Saturday, August 12, 2023

हमारी धर्म, संस्‍कृति, कला के प्रतीकों तक सिमट कर न रह जाएं हाथी

हाथी यानी गजराज हमारे इको सिस्‍टम का बेहद महत्‍वपूर्ण कड़ी है. यह हमारी पौराणिक आख्‍यानों, लोक कला और कथाओं, हमारी संस्‍कृति और साहित्‍य का अभिन्‍न हिस्‍सा है. प्रथम पूज्‍य कहे गए गणेश का रूप है गजानन. धैर्य और विवेक का प्रतीक ऐरावत हाथी देवराज इंद्र का वाहन है और ऐरावत समुद्र मंथन में से निकले 15 रत्‍नों में से 5 वां रत्‍न है. गीता में श्री कृष्‍ण कहते हैं कि वे हाथियों में ऐरावत हैं. सौंदर्य की प्रशंसा में नायिका गजगामिनी संबोधित की गई है. हिंदू धर्म में गजलक्ष्‍मी को राजलक्ष्‍मी की संज्ञा दी गई है.

बौद्ध धर्म में हाथी मानसिक दृढ़ता और बुद्ध के गर्भ में आने के प्रतीक हैं. हिंदू मंदिरों और बौद्ध गुफाओं में हाथी उकेरे गए हैं. मध्‍य प्रदेश में भोपाल के पास भीमबेटका गुफाएँ हाथियों की सबसे पुरानी पेंटिंग हैं, जो लगभग 10,000 वर्ष पुरानी बताई जाती हैं. मुंबई के पास घारापुरी द्वीप को एलीफेंटा गुफाओं के नाम से जाना जाता है. हाथी की नक्काशी और अकेली हाथी की मूर्तियां उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर और दक्ष प्रजापति मंदिर जैसे स्‍थलों पर पाई जाती हैं. ‘हस्ती आयुर्वेद’ एक ग्रंथ है जो हाथियों का आयुर्वेद है. इसे गजयुर्वेद या गजचिकित्सा कहा जाता है जो हाथियों की विभिन्न बीमारियों के उपचार की विधियां बताता हैं.

विस्‍तार दिया जाए तो कई संदर्भ और प्रतीक का उल्लेख किया जाएगा. मगर मुद्दा कुछ ओर है. इस सबको बताने के पीछे लक्ष्‍य है कि हाथी यानी गजराज हमारे जीवन का हिस्‍सा रहे हैं, इतना महत्‍वपूर्ण अंग कि उनकी उपस्थिति हमारे धर्म, कला-संस्‍कृति, साहित्‍य व आर्थिकी में विशिष्‍ट रही है. अब भय लग रहा है कि शक्ति, धैर्य, विवेक के प्रतीक गज कहीं वास्‍तव में ही प्रतीक बन कर ही न रह जाएं. इनकी सिमटी संख्‍या यह भय पैदा कर रही है. ये चिंताएं और भय केवल भारत की ही नहीं है बल्कि पूरी दुनिया की हैं. तभी 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय हाथी दिवस मनाया जाता है. यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे धर्म, हमारी कहानियों और हमारे लिए प्रतीक हाथी को बचाने के प्रयास तेज करना है. इस दिन की शुरुआत 2012 में कनाडाई पेट्रीसिया सिम्स और थाईलैंड के एलिफेंट रीइंट्रोडक्शन फाउंडेशन की एचएम क्वीन द्वारा की गई थी. हर साल की तरह 12 अगस्त को एक नई योजना, एक नए रोडमैप के साथ हाथी बचाने की पहल पर बल दिया जाता है. विश्‍व हाथी दिवस 2023 की थीम ‘वन्‍य प्राणियों के अवैध व्‍यापार पर रोक’ लगाना है.

हाथी के संरक्षण की पहल कितनी महत्‍वपूर्ण है यह इस बात से समझा जा सकता है कि हर साल 16 अप्रैल को विश्‍व हाथी बचाओ दिवस मनाया जाता है. कोशिश यही है कि पूरी दुनिया हाथी महत्‍ता को जाने तथा उन्‍हें बचाने के जतन करें. अन्‍य लुप्‍त होते वन्‍य प्राणियों की तरह ही हमारे विकास ने हाथियों के अस्तित्‍व को संकट में डाला है. वनों में बढ़ते अतिक्रमण तथा वन संसाधनों पर शहरी इंसान के कब्‍जे ने वन प्राणियों के लिए खतरा बढ़ा दिया है. इस तरह पिछले कुछ सालों में एशियाई हाथियों का आवास भी कम हुआ और हाथी दांत के लिए हाथियों का शिकार भी खूब हुआ. जरा सर्च करें तो पाएंगे कि 1980 में एशिया में लगभग 93 लाख हाथी थे और अब इनकी संख्‍या लगातार घट रही है. एक साल पहले तक यह संख्‍या कम हो कर 50 हजार तक पहुंच गई है. इनमें से भी 55 फीसदी हाथी यानी 27 हजार हाथी भारत में हैं. भारत में हाथियों के रहवासी स्थल 10 हैं. ये 27 हजार से अधिक हाथी 15 राज्यों में 10 रहवास क्षेत्रों तथा 33 हाथी अभयारण्यों में रहते हैं.

भारत के लिहाज से देखें तो इंसान हाथियों के प्राकृतिक आवास क्षेत्र में बस गए हैं और बेदखल कर दिए गए हाथी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गोवा और मध्य प्रदेश के उन क्षेत्रों चले गए जहां उनका पारंपरिक आवास नहीं है. स्‍वाभाविक है कि इंसान के साथ उनका संघर्ष होगा. अध्‍ययन बताते हैं कि अपने मुख्‍य आहार वाली वनस्‍पतियों के खत्‍म होने के कारण भोजन और पानी की तलाश हाथी एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर पहुंच गए हैं.

अपना प्राकृतिक आवास छिन लिए जाने से हाथी का स्‍वभाव भी बदलता जा रहा है. वे उन स्‍थलों पर ठहर जाते हैं जहां उन्‍हें अपने खाने लायक वनस्‍पति और रहने को जगह मिलती है। छत्‍तीसगढ़ और मध्‍य प्रदेश का सीमावर्ती क्षेत्र हाथियों के इसी बदले स्‍वभाग का गवाह बन रहा है. हाथियों के झुंड के आने से किसानों की फसलें बर्बाद होती है तो उनसे बचने के लिए शोर किया जाता है. और जब किसानों का धैर्य टूटने लगता है तो वे करंट के तार बिछा कर हाथियों को भगाने का जतन करते हैं. नजीतन आंकड़ें बताते हैं कि पिछले दस सालों में करंट लगने के कारण हमारे देश में ही 482 हाथियों की मौत हुई है. पहले हमने पालतू हाथी को अपने महावत के साथ शहरों-गांवों में घूमते देखा है. मगर अब आंकड़ें बताते हैं कि इंसानों और हाथियों के संघर्ष में अधिकांश जान महावत की जाती है. वह महावत जो हाथी के साथ सबसे ज्‍यादा समय गुजारता है. इसका कारण यह है कि महावतों को हाथी के साथ रहने या उसे पालने का कुशल पता नहीं होता. हाथी के पालन और देखरेख का कौशल समय के साथ लुप्‍त होता जा रहा है.

हाथी के संरक्षण की फिक्र कर रहे प्रकृति प्रेमी पिछले दिनों सरकार के उस निर्णय से चिंतित हो गए है जिसमें वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलिफैंट को एक कर दिया है. अब दोनों प्रोजेक्‍ट ‘प्रोजेक्ट टाइगर एंड एलिफैंट डिवीजन’ नामक नए डिवीजन के तहत मिला दिया गया है. यह प्रस्‍ताव 2011 में भी लाया गया था. तब राष्ट्रीय वन्यजीव स्थायी समिति के विशेषज्ञों की आपत्तियों के बाद इस प्रस्‍ताव को रोक दिया गया था. अब इसे लागू कर दिया गया है. यह बात अच्‍छी है कि प्रोजेक्‍ट टाइगर ने बेहतर सफलता प्राप्‍त की है और देश में बाघ की तादाद 2010 की 1706 बाघ की तुलना में 2023 में बढ़ कर 3167 हो गई है लेकिन फिक्र तो हाथी की है. चिंता का कारण यह है कि बाघ संरक्षण के लिए धन आवंटन 2018-19 से घट रहा है. अब दोनों प्रोजेक्‍ट को मिला देने से भय है कि हाथी के संरक्षण का पैसा प्रोजेक्ट टाइगर पर खर्च होने लगेगा. धन के बंटवारे में अंतर के अलावा वन्य प्राणी विशेषज्ञों का तर्क है कि बाघ और हाथी दोनों की प्रकृति अलग है और दोनों ही प्रोजेक्ट्स के लक्ष्‍य व चुनौतियां अलग-अलग हैं. उन्हें एक साथ मिला देने से दोनों के ही संरक्षण के प्रयासों को नुकसान पहुंचेगा.

सहअस्तिव के दर्शन को मानने वाले देश भारत में हमें हाथी जैसे बड़े प्राणी के रहने तथा खाने की फिक्र करनी होगी. यह दुर्भाग्‍य है कि वन्‍य प्राणियों को लुप्‍त होने से बचाने के लिए प्रोजेक्‍ट चलाने पड़ रहे हैं लेकिन केवल प्रोजेक्‍ट चलाने और संख्‍या बढ़ा देने से काम नहीं चलेगा. यदि ऐसे प्रोजेक्‍ट सफलता के बाद वन्‍य प्राणी बढ़ते हैं तो उनके जिंदा रहने की फिक्र भी करनी होगी.

(न्‍यूज 18 पर 12 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित) 

Friday, August 11, 2023

राहत इंदौरी: वे होते थे तो बस वे ही होते थे

फूलों की दुकानें खोलो, खुशबु का व्यापार करो

इश्क खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो.

ऐसी शायरी लिखने और उसे पढ़ने के अपने अलहदा अंदाज के कारण मुशायरा लूट लेने वाले शायर राहत इंदौरी अब नहीं हैं. यूट्यूब, फेसबुक, इंस्‍टा और रील्‍स वाली सोशल मीडिया की दुनिया को यह अहसास नहीं है, मगर मुशायरों के श्रोता तो आज अपने महबूब शायर का न होना शिद्दत से महसूस करते हैं. वे उस अंदाज को याद करते हैं जो शायरी को हर्फ से आगे ले जाकर श्रोताओं के अनुभव से जोड़ा देता था. आसमान में देख कर शायरी पढ़ने का वह अंदाज, आवाज में उतार-चढ़ाव का वह जादू और आम शब्‍दों की कारीगरी ऐसी कि वे होते थे तो बस वे ही होते थे.

राहत साहब की याद आने पर इंटरनेट पर पड़े ढ़ेरों वीडियो को देख-सुना जा सकता है मगर देश-दुनिया में मुझ जैसे लाखों श्रोता हैं जो मुशायरों में उनका न होना मिस करते हैं. वे जो हर वाकये पर सोचते हैं कि वे होते को क्‍या लिखते? रंग बदलती दुनिया में नए चेहरे पर उनका तंज क्‍या होता? राजनीति और मोहब्‍बत के रूख पर उनका नया लिखा कैसा होता? साल 2020 में 11 अगस्‍त की वह शाम थी जब राहतें बांटने वाला जिंदादिल शायर इस दुनिया से रूखसत हो गया था. कोरोना से जो हमें गहरे जख्‍म दिए हैं उनमें एक यह जख्‍म भी है.

राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को इंदौर में हुआ था. उनके पिता रफ्तुल्लाह कुरैशी कपड़ा मिल के कर्मचारी थे. परिवार की आर्थिक हालत को देखते हुए राहत ने 10 साल की उम्र में ही उन्होंने साइन बोर्ड बनाने शुरू कर दिए थे. यही वह दौर था जब वे शायरी की ओर आकर्षित हुए. उनके शायर बनने की कहानी भी कई बार बताई गई है. सड़कों पर साइन बोर्ड लिखने का काम था तो जाहिर उनकी लिखावट सुंदर थी. एक मुशायरे के दौरान उनकी मुलाकात मशहूर शायर जां निसार अख्तर से हुई. जां निसार अख्‍तर से ऑटोग्राफ लेते वक्त राहत ने शायर बनने की ख्‍वाहिश जताई तो जां निसार अख्तर ने कहा कि पहले 5 हजार शेर याद कर लें फिर वे खुद ब खुद शायरी लिखने लगेंगे. राहत इंदौरी ने तुरंत बताया कि उन्‍हें 5 हजार शेर तो पहले से ही याद है. इस पर जां निसार अख्तर ने जवाब दिया कि फिर देर किस बात की है, तुम तो शायर हो, संभालो स्टेज.

यह प्रेरणा काम कर गई और वे शायरी करने लगे. साथ ही साथ उन्होंने इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से 1973 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और 1975 में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया.

तमाम बड़े शायरों के बीच राहत इंदौरी ने अपनी लेखनी से ही नहीं बल्कि मुशायरा पढ़ने के अपने अंदाज से भी अपनी खास पहचान बनाई और प्रसिद्धि पाई. उनका अंदाज ऐसा था जैसे वे शायरी नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि एक कुशल पेंटर है जो चित्र बना रहा है. उनके शब्‍द श्रोताओं के ख्‍याल में दृश्‍य बनाने लगते थे. कई लोगों ने राहत इंदौरी के इस अंदाज की नकल करने की कोशिश की लेकिन श्रोताओं ने सभी को नकार दिया. कोई भी उनकी तरह नकल कर शायरी पढ़ता है तो राहत ही याद आते हैं और इस तरह उनकी नकल करने की कोशिश विफल प्रयास साबित होती है.

राहत इंदौरी की शायरी केवल मंच पर ही नहीं पढ़ी गई बल्कि वह कई-कई जगह छापी गई है. विद्यार्थियों ने इस शायरी को जान-समझ कर लिखने के सबक याद किए हैं. देश-दुनिया के मुशायरों और कवि सम्‍मेलनों में उनकी शायरी चाव से सुनी गई तो बॉलीवुड क्‍यों पीछे रहता भला? ‘बेगम जान’, ‘मर्डर’, ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’, ‘मिशन कश्मीर’, ‘इश्क’, ‘घातक’, ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ जैसी ख्‍यात फिल्‍मों के गीत राहत इंदौरी ने लिखे हैं.

हालांकि, राहत इंदौरी ने अपनी शायरी में अपने वक्‍त के मिजाज पर खूब तंज किए हैं. उनकी शायारी सामाजिक, राजनीतिक स्थितियों पर गहरी नजर रखती है फिर भी उर्दू शायरी तो मोहब्‍बत की जुबां है और राहत इंदौरी की शायरी इससे जुदां नहीं है. राहत इंदौरी की पुण्‍यतिथि पर उनकी शायरी के मुख्‍तलिफ रंग को देखना सुकूनबख्‍श काम होगा.

बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने पर

जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं.


उस की याद आई है सांसों जरा आहिस्ता चलो

धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है.


मुंतजि‍र हूं कि सितारों की जरा आंख लगे

चांद को छत पे बुला लूंगा इशारा कर के.


फूंक डालूंगा किसी रोज मैं दिल की दुनिया

ये तिरा खत तो नहीं है कि जिला भी न सकूं.


दोस्ती जब किसी से की जाए

दुश्मनों की भी राय ली जाए.


मैं इंतिजार में हूं तू कोई सवाल तो कर

यकीन रख मैं तुझे ला-जवाब कर दूंगा.


महकती रात के लम्हों नजर रखो मुझ पर

बहाना ढूंढ़ रहा हूं उदास होने का.


कहां हो आओ मिरी भूली-बिसरी यादो आओ

खुश-आमदीद है मौसम उदास होने का.


अभी गनीमत है सब्र मेरा, अभी लबालब भरा नहीं हूं मैं

वो मुझको मुर्दा समझ रहा है, उसे कहो मरा नहीं हूं मैं.


अड़े थे जिद पे के सूरज बनाके छोड़ेंगे

पसीने छूट गए एक दीया बनाने में.


मेरी निगाह में वो शख्स आदमी भी नहीं

जिसे लगा है ज़माना खुदा बनाने में.


ये चंद लोग जो बस्ती में सबसे अच्छे है

इन्ही का हाथ है मुझको बुरा बनाने बनाने.


मैं मर जाऊं तो मेरी एक अलग पहचान लिख देना

लहू से मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना.

(न्‍यूज 18 पर 11 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित) 

Wednesday, August 9, 2023

अगस्‍त क्रांति: गांधी जी रोक दिया था भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के लेने से

9 अगस्‍त भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह ऐतिहासिक दिन है जब देश ने एक हो कर हुंकार भरी थी- क्विट इंडिया, अंग्रेजों भारत छोड़ो. ब्रिटिश साम्राज्‍य को उखाड़ फेंकने की जो कोशिश कई-कई आंदोलनों के जरिए की जा रही थी वह अंतत: उस आंदोलन पर आ कर टिक गई जिसे में अगस्‍त क्रांति कहते हैं. गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा देकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए पूरे भारत के युवाओं का आह्वान किया था.

साल था 1942 और स्‍थान था मुंबई का गोवालिया पार्क जिसे बाद में अगस्‍त क्रांति मैदान नाम दिया गया. इस आंदोलन की नींव 4 जुलाई 1942 को पड़ी थी जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर निर्णय लिया कि कि दूसरे विश्‍व युद्ध के समय किया वादा पूरा नहीं होता है और अंग्रेज भारत छोड़ कर नहीं जाते हैं तो देश भर में नागरिक अवज्ञा आंदोलन किया जाएगा. तथ्‍य बताते हैं कि इस निर्णय पर कांग्रेस में दो मत थे. कांग्रेसी नेता चक्रवर्ती गोपालाचारी इसके पक्ष में नहीं थे. विरोध करते हुए उन्‍होंने पार्टी छोड़ दी. वहीं सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अशोक मेहता और जयप्रकाश नारायण ने इस प्रस्‍ताव का समर्थन किया. मुस्लिम लीग, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा इस आंदोलन में कांग्रेस के साथ नहीं आए.

गांधी जी द्वारा तय दिशा के अनुसार आंदोलन की रूपरेखा बनी और 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू करने का निर्णय ले लिया. 9 अगस्‍त की सुबह से ही कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं मगर गांधी जी के भाषण से मिली ऊर्जा पूरे देश में फैल गई और लगभग पूरे देश ने एक स्‍वर में कहा, अंग्रेजों भारत छोड़ो.कांग्रेस समिति में दिया गया गांधी जी का भाषण इस‍ लिहाज से बेहद महत्‍वपूर्ण है. गांधी जी ने अपने भाषण में कुछ बातें साफ करना चाही थीं और कहा था कि कई लोग मुझसे यह पूछते है की क्या मैं वही इंसान हूं जो मैं 1920 में हुआ करता था, और क्या मुझमे कोई बदलाव आया है. मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि मैं वही मोहनदास गांधी हूं जैसा मैं 1920 में था.

गांधी जी ने 1920 का जिक्र इसलिए किया क्‍योंकि 1 अगस्‍त 1920 को असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ था. इसके पहले 1919 में जलियांवाला बाग हत्‍याकांड हो चुका था. कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 4 सितंबर 1920 को आंदोलन का प्रस्ताव पारित हुआ. जनता से आग्रह किया गया था कि वे स्कूलो, कॉलेजो और न्यायालय न जाएं तथा अंग्रेजों का कर न चुकाएं. सभी अंग्रेज सरकार के साथ असहयोग करें. गांधी जी का मानना था कि यदि असहयोग का ठीक ढंग से पालन किया जाए तो भारत एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त कर लेगा. लेकिन फरवरी 1922 में किसानों के एक समूह ने गौरखपुर जिले के चौरी चौरा में एक पुलिस थाने में आग लगा दी. इस अग्निकांड में कई पुलिस वालों की जान चली गई. हिंसा भड़कने पर गांधी जी ने असहयोग आंदोलन तत्काल वापस लेना पड़ा. उन्होंने जोर दिया कि, ‘किसी भी तरह की उत्तेजना को निहत्थे और एक तरह से भीड़ की दया पर निर्भर व्यक्तियों की घृणित हत्या के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है’.

इसीलिए 1920 का जिक्र कर भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान करते हुए गांधी जी ने साफ किया था कि वे हिंसा से उतनी ही नफरत करता हैं जितनी 1920 में किया करते थे. उन्‍होंने कहा कि मेरे वर्तमान प्रस्ताव और पहले के लेख और स्वभाव में कोई विरोधाभास नही है. मैं चाहता हूं कि आप सभी इस बात को जाने कि अहिंसा से ज्यादा शुद्ध और कुछ नहीं है, इस बात को मैं आज कह भी रहा हूं और अहिंसा के मार्ग पर चल भी रहा हूं. हमारी कार्यकारी समिति का बनाया हुआ प्रस्ताव भी अहिंसा पर ही आधारित है और हमारे आंदोलन के सभी तत्व भी अहिंसा पर ही आधारित होंगे. भगवान ने मुझे अहिंसा के रूप में एक मूल्यवान हथियार दिया है. मैं और मेरी अहिंसा ही आज हमारा रास्ता है. यदि आप में से किसी को भी अहिंसा पर भरोसा नहीं है तो कृपया करके इस प्रस्ताव के लिये वोट ना करें.

‘करो या मरो’ का नारा देते हुए गांधी जी ने कहा था कि अब मुझे डरने की बजाए आगे देखकर बढ़ना होगा. हमारी यात्रा ताकत पाने के लिए नहीं बल्कि भारत की आजादी के लिए अहिंसात्मक लड़ाई के लिए है. हिंसात्मक यात्रा में तानाशाही की संभावनाएं ज्यादा होती है जबकि अहिंसा में तानाशाही के लिए कोई जगह ही नही है. एक अहिंसात्मक सैनिक खुद के लिये कोई लोभ नही करता, वह केवल देश की आजादी के लिये ही लड़ता है. कांग्रेस इस बात को लेकर बेफिक्र है की आजादी के बाद कौन शासन करेगा. आजादी के बाद जो भी ताकत आएगी उसका संबंध भारत की जनता से होगा और भारत की जनता ही ये निश्चित करेंगी की उन्हें ये देश किसे सौपना है. हो सकता है कि भारत की जनता अपने देश को पेरिस के हाथों सौंपे. कांग्रेस सभी समुदायों को एक करना चाहती है ना कि उनमें फुट डालकर विभाजन करना चाहती है.

आजादी के बाद भारत की जनता अपनी इच्छानुसार किसी को भी अपने देश की कमान संभालने के लिये चुन सकती है और चुनने के बाद भारत की जनता को भी उसके अनुरूप ही चलना होंगा. मैं जानता हूं कि अहिंसा परिपूर्ण नहीं है और ये भी जानता हूं कि हम अपने अहिंसा के विचारों से फि‍लहाल कोसों दूर है लेकिन अहिंसा में ही अंतिम असफलता नहीं है. मुझे पूरा विश्वास है, छोटे-छोटे काम करने से ही बड़े-बड़े कामों को अंजाम दिया जा सकता है.

गांधी जी ने कार्यसमिति में कहा था कि मेरा इस बात पर भरोसा है कि दुनिया के इतिहास में हमसे बढ़कर और किसी देश ने लोकतांत्रिक आजादी पाने के लिये संघर्ष किया होगा. मेरा इस बात पर पूरा विश्वास है की जब हिंसा का उपयोग कर आजादी के लिये संघर्ष किया जाएगा तब लोग लोकतंत्र के महत्त्व को समझने में असफल होंगे. जिस लोकतंत्र का मैंने विचार कर रखा है, उस लोकतंत्र का निर्माण अहिंसा से होगा, जहां हर किसी के पास समान आजादी और अधिकार होंगे. जहां हर कोई खुद का शिक्षक होंगा और इसी लोकतंत्र के निर्माण के लिए आज मै आपको आमंत्रित करने आया हूं. एक बार यदि आपने इस बात को समझ लिया तब आप हिंदू और मुस्लिम के भेदभाव को भूल जाओगे. तब आप एक भारतीय बनकर खुद का विचार रखोगे और आजादी के संघर्ष में साथ दोगे.

गांधी जी यह विचार भी बेहद महत्‍वपूर्ण था कि कुछ लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद और ब्रिटिश लोगों के बीच के अंतर को भूल चुके है. उन लोगों के लिए दोनों ही एक समान है. उनकी यह घृणा जापानियों को आमंत्रित कर रही है. यह काफी खतरनाक होगा. इसका मतलब वे एक गुलामी की दूसरी गुलामी से अदला बदली करेंगे. हमें इस भावना को अपने दिलो दिमाग से निकाल देना चाहिए. हमारा झगडा ब्रिटिश लोगों के साथ नही हैं बल्कि हमें उनके साम्राज्यवाद से लड़ना है. ब्रिटिश शासन को खत्म करने का मेरा प्रस्ताव गुस्से से पूरा नही होने वाला. हम हमारे महापुरुषों के बलिदानों को नही भूल सकते हैं. मैं जानता हूं की ब्रिटिश सरकार हमसे हमारी आजादी छीन नहीं सकती लेकिन आजादी के लिए हमें एकजुट होना होगा. हमें खुद को घृणा से दूर रखना चाहिए.

इस तरह भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई. पूरे देश ने ही गांधी जी के आह्वान को स्‍वीकार किया और अंतत: ब्रिटिश सरकार को देश छोड़ना पड़ा। लेकिन जाते-जाते वे घृणा और विद्वेष का ऐसा बीज बो गए जिसने देश को विभाजन की कगार पर पहुंचा दिया.

(न्‍यूज 18 पर 9 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित) 

Sunday, August 6, 2023

हिरोशिमा दिवस 2023: जापान और ओपेनहाइमर के सबक को भूला बैठी दुनिया

 

यह 1945 की बात है. 6 अगस्त 1945 की सुबह. वह सुबह जापान के शहर हिरोशिमा में रोज की तरह थी. मगर कुछ घंटों बाद यह सुबह और शहर दोनों ही दुनिया के सबसे त्रासद वक्‍त में तब्‍दील हो गए. मारियाना द्वीप से उड़ान भरकर पहुंचे अमेरिकी विमान ने जापान के इस शहर पर परमाणु बम गिरा दिया. यह दुनिया का पहला परमाणु बम विस्‍फोट था. 10 सेकंड में खुशहाल हिरोशिमा आग के शहर में बदल गया. 70,000 से अधिक लोग भस्‍म हो गए. दुनिया के इस कोने में मानवता का चीत्‍कार रही थी तो अमेरिका में बैठे रॉबर्ट ओपेनहाइमर जरूर खुश हुए होंगे. लेकिन अपने बम की सफलता की यह खुशी लाखों प्राणियों और प्रकृति के उजाड़ होने पर टिकी थी. कितने दिन टिकी रहती? वे कुछ ही समय में ग्‍लानि से भर गए और जब राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन से मिले तो ग्‍लानि में कहा मेरे हाथ खून से रंगे हुए हैं.

6 अगस्‍त को हिरोशिमा दिवस है और हिरोशिमा को तबाह करने वाला परमाणु बम बनाने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपेनहाइमर पर बनी फिल्‍म सफलता के कीर्तिमान छू रही है. इस बहाने से दोनों पर बात की जा सकती है और इस निष्‍कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि आविष्‍कार कितना ही अच्‍छा क्‍यों न हो यदि उसका उपयोग मानवता, प्रकृति और मूल्‍यों के खिलाफ हुआ है तो वह निकृष्‍टतम है.

जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर का जन्म न्यूयॉर्क में 22 अप्रैल 1904 को हुआ था. महज 9 साल की उम्र से वह अलग-अलग भाषाओं के साहित्य पढ़ने लगे. विज्ञान में रूचि ने उन्‍हें वैज्ञानिक बना दिया. 1939 में जब दूसरा विश्‍व युद्ध शुरू हुआ तो सेकंड्स में विध्‍वंस के ख्‍याल ने जोर पकड़ा और इस दौड़ में आगे निकलने के लिए परमाणु बम की कोशिशें तेज हो गईं.

1942 में अमेरिका ने मैनहट्टन जिले में परमाणु बम बनाने का कार्य ‘मैनहट्टन प्रोजेक्ट’ के नाम से शुरू किया. इस प्रोजेक्‍ट का नेतृत्‍व वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने किया. वैज्ञानिकों की रात दिन की मेहनत का परिणाम था कि तीन साल बाद अमेरिका परमाणु बम के पहले परीक्षण में सफल हुआ. 16 जुलाई 1945 की सुबह दुनिया का पहला परमाणु बम परीक्षण हुआ.

इस परीक्षण के 22वें दिन अमेरिका ने जापान को कमजोर करने के लिए हिरोशिमा पर पहला परमाणु बम गिरा दिया. असल में, 1939 में शुरू हुए दूसरे विश्व युद्ध को छह साल हो चुके थे, लेकिन लड़ाई का अंत नजर नहीं आ रहा था. युद्ध में अमेरिका लगातार जापान पर बम गिरा रहा था. अगस्त 1945 तक अमेरिकी द्वारा की गई बममारी से 3 लाख से ज्‍यादा लोगों ने अपना जीवन खो दिया था. जापान लगातार हमले कर रहा था तब अमेरिका ने ये मान लिया कि सिर्फ पारंपरिक बमबारी के जरिए जापान झुकने वाला नहीं है तो जापान को क्षण में ध्‍वस्‍त करने के लिए परमाणु बम गिरा दिया.

हिरोशिमा पर हमले के तीसरे दिन अमेरिका ने 9 अगस्त 1945 की सुबह 11 बजे जापान के नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया था. हजारों लोगों की जान एक क्षण में चली गई और भारी क्षति उठा कर जापान ने झुकना स्‍वीकार कर लिया. अमेरिका का प्रभुत्‍व स्‍थापित हुआ और दूसरा विश्व युद्ध समाप्‍त हुआ. परमाणु हमले के कई सालों बाद तक जापान के इन शहरों के आसपास के शहरों में परमाणु विकिरण के कारण दिव्‍यांग बच्चे पैदा होते रहे.

परमाणु विभीषिका झेलने के बाद जापान ने परमाणु शक्ति के शांतिपूर्ण इस्तेमाल और कभी परमाणु बम नहीं बनाने का संकल्प लिया, लेकिन दुनिया के तमाम दूसरे देशों ने परमाणु ताकत जुटाने की होड़ जगजाहिर है. 2020 में दुनियाभर में 3,720 परमाणु बम तैनात थे. 2021 में ये बढ़कर 3,825 हो गए थे. मतलब दुर्भाग्‍य से अब जो भी हिरोशिमा-नागासाकी होगा वह अधिक तबाही का गवाह बनेगा.

अब बात करते हैं ओपेनहामइर की. परमाणु बम से हुई मानवता की क्षति का दोष ओपेनहाइमर ने स्‍वयं पर लिया. इस आत्‍मग्‍लानि से उभरने में ‘भगवद् गीता’ उनका संबल बनी. उन्होंने एक बार कहा था कि परमाणु बम बनाते समय नतीजों को सोचकर जब वह डर जाते थे तो उनकी उलझन गीता से कम हो जाती थी. गीता में लिखी इस बात ने उन्हें काफी प्रोत्साहित किया कि- ‘कर्म किए जाओ फल की चिंता मत करो.’

संदर्भ बताते हैं कि 1929 में ओपेनहाइमर जब अपने देश अमेरिका लौटे तो वह साहित्य और दर्शन की किताबें पढ़ने लगे थे. इसी समय उन्होंने भगवद् गीता भी पढ़ी थी. ओपेनहाइमर गीता पढ़कर काफी प्रभावित हुए थे. वह मानते थे कि इस किताब से उन्हें दार्शनिक सोच की बुनियाद मिली थी. वह जब भी उलझन में होते थे तो इससे उन्हें शांति मिलती थी.

तथ्‍य यह भी कि परमाणु हमले के बाद जब अमेरिकी राष्ट्रपति के बुलावे पर ओपेनहाइमर उनसे मिलने राष्ट्रपति भवन गए तो ओपेनहाइमर ने राष्‍ट्रपति से कहा था कि वे महसूस करते हैं कि उनके हाथ खून से रंगे हुए हैं. हालांकि, राष्‍ट्रपति को उनकी यह बात पसंद नहीं आई और ओपेनहाइमर को कमजोर व भावनात्‍मक इंसान करार दे दिया गया. ओपेनहाइमर लगातार अमेरिकी सरकार के कदम का पुरजोर विरोध करते रहे.

ओपेनहाइमर को सरकार के खिलाफ जाने की सजा मिली. 1954 में उन पर सोवियत रूस का जासूस होने का आरोप लगा. अमेरिकी सरकार ने उन्हें सिक्योरिटी क्लियरेंस अप्रूवल देने से मना कर दिया. उन्हें देश के टॉप साइंटिस्ट की लिस्ट से ब्लैकलिस्ट कर दिया गया. ओपेनहाइमर की बाकी की जिंदगी देशद्रोही और गद्दार के लांछन के साथ बीती.

18 फरवरी 1967 को प्रिंसटन स्थित घर में गले के कैंसर से ओपेनहाइमर की मौत हो गई. मृत्यु से ठीक पहले 1966 में तत्‍कालीन राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन उन्हें एटॉमिक एनर्जी कमीशन का सर्वोच्च सम्मान एनरिको फर्मी अवॉर्ड से सम्मानित किया. आखिरकार ओपेनहाइमर के निधन के 55 साल बाद 2022 में अमेरिकी सरकार ने उनकी वफादारी पर मुहर लगाते हुए उनका सिक्योरिटी क्लियरेंस बहाल किया.

परमाणु बम के निर्माता ओपेनहाइमर और परमाणु बम के विध्‍वंस को झेल चुके जापान ने तो इसके विनाश को पहचाना और सबक लिए. गीता के मार्ग को हर कर्म का स्‍वीकृति मान लेना हमारी समझ का दोष हो सकता है, गीता दर्शन का नहीं। गीता हमें आत्‍म बंधन से मुक्‍त होना सीखाती है, तभी कहती है कर्म करो फल की चिंता न करो, लेकिन वह फल आपके हिस्‍से का परिणाम नहीं है, उस फल या परिणाम की चिंता तो करनी चाहिए जो मानवता के हिस्‍से में आता है.


(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)