Friday, September 9, 2022

भारतेंदु हरिश्‍चंद्र: जब महावीर प्रसाद द्विवेदी को झेलना पड़ा था व्‍यंग्‍य प्रहार

भारतेंदु हरिशचंद्र ने देहांत से पहले नवंबर 1884 में बलिया के ददरी मेले में आर्य देशोपकारिणी सभा में एक भाषण दिया था. इस भाषण का विषय था-भारत वर्ष उन्नति कैसे हो सकती है. उस समय अंग्रेजों का शासन था, और आजादी की कोई संभावना सामने नहीं दिखती थी. ऐसे में भारतेंदु ने देश की उन्नति के लिए देशवासियों को सुझाव दिए थे. लगता है 138 सालों बाद आज भी बहुत कुछ नहीं बदला है. मानो यह भाषण आज के लिए ही दिया गया है.

आज भले ही नई हिंदी की बात हो रही है मगर हिंदी तो नई चाल में 1873 में ढली थी. भारतेंदु हरिशचंद्र ने लिखा था कि हिंदी नई चाल में ढली और हिंदी को इस चाल में ढालने के लिए भारतेंदु को मात्र दस वर्ष का समय मिला. इन दस वर्षों में हिंदी की सेवा में भारतेंदु हरिशचंद्र ने वो रच दिया जो इतिहास बन गया. आलोचकों की नजर में भाषा के बाद भारतेंदु का सबसे बड़ा योगदान नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में रहा. उन्होंने पहली बार हिंदी में मौलिक नाटकों की रचना की. उन्हें हिंदी नाटक का युग प्रवर्त्तक करार दिया गया.









भारतेंदु हरिशचंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 बनारस के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था. 6 जनवरी 1885 को उनका देहांत हो गया. उनका मूल नाम ‘हरिश्चंद्र’ था और ‘भारतेंदु’ उनकी उपाधि थी. वे अत्‍यंत धनाढ्य परिवार से थे मगर साहित्‍य की सेवा और गरीबों के प्रति उदारता के कारण सबकुछ लुटा दिया. किसी को दु:खी और परेशान देखकर उसे तन के वस्त्र तक उतारकर दे देना भारतेंदु का सामान्‍य व्‍यवहार था. धनहीन होने पर उन्हें सबसे ज्यादा अफसोस इसी बात का होता था कि वह निर्धनों की सहायता नहीं कर पा रहे थे.

भारतेंदु के दान की बहुत-सी कहानियां प्रसिद्ध हैं. सर्दियों की रात में बाहर घूमते हुए उन्हें एक दरिद्र सोता हुआ मिला. उसे सर्दी से ठिठुरता देखकर उन्होंने उसे अपना दुशाला ओढ़ा दिया. एक बार नीचे फकीर को ओढना मांगते देखकर ऊपर से ही उसे दुशाला भेंट किया. किसी गरीब को फूलों का गजरा उतारकर उसमें पांच का नोट छिपाकर दे दिया. किसी को बेटी ब्याहने के लिए पेटी में दो सौ रुपये और साड़ियां भेंट की. कुछ न रहने पर एक निर्धन को लड़कियां ब्याहने के लिए उन्होंने हाथ की अंगूठी उतारकर दे दी और अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए कहा, “मेरे यहां धन का अभाव है; यह अंगूठी आप ही के भाग्य से बची रह गई थी, इसे लीजिए.”

यह भी सर्वविदित है कि पुस्तकें और पत्रिकाएं छापने के लिए उन्होंने अपना खजाना खोल दिया. पुस्तकों के लिए पुरस्कार देने, दूसरों को पुस्तकें देने, साहित्यकारों की आर्थिक सहायता करने में उन्‍होंने कितना खर्च किया इसका कोई हिसाब नहीं है.

प्रख्‍यात आलोचक रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्‍तक ‘भारतेंदु हरिश्‍चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्‍याएं’ में भारतेंदु के जीवन के कई अनजाने पहलुओं का उल्‍लेख किया है. इसमें भारतेंदु की पत्रिका में प्रकाशित एक विज्ञापन में हुई मात्रा की त्रुटि पर आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को मिले व्‍यंग्‍य प्रत्‍युत्‍तर का भी जिक्र है. महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भारतेंदु हरिशचंद्र द्वारा लिखे एक विज्ञापन में ‘का’ की जगह ‘को’ लिख दिए जाने की भूल दिखाते हुए कहा था कि संभव है, उन्होंने वाक्य ठीक लिखा हो, लेकिन छापे वालों की असावधानी से त्रुटियां रह गई हों.

इस पर बालमुकुंद गुप्त ने तीखा व्यंग्य लिखा. ‘भाषा की अनस्थिरता’ नाम के अपने ऐतिहासिक निबंध में बालमुकुंद गुप्‍त ने लिखा था, “एक तो काशी ऐसा स्थान है, जिसकी विद्या के हिसाब से कुछ गिनती ही नहीं. जहां न कोई संस्कृत जानता है न संस्कृत का व्याकरण, हिंदी पढ़ा-लिखा तो वहां होगा ही कौन, क्योंकि हिन्दी वहां की मातृ भाषा है. फिर हरिश्चंद्र जैसा विद्या-शून्य आदमी, जिसने लाखों रुपए हिंदी के लिए स्वाहा कर डाले और पचासों ग्रंथ हिन्दी के रच डाले, भला वह क्या एक पूरे पौने दो वाक्य का विज्ञापन शुद्ध लिख सकता था? कभी नहीं, तीन काल में नहीं! छापे वाले कभी नहीं भूले, हरिश्चंद्र ही भूला; क्योंकि वह व्याकरण नहीं जानता था. न तो उसे कर्म के चिह्न ‘को’ का विचार था, न वह सर्वनाम की जरूरत की खबर रखता था. क्या अच्छा होता कि द्विवेदीजी का दो दर्जन साल पहले जन्म होता और हरिश्चंद्र को आपके शिष्यों में नाम लिखाने तथा कुछ व्याकरण सीखने का अवसर मिल जाता! अथवा यही होता कि दो दर्जन वर्ष हरिश्चंद्र और जीता, जिससे द्विवेदीजी से व्याकरण सीख लेने का अवसर उसे मिल जाता.”

रामविलास शर्मा लिखते हैं बालमुकुंद गुप्‍त ने भारतेन्दु के सम्मान की रक्षा के लिए यूं व्यंग्णास्त्र उठाया है मानो किसी ने पवित्र देवमंदिर को भ्रष्ट कर दिया हो या उनके गुरु को ही गाली दी हो.

मात्र 34 वर्ष 4 महीने की छोटी सी आयु में भारतेंदु ने भाषा, साहित्य और समाज में व्यापक परिवर्तन कर दिया. उनके लिखे और अनुवादित किए हुए नाटक साढ़े आठ सौ पृष्ठों में छपे हैं. साढ़े आठ सौ से कुछ ऊपर पृष्‍ठों में उनकी कविताएं छपी हैं. उनके लेख कई हजार पन्ने घेरेंगे. उनके लिखे हुए पत्रों की कोई गणना नहीं है. इतने परिमाण में साहित्य रचना परिश्रम करने की अद्भुत क्षमता प्रकट करता है. कहा जाता है कि भारतेंदु का पुस्तकालय एक लाख रुपये में बिक सकता था, लेकिन उन्होंने बेचने से इंकार कर दिया था. उन्होंने इस पुस्तकालय की तो पुस्तकें पड़ी ही होंगी? इसके सिवा जो पढ़ा हो, सो थोड़ा.

भारतेंदु  ने अपने देहांत से पहले नवंबर 1884 में बलिया के ददरी मेले में आर्य देशोपकारिणी सभा में एक भाषण दिया था. यह नवोदिता हरिश्‍चंद्र चंद्रिका में दिसंबर 1884 के अंक में छपा था. इस भाषण का विषय था-भारत वर्षोन्नति कैसे हो सकती है. उस समय अंग्रेजों का शासन था, और आजादी की कोई संभावना सामने नहीं दिखती थी. देश की उन्नति कैसे हो, इसके बारे में भारतेंदु ने देशवासियों को सुझाव दिए थे. इस भाषण के केंद्र में यह चिंता थी कि देश की उन्नति कैसे हो सकती है.

चर्चित नाटक ‘भारत दुर्दशा’ में भारतेंदु ने अंग्रेजी राज की जितनी तीखी आलोचना की है उतनी ही तीखी आलोचना भारतीय जनता की भी की है. इसमें एक ओर अंग्रेजी शासन और शोषण के दृश्‍य हैं तो दूसरी ओर भारतीय जनता के आलस्‍य, अंधविश्वास, भाग्यवाद और जातिवाद की तस्‍वीरें भी है. इन दृश्‍यों में भारत की उन्‍नति के बीज छिपे हैं. बलिया वाले भाषण में भी भारतेंदु ने भारत की गुलामी के कारण बताए हैं :

  • हमारे हिंदुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं. यद्यपि फर्स्ट क्लास, सेकेंड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी-अच्छी और बड़े-बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी हैं पर बिना इंजन ये सब नहीं चल सकतीं, वैसे ही हिंदुस्तानी लोगों को कोई चलाने वाला हो तो ये क्या नहीं कर सकते. 
  • राजे-महाराजों को अपनी पूजा भोजन झूठी गप से छुट्टी नहीं. हाकिमों को कुछ तो सरकारी काम घेरे रहता है, कुछ बॉल, घुड़दौड़, थिएटर, अखबार में समय गया. कुछ बचा भी तो उनको क्या गरज है कि हम गरीब गंदे काले आदमियों से मिलकर अपना अनमोल समय खोएं.
  • पहले भी जब आर्य लोग हिंदुस्तान में आकर बसे थे, राजा और ब्राह्मणों ही के जिम्मे यह काम था कि वे देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति फैलाएं। ये लोग चाहें तो हिंदुस्तान प्रतिदिन-प्रतिक्षण बढ़ सकता है पर इन्हीं लोगों को सारे संसार के निकम्मेपन ने घेर रखा है.
  • अंग्रेजों के राज्य में सब प्रकार का सामान पाकर, अवसर पाकर भी हम लोग जो इस समय पर उन्नति न करें तो हमारा केवल अभाग्य और परमेश्वर का कोप ही है. अंगरेजों के राज्य में भी हम कूंए के मेंढ़क, काठ के उल्लू, पिंजड़े के गंगाराम ही रहें तो हमारी कमबख्त कमबख्ती फिर कमबख्ती है.क्या इंग्‍लैंड में किसान, खेतवाले, गाड़ीवान, मजदूर, कोचवान आदि नहीं है? किसी देश में भी सभी पेट भरे हुए नहीं होते. किंतु वे लोग जहां खेत जोतते, बोते हैं वहीं उसके साथ यह भी सोचते हैं कि ऐसी और कौन नई मशील या मसाला बनाएं जिसमें इस खेती में आगे से दूना अन्न उपजे. विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढ़ते हैं. जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहां गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अखबार निकाला. यहां उतनी देर कोचवान हुक्का पीएगा या गप्प करेगा. यह गप्प भी निकम्मी. वहां के लोग गप्प ही में देश के प्रबंध करते है. सिद्धांत यह कि वहां के लोगों का यह सिद्धांत है कि एक क्षण भी व्यर्थ न जाएं. यहां लोगों में जितना निकम्मापन होगा उसे उतना ही अमीर समझा जाता है.
  • राजा महाराजों का मुंह मत देखो, मत यह आशा रखो कि पंडितजी कथा में कोई देश का रुपया और बुद्धि बढ़ाने के उपाय बताएंगे. तुम खुद ही कमर कसो, आलस छोड़ो. दौड़ो इस घोड़दौड़ में जो पीछे रह गए तो फिर कहीं ठिकाना नहीं है.


लगता है 138 सालों बाद आज भी बहुत कुछ नहीं बदला है. मानो यह भाषण आज के लिए ही दिया गया है. अब यह प्रश्न होगा कि उन्नति और सुधार कैसे होगा? इसके भी सूत्र उसी भाषण में हैं :

  • सब उन्नतियों का मूल धर्म है. इससे सबके पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है. देखो, अंग्रेजों की धर्मनीति और राजनीति परस्पर मिली है, इससे उनकी दिन दिन कैसी उन्नति है. बीच में जो खराबी हुई है वह इसलिए कि लोगों ने धर्म का मतलब नहीं समझा. वास्तविक धर्म तो केवल परमेश्वर के चरणकमल का भजन है. बाकी सब तो समाजधर्म हैं जो देशकाल के अनुसार बदले जा सकते हैं.
  • महात्मा- ऋषियों के वंशजों ने बहुत से नए नए धर्म बनाकर रख दिए. सभी तिथियां व्रत और सभी स्थान तीर्थ हो गए. आंख खोलकर देख-समझ लीजिए कि ऋषियों ने कोई बात क्यों बनाई और उनमें देश और काल के जो अनुकूल और उपकारी हो उसको ग्रहण कीजिए.
  • बहुत सी बातें जो समाज-विरुद्ध मानी हैं किंतु धर्मशास्त्रों में जिनका विधान है उनको चलाइए. जैसे जहाज का सफर, विधवा विवाह आदि. लड़कों को छोटेपन ही में ब्याह करके उनका बल, वीर्य, आयुष्य सब मत घटाइए. आप उनके मां बाप हैं या उनके शत्रु हैं. कुलीन प्रथा, बहुविवाह को दूर कीजिए.
  • हिंदू, जैन, मुसलमान सब आपस में मिलिए. जाति में कोई चाहे ऊंचा हो चाहे नीचा हो सबका आदर कीजिए, जो जिस योग्य हो उसको वैसा मानिए. छोटी जाति के लोगों को तिरस्कार करके उनका जी मत तोड़िए. सब लोग आपस में मिलिए.
  • मुसलमान भाइयों इस हिंदुस्तान में बस कर वे हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ दें. ठीक भाइयों की भांति हिंदुओं से बरताव करें. ऐसी बात, जो हिंदुओं का जी दुखाने वाली हो, न करें. जो बात हिंदुओं को नहीं मयस्सर हैं वह धर्म के प्रभाव से मुसलमानों को सहज प्राप्त हैं. उनमें जाति नहीं, खाने पीने में चौका चूल्हे का भेद नहीं, विलायत जाने में रोक टोक नहीं. फिर भी बड़े ही सोच की बात है, मुसलमानों ने अभी तक अपनी दशा कुछ नहीं सुधारी. अब आलस हठधर्मी यह सब छोड़ो. चलो, हिंदुओं के साथ तुम भी दौड़ो, एकाएक दो होंगे. पुरानी बातें दूर करो. मीरहसन की मसनवी और इंदरसभा पढ़ाकर छोटेपन ही से लड़कों का सत्यानाश मत करो. अच्छी से अच्छी उनको तालीम दो. लड़कों को रोजगार सिखलाओ. विलायत भेजो. छोटेपन से मेहनत करने की आदत दिलाओ. सौ सौ महलों के लाड़ प्यार दुनिया से बेखबर रहने की राह मत दिखलाओ.
  • भाई हिंदुओ! तुम भी मतमतांर का आग्रह छोड़ो. आपस में प्रेम बढ़ाओ. इस महामंत्र का जप करो. जो हिंदुस्तान में रहे, चाहे किसी रंग किसी जाति का क्यों न हो, वह हिंदू. हिंदू की सहायता करो. बंगाली, मराठी, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्राह्मणों, मुसलमान सब एक का हाथ एक पकड़ो.
  • अब तो नींद से चौंको, अपने देश की सब प्रकार उन्नति करो. जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढ़ो, वैसे ही खेल खेलो, वैसी ही बातचीत करो. अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो.


(Source: News18Hindi में 9 September 2022 को प्रकाशित) 

Wednesday, August 17, 2022

अमृतलाल नागर: शरतचंद्र ने ऐसा क्‍या कहा कि बदल गई जिंदगी

पादप जगत के बारे में यह उक्ति चर्चित हो गई है कि बरगद के नीचे कोई दूसरा पेड़ नहीं पनप सकता है. अब प्रकृति के बारे में यह नियम कितना उचित है, यह तो नहीं कह सकते मगर हमारे जीवन में कई उदाहरण हैं जिनमें बरगद के नीचे दूसरा बरगद बनते और विकसित होते देखा है. इन उदाहरणों में एक जो सबसे अधिक जाना पहचाना नाम है वह है ‘मानस के हंस’ और ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ के लेखक अमृतलाल नागर. पद्म विभूषण नागर जी मुंशी प्रेमचंद, कथाकार शरतचंद्र, महाप्राण निराला, जयशंकर प्रसाद जैसे रचनाकारों के सानिध्‍य में अद्वितीय लेखक बने. ऐसे रचनाकार जिनकी गिनती हिंदी साहित्य के गद्य शिल्पियों में प्रेमचंद के बाद होती है.


उन्‍हीं अमृतलाल नागर की आज जयंती है. नागर जी का जन्म 17 अगस्त 1916 को आगरा के गोकुलपुरा में हुआ था. 55 वर्ष के लेखनकाल में उन्होंने बेहद विस्तृत और वैविध्यपूर्ण साहित्य रचा है. बाल साहित्य, कविताएं, कहानियां, उपन्‍यास, व्‍यंग्‍य, अनुवाद, संपादन, संस्मरण नाटक, रेडियो नाटक व फीचर, साहित्‍य की ऐसी कौन सी विधा जो नागर जी ने नहीं रची. इस रचना प्रक्रिया की शुरुआत 1932 में हुई. पहले मेघराज इंद्र के नाम से कविताएं लिखीं. ‘तस्लीम लखनवी’ नाम से व्यंग्यपूर्ण स्केच व निबंध लिखे. कहानियां मूल नाम अमृतलाल नागर से ही लिखीं. पहला कहानी संग्रह, ‘वाटिका’ वर्ष 1935 में प्रकाशित हुआ था. 1956 में प्रकाशित, ‘बूंद और समुद्र’ बड़ा उपन्यास है जो लखनऊ के चौक मोहल्लों और गलियों के किरदारों से रूबरू करवाता है. ‘अमृत और विष’ 1965 में आत्मकथा शैली में लिखा गया जिसे 1967 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्‍त हुआ है. ‘एकदा नैमिषारण्य’ में भारत के पौराणिक और ऐतिहासिक अतीत के दर्शन होते हैं. 1972 में आया ‘मानस का हंस’ और 1977 में प्रकाशित ‘नाच्‍यौ बहुत गोपाल’ नागर जी का प्रतिनिधि साहित्‍य कहा जाता है. ‘मानस का हंस’ महकवि तुलसीदास की जीवनी है. ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ में सफाईकर्मी समाज और नारी शोषण की संवेदनशील गाथा है. 1980 में रचा गया ‘खंजन नयन’ उपन्‍यास भक्‍त कवि सूरदास की जीवनी पर आधारित हैं.


इस कृतित्‍व पर पाठकों ने अपना स्‍नेह ही न्‍योछावर नहीं किया बल्कि अनेकों सम्‍मान प्रदान कर लेखक के प्रति अपनी कृतज्ञता व्‍यक्‍त की है. इन सम्‍मानों में ‘मानस का हंस’ पर मध्य प्रदेश सरकार ने अखिल भारतीय वीरसिंह देव पुरस्कार, वर्ष 1985 का उ.प्र. हिंदी संस्थान का सर्वोच्च भारत भारती सम्मान तथा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण सम्मान प्रमुख हैं.


अमृतलाल नागर ने काव्‍य के साथ रचना कार्य आरंभ किया था, अत: पद्य शैली होना स्‍वाभाविक है. मगर पद्य शैली में लिखे जा रहे गद्य की दिशा बदलने का प्रसंग भी रोचक है. जब हम अमृतलाल नागर जी के जीवन के बारे में पड़ताल करते हैं तो पता चलता है कि उन्‍होंने अपना पहला कहानी संग्रह ‘वाटिका’ मुंशी प्रेमचंद को भेजा था. जवाब में प्रेमचंद ने उन्हें लिखा कि वाटिका की कहानियां गद्यकाव्य जैसी चीज हैं. मैं रियलिस्टिक कहानियां चाहता हूँ जिनका आधार जीवन हो, जिनसे जीवन पर कुछ प्रकाश पड़ सके. मैंने वाटिका के दो-चार फूल सूंघे, अच्छी खुशबू है.


लेखन के शुरुआत में ही कथा सम्राट प्रेमचंद से मिली इस सलाह को नागर जी ने शिरोधार्य किया. यहीं से उनके लेखन की दिशा बदल गई. अगली रचनाओं में ‘गद्यकाव्य जैसी चीज’ संशोधित होती गई और उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार बढ़ते चले गए. स्‍वयं नागरजी ने इस बात को स्‍वीकार करते हुए लिखा है कि प्रेमचंद के इस वाक्य ने एक तरह से मेरी जन्मपत्री ही बदल दी. वे चिंतन और लेखन में मोड़ लाने का एक कारण बने!


नागर जी ने बांग्‍ला साहित्‍यकार शरतचंद्र के प्रति अपने मोह को अक्‍सर व्‍यक्‍त किया है. शरतचंद्र से मुलाकात और उनसे मिली सलाह ने भी नागर जी के साहित्‍य को नई दिशा ही है. शरत साहित्‍य पढ़ने के लिए ही नागर जी ने बांग्‍ला सीखी थी. जब वे शरत जी ने मिलने गए तो वह मुलाकात नागर जी की साहित्‍य यात्रा में मील का पत्‍थर बनी. संस्मरण “शरत के साथ बिताया कुछ समय” में स्‍वयं नागर जी लिखते हैं :

उनके दर्शन करने मैं कलकत्‍ता गया. परिचय होने के बाद, दूसरे दिन जब मैं उनसे मिलने गया, मुझे ऐसा मालूम पड़ा जैसे हम वर्षों से एक-दूसरे को बहुत अच्‍छी तरह से जानते हैं. इधर-उधर की बहुत-सी बातें होने के बाद एकाएक वह मुझसे पूछ बैठे, ”क्‍या तुमने यह निश्‍चय कर लिया है कि आजन्‍म साहित्‍य-सेवा करते रहोगे?”


मैंने नम्रतापूर्वक उत्‍तर दिया, ”जी हां.”


वे बोले, ”ठीक है. केवल इस बात का ध्‍यान रखना कि जो कुछ भी लिखो, वह अधिकतर तुम्‍हारे अपने ही अनुभवों के आधार पर हो. व्‍यर्थ की कल्‍पना के चक्‍कर में कभी न पड़ना.”


आरामकुर्सी पर इत्‍मीनान के साथ लेटे हुए, सटक के दो-तीन कश खींचने के बाद वह फिर कहने लगे, ”कॉलेज में मुझे एक प्रोफेसर महोदय पढ़ाते थे. वह सुप्रसिद्ध समालोचक भी थे. कॉलेज से बाहर आकर मैंने ‘देवदास’, ‘परिणीता’, ‘बिंदूरछेले’ (बिंदू का लड़का) आदि कुछ चीजें लिखीं. लोगों ने उन्‍हें पसंद भी किया. एक दिन मार्ग में मुझे वे प्रोफेसर महोदय मिले. उन्‍होंने मुझसे कहा, ‘शरत, मैंने सुना है, तुम बहुत अच्‍छा लिख लेते हो. लेकिन भाई, तुमने अपनी कोई भी रचना मुझे नहीं दिखलाई.”


शरत विनयपूर्वक बोले व पुस्तकें इस योग्य नहीं कि आप जैसे पंडित उन्हें पढ़े.” तब प्रोफेसर बोले और पुस्तकें तो मैं कहीं से लेकर पढ़ लूंगा, पर चूंकि अब तुम लेखक हो गए हो इसलिए मेरी तीन बातें ध्यान में रखना. एक तो जो लिखना सो अपने अनुभव से लिखना. दूसरे अपनी रचना को लिखने के बाद तुरंत ही किसी को दिखाने सुनाने या सलाह लेने की आदत मत डालना. कहानी लिखकर तीन महीने तक अपनी दराज में डाल दो और फिर ठंडे मन से स्वयं ही उसमें सुधार करते रहो. इससे जब यथेष्ठ संतोष मिल जाए, तभी अपनी रचना को दूसरों के सामने लाओ.” प्रोफेसर साहब का तीसरा आदेश यह था कि अपनी कलम से किसी की निंदा मत करो.


अपने गुरु की ये तीन बातें बताते हुए शरत जी ने नागर जी को कहा कि यदि तुम्हारे पास चार पैसे हो तो तीन पैसे जमा करो और एक खर्च. यदि अधिक खर्चीले हो तो दो जमा करो और दो खर्च. यदि बेहद खर्चीले हो तो एक जमा करो और तीन खर्च. इसके बाद भी यदि तुम्हारा मन न माने तो चारों खर्च कर डालो, मगर फिर पांचवां पैसा किसी से उधर मत मांगो. उधार की वृति लेखक की आत्मा को हीन और मलीन कर देती है.


नागर जी लिखते हैं कि मैं यह तो नहीं कह सकता कि इन चारों उपदेशों को मैं शत-प्रतिशत अमल में ला सकता हूं, फिर भी यह अवश्य कह सकता हूं कि प्रायः नब्बे फीसदी मेरे आचरण पर इन उपदेशों का प्रभाव पड़ा है.


टुकड़े-टुकड़े दास्‍तान में नागर जी लेखकों के लिए एक सूत्र देते हैं कि दूसरों की रचनाएं, विशेष रूप से लोकमान्य लेखकों की रचनाएं पढ़ने से लेखक को अपनी शक्ति और कमजोरी का पता लगता है. यह हर हालत में बहुत ही अच्छी आदत है. इसने एक विचित्र तड़प भी मेरे मन में जगाई. बार-बार यह अनुभव होता था कि विदेशी साहित्य तो अंग्रेजी के माध्यम से बराबर हमारी दृष्टि में पड़ता रहता है, किंतु देशी साहित्य के संबंध में हम कुछ नहीं जान पाते. उन दिनों हिंदीवालों में बांग्ला पढ़ने का चलन तो किसी हद तक था, लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य हमारी जानकारी में प्रायः नहीं के बराबर ही था. इसी तड़प में मैंने अपने देश की चार भाषाएं सीखी. आज तो दावे से कह सकता हूंं कि लेखक के रूप में आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए मेरी इस आदत ने मेरा बड़ा ही उपकार किया है. विभिन्न वातावरणों को देखना, घूमना भटकना, बहुश्रुत और बहुपठित होना भी मेरे बड़े काम आता है. यह मेरा अनुभवजन्य मत है कि मैदान मैं लड़नेवाले सिपाही को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए जिस प्रकार नित्य की कवायद बहुत आवश्यक होती है, उसी प्रकार लेखक के लिए उपरोक्त अभ्यास भी नितांत आवश्यक है. केवल साहित्यिक बातावरण ही में रहनेवाला कथा लेखक मेरे विचार में घाटे में रहता है. उसे निस्संकोच विविध वातावरणों से अपना सीधा संपर्क स्थापित करना ही चाहिए.


कितना ही कारगर सूत्र दिया है नागर जी ने. बेहतर लेखक बनने के लिए यथार्थवादी लेखन जितना आवश्‍यक है, उतना ही आवश्‍यक है श्रेष्‍ठ और लोक मान्‍य साहित्‍य को पढ़ा जाना.

Sunday, August 7, 2022

किस सत्‍य को गुरुदेव ने तो माना, पर आइंस्‍टीन ने नहीं

 

विज्ञान और अध्‍यात्‍म हमारी प्रकृति व जीवन को समझने की दो पद्धतियां है. ऐसी प्रक्रिया जिसमें हम अध्‍यात्‍म को विज्ञान कहते हैं तो विज्ञान का अपना एक अध्‍यात्‍म होता है. क्‍या दोनों, विज्ञान और अध्‍यात्‍म, में कोई साम्‍य है या दोनों में कोई विरोध का सूत्र भी है? इस पर अपने अपने तर्क हो सकते हैं मगर क्‍या हो जब विज्ञान और दर्शन के दो शीर्ष पुरूष यानि अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन और गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर इस पर बात करें? इन दोनों की मुलाकात हो और बात हो तो उसे दुनिया की चंद सबसे महत्‍वपूर्ण मुलाकात और चर्चा तो होना ही था.


इस मुलाकात का जिक्र आज इसलिए क्‍योंकि आज भारत के महान साहित्यकार, नाटककार, मानवतावादी और दार्शनिक, कला मनीषी गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर की पुण्‍यतिथि है. 7 मई, 1861 को कलकत्ता में जन्‍में रबींद्रनाथ टैगोर को उनकी महान रचना ‘गीतांजलि’ के लिए 1913 में साहित्य का नोबल पुरस्कार दिया गया था. वे नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय हैं. गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर को उम्र के बावनवें साल (1913) में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो आइंस्टाइन को उम्र के तैतालिसवें साल (1922) में भौतिक विज्ञान के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ.


दो नोबल पुरस्‍कार विजेताओं यानि अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन और गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर के बीच लगातार चिट्ठियों के जरिए संवाद होता रहा लेकिन पूरी दुनिया ने उस पल को सबसे ज्यादा तरजीह दी जब विज्ञान और दर्शन के दो ध्रुवों की मुलाकात व चर्चा हुई थी. 14 जुलाई 1930 वह ऐतिहासिक दिन था जब आइंस्टीन के बर्लिन स्थित निवास पर रबींद्रनाथ टैगोर पहुंचे थे और दोनों के बीच विज्ञान और भारतीय अध्‍यात्‍म परंपरा पर चर्चा हुई थी. इस चर्चा के केंद्र में विज्ञान, सौंदर्य, चेतना और दर्शन की अवधारणा थी. दिलचस्प बात यह है कि जब वे मिले थे तब टैगोर जर्मन नहीं जानते थे और आइंस्टीन की अंग्रेजी इतनी कमजोर थी कि बातचीत नहीं की जा सकती थी. इसलिए बातचीत के लिए दुभाषियों का सहारा लिया गया. बात इतनी गंभीर और महीन थी कि गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर और आइंस्टीन उस चर्चा की रिकॉर्ड से खुश नहीं थे, क्योंकि अनुवाद काफी कमजोर थे. पहले उन्होंने खुद अपने अपने हिस्सों को दुरूस्‍त किया उसके बाद इस बातचीत को सार्वजनिक किया गया.


जानते हैं, वह संवाद आखिर था क्‍या. संवाद की शुरुआत गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर ने की थी.


टैगोर: आप गणितज्ञों के साथ दो प्राचीन इकाई, समय और अंतरिक्ष की खोज में व्यस्त हैं. जबकि मैं इस देश (जर्मनी) में मनुष्य की वास्तविक दुनिया और ब्रह्माण्ड की यथार्थता पर भाषण दे रहा हूं.


आइंस्टीन: क्या आप दुनिया से अलग दिव्य सत्‍ता में विश्वास करते हैं?


टैगोर: अलग नहीं है. मनुष्य का अनंत व्यक्तित्व ब्रह्मांड को समझता है. ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है जिसे मानव व्यक्तित्व द्वारा समाहित नहीं किया जा सकता है. यह साबित करता है कि ब्रह्मांड का सत्य वास्‍तव में मानव का सत्य है.


आइंस्टीन: ब्रह्मांड की प्रकृति के बारे में दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं – एकता के रूप में दुनिया मानवता पर निर्भर है और यथार्थ रूप में दुनिया मानव कारकों से स्वतंत्र है.


टैगोर: जब हमारे ब्रह्मांड का मनुष्यों के साथ सामंजस्य होता है, तो हम इसे सत्य के रूप में जानते हैं, हम इसके सौंदर्य को अनुभूत करते हैं.


आइंस्टीन: यह ब्रह्मांड की पूरी तरह से एक मानव अवधारणा है.


टैगोर: दुनिया मानव का संसार है – इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी वैज्ञानिक मानव का ही है. इसलिए, हमारे अलावा कोई और दुनिया नहीं है; यह एक सापेक्ष दुनिया है, जिसकी वास्तविकता हमारी अपनी चेतना पर निर्भर है.


आइंस्टीन: यह मानव की अनुभूति है.


टैगोर: हां, एक शाश्वत इकाई. हमें अपनी भावनाओं और क्रियाकलापों के माध्यम से इसका अनुभव करना होगा. हम अपनी व्यक्तिगत सीमाओं में उस परम मानव की अनुभूति करते हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है. विज्ञान उस से संबंधित है जो व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं है; यह सत्य की व्यक्तित्वहीन मानव दुनिया है. धर्म इस सत्य को अनुभव करता है और उन्हें हमारी गहरी आवश्‍यकताओं के साथ जोड़ता है. इससे सत्य की हमारी व्यक्तिगत चेतना सार्वभौमिक महत्व प्राप्त करती है. धर्म सत्य को मूल्यवान बनाता है और हम इसके साथ अपने साम्‍य के माध्यम से सत्य को अच्छे रूप में जानते हैं.


आइंस्टीन: सत्य, या सौंदर्य, मनुष्य से स्वतंत्र नहीं है?


टैगोर: नहीं, मैं ऐसा नहीं कहता.


आइंस्टाइन: अगर इंसान नहीं होंगे तो अपोलो बेल्वेडियर (एक प्रख्‍यात रोमन मूर्ति) सुंदर नहीं होगा?


टैगोर: नहीं!


आइंस्टीन: मैं सुंदरता की इस अवधारणा से सहमत हूं, लेकिन सत्य के संबंध में ऐसा नहीं है.


टैगोर: क्यों नहीं? इंसान के माध्यम से सत्य का अनुभव होता है.


आइंस्टीन: मैं सिद्ध नहीं कर सकता कि मेरी अवधारणा सही है, लेकिन वह मेरा धर्म है.


टैगोर: सुंदरता पूर्ण सामंजस्य की आदर्श स्थिति है जिसका सार्वभौमिक अस्तित्व है; सत्य सार्वभौमिक मस्तिष्‍क की सही समझ है. हम मनुष्‍य इसे अपनी गलतियों और त्रुटियों, अपने संचित अनुभवों और अपनी चेतना के माध्यम से प्राप्त करते हैं. अन्यथा हम सत्‍य कैसे जानते?


आइंस्टीन: मैं साबित नहीं कर सकता, लेकिन मैं पाइथागोरियन तर्क में विश्वास करता हूं जो कहता है कि सत्य मनुष्यों से स्वतंत्र है. यही निरंतरता के तर्क की समस्या है.


टैगोर: सत्य, जो सार्वभौमिक है, अनिवार्य रूप से मानवीय होना चाहिए; अन्यथा, हम मानव सत्य के रूप में जो भी अनुभव करते हैं वह कभी भी सत्य नहीं कहा जा सकता है. कम से कम, वह सच्चाई जिसे वैज्ञानिक रूप में वर्णित किया गया है और जिसे केवल तर्क की प्रक्रिया के माध्यम से जाना जा सकता है – दूसरे शब्दों में, मानव के विचारों द्वारा. भारतीय दर्शन के अनुसार ‘एक ब्राह्मण है, जो परम सत्य है, जिसे इंसानी दिमाग की तर्क शक्ति से नहीं जाना जा सकता न ही उसे शब्दों के माध्‍यम से व्‍यक्‍त किया जा सकता है. उसके बारे तभी जाना जा सकता है जब इंसान खुद को अनंत में समाहित या विलीन कर ले और यह केवल मेडिटेशन यानि ध्यान से ही हो सकता है. लेकिन यह सच्चाई विज्ञान की नहीं हो सकती. सत्य की प्रकृति जिस पर हम चर्चा कर रहे हैं वह एक उपस्थिति है. यह कहना कि सत्य वह है जो मानव मन में सच प्रतीत होता है, माया या भ्रम कहा जा सकता है.


आइंस्टीन : यह किसी व्यक्ति का भ्रम नहीं है, बल्कि प्रजातियों (स्पीशीज) का है.


टैगोर : प्रजाति (स्पीशीज) भी एक तरह की इकाई है, यह भी मानवता के अनुभव के जरिए जुड़ी हुई है. इसलिए सभी मानव मस्तिष्‍क एक समय पर एक ही सत्य का अनुभव करते हैं. भारतीय और यूरोपीय मस्तिष्‍क समान स्‍तर पर मिलते हैं.


आइंस्टीन: जर्मन भाषा में स्पीशीज (प्रजाति) शब्द का प्रयोग संपूर्ण मानव जाति के लिए किया गया है, यहां तक कि इसमें बंदर और मेढ़कों तक को शामिल किया गया है. ऐसे में क्या सत्य हमारी चेतना से अलग है?


टैगोर:  हम जिसे सत्य कहते हैं वो वास्तविकता के वस्‍तुपरक और विषयपरक पहलुओं के बीच विवेकपूर्ण साम्य में अंतर्निहित है और ये दोनों ही परम मानव से जुड़े हैं.


आइंस्टीन: अपने दैनिक जीवन में हम कई ऐसे काम अपने दिमाग द्वारा करते हैं जिसके लिए हम जिम्मेदार नहीं होते, हमारा दिमाग बाहर की वास्‍तविकता को देखकर भी उससे अलग निरपेक्ष रहकर काम करता है. उदाहरण के लिए इस घर में कोई न भी हो तब भी यह टेबल यहीं बनी रहेगी.


टैगोर : हां, ये हमारे मानवीय दिमाग से बाहर है लेकिन यह यूनिवर्सल माइंड (परम मस्तिष्‍क) से बाहर नहीं है. टेबल वो चीज है जो हमारी चेतना द्वारा दिखाई देती है.


आइंस्टीन : अगर इस घर में कोई नहीं है, तब भी यह टेबल वहीं रहेगी, लेकिन आपके ही विचारों से यह बात पहले ही अनुचित है. क्योंकि हम यह व्याख्या नहीं कर सकते कि इसका अर्थ क्या है कि हमसे निरपेक्ष रहकर वह टेबल वहीं रखी हुई है. सत्य के अस्तित्व की व्याख्या मानव जाति से परे जा कर न तो की जा सकती है और न ही इसे साबित किया जा सकता है. लेकिन यह एक ऐसा विश्वास है जिसे कोई भी फिर चाहे वो छोटे से छोटा जीव ही क्यों न हो छोड़ना नहीं चाहता. हमने सत्य को सुपरह्यूमन ऑब्जेक्टिविटी के साथ प्रतिस्थापित कर दिया है. यह हमारे लिए परम आवश्यक है, इसका कोई विकल्प नहीं है. यह वास्तविक्ता हमारे अस्तित्व, हमारे अनुभव और हमारे मस्तिष्‍क से निरपेक्ष और स्‍वतंत्र है. हालांकि हम यह नहीं कह सकते कि इसका अर्थ क्या है.


टैगोर:  किसी भी स्थिति में अगर कोई ऐसा सत्य है जिसका मानव जाति से कोई सरोकार नहीं है, तो हमारे लिए यह पूरी तरह से अस्तित्वहीन है.


आइंस्टीन :  ऐसे में तो मैं आपसे भी ज्यादा धार्मिक और आस्थावान हो जाऊंगा.


टैगोर: स्‍वयं के व्यक्तित्व में उस सार्वभौम आत्मा यानि परमात्‍मा के साथ सामंजस्य, एक लय स्‍थापित करना ही मेरा धर्म है.


गुरुदेव के इस वाक्‍य के साथ यह चर्चा खत्‍म होती है. दोनों के बीच हुई चर्चा का केंद्र ‘सत्‍य’ का अन्‍वेषण था. सत्य और सौंदर्य का अस्तित्व क्या मानव से अलग, मानवरहित हो सकता है? गुरुदेव के विचार सुनने के दौरान आइंस्टीन ने कहा था कि ‘आपकी बातें पूरी तरह से मानवीय धारणा है, पर विज्ञान इससे अलग हटकर सोचता है.’


गुरुदेव ने उत्‍तर दिया था कि ‘प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन से मिल कर बनने वाली चीज के बीच में एक खाली जगह होती है, जो इसे बांध कर रखती है. ठीक इसी तरह ‘मानवीय संबंध व्यक्तियों को एक-दूसरे से जोड़े रखते हैं.’ आइंस्टीन कहते हैं कि ‘मैं मानवीयता को लेकर आपसे सहमत हूं, पर जिसे आप सत्य मनाते हैं, उसे मैं सच नहीं मानता.’


मानव और विज्ञान पर दोनों की बहस आगे भी जारी रही और दोनों ही अपनी-अपनी बात को सही बताते रहे. गुरुदेव रबींद्रनाथ का कहना था कि ‘सत्य और सौंदर्य के बारे में मानव के बिना सोचा ही नहीं जा सकता है.’ आइंस्टाइन सौंदर्य के बारे में गुरुदेव की बात से सहमत हुए मगर सत्य के बारे में उनकी स्‍थापना का अमान्य करते हैं. दोनों दिग्गज अपने-अपने विश्वासों पर कायम रहे.

Friday, July 1, 2022

National Doctor's Day 2022: इनके लिखे ‘पर्चे’ को पढ़कर भी सुधर जाती है सेहत

 

वे पेशे से डॉक्‍टर हैं. कोई दिल की बीमारी को दुरुस्‍त करता है तो कोई दिमाग को. कोई तंत्रिकाओं को साधता है तो कोई फेफड़ों के कमजोर होने से रोकने में हमारी सहायता करता है. आज जब देश डॉक्‍टर्स डे मना रहा है तो हमें उन सभी डॉक्‍टरों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहिए, जिन्‍होंने समाज और देश को सेहतमंद बनाए रखने में खुद को झोंक रखा है. वे लोग जिन्‍हें हम सम्‍मान से भगवान का दर्जा देते हैं. मेडिकल की दुरूह पढ़ाई के बाद इलाज का सिलसिला शुरू होता है. ऐसी यात्रा जो अंतिम सांस तक चलती है, 24 घंटे सातों दिन. हर समय इमरजेंसी के लिए तैयार रहना. मरीजों को ठीक करते हुए आधुनिक चिकित्‍सा विज्ञान व नई जानकारियों के प्रति खुद को भी अपडेट रखना. यह ऐसा जज्‍बा है जो स्‍वत: हमारे भीतर सम्‍मान जगाता है.


इतनी व्‍यस्‍त दिनचर्या के बीच कुछ ऐसा होता है जो डॉक्‍टर्स को दिन में बेचैन रखता है और रात में सोने नहीं देता. ऐसा कुछ जो सुकून के पलों में भी उन्‍हें मजबूर करता है कि वे एक ऐसा पर्चा लिखें जो हमें सेहत बख्‍शे. ऐसा पर्चा जिसमें दवाइयां नहीं, जीवन प्रबंधन के नुस्‍खे लिखे होते हैं. वे साहित्‍य रचते हैं, वे सोशल मीडिया पर ऐसे सूत्र बताते रहते हैं जिन्‍हें पढ़ कर हमारा जीना आसान हो जाता है.


ऐसे ही एक डॉक्‍टर हैं, डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी. मऊरानीपुर (झांसी) उत्तर प्रदेश में जन्मे डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी की कार्यस्‍थली मध्य प्रदेश है. वे भेल भोपाल के कस्‍तूरबा अस्‍पताल में हृदयरोग विशेषज्ञ के रूप में जाने गए तो बाहर उनकी पहचान दिल के डॉक्‍टर की नहीं, एक प्रभावी उपन्‍यासकार और उतने ही मारक व्‍यंग्‍यकार के रूप में है. सत्तर के दशक से ख्‍यात पत्रिका ‘धर्मयुग’ से लेखन की शुरुआत करने वाले डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का प्रथम उपन्यास ‘नरक-यात्रा’ बेहद पसंद किया गया. ‘नरक यात्रा’ डॉक्टरों के व्‍यवहार यानि अपने ही धंधे पर कटाक्ष है. बुंदेलखंडी परिदृश्य पर ‘बारामासी’ उपन्यास लिखा है. तीसरा उपन्यास ‘मरीचिका’ लिखा है, जो एक पौराणिक गाथा है. ‘ हम न मरब’ उपन्यास मृत्‍यु के दर्शन पर आधारित है. ताजा उपन्‍यास ‘स्वांग’ में एक गांव के बहाने समूचे भारतीय समाज के विडम्बनापूर्ण बदलाव की कथा दिलचस्प अंदाज से कही गई है. उनके उपन्‍यासों में जीवन के रंग विस्‍तार पाते हैं तो व्‍यंग्‍य की धार कभी हमें गुदगुदाती है, कभी तीखे कांटे सी चुभती है.


मालवा में सांसारिक जीवन से विरक्ति के भाव बोध से कहा जाता है, हिमालय की राह पकड़ना. इंदौर निवासी और प्रख्‍यात तंत्रिक तंत्र विशेषज्ञ डॉ. अजय सोडानी के लिए हिमालय जाना संन्‍यास की राह पकड़ना नहीं है बल्कि बेपटरी हो रहे जीवन को राह दिखलाना है. उनका मन हिमालय पर बसता है और वे पुनि पुनि जहाज की तर्ज पर बार-बार हिमालय पहुंच जाते हैं. वे हिमालय की अब तक कुल 38 यात्राएं कर चुके हैं. इसमें क्‍या बड़ी बात है कि वे बार बार हिमालय की यात्राएं करते हैं? बड़ी बात यह है कि इन यात्राओं के संस्‍मरण पुस्‍तकाकार हो कर हमारे बीच में हैं और खासे चर्चित हो चुके हैं. डॉ. सोडानी द्वारा सपरिवार की गई हिमालय यात्राएं दो बार लिम्‍का बुक्‍स ऑफ रिकार्ड्स में दर्ज हो चुकी हैं. ‘दर्रा-दर्रा हिमालय’, ‘दरकते हिमालय पर दर-ब-दर’ और ताजा यात्रा वृतांत ‘सार्थवाह हिमालय’ महज यात्राओं का विवरण नहीं है. यह एक तरह का शोध ग्रंथ प्रतीत होता है. उनकी पुस्‍तकों को पढ़ने के उपरांत अनुभव होता है मानो ये यात्राएं हमने ही की हैं. ऐसा वृतांत कि पंक्ति-दर-पंक्ति हम लेखक के साथ यात्रा करते चलते हैं. हिमालय की गोद में फैली संस्‍कृति और लोक से वाकिफ होते चलते हैं. उनकी आंखों से हम हिमालय को देखते हैं और मेधा से हम अपना ज्ञान भंडार समृद्ध करते हैं.


और जब जीवन को जानने, समझने और उसकी रहस्‍य पोटलियों को खोलने के जंतर की बात चली है तो मेरठ निवासी डॉ. अनुराग आर्य का जिक्र होना तो लाजमी है. कहने को वे डर्मेटोलॉजिस्‍ट हैं मगर मन की गुत्थियों को सुलझाने का जो हुनर डॉ. आर्य ने पाया वह उनके लिखे के पहले पाठ में ही उनका मुरीद बना देता है. सोशल मीडिया प्‍लेटफार्म फेसबुक पर अपने परिचय में वे लिखते हैं- ‘लिखना किसी काफिले से अलहदा होना है, लिखना कन्फेशन बॉक्स में खड़ा होना है’. डॉ. अनुराग आर्य की वॉल पर जरा घूम आइए. मन के गहन कोने में कोई असमंजस, कोई भय, कोई सवाल ठिठका होगा तो उसका रोशन जवाब वहां पाइएगा.


जीवन को नए अंदाज में देखने की चाह हो तो डॉ. प्रवीण झा को जरूर पढ़ा जाना चाहिए. नार्वे में रह रहे डॉ. प्रवीण झा का रचना संसार व्‍यापक हैं. कुली लाइंस, वाह उस्ताद, ख़ुशहाली का पंचनामा, रिनैशां, जेपी- नायक से लोकनायक तक, दास्तान-ए-पाकिस्तान, उल्टी गंगा और भूतों के देश में पुस्‍तकों के लेखक डॉ.प्रवीण झा की फेसबुक वॉल पर किताबों और जीवन के विविध प्रसंगों की दिलचस्‍प बातें हैं. घटनाओं और प्रसंगों को उनकी दृष्टि से देखना-समझना पाठकों के लिए अनूठा अनुभव होता है.


बिहार की राजधानी पटना में एक डॉ. विनय कुमार रहते हैं. वे साहित्य, कला व संस्कृति के मंच ‘पाटल’ के सूत्रधार हैं. उनकी कविताओं ने अपना खास प्रशंसक वर्ग तैयार किया है. जैसे, यह रचना :


ओ मेरी आत्मा


इतनी बकरी कभी न होना


कि मेरा मार्ग


लोगों की लगायी घास तय करे और मैं


एक से दूसरे जंगल तक जाते बाघ का पाथेय होकर चुकूं! (विनय कुमार)


डॉ. विनय कुमार ने बीते दिनों अपने चिकित्‍सकीय अनुभवों को लिखा है और यह उनके संवेदनशील पक्ष को जानने का बेहतर माध्‍यम हैं.


उत्‍तर प्रदेश के फतेहपुर सिटी निवासी डॉ. कौशलेन्द्र सिंह का कविता संसार समृद्ध है. ‘भीनी उजेर’ उनका ताजा काव्‍य संग्रह है. उनकी कविताओं में वर्तमान इतने वास्‍तविक चेहरे के साथ पेश आता है कि पाठक सहज जुड़ाव महसूस करता है. किताबों लेकर कही गई उनकी यह बात कितनी भली है : क़िताबें आने को होती हैं तो यूं लगता है कुछ पुराने यार मिलने आ रहे…


कहानियां हमें हमारी वास्‍तविकता से रूबरू करवाती हैं. जीवन की यह वास्‍तविकता झांसी निवासी डॉ. निधि अग्रवाल के कथा संसार में हर क्षण महसूस होती है. वे हमारे समय की ख्‍यात कथाकारों में शुमार होती हैं. उनकी फेसबुक वॉल पर जाएंगे तो फोटो और अनुभवों से उपजी लेखनी का ऐसा कोलाज स्‍वागत करे जिसके साथ आप लंबा वक्‍त गुजारने को सहर्ष तैयार हो जाएंगे. प्रकृति प्रेम उनके स्‍वभाव की विशिष्‍टता है और अपनी यात्राओं में प्रकृति के सुहाने रूप से हमारा साक्षात्‍कार करवाते चलती हैं. विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित हो रहीं डॉ. निधि अग्रवाल की कथाओं में बुनावट और कहन विचार के नए रास्‍ते खोलती है.


‘पसरती ठंड’ कहानी संग्रह से चर्चित हुए राजस्‍थान की जोधपुर सिटी निवासी के डॉ. फतेह सिंह भाटी अपने ऐतिहासिक  पृष्‍ठभूमि के उपन्यास ‘उमादे’ के कारण चर्चा में हैं. उनके इस उपन्‍यास पर पत्रकार, कथाकार, उपन्‍यासकार धीरेंद्र अस्‍थाना की यह टिप्‍पणी गौरतलब है. धीरेंद्र अस्‍थाना लिखते हैं – ‘ऐतिहासिक उपन्यासों की कतार में यह उपन्यास कोहिनूर की तरह चमकता रहेगा. यह उपन्यास इतना अधिक रोचक है कि इसे मैंने भूख प्यास शराब दवाई जरूरी काम छोड़कर उसी पागलपन की तरह पढ़ा जैसे किशोर दिनों में चंद्रकांता संतति पढ़ी थी. यह उपन्यास पढ़कर जाना कि राजस्थान के लिए पधारो म्हारे देस की पुकार क्यों लगाई जाती है. राजस्थान का मतलब जानना है तो इस उपन्यास को अपनी प्राथमिकता में शामिल करें’.


यह तो एक बानगी है. नाम कई हैं. आप गौर कर देखेंगे तो पाएंगे कि हमारे आसपास के डॉक्‍टरों ने जब साहित्‍य की दुनिया में हाथ आजमाया है तो दुनिया को बेहतर बनाने का नुस्‍खा ही थमाया है. हमें इस डॉक्‍टर्स डे पर हमारे मन-मानस को स्‍वस्‍थ्‍य बना रहे डॉक्‍टरों के इस योगदान के प्रति भी कृतज्ञ होना चाहिए.