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Monday, February 13, 2023

‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान... सीने में जलन...' लिखने वाले शहरयार की जिंदगी भी रोचक दास्तां है

शहरयार का जिक्र करते ही कोई भी पूछ सकता है, कौन शहरयार? और जब कहें कि ‘उमराव जान’ के गीत ‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए’, ‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं’, ‘जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने’ लिखने वाले शहरयार. तब सामने वाला कहेगा, अच्‍छा वे शहरयार. वे शहरयार जिन्‍होंने लिखा है, ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’. वे शहरयार जो कम बोलते थे मगर उनकी शायरी जनता के सिर चढ़ कर बोलती थी. जिनकी शायरी को साहित्‍य अकादेमी, ज्ञानपाठी आदि सम्‍मानों से नवाजा गया वे शहरयार. वे उर्दू के चौथे साहित्यकार हैं जिन्हें ज्ञानपीठ सम्मान मिला. उनके पहले फिराक गोरखपुरी, कुर्रतुल ऐन हैदर और अली सरदार जाफरी को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया है. वे शहरयार जिन्‍हें हिंदी और उर्दू भाषा के बीच का पुल कहा जाता है. आज उन्‍हीं शहरयार की पुण्‍यतिथि है.

अखलाक मुहम्मद खान यानी शहरयार का जन्‍म 16 जून 1936 को अलोनी जिला बरेली में हुआ था. 1948 में उनके बड़े भाई का तबादला अलीगढ़ हुआ तो वे अलीगढ़ आ गए और वहीं के हो कर रह गए. घर परिवार में कोई शायर नहीं था. पिता पुलिस इंस्‍पेक्‍टर थे और जाहिर है वे बेटे को भी पुलिस महकमे में ही देखना चाहते थे. अखलाक खान को पढ़ाई के दौरान हॉकी से जुनून की हद तक लगाव था. मगर जिंदगी में कोई आया और शायरी भी दाखिल हो गई. शहरयार ने ही अपने साक्षात्कारों में बताया है कि अलीगढ़ में उनकी मुलाकात खलीलुल रहमान आजमी से हुई. आजमी की दोस्‍ती ने उन्‍हें शायरी से मिलवाया. खलीलुल रहमान के ही कहने पर अखलाक खान ने बतौर शायर ‘शहरयार’ नाम अपनाया.

चुनिंदा मंचों पर अपनी शायरी से मुखर रहने वाले शहरयान निजी जीवन में खामोश इंसान थे. मुशायरों में भी वे कम ही जाते थे. ‘उमराव जान’ जैसी फिल्‍म के गाने लिख कर रातोंरात चर्चित हुए शहरयार को धुन पर गीत लिखना रास नहीं आया और वे अदब की दुनिया में ही रहे. डॉ. प्रेमकुमार की किताब ‘बातों-मुलाकातों में शहरयार ने अपने जीवन के कुछ राज खोले हैं. लेखन के शुरुआती पर वे बताते हैं कि जब मैंने तय किया कि मुझे थानेदार नहीं बनना है तो घर से अलग होना पड़ा. तब मैं खलीलुर्रहमान के साथ रहने लगा. शुरू में मेरी जो चीजें छपीं, ऐक्चुअली वो मेरी नहीं हैं. बाद में अचानक कोई मेरी जिंदगी में आया…नहीं, यह कांफीडेंशियल है… कहते हुए शहरयार उस व्‍यक्ति के बारे में अपनी बात को छिपा जाते हैं. उनकी संवेदनशीलता इस कहन में झलकती है कि इस उम्र में मैं कितना ही रुसवा हो जाऊं, किसी और को रुसवा क्यों करूं?

वे इस प्रसंग को छोड़ आगे बढ़ते हैं और बताते हैं कि तब दुनिया मुझे अजीब लगने लगी और फिर मैं शायरी करने लगा. बीए के आखिरी साल में शेर लिखने की रफ्तार तेज हो गई. एमए में साइकोलॉजी में दाखिला लिया और जल्दी ही अहसास हुआ कि फैसला गलत लिया है. दिसंबर में नाम कटा लिया. फिर चार-छह महीने केवल शायरी की – खूब छपवाई. ऊपर वाले की मुझ पर…. हां, यूं मैं मार्क्सिस्ट हूं फिर भी मानता हूं कि कोई शक्ति है; कोई बड़ी ताकत है जो मेरी चीजों को तय करती रही है. उर्दू की बहुत अच्छी मैगजींस में मेरी चीजें छपने लगीं. तेज रफ्तारी से सामने आया. फिर एमए उर्दू में ज्वाइन किया.’

साफगोई देखिए कि शहरयार जोर दे कर स्‍वीकार करते हैं कि वे मार्क्‍सवादी हैं मगर एक परम सत्‍ता पर भरोसा करते हैं. शहरयार निजी जीवन के मामले में कम ही बोले हैं. शहरयार की अपनी बेगम नजमा के साथ मन नहीं मिला था. उनके एकांत और खामोश मिजाजी के पीछे इसे भी एक कारण माना जाता है. पत्‍नी नजमा के लिए वे क्‍या सोचा करते थे, उनकी नज्‍म ‘नजमा के लिए’ में दिखाई देता है. इस नज्‍म में वे लिखते हैं:

क्या सोचती हो

दीवार-ए-फरामोशी से उधर क्या देखती हो

आईना-ए-ख्‍वाब में आने वाले लम्हों के मंजर देखो

आंगन में पुराने नीम के पेड़ के साए में

भय्यू के जहाज में बैठी हुई नन्ही चिड़िया

क्यूं उड़ती नहीं

जंगल की तरफ जाने वाली वो एक अकेली पगडंडी

क्यूं मुड़ती नहीं

टूटी जंजीर सदाओं की क्यूं जुड़ती नहीं

इक सुर्ख गुलाब लगा लो अपने जूड़े में

और फिर सोचो.

शहरयार के मिजाज पर कमलेश्‍वर ने लिखा है, उन्होंने अपनी शायरी में मानवीय मूल्यों को सबसे आगे रखा. शायरी हो या अफसाना शहरयार बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि जो लिखना है जमकर लिखो और इतना लिखो कि अपने लिखे को भी जी भर के खारिज कर सको, जिससे साहित्य जो सामने आए तो खूबसूरत और असरदार बन सके. इसके साथ ही वह बहसों में न हिस्सा लेते हैं और न शरीक होते हैं क्योंकि वह किसी भी कीमत पर अपना सकून खोना नहीं चाहते.

जब फिल्‍मों में गाने खास कर ‘उमराव जान’ का जिक्र हुआ तो शहरयार ने डॉ. प्रेमकुमार को दिए अपने इंटरव्‍यू में बताया था कि मुझे जिंदगी में बहुत सी चीजें फि‍ल्म के गानों की मकबूलियत से मिलीं. वे उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वे जब इलाज के लिए ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट जाते थे तो उन्‍ळें लाइन में खड़ा नहीं होना पड़ता था. वहां डॉक्‍टर बिना कार्ड ही उनकी जांच कर लेते थे. वे बहुत खुशी से जांच करते थे. ट्रेन या हवाई जहाज में रिजर्वेशन करवाना हो या एएमयू की एक्जिक्यूटिव या कोर्ट के इलेक्शन का मसला हो ‘उमराव जान’ के गानों ने हमेशा मदद की है. मुशायरा चाहे देश का हो या विदेश का शहरयार का सिर्फ एक ही परिचय काफी होता था, ‘उमराव जान’ के गीतकार.

बाद में ‘दामन’, ‘फासले’, ‘द नेमसेक’ आदि फिल्‍मों के लिए गीत लिखे मगर मन फिल्‍मी दुनिया में रमा नहीं. इसका कारण शहरयार ने यूं बताया है, मेरा एक उसूल है कि मैं किसी ऐसी फि‍ल्म में गाने नहीं लिख सकता, जिसमें गाना कहानी का पार्ट न हो और जिसमें पोयट्री की गुंजाइश न हो. हम दनादन धुन पर तुरंत नहीं लिख सकते. उन्‍होंने बताया था कि पिता का कहना था कि यह तो आदमी को मालूम नहीं हो पाता कि वह क्या कर सकता है, लेकिन यह बहुत आसानी से मालूम हो जाता है कि वह क्या नहीं कर सकता. जब यह मालूम हो जाए तो ऐसा काम करने के बाद सिवाय जिल्लत के कुछ नहीं मिलता. शहरयार ने जान लिया था कि वे क्‍या कर सकते हैं और यह जान कर उन्‍होंने जो किया उसने उन्‍हें शायरी का शहरयार (बादशाह) बना दिया. उनके लिखे को पढ़ना हमेशा चैन देता है तो ठिठकने पर मजबूर भी करता है, जैसे आज वे नहीं है तो महसूस होता है कहीं कुछ कम है.


जिंदगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है

हर घडी होता है अहसास कहीं कुछ कम है.


अब जिधर देखिए लगता है कि इस दुनिया में

कहीं कुछ ज़्यादा है, कहीं कुछ कम है.


वो देख लो वो समंदर खुश्क होने लगा

जिसे था दावा मेरी प्यास को बुझाने का.


हर मुलाकात का अंजाम जुदाई क्यूं है

अब तो हर वक्‍त यही बात सताती है हमें


सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है

इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूं है.


शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को

मैं देखता रहा दरिया तिरी रवानी को.


दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे

फिर भी इक शख़्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे.


किस्सा-ए-दर्द में ये बात कहां से आई

मैं बहुत हंसता हूं जब कोई सुनाता है मुझे.


ख़्वाब देखने की हसरत में तन्हाई मेरी

आंखों की बंजर धरती में नींदें बोती है.


खुद को तसल्ली देना कितना मुश्किल होता है

कोई कीमती चीज अचानक जब भी खोती है.


वो बेवफा है हमेशा ही दिल दुखाता है

मगर हमें तो वही एक शख्‍स भाता है.


अजीब चीज है ये वक्‍त जिसको कहते हैं

कि आने पाता नहीं और बीत जाता है.

(न्‍यूज 18 में 13 फरवरी 2023 को प्रकाशित ब्‍लॉग।)

Monday, February 6, 2023

कवि प्रदीप: जब एक लाइन ने अंग्रेज सरकार को कर दिया था असहाय


कवि प्रदीप… यह नाम सुनते ही हमारे ख्‍याल में एक साथ कई गीत बज उठते हैं. ‘ ऐ मेरे वतन के लोगों’, ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिंदुस्‍तान हमारा है’, ‘चल चल रे नौजवान’, ‘हम लाए हैं तूफान से कश्‍ती निकाल कर’, ‘दूसरा का दुखड़ा दूर करने वाले’, ‘टूट गई है माला’. एक के बाद एक बेहद लोकप्रिय गीतों की शृंखला याद हो आती हैं. ऐसे भी गीत जो टैग लाइन बन गए हैं. जैसे फेरी वाला जब ऊंची आवाज में कहता है, चने जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार, तब उसे कहां याद रहता है कि इन पंक्तियों को कवि प्रदीप ने लिखा है. हमारे समय में मानवता के पतन से दु:खी हो कर जब हम कहते हैं कि कितना बदल गया इंसान तब बरबस कवि प्रदीप याद हो आते हैं. वहीं प्रदीप जिनके लिखे गीत को गा कर इंदिरा गांधी अपने बचपन की ‘वानर सेना’ में जोश भरती थी. प्रदीप का लिखा ‘आओ बच्‍चों तुम्‍हें दिखाएं झांकी हिंदुस्‍तान की’ बाल सभाओं में सबसे ज्‍यादा गाए जाने वाले गीतों में से एक है. बरसों तक इन्‍हीं के भजनों से जाने कितने घरों में सुबह रोशन हुआ करती थी. कवि प्रदीप का एक परिचय देशभक्ति का संचार करने वाले गीत हैं तो दूसरा परिचय वे भजन हैं जिन्‍होंने हमें समय के पहले सचेत किया.

आज उन्‍हीं कवि प्रदीप की जयंती है. 6 फरवरी 1915 में मध्य प्रदेश के उज्जैन के बड़नगर में एक बाल का जन्‍म हुआ जिसे नाम मिला रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी. घर में रामचंद्र को रामू कहा जाता था. बड़े भाई कृष्‍ण वल्‍लभ द्विवेदी अनुवादक, लेखक, कवि थे. उनकी विद्वता का असर छोटे भाई रामू पर भी हुआ. बड़े भाई गद्य के मनीषी थे तो छोटे भाई रामचंद्र ने काव्‍य को चुना. प्रदीप के नाम से लेखन शुरू किया और शुरुआती लेखन से ही श्रोताओं को मंत्रमुग्‍ध कर दिया. 15-16 बरस की उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए. अंग्रेजों की लाठियां खाईं. महीनों अस्पताल में भर्ती रहे. यहीं से देशभक्ति के गीतों का लेखन शुरू हुआ.

सुधीर निगम द्वारा लिखी गई जीवनी में कवि प्रदीप के जीवन के बारे में विस्‍तार से बताया गया है. इसके अनुसार अहमदाबाद में काव्‍य पाठ के बाद एक परिचित के साथ मुंबई जाना हुआ और संयोग ऐसा बना कि कवि प्रदीप प्रख्‍यात फिल्‍मकार हिमांशु राय से उनके दफ्तर में मिले. उस समय वहां देविका रानी, अशोक कुमार, लीला चिटनिस, निर्देशक फ्रेंज आस्टिन, शषधर मुकर्जी और अमिय चक्रवर्ती जैसी हस्तियां मौजूद थीं. हिमांशु राय ने प्रदीप से एक गीत सुनाने के लिए कहा. यह फिल्मों में उनकी प्रवेश परीक्षा थी. प्रदीप ने गाया-

तुम हो कहो, कौन?

अब तो खुलो, प्राण, मुंदकर रहो यों न! 

प्रदीप का काव्‍य और स्वर जादू कर गया. हिमांशु राय ने फिल्‍म निर्माण कंपनी बाम्बे टॉकीज में गीतकार की नौकरी की पेशकश कर दी. मासिक वेतन पर मामला अटक गया. लोग हैरत में थे कि किशोर प्रदीप कैसे दिग्‍गज हिमांशु राय को इंकार कर रहे हैं. असल में प्रदीप को दो डर थे. एक तो यह कि वे हिमांशु राय के मन का चाहा लिख पाएंगे या नहीं और दूसरा, उन्‍हें लग रहा था कि वेतन के रूप में 60-70 रुपए मिलेंगे. मगर हिमांशु राय ने 200 रुपए वेतन तय किया तो वे हैरान रह गए. इतना वेतन तो बड़े बड़े अभिनेताओं का भी नहीं था. राजकपूर का भी मासिक वेतन 170 रुपए था.

इस तरह कवि प्रदीप का फिल्‍मों में लेखन आरंभ हुआ. 1940 में आई शषधर मुकर्जी की फिल्म ‘बंधन’ (1940) में सभी 12 गीत प्रदीप ने लिखे थे. इस फिल्म का एक गीत उस समय चर्चित हुआ जो आज भी प्रेरणादायी बना हुआ है. वह गीत यूं है:

दूर तेरा गांव

और थके पांव

फिर भी तू हरदम

आगे बढ़ा कदम

रुकना तेरा काम नहीं

चलना तेरी शान

चल-चल रे नौजवान

चल-चल रे नौजवान.

देश के नवयुवकों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के लिए लिखा गया यह गीत इतना पसंद किया गया कि हर जगह गाया जाने लगा. यह गीत जन जागरण के लिए प्रभात फेरियों का मंत्र बन गया. सिंध और पंजाब की विधान सभाओं ने इस गीत को राष्ट्रीय गीत की मान्यता दी. बीबीसी. लंदन में कार्यरत बलराज साहनी ने गीत को कई बार प्रसारित किया. अहमदाबाद में महादेव भाई ने इस गीत की उपमा  ‘चरैवेति चरैवेति’ मंत्र से की. कई सिनेमा घरों में दर्शकों की मांग पर इस गीत को दोबारा दिखाना पड़ता था. संदर्भ बताते हैं कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने प्रदीप को बताया था, अपनी किशोरावस्‍था  में इंदिरा प्रभात फेरियों में ‘चल चल रे नौजव़ान’ गाकर अपनी ‘वानर सेना’ की परेड कराती थीं.

यहां बताता दूं कि जब आप कहीं सुने कि ‘चना जोर गरम लेलो’ तब याद कीजिएगा कि यह गीत 1940 की फिल्म ‘बंधन’ का है जिसे कवि प्रदीप ने लिखा है. यह भी एक तथ्‍य है कि 1941 में आई फिल्‍म ‘झूला’ के गीत ‘न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे’ गायक अभिनेता अशोक कुमार को इतना पसंद आया था कि उन्होंने इसे अपनी अंतिम यात्रा में बजाने की इच्‍छा जताई थी.

फिर 1943 में प्रदीप और अनिल विश्वास के गीत- संगीत से सजी फिल्‍म ‘किस्‍मत’ ने एक और कीर्तिमान रच दिया. इस फिल्‍म का कालजयी गीत है

आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है,

दूर हटो ऐ दुनिया वालो ये हिंदुस्तान हमारा है.

‘चल चल रे नौजवान’ के बाद यह ऐसा गीत था जो 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का नारा बन गया था.

जनता एकजुट हो गई. ब्रिटिश सरकार को यह नागवार गुजरा. डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स की दफा 26 के तहत गीतकार प्रदीप पर जांच बैठा दी गई. अभियोजन अधिकारी धर्मेंद्र गौड़ ने मामले की जांच के बाद लिखा कि ‘इस गाने में प्रदीप ने जर्मनी और जापान को अपना निशाना बनाया है अंग्रेजों को नहीं. प्रदीप धोती कुर्ता पहनते जरूर है पर कांग्रेसी नहीं हैं और क्रांतिकारी भी नहीं हैं.’ मामला खत्म हुआ. वास्तव में प्रदीप ने चतुराई दिखाई थी। वे जानते थे कि इस गीत पर अंग्रेज हायतोबा मचाएंगे, इस कारण उन्होंने गीत में एक पंक्ति डाल दी थी- ‘तुम न किसी के आगे झुकना, जर्मन हो या जापानी.’ यही पंक्ति अभियोजन अधिकारी की रिपोर्ट का आधार बनी और चाह कर भी अंग्रेज सरकार कवि प्रदीप पर कार्रवाई नहीं कर सकी.

कवि प्रदीप ने अपने जीवन में लगभग 1700 गाने लिखे. फिल्मों और फिल्म वालों का रवैया बदलने लगा तो उन्होंने 1988 में फिल्मों में लिखना बंद कर दिया. निर्माता पहले से बनाई गई धुनों पर गीत लिखवाना चाहते थे जबकि प्रदीप का कहना था कि मुर्दे का कफन पहले खरीदोगे तो मुर्दे को उसकी साइज का काटना पड़ेगा यह मैं नहीं कर सकता. 1997 में कवि प्रदीप को सिनेमा में भारत के सर्वोच्च पुरस्कार, लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 11 दिसंबर 1998 को कवि प्रदीप की मृत्यु हो गई थी. वे आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके गीत आज भी अमर हैं. खासकर ‘ऐ मेरे वतन के लोगों… तुम खूब लगा लो नारा’.

इस गीत की रचना प्रक्रिया और प्रस्‍तुति भी एक कथा है. यह गीत भारत-चीन युद्ध के शहीदों को याद कर लिखा गया था. लता मंगेशकर ने इसे पहली बार 27 जनवरी, 1963 को दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में गाया था. यह कार्यक्रम युद्ध के बाद सैनिकों को आर्थिक मदद देने के लिए आयोजित किया गया था. सभी मशहूर संगीतकारों ने यहां अपना एक-एक देशभक्ति गीत प्रस्‍तुत किया था. संगीतकार सी. रामचंद्र के पास कोई गाना नहीं था. ऐसे गीत लिखने के आग्रह के साथ कवि प्रदीप के पास पहुंचे. इस आग्रह पर जो गीत बना वह है, ‘ऐ मेरे वतन के लोगों.’

कवि प्रदीप के अनुसार एक दिन ऐसे ही माहिम बीच पर टहल रहे थे. उनके दिमाग में एक लाइन कौंधी और एक पूरा पैरा तैयार हो गया. उस वक्‍त उनके पास कागज-पेन था नहीं. तुरंत एक राहगीर से पेन मांगा और सिगरेट का डिब्बा फाड़कर उस पर गीत लिख दिया. उन्‍होंने गीत के कुल सौ पैराग्राफ लिखे थे. गीत को गाने की बारी आई तो सी. रामचंद्र से लता मंगेशकर की बातचीत बंद थी इसलिए आशा को चुना गया. कवि प्रदीप की इच्‍छा थी कि लता इस गीत को गाए. सी. रामचंद्र तो बात करते नहीं थे, लिहाजा कवि प्रदीप ने ही पहल की. लता उनकी बात टाल नहीं सकीं. तय हुआ कि यह गीत दोनों बहनें लता और आशा गाएंगी मगर ऐनवक्‍त पर आशा भोंसले बीमार पड़ गई और लता मंगेशकर ने यह गीत गाया.

लता ने जब कवि प्रदीप का लिखा गीत गाया तो एक इतिहास बन गया. मोहम्‍मद रफी ने फिल्म ‘लीडर’ का गीत ‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं’ गाया. लग रहा था इसके आगे क्‍या कोई गीत होगा?  लेकिन लता के पहली पंक्ति गाते ही स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया. सब स्‍तब्‍ध. आंखों में आंसू. गाना पूरा होने के बाद पंडित नेहरू ने लता मंगेशकर को पास बुला कर कहा ‘लता, तुमने आज मुझे रुला दिया’.

पं. नेहरू तो क्‍या उस कार्यक्रम में कौन होगा जो यह गीत सुन कर रोया नहीं होगा? कौन होगा जो प्रदीप के गीतों को सुन कर आज भी दो पल सोचने को मजबूर न होगा?  यह सच ही है कि जो प्रदीप के गीतों को सुन पर अप्रभावी रह गया उसे अपनी संवेदना के स्‍तर को जरूर टटोलना चाहिए. कौन होगा जो आज के हालत को देख-जान कर कवि प्रदीप की पंक्तियों में न कहता होगा:

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान,

कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान,

सूरज ना बदला, चांद ना बदला, ना बदला रे आसमान,

कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.

आया समय बड़ा बेढंगा, आज आदमी बना लफंगा,

कहीं पे झगड़ा, कहीं पे दंगा, नाच रहा नर होकर नंगा,

छल और कपट के हांथों अपना बेच रहा ईमान,

कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.

राम के भक्त, रहीम के बंदे, रचते आज फरेब के फंदे,

कितने ये मक्कार ये अंधे, देख लिए इनके भी धंधे,

इन्हीं की काली करतूतों से हुआ ये मुल्क मशान,

कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.


(न्‍यूज 18 में 6 फरवरी 2023 को प्रकाशित ब्‍लॉग) 

Saturday, February 4, 2023

'फिर छिड़ी रात बात फूलों की' वाले शायर के एक शेर ने बदल दिया था निजाम

‘रात भर आपकी याद आती रही’, ‘फिर छिड़ी रात बात फूलों की’ और ‘इक चमेली के मंडुए तले’ जैसे गीत आपको याद तो होंगे. क्‍या इनके रचनाकार को जानते हैं? शायद नहीं. ये गीत शायर मखदूम मोहिउद्दीन के लिखे हुए हैं. खासबात यह है कि उन्‍होंने कभी फिल्‍मों के लिए लिखा ही नहीं था. उनकी रचनाओं की लोकप्रियता ऐसी थी कि फिल्‍मकारों ने शायरी का बतौर गीत इस्‍तेमाल किया. वे तो एक ऐसे शायर थे जो एक हाथ में कलम रखते थे तो दूसरे हाथ में बंदूक.

बंदूक? जी हां, आपने सही पढ़ा. वे ऐसे शायर थे जिन्‍होंने लिखा तो फूलों की बात को शब्‍द दिए और हैदराबाद को आजाद भारत में मिलाने की बारी आई तो निजाम के खिलाफ बंदूक थाम ली. जो इतना मजाकिया थे कि खुद के किस्‍सों को दिलचस्‍पी से सुनाते थे और मौका आने पर मुशायरे में शायरा को हमले से बचाने के लिए चीते सी फुर्ती लिए एक शख्‍स से भिड़ गए थे.

आज उन्‍हीं मखदूम मोहियुद्दीन की जयंती है और इस दिन उनकी रचनाओं और साहित्‍य जगत में फैले उनके किस्‍सों की बात करते हैं. मखदूम मोहिउद्दीन का जन्‍म 4 फरवरी 1908 को हैदराबाद रियासत के अंडोल गांव (अब जिला मेडक) में हुआ था. बचपन में पिता के देहांत के बाद चाचा ने उनकी परवरिश की. शायरी के लिए याद किए जाने वाले मखदूम मोहिउद्दीन वास्‍तव में कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के कार्यकर्ता पहले थे, शायर बाद में. लाल झंडे तले क्रां‍ति के लिए उन्‍होंने शायरी को ‘टूल’ बनाया. आजादी के संघर्ष और फिर हैदराबाद राज्य के निजाम के खिलाफ 1946-1947 के तेलंगाना विद्रोह में अपनी शायरी से क्रांति जगाने का काम किया. नर्म मिजाज शायर मखदूम मोहिउद्दीन निजाम की सेना का भी मुकाबला करने के लिए कलम के साथ बंदूक लिए भी उठाए घूमते थे.

कलम और बंदूक की धमक इतनी थी कि निजाम ने उन पर पांच हजार का इनाम घोषित किया था. इतना ही नहीं हैदराबाद के तत्कालीन निजाम मीर उस्मान अली खान ने लोगों को भड़काने का आरोप लगाकर मख़दूम को जान से मारने का आदेश दिया था.

कलम की ताकत से भी मखदूम ने निजाम को झुकने पर मजबूर कर दिया था. यह वाकया मखदूम के खास दोस्‍त मोहम्मद मेहदी ने उनके प्रशंसकों बताया है. उन दिनों हर स्कूल में पहले निजाम की शान में एक तराना पढ़ा जाता था. मखदूम ने इस तराने के खिलाफ एक शेर लिख दिया जो बहुत प्रसिद्द हो गया. लोगों ने निजाम को बताया कि मखदूम ने एक शेर लिखा है और जब जब निजाम की तारीफ में वह तराना गाया जाता है तो लोग मखदूम का शेर याद कर हंसने लगते हैं. अपनी हंसी उड़ती देख कर निजाम ने तराना गाने का नियम खत्‍म कर दिया.

मखदूम के तेलंगाना में किसानों के साथ किए गए संघर्ष को पर उर्दू के उपन्यासकार कृश्न चंदर ने ‘जब खेत जागे’ उपन्यास लिखा है. इस पर गौतम घोष ने तेलुगू में ‘मां भूमि’ फिल्म बनाई. विमल रॉय ने जब चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की मशहूर कहानी पर ‘उसने कहा था’ फिल्म बनाई तो उसमें मखदूम की नज्‍म ‘जाने वाले सिपाही से पूछो’ का उपयोग गीत के रूप में किया था. युद्ध के लिए सिपाही अपने परिवार को छोड़ कर जा रहा है. यह नज्‍म उसके जाने के समय के माहौल को बताती है.

जाने वाले सिपाही से पूछो
वो कहां जा रहा है

कौन दुखिया है जो गा रही है
भूखे बच्‍चों को बहला रही है
लाश जलने की बू आ रही है
ज़िंदगी है कि चिल्‍ला रही है.

कितने सहमे हुए हैं नजारे
कैसे डर डर के चलते हैं तारे
क्‍या जवानी का खून हो रहा है
सुर्ख हैं आंचलों के किनारे.

गिर रहा है सियाही का डेरा
हो रहा है मेरी जाँ सवेरा
ओ वतन छोड़कर जाने वाले
खुल गया इंकलाबी फरेरा.

‘सरमाया मखदूम’ पुस्‍तक में मखदूम मोहिउद्दीन के दोस्‍तों और करीबियों ने उनकी जीवन यात्रा पर अपने अनुभव लिखे हैं. ‘मखदूम मोहिउद्दीन: यादों में बसा आदमी’ शीर्षक से लेख में मुज्‍तबा हुसैन लिखते हैं कि खुद अपना मजाक उड़ाने में उनका कोई सानी नहीं था. मुज्‍तबा हुसैन उनके एक किस्से का जिक्र करते हैं.

एक बार मखदूम अलसुबह ओरिएंट होटल पहुंचे और बैरा से पूछा, निहारी है?
बैरा बोला, ‘नहीं है.‘
मखदूम ने पूछा, ‘आमलेट है?’
बैरा बोला, ‘नहीं.’
मखदूम ने फिर पूछा, ‘खाने के लिए कुछ है?’
बैरे ने जवाब दिया, ‘इस वक़्त तो कुछ नहीं है.‘
इस पर मखदूम बोले, ‘ये होटल है या हमारा घर कि यहां कुछ भी नहीं है!’

उम्र के आखिरी चरण में भी वे इंकलाबी थे. उनके इंतकाल से दो बरस पहले की बात है. हैदराबाद में एक बड़ा मुशायरा बरपा था. मखदूम डायस पर बैठे थे और एक शाइरा माइक पर कलाम सुना रही थी. डायस के नीचे एक तगड़ा शख्स नशे में धुत्त बैठा शायरा को घूरे जा रहा था. फिर उसके जी में ना जाने क्या आई कि उसने अचानक शायरा की तरफ छलांग लगाई. मखदूम ने भी चीते जैसी फुर्ती के साथ उस शख्स की तरफ़ छलांग लगाई. सेकंडों में उस शख्स को डायस से नीचे गिराया और उसके सीने पर सवार हो गए. मैं कैसे बताऊं कि बीस-पच्चीस बरस बाद मखदूम के अंदर छिपे हुए इंकलाबी को फिर एक बार देखकर कितनी खुशी हुई. लोगों ने मखदूम की इस अदा की दाद भी उसी तरह दी जिस तरह उनके कलाम पर दिया करते थे.

मखदूम अक्सर अपने परिचितों को जानबूझकर छेड़ते भी रहते थे. ऐसा ही एक किस्सा है पेंटर को दी चुनौती का. मुज्‍तबा हुसैन ने लिखा है कि एक रात सुलेमान अरीब के घर हैदराबाद के मशहूर आर्टिस्ट सईद बिन मुहम्मद आए हुए थे. मखदूम ने उनसे कहा कि शायरी पेंटिंग से कहीं ज्यादा ताकतवर माध्‍यम है.

सईद मुहम्मद ने जवाब दिया, पेंटिंग और शायरी का क्‍या मुकाबला? तुम जो चीज शायरी में नहीं कह सकते हो वह हम रंगों में कह देते हैं. तुम कहो तो सारी उर्दू शायरी को पेंट करके रख दूं.

मखदूम बोले, सारी उर्दू शायरी तो बहुत बड़ी बात है, तुम इस मामूली मिस्रे को ही पेंट कर दो. मिसरा था- ‘पंखुड़ी इक गुलाब की सी है.’

सईद बिन मुहम्मद बोले, ‘यह कौन सी मुश्किल बात है. मैं कैनवास पर गुलाब
की एक पंखुड़ी बना दूंगा.’

मखदूम बोले, ‘पंखुड़ी गुलाब की तो पेंट हो गई मगर ‘सी’ को कैसे पेंट करोगे?’ सईद बिन मुहम्मद बोले, ‘सी’ भी भला कोई पेंट करने की चीज है?’

मखदूम बोले, ‘मिस्रे की जान तो ‘सी’ ही है. सईद! आज मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा जब तक तुम ‘सी’ को पेंट नहीं करोगे.’

यह सुनते ही सईद बिन मुहम्मद वहां से भाग खड़े हुए.

जब हम मखदूम के बारे में पड़ताल करते हैं तो कई किस्‍से सुनाई देते हैं. एक और दिलचस्प वाकया है. मखदूम ने विधानसभा का चुनाव लड़ा था. इस चुनाव में उनके ही शेर का जबर्दस्‍त इस्‍तेमाल हुआ. शेर है:

हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो
चलो तो जमाने को अपने साथ ले के चलो.

चुनाव में प्रचार के दौरान इस शेर को बदल कर लिखा गया:

हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो
चलो तो जनाने को अपने साथ ले के चलो.

यानी कि मतदान के दिन अपने साथ महिलाओं को भी लेकर चलो ताकि इस इंकलाबी शायर को ज्‍यादा से ज्‍यादा वोटों से जिताया जा सके. हैदराबाद के भारत विलय के बाद हुए चुनाव में वे जीत कर आंध्र प्रदेश विधानसभा में पहुंचे. मखदूम ने हैदराबाद में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी. वे कामरेड एसोसिएशन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे. मखदूम मोहिउद्दीन की प्रकाशित कृतियों में उनके तीन काव्य-संग्रह ’सुर्ख सवेरा’, ’गुले-तर’ और ’बिसात्-ए-रक़्स’ प्रमुख हैं. ‘बिसात-ए-रक़्स’ के लिए उन्हें 1969 का साहित्य अकादमी अवार्ड भी प्राप्त हुआ है.

वे बेहद अनुशासति थे. सारा दिन पार्टी का काम करते थे और शाम का थोड़ा वक्त दोस्तों में गुजारते थे. जहां अहसास हुआ कि वक्त जाया हो रहा है, झट से उठ जाते थे और महफि‍ल से गायब. वो दुनिया से गए भी इसी तरह यानी एकदम से चल दिए. संदर्भ बताते हैं कि मखदूम मानते थे कि प्रेम और युद्ध की कविता अलग-अलग नहीं होती, आखिर हम युद्ध भी तो प्रेम के लिए करते हैं और बिना प्रेम के युद्ध भी नहीं कर सकते. शायद यही कारण है इस गैरमामूली फिलासफी को जीने वाला इंसान ने जीवन भर ही नहीं मौत के बाद भी खूब प्‍यार पाया. तारीख गवाह है कि 25 अगस्त, 1969 को जब मखदूम की मृत्यु हुई तो हजारों लोग दहाड़ें मार-मार कर रो रहे थे जैसे कि उनके परिवार के किसी अपने की मृत्यु हुई हो.

उनकी कुछ रचनाओं का जिक्र किए बगैर जयंती पर उन्‍हें याद करना अधूरा ही रहेगा.

आप की याद आती रही रात भर
चश्मे नम मुस्कुराती रही रात भर.

रात भर दर्द की शम्मा जलती रही
गम की लौ थरथराती रही रात भर.

बांसुरी की सुरीली सुहानी सदा
याद बन बन के आती रही रात भर.

याद के चांद दिल में उतरते रहे
चाँदनी जगमगाती रही रात भर.

कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा
कोई आवाज आती रही रात भर.

फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बरात फूलों की.

फूल के हार फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की.

आप का साथ साथ फूलों का
आप की बात बात फूलों की.

नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं
मिल रही है हयात फूलों की.

कौन देता है जान फूलों पर
कौन करता है बात फूलों की.

इश्क के शोले को भड़काओ कि कुछ रात कटे
दिल के अंगारे को दहकाओ कि कुछ रात कटे.

दीप जलते हैं दिलों में कि चिता जलती है
अब की दीवाली में देखेंगे कि क्या होता है.

एक झोंका तिरे पहलू का महकती हुई याद
एक लम्हा तिरी दिलदारी का क्या क्या न बना.

(4 फरवरी 2023 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 

Sunday, January 29, 2023

जन कवि गोरख पांडेय पुण्‍यतिथि: आएंगे, अच्छे दिन आएंगे

 


दु:ख की रेखाएं मिट जाएंगी

खुशियों के होंठ मुस्कुराएंगे

सपनों की सतरंगी डोरी पर

मुक्ति के फरहरे लहराएंगे

आएंगे, अच्छे दिन आएंगे …

उम्‍मीद की ऐसा कविता लिखने वाले जन कवि गोरख पांडेय की आज पुण्‍यतिथि है. आज से 34 साल पहले दिल्‍ली के जेएनयू में अपनी मानसिक बीमारी से तंग आ कर इस कवि अपना जीवन खत्‍म कर लिया था. उम्‍मीद और हक की बातें करने वाला कवि निराशा की राह चल पड़ा लेकिन आज भी उनकी कविताएं और भोजपुरी गीत हौसला और आस में गाई जा रही हैं.

गोरख पांडेय का जन्म उत्‍तर प्रदेश के देवरिया जिले के मुंडेरवा गांव में सन् 1945 में हुआ था. वे बनारस‍ हिंदु विश्‍वविद्यालय से होते हुए उच्‍च शिक्षा के लिए जेएनयू तक पहुंच गए थे. गोरख पांडेय ने 1969 से ही नक्सलवाड़ी आंदोलन के प्रभाव में आ कर जनसंघर्ष के गीत लिखे. ब्राह्मण परिवार में जन्‍मे गोरख पांडेय ने अपनी जनेऊ उतार दी थी. वे गांव की गरीब बस्तियों में जाते थे. गरीबों के साथ रह कर उनकी पीड़ा को समझते, उनके साथ खाते-पीते और उनकी भाषा में प्रतिरोध का साहित्‍य रचा करते थे. वे इन विचारों को लिखते और गाते ही नहीं थे बल्कि जीते भी थे. जब वे गांव आते तो अपने खेतों में काम करने आने वाले मजदूरों से कहते थे कि खेत पर कब्जा कर लो. पिता ललित पांडेय जब रोकते तो कहा करते थे कि इतने खेतों का क्या करेंगे? गरीबों में बांट दीजिए.

यह बात वे कविताओं और गीतों में लिखते भी रहे. उनकी कविताएं हर तरह के शोषण से मुक्त दुनिया की चाह की आवाज बनती रही है. जब गोरख पांडेय ने अपना जीवन खत्‍म किया तब वे जेएनयू में रिसर्च एसोसिएट थे. मृत्यु के बाद उनकी रचनाओं के तीन संग्रह प्रकाशित हुए हैं –स्वर्ग से विदाई (1989), लोहा गरम हो गया है (1990) और समय का पहिया (2004).

उनके लेखन को जन गीत की दिशा किसान आंदोलन से मिली थी. एक साक्षात्‍कार में उन्‍होंने बताया था कि नवगीत आंदोलन के दौर में मैंने पहला गीत ‘आंगन में ठहरा आकाश, धीरे-धीरे धुंधला हो गया, लिखा था. ये गीत रूमानी भावनाओं, अजनबियत और अलगाव के अस्तित्ववादी चिंतन के मेल-जोल से बने थे. सन् 1968 में किसान-आंदोलन से जुड़ा. वहां ऐसे गीतों की क्या आवश्यकता थी? मुझे अपनी रचना अप्रासंगिक और व्यर्थ होती दिखाई पड़ी. तब मैंने ‘नक्सलबाड़ी के तुफनवा जमनवा बदली’ जैसे गीत लिखे. 1976 में दिल्ली आया, उसके बाद के कई साल क्रांतिकारी-लोकप्रिय रचना की तलाश के रहे.

तभी समाजवाद जैसा गीत लिखा गया जो आज भी गाया जा रहा है:

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई, घोड़ा से आई

अंगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद…

अपने समय की गरीबी, छुआछूत, भेदभाव के खिलाफ मुखर हुए गोरख पांडेय के जीवन खत्‍म कर देने का कारण भले ही मानसिक अस्थिरता रही हो मगर वे भावनात्मक रूप से उद्वेलन झेल रहे होंगे तब ही अपनी मानिसक स्थिति के आगे झुक गए. वह भावनात्‍मक सघनता का पात उनकी इस रचना में देखा जा सकता है जो अपनी प्रिय बुआ के नाम लिखी थी:

‘लेकिन बुआ

तुम अब भी छुआछूत क्यों मानती हो?

पिता के सामंती अभिमान के हमलों से कवच की तरह

हमारी हिफाजत करने के बावजूद

रामधनी चमार को नीच क्यों समझती हो

जो जिंदगी भर हमारे घर हल चलाता रहा

हमेशा गरीब रहा

और पिता का जुल्म सहता रहा? क्यों?

आखिर क्यों सबकी बराबरी में तुम्हें यकीन नहीं होता?

बोलो

चुप मत रहो बुआ।’

‘गोरख पांडेय: संकलित गद्य रचनाएं’ पुस्‍तक में उनके इंटरव्‍यू प्रकाशित हुए हैं. ‘गोरख पांडेय से मनोहर नायक की बातचीत’ शीर्षक से प्रकाशित इंटरव्‍यू में मनोहर नायक के सवाल पर गोरख पांडेय ने कविता को लेकिर अपनी चिंता जाहिर की थी. उन्‍होंने कहा था कि कविता मनुष्य की भाषिक अभिव्यक्ति का बुनियादी रूप है. इस बीच समस्या यह रही है कि कविता देश के आम जीवन की धारा से कटती चली गयी. गीत को ऐतिहासिक तौर पर अप्रासंगिक बताने की कोशिश की गयी. यह कविता के ढांचे को योरोपीय कविता के ढांचे में ढालने की कोशिश थी. यह स्थिति भारतीय जीवन-हलचल में शामिल होने की भूमिका नहीं निभाती. कविता धीरे-धीरे चंद साहित्यकारों या कुलीन लोगों के बीच की चीज़ होकर रह गई. मेरी चिंता यही है, कि कैसे कविता को फिर से जनता के जीवन और उसकी आजादी के संघर्षों का वाहक बनाया जाए.

जब उनसे पूछा गया कि कविता से आप समाज में किस तरह के काम लेना चाहते हैं? तब गोरख पांडेय ने कहा था कि कविता एक आध्यात्मिक, वेदांत नहीं है. वह रचना होती है. जनता में आवेग और विचार बिखरे होते हैं. चिंतक उन्हें एक सूत्र में बांधता है. कविता भी बिखरी भावनाओं को सौंदर्य-बोध से संगठित दिशा की ओर ले जाने की कोशिश करती है. कविता प्रमाणिक रूप से जनांदोलन की जमीन तैयार कर सकती है. यदि वह परिवर्तन की बजाय यथास्थिति की तरफदार होगी तो समाज में वैसा ही असर पैदा करेगी.

गोरख पांडे के जीवन आचरण को देखना, समझना हो तो उनकी रचनाओं को ही देखना काफी है. उनकी कुछ चर्चित कविताओं पर एक नजर :

ये आंखें हैं तुम्हारी

तकलीफ का उमड़ता हुआ समुंदर

इस दुनिया को

जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए


उनका डर

वे डरते हैं

किस चीज से डरते हैं वे

तमाम धन-दौलत

गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद?

वे डरते हैं

कि एक दिन

निहत्थे और ग़रीब लोग

उनसे डरना

बंद कर देंगे.


कुर्सी

जब तक वह जमीन पर था

कुर्सी बुरी थी

जा बैठा जब कुर्सी पर वह

जमीन बुरी हो गई.

2

उसकी नजर कुर्सी पर लगी थी

कुर्सी लग गई थी

उसकी नजर को

उसको नजरबंद करती है कुर्सी

जो औरों को

नजरबंद करता है।

3

महज ढांचा नहीं है

लोहे या काठ का

कद है कुर्सी

कुर्सी के मुताबिक वह

बड़ा है छोटा है

स्वाधीन है या अधीन है

खुश है या गमगीन है

कुर्सी में जज्ब होता जाता है

एक अदद आदमी.


आशा का गीत

आएंगे, अच्छे दिन आएंगे

गर्दिश के दिन ये कट जाएंगे

सूरज झोपड़ियों में चमकेगा

बच्चे सब दूध में नहाएंगे.

जालिम के पुर्जे उड़ जाएंगे

मिल-जुल के प्यार सभी गाएंगे

मेहनत के फूल उगाने वाले

दुनिया के मालिक बन जाएंगे

दु:ख की रेखाएं मिट जाएंगी

खुशियों के होंठ मुस्कुराएंगे

सपनों की सतरंगी डोरी पर

मुक्ति के फरहरे लहराएंगे.


(29 जनवरी 23 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)

Wednesday, January 25, 2023

कृष्‍णा सोबती: ‘मित्रो’ की छवि बचाने के लिए रचा दिया दूसरा पात्र

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कृष्णा सोबती की आज पुण्‍यतिथि है. 2010 में यदि वे पद्मभूषण पुरस्‍कार ठुकराती नहीं तो हम इस अलंकरण के साथ उन्‍हें संबोधित कर रहे होते. देश की पहली फेमिनिस्‍ट लेखिका कही जाने वाली कृष्‍णा सोबती स्‍वयं को लेखिका कहलाना पसंद नहीं करती थी. वे मानती थी कि लेखक स्‍त्री या पुरूष नहीं होता है, वह लेखक होता है. अशोक वाजपेयी के शब्‍दों में कहें तो ऐसे लोग कम होते हैं जिनके लिखे और जीने में बहुत कम अंतर होता है. ऐसे बहुत कम लोगों में एक नाम है कृष्‍णा सोबती.

कृष्णा सोबती का जन्म अविभाजित भारत में पंजाब के गुजरात जनपद (जो अब पकिस्तान में है) में 18 फरवरी, 1925 को हुआ था. विभाजन के बाद वे भारत आ गईं. उन्‍हें जिंदगीनामा (1979) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. उन्हें 1981 में शिरोमणि अवार्ड, 1982 में हिंदी अकादमी अवार्ड, 1996 में साहित्य अकादमी फैलोशिप, 2017 में भारतीय साहित्य का सर्वश्रेष्ठ सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला.

वे उसूलों की पक्‍की थीं और खुद्दार इंसान थीं. इतनी खुद्दार की कभी कोई सरकारी पद नहीं लिया और सम्‍मान, पुस्‍तकों की रॉयल्‍टी से मिली राशि रजा फाउंडेशन आदि को सौंप दी. कृष्णा सोबती ने एक करोड़ रुपए से अधिक की रजा फाउंडेशन के अशोक वाजपेयी को दी. इसी तरह ज्ञानपीठ पुरस्कार की ग्यारह लाख की राशि भी रजा फाउंडेशन को प्रदान की. अपनी वसीयत में अपनी सहायिका के घर और जीवनयापन का पुख्‍ता इंतजाम किया. 94 वर्ष के लंबे जीवन में सबकुछ सुखमय नहीं था. कई संघर्ष थे. समय के थपेड़े थे मगर इस सबसे लड़ती-भिड़ती कृष्‍णा सोबती के चेहरे पर मासूम मुस्‍कान हमेशा कायम रही. उनके हिस्‍से में ‘जिंदगीनामा’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘ऐ लड़की’ और ‘हम हशमत’ जैसी रचनाओं को मिला पाठकों का प्‍यार ही नहीं आया बल्कि एक लंबी कानूनी लड़ाई भी आई. अमृता प्रीतम जैसी ख्‍यात समकालीन पंजाबी साहित्‍यकार के साथ उनकी यह लड़ाई साहित्‍य जगत का एक अनचाहा प्रसंग है.

यह विवाद किताब के शीर्षक को लेकर था. कृष्‍णा सोबती का उपन्‍यास ‘जिंदगीनामा’ आने के करीब चार साल बाद ‘हरदत्‍त का जिंदगीनामा’ शीर्षक से अमृता प्रीतम की भी किताब का विज्ञापन छपा. आवरण पर हरदत्‍त छोटे अक्षरों में था जबकि जिंदगीनाम बड़े अक्षरों में. इस पर कृष्‍णा सोबती केा ऐतराज हो गया. वे शीर्षक के कॉपीराइट का मामला लेकर कोर्ट में चली गई. हाईकोर्ट ने मामला दिल्ली के जिला अदालत में भेज दिया. वह मुकदमा 27 साल तक चला. फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में ही आया मगर तब तक उनका देहांत हो चुका था. फैसले के बाद कृष्‍णा सोबती ने कहा था कि लड़ाई लंबी खींच गई और मजाक बनकर रह गई. मगर वे इसे ताउम्र सिद्धांत की लड़ाई कहती रही.

सिद्धांत के लिए अगर वे लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकती थी जिस दौरान उनके तीन घर बिक गए तो अपने पात्र के लिए संवेदनाओं के शिखर पर भी खड़ी दिखाई देती हैं. अपने उपन्‍यास ‘मित्रो मरजानी’ की पात्र मित्रो के लिए वे इतनी संवेदनशील थीं कि फिल्‍म में मित्रो के चरित्र से छेड़छाड़ रोकने के लिए उन्‍होंने दूसरा पात्र गढ़ दिया. कृष्णा सोबती की जीवनी ‘दूसरा जीवन’ में गिरधर राठी इस प्रसंग का जिक्र करते हैं. वे लिखते हैं कि फिल्मकार राम माहेश्वरी ने ‘मित्रो मरजानी’ पढ़ा तो इस पर फिल्‍म बनाने का विचार आया. आरंभिक चर्चा के बाद अनुबंध की बात हो गई. फिल्म के स्‍क्रीन प्‍ले के दौरान सुझाव आया कि मित्रो को बिकिनी पहना कर गांव में तैराने का दृश्य फिल्माया जाए.

कृष्‍णा सोबती कहती हैं, ‘बिकनी पहने मित्रो! यह जुमला और इससे उभरती छवि दोनों ने मेरे दिल-दिमाग़ में खलबली मचा दी. मैं मित्रो के लिए खासी परेशान हुई. मैं चौकस हुई. लेखक होने के नाते मेरा कर्तव्य बनता है कि बनता है कि मैं मित्रो जैसे पात्र से इतनी छेड़छाड़ न होने दूं.”

तब कृष्णा सोबती ने दो रात और एक दिन में बिकिनी में नहाने योग्य पात्र जैनी रच डाला. अगली बैठक में उन्‍होंने जैनी की कहानी सुना दी. उन्‍होंने प्रस्‍ताव रखा कि मित्रो के बदले सुनहरे बालों वाली कनाडा में जन्मी जैनी पर ही फिल्म बनाई जाए. मगर न जैनी पर फिल्म बनी न मित्रो पर. ‘मित्रो मरजानी’ पर फिल्‍म नहीं बन सकी मगर रंगमंच पर यह कथा नुमाया हुई और देश भर में शहरों में सौ से अधिक नाट्य प्रस्तुतियां हुईं. कृष्णा सोबती ने लेखक गिरधर राठी को बताया था कि कहानी लेखक के तौर पर उन्‍हें पांच हजार रुपए का चेक भेजा गया था. मगर उन्‍होंने पैसा लेने से इंकार कर दिया था. कोई फिल्‍म बनाए, नाटक प्रस्‍तुत करे इतना ही बहुत है. इसके लिए पैसा लेना क्या जरूरी है?

कृष्‍णा सोबती का जीवन संयोगों से भरा हुआ है. कई संयोगों में एक संयोग यह भी कि उन्‍होंने रिटायर्ड आईएएस और अनुवादक शिवनाथ के साथ विवाह का भी है. दोनों की जन्मतिथि और जन्म वर्ष एक, दोनों की माताओं का नाम एक, दोनों पढ़े भी लाहौर में. 1983 में पत्नी के निधन के बादशिवनाथ अकेले 1989 में दिल्‍ली की आनंदलोक सोसाइटी के अपार्टमेंट बी-505 में रहने आ गए थे. कृष्णा सोबती ने 1990-91 में आनन्दलोक सोसाइटी का बी-503 नंबर का फ्लैट खरीदा था. सोसाइटी के पुस्तकालय का उद्घाटन करने आईं कृष्णा सोबती को सोसायटी अध्‍यक्ष शिवनाथ ने पहली बार देखा था. इसके बाद इंडियन लिटरेचर के संपादक के आग्रह पर शिवनाथ ने कृष्‍णा सोबती के उपन्‍यास ‘ऐ लड़की’ का अंग्रेजी अनुवाद किया. इसके बाद ‘डार से बिछुड़ी’ का अनुवाद शुरु किया. तब से लेकर सन् 2000 तक शिवनाथ सुख-दु:ख में कृष्‍णा सोबती के साथ रहे. अंतत: 24 नवंबर 2000 को दोनों ने मैरिज रजिस्‍ट्रार के समक्ष विवाह कर लिया.

लेखक कृष्णा सोबती और अनुवादक शिवनाथ का विवाह दोनों की 75 वर्ष की आयु में हुआ. वास्‍तव में यह मन का मिलाप था. कृष्णा सोबती के ही शब्दों में, ‘वे अपने कमरे में. मैं अपने कमरे में. मेरी आदत रात-रात भर काम करने की, सुबह देर से उठने की. उनका दिन प्रातः से शुरु. हम दोनों के स्वभाव अलग लेकिन एक दूसरे को पूरी तरह समझने वाले.’

इस संयोग जैसा ही एक और संयोग है पहली किताब का सबसे अंत में छपना. यह भी बेहद दिलचस्‍प प्रसंग है. कृष्णा सोबती ने 1954 में एक उपन्यास लिखा था ‘चन्ना’. यह उनका पहला उपन्यास था. ‘लीडर प्रेस’ इलाहाबाद ने इसे छापने का निर्णय किया. कोई 350 पेज छापने के बाद उसकी प्रति कृष्‍णा सोबती को भेजी गई. उन्‍होंने देखा कि कुछ शब्दों को बदल दिया गया है. जैसे ‘वृक्ष’ को मैंने रूख लिखा था इसीतरह शाहनी को शाहपत्नी कर दिया. स्थानीय भाषा के शब्दों को बदलने पर वे परेशान हो गईं. उन दिनों लीडर प्रेस बहुत चर्चित था. उन्होंने सोचा होगा कि पहला उपन्यास है तो बदलाव कर सकते हैं मगर कृष्‍णा सोबती अड़ गईं. बात बनी नहीं और कृष्णा सोबती ने कागज तथा छपाई का खर्चा चुका कर उपन्‍यास वापस ले लिया. तब उनके पास छोटी सी नौकरी थी फिर भी उन्होंने ऐसा निर्णय लिया था.

इस घटना के करीब 65 साल बाद राजकमल प्रकाशन ने ‘चन्‍ना’ उपन्‍यास को प्रकाशित किया. 11 जनवरी 2019 को ‘चन्ना’ उपन्यास का विमोचन हुआ और 25 जनवरी 2019 को सुबह 8 बजे कृष्णा सोबती का दिल्ली में लंबी बीमारी के बाद देहावसान हो गया. कृष्‍णा सोबती जैसे इंसान कम ही होते हैं, अपने समय के सबसे ‘बोल्‍ड’ किरदार रचने वाली कृष्‍णा सोबती जितनी साहसी लेखक थीं, विचारधारा के मामले में उतनी ही स्‍पष्‍ट भी. निर्णय पर अडिग रहने वाली कृष्‍णा सोबती को लोग बेहद संवेदनशील व्‍यक्तित्‍व और सौम्‍य मुस्‍कान के लिए याद करते हैं.

(25 जनवरी 2023 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)

Friday, January 20, 2023

कुर्रतुलऐन हैदर: लेखक के नजरिए से देखिए हिंदुस्‍तान का अतीत और विभाजन की त्रासदी


आज ऐनी आपा के नाम से चर्चित कुर्रतुलऐन हैदर की जयंती है. माना जाता है कि उर्दू अदब की एक धारा वहां से शुरू होती है जहां से कुर्रतुलऐन हैदर ने लिखना शुरू किया था. वे विभाजन के समय पाकिस्‍तान गईं, वहां से लंदन और फिर भारत लौटी. यहां आ कर पत्रकारिता की, साहित्‍य लेखन किया. उनके लिखे को पाठकों ने खूब प्‍यार दिया तो दिया ही संस्‍थाओं और सरकार ने साहित्‍य अकादेमी, ज्ञानपीठ, पद्मश्री, पद्मभूषण सम्‍मान भी प्रदान किए. तमाम रचनाओं के अलावा कुर्रतुलऐन हैदर को सबसे ज्‍यादा 1959 में प्रकाशित उपन्‍यास ‘आग का दरिया’ के लिए जाना जाता है. इस उपन्‍यास की जितनी प्रशंसा हुई है उतनी ही इसके बारे में गलतबयानी भी. इतना कुछ कहा गया कि आ‍पत्तियों के बाद माफियां मांगी गईं. कुर्रतुलऐन हैदर हर गलत बयान का विरोध करती रहीं. मगर झूठ के सौ पैर होते हैं और वे गलतबयानी आज भी जारी है.

कुर्रतुलऐन हैदर का जन्म 20 जनवरी 1927 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था. ऐनी आपा यानी कुर्रतुलऐन हैदर का पूरा नाम मुसन्निफा क़ुर्रतुल ऐन हैदर था. उनके पिता सज्जाद हैदर यलदरम कुर्अतुल नहटौर के रहने वाले थे लेकिन हैदर के जन्म के समय वे अलीगढ़ विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार थे. पिता सज्जाद हैदर यलदरम खुद उर्दू के अच्छे लेखक थे. कुर्अतुल ऐन की मां नजर जहरा भी लेखिका थी. अदब के संस्‍कार परिवार में ही थे तभी कुर्रतुलऐन हैदर ने छह साल की उम्र से से लिखना शुरू किया. 1945 में उनका पहला कहानी संकलन ‘शीशे का घर’ छपा. तब उनकी उम्र 18 साल थी. वे लेखिका थी और उन्‍होंने ताउम्र खूब लिखा. कभी साहित्‍य रचा तो कभी पत्रकारिता की. निधन के समय 21 अगस्त 2007 तक वे लगातार लिखाती रहीं.

भारत के विभाजन पर सबसे चर्चित उपन्‍यासों में से एक ‘आग का दरिया’ पर बात करने से पहले जान लें कि कुर्रतुलऐन हैदर उन लोगों में शामिल हैं जो विभाजन के वक्‍त पाकिस्‍तान चले गए थे और बाद में भारत लौट आए. उनके बारे में कहा गया कि ‘आग का दरिया’ उपन्‍यास पाकिस्‍तान में सेंसरशिप का शिकार हुआ. कट्टरपंथियों ने उनके लिखे पर हंगामा किया. उन पर पाबंदियां लगाई गईं. मगर उपन्‍यास के हिंदी अनुवाद की भूमिका में वे इन सारी बातों को खारिज करती हैं. कहा जाता है कि पाकिस्‍तान में विरोध से परेशान हो कर वे ब्रिटेन गई थीं और फिर अपने पिता के खास दोस्‍त मौलाका अबुल कलाम आजाद के कहने पर भारत लौट आईं. यह आधी बात सच है और आधी झूठ.

कुर्रतुलऐन हैदर ने खुद लिखा है कि वे अपनी मां का इलाज करवाने ब्रिटेन गई थीं, न कि कट्टरपंथियों या सेंसरशिप से परेशान हो कर. हां, यह सच है कि पिता के मित्र अबुल कलाम आजाद के कहने पर ही वे लंदन में न रह कर भारत लौट आई थीं. भारत आने के बाद उन्‍होंने ‘द टेलीग्राफ’ में रिपोर्टिंग की. ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ में संपादन किया. ‘इम्प्रिंट’ की प्रबंध संपादक रहीं. उन्होंने लगभग बारह उपन्यास और ढेरों कहानियां लिखीं. उनकी प्रमुख कहानियां में ‘पतझड़ की आवाज’, ‘स्ट्रीट सिंगर ऑफ लखनऊ एंड अदर स्टोरीज’, ‘रोशनी की रफ्तार’ जैसी कहानियां शामिल हैं. उन्होंने ‘हाउसिंग सोसायटी’, ‘सफीने गमे दिल’, ‘आखि‍रे- शब के हमसफर’, ‘कारे जहां दराज है’ जैसे उपन्यास भी लिखें. ‘आखि‍रे- शब के हमसफर’ के लिए इन्हें 1967 में साहित्य अकादमी और 1989 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला. साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें 1984 में पद्मश्री और 1989 में उन्हें पद्मभूषण से पुरस्कृत किया गया.

मगर जिस उपन्‍यास के कारण वे हमेशा चर्चा में रही वह है, ‘आग का दरिया’. 1959 में इतिहास को समेटते वर्तमान की त्रासदी पर एक उपन्‍यास लिखा जाना क्रांतिकारी ही कहा जाएगा. इसकी शैली वैसी है जैसी बाद में हिंदी में कमलेश्वर ने ‘कितने पाकिस्तान’ उपन्यास में अपनाई थी. विभाजन की रक्तरंजित घटनाओं पर यशपाल ने ‘झूठा सच’, भीष्म साहनी ने ‘तमस, राही मासूम रज़ा ने ‘आधा गांव” जैसे उपन्यास लिखे हैं. इन सबमें प्रसिद्धि का चरम कुर्रतुलऐन हैदर के उर्दू उपन्यास ‘आग का दरिया’ ने छूआ है. यह उपन्यास में भारत के तीन हजार वर्ष के इतिहास को विभाजन की त्रासदी से जोड़ता है.

पुस्तक के अनुवादक नंद किशोर विक्रम कहते हैं कि आग का दरिया की कहानी बौद्ध धर्म के उत्थान और ब्राह्मणत्व पतन से शुरू होती है. ये तीन काल में विभाजित है, किंतु इसके पात्र गौतम, चंपा, हरिशंकर और निर्मला तीनों काल में मौजूद रहते हैं कहानी बौद्धमत और ब्राह्मणत्व के टकराव से शुरू हो कर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के टकराव तक पंहुचती है. उपन्यास देश के विभाजन की त्रासदी पर समाप्त होता है. यहां यह बात बतानी बेहद जरूरी है कि लेखिका ने विभाजन की त्रासदी को मानव त्रासदी के रूप में देखा है. मानव पीड़ा से सरोकार का यह पक्ष ‘चांदनी बेगम’, ‘चाय के बाग’ और ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ में भी दिखाई देता है.

पात्र गौतम और चंपा की एक ही इच्छा है कि वे बनारस पहुंच जाएं. उपन्यास में चंपा कहती है जब वह बनारस में पढ़ती थी तो कभी दो कौमों के सिद्धांत् पर गौर नही किया. काशी की गलियां, शिवालय और घाट मेरे भी इतने ही थे, जितने मेरी दोस्त लीना भार्गव के. फिर क्या हुआ कि जब मैं बड़ी हुई तो मुझे पता चला कि इन शिवालयों पर मेरा कोई हक नहीं, क्योंकि मैं माथे पर बिंदी नही लगाती. कुर्रतुलऐन हैदर लिखती हैं कि यहां हजारों देवी−देवता हैं. आप चाहे किंतु जिसे माने. इस्लाम में ऐसा नहीं है, वहां आपके लिए कोई आजादी नही दी गई है.

लेखक हमें अतीत से साक्षात्‍कार करवाते हैं और इस आधार पर हम भविष्‍य की इबारत लिख सकते हैं. विभाजन की त्रासदी को भी कुर्रतुलऐन हैदर की नजर से ‘आग का दरिया’ के रूप में जरूर देखा जाना चाहिए.

(20 जनवरी 2023 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 



Monday, September 12, 2022

कर्मकांड की भेंट चढ़ गए थे ‘उसने कहा था’ वाले चंद्रधर शर्मा गुलेरी

Chandradhar Sharma Guleri Death Anniversary: जाने कितनी किताबों के प्रकाशन के आधार रहे चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी की जीते जी कोई किताब नहीं छपी थी. वे कम लेकिन बेहतर लेखन के हिमायती थे. 'उसने कहा था' कहानी इसका प्रमाण है. जितनी यादगार उनकी कहानी और जीवन है, मृत्‍यु प्रसंग उतना ही कष्‍टदायक.

हिंदी साहित्‍य में रूचि रखने वाला शायद ही कोई होगा जिसने ‘उसने कहा था’ कहानी न पढ़ी हो. जिसने भी यह कहानी पढ़ी है वह इसके लेखक चंद्रधर शर्मा गुलेरी की लेखन क्षमता का कायल हुए बिना नहीं रह सकता है. फिर यह पता चले कि गुलेरी ने मात्र तीन कहानियां ही लिखी हैं तो अचरज और भी बढ़ जाता है. उस पर यह भी एक तथ्‍य है कि आजीवन हिंदी की सेवा करने वाले प्रकांड विद्वान, जाने कितनी किताबों के प्रकाशन के आधार रहे गुलेरी जी की जीते जी कोई किताब नहीं छपी थी. वे कम लेकिन बेहतर लेखन के हिमायती थे और मात्र 39 वर्ष की उम्र में जब उनका देहांत हुआ तो यादगार लेखन व समृद्ध साहित्‍य सेवा का इतिहास छोड़ कर गए. जितनी यादगार उनकी कहानी और जीवन है, मृत्‍यु प्रसंग उतना ही कष्‍टदायक. उनकी मृत्‍यु प्राकृतिक न थी बल्कि एक शास्‍त्रज्ञाता ‘कर्मकांड’ की भेंट चढ़ गया.

आज पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी की पुण्‍यतिथि है. लेखक, पत्रकार, विमर्शकार, अनुसंधनकर्ता और शास्त्रज्ञ आदि जैसे रूपों में गुलेरी जी को सम्‍मान के साथ याद किया जाता है. यूं तो उनके कार्यों की सूची लंबी है मगर समाज उन्हें केवल एक कहानी ‘उसने कहा था’ से जानता है. ‘उसने कहा था’ और गुलेरी जी इस बात के उदाहरण हैं कि किसी लेखक की केवल एक रचना उसे किस तरह अमरत्व प्रदान कर सकती है. ‘उसने कहा था’ एक ऐसी अविस्मरणीय कहानी है जिसने भारतीय साहित्य में गुलेरी को अक्षय कीर्ति प्रदान की, जिसने हिंदी कहानी को नई दिशा दी.









पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी का जन्‍म 7 जुलाई, 1883 को हुआ था. उनके पिता पंडित शिवराम जी ‘महाराज’ का जन्म गुलेर (कांगडा जिला तब पंजाब प्रांत, अब हिमाचल प्रदेश) में हुआ था. काशी में शास्त्रार्थ में अनेक विद्वानों को परास्त करने के बाद वे जयपुर राज्य के सवाई राम सिंह के आग्रह पर प्रधान पंडित नियुक्‍त हुए थे. अपने पिता के संघर्षपूर्ण जीवन, विद्वता और मान प्रतिष्ठा का गुलेरी जी के जीवन पर गहरा प्रभाव पडा. उनकी विद्वता का प्रमाण है कि मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में जयपुर वेधशाला के जीर्णोद्धार में प्रमुख भूमिका निभाई थी. गुलेरी जी ने जब लिखना शुरू किया तो अपने गांव के साथ गहरे सम्‍बन्‍ध को दर्शाने के लिए गुलेर से ‘गुलेरी’ उपाधि धारण कर ली.

गुलेरी जी दर्शन-शास्त्र में एमए करने के इच्छुक थे किंतु परीक्षा के एक दिन पहले वे देर रात तक अध्ययन करते रहे. नींद पूरी नहीं हुई और परीक्षा भवन में तंद्रा की अवस्था में ही रहे. स्‍वयं गुलेरी जी के शब्दों में ‘परीक्षा की आवश्यकता से भी बढ़कर विषय का अनुशीलन किया किन्तु अस्वस्थता के कारण परीक्षा न दे सका.’’ फिर 1904 में गुलेरी जी जयपुर राज्य के आग्रह पर खेतडी नरेश जयसिंह के शिक्षक और अभिभावक बनकर मेयो कॉलेज अजमेर चले गए. इस प्रकार उनका एमए करने का विचार पूरा न हो सका.

उनके विवाह की भी बडी अद्भुत कहानी हैं. गुलेरी जी की पुत्री डॉ. अदिति गुलेरी ने एक संस्‍मरण में बताया है कि लगभग बीस-बाइस वर्ष की अवस्था में गुलेरी जी का विवाह पद्मावती से हुआ था. प्रसंग है कि गुलेर गांव में उनके विवाह की तैयारियों हो चुकी थीं. दुर्भाग्यवश कन्या के पिता का देहांत हो गया. पिता शिवरामजी असमंजस में पड गए. वह बेटे को अविवाहित लेकर जयपुर नहीं लौटना चाहते थे क्‍योंकि उन्हें जयपुर राज्य की ओर से विवाह के लिए पांच सौ रुपये की सहायता प्राप्‍त हुई थी. इसीलिए शीघ्र ही ‘हरिपुर’ निवासी कवि रैणा की पुत्री पद्मावती से उनका विवाह करवाया गया.

जुलाई 1916 में गुलेरी जी ने मेयो कॉलेज अजमेर में संस्कृत विभागाध्यक्षक का पद संभाला. मेयो कॉलेज अजमेर में गुलेरी जी की कार्यदक्षता और योग्यता की धाक दूर-दूर तक फैल गई थी. उन दिनों महामना पंडित मदन मोहन मालवीय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए घूम-घूम कर धन एकत्र कर रहे थे. उनका गुलेरी जी से परिचय हुआ. मालवीय जी भी देश के कोने-कोने से चोटी के विद्वानों को बुलाकर हिन्दू विश्वविद्यालय में लाने के लिए प्रयत्नशील रहते थे.

‘श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरी: व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व’ के लेखक पीयूष गुलेरी ने एक संस्‍मरण में लिखा है कि हिंदी के प्रति उनकी आस्था इतनी गहरी थी कि उन्होंने अंग्रेज़ी के प्रयोग करने पर अपने मित्र रहे पंडित मदन मोहन मालवीय की भी आलोचना की. महामना पंडित मदन मोहन मालवीय सरल हिंदी की जगह अन्‍य भाषा के साथ मिश्रित हिंदी की पैरोकारी करने लगे. इसपर गुलेरी जी का विरोध ‘खुली चिठ्ठी’ के माध्यम से समालोचकः 1904 ईसवी में प्रकाशित हुआ. वे लिखते हैं:

‘वैसे ही जिन लोगों ने मालवीय जी की देखादेखी हिंदी का पक्ष लिया था, जो मालवीय जी की हिंदी को हिंदी मानते थे, वे आज मालवीय जी की दूसरी डिबिया को देखकर, चकराते हुए कह रहे हैं – सरल हिंदी, उर्दू मिश्रित हिंदी. जिज्ञासा यह है कि डिबिया जेब में कहां से आ गई? पहले ही से थी, या अब इसकी जरूरत पड़ी है?”

‘खरे सज्जनों को हरी चिट्ठियां’ वे व्यंग्यात्मक ढंग से लिखते हैं-

‘श्रीमान् ऑनरेबल पंडित मदन मोहन मालवीय: बीए, एलएलबी के नाम: ‘हमारे एक दयालु मित्र खो गए हैं. वे हमारे कृपालु थे, हमारी हिंदी के बड़े भारी सेवक और लेखक थे. उनका आपको कुछ पता है? कहां हैं? क्यों एकांतवास करते हैं? उनकी बोलती क्यों बंद हो गई है, इसका आपको पता है? हमारे वे सौम्यदर्शन ब्राह्मण मित्र’ पंडित मदनमोहन बीए इस नाम को भूषित करते थे और दैनिक हिन्दुस्तान के वे चिराग थे. कुछ लोग तो कहते हैं कि वे ही महाशय शैलूप की तरह नई भूमिका में ‘ऑनरेबल मालवीय’ के नाम से आ गए हैं. क्या यह भी सच है? युक्तप्रांत की कचहरियों में नागरी का चंचुप्रवेश करने वाला जो प्रसिद्ध है, वह और जो किसी काल में हिंदी का लेखक था, क्या एक ही व्यक्ति की सविधि (…) है? तो क्या वह महाशय धूपछाया के रंग का है? या अनेक रूपरूपाय का भक्त होने से ‘रूपं रूपं प्रति रूपो बभूव’ हो गया है? या लोगों के चश्मे का रंग बदल गया? या उसे हिंदी लिखने में लज्जा मालूम होती है? या इसमें यश नहीं मिलेगा? क्या कारण है कि उसके हाथ में नड़ की ग्रामीण क़लम न देखकर सभ्य फाउंटेन पेन देखते हैं! (-चिट्ठीवाला)’

गुलेरी जी ने सन् 1900 से 1922 के दौरान में हिंदी में बहुत लेखन किया. यहां तक कि उन्होंने छद्म नामों से भी कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख लिखे. उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा के प्रभावी संचालन के लिए बाबू श्याम सुन्दर दास को भी यथासम्भव सहयोग प्रदान किया. वे नागरी प्रचारिणी सभा के लिए तन-मन-धन से समर्पित रहे. वे सभा के लिए कुछ देना ही चाहते थे. वहां से कुछ लिया ही नहीं. यहां तक कि सभा का पानी भी ग्रहण नहीं करते थे. इस विषय में बाबू श्याम सुन्दर दास द्वारा पूछने पर उन्होंने कहा था, “मैं सभा को बेटी मानता हूं, बेटी के यहां का अन्न-जल ग्रहण करना निषिद्ध है.’

मित्रों की सहायता के लिए वे सदैव तत्‍पर रहते थे. उन्हें साहित्य-प्रकाशन से धन अर्जित करने या यश कमाने का जैसे कोई लालच ही न था. वे दूसरों के प्रेरणा -स्रोत रहे. राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त को साहित्यिक सम्मतियां दीं, राय कृष्णदास की पाण्डुलिपियों को सुधारा और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे विद्वानों के आदि देव बन गए. उन्होंने अपने मित्रों को रचनाओं के प्रकाशनार्थ उत्साहित किया किन्तु अपनी पुस्तक तक न छपवाई. साहित्य प्रकाशन में वे संख्‍या की जगह गुणवत्‍ता के पक्षधर थे. थोडा लिखा जाए परंतु स्तरीय लिखा जाए.

गुलेरी जी ने काशी पहुंच कर प्राच्य-विभाग का पुनर्गठन किया. लेकिन गुलेरी जी को काशी जाना फला नहीं. वह जिन भावनाओं को लेकर वहाँ गए थे, वे सब धरी की धरी रह गईं. वहां पहुंचने के कुछ समय पश्चात् उन पर एक-एक कर विपत्तियां टूटने लगीं.

अपने शोध ग्रथ में डॉ. पीयूष गुलेरी गुलेरी जी के अंतिम रोग के कष्‍ट का उल्‍लेख करते हैं. अपने भाई की पत्‍नी के अंतिम संस्कार के लिए वे काशी के ‘मणिकर्णिका घाट’ गए हुए थे. उनकी तबीयत ठीक नहीं थी. अतः उन्होंने स्‍नान न करते हुए गंगाजल का आचमन और छिडकाव ही किया. तब मृतका के भाई पंडित पद्मानाभ ने क्रोधित होकर कहा- ‘‘क्या तुम नहाओगे नहीं? जान पडता है तू ब्रह्म राक्षस है.’’

गुलेरी जी सनातनी थे. यदि उन्हें श्मशानघाट पर नहाना होता तो वस्त्रों सहित नहाते. उन्हें पद्मानाभ की बात से बडा क्षोभ हुआ. उन्होंने कहा- ‘अरे चाण्डाल! जो तू मेरे प्राण लेना चाहता है तो ले.’ यह कहकर वह गंगा में कूद गए, उसी दिन से उन्हें हल्का ज्वर रहने लगा. इस ज्‍वर को खत्‍म करने के अनेक उपाय हुए. उन्‍हें बर्फ की शीलाओं पर सुलाया जाता मगर रोग कम न हुआ. सोलह दिन उपरांत 12 सितंबर 1922 को हिंदी का यह भास्‍कर अस्‍त हो गया. उस समय उनकी दैहिक आयु उनतालीस वर्ष दो महीने और पांच दिन थी. ‘उसने कहा था’ जैसी कहानी व हिंदी सेवा के माध्‍यम से वे अमर हैं.


(Source: News18 Hindi में 12 September 2022 को प्रकाशित) 


Friday, September 9, 2022

भारतेंदु हरिश्‍चंद्र: जब महावीर प्रसाद द्विवेदी को झेलना पड़ा था व्‍यंग्‍य प्रहार

भारतेंदु हरिशचंद्र ने देहांत से पहले नवंबर 1884 में बलिया के ददरी मेले में आर्य देशोपकारिणी सभा में एक भाषण दिया था. इस भाषण का विषय था-भारत वर्ष उन्नति कैसे हो सकती है. उस समय अंग्रेजों का शासन था, और आजादी की कोई संभावना सामने नहीं दिखती थी. ऐसे में भारतेंदु ने देश की उन्नति के लिए देशवासियों को सुझाव दिए थे. लगता है 138 सालों बाद आज भी बहुत कुछ नहीं बदला है. मानो यह भाषण आज के लिए ही दिया गया है.

आज भले ही नई हिंदी की बात हो रही है मगर हिंदी तो नई चाल में 1873 में ढली थी. भारतेंदु हरिशचंद्र ने लिखा था कि हिंदी नई चाल में ढली और हिंदी को इस चाल में ढालने के लिए भारतेंदु को मात्र दस वर्ष का समय मिला. इन दस वर्षों में हिंदी की सेवा में भारतेंदु हरिशचंद्र ने वो रच दिया जो इतिहास बन गया. आलोचकों की नजर में भाषा के बाद भारतेंदु का सबसे बड़ा योगदान नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में रहा. उन्होंने पहली बार हिंदी में मौलिक नाटकों की रचना की. उन्हें हिंदी नाटक का युग प्रवर्त्तक करार दिया गया.









भारतेंदु हरिशचंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 बनारस के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था. 6 जनवरी 1885 को उनका देहांत हो गया. उनका मूल नाम ‘हरिश्चंद्र’ था और ‘भारतेंदु’ उनकी उपाधि थी. वे अत्‍यंत धनाढ्य परिवार से थे मगर साहित्‍य की सेवा और गरीबों के प्रति उदारता के कारण सबकुछ लुटा दिया. किसी को दु:खी और परेशान देखकर उसे तन के वस्त्र तक उतारकर दे देना भारतेंदु का सामान्‍य व्‍यवहार था. धनहीन होने पर उन्हें सबसे ज्यादा अफसोस इसी बात का होता था कि वह निर्धनों की सहायता नहीं कर पा रहे थे.

भारतेंदु के दान की बहुत-सी कहानियां प्रसिद्ध हैं. सर्दियों की रात में बाहर घूमते हुए उन्हें एक दरिद्र सोता हुआ मिला. उसे सर्दी से ठिठुरता देखकर उन्होंने उसे अपना दुशाला ओढ़ा दिया. एक बार नीचे फकीर को ओढना मांगते देखकर ऊपर से ही उसे दुशाला भेंट किया. किसी गरीब को फूलों का गजरा उतारकर उसमें पांच का नोट छिपाकर दे दिया. किसी को बेटी ब्याहने के लिए पेटी में दो सौ रुपये और साड़ियां भेंट की. कुछ न रहने पर एक निर्धन को लड़कियां ब्याहने के लिए उन्होंने हाथ की अंगूठी उतारकर दे दी और अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए कहा, “मेरे यहां धन का अभाव है; यह अंगूठी आप ही के भाग्य से बची रह गई थी, इसे लीजिए.”

यह भी सर्वविदित है कि पुस्तकें और पत्रिकाएं छापने के लिए उन्होंने अपना खजाना खोल दिया. पुस्तकों के लिए पुरस्कार देने, दूसरों को पुस्तकें देने, साहित्यकारों की आर्थिक सहायता करने में उन्‍होंने कितना खर्च किया इसका कोई हिसाब नहीं है.

प्रख्‍यात आलोचक रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्‍तक ‘भारतेंदु हरिश्‍चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्‍याएं’ में भारतेंदु के जीवन के कई अनजाने पहलुओं का उल्‍लेख किया है. इसमें भारतेंदु की पत्रिका में प्रकाशित एक विज्ञापन में हुई मात्रा की त्रुटि पर आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को मिले व्‍यंग्‍य प्रत्‍युत्‍तर का भी जिक्र है. महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भारतेंदु हरिशचंद्र द्वारा लिखे एक विज्ञापन में ‘का’ की जगह ‘को’ लिख दिए जाने की भूल दिखाते हुए कहा था कि संभव है, उन्होंने वाक्य ठीक लिखा हो, लेकिन छापे वालों की असावधानी से त्रुटियां रह गई हों.

इस पर बालमुकुंद गुप्त ने तीखा व्यंग्य लिखा. ‘भाषा की अनस्थिरता’ नाम के अपने ऐतिहासिक निबंध में बालमुकुंद गुप्‍त ने लिखा था, “एक तो काशी ऐसा स्थान है, जिसकी विद्या के हिसाब से कुछ गिनती ही नहीं. जहां न कोई संस्कृत जानता है न संस्कृत का व्याकरण, हिंदी पढ़ा-लिखा तो वहां होगा ही कौन, क्योंकि हिन्दी वहां की मातृ भाषा है. फिर हरिश्चंद्र जैसा विद्या-शून्य आदमी, जिसने लाखों रुपए हिंदी के लिए स्वाहा कर डाले और पचासों ग्रंथ हिन्दी के रच डाले, भला वह क्या एक पूरे पौने दो वाक्य का विज्ञापन शुद्ध लिख सकता था? कभी नहीं, तीन काल में नहीं! छापे वाले कभी नहीं भूले, हरिश्चंद्र ही भूला; क्योंकि वह व्याकरण नहीं जानता था. न तो उसे कर्म के चिह्न ‘को’ का विचार था, न वह सर्वनाम की जरूरत की खबर रखता था. क्या अच्छा होता कि द्विवेदीजी का दो दर्जन साल पहले जन्म होता और हरिश्चंद्र को आपके शिष्यों में नाम लिखाने तथा कुछ व्याकरण सीखने का अवसर मिल जाता! अथवा यही होता कि दो दर्जन वर्ष हरिश्चंद्र और जीता, जिससे द्विवेदीजी से व्याकरण सीख लेने का अवसर उसे मिल जाता.”

रामविलास शर्मा लिखते हैं बालमुकुंद गुप्‍त ने भारतेन्दु के सम्मान की रक्षा के लिए यूं व्यंग्णास्त्र उठाया है मानो किसी ने पवित्र देवमंदिर को भ्रष्ट कर दिया हो या उनके गुरु को ही गाली दी हो.

मात्र 34 वर्ष 4 महीने की छोटी सी आयु में भारतेंदु ने भाषा, साहित्य और समाज में व्यापक परिवर्तन कर दिया. उनके लिखे और अनुवादित किए हुए नाटक साढ़े आठ सौ पृष्ठों में छपे हैं. साढ़े आठ सौ से कुछ ऊपर पृष्‍ठों में उनकी कविताएं छपी हैं. उनके लेख कई हजार पन्ने घेरेंगे. उनके लिखे हुए पत्रों की कोई गणना नहीं है. इतने परिमाण में साहित्य रचना परिश्रम करने की अद्भुत क्षमता प्रकट करता है. कहा जाता है कि भारतेंदु का पुस्तकालय एक लाख रुपये में बिक सकता था, लेकिन उन्होंने बेचने से इंकार कर दिया था. उन्होंने इस पुस्तकालय की तो पुस्तकें पड़ी ही होंगी? इसके सिवा जो पढ़ा हो, सो थोड़ा.

भारतेंदु  ने अपने देहांत से पहले नवंबर 1884 में बलिया के ददरी मेले में आर्य देशोपकारिणी सभा में एक भाषण दिया था. यह नवोदिता हरिश्‍चंद्र चंद्रिका में दिसंबर 1884 के अंक में छपा था. इस भाषण का विषय था-भारत वर्षोन्नति कैसे हो सकती है. उस समय अंग्रेजों का शासन था, और आजादी की कोई संभावना सामने नहीं दिखती थी. देश की उन्नति कैसे हो, इसके बारे में भारतेंदु ने देशवासियों को सुझाव दिए थे. इस भाषण के केंद्र में यह चिंता थी कि देश की उन्नति कैसे हो सकती है.

चर्चित नाटक ‘भारत दुर्दशा’ में भारतेंदु ने अंग्रेजी राज की जितनी तीखी आलोचना की है उतनी ही तीखी आलोचना भारतीय जनता की भी की है. इसमें एक ओर अंग्रेजी शासन और शोषण के दृश्‍य हैं तो दूसरी ओर भारतीय जनता के आलस्‍य, अंधविश्वास, भाग्यवाद और जातिवाद की तस्‍वीरें भी है. इन दृश्‍यों में भारत की उन्‍नति के बीज छिपे हैं. बलिया वाले भाषण में भी भारतेंदु ने भारत की गुलामी के कारण बताए हैं :

  • हमारे हिंदुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं. यद्यपि फर्स्ट क्लास, सेकेंड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी-अच्छी और बड़े-बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी हैं पर बिना इंजन ये सब नहीं चल सकतीं, वैसे ही हिंदुस्तानी लोगों को कोई चलाने वाला हो तो ये क्या नहीं कर सकते. 
  • राजे-महाराजों को अपनी पूजा भोजन झूठी गप से छुट्टी नहीं. हाकिमों को कुछ तो सरकारी काम घेरे रहता है, कुछ बॉल, घुड़दौड़, थिएटर, अखबार में समय गया. कुछ बचा भी तो उनको क्या गरज है कि हम गरीब गंदे काले आदमियों से मिलकर अपना अनमोल समय खोएं.
  • पहले भी जब आर्य लोग हिंदुस्तान में आकर बसे थे, राजा और ब्राह्मणों ही के जिम्मे यह काम था कि वे देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति फैलाएं। ये लोग चाहें तो हिंदुस्तान प्रतिदिन-प्रतिक्षण बढ़ सकता है पर इन्हीं लोगों को सारे संसार के निकम्मेपन ने घेर रखा है.
  • अंग्रेजों के राज्य में सब प्रकार का सामान पाकर, अवसर पाकर भी हम लोग जो इस समय पर उन्नति न करें तो हमारा केवल अभाग्य और परमेश्वर का कोप ही है. अंगरेजों के राज्य में भी हम कूंए के मेंढ़क, काठ के उल्लू, पिंजड़े के गंगाराम ही रहें तो हमारी कमबख्त कमबख्ती फिर कमबख्ती है.क्या इंग्‍लैंड में किसान, खेतवाले, गाड़ीवान, मजदूर, कोचवान आदि नहीं है? किसी देश में भी सभी पेट भरे हुए नहीं होते. किंतु वे लोग जहां खेत जोतते, बोते हैं वहीं उसके साथ यह भी सोचते हैं कि ऐसी और कौन नई मशील या मसाला बनाएं जिसमें इस खेती में आगे से दूना अन्न उपजे. विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढ़ते हैं. जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहां गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अखबार निकाला. यहां उतनी देर कोचवान हुक्का पीएगा या गप्प करेगा. यह गप्प भी निकम्मी. वहां के लोग गप्प ही में देश के प्रबंध करते है. सिद्धांत यह कि वहां के लोगों का यह सिद्धांत है कि एक क्षण भी व्यर्थ न जाएं. यहां लोगों में जितना निकम्मापन होगा उसे उतना ही अमीर समझा जाता है.
  • राजा महाराजों का मुंह मत देखो, मत यह आशा रखो कि पंडितजी कथा में कोई देश का रुपया और बुद्धि बढ़ाने के उपाय बताएंगे. तुम खुद ही कमर कसो, आलस छोड़ो. दौड़ो इस घोड़दौड़ में जो पीछे रह गए तो फिर कहीं ठिकाना नहीं है.


लगता है 138 सालों बाद आज भी बहुत कुछ नहीं बदला है. मानो यह भाषण आज के लिए ही दिया गया है. अब यह प्रश्न होगा कि उन्नति और सुधार कैसे होगा? इसके भी सूत्र उसी भाषण में हैं :

  • सब उन्नतियों का मूल धर्म है. इससे सबके पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है. देखो, अंग्रेजों की धर्मनीति और राजनीति परस्पर मिली है, इससे उनकी दिन दिन कैसी उन्नति है. बीच में जो खराबी हुई है वह इसलिए कि लोगों ने धर्म का मतलब नहीं समझा. वास्तविक धर्म तो केवल परमेश्वर के चरणकमल का भजन है. बाकी सब तो समाजधर्म हैं जो देशकाल के अनुसार बदले जा सकते हैं.
  • महात्मा- ऋषियों के वंशजों ने बहुत से नए नए धर्म बनाकर रख दिए. सभी तिथियां व्रत और सभी स्थान तीर्थ हो गए. आंख खोलकर देख-समझ लीजिए कि ऋषियों ने कोई बात क्यों बनाई और उनमें देश और काल के जो अनुकूल और उपकारी हो उसको ग्रहण कीजिए.
  • बहुत सी बातें जो समाज-विरुद्ध मानी हैं किंतु धर्मशास्त्रों में जिनका विधान है उनको चलाइए. जैसे जहाज का सफर, विधवा विवाह आदि. लड़कों को छोटेपन ही में ब्याह करके उनका बल, वीर्य, आयुष्य सब मत घटाइए. आप उनके मां बाप हैं या उनके शत्रु हैं. कुलीन प्रथा, बहुविवाह को दूर कीजिए.
  • हिंदू, जैन, मुसलमान सब आपस में मिलिए. जाति में कोई चाहे ऊंचा हो चाहे नीचा हो सबका आदर कीजिए, जो जिस योग्य हो उसको वैसा मानिए. छोटी जाति के लोगों को तिरस्कार करके उनका जी मत तोड़िए. सब लोग आपस में मिलिए.
  • मुसलमान भाइयों इस हिंदुस्तान में बस कर वे हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ दें. ठीक भाइयों की भांति हिंदुओं से बरताव करें. ऐसी बात, जो हिंदुओं का जी दुखाने वाली हो, न करें. जो बात हिंदुओं को नहीं मयस्सर हैं वह धर्म के प्रभाव से मुसलमानों को सहज प्राप्त हैं. उनमें जाति नहीं, खाने पीने में चौका चूल्हे का भेद नहीं, विलायत जाने में रोक टोक नहीं. फिर भी बड़े ही सोच की बात है, मुसलमानों ने अभी तक अपनी दशा कुछ नहीं सुधारी. अब आलस हठधर्मी यह सब छोड़ो. चलो, हिंदुओं के साथ तुम भी दौड़ो, एकाएक दो होंगे. पुरानी बातें दूर करो. मीरहसन की मसनवी और इंदरसभा पढ़ाकर छोटेपन ही से लड़कों का सत्यानाश मत करो. अच्छी से अच्छी उनको तालीम दो. लड़कों को रोजगार सिखलाओ. विलायत भेजो. छोटेपन से मेहनत करने की आदत दिलाओ. सौ सौ महलों के लाड़ प्यार दुनिया से बेखबर रहने की राह मत दिखलाओ.
  • भाई हिंदुओ! तुम भी मतमतांर का आग्रह छोड़ो. आपस में प्रेम बढ़ाओ. इस महामंत्र का जप करो. जो हिंदुस्तान में रहे, चाहे किसी रंग किसी जाति का क्यों न हो, वह हिंदू. हिंदू की सहायता करो. बंगाली, मराठी, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्राह्मणों, मुसलमान सब एक का हाथ एक पकड़ो.
  • अब तो नींद से चौंको, अपने देश की सब प्रकार उन्नति करो. जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढ़ो, वैसे ही खेल खेलो, वैसी ही बातचीत करो. अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो.


(Source: News18Hindi में 9 September 2022 को प्रकाशित)