Tuesday, August 15, 2023

उस्‍ताद अमीर खां: रियाज छूट जाता था इसलिए नहीं करते थे कार्यक्रमों के लिए यात्राएं

 गुंचे तेरी ज़िंदगी पे दिल हिलता है 

सिर्फ एक तबस्सुम के लिए खिलता है

गुंचे ने कहा कि इस चमन में बाबा

ये एक तबस्सुम भी किसे मिलता है.

फिल्‍म्‍स डिवीजन द्वारा बनाई गई अपनी बायोपिक में उस्‍ताद अमीर खां साहब यही एक शेयर पढ़ते हैं और मानो कहते हैं, तमाम संघर्षों के बाद भी मैं खुश हूं. वे अमीर खां साहब जिनके पहले तक हिंदुस्‍तानी संगीत की एक खास गायन शैली तराना अर्थहीन थी. संगीत विद्वान पं. विष्‍णु नारायण भातखंडे ने भी तराना को अर्थहीन ही करार दिया था. मगर दस सालों के शोध के बाद उस्‍तार अमीर खां ने तराना को अर्थ दिया. उन्‍होंने बताया कि अमीर खुसरो द्वारा इजाद किया गया तराना अर्थहीन नहीं बल्कि वह एक तरह का जप है और इस कारण मूल्‍यवान है. इसलिए उन्‍होंने तराने में कम शब्‍द रख कर उनका जप अधिक रखा और इस तरह वे अध्‍यात्‍म में एकाकार होते रहे. पंडित निखिल मुखर्जी को दिए साक्षात्कार में उस्‍ताद अमीर खां ने कहा था पहले गायक शब्‍द पर अधिक बल देते थे जबकि भाव को महत्‍व कम देते थे. जबकि अमीर खां साहब के गायन में स्‍वर्गिक भाव का अहसास होता है.

शब्‍द से भाव की संगीत यात्रा करवाने वाले उस्‍ताद गायक अमीर खां की 15 अगस्त को जयंती है. उनका जन्‍म 15 अगस्त, 1912 को हुआ था. उनके पिता शाहमीर खान भिंडी बाजार घराने के सारंगी वादक थे, जो इंदौर के होलकर राजघराने में बजाया करते थे. उनके दादा चंगे ख़ान तो बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार में गायक थे. 1921 में अमीर अली की मां का देहांत हो गया था जब वे केवल नौ वर्ष के थे. अमीर और उनका छोटे भाई बशीर को पिता ने सारंगी की शिक्षा देनी आरंभ की. जल्द ही पिता को महसूस हुआ कि अमीर का रुझान वादन से ज़्यादा गायन की तरफ है. इसलिए उन्होंने अमीर अली को गायन की तालीम देने लगे.

बालक अमीर के उत्‍साद अमीर खां बनने के पीछे दर्द और अपमान की दास्‍तानें हैं. डॉ. इब्राहिम अलद की पुस्‍तक में बचपन की एक अपमानभरी घटना का उल्‍लेख अमीर खां के बाल मित्र सितार वादक रामनाथ श्रीवास्‍तव ने किया है. वे बताते हैं कि पिता का व्‍यवहार उस जमाने के उस्‍तादों की तरह ही बेहद कड़क होता था. एकबार पिता ने सांरगी बजाने के दौरान किसी गलती पर नन्‍हे अमीर की गर्दन पर डिब्‍बा दे मारा था. इससे दुखी अमीर ने गायक की राह पकड़ ली. वे छिपछिप कर रियास किया करते थे. इसमें छोटे भाई बशीर की सारंगी पर संगत मिला करती थी.

बचपन में ही एक घटना और हुई. इंदौर के प्रसिद्ध हार्मोनियम वादक बापराव अग्निहोत्री ने लिखा है कि एक बार इंदौर के गफूर बजरिया मोहल्‍ले में उस्‍ताद नसीरूद्दीन खां डागर का कार्यक्रम हुआ. वहां अमीर खां ने ‘मेरुदंड’ नामक ग्रंथ देखा. वे उसे लेकर पढ़ने लगे तो उस्‍ताद नसीरूद्दीन ने यह कहते हुए ग्रंथ छीन लिया कि यह बच्‍चों के काम का नहीं है. बालक अमीर इतने आहत हुए कि तय कर लिया उच्‍च श्रेणी के गायक बन कर ही दम लेंगे. बालसखा रामनाथ श्रीवास्‍तव से ‘मेरुदंड’ ग्रंथ लाने को कहा. रामनाथ ने भी दोस्‍त के भाव को समझा और कुछ ही दिनों में ‘मेरुदंड’ की कॉपी हाथ से लिख कर अमीर खां को दे दी.

अपमान की ऐसी ही एक घटना का उल्‍लेख कला मर्मज्ञ प्रभु जोशी ने अपने आलेख में किया है. वे लिखते हैं कि उस्ताद अमीर खां की प्रतिभा को अस्वीकार का आरंभ तो उसी समय हो गया था, जब वे शास्त्रीय संगीत के एक दक्ष गायक बनने के स्वप्न से भरे हुए थे और रायगढ़ दरबार में एक युवतर गायक की तरह अपनी अप्रतिम प्रतिभा के बलबूते संगीत-संसार में एक सर्वमान्य जगह बनाने में लगे हुए थे. एक बार उनके आश्रयदाता ने उन्हें मिर्जापुर में सम्पन्न होने वाली एक भव्य-संगीत सभा में प्रतिभागी की बतौर भेजा, ताकि वे वहां जाकर अपनी गायकी की एक प्रभावकारी उपस्थिति दर्ज करवा के लौटें. लेकिन, उन्होंने जैसे ही अपना गायन शुरू किया रसिकों के बीच से उनके विरोध के स्वर उठने लगे. यह विरोध जल्द ही शोरगुल में बदल गयस. उस संगीत-सभा में प्रसिद्ध गायक इनायत खां, फैयाज खां और केशरबाई भी मौजूद थे. इन वरिष्ठ गायकों की बात भी श्रोताओं ने सुनी नहीं. इस घटना से हुए अपमान-बोध ने युवा गायक अमीर खां के मन में ‘अमीर‘ बनने के दृढ़ संकल्प से साथ दिया. वे जानते थे, एक गायक की ‘सम्पन्नता’, उसके ‘स्वर’ के साथ ही साथ ‘कठिन साधना’ भी है. नतीजतन, वे अपने गृह नगर इंदौर लौट आए.

उसने स्वर-साधना को अपना अवलम्ब बनाया, और ऐसी साधना ने एक दिन उसको उसकी इच्छा के निकट लाकर छोड़ दिया. शायद इसी की वजह रही कि बाद में, जब अमीर खां साहब देश के सर्वोत्कृष्ट गायकों की कतार में खड़े हो गये तो बड़े-बड़े आमंत्रणों और प्रस्तावों को वे बस इसलिए अस्वीकार कर दिया करते थे कि ‘वहां आने-जाने में उनकी ‘रियाज‘ का बहुत ज्‍यादा नुकसान हो जाएगा. प्रभु जोशी सच ही लिखते हैं कि कुल मिला कर यह रियाज के अखण्डता की बात ही थी. बहारहाल, अमीर खां साहब का सर्वस्व रियाज पर ही एकाग्र हो गया था. भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा गायक हुआ होगा, जिसके लिए ‘रियाज‘ इतना बड़ा अभीष्ट बन गया हो. उनके बारे में एक दफा उनके शिष्य रमेश नाडकर्णी ने जो एक बात अपनी भेंट में कही थी, वह यहां याद आ रही है कि ‘मौन में भी कांपता रहता था, खां साहब का कंठ. जैसे स्वर अपनी समस्त श्रुतियों के साथ वहां अखंड आवाजाही कर रहा है.’

फिल्म संगीत में भी उस्ताद अमीर खां का योगदान उल्लेखनीय है. ‘बैजू बावरा’, ‘शबाब’, ‘झनक झनक पायल बाजे’, ‘रागिनी’, और ‘गूंज उठी शहनाई’ जैसी फि‍ल्मों के लिए उन्होंने अपना स्वरदान किया. एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने कहा था कि दूसरे संगीतकारों की तरह उन्‍होंने कभी फिल्‍मों में गाने से परहेज नहीं किया.  संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये उस्ताद अमीर खां को 1967 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. फिर 13 जनवरी 1974 का वह दिन जिसने एक कार दुर्घटना ने शास्त्रीय संगीत के इस महान गायक को हमसे छीन लिया है. हालांकि, संगीत में उन्‍होंने आसमान सा कद अर्जित किया लेकिन उनका पारिवारिक जीवन संतोषप्रद नहीं रहा. अलग-अलग कारणों से उन्‍हें चार बार शादियां करनी पड़ीं. उनके दो बेटे भी हुए लेकिन दोनों में से किसी ने भी भी संगीत की अपनी विरासत को आगे नहीं बढ़ाया. उनका एक बेटा इंजीनियर हुआ था भारत के बाहर बस गया जबकि दूसरा बेटा हैदर अली फिल्‍मी दुनिया में अभिनेता शाहबाज खान के नाम से चर्चित हुआ.

इंटरनेट पर उपलब्‍ध उस्ताद अमीर खां साहब के इंटरव्‍यू या गायन को सुन कर एक ही बात से सहमति होती है कि वे एक गायक नहीं, एक पूरे घराने की तरह मौजूद हैं, जिसमें उनके कई-कई शिष्य हैं, जो गा-गा कर अपने गुरु का ऋण उतार रहे हैं.

(न्‍यूज 18 पर 15 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित) 

Monday, August 14, 2023

मैडम कामा: तिरंगे में राष्‍ट्रीय एकता का भाव और विदेश में भारत की आजादी का घोष

15 अगस्‍त करीब है. 15 अगस्‍त यानी हमारे देश की आजादी का दिन. वह दिन जब लाखों स्‍वतंत्रता सेनानियों का स्‍वप्‍न साकार हुआ था. वह क्षण जब भारत माता गुलामियों की बेडि़यों से मुक्‍त हुई थी. मुक्ति का वह पल जिसे देखने का स्‍वप्‍न लिए लाखों क्रांतिकारी, स्‍वतंत्रता संग्रामी सेनानी ताउम्र संघर्ष करते रहे. वह पल जिसे देखना सबसे बड़ा लक्ष्‍य था और हजारों सेनानियों ने इस लक्ष्‍य को पाने के लिए अपने जीवन की आहूति दे दी. ऐसी ही थी मैडम भीकाजी रूस्‍तम कामा. 13 अगस्‍त उनके देहांत की तारीख है मगर उनकी मृत्‍यु के 11 साल बाद 15 अगस्‍त को देश ने वह पल देखा जिसके लिए मैडम भीकाजी कामा ने जीवन समर्पित किया. वे वही महिला हैं जिन्‍होंने देश की आजादी का स्‍वप्‍न लिए पहली बार तिरंगा फहराया और विदेशों में भारत की गुलामी की सच्‍चाई बता कर भारत के पक्ष में जनमत बनाने का बेहद महत्‍वपूर्ण कार्य किया. उनकी पुण्‍यतिथि उनके जीवन और पहले तिरंगे को फहराने की गाथा जानने का दिन है.

मुंबई निवासी एक पारसी परिवार सोहराब जी के घर में 24 सितंबर 1861 को जन्‍मी बालिका का नाम भीकाजी रखा गया था.. बचपन में भीकाजी को मुन्‍नी कह का पुकारा जाता था और बाद में वे पूरी दुनिया में भारत की स्‍वतंत्रता की उद्घोषक बनी तो मैडम कामा कहलाईं. वे बचपन से ही कुशाग्र थीं और स्‍वतंत्रता आंदोलन में रूचि लेती थीं. देशभक्ति की उनकी बातें तथा क्रियाकलापों से भयभीत हो कर उनके पिता ने 3 अगस्त 1885 को उनका विवाह मुंबई के प्रसिद्ध वकील रुस्तम जी कामा से कर दिया. पिता ने सोचा था कि विवाह के बाद भीकाजी का मानस बदल जाएगा और वे ब्रिटिश सरकार विरोधी गतिविधियों से दूर हो जाएंगी. मगर वैवाहिक जीवन में तो कुछ और लिखा था. भीकाजी देश की मुक्ति के स्‍वप्‍न देख रही थीं ज‍बकि उनके पति वकील रुस्तम जी कामा उनसे एकदम उलट विचार व स्वभाव वाले व्यक्ति थे. वे ब्रिटिश सरकार के प्रति गहरी आस्था रखते थे. पति-पत्नी के विचार व दृष्टिकोण एकदम विपरीत थे. एक था अंग्रेजों का कट्टर समर्थक व दूसरा उनका तगड़ा विरोधी. विचारों का अंतर दोनों के दांपत्‍य में कांटें बिछाने लगा लेकिन मैडम कामा ने किसी तरह का समझौता नहीं किया बल्कि वे अधिक गंभीरता से ब्रिटिस सरकार विरोधी गतिविधियों में हिस्‍सा लेने लगीं.

वर्ष 1896 में मुंबई में प्‍लेग ने हजारों लोगों को अपनी चपेट में ले लिया. भीकाजी कामा भी पीडि़तों की सेवा में जुट गईं. जाहिर है, बीमारों की सेवा करते करते वे भी प्‍लेग की चपेट में आनी थी. ऐसा हुआ और उनकी तबियत बिगड़ी और फिर मित्रों की सलाह और दबाव पर वे उपचार करवाने यूरोप गईं. उनका यूरोप जाना उपचार के लिए था मगर देश स्‍वतंत्रता की गतिविधियों वहां भी कम नहीं हुईं. उन्‍होंने यूरोपीय देशों में भारत की गुलामी की हकीकत उजागर करनी शुरू की.

अगस्त 1907 में मैडम कामा को पता चला कि जर्मनी स्थित स्टुटगार्ट में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन का आयोजन हो रहा है. सम्‍मेलन में विभिन्न देशों के हजारों प्रतिनिधि भाग ले रहे थे. भीकाजी को पूरी दुनिया के सामने पराधीन भारत की वास्‍तविक स्थिति को उजागर करने तथा देश की मुक्ति के लिए विश्व जनमत जुटाने का यह बेहतर अवसर प्रतीत हुआ. वे सम्‍मेलन में पहुंची और भारतीय परिधान साड़ी पहन कर जब वे मंच पर पहुंची तो उनके व्‍यक्तित्‍व की आभा से मंच दमक उठा. ‘मैडम कामा’ पुस्‍तक में लिखा है कि इस सम्‍मेलन में मैडम कामा ने कहा कि मां भारती के शिशु अंग्रेजों के अत्याचार व अपमान तले रौंदे जा रहे हैं. जो असहाय नीचे ही नीचे धंसते जा रहे हैं, उन्हें स्वराज्य की सुखद स्थिति की ओर बढ़ाओ. आगे बढ़ो! हम भारत के लिए और भारत भारतीयों के लिए यही हमारा ध्येय सूत्र है.

वे यूरोप के साथ ही दुनिया के अनेक देशों में पहुंचती और भारत की स्‍वतंत्रता के लिए पहल करती. वे जहां भी भाषण देती देशवासियों को संगठित होकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रहीं। उनका संदेश था- ‘जाति का प्रश्न हमारी राह में नहीं आना चाहिए। हम सब भारतीय एक ही परिवार के हैं।’ वह चाहती थी कि भारतीयों में भाईचारे की भावना प्रबल होकर एकता स्थापित हो. वह चेतावनी देती थीं कि अंग्रेजों द्वारा दिया गया कोई भी काम या पद, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, कतई स्वीकार न किया जाए. उन्होंने आह्वान किया कि लोग अपने संसाधनों के सहारे ही जीना सीखें. अपने वाणिज्य, व्यापार, उद्योग, कला में भारतीयता को प्रोत्साहन देते हुए हर चीज को पूर्णतया भारतीय बना कर छोड़ें.

मैडम भीकाजी कामा ने अपने क्रांतिकारी विचारों को प्रचारित करने के लिए ‘वंदेमातरम्’ तथा ‘तलवार’ नामक पत्रों का सहारा लिया. उनके इन कार्यों को सम्‍मान देते हुए सहयोगी उन्हें ‘भारतीय क्रांति की माता’ मानते थे; जबकि अंग्रेज उन्हें कुख्यात महिला, खतरनाक क्रांतिकारी, अराजकतावादी क्रांतिकारी, ब्रिटिश विरोधी कहा करते थे. इतने परिश्रम और शारीरिक कष्‍ट के चलते वे बीमार रहने लगी. उनकी इच्‍छा थी कि वे अंतिम समय देश में व्‍यतीत करें. लेकिन ब्रिटिश सरकार तो उनसे भयभीत थी. अंग्रेज सरकार से अनुमति मिलती तभी वे भारत में प्रवेश कर सकती थीं. लंबी कानूनी व प्रशासनिक लड़ाई के बाद ब्रिटिश सरकार ने अनुमति दी लेकिन इस शर्त के साथ कि वे आजादी के संघर्ष में अब भाग नहीं लेंगी तथा क्रांतिकारियों से कोई संपर्क नहीं रखेंगी. मैडम कामा ने यह शर्त मानने से इंकार कर दिया मगर शुभचिंतकों ने आग्रह तथा दबाव डालकर उन्‍हें शर्त मानने को मजबूर कर दिया. वे कष्‍टप्रद समुद्री यात्रा कर वे अपने जन्मस्थल मुंबई पहुंची. बंदरगाह से उन्‍हें सीधे अस्पताल ले जाया गया. अस्पताल में करीब आठ मा‍ह उनका इलाज चला और लेकिन तमाम उपचार उन्‍हें बचा नहीं सके और 13 अगस्त 1936 को उनका देहांत हो गया.

भारत की स्‍वतंत्रता का स्‍वप्‍न पाले जीने वाली मैडम कामा ने पूरी दुनिया में जहां मौका मिला वहां भारत की स्‍वतंत्रता के लिए सहयोग का आह्वान किया. ऐसा ही एक दिन 22 अगस्त 1907 भी था जब जर्मनी में हुई इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांफ्रेंस में भीकाजी काम ने भारतीय स्वतंत्रता के ध्वज को फहरया था. यह भारत का ध्‍वज भी तिरंगा था लेकिन हमारे वर्तमान राष्‍ट्र ध्वज तिरंगे से जरा भिन्‍न था. संदर्भ बताते हैं कि भीकाजी द्वारा लहराए गए तिरंगे झंडे में तीन रंग हरा, पीला और लाल थे जो इस्लाम, हिंदुत्व और बौद्ध मत को प्रदर्शित कर रहे थे. ध्‍वज के बीच में देवनागरी लिपि में ‘वंदे मातरम्’ लिखा हुआ था. इस तरह मैडम कामा ने ख्‍याल रखा था कि ध्‍वज में देश की विभिन्न संस्‍कृतियों और धर्मों का प्रतिनिधित्‍व हो.

जर्मनी के स्टुटगार्ड में हुए ‘अंतर्राष्ट्रीय समाजवाद सम्मेलन’ में मैडम कामा ने यह तिरंगा झण्डा फहराते हुए अपील की थी:

यह भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज है. इसका जन्म हो चुका है. हिन्दुस्तान के युवा वीर सपूतों के रक्त से यह पहले ही पवित्र हो चुका है. यहां उपस्थित सभी महानुभावों से मेरा निवेदन है कि सब खड़े होकर हिंदुस्‍तान की आजादी के इस ध्वज की वंदना करें।

इस भावुक अपील से प्रभावित हो कर वैश्विक समुदाय ने खड़े हो कर करतल ध्‍वनि से मैडम भीकाजी की भावनाओं से सहमति जताई. आजादी के बाद तिरंगे का रंग बदला, वंदेमातरम् की जगह पहले चरखा और फिर अशोक चक्र ने ली लेकिन भारत की एकता, अखंडता, विविधता की विशिष्‍टता के लिए देशभक्‍तों की भावनाओं में कोई अंतर नहीं आया. तिरंगा यात्राएं तथा तिरंगे को सलाम करने के लिए उठे हाथों के पीछे यही जज्‍बा है कि आजादी के मतवालों को याद कर आजादी को अखंड बनाए रखने का संकल्‍प दोहराया जा सके.

(न्‍यूज 18 पर 14 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित) 

Saturday, August 12, 2023

हमारी धर्म, संस्‍कृति, कला के प्रतीकों तक सिमट कर न रह जाएं हाथी

हाथी यानी गजराज हमारे इको सिस्‍टम का बेहद महत्‍वपूर्ण कड़ी है. यह हमारी पौराणिक आख्‍यानों, लोक कला और कथाओं, हमारी संस्‍कृति और साहित्‍य का अभिन्‍न हिस्‍सा है. प्रथम पूज्‍य कहे गए गणेश का रूप है गजानन. धैर्य और विवेक का प्रतीक ऐरावत हाथी देवराज इंद्र का वाहन है और ऐरावत समुद्र मंथन में से निकले 15 रत्‍नों में से 5 वां रत्‍न है. गीता में श्री कृष्‍ण कहते हैं कि वे हाथियों में ऐरावत हैं. सौंदर्य की प्रशंसा में नायिका गजगामिनी संबोधित की गई है. हिंदू धर्म में गजलक्ष्‍मी को राजलक्ष्‍मी की संज्ञा दी गई है.

बौद्ध धर्म में हाथी मानसिक दृढ़ता और बुद्ध के गर्भ में आने के प्रतीक हैं. हिंदू मंदिरों और बौद्ध गुफाओं में हाथी उकेरे गए हैं. मध्‍य प्रदेश में भोपाल के पास भीमबेटका गुफाएँ हाथियों की सबसे पुरानी पेंटिंग हैं, जो लगभग 10,000 वर्ष पुरानी बताई जाती हैं. मुंबई के पास घारापुरी द्वीप को एलीफेंटा गुफाओं के नाम से जाना जाता है. हाथी की नक्काशी और अकेली हाथी की मूर्तियां उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर और दक्ष प्रजापति मंदिर जैसे स्‍थलों पर पाई जाती हैं. ‘हस्ती आयुर्वेद’ एक ग्रंथ है जो हाथियों का आयुर्वेद है. इसे गजयुर्वेद या गजचिकित्सा कहा जाता है जो हाथियों की विभिन्न बीमारियों के उपचार की विधियां बताता हैं.

विस्‍तार दिया जाए तो कई संदर्भ और प्रतीक का उल्लेख किया जाएगा. मगर मुद्दा कुछ ओर है. इस सबको बताने के पीछे लक्ष्‍य है कि हाथी यानी गजराज हमारे जीवन का हिस्‍सा रहे हैं, इतना महत्‍वपूर्ण अंग कि उनकी उपस्थिति हमारे धर्म, कला-संस्‍कृति, साहित्‍य व आर्थिकी में विशिष्‍ट रही है. अब भय लग रहा है कि शक्ति, धैर्य, विवेक के प्रतीक गज कहीं वास्‍तव में ही प्रतीक बन कर ही न रह जाएं. इनकी सिमटी संख्‍या यह भय पैदा कर रही है. ये चिंताएं और भय केवल भारत की ही नहीं है बल्कि पूरी दुनिया की हैं. तभी 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय हाथी दिवस मनाया जाता है. यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे धर्म, हमारी कहानियों और हमारे लिए प्रतीक हाथी को बचाने के प्रयास तेज करना है. इस दिन की शुरुआत 2012 में कनाडाई पेट्रीसिया सिम्स और थाईलैंड के एलिफेंट रीइंट्रोडक्शन फाउंडेशन की एचएम क्वीन द्वारा की गई थी. हर साल की तरह 12 अगस्त को एक नई योजना, एक नए रोडमैप के साथ हाथी बचाने की पहल पर बल दिया जाता है. विश्‍व हाथी दिवस 2023 की थीम ‘वन्‍य प्राणियों के अवैध व्‍यापार पर रोक’ लगाना है.

हाथी के संरक्षण की पहल कितनी महत्‍वपूर्ण है यह इस बात से समझा जा सकता है कि हर साल 16 अप्रैल को विश्‍व हाथी बचाओ दिवस मनाया जाता है. कोशिश यही है कि पूरी दुनिया हाथी महत्‍ता को जाने तथा उन्‍हें बचाने के जतन करें. अन्‍य लुप्‍त होते वन्‍य प्राणियों की तरह ही हमारे विकास ने हाथियों के अस्तित्‍व को संकट में डाला है. वनों में बढ़ते अतिक्रमण तथा वन संसाधनों पर शहरी इंसान के कब्‍जे ने वन प्राणियों के लिए खतरा बढ़ा दिया है. इस तरह पिछले कुछ सालों में एशियाई हाथियों का आवास भी कम हुआ और हाथी दांत के लिए हाथियों का शिकार भी खूब हुआ. जरा सर्च करें तो पाएंगे कि 1980 में एशिया में लगभग 93 लाख हाथी थे और अब इनकी संख्‍या लगातार घट रही है. एक साल पहले तक यह संख्‍या कम हो कर 50 हजार तक पहुंच गई है. इनमें से भी 55 फीसदी हाथी यानी 27 हजार हाथी भारत में हैं. भारत में हाथियों के रहवासी स्थल 10 हैं. ये 27 हजार से अधिक हाथी 15 राज्यों में 10 रहवास क्षेत्रों तथा 33 हाथी अभयारण्यों में रहते हैं.

भारत के लिहाज से देखें तो इंसान हाथियों के प्राकृतिक आवास क्षेत्र में बस गए हैं और बेदखल कर दिए गए हाथी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गोवा और मध्य प्रदेश के उन क्षेत्रों चले गए जहां उनका पारंपरिक आवास नहीं है. स्‍वाभाविक है कि इंसान के साथ उनका संघर्ष होगा. अध्‍ययन बताते हैं कि अपने मुख्‍य आहार वाली वनस्‍पतियों के खत्‍म होने के कारण भोजन और पानी की तलाश हाथी एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर पहुंच गए हैं.

अपना प्राकृतिक आवास छिन लिए जाने से हाथी का स्‍वभाव भी बदलता जा रहा है. वे उन स्‍थलों पर ठहर जाते हैं जहां उन्‍हें अपने खाने लायक वनस्‍पति और रहने को जगह मिलती है। छत्‍तीसगढ़ और मध्‍य प्रदेश का सीमावर्ती क्षेत्र हाथियों के इसी बदले स्‍वभाग का गवाह बन रहा है. हाथियों के झुंड के आने से किसानों की फसलें बर्बाद होती है तो उनसे बचने के लिए शोर किया जाता है. और जब किसानों का धैर्य टूटने लगता है तो वे करंट के तार बिछा कर हाथियों को भगाने का जतन करते हैं. नजीतन आंकड़ें बताते हैं कि पिछले दस सालों में करंट लगने के कारण हमारे देश में ही 482 हाथियों की मौत हुई है. पहले हमने पालतू हाथी को अपने महावत के साथ शहरों-गांवों में घूमते देखा है. मगर अब आंकड़ें बताते हैं कि इंसानों और हाथियों के संघर्ष में अधिकांश जान महावत की जाती है. वह महावत जो हाथी के साथ सबसे ज्‍यादा समय गुजारता है. इसका कारण यह है कि महावतों को हाथी के साथ रहने या उसे पालने का कुशल पता नहीं होता. हाथी के पालन और देखरेख का कौशल समय के साथ लुप्‍त होता जा रहा है.

हाथी के संरक्षण की फिक्र कर रहे प्रकृति प्रेमी पिछले दिनों सरकार के उस निर्णय से चिंतित हो गए है जिसमें वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलिफैंट को एक कर दिया है. अब दोनों प्रोजेक्‍ट ‘प्रोजेक्ट टाइगर एंड एलिफैंट डिवीजन’ नामक नए डिवीजन के तहत मिला दिया गया है. यह प्रस्‍ताव 2011 में भी लाया गया था. तब राष्ट्रीय वन्यजीव स्थायी समिति के विशेषज्ञों की आपत्तियों के बाद इस प्रस्‍ताव को रोक दिया गया था. अब इसे लागू कर दिया गया है. यह बात अच्‍छी है कि प्रोजेक्‍ट टाइगर ने बेहतर सफलता प्राप्‍त की है और देश में बाघ की तादाद 2010 की 1706 बाघ की तुलना में 2023 में बढ़ कर 3167 हो गई है लेकिन फिक्र तो हाथी की है. चिंता का कारण यह है कि बाघ संरक्षण के लिए धन आवंटन 2018-19 से घट रहा है. अब दोनों प्रोजेक्‍ट को मिला देने से भय है कि हाथी के संरक्षण का पैसा प्रोजेक्ट टाइगर पर खर्च होने लगेगा. धन के बंटवारे में अंतर के अलावा वन्य प्राणी विशेषज्ञों का तर्क है कि बाघ और हाथी दोनों की प्रकृति अलग है और दोनों ही प्रोजेक्ट्स के लक्ष्‍य व चुनौतियां अलग-अलग हैं. उन्हें एक साथ मिला देने से दोनों के ही संरक्षण के प्रयासों को नुकसान पहुंचेगा.

सहअस्तिव के दर्शन को मानने वाले देश भारत में हमें हाथी जैसे बड़े प्राणी के रहने तथा खाने की फिक्र करनी होगी. यह दुर्भाग्‍य है कि वन्‍य प्राणियों को लुप्‍त होने से बचाने के लिए प्रोजेक्‍ट चलाने पड़ रहे हैं लेकिन केवल प्रोजेक्‍ट चलाने और संख्‍या बढ़ा देने से काम नहीं चलेगा. यदि ऐसे प्रोजेक्‍ट सफलता के बाद वन्‍य प्राणी बढ़ते हैं तो उनके जिंदा रहने की फिक्र भी करनी होगी.

(न्‍यूज 18 पर 12 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित) 

Friday, August 11, 2023

राहत इंदौरी: वे होते थे तो बस वे ही होते थे

फूलों की दुकानें खोलो, खुशबु का व्यापार करो

इश्क खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो.

ऐसी शायरी लिखने और उसे पढ़ने के अपने अलहदा अंदाज के कारण मुशायरा लूट लेने वाले शायर राहत इंदौरी अब नहीं हैं. यूट्यूब, फेसबुक, इंस्‍टा और रील्‍स वाली सोशल मीडिया की दुनिया को यह अहसास नहीं है, मगर मुशायरों के श्रोता तो आज अपने महबूब शायर का न होना शिद्दत से महसूस करते हैं. वे उस अंदाज को याद करते हैं जो शायरी को हर्फ से आगे ले जाकर श्रोताओं के अनुभव से जोड़ा देता था. आसमान में देख कर शायरी पढ़ने का वह अंदाज, आवाज में उतार-चढ़ाव का वह जादू और आम शब्‍दों की कारीगरी ऐसी कि वे होते थे तो बस वे ही होते थे.

राहत साहब की याद आने पर इंटरनेट पर पड़े ढ़ेरों वीडियो को देख-सुना जा सकता है मगर देश-दुनिया में मुझ जैसे लाखों श्रोता हैं जो मुशायरों में उनका न होना मिस करते हैं. वे जो हर वाकये पर सोचते हैं कि वे होते को क्‍या लिखते? रंग बदलती दुनिया में नए चेहरे पर उनका तंज क्‍या होता? राजनीति और मोहब्‍बत के रूख पर उनका नया लिखा कैसा होता? साल 2020 में 11 अगस्‍त की वह शाम थी जब राहतें बांटने वाला जिंदादिल शायर इस दुनिया से रूखसत हो गया था. कोरोना से जो हमें गहरे जख्‍म दिए हैं उनमें एक यह जख्‍म भी है.

राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को इंदौर में हुआ था. उनके पिता रफ्तुल्लाह कुरैशी कपड़ा मिल के कर्मचारी थे. परिवार की आर्थिक हालत को देखते हुए राहत ने 10 साल की उम्र में ही उन्होंने साइन बोर्ड बनाने शुरू कर दिए थे. यही वह दौर था जब वे शायरी की ओर आकर्षित हुए. उनके शायर बनने की कहानी भी कई बार बताई गई है. सड़कों पर साइन बोर्ड लिखने का काम था तो जाहिर उनकी लिखावट सुंदर थी. एक मुशायरे के दौरान उनकी मुलाकात मशहूर शायर जां निसार अख्तर से हुई. जां निसार अख्‍तर से ऑटोग्राफ लेते वक्त राहत ने शायर बनने की ख्‍वाहिश जताई तो जां निसार अख्तर ने कहा कि पहले 5 हजार शेर याद कर लें फिर वे खुद ब खुद शायरी लिखने लगेंगे. राहत इंदौरी ने तुरंत बताया कि उन्‍हें 5 हजार शेर तो पहले से ही याद है. इस पर जां निसार अख्तर ने जवाब दिया कि फिर देर किस बात की है, तुम तो शायर हो, संभालो स्टेज.

यह प्रेरणा काम कर गई और वे शायरी करने लगे. साथ ही साथ उन्होंने इस्लामिया करीमिया कॉलेज इंदौर से 1973 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और 1975 में बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया.

तमाम बड़े शायरों के बीच राहत इंदौरी ने अपनी लेखनी से ही नहीं बल्कि मुशायरा पढ़ने के अपने अंदाज से भी अपनी खास पहचान बनाई और प्रसिद्धि पाई. उनका अंदाज ऐसा था जैसे वे शायरी नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि एक कुशल पेंटर है जो चित्र बना रहा है. उनके शब्‍द श्रोताओं के ख्‍याल में दृश्‍य बनाने लगते थे. कई लोगों ने राहत इंदौरी के इस अंदाज की नकल करने की कोशिश की लेकिन श्रोताओं ने सभी को नकार दिया. कोई भी उनकी तरह नकल कर शायरी पढ़ता है तो राहत ही याद आते हैं और इस तरह उनकी नकल करने की कोशिश विफल प्रयास साबित होती है.

राहत इंदौरी की शायरी केवल मंच पर ही नहीं पढ़ी गई बल्कि वह कई-कई जगह छापी गई है. विद्यार्थियों ने इस शायरी को जान-समझ कर लिखने के सबक याद किए हैं. देश-दुनिया के मुशायरों और कवि सम्‍मेलनों में उनकी शायरी चाव से सुनी गई तो बॉलीवुड क्‍यों पीछे रहता भला? ‘बेगम जान’, ‘मर्डर’, ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’, ‘मिशन कश्मीर’, ‘इश्क’, ‘घातक’, ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’ जैसी ख्‍यात फिल्‍मों के गीत राहत इंदौरी ने लिखे हैं.

हालांकि, राहत इंदौरी ने अपनी शायरी में अपने वक्‍त के मिजाज पर खूब तंज किए हैं. उनकी शायारी सामाजिक, राजनीतिक स्थितियों पर गहरी नजर रखती है फिर भी उर्दू शायरी तो मोहब्‍बत की जुबां है और राहत इंदौरी की शायरी इससे जुदां नहीं है. राहत इंदौरी की पुण्‍यतिथि पर उनकी शायरी के मुख्‍तलिफ रंग को देखना सुकूनबख्‍श काम होगा.

बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने पर

जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं.


उस की याद आई है सांसों जरा आहिस्ता चलो

धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है.


मुंतजि‍र हूं कि सितारों की जरा आंख लगे

चांद को छत पे बुला लूंगा इशारा कर के.


फूंक डालूंगा किसी रोज मैं दिल की दुनिया

ये तिरा खत तो नहीं है कि जिला भी न सकूं.


दोस्ती जब किसी से की जाए

दुश्मनों की भी राय ली जाए.


मैं इंतिजार में हूं तू कोई सवाल तो कर

यकीन रख मैं तुझे ला-जवाब कर दूंगा.


महकती रात के लम्हों नजर रखो मुझ पर

बहाना ढूंढ़ रहा हूं उदास होने का.


कहां हो आओ मिरी भूली-बिसरी यादो आओ

खुश-आमदीद है मौसम उदास होने का.


अभी गनीमत है सब्र मेरा, अभी लबालब भरा नहीं हूं मैं

वो मुझको मुर्दा समझ रहा है, उसे कहो मरा नहीं हूं मैं.


अड़े थे जिद पे के सूरज बनाके छोड़ेंगे

पसीने छूट गए एक दीया बनाने में.


मेरी निगाह में वो शख्स आदमी भी नहीं

जिसे लगा है ज़माना खुदा बनाने में.


ये चंद लोग जो बस्ती में सबसे अच्छे है

इन्ही का हाथ है मुझको बुरा बनाने बनाने.


मैं मर जाऊं तो मेरी एक अलग पहचान लिख देना

लहू से मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना.

(न्‍यूज 18 पर 11 अगस्‍त 2023 को प्रकाशित)