रपति को उनकी यह बात पसंद नहीं आई और ओपेनहाइमर को कमजोर व भावनात्‍मक इंसान करार दे दिया गया. ओपेनहाइमर लगातार अमेरिकी सरकार के कदम का पुरजोर विरोध करते रहे.

ओपेनहाइमर को सरकार के खिलाफ जाने की सजा मिली. 1954 में उन पर सोवियत रूस का जासूस होने का आरोप लगा. अमेरिकी सरकार ने उन्हें सिक्योरिटी क्लियरेंस अप्रूवल देने से मना कर दिया. उन्हें देश के टॉप साइंटिस्ट की लिस्ट से ब्लैकलिस्ट कर दिया गया. ओपेनहाइमर की बाकी की जिंदगी देशद्रोही और गद्दार के लांछन के साथ बीती.

18 फरवरी 1967 को प्रिंसटन स्थित घर में गले के कैंसर से ओपेनहाइमर की मौत हो गई. मृत्यु से ठीक पहले 1966 में तत्‍कालीन राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन उन्हें एटॉमिक एनर्जी कमीशन का सर्वोच्च सम्मान एनरिको फर्मी अवॉर्ड से सम्मानित किया. आखिरकार ओपेनहाइमर के निधन के 55 साल बाद 2022 में अमेरिकी सरकार ने उनकी वफादारी पर मुहर लगाते हुए उनका सिक्योरिटी क्लियरेंस बहाल किया.

परमाणु बम के निर्माता ओपेनहाइमर और परमाणु बम के विध्‍वंस को झेल चुके जापान ने तो इसके विनाश को पहचाना और सबक लिए. गीता के मार्ग को हर कर्म का स्‍वीकृति मान लेना हमारी समझ का दोष हो सकता है, गीता दर्शन का नहीं। गीता हमें आत्‍म बंधन से मुक्‍त होना सीखाती है, तभी कहती है कर्म करो फल की चिंता न करो, लेकिन वह फल आपके हिस्‍से का परिणाम नहीं है, उस फल या परिणाम की चिंता तो करनी चाहिए जो मानवता के हिस्‍से में आता है.


(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 

Monday, July 31, 2023

प्रेमचंद: हिंदी वाले इन्‍हीं की बदौलत दूसरी भाषा वालों के सामने इठला सकते हैं

 साहित्य का प्रभाव चरित्र पर बहुत पडता है. साहित्य का उद्देश्य ही चरित्र का निर्माण है, इसलिए इस काम में अपने आदर्शी और उद्देश्यो को पवित्र रखना चाहिए. मुंशी प्रेमचंद ने यह बात एक पत्र में साहित्‍यकार-संपादक बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखी थी. कमोबेश यही बात प्रेमचंद ने पत्रकार-कहानीकार प्रभाकर माचवे को भी लिखते हुए कहा था कि कहानी वही श्रेष्‍ठ जिसका कोई उद्देश्‍य हो. बिना समाज को संदेश दिए लिखा गया साहित्‍य कितना भी श्रेष्‍ठ क्‍यों न हो, अच्‍छा नहीं कहा जा सकता है.

अपनी इस कसौटी पर साहित्‍य रचने वाले मुंशी प्रेमचंद लेखन के लिहाज से अपने समय से आगे थे और आज भी अधिक प्रासंगिक मालूम होते हैं. उनकी रचनाओं को पढ़ कर लगता ही नहीं है ये रचनाएं सौ साल पहले लिखी गई थीं. हमें यूं लगता है जैसे ये हमारे समय में ही लिखी गई हैं, हमारा वह समय जब नैतिकता, मूल्‍यों और मानवता का ह्रास हो रहा है. मुंशी प्रेमचंद के नाम से मशहूर साहित्‍यकार का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव है. 31 जुलाई 1880 को उत्‍तर प्रदेश के लमही में जन्‍मे प्रेमचंद का देहांत 8 अक्टूबर 1936 को हुआ. वर्ष 1901 से ही प्रेमचंद की साहित्यिक यात्रा आरंभ हो गई थी. शुरुआत में वो नवाब राय के नाम से उर्दू में लिखा करते थे. उनका पहला उर्दू उपन्यास “असरारे मआबिद” है यह धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ. 1908 में प्रकाशित पहला कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण था. अंग्रेज सरकार ने इस संग्रह को प्रतिबंधित कर सभी प्रतियां जब्त कर ली थीं.

उन्‍हें भविष्य में न लिखने की हिदायत दी गई थी. यही कारण है कि उन्‍होंने अपना नाम बदल कर प्रेमचंद रख लिया था. 1918 में उनका पहला उपन्यास ‘सेवासदन’ प्रकाशित हुआ. लोकप्रिय हुए इस उपन्‍यास के बाद वे उर्दू के बाद हिंदी में समान रूप से ख्‍यात हो गए. प्रेमाश्रम, रंगभूमि, सेवासदन, निर्मला, कर्मभूमि, गोदान, गबन उपन्यास और पूस की रात, बड़े घर की बेटी, कफन, पंच परमेश्वर, दो बैलों की कथा, बूढी काकी जैसी कहानियां प्रेमचंद के रचना संसार की प्रतीक रचनाएं हैं.

ऐसी रचनाएं जिनके संदर्भ में साहित्‍यकार बनारसी दास चतुर्वेदी ने कहा है कि हिंदी वाले उन्हीं की बदौलत आज दूसरी भाषा वालों के सामने मूंछों पर ताव दे सकते हैं. यद्यपि इस बात में संदेह है कि प्रेमचंद हिंदी भाषा-भाषी जनता में कभी उतने लोकप्रिय बन सकेंगे जितने कविवर मैथिलीशरण जी हैं. पर प्रेमचंद के सिवा भारत की सीमा उल्लंघन करने की क्षमता रखने वाला कोई दूसरा हिंदी कलाकार इस समय हिंदी जगत में विद्यमान नहीं. लोग उनको उपन्यास सम्राट कहते हैं, पर कोई भी समझदार आदमी उनसे दो ही मिनट बातचीत करने के बाद समझ सकता है कि प्रेमचंद में साम्राज्यवादिता का नामोनिशान नहीं है. कद के छोटे है, शरीर निर्बल-सा है. चेहरा भी कोई प्रभावशाली नहीं और श्रीमती शिवरानी देवी हमें क्षमा करें, यदि हम कहे कि जिस समय ईश्वर के यहां शारीरिक सौंदर्य बंट रहा था. प्रेमचंद जरा देर से पहुंचे थे. पर उनकी उन्मुक्त हंसी की ज्योति पर, जो एक सीधे-सादे सच्चे स्नेहमय हृदय से ही निकल सकती है, कोई भी सहदया सुकुमारी पतंगवत अपना जीवन निछावर कर सकती है.

प्रेमचंद का संपूर्ण जीवन साहित्‍य को समर्पित था. उन्‍होंने खूब लिखा, तमाम विपरीत परिस्थि‍तियों में भी ‘हंस’ का संपादन किया. लेकिन इस संघर्षों तथा विपरीत स्थितियों का स्‍वयं के व्‍यक्तित्‍व पर असर नहीं पड़ने दिया. बनारसी दास चतुर्वेदी अपने संस्‍मरण में लिखते हैं, प्रेमचंदजी ने बहुत से कष्ट पाए हैं, अनेक मुसीबतों का सामना किया है, पर उन्होंने अपने हृदय में कटुता को नहीं आने दिया. वे शुष्क बनियापन से कोसों दूर रहे. प्रेमचंदजी में सबसे बड़ा गुण यही है कि उन्हें धोखा दिया जा सकता है. जब इस चालाक साहित्य-संसार में बीसियों आदमी ऐसे पाए जाते हैं, जो दिन-दहाड़े दूसरों को धोखा दिया करते हैं, प्रेमचंदजी की तरह के कुछ आदमियों का होना गनीमत है. उनमें दिखावट नहीं, अभिमान उन्हें छू भी नहीं गया और भारत व्यापी कीर्ति उनकी सहज विनमता को उनसे छीन नहीं पाई.

प्रख्‍यात लेखिका महादेवी वर्मा ने लिखा है, प्रेमचंद के व्यक्तित्व में एक सहज संवेदना और ऐसी आत्मीयता थी. जिस युग में उन्होंने लिखना आरंभ किया था, उस समय हिंदी कथा-साहित्य जासूसी और तिलस्मी कौतूहली जगत में ही सीमित था. उसी बाल-सुलभ कुतूहल में प्रेमचंद उसे एक व्यापक धरातल पर ले आए, जो सर्व सामान्य था. उन्होंने साधारण कथा, मनुष्य की साधारण घर-घर की कथा, हल-बैल की कथा, खेत-खलि-हान की कथा, निर्झर, वन, पर्वतों की कथा सब तक इस प्रकार पहुंचाई कि वह आत्मीय तो थी ही, नवीन भी हो गई.

प्रेमचंद के जीवन संघर्षों को कई साहित्‍यकारों ने करीब से देखा है और उनके व्‍यक्तित्‍व के प्रति आदर व्‍यक्‍त किया है. महादेवी वर्मा अपने संस्‍मरण में यही बात रेखांकित करती हैं. वे लिखती हैं कि प्रेमचंद ने जीवन के अनेक संघर्ष झेले और किसी संघर्ष में उन्होंने पराजय की अनुभूति नहीं प्राप्त की. पराजय उनके जीवन में कोई स्थान नहीं रखती थी. संघर्ष सभी एक प्रकार से पथ के बसेरे के समान ही उनके लिए रहे. वह उन्हें छोड़ते चले गए. ऐसा कथाकार जो जीवन को इतने सहज भाव से लेता है, संघर्षों को इतना सहज मानकर, स्वाभाविक मानकर चलता है, वह आकर फिर जाता नहीं. उसे मनुष्य और जीवन भूलते नहीं. वह भूलने के योग्य नहीं है. उसे भूलकर जीवन के सत्य को ही हम भूल जाते हैं. जिस पर उन्होंने विश्वास किया, जिस सत्य को उनके जीवन ने, आत्मा ने स्वीकार किया उसके अनुसार उन्होंने निरंतर आचरण किया. इस प्रकार उनका जीवन, उनका साहित्य दोनों खरे स्वर्ण भी हैं और स्वर्ण के खरेपन को जांचने की कसौटी भी है.

काम के प्रति प्रेमचंद का आग्रह कैसा था, यह बनारसीदास चतुर्वेदी के संस्‍मरण से ही समझा जा सकता है. वे लिखते हैं, यदि प्रेमचंद को अपनी डिक्टेटर शिवरानी देवी का डर न रहे तो वे चौबीस घंटे यही निष्काम कर्म कर सकते हैं. एक दिन बात करते-करते काफी देर हो गई घड़ी देखी तो पता लगा कि पौन दो बजे हैं. रोटी का वक्त निकल चुका था. प्रेमचंद ने कहा ‘खैरियत यह है कि घर में ऊपर घड़ी नहीं है, नहीं तो अभी अच्छी खासी डांट सुननी पड़ती. घर में एक घड़ी रखना, और सो भी अपने पास बात सिद्ध करती है कि पुरुष यदि चाहे तो स्त्री से कहीं अधिक चालाक बन सकता है और प्रेमचंद में इस प्रकार का चातुर्य बीजरूप में तो विद्यमान है ही.

बकौल बनारसीदास चतुर्वेदी प्रेमचंद में मानसिक स्फूर्ति चाहे कितनी ही अधिक मात्रा में क्यों न हो, शारीरिक फुर्ती का प्रायः अभाव ही है. यदि कोई भला आदमी प्रेमचंद तथा कथाकार सुदर्शन को एक मकान में बंद कर दे तो सुदर्शन तिकड़म भिड़ाकर छत से नीचे कूद पड़ेंगे और प्रेमचंद वही बैठे रहेंगे. यह दूसरी बात है कि प्रेमचंद वहां बैठे-बैठे कोई गल्प लिख डालें. जम के बैठ जाने में ही प्रेमचंद की शक्ति और निर्बलता का मूल स्रोत छिपा हुआ है. प्रेमचंद ग्रामों में जमकर बैठ गए और उन्होंने अपने मस्तिष्क के सुपरफाइन कैमरे से वहां के चित्र-विचित्र जीवन का फिल्म ले लिया.

जीवित रहते हुए भी प्रेमचंद के नाम के साथ विवाद जुड़े थे, खासकर हंस के प्रकाशन के दौरान. उनके निजी जीवन पर भी तंंज किए गए.  आज भी प्रेमंचद और उनके साहित्‍य को तरह-तरह की दृष्टि से देखा जा रहा है. उनकी आलोचना की जा रही है मगर जो उन्‍होंने जिया और रचा है, वह आज के समय में भी एक व्‍यक्ति को ठीक एक समूह के बस की भी बात नहीं है. इसीलिए प्रेमचंद का लिखा हमें पसंद आता है.


(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 

Thursday, July 27, 2023

मिसाइल मैन डॉ. कलाम: एक ब्रेक ने दूर कर दी थी अग्नि मिसाइल परीक्षण की घबराहट

वह 27 जुलाई 2015 की शाम थी. भारत के पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग में व्याख्यान दे रहे थे. इस दौरान उन्हें जोरदार कार्डियक अरेस्ट हुआ और वे बेहोश हो कर गिर पड़े. यह दिल का दौरा इतना ताकतवर था कि उन्‍हें बचाया नहीं जा सका. जीवन भर अपने कार्य के प्रति समर्पित और निष्‍ठावान रहे डॉ. कलाम का इस तरह सक्रिय रहते हुए निधन भी जैसे उनकी कर्मठता का अभिनंदन था. डॉ. कलाम को प्रोजेक्ट डायरेक्टर के रूप में भारत का पहला स्वदेशी उपग्रह (एस.एल.वी. तृतीय) प्रक्षेपास्त्र बनाने का श्रेय हासिल है. कलाम ने ही पोखरण में दूसरी बार परमाणु परीक्षण कर देश को परमाणु हथियार निर्माण की क्षमता दिलवाई. वे ऐसे तीसरे राष्ट्रपति हैं जिन्हें भारत रत्न से सम्‍मानित किया गया.

15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु में रामेश्वरम के धनुषकोडी गांव में जन्‍मे डॉ. कलाम का जीवन आसान नहीं रहा. मध्‍यमवर्गीय संयुक्‍त परिवार में जन्‍मे अबुल पाकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम के भारत रत्‍न डॉ. एपीजे अब्‍दुल कलाम बनने तक के सफर में अनेक मील के पत्‍थर हैं जो हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत हो सकते हैं. इस सफलता के पीछे के कारकों को उन्‍होंने अपनी पुस्‍तक ‘द ट्री लाइफ’ में दर्ज किया है. ‘क्या मैं अकेला हूं’ शीर्षक से वे लिखते हैं:

मैं और मेरे मित्र प्रो. विद्यासागर हवाई जहाज से हैदराबाद से दिल्ली आ रहे थे. हमारा हवाई जहाज घने बादलों में परत-दर-परत ऊपर उठता हुआ ऊंची उड़ान भर रहा था. उस अद्भुत दृश्य ने हमारी अंतरात्मा को झकझोर दिया. उसके बाद, एक दिन हम एशियाड विलेज कांप्लैक्स के बागीचे में घूम रहे थे तो वहां फूलों से लदे हुए नागफनी के खूबसूरत पौधे ने एक ईश्वरीय अनुभव से हमारी आत्मा को भिगो दिया और मुझे ‘जीवन वृक्ष’ लिखने के लिए प्रेरित किया.

सांप्रदायिक सोच हमारे देश में हमेशा से एक मसला रही है. इस सोच देश को कई हिस्‍सों में बांट दिया है. मुस्लिम परिवार में जन्‍मे डॉ. कलाम का भी इस सोच से सामना हुआ होगा. उन्‍होंने ऐसे मामलों पर अपने अनुभव को यूं लिखा है:

जब भी मैं सांप्रदायिकता और सामाजिक असमानता की बातें सुनता हूं तो मुझे रामेश्वरम् के अपने प्राइमरी स्कूल की एक घटना तुरंत याद आ जाती है. मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ता था. हमें पढ़ाने के लिए स्कूल में एक नए शिक्षक आए थे. मैं हमेशा अपने परम मित्र रामनाथन के साथ सबसे आगे की पंक्ति में बैठा करता था. नए शिक्षक एक ब्राह्मण और एक मुसलिम विद्यार्थी का कक्षा में एक साथ बैठना समझ न सके. शिक्षक ने अपनी समझ से सामाजिक व्यवस्था का पालन करते हुए मुझे पीछे के बेंच पर बैठने के लिए कहा. मुझे यह सुनकर बहुत क्रोध आया और मेरा मित्र रामनाथन भी इससे बहुत विचलित हुआ. मैं आगे से उठकर आखिरी बेंच पर जा बैठा. यह देखकर रामनाथन ने रोना शुरू कर दिया. रामनाथन का रोता चेहरा मुझे आज भी याद है. हमारे पिता और परिजनों को जब इस घटना के बारे में पता चला तो अध्यापक को बुलाकर समझाया गया कि उन्होंने बहुत घृणित कार्य किया है. लगभग 50 वर्ष पूर्व, हमारे परिजनों के मजबूत विश्वास ने उस अध्यापक के विचार बदल दिए.

फिर जब देश आजाद हुआ तब भी सांप्रदायिक दंगों ने बाल मन को प्रभावित किया था. उस दौरान महात्‍मा गांधी भूमिका पर किशोर अब्‍दुल कलाम क्‍या सोचते थे, यह यूं व्‍यक्‍त हुआ है:

15 अगस्त, 1947 को हमारे हाई स्कूल के अध्यापक श्रद्धेय अय्यादुरै सोलेमन मुझे पं. जवाहरलाल नेहरू की मध्य रात्रि में दी जानेवाली स्वतंत्रता दिवस की तकरीर सुनाने के लिए ले गए. उन दिनों सभी घरों में रेडियो नहीं हुआ करते थे. नेहरूजी की तकरीर ने हमें द्रवित कर दिया. अगली सुबह सभी समाचार पत्रों ने इस महत्त्वपूर्ण घटना को अपना मुख्य समाचार बनाया. परंतु साथ ही एक अन्य समाचार भी छपा था, जो आज भी मेरी स्मृति में ताजा है. यह था कि कैसे सांप्रदायिक दंगों से पीडित परिवारों का कष्ट दूर करने के लिए गांधीजी नंगे पाँव नौआखली में घूम रहे थे. साधारणतः राष्ट्रपिता होने के नाते महात्मा गांधी को उस समय सत्ता हस्तांतरण और राष्ट्रीय ध्वज को फहराना देखने के लिए राजधानी में होना चाहिए था. जबकि वे उस समय नौआखली में थे, यही महात्मा की महानता थी. इसने मेरे हृदय पर एक अमिट छाप छोड़ी.

जमीन से जमीन पर मार करने वाली अग्नि मिसाइल और पृथ्वी मिसाइल का सफल परीक्षण का श्रेय डॉ. कलाम को जाता है. उन्‍होंने स्‍वदेशी तकनीक से अग्नि मिसाइल का निर्माण किया था. क्‍या आप जानते हैं, आयुध क्षमता निर्माण व विकास में जुटे वैज्ञानिक डॉ. कलाम को प्रकृति ने सदैव प्रेरणा दी है. यानी शस्‍त्रों की मारकता के पीछे फूलों सी सुकोमल सोच की शक्ति थी. हथियारों के बुद्धिमत्‍तापूर्ण और संयमित उपयोग के लिए यह एक तरह का संदेश है. डॉ. कलाम लिखते हैं:

पिछले अनेक वर्षों से हम मध्यम दूरी की जिस अग्नि मिसाइल पर कार्य करते आ रहे थे उसे प्रक्षेपण के लिए चांदीपुर में प्रक्षेपण स्थल पर स्थापित कर दिया गया था. हमें अगले दिन उसका प्रक्षेपण करना था. मैं प्रक्षेपण स्थल से लांच ऑथोराइजेशन बोर्ड के लिए कंट्रोल सेंटर जा रहा था. मैं विचारमग्न था क्योंकि हमारे पिछले दो प्रयासों के दौरान प्रक्षेपण प्रतिक्रिया में कुछ गड़बड़ी पैदा हो गई थी. हालांकि हम काफी संतुष्ट थे कि हम मिसाइल को सुरक्षित रखने में सफल हुए थे. तभी कार की खिड़की से मैंने बाहर देखा और मेरी नजर सड़क के साथ-साथ बने तालाबों में खिली रंग-बिरंगी कुमुदनियों पर पड़ी. सुबह-सवेरे की ठंडी मनमोहक हवा के साथ इधर-उधर डोल रही इन कुमुदनियों का नृत्य देखने के लिए मैं कार से उतर पड़ा. इस अल्पविश्राम ने मुझे शांति प्रदान की और मैं तनाव मुक्त हो गया. एक बार फिर मैं चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार था. अगले दिन अग्नि को छोड़ा गया और शेष तो अब इतिहास है.

यह ऐतिहासिक कार्य करने वाले वैज्ञानिक किस मानसिक और भावनात्‍मक दौर से गुजरते हैं यह हमें पता ही नहीं होता है. देश के वैज्ञानिकों और उनके परिजनों के समर्पण और संघर्ष को डॉ. कलाम ने यूं बताया है:

अग्नि के सफल परीक्षण ने पूरे देश को उल्लासित कर दिया था. अग्नि के निर्माण के समय एक घटना घटी. अग्नि के निर्माण कार्य में लगे होने के कारण लगभग चालीस दिन से अपने घर-परिवार से दूर एक वैज्ञानिक ने, जो इस कार्य में विशेष निपुण है, अपने घरवालों का कुशलक्षेम जानने के लिए उन्हें हैदराबाद फोन किया. उनकी पत्नी ने फोन उठाया, पर ज्यादा बात न कर फोन उनके पिता को थमा दिया. पिता ने उनसे बातचीत की और उन्हें आश्वस्त किया कि वे सब हैदराबाद में कुशल से हैं और जानना चाहा कि वह कब घर लौट रहे हैं. कुछ दिन बाद अग्नि के सफल प्रक्षेपण के पश्चात् जब वे लौटे तो पत्नी को रोते हुए देख काफी व्याकुल हुए. तब उन्हें पता चला कि एक सप्ताह पूर्व उनकी पत्नी के भाई की एक दुर्घटना में असमय मृत्यु हो गई थी. अग्नि-निर्माण के कार्य में बाधा न पड़े, यह सोचकर घरवालों ने उन्हें यह खबर नहीं दी थी. ऐसे परिवारों को मैं झुककर सलाम करता हूं.

जब हम सफल होते हैं तो हमें अपने माता-पिता, अपने शिक्षक, अपने मित्र, प्रेरणास्रोत याद आते हैं. अपनी सफलता में इन सभी का योगदान होता है. ‘अम्मी-अब्बा मैं आपका शिशु’ शीर्षक में डॉ. कलाम लिखते हैं:

1990 के गणतंत्र दिवस के दिन मुझे एक सुखद समाचार मिला. भारत के राष्ट्रपति ने मुझे पद्मविभूषण से सम्मानित किया है. इस खुशी के मौके पर मैंने अपना कमरा संगीतमय वातावरण से भर दिया और वह संगीत मुझे किसी अन्य देश और काल में ले गया. मैं पुरानी यादों में खो गया. अपने कल्पना लोक में घूमता हुआ मैं रामेश्वरम् पहुंचा और अपनी मां के गले जा लगा. मेरे पिता मेरे बाल अपने हाथों से संवार रहे थे. मस्जिद वाली सड़क पर इकट्ठी हुई भीड़ को जलालुद्दीन ने यह समाचार दिया. लक्ष्मण शास्त्री ने मेरे माथे पर तिलक लगाया. फादर सोलोमन ने अपने पवित्र क्रॉस के लॉकेट पर हाथ रखकर मुझे आशीर्वाद दिया. मैंने प्रो. विक्रम साराभाई को मुस्कराते हुए देखा. बीस साल पहले उनके लगाए बिरवे में फल आ गए थे. मेरा हृदय कृतज्ञता से भर गया.


 (न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)