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Tuesday, February 1, 2011

सखी वे कह कर जाते?

वसंत आ रहा है...



सखी, देखो वो चला आ रहा है चुपचाप...बिना पदचाप...जैसे कोई देख ना ले...कोई सुन ना ले...उसके आने की आहट।


वसंत हाँ, वसंत ऐसे ही तो आता है, जीवन में भी। जाने कब आ कर हथेलियों पर बिखरा देता है मेंहदी।  स्वप्न कुसुम केसरिया रंग ओढ़ लेते हैं...।


वसंत का आना पता ही नहीं चलता...इस दौड़ती भागती जिंदगी में।


ऐसे ही चुपचान आया था वसंत, उस दिन, उस साल।


मानो कल ही की बात हो जैसे।


यूँ लगता था जैसे आँगन में लगा हर पौधा गुलमोहर हो गया हो और मन के भीतर तमाम तरफ बोगनवेलिया उग आए हों। रंग-बिरंगे जंगली फूलों की तरह खिले सपने, बेतरतीब जरूर थे...बेपरवाह लोगों को कहाँ अनुशासन की फिक्र ? उनका उन्मुक्त होना ही तो सौंदर्य के गुलदस्ते में बँधने से ज्यादा जरूरी था। ऐसे ही थे सपनों के नील गगन में ऊँची उड़ान भरते इरादे।


यूँ होगा तो ऐसा कह देंगे...ऐसा हुआ तो वैसा कर लेंगे।  ख्यालों के केनवास पर बनते-बिगड़ते विचार। पतंगों के पेंच की तरह लड़ते, ढील देते, काट करते विचार।


अपना धागा-अपनी पतंग। खूब उड़ाओ...न आसमान खत्म होता न ख्वाबों की डोर छोटी पड़ती।


और एक दिन जब...ख्याल सच करने की बारी आई...छोटा रह गया सबकुछ।


हाथों से छूट गई डोर, डोलने लगी पतंग, यकायक बेआब हो गए फूल सारे, छोटा पड़ गया साहस अपना।


न बोल फूटे, न हाथ बढ़े।


अरे, कहीं इसे ही तो काठ मारना नहीं कहते हैं?


बल्लियों उछलने वाले उस क्षण पाताल में जम गए थे सारे। मन ही मन जो बुना था, ख्याली साबित हुआ सबकुछ।


क्या हो गया था नैन तुमको? तुम ही रोक लेते पलछिन उनको। पर तुम्हें फुर्सत कहाँ बहने से और...


और वे चले गए जैसे गुजर जाता है हर लम्हा, अच्छा हो या बुरा।


कितना रोकना चाहा, लेकिन कहाँ मैंने कहा और कहाँ उसने सुना?


चले गए वे भी...जैसे सब जाते हैं।


अब कहने से क्या होता है- सखी वे कह कर जाते?


सचमुच अगर वे कह कर जाते तो क्या जा पाते?




Tuesday, November 2, 2010

लौटा लाओ कि हमेशा के लिए न चले जाएँ वे


श्मशान में सचेत करती अनिल गोयल की पंक्तियाँ
 'क्रूरता से विदा किया तुमने/
वे सहजता से चले गए/
चाहो तो लौटा लाओ/
लौटा लाओ कि/
चले जाएँ ना इतनी दूर/
जहाँ से नहीं लौटता कोई।"

सुभाष नगर विश्राम घाट की दीवारों पर चित्रों के साथ टंगी ऐसी ही पंक्तियाँ बरबस रोक लेती है और सोचने को मजबूर करती हैं। कहते हैं श्मशान अस्थाई वैराग्य करवाता है। कुछ पलों के लिए ही सही लेकिन यहीं आकर व्यक्ति को अपनी ताकत और क्षणभंगुरता का अहसास होता है। यही वह पल होते हैं जब वह खालिस अपने कर्म और अपने जीवन के बारे में खरा चिंतन करता है। चिंतन के इन्हीं पलों को अनिल गोयल ने और गहरा, और भावपूर्ण, और असरकारी बना दिया है। विश्राम घाट की दीवारों, पीलर्स पर दो दर्जन से ज्यादा फ्रेम टंगी हैं। हर एक में बुजुर्गों के श्वेत-श्याम चित्रों के साथ काव्य पंक्तियाँ हैं। चिंतन के क्षणों में ये पंक्तियाँ आपको सोचने पर मजबूर करती हैं। बुजुर्गों के साथ अपने व्यवहार का आकलन करने को विवश करती हैं। शायद ही कोई होगा जिसे इन पंक्तियों ने आकृष्ट न किया हो और बिरला ही होगा जिसने इन्हें पढ़ने के बाद भी अपने बुरे बर्ताव में सुधार न किया हो।

मसलन, एक फ्रेम में लिखा है-
'प्रतिबंध था जिसके बोलने पर 
 उसके बारे में बोला गया
मृदुभाषी शोकसभा में।"
ये पंक्तियाँ किसी विवरण की माँग नहीं करती। सीधे दिल में उतरती हैं और दिमाग पर असर करती हैं। इन कविताओं में बेटों के बाद भी बुजुर्गों के अकेले छूट जाने की पीड़ा को देखा-समझा और महसूसा जा सकता है।

अनिलजी का जन्म 6 नवंबर 1961 को विदिशा में हुआ था। छह साल की उम्र में हुआ पोलियो 70 फीसदी विकलांगता दे गया। शरीर ने कष्ट सहे लेकिन इरादे मुरझाए नहीं, वेदना पा कर संवेदना गहरी होती गई। अनिलजी ने संघर्ष किया, खुद को कभी लेखक, कभी अभिनेता, कभी नाटकों में व्यक्त किया। बुजुर्गों खास कर माँ पर अनिलजी की अभिव्यक्ति लाजवाब है। इस अभिव्यक्ति की शुरूआत भी उन्होंने भोपाल से ही की। वैलेंटाइन डे पर जब युवा पीढ़ी अपने इश्क के इजहार में व्यस्त थी, अनिलजी ने होटल सरल में माँ के प्रति अनुराग दर्शाती फोटो-कविता प्रदर्शनी का आयोजन किया। यहाँ काफी तारीफ मिली। वे कहते हैं कि बुजुर्गों के प्रति यवाओं का व्यवहार उन्हें कष्ट पहुँचाता है। यही वजह है कि उन्होंने श्मशान घाट में चित्र-कविताएँ लगवाई। यदि इससे सबक ले कर बेटों ने माँ-बाप की सुध ले ली तो समझो मकसद पूरा हो गया। अनिलजी इसीबात को एक पोस्टर में कुछ यूँ कहते हैं-
'माँ के कर्ज की किश्त/
समय पर चुकाइये/
सुख समृद्धि और वैभव का बोनस पाइए।"

Wednesday, October 13, 2010

तीन साल से सूचना मिलने का इंतजार

पुनर्वास विभाग को नहीं पता कितने हुए विस्थापित
 मप्र के पुनर्वास विभाग को नहीं पता है कि प्रदेश में विभिन्न योजनाओं के तहत कितने लोगों को विस्थापित किया गया और कितने लोगों का पुनर्वास किया गया। विभाग से जब 2006 में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी माँगी गई तो जवाब मिला-'हम बांग्लादेशी और पाकिस्तान के विस्थापितों का काम देखते हैं। प्रदेश के विस्थापन की जानकारी नहीं है।" जब राज्य सूचना आयोग ने सूचना जुटा कर देने को कहा तो पुनर्वास विभाग ने 13 विभागों से जानकारी माँगी। तब से जानकारी ही जुटाई जा रही है।
यह एक उदाहरण सूचना के अधिकार की ताकत और जरूरत बताने के लिए काफी है। 12 अक्टूबर 2007 में लगाए गए इस आवेदन के जवाब में विभाग ने जानकारी न होने बात कह दी। प्रथम अपील में भी प्रकरण खारिज कर दिया गया तो राज्य सूचना आयोग में अपील की गई। सुनवाई के बाद आयोग ने कहा कि पुनर्वास विभाग को जानकारी देना चाहिए। आयोग ने कहा कि विभाग के पास जानकारी नहीं है तो वह अन्य विभागों से जुटा कर जानकारी दे। इस आदेश के बाद पुनर्वास विभाग ने विस्थापन करने वाले राजस्व, नगरीय प्रशासन, वन एवं पर्यावरण, जल संसाधन सहित 13 विभागों से विस्थापन और पुनर्वास की जानकारी माँगी। तीन साल बाद अब तक विभागों ने जानकारी नहीं भेजी है।
आकलन है कि प्रदेश में हुए 60 से 80 प्रतिशत विस्थापन के बारे में विभागों को पता नहीं है कि विस्थापित कहाँ और किस हालत में हैं। इस आवेदन ने व्यवस्था की पोल खोलते हुए साबित कर दिया कि दफ्तरों में कामों और जानकारियों को अपडेट नहीं किया जाता। यहाँ केवल तात्कालिक जानकारियाँ ही मौजूद होती हैं। असल  में यह इस कानून के अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा है। गौरतलब है कि सूचना के अधिकार कानून में अधिकांश आवेदनों को सूचना न होने की वजह से खारिज कर दिया जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता सचिन जैन कहते हैं कि सरकारी विभागों में सूचना को एकत्रित करने और संग्रह कर रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। योजनाएँ प्रारम्भ कर दी गई लेकिन उसके प्रभावितों, नुकसान और लाभ के आकलन के लिए जानकारियाँ ही नहीं है तो कैसे सफलता-असफलता जाँची जा सकेगी? आँकड़ों के बिना गरीब विस्थापितों के लिए कोई योजना कैसे चलाई जा सकेगी? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि सही तथ्य, जानकारियाँ और आँकड़ों के अभाव में सही योजना का निर्माण कैसे होगा?

एक साल बाद भी नहीं मिली कॉपियाँ
एक तरफ जहाँ विभागों के पास जानकारियाँ नहीं हैं वहीं दूसरी ओर अपील करने के बाद निर्णय और सूचना देने में इतनी देर हो जाती है कि फिर सूचना का मकसद खत्म हो जाता है। पिपरिया की सुगंधा और खुशबू माहेश्वरी का प्रकरण इसका उदाहरण है।

सुगंधा और खुशबू माहेश्वरी ने माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से दिसंबर 2008 में एमएससी कम्प्यूटर साइंस की परीक्षा दी थी। मार्च 2009 में जब परिणाम आया तो सुगंधा को दो विषय में 35-35 और दो में 45-45 नंबर मिले थे। खुशबू को दो में 45-45 और दो में 55-55 नंबर मिले। सुगंधा जहाँ दो विषयों मंे फेल होने से सकते में थीं वहीं समान नंबर मिलने से खुशबू अचरज में। उन्होंने कॉपियों की फोटोकॉपी माँगने के लिए 3 जून 2009 को आवेदन दिया। आवेदन खारिज होने पर अगस्त 2009 में राज्य सूचना आयोग में अपील की गई। आयोग में उनके प्रकरण पर सुनवाई का नंबर साल भर बाद अक्टूबर 2010 में आया। अब साल भर पास या फेल का निर्णय हो भी जाए तो समय गुजरने के बाद मिली सूचना किस काम आएगी?

Tuesday, August 24, 2010

कथक के आसमान का चाँद

उनका नाम ही मकबूल है। कहने को आसमान में हजारों सितारे हैं लेकिन कथक के संसार की वह इकलौती चाँद हैं!
हो सकता है कि उन्हें देखे बगैर इन पंक्तियों में अतिश्योक्ति नजर आ जाए लेकिन सच तो यह है कि जो भी शख्स सितारा देवी से मिल लेता है, वह बिना झिझक इस बात को स्वीकार कर लेता है कि उनके जैसा कोई नहीं है। वे 90 वर्ष की हैं लेकिन कथक के प्रति उनका जोश किसी युवा से कम नहीं है। 77 वर्ष की उम्र जब अधिकांश लोग मौत की राह तकते हैं, पलंग पर गुजर-बसर करते हैं, वे भोपाल में 4 घंटे तक कथक से दर्शकों को हतप्रभ करती हैं और जब अगली बार 13 साल बाद 21 अगस्त 2010 को भोपाल आती हैं तो भले नृत्य नहीं करती है लेकिन मंच पर गायन के साथ ऐसी भावमुद्रा बनाती हैं कि सभागार में बैठा कला समाज भौंचक देखता रहता है।

यह जिक्र उस कलाकार का है जिसका नाम धनलक्ष्मी रखा गया था। 1920 की दीपावली की पूर्व संध्या पर जन्म लेने के कारण भी संभव है कि यह नाम रखा गया हो। बाद में जब मंच पर इस नन्हीं कलाकार ने अपने हुनर का मुजाहिरा किया तो 'सितारा" नाम मुफीद समझा गया। यही सितारा देवी 21 अगस्त को भोपाल में थी। मुझे कुछ पल उनके संग रहने और उनके आभा मंडल को जानने का मौका मिला। मैंने पाया कि 90 वर्ष की उम्र में उनकी देह थकी है लेकिन नृत्य के प्रति आग्रह और उत्साह जरा कम नहीं हुआ और न ही उनके स्वाभिमान की ठसक कम हुई है। मकबूल नृत्यांगना सितारा देवी से बात करते समय मानो एक स्वर्णिम दौर जीवंत हो उठता है। वे हर व्यक्ति से आत्मीय से बात करती हैं। उनकी इस भोपाल यात्रा मैं भी उन्हें गुनगुनाते, नृत्य की भाव मुद्रा बनाते देख लोगों को 16 साल पहले की वह शाम याद आ गई जब भारत भवन में उन्हें कालिदास सम्मान प्रदान किया गया था। तब 77 वर्षीय सितारा देवी ने तुलसीदासजी की विनय पत्रिका की ख्यात पंक्तियों 'ठुमकत चलत रामचन्द्र बाजत पैजनियाँ" पर चमत्कृत कर देने वाली प्रस्तुति दी थी। उन्हें 1975 में पद्मश्री दिया गया लेकिन बाद में पद्मभूषण लेने से इंकार कर दिया। जब सम्मान की बात चली तो उन्होंने कहा कि भारत रत्न से कम कोई सम्मान मंजूर नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार मेरेे योगदान को नहीं जानती। ऐसे सम्मान का क्या मतलब। भोपाल में मधुवन द्वारा दिए गए सम्मान पर उन्होंने कहा कि यह सुरेश तांतेड़ जैसे साधक के श्रम की संस्था है। ऐसी संस्थाओं से मिला सम्मान स्वीकार हैं क्योंकि यह प्रशंसकों के ोह का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि नए नर्तकों में लगन और साधना की कमी दिखलाई देती है। वो दौर और था जब बरसों ने अभ्यास के बाद भी मंच नहीं मिलता था। अब तो गुरू फटकार दे तो शिष्य अगले दिन आना बंद कर देते हैं। कला के लिए यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है।

उम्र का इजहार आम तौर पर महिलाओं की कमजोरी मानी जाती है। इसलिए भरसक प्रयास किया जाता है कि इसे छुपाया जा सके लेकिन 90 वर्षींय महिला मंच से घोषित उम्र की सत्यता जाँचने का प्रयास करें तो इसे क्या कहेंगे? जी हाँ, रवीन्द्र भवन में जब उनके परिचय के साथ उम्र को उल्लेख किया गया तो उन्होंने उद्घोषक को पास बुला कर स्पष्ट जाना कि क्या उम्र बताई गई है। यह उनके परफेक्शन का एक नमूना है। सोचिए जब वे मंच पर होती होंगी तब नृत्य के साथ कितनी सम्पूर्णता रखती होंगी।

इसीलिए वे सितारा हैं।

Friday, August 6, 2010

हिन्दी के मास्साब नहीं जानते अंबर का मतलब

* बच्चों के साथ शिक्षक भी फेल * ऐसा कैसा 'स्कूल चले हम अभियान"

मध्यप्रदेश सरकार कह रही है कि सभी बच्चे स्कूल आए लेकिन जो बच्चे स्कूल आ रहे है उनकी हालत अनपढ़ बच्चों जैसी ही है। विभिन्न संगठन और रिपोर्ट जिस बात को बार-बार उठाते हैं, पढ़ाई की वही पोल भोपाल में जिला शिक्षा अधिकारी के निरीक्षण के दौरान फिर खुल गई। अधिकारी ने जब छठी कक्षा के बच्चे अंबर का अर्थ पूछा तो वे नहीं बता पाए। हद तो तब हो गई जब हिन्दी के शिक्षक को भी इसका अर्थ नहीं बता सके।

सरकारी स्कूलों की यह सच्चाई देख जिला शिक्षा अधिकारी सीएम उपाध्याय भी हैरत में पड़ गए। श्री उपाध्याय ने हाल ही में बैरागढ़ क्षेत्र के शासकीय स्कूलों का निरीक्षण किया। वे जब ग्राम बैरागढ़ कलां के स्कूल में पहुंचे तो वहां शिक्षक किताबें लेकर बच्चों को पढ़ा रहे थे। एक यूडीटी शिक्षक करन सिंह मेहरा 6वीं की कक्षा में हिन्दी पढ़ा रहे थे। डीईओ ने जब कक्षा में जाकर बच्चों से हिन्दी के कुछ शब्दों जैसे अंबर, देवेन्द्र आदि अर्थ पूछा तो कोई भी बच्चा नहीं बता पाया। इसके बाद डीईओ ने शिक्षक से इन शब्दों का अर्थ पूछा तो वे भी बगलें झांकते नजर आए।

इसके बाद डीईओ छठी कक्षा के दूसरे वर्ग में पहुंचे वहां शिक्षक अर्जुन सिंह बघेल बच्चों को इतिहास पढ़ा रहे थे। जब डीईओ ने बच्चों से पूछा कि चंद्रगुप्त मौर्य कौन थे तो कोई भी बच्चा जवाब नहीं दे पाया। बाद में शिक्षक ने यह तो बता दिया कि चंद्रगुप्त मौर्य कौन थे लेकिन वे उनका कालक्रम नहीं बता पाए।

पांचवीं के बच्चे नहीं पढ़ पाए हिन्दी

जिला शिक्षा अधिकारी ने जसलोक प्राथमिक स्कूल का भी निरीक्षण किया। वहां वे पांचवीं की कक्षा में पहुंचे। उस समय स्कूल शिक्षिका कृष्णा देवी किताब लेकर बच्चों को हिन्दी पढ़ाती मिली। श्री उपाध्याय ने उनसे किताब लेकर बच्चों को पढ़ने को दी। जिला शिक्षा अधिकारी श्री उपाध्याय उस समय चौंक गए जब कोई भी बच्चा किताब में लिखा एक पैरा भी ठीक से नहीं पढ़ पाया।

हमारी शिक्षा प्रणाली की असलीयत दिखाने के लिए इतना ही काफी है।

Tuesday, July 20, 2010

भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल में होगा ट्रस्टियों का मुफ्त इलाज

जाते-जाते खुद का भला कर गया ट्रस्ट
सीएस और पीएस के विरोध को किया दरकिनार


भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट जाते-जाते भी खुद का भला कर गया। अस्पताल में ट्रस्ट के सदस्यों का उपचार बिल्कुल निशुल्क होगा। इलाज का सारा खर्च गैस पीड़ितों के उपचार के मिली राशि से किया जाएगा। ट्रस्ट ने यह स्वात: सुखाय फैसला पिछले दिनों हुई बैठक में ले लिया। जबकि प्रदेश के मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव ने इस प्रस्ताव को कड़ा विरोध करते हुए इसे फिजूलखर्ची करार दिया था।

'द भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल ट्रस्ट" ने यह फैसला मार्च में उस वक्त लिया था, जब गैस त्रासदी के दोषियों के मामले की सुनवाई अंतिम चरण में थी। भोपाल गैसकांड के आरोपियों पर से धारा 304 'ए" हटाने के लिए गैस पीड़ितों की नाराजगी झेल रहे सुप्रीम कोर्ट के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एएम अहमदी की अध्यक्षता में यह निर्णय लिया गया। हाँलाकि इस पद से इस्तीफे की उनकी पेशकश को लगभग नौ माह बीत चुके थे। ट्रस्ट की अंतिम बैठक नई दिल्ली में हुई थी। इस बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि ट्रस्टियों को भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल में मुफ्त इलाज की सुविधा प्रदान की जाए। इस इलाज का सारा खर्च गैस पीड़ितों के इलाज के लिए मिली राशि से दिया जाएगा। बैठक में मुख्य सचिव अवनि वैश्य और प्रमुख सचिव स्वास्थ्य एसआर मोहंती शामिल नहीं हुए थे। जब बैठक का पत्र उनके पास अनुमोदन के लिए पहुँचा तो दोनों ने यह कहते हुए प्रस्ताव का विरोध किया कि यह गैस पीड़ितों के पैसों की बर्बादी है। ट्रस्ट सदस्य अपने इलाज का खर्च खुद उठाने में सक्षम हैं। इन आला अफसरों के विरोध के बावजूद यह प्रस्ताव बहुमत के आध्ाार पर पारित कर दिया गया। इस बारे में जब ट्रस्टी सुश्री के. अरोन्देकर से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे इस बैठक में शामिल ही नहीं हुई थी, जबकि वर्किंग ट्रस्टी अधिवक्ता अजीज अहमद सिद्दीकी के नईदिल्ली में होने से उनसे सम्पर्क नहीं हो सका।

ट्रस्ट के फैसलों की समीक्षा हो

ट्रस्ट के इस फैसले से भी गैस पीड़ित संगठनों में नाराजी है। भोपाल ग्रुप फॉर इंफर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा और गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति की साधना कर्णिक ने माँग की है कि नए निजाम में ट्रस्ट द्वारा लिए गए निर्णयों की पुर्नसमीक्षा होना चाहिए। उनका आरोप है कि पिछले कई दिनों से भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल में गैस पीड़ितों के इलाज में लापरवाही हो रही है। बाहरी मरीजों को तवज्जो दी जा रही है, क्योंकि उससे ट्रस्ट को पैसा मिलता है। जबकि इस अस्पताल का निर्माण केवल गैस पीडितों के इलाज के लिए ही कराया गया था।

दस साल पहले शुरु हुआ था अस्पताल

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन ने लंदन में 20 मार्च 1992 को 'द भोपाल हॉस्पिटल ट्रस्ट" की स्थापना की। इस चैरिटेबल ट्रस्ट के एकमात्र ट्रस्टी सर इयान पर्सीवल थे। मप्र सरकार ने अस्पताल निर्माण के लिए ट्रस्ट को लगभग 80 एकड़ जमीन मुफ्त प्रदान की। सर पर्सीवल की मृत्यु के बाद 1998 में 'द भोपाल मेमोरियरल हॉस्पिटल ट्रस्ट" की स्थापना की गई। ट्रस्ट ने छह अस्पताल सहित कम से कम 32 स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए थे। इस अस्पताल का संचालन जुलाई 2000 से शुरू हो गया था।

कौन हैं ट्रस्टी

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एएम अहमदी ट्रस्ट के अध्यक्ष बनाए गए। पूर्व राज्यपाल मोहम्मद शफी कुरैशी को उपाध्यक्ष बनाया गया। ट्रस्ट में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा की पत्नी श्रीमती विमला शर्मा, लंदन के बैरिस्टर राबर्ट पर्सीवल, केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव, डीजी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, निदेशक पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च चंडीगढ़ प्रो. केके तलवार, मुख्य सचिव मप्र, आईडीबीआई के पूर्व अध्यक्ष एसएच खान शामिल किए गए। भोपाल के अधिवक्ता अजीज अहमद सिद्दीकी को वर्किंग ट्रस्टी बनाया गया। वर्किंग कमेटी में प्रमुख सचिव स्वास्थ्य मप्र , केन्द्रीय रसायन और पेट्रोकेमिकल्स विभाग के संयुक्त सचिव, डॉ संतोख सिंह पूर्व डीएमई मप्र, जीबी पंत अस्पताल नईदिल्ली के पूर्व निदेशक डॉ. एम खलीलुल्ला, भोपाल के चार्टर्ड अकाउंटेंट एसएल छाजेड़ और महिला चेतना मंच की उपाध्यक्ष सुश्री के. अरोन्देकर को शामिल किया गया।

Sunday, July 11, 2010

मप्र व केन्द्र में टकराव के बीज

बीज के दाम भी तय करेगा बाजार



पेट्रोलियम पदार्थों के दाम नियंत्रण का अधिकार बाजार को दे चुकी केन्द्र सरकार की योजना है कि वह शकर के दाम बढ़ाने की ताकत भी बाजार को दे दे। इसकी मार आम आदमी पर पड़ेगी, लेकिन इससे एक कदम और आगे जाते हुए केन्द्र सरकार चाहती है कि बीजों के दामों पर भी बाजार का नियंत्रंण हो। वह बीज-2010 विधेयक पास करवाकर बीजों को पेट्रोलियम पदार्थों की तरह नियंत्रण से मुक्त करना चाहती है। दूसरी तरफ राज्य सरकारों का मानना है कि बीजों के दामों को बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसका सीधा सम्बन्ध किसानों के हितों से जुड़ा है। इन राज्य सरकारों में मप्र सरकार भी है। वह खुद बीज कीमतों को काबू करने वाला विधेयक लाने जा रही है। आंध्र प्रदेश सरकार इस तरह का बिल पहले ही पास कर चुकी है।

उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा बीज एक्ट 1966 में संशोधन के लिए बीज विधेयक -2004 लाया गया था। यह तीन बार संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन तीनों बार इसे पारित नहीं कराया जा सका। इस बार भी केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने विधेयक को स्वीकृति दे दी है और सरकार कोशिश है कि मानसून सत्र में ही बीज विधेयक 2010 पारित हो जाए। लेकिन सचाई यह है कि तमाम सामाजिक संगठन, प्रबुद्ध नागरिक और किसान संगठन इस विधेयक को किसान विरोधी और बीज कंपनियों के हित में बता रहे हैं। किसान संगठन बीजों के दामों पर नियंत्रण की पैरवी कर रहे हैं, लेकिन केन्द्र सरकार विधेयक में संशोधन पर राजी नहीं है।

मप्र सरकार ने भी इस विधेयक की एक खामी गिनाते हुए इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। हाल में मप्र कैबिनेट ने सामाजिक और किसान संगठनों की बात से सहमति जताते हुए राज्य में कपास के बीजों के मूल्य पर नियंत्रण के लिए विधेयक लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। विशेषज्ञों के अनुसार यह 7 वीं अनुसूची का मसला है। इस विषय पर दोनों सरकारें बिल ला सकती हैं, लेकिन जब किसी बिंदु केन्द्र और राज्य सरकार के नियमों में टकराव हो तो केन्द्र सरकार की बात मानी जाएगी। हाँलाकि ऐसा हुआ तो बीजों के दाम नियंत्रण के मामले में केन्द्र के बिल को महत्व मिलेगा।

मुआवजे के उपबंध भी जोड़ें

राज्य सरकार और सामाजिक संगठनों का कहना है कि केन्द्र सरकार बीज अध्ािनियम 2010 में बीज कंपनियों की जवाबदेही भी तय करें। वह मूल्य नियंत्रण और घटिया बीज से हानि पर किसानों को पर्याप्त मुआवजे का उपबंध भी जोड़े। गौरतलब है कि केन्द्र सरकार ने 10 जून को बिनौले के उत्पादन और वितरण का नियमन और छह महीने करने का फैसला किया है । संसद में बीज विधेयक पारित होने के बाद बिनौले का नियंत्रण विधेयक के प्रावधानों के तहत होगा और उसके बाद आवश्यक वस्तु कानून के तहत बिनौले को लेकर जारी अधिसूचना वापस ले ली जाएगी ।

बीज कमेटी ने की सिफारिशें

28 नवंबर 2006 को प्रोफेसर राम गोपाल यादव की अध्यक्षता में गठित कृषि पर स्टैंडिंग कमेटी ने अपने सुझाव में बीज विधेयक में अनेक संशोधन किए जाने की सिफारिश की है। कमेटी ने कहा कि किसानों द्वारा उपयोग किए जाने व बेचे जाने वाले बीजों का पंजीकृत बीज संबंधी न्यूनतम मानकों के अनुरूप होना किसानों के अधिकार में बाधा है। इसलिए कमेटी इस प्रावधान को रद्द करने की सिफारिश करती है। किसान की परिभाषा को और व्यापक करते हुए इसमें उन्हें भी शामिल किया जाए जो पारंपरिक बीजों का संरक्षण कर रहे हैं। बीज विधेयक में किसानों को बीज उगाने और उनके लेन-देन की अनुमति होनी चाहिए। विधेयक में मूल्य नियामक का प्रावधान होना चाहिए, जिससे कि किसानों से बीज उत्पादक/सप्लायर मनमाफिक दाम नहीं वसूल सकें।




' बीज विधेयक 2010 किसान विरोधी  है। मप्र सरकार बीजों के मूल्य पर सरकारी नियंत्रण के पक्ष में है। हम केन्द्र सरकार से माँग कर रहे हैं कि वह विधेयक में बदलाव करे।"

डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया, कृषिमंत्री, मप्र शासन



' बीजों के दाम के नियंत्रण का मामला 7 वीं अनुसूची से जुड़ा है। इसके तहत केन्द्र और राज्य सरकार अपने नियम बना सकती है लेकिन विवाद के बिंदु पर केन्द्र के विधेयक की बात ही मानी जाएगी।"

विश्वेन्द्र मेहता, संविधान विशेषज्ञ और पूर्व सचिव मप्र विस



' जब प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटी एंड फार्मर्स राइट एक्ट (पीपीवीएफआर) मौजूद है, तो बीज अधिनियम लाने की जरूरत ही नहीं है। दरअसल 90 फीसदी किसान अपने बीज ही उपयोग में लाते हैं। किसान अधिक बीज खरीदें और कंपनियों को फायदा हो, इसलिए सरकार बीज विधेयक पारित करने की कोशिश में है। बीज विधेयक 2010 में दो महत्वपूर्ण बदलाव की जरूरत है। पहला तो यह कि बीज मूल्यों का नियमन जरूर हो। साथ ही नियमों के उल्लघंन पर कड़े दंड का प्रावधान हो।"

डॉ. देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ

Saturday, June 26, 2010

बेटा नहीं मौत लेने आई

बेटे के छल का सदमा झेल नहीं पाए 72 वर्षीय बुजुर्ग

भोपाल में 20 जून को फादर्स डे पर पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जा रही थी, आनंदधाम वृद्धाश्रम में मायूसी छाई थी। मायूसी की वजह बुजुर्गों के प्रति बेटों का अनादर नहीं बल्कि बीते पखवाड़े हुई एक बुजुर्ग की मौत है। दस साल से वृद्धाश्रम में रह रहे 72 वर्षीय दाते साहब को लेने बेटे को आना था लेकिन बेटे ने आने से इंकार किया तो वे सदमे में मौत के साथ चले गए।



पिता यानि जीवन का सहारा और बेटा बुढ़ापे का भरोसा। यह धारणा आधुनिक जीवन में बार-बार टूट रही है। इस बार इस धारणा के टूटने का गवाह बना आनंदधाम वृद्धाश्रम। फादर्स-डे के दिन आमतौर पर यहाँ के सहायक और संचालक बुजुर्गों को अकेलापन महसूस नहीं होने देते। इस दिन को खास बनाने के लिए कुछ विशेष रचा जाता है, लेकिन इस बार यहाँ विशेष में भी जोश और उत्साह नहीं था। चाह कर भी बुजुर्ग अपने साथी दाते साहब को नहीं भुला पा रहे थे, वहीं दाते साहब जो अपने बेटे द्वारा छले गए थे। यहाँ की देखरेख करने वाली माधुरी मिश्रा बताती हैं कि दाते साहब करीब दस साल से यहाँ रह रहे थे। पिछले महीने उनकी बेटी ने पटना में रहने वाले अपने भाई पर दबाव बनाया कि वह पिता को अपने साथ ले जाए। बहन के दबाव और जिद ने भाई को झुकने पर मजबूर कर दिया। पिता को भी बेटी ने ही जाने के लिए तैयार किया। आखिर बेटे ने दाते साहब को ले जाने के लिए सहमति दे दी। दाते साहब ने खुशी-खुशी बेटे के पास जाने की तैयारी की थी। वृद्धाश्रम में उनके जाने का गम तो था लेकिन खुशी थी कि वे दस सालों बाद अपने परिवार के पास जा रहे थे। तय कार्यक्रम के अनुसार पिछले हफ्ते उनके जाने का दिन आ गया। सारी तैयारी हो चुकी थी, सामान पैक था। काफी इंतजार के बाद बेटा नहीं आया तो पड़ताल की गई। सुश्री मिश्रा ने बताया कि बेटे ने आने में असमर्थता जता दी। बेटे का यह विश्वासघात दाते साहब झेल नहीं पाए। उन्हें इतनी निराशा हुई कि वे खामोश हो गए। इस गहरे सदमे में उन्हें हार्ट अटैक हुआ और वे दुनिया से कूच कर गए।

बेटे के छल से उनके साथी नाराज हैं। वे कहते हैं कि जब नहीं ले जाना था तो वादा क्यों किया? दस सालों से वृद्धाश्रम में रह रहे थे। उनके इस परिवार को अभी उनकी और जरूरत थी।

Tuesday, June 15, 2010

हार गई हरियाली

भोपाल के नाम बरगद की चिठ्ठी


' आज जो मैं एक ठूँठ दिखाई दे रहा हूँ, पिछले साल तक मैं भी हरा-भरा पेड़ था। मेरी पहचान सूखा तना नहीं, जमीन को छूती डालियाँ और घनी छाँव देता विस्तार था। तब सभी मुझे बरगद कहते थे। आज मैं अपना यह परिचय देने में शरमा जाता हूँ। कहाँ भरा-पूरा विस्तार और कहाँ यह सूखे ठूँठ? मुझे बरगद से ठूँठ बना देने के दोषी आप हैं। आप ही ने साल भर पहले मेरी जमीन और मेरा आसमान छीन लिया था। मुझे एक अनजान जगह ला कर रोप दिया, यहाँ न मुझे वैसा खाद-पानी मिला और न परवरिश। आपने मुझे कटने से बचाया लेकिन यहाँ किश्तों में मरने के लिए छोड़ दिया। पहले मेरे पत्ते गए, फिर शाखाएँ काट दी गई। अब तने के अलावा कुछ भी नहीं बचा। मैं हीं नहीं उजड़ा, मेरी गोद में समाया पक्षियों का पूरा संसार उजड़ गया। मेरे जैसे कई वृक्षों के साथ हरियाली हार गई और हार गई आपकी साँसें।'




प्रिय भोपालवासियो,


आप खुश हैं कि मिसरोद से बैरागढ़ तक सिक्स लेन सड़क बन रही है। आपको चौड़ी सड़क मिलेगी तो आवाजाही में कठिनाई नहीं होगी। जाम से मुक्ति मिलेगी। सोचता हूँ इसी लालच में आपने मुझ जैसे हरे पड़ों को काटा जाना मंजूर किया होगा। लेकिन क्या आपने सोचा है कि इतने पेड़ों के कटने से आपकी साँसें जाम हो सकती है, जब भविष्य में ऑक्सीजन नहीं मिलेगी? ऐसी ही चिंता के चलते मुझ जैसे करीब 80 पेड़ों का ठिकाना बदला गया। मुझे पता चला कि आप जैसे कई पर्यावरण प्रेमी उस दिन बड़े प्रसन्ना हुए थे, जब 50 साल पुराने वृक्षों की जगह बदल कर उन्हें नए ठिकाने दिए गए थे। उम्मीद थी कि नई जगह में भी हम खूब हरियाएँगे, लहलहाएँगे, छाँव और फल देंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।


आप जानते हैं, नगर निगम ने मिसरोद से बैरागढ़ तक बनने वाले करीब 16.5 किलोमीटर लंबे सिक्स लेन रोड के बीच में आने वाले 2333 पेड़ों में से करीब 602 पेड़ों का ठिकाना बदलने की योजना बनाई थी। इनमें बरगद, पीपल, गूलर, आम, जामुन, शीशम, सप्तपर्णी, करंज, अर्जुन, गुलमोहर सभी शामिल हैं। पहले महीने मिसरोद क्षेत्र से करीब डेढ़ दर्जन पेड़ों को हटाया गया। 13 पेड़ मिसरोद श्मशान घाट में रोपे गए, जबकि 6 पेड़ सुरेन्द्र लैंडमार्क के पास स्थित नटबाबा मंदिर प्रांगण में पहुंचाए गए। कुछ पेड़ बावड़िया कला श्मशान घाट में लगाए गए थे। जब हमारा ठिकाना बदला जा रहा था, तब मेरी जड़ें काफी गहरी जमी थीं। मेरी हर डाल पत्तियों से लदी हुई थी। मेरे साथी गुलमोहर के फूल गर्मी में खिलखिलाते थे। हर डाल लाल-लाल फूलों से भर जाती थी। हमारी ही छांव में लोग सुस्ताते थे, सावन में हमारी ही डालियों पर झूले डाले जाते थे। इन्हीं शाखाओं पर किस्म-किस्म के पंछियों का बसेरा था। इन सबका न मैंने कभी किराया लिया और न कभी घोंसले हटा लेने का नोटिस दिया।


लेकिन एक दिन आपने ही मेरे तने को छील कर उस पर नंबर लिख दिया। तब मैंने किसी को यह कहते हुए सुना था कि मेरी जड़ों को हटाया जाने वाला है। मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा था। कभी सुना भी नहीं था कि बरगद को कोई डिगा भी सकता है। मुझसे तो बड़े व्यक्तित्व वाले इंसानों की तुलना होती है। फिर लगा, तरक्की पसंद इंसान ने कोई नई तकनीक ईजाद की होगी। सच बताऊँ तो उस दिन मेरी गोद में पलने वाले पंछियों ने खूब नाराजी जताई थी। कई ने तो खाना छोड़ चिल्ला-चिल्ला कर अपना गुस्सा दिखाया था, पर आपको वह सब सुनने की फुर्सत कहाँ थी?


मुझे पता चला कि इंदौर के पेड़ शिफ्टिंग विशेषज्ञ प्रेम जोशी हमारा ठिकाना बदलेंगे। उन्होंने कलकत्ता में 12 बीघा क्षेत्रफल में फैला बरगद का पेड़, शुक्रवासा (देवास) में 12 बीघा में फैले करीब तीन हजार साल पुराने बरगद के अलावा गुजरात और नेपाल में भी बरसों पुराने पेड़ों को दूसरी जगह ले जाकर लगाया था। दक्षिण भारत में इमली के पेड़ की अहमियत ज्यादा है, जिसके चलते वहां उन्होंने कई पेड़ शिफ्ट कराने में मदद की है।


इतना पता चलने के बाद हम भी खुश थे। सोचा था, नई जगह होगी तो क्या, परिंदें फिर आशियाना बना लेंगे। राहगीर छाँव तलाश लेंगे। मुझे श्मशान में लगाया जाना था। लगा था वहाँ पहुँचने वाले लोगों के दुख को पनाह दूँगा। लेकिन मेरी किस्मत कलकत्ता के बरगद जैसी नहीं निकली। साल भर बाद भी नई कोंपल फूटना तो दूर तने की छाल भी नहीं रही। यूँ लग रहा है जैसे पैरहन (कपड़े) के साथ मेरी आबरू जाती रही। अब बरगद के नाम पर दो सूखे तने बचे है। मैं ही क्यों आ कर देखो तो मेरे जैसे कई पेड़ तिल-तिल कर मर रहे हैं। पत्तियों और शाखाओं के साथ इनका पेड़ होने का सम्मान जाता रहा। श्मशान में मैं पनप नहीं पाया और अब तो लगता है मेरी शाखाएं पंछियों को घोसला बनाने या इंसानों को छांव देने के बजाय शायद किसी पार्थिव देह को भस्म करने के ही काम आ जाएगी।


फूटी कोंपलें
वो कहते हैं ना कि सभी की किस्मत एक जैसी नहीं होती। पेड़ों के साथ भी यही हुआ। बावड़ियाँ कला श्मशान घाट में लगाए पेड़ों में अंकुरण हो गया है। यह मरणासन्ना बुजुर्ग की साँसें फिर चलने जैसा है। यहाँ आ कर देखिये तो। सूखे तने में फूट रहे नए हरे पात कितने अच्छे लग रहे है। लेकिन इन पीपल और गुलमोहर के पेड़ों को अपने पुराने स्वरूप में आने में बरसों लगेंगे। तब तक शायद इन्हें यहाँ से भी हटाने की बारी आ जाए। हमारी इनके जैसी किस्मत कहाँ? हम बचे रह गए ठूँठ, हरे पत्तों को तरस रहे हैं।


शिफ्टिंग के हालात :


0 काम : मिसरोद से बैरागढ़ तक सिक्स लेन रोड
0 बाधा : 2333 पेड़
0 हटेंगे : 602 पेड़
0 कटेंगे : 1731 पेड़
0 अब तक हटे : करीब 80 पेड़
0 कितना खर्च : प्रति पेड़ ढाई से दस हजार स्र्पए तक
0 यह पेड़ हुए शिफ्ट : बरगद, पीपल, गूलर, आम, जामुन, शीशम, सप्तपर्णी, करंज, अर्जुन, गुलमोहर आदि।
0 यहां पहुंचाए : मिसरोद विश्राम घाट परिसर, नटबाबा मंदिर परिसर, बावड़िया कला श्मशान घाट, नूतन कालेज के सामने ग्रीन बेल्ट की जमीन, दुर्गा पेट्रोल पंप के सामने।

Sunday, June 13, 2010

कच्ची केरी के साथ बचपन के दिन



कल दफ्तर से घर लौट रहा था कि अचानक सड़क किनारे बैठी महिलाओं पर नजर पड़ी। महिलाओं पर नहीं डलिया में रखी पीली सलोनी पकी केरियों पर नजरें टिक गई। भरपूर ललचाई नजरों से उन आमों को देख मैं आगे बढ़ गया। लेकिन आगे तो गाड़ी बढ़ रही थी मैं तो पीछे लौट रहा था...बचपन में।


क्या दिन थे वो। अल्हड़, बेबाक, निर्मल आनंद से गर्मियों की छुट्टियों के दिन। अगर आप आज के बच्चों की गर्मी की छट्टियों से इनदिनों की तुलना कर रहे हैं तो जनाब गलती कर रहे है। ये छुट्टियाँ शिविरों में अपने व्यक्तित्व में हुनर जोड़ने और स्कूल दिए प्रोजेक्ट व होम वर्क पूरा करने में बीतती है। लेकिन हमारी छुट्टियाँ... उनके क्या कहने साहब। परीक्षा के आखिरी दिन बस्ता और पुरानी किताबों को यों उड़ा कर फेंक देते थे जैसे इनसे कोई नाता ही न रहा हो या कोई बम हो जो पास में रखने पर जान ले लेगा। मार्च लगते ही इस उधेड़बुन में दिन बीतते थे कि गर्मी की छुट्टियों की योजनाओं को कैसे पूरा करना है। छुट्टियाँ खत्म होते ही अगली छुट्टियों की योजना जो बन जाती थी। अंतिम पर्चे के साथ चेहरे पर ऐसे भाव उमड़ते थे मानो गंगा स्नान कर लिया हो और अब स्वर्ग का आनंद उठाने से कोई रोक नहीं सकता। मित्रों के साथ सुबह 5 बजे मैदान पर जाना। सूरज के चमकने साथ लौटना, फिर खाना खा कर दिन में भरपूर नींद और शाम ढलते ही बेट-बॉल के साथ फिर मैदान में। रात में घंटों गप्पे। कस्बे में रहते थे तो मित्रों के घर पास ही थे। जिनके घरों की छत आपस में मिली थी, उनके साथ तो नींद आने तक बातें होती-गुजरे दिन के क्रिया कलापों का विश्लेषण, अगले दिन की कार्य योजना यहीं बनती। सुबह अन्य दोस्तों को निर्णयों से अवगत करवा दिया जाता।

ऐसी ही मौज के बीच आनंद बढ़ जाता, जब बाग में हरी-हरी कच्ची केरियाँ पक कर पीली हो जाती। घर में टोकरियाँ भर कर आम आता तो क्या? असल आनंद तो पेड़ पर पत्थर से निशाना लगा कर केरी तोड़ लेने में आता था। दूना आनंद अपने आम को चौकीदार की नजर से बचा कर बाग से बाहर लाने में मिलता। तेज दौड़ कर लाया गया आम, किसी बड़ी स्पर्धा में जीते गए पदक से ज्यादा सुख देता था। उसके रस का स्वाद बता पाना शब्दों के बस में नहीं।

जनाब, पके आम का रस लेने की भी अपनी प्रक्रिया है। सधी उँगलियाँ आम को चारों तरफ से तैयार करती है। दबाव भी इतना संतुलित की कहीं से रस टपक न पड़े। अनुभव से पता चल जाता है कि बस, आम अब रसास्वाद के लिए एकदम तैयार हंै।

इन्हीं ख्यालों और बचपन के मीठे दिनों की याद में रात गुजरी और सुबह फिर एक घटना घटी। कॉलोनी में कई आम के पेड़ है और केरियों से लकदक आम पर राहगीरों की नजरें टिकी रहती हैं। बस्तियों के बच्चे इस आस में घंटों खड़े रहते हैं कि कब कोई आम टपके और वे लेकर भागें। मौका मिलता है तो वे पत्थर के निशाने से आम टपकाना नहीं चूकते। (पक्के निशानेबाज जो ठहरे)। तो हुआ यह कि अपनी गाड़ी बाहर निकाल रहा था कि एक बच्चे के जेब पर नजर पड़ी। उसकी जेब से कुछ बाहर झाँक रहा था, देखा और चौंका। अरे, यह तो गुलेल है। आम तोड़ लेने का पुराना साधन।

मेरे चेहरे पर मुस्कान तैर गई। बच्चा भी सजग था, मेरी नजरों को ताड़ गया। उसने जेब में रखे अपने साधन को हाथ से छुपाया और दौड़ लगा दी।

मैं उसे भागता देख, खुद को भागता देख रहा था। मैं उसके साथ अपने बचपन में लौट गया था। गुलेल के साथ... अमराई के बीच।

Sunday, June 6, 2010

धरती, जल, हवा, वन, कोई नहीं रहा पावन

हम ही बिगाड़ रहे अपना पर्यावरण,
थाम लो वरना खत्म हो जाएगा जीवन

धरती, जल, वायु और वन। जीवन के लिए अनिवार्य इन तत्वों में से कोई शुद्ध नहीं बचा। धरती बंजर हो रही है, पानी जहरीला होता जा रहा है। हवा दूषित है और आकाश में धुआं दौर धूलकण हैं। केन्द्र सरकार की स्टेट ऑफ इंवायरमेंट रिपोर्ट 2009 इसी कड़वी हकीकत को बयान करती है। रिपोर्ट के अनुसार देश की 328.73 मिलियन हेक्टेयर जमीन बंजर हो रही है। इसमें से 93.68 मिलियन हेक्टेयर पानी के क्षरण तथा 16.03 मिलियन हेक्टेयर पानी की अम्लता के कारण जमीन बंजर हुई है। इसी प्रकार खेतों में नरवाई जलाने से श्वसंन तंत्र बिगड़ रहा है तो फ्लोराइडयुक्त पानी हड्डियों को टेढ़ा बना रहा है।

धरती
* आजादी के बाद भारत की कुल आबादी तो तीन गुना बढ़ गई, लेकिन कृषि भूमि क्षेत्र में मामूली वृद्धि हुई। 1951 में खेती का रकबा 118.75 मिलियन हेक्टेयर था जो 2005-06 में 141.89 हुआ।
* ज्यादा उपज की लालच में प्रति हेक्टेयर रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल में इजाफा हुआ है। 1991-92 में 69.8 किलोग्राम उर्वरकों का उपयोग किया जाता था जो 2006-07 में बढ़ कर 113.3 किग्रा हो गया। इस कारण मिट्टी की उर्वरता खत्म हो रही है।
* खेतों में नरवाई जलाने के कारण न केवल जमीन का उपजाऊपन खत्म हो रहा है, बल्कि हवा प्रदूषित हो रही है और तापमान में इजाफा हो रहा है। अकेले पंजाब में 23 मिलियन टन चावल और 17 मिलियन टन गेहूँ की नरवाई होती है। चावल की 80 प्रतिशत यानि 18.4 मिलियन टन और गेहूँ की 5.5 मिलियन टन नरवाई जला दी जाती है।
* नरवाई जलाने से खेतों की मिट्टी का कार्बन का कार्बन डाई ऑक्साइह में तथा नाइट्रोजन का नाइट्रेट में परिवर्तन हो जाता है। यह 0.824 मिलियन टन उर्वरक के खत्म होने के बराबर है, यानि पंजाब में कुल उर्वरकों की खपत का आध्ाा।
* नरवाई से बिगड़ा पर्यावरण बड़े क्षेत्र में श्वाँस, चर्म और नेत्र रोग का कारण बनता है।



जल
* पर्यावरण में बदलाव के कारण देश में बारिश का अनुपात गड़बड़ा गया है। अनुमान है कि 2050 तक पश्चिम और मध्य भारत के बारिश के 15 दिन घट जाएँगे। दूसरी तरफ हम अभी औसतन बारिश का 45 प्रतिशत पानी संभाल नहीं पाते। यह व्यर्थ बह जाता है।
* मप्र के प्रथम श्रेणी के 25 शहरों में 1560.91 मिलियन लीटर प्रतिदिन पानी प्रदान किया जाता है। इसमें से 1248.726 एमएलडी पानी सीवेज के रूप में निकल जाता है।
* दूसरी श्रेणी के 23 शहरों में 163.64 एमएलडी पानी प्रदान किया जाता है। इन शहरों में 130 लीटर पानी मैला कर बहा दिया जाता है।
* प्रदेश के 19 जिलों में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा है। इस कारण बच्चों में दाँत के क्षरण और हड्डियों के टेढ़ा होने की बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही है।

हवा
* हमारे वाहनों और कारखानों ने ऑक्सीजन को कार्बन डाई ऑक्साइड में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। केवल दिल्ली का उदाहरण देखें तो यहाँ प्रतिवर्ष हवा में 3 हजार टन प्रदूषण घुल रहा है जिसमें 66 प्रतिशत वाहनों के कारण है।
* 2006-07 में भारत के कोयले का उपयोग कर रहे विद्युत क्षेत्र ने 495.54 मिलियन टन कॉर्बन का उत्सर्जन किया।
* भारत में 60 फीसदी घरों में ईध्ान के रूप में जलाऊ लक ड़ी और कोयला और कंडे का इस्तेमाल होता है।
* द इंटरोगर्वनमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज 2007 की रिपोर्ट कहती है कि 2080 तक तापमान में 2.7 से 4.3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो जाएगी।

वन
* यूँ तो देश की हरियाली में इजाफे के संकेत हैं लेकिन 2003 से 2005 के बीच कुल वन क्षेत्र में 728 वर्गकिमी की कमी आई थी। वन क्षेत्र घटने वाले प्रमुख राज्यों में मप्र भी शामिल है। यहाँ 132 वर्गकिमी वन घटा। तीन सालों में बड़े पैमाने पर वनक्षेत्र का कम होना, खतरनाक चेतावनी है।
* बदलते पर्यावरण के कारण ही राजस्थान का जलसंकट झेल रहा 92 प्रतिशत क्षेत्र रेगिस्तान में तब्दील हो रहा है। गुजरात में 91 फीसदी क्षेत्र रेगिस्तान बन रहा है।

Monday, May 31, 2010

आपका पानी कौन सा है?

आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है,
फिर उभरता है, फिर से बहता है,
न समंदर निगला सका इसको, न तवारीख तोड़ पाई है,
वक्त की मौज पर सदा बहता - आदमी बुलबुला है पानी का।

गुलजार साहब का यह गीत जिंदगी के साज पर इंसान के हौंसलों का राग है। पृथ्वी और हमारे शरीर में सबसे ज्यादा मात्रा में मौजूद यह तत्व पानी, कला माध्यमों में भी बहुतायत में मिलता है। बचपन से जब कल्पनाएँ परवान चढ़ने लगती है अभिव्यक्ति के लिए मन बैचेन हो उठता है, तब से पानी हमारी अभिव्यक्ति का केन्द्र बनता है। एक बच्चा जब कूची थामता है तो कुछ अभ्यास के बाद नदी, पहाड़, फूल और पेड़ की आकृति की उकेरता है। छुटपन के गिनेचुने खेलों में से एक है-'मछली-मछली कितना पानी।"




स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही रूपों में पानी सृजनधर्मियों का सहायक रहा है। चाहे वह शिल्प हो, संगीत हो, वास्तु या चित्रकला, नाट्य या वक्तृत्व कला। औजारों को धार देने का मामला हो या रोशनाई को घोलने का उपक्रम। बिना पानी सब सूना है, अधूरा है।

पानी के जितने स्वाद और प्रकार है, जीवन के भी उतने ही रूप है और उतनी कला में अभिव्यक्ति भी। ठहरा हुआ पानी, गहरा पानी, उथला पानी, गंदला पानी, साफ पानी, बदली में काला पानी, समंदर में नीला पानी, बाढ़ का उपद्रवी पानी, झीर का सूखता पानी...।

नैनों से झलकता पानी, मेहनतकश के शरीर का खारा पानी, शर्म का पानी, चेहरे का पानी...।

रंगों में घुलता पानी, दूध में मिलता पानी, कड़ाही पर पकता पानी, रोटी में फूलता पानी...।

चातक की प्यास बुझाता पानी, सीप में मोती बनता पानी...।


इन सभी में से एक पानी हमारा भी है। हमारा पानी एक समय में कई रंग दिखालाता है। अपनों के लिए मीठा होता है तो दूसरों के लिए खारा। प्यासे के लिए गंदला पानी भी मीठा हो जाता है और तृप्त कंठ के लिए मीठा पानी भी अर्थहीन। भेद भरे सृजन का पानी लोगों को बाँटता है, विभाजित करता है। वैमनस्यपूर्ण कला मनभेद रचती है और पानीदार कला मेल कराती है। ऐसी कला पानी की उन दो-चार बूँदों की मानिंद होती है जो उफनते दूध को शांत कर देती है।


सवाल यह है कि आपका पानी कौन-सा है?

Thursday, May 27, 2010

पानी गए न ऊबरे//

पानी को न जाना कुछ भी
मीरा बाई ने बरसों पहले एक भजन में कुछ सवाल पूछे थे। उनका पहला प्रश्न था- जल से पतला कौन है? सभी जानते हैं कि जल से पतला ज्ञान बताया गया था। बात इतनी सी है कि जल की इस तरलता को समझने में हमने बरसों लगा दिए, फिर भी अज्ञानी ही रहे।


वेद जल को विष्णु का पर्याय कहते हैं। हो भी क्यों न, विष्णु सृष्टा हैं और जल जीवन का आधार। विज्ञान कहता है कि साधारण माना जाने वाला पानी उत्तम विलायक भी है। हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक परमाणु से बने पानी की विशेषता है कि इसका ठोस रूप (बर्फ) द्रव रूप से हलका होता है। पानी का कमजोर ही सही लेकिन विशेष हाइड्रोजन बंध इसे कई गुण देता है। पानी के इस विज्ञान में भी कितना बड़ा अध्यात्म छुपा है। जीवन में देखें तो पानी जोड़ने का काम ही करता है। जन्म, विवाह और मृत्यु सहित तमाम संस्कारों के आवश्यक तत्व पानी को महाकवि तुलसीदास जी ने उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने के लिए उपयोग किया था। उन्होंने रामेश्वर में शिवलिंग की स्थापना के बाद श्री राम के मुख से कहलवाया कि जो गंगोत्री से गंगाजल ला कर यहाँ अभिषेक करेगा वह मुक्ति पाएगा। पानी देश के दो छोर को जोड़ने का ही नहीं बल्कि अंचलों को जोड़ने का माध्यम भी बना। जगह-जगह निकलने वाली कावड़ यात्राएँ, नर्मदा यात्राएँ और नदी में नहाने का महत्व धार्मिक कम पानी के प्रति आदरांजलि ज्यादा है। इस्लाम में भी पानी की अहम भागीदारी है। इस्लाम का मूल नमाज है और नमाज का मूल वजू है। बिना वजूके नमाज नहीं हो सकती और बिना पानी के वजू नामुमकिन है। यहाँ भी पानी के संरक्षण की बात कही गई है। माना जाता है कि कयामत के दिन जिसे नेकी के साथ रखा जाएगा वह वजू का पानी है। यानि ज्यादा से ज्यादा नमाज हो। और वजू में एक भी बूँद पानी की बर्बादी की तो आखिर में उसका हिसाब देना होगा। आज पानी जब कम हो रहा है तो उत्तर-दक्षिण ही नहीं, अड़ोस-पड़ोस के विवाद का कारण बन रहा है।


...बर्फ के हल्के होने का भी अपना संदेश हैं। आप चाहे जितना कठोर हो जाएँ, यह आपका हलकापन (उथलापन) ही होगा। आप तरल हैं तो सहज हैं। तभी वस्तुत: भारी भी हैं।


...सभ्यताओं और संस्कृति के जलस्त्रोतों के किनारे होने की वजह पानी का बहुपोग होना ही तो है। हम भी जितना बहुपयोगी, बहुगुणी और बहुआयामी होगें, उतना ही विस्तार और महत्व पाएँगे।


...पानी जहाँ जाता है, जिसमें मिलता, वैसा हो जाता है।


...पानी का एक गुण और है। यह राह बनाना जानता है। पत्थरों में रूकता नहीं, अवरोधों से सिमटता नहीं। दबकर, पलटकर, कुछ देर ठहरकर यह अपनी राह खोज लेता है। और यही पगडंडी धीरे-धीरे दरिया का रास्ता बनती है। देख लीजिए जिन्होंने अपनी पगडंडी चुनी, जो पानी की तरह तरल,सहज और विलायक हुए वही समाज के पथप्रदर्शक भी बने। उन्हें ही सुकून भी मिला।


हम हर बार कहते हैं, पढ़ते हैं- पानी गए न ऊबरे। लेकिन हर बार जब आकलन करते हैं तो पाते हैं कि पानी के बारे में जितना भी जाना, न जाना कुछ भी। और जिसने पानी को जान लिया वह पानी-पानी हो गया। जिसमें पानी को समझ लिया वह पानीदार हो गया।