आशी मनोहर नहीं रहे।
यह खबर भोपाल की सांस्कृतिक थाती को समझने वाले हर व्यक्ति को प्रभावित कर गई। लेकिन एक शख्स के दुनिया से चले जाने से ज्यादा दुख इसलिए हुआ कि एकमात्र अखबार नवदुनिया को छोड़ शहर के किसी भी अखबार ने इस संस्कृतिकर्मी के निधन पर चार लाइन का समाचार तक प्रकाशित नहीं किया! (ऐसे में श्रृद्धांजलि लेख की उम्मीद तो फिजूल है।)
...और रंज तब हुआ जब हमारे एक वरिष्ठ साथी से पता चला कि सभी अखबारों के कला संवाददाताओं ने आशी की मृत्यु की जानकारी पर उनसे जुड़े तमाम संदर्भ खंगाले थे लेकिन किसी ने भी एक लाइन नहीं लिखी!
हो सकता है पत्रकार मित्रों ने लिखी हो और डेस्क ने हर बार की तरह अपनी कैंची चला दी हो लेकिन कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि शहर के एक रचनात्मक व्यक्ति के निधन पर उसे सार समाचार में भी एक सूचना की तरह स्थान नहीं मिला।
यहाँ मुझे माँ पर लिखी एक कविता याद आ रही है जिसमें माँ की मृत्यु तो चार दिन पहले हो जाती है लेकिन बेटे की स्मृतियों में या यूँ कह लें बेटे के लिए वह तब तक जीवित रहती हैं जब तक उसे मौत का समाचार नहीं मिल जाता। यानि आशी अपने कई प्रशंसकों के लिए तब तक जीवित हैं जब तक की किसी माध्यम से उन तक निधन की सूचना नहीं पहुँच जाती। (क्योंकि सूचना पहुँचाने के आम माध्यम अखबारों ने अपनी यह भूमिका भी नहीं निभाई।)
यह सब सोचते वक्त एक बात बार-बार अखर रही है कि हमारी संवेदना और चयन का स्तर किस कदर गिरा है कि हम सामाजिक हो कर भी घोर असामाजिक प्राणी है। ठीक उस प्रतिक्रिया की तरह जब दुर्घटना की खबर बता रहे पत्रकार से सीनियर पूछ लेता है कि कोई मरा या नहीं? जितनी जाने गई होंगी, उतनी 'बड़ी" खबर होगी।
वैसे यहाँ यह बताना मौजूँ होगा कि अपनी संस्था के माध्यम से बच्चों के लिए पहला बाल समारोह प्रारम्भ करने आशी उम्र मे अंतिम चरण में भी नई पौध को संस्कारवान बनाने के प्रयत्न में जुटे रहे। उन्होंने विवाह की बाहरी नहीं आंतरिक तैयारियों के लिए कोचिंग संस्थान प्रारम्भ किया। यह अनूठा संस्थान परिवार जैसी संस्था को टूटने से बचाने का प्रयत्न था।
मूल रूप से उदयपुर के निवासी आशी का परिवार 1954 में भोपाल आया था। उन्होंने 'प्रेक्षक" रंग समूह बनाया था जिसने सत्तर-अस्सी के दशक में काफी रंग-गतिविधियां की थीं। किसी निजी संस्था की ओर से प्रदेश का ही नहीं बल्कि पूरे देश का पहला बाल समारोह 'बखत राम उत्सव" का कई सालों तक सफल आयोजन किया। वे 'रंग संधान" नामक पत्रिका निकालते थे। विरासत को सहेजने के लिए वे इसमें बड़ी दुर्लभ कालजयी कृतियों का नए कलेवर में प्रस्तुत करते थे। श्री आशी ने इस पत्रिका के नाम पर 'रंग संधान फाउंडेशन" की भी स्थापना की थी। उन्होंने 'दिगन्त" नामक अखबार भी निकाला।
वे अभिनय रंगनिर्देशन, रंग शिविर का आयोजन, रंग संस्था का संचालन आदि बहुआयामी कार्यों में सक्रिय थे। उनकी बनाई फिल्मों में 'सूरज का अंश" शामिल है। पण्डवानी तीजन बाई पर बनने वाली इकलौती फिल्म का निर्माण उन्होंने किया।
पिछले साल उन्होंने कोचिंग की बेहद नई परिभाषा गढ़ी थी और 'सर्वोत्तम संस्थान" प्रारंभ किया इसमें विवाह पूर्व तैयारियां, पर्सनालिटी डेवलपमेंट, अंग्रेजी बोलने का प्रशिक्षण आदि दिया जाता है। उनका सबसे आखिरी प्रोजेक्ट था लैण्ड मार्क जिसमें प्रापर्टी डीलिंग के लिए काउंसलिगि, प्रोमोशन आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है। आशी ने अपने जीवन के कैनवास पर इतने रंग बिखराएँ कि जीवन का कोई मोड़ हो, मित्रों और प्रशंसकों को वे बहुत याद आएँगे।
Wednesday, September 1, 2010
Monday, August 30, 2010
माण्डू
~ श्री राजू कुमार के फोटो पर अपनी कविता ~
माण्डू,
तुम रूपमती के रूप से सुंदर कहलाते हो।
तुम्हारे महल उतने ही ऊँचे हैं
जितना ऊँचा बाज बहादुर का प्यार था।
'रूपमती यहाँ से आती थी हाथी पर सवार हो।
जनाब, ये देखिए, यहीं से करती थी पूजा
देवी नर्मदा की।" जब कहता है गाइड
तो लगता है,
माण्डू के आँगन में धड़क रही है प्रेम गाथा।
बावरी हवा
इस कदर सुहानी लगती है
जैसे अभी-अभी रूपमती को छू कर आई हो।
इतिहास की धुंध तुम्हारा क्या बिगाड़ेगी माण्डू
दिन-महीने-साल गुजरते और जवान हो रही है
तुम्हारी आँगन की प्रेम कहानी।
माण्डू,
तुम रूपमती के रूप से सुंदर कहलाते हो।
तुम्हारे महल उतने ही ऊँचे हैं
जितना ऊँचा बाज बहादुर का प्यार था।
'रूपमती यहाँ से आती थी हाथी पर सवार हो।
जनाब, ये देखिए, यहीं से करती थी पूजा
देवी नर्मदा की।" जब कहता है गाइड
तो लगता है,
माण्डू के आँगन में धड़क रही है प्रेम गाथा।
बावरी हवा
इस कदर सुहानी लगती है
जैसे अभी-अभी रूपमती को छू कर आई हो।
इतिहास की धुंध तुम्हारा क्या बिगाड़ेगी माण्डू
दिन-महीने-साल गुजरते और जवान हो रही है
तुम्हारी आँगन की प्रेम कहानी।
Friday, August 27, 2010
वह लिखेगी
~ श्री अनिल गुलाटी के खींचे फोटो पर अपनी कविता ~
वह लिख रही है
'अ" अनार का।
कल वह लिखेगी
'उ" से उजास और
'व" से विकास।
आज उसकी आँखों में सपने हैं
कल हाथों में ताकत होगी
तब वह बदलेगी सूरत
तब दिन भी बहुरेंगे।
वह लिख रही है
'अ" अनार का।
कल वह लिखेगी
'उ" से उजास और
'व" से विकास।
आज उसकी आँखों में सपने हैं
कल हाथों में ताकत होगी
तब वह बदलेगी सूरत
तब दिन भी बहुरेंगे।
Tuesday, August 24, 2010
कथक के आसमान का चाँद
उनका नाम ही मकबूल है। कहने को आसमान में हजारों सितारे हैं लेकिन कथक के संसार की वह इकलौती चाँद हैं!
हो सकता है कि उन्हें देखे बगैर इन पंक्तियों में अतिश्योक्ति नजर आ जाए लेकिन सच तो यह है कि जो भी शख्स सितारा देवी से मिल लेता है, वह बिना झिझक इस बात को स्वीकार कर लेता है कि उनके जैसा कोई नहीं है। वे 90 वर्ष की हैं लेकिन कथक के प्रति उनका जोश किसी युवा से कम नहीं है। 77 वर्ष की उम्र जब अधिकांश लोग मौत की राह तकते हैं, पलंग पर गुजर-बसर करते हैं, वे भोपाल में 4 घंटे तक कथक से दर्शकों को हतप्रभ करती हैं और जब अगली बार 13 साल बाद 21 अगस्त 2010 को भोपाल आती हैं तो भले नृत्य नहीं करती है लेकिन मंच पर गायन के साथ ऐसी भावमुद्रा बनाती हैं कि सभागार में बैठा कला समाज भौंचक देखता रहता है।
यह जिक्र उस कलाकार का है जिसका नाम धनलक्ष्मी रखा गया था। 1920 की दीपावली की पूर्व संध्या पर जन्म लेने के कारण भी संभव है कि यह नाम रखा गया हो। बाद में जब मंच पर इस नन्हीं कलाकार ने अपने हुनर का मुजाहिरा किया तो 'सितारा" नाम मुफीद समझा गया। यही सितारा देवी 21 अगस्त को भोपाल में थी। मुझे कुछ पल उनके संग रहने और उनके आभा मंडल को जानने का मौका मिला। मैंने पाया कि 90 वर्ष की उम्र में उनकी देह थकी है लेकिन नृत्य के प्रति आग्रह और उत्साह जरा कम नहीं हुआ और न ही उनके स्वाभिमान की ठसक कम हुई है। मकबूल नृत्यांगना सितारा देवी से बात करते समय मानो एक स्वर्णिम दौर जीवंत हो उठता है। वे हर व्यक्ति से आत्मीय से बात करती हैं। उनकी इस भोपाल यात्रा मैं भी उन्हें गुनगुनाते, नृत्य की भाव मुद्रा बनाते देख लोगों को 16 साल पहले की वह शाम याद आ गई जब भारत भवन में उन्हें कालिदास सम्मान प्रदान किया गया था। तब 77 वर्षीय सितारा देवी ने तुलसीदासजी की विनय पत्रिका की ख्यात पंक्तियों 'ठुमकत चलत रामचन्द्र बाजत पैजनियाँ" पर चमत्कृत कर देने वाली प्रस्तुति दी थी। उन्हें 1975 में पद्मश्री दिया गया लेकिन बाद में पद्मभूषण लेने से इंकार कर दिया। जब सम्मान की बात चली तो उन्होंने कहा कि भारत रत्न से कम कोई सम्मान मंजूर नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार मेरेे योगदान को नहीं जानती। ऐसे सम्मान का क्या मतलब। भोपाल में मधुवन द्वारा दिए गए सम्मान पर उन्होंने कहा कि यह सुरेश तांतेड़ जैसे साधक के श्रम की संस्था है। ऐसी संस्थाओं से मिला सम्मान स्वीकार हैं क्योंकि यह प्रशंसकों के ोह का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि नए नर्तकों में लगन और साधना की कमी दिखलाई देती है। वो दौर और था जब बरसों ने अभ्यास के बाद भी मंच नहीं मिलता था। अब तो गुरू फटकार दे तो शिष्य अगले दिन आना बंद कर देते हैं। कला के लिए यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है।
उम्र का इजहार आम तौर पर महिलाओं की कमजोरी मानी जाती है। इसलिए भरसक प्रयास किया जाता है कि इसे छुपाया जा सके लेकिन 90 वर्षींय महिला मंच से घोषित उम्र की सत्यता जाँचने का प्रयास करें तो इसे क्या कहेंगे? जी हाँ, रवीन्द्र भवन में जब उनके परिचय के साथ उम्र को उल्लेख किया गया तो उन्होंने उद्घोषक को पास बुला कर स्पष्ट जाना कि क्या उम्र बताई गई है। यह उनके परफेक्शन का एक नमूना है। सोचिए जब वे मंच पर होती होंगी तब नृत्य के साथ कितनी सम्पूर्णता रखती होंगी।
इसीलिए वे सितारा हैं।
हो सकता है कि उन्हें देखे बगैर इन पंक्तियों में अतिश्योक्ति नजर आ जाए लेकिन सच तो यह है कि जो भी शख्स सितारा देवी से मिल लेता है, वह बिना झिझक इस बात को स्वीकार कर लेता है कि उनके जैसा कोई नहीं है। वे 90 वर्ष की हैं लेकिन कथक के प्रति उनका जोश किसी युवा से कम नहीं है। 77 वर्ष की उम्र जब अधिकांश लोग मौत की राह तकते हैं, पलंग पर गुजर-बसर करते हैं, वे भोपाल में 4 घंटे तक कथक से दर्शकों को हतप्रभ करती हैं और जब अगली बार 13 साल बाद 21 अगस्त 2010 को भोपाल आती हैं तो भले नृत्य नहीं करती है लेकिन मंच पर गायन के साथ ऐसी भावमुद्रा बनाती हैं कि सभागार में बैठा कला समाज भौंचक देखता रहता है।
यह जिक्र उस कलाकार का है जिसका नाम धनलक्ष्मी रखा गया था। 1920 की दीपावली की पूर्व संध्या पर जन्म लेने के कारण भी संभव है कि यह नाम रखा गया हो। बाद में जब मंच पर इस नन्हीं कलाकार ने अपने हुनर का मुजाहिरा किया तो 'सितारा" नाम मुफीद समझा गया। यही सितारा देवी 21 अगस्त को भोपाल में थी। मुझे कुछ पल उनके संग रहने और उनके आभा मंडल को जानने का मौका मिला। मैंने पाया कि 90 वर्ष की उम्र में उनकी देह थकी है लेकिन नृत्य के प्रति आग्रह और उत्साह जरा कम नहीं हुआ और न ही उनके स्वाभिमान की ठसक कम हुई है। मकबूल नृत्यांगना सितारा देवी से बात करते समय मानो एक स्वर्णिम दौर जीवंत हो उठता है। वे हर व्यक्ति से आत्मीय से बात करती हैं। उनकी इस भोपाल यात्रा मैं भी उन्हें गुनगुनाते, नृत्य की भाव मुद्रा बनाते देख लोगों को 16 साल पहले की वह शाम याद आ गई जब भारत भवन में उन्हें कालिदास सम्मान प्रदान किया गया था। तब 77 वर्षीय सितारा देवी ने तुलसीदासजी की विनय पत्रिका की ख्यात पंक्तियों 'ठुमकत चलत रामचन्द्र बाजत पैजनियाँ" पर चमत्कृत कर देने वाली प्रस्तुति दी थी। उन्हें 1975 में पद्मश्री दिया गया लेकिन बाद में पद्मभूषण लेने से इंकार कर दिया। जब सम्मान की बात चली तो उन्होंने कहा कि भारत रत्न से कम कोई सम्मान मंजूर नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार मेरेे योगदान को नहीं जानती। ऐसे सम्मान का क्या मतलब। भोपाल में मधुवन द्वारा दिए गए सम्मान पर उन्होंने कहा कि यह सुरेश तांतेड़ जैसे साधक के श्रम की संस्था है। ऐसी संस्थाओं से मिला सम्मान स्वीकार हैं क्योंकि यह प्रशंसकों के ोह का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि नए नर्तकों में लगन और साधना की कमी दिखलाई देती है। वो दौर और था जब बरसों ने अभ्यास के बाद भी मंच नहीं मिलता था। अब तो गुरू फटकार दे तो शिष्य अगले दिन आना बंद कर देते हैं। कला के लिए यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है।
उम्र का इजहार आम तौर पर महिलाओं की कमजोरी मानी जाती है। इसलिए भरसक प्रयास किया जाता है कि इसे छुपाया जा सके लेकिन 90 वर्षींय महिला मंच से घोषित उम्र की सत्यता जाँचने का प्रयास करें तो इसे क्या कहेंगे? जी हाँ, रवीन्द्र भवन में जब उनके परिचय के साथ उम्र को उल्लेख किया गया तो उन्होंने उद्घोषक को पास बुला कर स्पष्ट जाना कि क्या उम्र बताई गई है। यह उनके परफेक्शन का एक नमूना है। सोचिए जब वे मंच पर होती होंगी तब नृत्य के साथ कितनी सम्पूर्णता रखती होंगी।
इसीलिए वे सितारा हैं।
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