Wednesday, January 25, 2023

कृष्‍णा सोबती: ‘मित्रो’ की छवि बचाने के लिए रचा दिया दूसरा पात्र

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कृष्णा सोबती की आज पुण्‍यतिथि है. 2010 में यदि वे पद्मभूषण पुरस्‍कार ठुकराती नहीं तो हम इस अलंकरण के साथ उन्‍हें संबोधित कर रहे होते. देश की पहली फेमिनिस्‍ट लेखिका कही जाने वाली कृष्‍णा सोबती स्‍वयं को लेखिका कहलाना पसंद नहीं करती थी. वे मानती थी कि लेखक स्‍त्री या पुरूष नहीं होता है, वह लेखक होता है. अशोक वाजपेयी के शब्‍दों में कहें तो ऐसे लोग कम होते हैं जिनके लिखे और जीने में बहुत कम अंतर होता है. ऐसे बहुत कम लोगों में एक नाम है कृष्‍णा सोबती.

कृष्णा सोबती का जन्म अविभाजित भारत में पंजाब के गुजरात जनपद (जो अब पकिस्तान में है) में 18 फरवरी, 1925 को हुआ था. विभाजन के बाद वे भारत आ गईं. उन्‍हें जिंदगीनामा (1979) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. उन्हें 1981 में शिरोमणि अवार्ड, 1982 में हिंदी अकादमी अवार्ड, 1996 में साहित्य अकादमी फैलोशिप, 2017 में भारतीय साहित्य का सर्वश्रेष्ठ सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला.

वे उसूलों की पक्‍की थीं और खुद्दार इंसान थीं. इतनी खुद्दार की कभी कोई सरकारी पद नहीं लिया और सम्‍मान, पुस्‍तकों की रॉयल्‍टी से मिली राशि रजा फाउंडेशन आदि को सौंप दी. कृष्णा सोबती ने एक करोड़ रुपए से अधिक की रजा फाउंडेशन के अशोक वाजपेयी को दी. इसी तरह ज्ञानपीठ पुरस्कार की ग्यारह लाख की राशि भी रजा फाउंडेशन को प्रदान की. अपनी वसीयत में अपनी सहायिका के घर और जीवनयापन का पुख्‍ता इंतजाम किया. 94 वर्ष के लंबे जीवन में सबकुछ सुखमय नहीं था. कई संघर्ष थे. समय के थपेड़े थे मगर इस सबसे लड़ती-भिड़ती कृष्‍णा सोबती के चेहरे पर मासूम मुस्‍कान हमेशा कायम रही. उनके हिस्‍से में ‘जिंदगीनामा’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘ऐ लड़की’ और ‘हम हशमत’ जैसी रचनाओं को मिला पाठकों का प्‍यार ही नहीं आया बल्कि एक लंबी कानूनी लड़ाई भी आई. अमृता प्रीतम जैसी ख्‍यात समकालीन पंजाबी साहित्‍यकार के साथ उनकी यह लड़ाई साहित्‍य जगत का एक अनचाहा प्रसंग है.

यह विवाद किताब के शीर्षक को लेकर था. कृष्‍णा सोबती का उपन्‍यास ‘जिंदगीनामा’ आने के करीब चार साल बाद ‘हरदत्‍त का जिंदगीनामा’ शीर्षक से अमृता प्रीतम की भी किताब का विज्ञापन छपा. आवरण पर हरदत्‍त छोटे अक्षरों में था जबकि जिंदगीनाम बड़े अक्षरों में. इस पर कृष्‍णा सोबती केा ऐतराज हो गया. वे शीर्षक के कॉपीराइट का मामला लेकर कोर्ट में चली गई. हाईकोर्ट ने मामला दिल्ली के जिला अदालत में भेज दिया. वह मुकदमा 27 साल तक चला. फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में ही आया मगर तब तक उनका देहांत हो चुका था. फैसले के बाद कृष्‍णा सोबती ने कहा था कि लड़ाई लंबी खींच गई और मजाक बनकर रह गई. मगर वे इसे ताउम्र सिद्धांत की लड़ाई कहती रही.

सिद्धांत के लिए अगर वे लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकती थी जिस दौरान उनके तीन घर बिक गए तो अपने पात्र के लिए संवेदनाओं के शिखर पर भी खड़ी दिखाई देती हैं. अपने उपन्‍यास ‘मित्रो मरजानी’ की पात्र मित्रो के लिए वे इतनी संवेदनशील थीं कि फिल्‍म में मित्रो के चरित्र से छेड़छाड़ रोकने के लिए उन्‍होंने दूसरा पात्र गढ़ दिया. कृष्णा सोबती की जीवनी ‘दूसरा जीवन’ में गिरधर राठी इस प्रसंग का जिक्र करते हैं. वे लिखते हैं कि फिल्मकार राम माहेश्वरी ने ‘मित्रो मरजानी’ पढ़ा तो इस पर फिल्‍म बनाने का विचार आया. आरंभिक चर्चा के बाद अनुबंध की बात हो गई. फिल्म के स्‍क्रीन प्‍ले के दौरान सुझाव आया कि मित्रो को बिकिनी पहना कर गांव में तैराने का दृश्य फिल्माया जाए.

कृष्‍णा सोबती कहती हैं, ‘बिकनी पहने मित्रो! यह जुमला और इससे उभरती छवि दोनों ने मेरे दिल-दिमाग़ में खलबली मचा दी. मैं मित्रो के लिए खासी परेशान हुई. मैं चौकस हुई. लेखक होने के नाते मेरा कर्तव्य बनता है कि बनता है कि मैं मित्रो जैसे पात्र से इतनी छेड़छाड़ न होने दूं.”

तब कृष्णा सोबती ने दो रात और एक दिन में बिकिनी में नहाने योग्य पात्र जैनी रच डाला. अगली बैठक में उन्‍होंने जैनी की कहानी सुना दी. उन्‍होंने प्रस्‍ताव रखा कि मित्रो के बदले सुनहरे बालों वाली कनाडा में जन्मी जैनी पर ही फिल्म बनाई जाए. मगर न जैनी पर फिल्म बनी न मित्रो पर. ‘मित्रो मरजानी’ पर फिल्‍म नहीं बन सकी मगर रंगमंच पर यह कथा नुमाया हुई और देश भर में शहरों में सौ से अधिक नाट्य प्रस्तुतियां हुईं. कृष्णा सोबती ने लेखक गिरधर राठी को बताया था कि कहानी लेखक के तौर पर उन्‍हें पांच हजार रुपए का चेक भेजा गया था. मगर उन्‍होंने पैसा लेने से इंकार कर दिया था. कोई फिल्‍म बनाए, नाटक प्रस्‍तुत करे इतना ही बहुत है. इसके लिए पैसा लेना क्या जरूरी है?

कृष्‍णा सोबती का जीवन संयोगों से भरा हुआ है. कई संयोगों में एक संयोग यह भी कि उन्‍होंने रिटायर्ड आईएएस और अनुवादक शिवनाथ के साथ विवाह का भी है. दोनों की जन्मतिथि और जन्म वर्ष एक, दोनों की माताओं का नाम एक, दोनों पढ़े भी लाहौर में. 1983 में पत्नी के निधन के बादशिवनाथ अकेले 1989 में दिल्‍ली की आनंदलोक सोसाइटी के अपार्टमेंट बी-505 में रहने आ गए थे. कृष्णा सोबती ने 1990-91 में आनन्दलोक सोसाइटी का बी-503 नंबर का फ्लैट खरीदा था. सोसाइटी के पुस्तकालय का उद्घाटन करने आईं कृष्णा सोबती को सोसायटी अध्‍यक्ष शिवनाथ ने पहली बार देखा था. इसके बाद इंडियन लिटरेचर के संपादक के आग्रह पर शिवनाथ ने कृष्‍णा सोबती के उपन्‍यास ‘ऐ लड़की’ का अंग्रेजी अनुवाद किया. इसके बाद ‘डार से बिछुड़ी’ का अनुवाद शुरु किया. तब से लेकर सन् 2000 तक शिवनाथ सुख-दु:ख में कृष्‍णा सोबती के साथ रहे. अंतत: 24 नवंबर 2000 को दोनों ने मैरिज रजिस्‍ट्रार के समक्ष विवाह कर लिया.

लेखक कृष्णा सोबती और अनुवादक शिवनाथ का विवाह दोनों की 75 वर्ष की आयु में हुआ. वास्‍तव में यह मन का मिलाप था. कृष्णा सोबती के ही शब्दों में, ‘वे अपने कमरे में. मैं अपने कमरे में. मेरी आदत रात-रात भर काम करने की, सुबह देर से उठने की. उनका दिन प्रातः से शुरु. हम दोनों के स्वभाव अलग लेकिन एक दूसरे को पूरी तरह समझने वाले.’

इस संयोग जैसा ही एक और संयोग है पहली किताब का सबसे अंत में छपना. यह भी बेहद दिलचस्‍प प्रसंग है. कृष्णा सोबती ने 1954 में एक उपन्यास लिखा था ‘चन्ना’. यह उनका पहला उपन्यास था. ‘लीडर प्रेस’ इलाहाबाद ने इसे छापने का निर्णय किया. कोई 350 पेज छापने के बाद उसकी प्रति कृष्‍णा सोबती को भेजी गई. उन्‍होंने देखा कि कुछ शब्दों को बदल दिया गया है. जैसे ‘वृक्ष’ को मैंने रूख लिखा था इसीतरह शाहनी को शाहपत्नी कर दिया. स्थानीय भाषा के शब्दों को बदलने पर वे परेशान हो गईं. उन दिनों लीडर प्रेस बहुत चर्चित था. उन्होंने सोचा होगा कि पहला उपन्यास है तो बदलाव कर सकते हैं मगर कृष्‍णा सोबती अड़ गईं. बात बनी नहीं और कृष्णा सोबती ने कागज तथा छपाई का खर्चा चुका कर उपन्‍यास वापस ले लिया. तब उनके पास छोटी सी नौकरी थी फिर भी उन्होंने ऐसा निर्णय लिया था.

इस घटना के करीब 65 साल बाद राजकमल प्रकाशन ने ‘चन्‍ना’ उपन्‍यास को प्रकाशित किया. 11 जनवरी 2019 को ‘चन्ना’ उपन्यास का विमोचन हुआ और 25 जनवरी 2019 को सुबह 8 बजे कृष्णा सोबती का दिल्ली में लंबी बीमारी के बाद देहावसान हो गया. कृष्‍णा सोबती जैसे इंसान कम ही होते हैं, अपने समय के सबसे ‘बोल्‍ड’ किरदार रचने वाली कृष्‍णा सोबती जितनी साहसी लेखक थीं, विचारधारा के मामले में उतनी ही स्‍पष्‍ट भी. निर्णय पर अडिग रहने वाली कृष्‍णा सोबती को लोग बेहद संवेदनशील व्‍यक्तित्‍व और सौम्‍य मुस्‍कान के लिए याद करते हैं.

(25 जनवरी 2023 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)

Friday, January 20, 2023

कुर्रतुलऐन हैदर: लेखक के नजरिए से देखिए हिंदुस्‍तान का अतीत और विभाजन की त्रासदी


आज ऐनी आपा के नाम से चर्चित कुर्रतुलऐन हैदर की जयंती है. माना जाता है कि उर्दू अदब की एक धारा वहां से शुरू होती है जहां से कुर्रतुलऐन हैदर ने लिखना शुरू किया था. वे विभाजन के समय पाकिस्‍तान गईं, वहां से लंदन और फिर भारत लौटी. यहां आ कर पत्रकारिता की, साहित्‍य लेखन किया. उनके लिखे को पाठकों ने खूब प्‍यार दिया तो दिया ही संस्‍थाओं और सरकार ने साहित्‍य अकादेमी, ज्ञानपीठ, पद्मश्री, पद्मभूषण सम्‍मान भी प्रदान किए. तमाम रचनाओं के अलावा कुर्रतुलऐन हैदर को सबसे ज्‍यादा 1959 में प्रकाशित उपन्‍यास ‘आग का दरिया’ के लिए जाना जाता है. इस उपन्‍यास की जितनी प्रशंसा हुई है उतनी ही इसके बारे में गलतबयानी भी. इतना कुछ कहा गया कि आ‍पत्तियों के बाद माफियां मांगी गईं. कुर्रतुलऐन हैदर हर गलत बयान का विरोध करती रहीं. मगर झूठ के सौ पैर होते हैं और वे गलतबयानी आज भी जारी है.

कुर्रतुलऐन हैदर का जन्म 20 जनवरी 1927 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था. ऐनी आपा यानी कुर्रतुलऐन हैदर का पूरा नाम मुसन्निफा क़ुर्रतुल ऐन हैदर था. उनके पिता सज्जाद हैदर यलदरम कुर्अतुल नहटौर के रहने वाले थे लेकिन हैदर के जन्म के समय वे अलीगढ़ विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार थे. पिता सज्जाद हैदर यलदरम खुद उर्दू के अच्छे लेखक थे. कुर्अतुल ऐन की मां नजर जहरा भी लेखिका थी. अदब के संस्‍कार परिवार में ही थे तभी कुर्रतुलऐन हैदर ने छह साल की उम्र से से लिखना शुरू किया. 1945 में उनका पहला कहानी संकलन ‘शीशे का घर’ छपा. तब उनकी उम्र 18 साल थी. वे लेखिका थी और उन्‍होंने ताउम्र खूब लिखा. कभी साहित्‍य रचा तो कभी पत्रकारिता की. निधन के समय 21 अगस्त 2007 तक वे लगातार लिखाती रहीं.

भारत के विभाजन पर सबसे चर्चित उपन्‍यासों में से एक ‘आग का दरिया’ पर बात करने से पहले जान लें कि कुर्रतुलऐन हैदर उन लोगों में शामिल हैं जो विभाजन के वक्‍त पाकिस्‍तान चले गए थे और बाद में भारत लौट आए. उनके बारे में कहा गया कि ‘आग का दरिया’ उपन्‍यास पाकिस्‍तान में सेंसरशिप का शिकार हुआ. कट्टरपंथियों ने उनके लिखे पर हंगामा किया. उन पर पाबंदियां लगाई गईं. मगर उपन्‍यास के हिंदी अनुवाद की भूमिका में वे इन सारी बातों को खारिज करती हैं. कहा जाता है कि पाकिस्‍तान में विरोध से परेशान हो कर वे ब्रिटेन गई थीं और फिर अपने पिता के खास दोस्‍त मौलाका अबुल कलाम आजाद के कहने पर भारत लौट आईं. यह आधी बात सच है और आधी झूठ.

कुर्रतुलऐन हैदर ने खुद लिखा है कि वे अपनी मां का इलाज करवाने ब्रिटेन गई थीं, न कि कट्टरपंथियों या सेंसरशिप से परेशान हो कर. हां, यह सच है कि पिता के मित्र अबुल कलाम आजाद के कहने पर ही वे लंदन में न रह कर भारत लौट आई थीं. भारत आने के बाद उन्‍होंने ‘द टेलीग्राफ’ में रिपोर्टिंग की. ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ में संपादन किया. ‘इम्प्रिंट’ की प्रबंध संपादक रहीं. उन्होंने लगभग बारह उपन्यास और ढेरों कहानियां लिखीं. उनकी प्रमुख कहानियां में ‘पतझड़ की आवाज’, ‘स्ट्रीट सिंगर ऑफ लखनऊ एंड अदर स्टोरीज’, ‘रोशनी की रफ्तार’ जैसी कहानियां शामिल हैं. उन्होंने ‘हाउसिंग सोसायटी’, ‘सफीने गमे दिल’, ‘आखि‍रे- शब के हमसफर’, ‘कारे जहां दराज है’ जैसे उपन्यास भी लिखें. ‘आखि‍रे- शब के हमसफर’ के लिए इन्हें 1967 में साहित्य अकादमी और 1989 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला. साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें 1984 में पद्मश्री और 1989 में उन्हें पद्मभूषण से पुरस्कृत किया गया.

मगर जिस उपन्‍यास के कारण वे हमेशा चर्चा में रही वह है, ‘आग का दरिया’. 1959 में इतिहास को समेटते वर्तमान की त्रासदी पर एक उपन्‍यास लिखा जाना क्रांतिकारी ही कहा जाएगा. इसकी शैली वैसी है जैसी बाद में हिंदी में कमलेश्वर ने ‘कितने पाकिस्तान’ उपन्यास में अपनाई थी. विभाजन की रक्तरंजित घटनाओं पर यशपाल ने ‘झूठा सच’, भीष्म साहनी ने ‘तमस, राही मासूम रज़ा ने ‘आधा गांव” जैसे उपन्यास लिखे हैं. इन सबमें प्रसिद्धि का चरम कुर्रतुलऐन हैदर के उर्दू उपन्यास ‘आग का दरिया’ ने छूआ है. यह उपन्यास में भारत के तीन हजार वर्ष के इतिहास को विभाजन की त्रासदी से जोड़ता है.

पुस्तक के अनुवादक नंद किशोर विक्रम कहते हैं कि आग का दरिया की कहानी बौद्ध धर्म के उत्थान और ब्राह्मणत्व पतन से शुरू होती है. ये तीन काल में विभाजित है, किंतु इसके पात्र गौतम, चंपा, हरिशंकर और निर्मला तीनों काल में मौजूद रहते हैं कहानी बौद्धमत और ब्राह्मणत्व के टकराव से शुरू हो कर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के टकराव तक पंहुचती है. उपन्यास देश के विभाजन की त्रासदी पर समाप्त होता है. यहां यह बात बतानी बेहद जरूरी है कि लेखिका ने विभाजन की त्रासदी को मानव त्रासदी के रूप में देखा है. मानव पीड़ा से सरोकार का यह पक्ष ‘चांदनी बेगम’, ‘चाय के बाग’ और ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ में भी दिखाई देता है.

पात्र गौतम और चंपा की एक ही इच्छा है कि वे बनारस पहुंच जाएं. उपन्यास में चंपा कहती है जब वह बनारस में पढ़ती थी तो कभी दो कौमों के सिद्धांत् पर गौर नही किया. काशी की गलियां, शिवालय और घाट मेरे भी इतने ही थे, जितने मेरी दोस्त लीना भार्गव के. फिर क्या हुआ कि जब मैं बड़ी हुई तो मुझे पता चला कि इन शिवालयों पर मेरा कोई हक नहीं, क्योंकि मैं माथे पर बिंदी नही लगाती. कुर्रतुलऐन हैदर लिखती हैं कि यहां हजारों देवी−देवता हैं. आप चाहे किंतु जिसे माने. इस्लाम में ऐसा नहीं है, वहां आपके लिए कोई आजादी नही दी गई है.

लेखक हमें अतीत से साक्षात्‍कार करवाते हैं और इस आधार पर हम भविष्‍य की इबारत लिख सकते हैं. विभाजन की त्रासदी को भी कुर्रतुलऐन हैदर की नजर से ‘आग का दरिया’ के रूप में जरूर देखा जाना चाहिए.

(20 जनवरी 2023 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 



Thursday, November 10, 2022

विजयदान देथा: बहुओं के बीच बैठे, बातें सुनी और रच दी कथाओं की फुलवाड़ी

विजयदान देथा को जानते हैं आप? जो नहीं जानते हैं वे शाहरूख-रानी मुखजी अभिनीत फिल्‍म ‘पहेली’ व हबीब तनवीर के विख्‍यात नाटक ‘चरणदास चोर’ के कथाकार के रूप में विजयदान देथा से परिचय का सूत्र जोड़ सकते हैं. प्रशंसकों के बीच बिज्‍जी के रूप में मशहूर विजयदान देथा के रचना संसार को जानना शुरू करेंगे तो पाएंगे कि रवींद्रनाथ टैगोर के बाद बिज्जी भारतीय उपमहाद्वीप के एकमात्र लेखक हैं, जिनका नाम 2011 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए नामित हुआ था. ऐसे कथाकार जो सबकुछ समेट कर अपने गांव में सिमट आया और फिर ख्‍याति ने ऐसा विस्‍तार लिया कि हर शख्‍स ने बिज्‍जी की रचनाओं के किरदारों में अपना कोई तार जुड़ा पाया.

रतलाम के प्रसिद्ध कवि देवव्रत जोशी ने अपनी एक कविता में एक ऐसी गीत लिखने की इच्‍छा जताई थी जिसे लोक गीत की तरह याद रखा जाए, लेखक को भुलाते हुए. ऐसी ही मछुआरों की कहानी का जिक्र विजयदान देथा भी किया करते थे. जिसमें अर्जेंटिना के मछुआरे चिली के सुविख्‍यात कवि पाब्‍लो नेरूदा का गीत गाते थे. मछुआरों को पता नहीं था कि गीत का लेखक कौन है. इसी तरह लोक को जीने और लोक को फिर नया रूप देने वाले बिज्‍जी की रचनाओं ने संसार की सारी सीमाओं को बौना साबित किया है. उन्‍हें जितना पढ़ा गया, उससे ज्‍यादा सुना गया. उनकी कथाएं याद रखी गईं, लेखक का विस्‍मृत करते हुए. लोक कथाएं उनकी कहानियों में फिर फिर जिंदा हो उठीं. तभी तो एक संकुचित कहे जाने वाले साहित्‍य समाज में एक भाषा (पंजाबी) की लेखिका अमृता प्रीतम दूसरी भाषा (राजस्‍थान की मारवाड़ी) के कथाकार बिज्‍जी के चरित्रों में अपना सच पाती हैं.

1 सितंबर 1926 के जन्मे विजयदान देथा का 87 वर्ष की उम्र में 10 नवंबर 2013 को देहांत हुआ था. लगभग 800 कहानियां लिखने वाले बिज्‍जी का रचना संसार ‘बातां री फुलवारी’, ‘उजाले के मुसाहिब’, ‘दोहरी जिंदगी’, ‘सपन प्रिया’, ‘महामिलन’, ‘त्रिवेणी’ में समाहित है. ‘समाज और साहित्य’, ‘गांधी के तीन हत्यारे’ आदि उनकी आलोचना पुस्तके हैं. रचनाधर्मिता का सम्‍मान करते हुए उन्‍हें पद्मश्री और साहित्य अकादमी सहित अन्‍य पुरस्कार प्रदान किए गए हैं.

बिज्जी के दादा जुगतीदान देथा राजस्थानी की डिंगल काव्य-धारा के सुप्रसिद्ध कवि थे. वहीं पिता सबलदान देथा पुश्तैनी चारणी काव्य-परंपरा के निपुण रचनाकार थे. छठी कक्षा में लिखी गई कविता बिज्‍जी के लेखकीय जीवन का आरंभ थी. जोधपुर के दरबार हाई स्कूल में रोज नई शरारतें बिज्‍जी की पहचान बन गई. हेड मास्‍टर ने पिटाई के लिए छड़ी उठाई तो बिज्‍जी ने उसे पकड़ कर रोक दिया. फलस्वरूप नवीं कक्षा में यह स्कूल छोड़ना पड़ा. वे राजस्‍थान में कहीं प्रवेश नहीं ले सकते थे तो पंजाब बोर्ड से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर उच्च शिक्षा के लिए जोधपुर लौटे. जसवंत कॉलेज में शिक्षा के दौरान सन् 1947 में उनका ‘उषा’ नामक प्रथम काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ. संदर्भ बताते हैं कि यह काव्य संग्रह एक रचनात्मक शरारत ही था. बिज्जी ने अपनी सहपाठिन उषा पाठक को संबोधित करते हुए इस काव्‍य संग्रह में सूर्योदय एवं संध्या का चित्रण करने वाली कविताएं लिखी थीं.

शरतचंद्र की एक किताब को 60-70 बार पढ़ा 

जसवंत कॉलेज में अध्‍ययन के दौरान बिज्‍जी ने पहली बार शरत साहित्य पढ़ा. शरतचंद्र को पढ़ते हुए बिज्जी का जीवन बदल गया. अपने साक्षात्‍कार में बिज्‍जी ने कहा है कि उन्‍होंने शरतचंद्र की रचनाओं को 70-70 बार तक पढ़ा है. उन्‍हीं के शब्‍दों में वे शरत साहित्‍य का पारायण करते थे और हर बार उस पुस्‍तक को पढ़ कर नई प्रेरणा मिलती.

सन् 1959 में उन्होंने हिंदी छोड़कर राजस्थानी में लिखने का संकल्प लिया और अपने गांव बोरुंदा लौट आए. ‘बातां री फुलवाड़ी’ शीर्षक से लोक-कथाओं के पुनर्सृजन की उनकी यात्रा यहीं से आरंभ हुई. संवाद में वर्ष 2020 में प्रकाशित साक्षात्‍कार में प्रेम कुमार कई पहलुओं पर बात रखते हैं. इस साक्षात्‍कार में बिज्‍जी ने बताया कि जयपुर में उद्योग विभाग के तत्‍कालीन निदेशक त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी ने आठ हज़ार का ऋण मंजूर करवाया. उसी से गांव में प्रेस लगाई. बिजली नहीं थी. एक बड़ा-सा व्हील कबाड़ा–पट्टा लगाकर प्रेस मशीन चलाई. सन् 1962 की दीपावली पर ‘बातां री फुलवाड़ी’ का पहला भाग निकला. उस वक्त उन्‍होंने लिखने के मामले में मशीन से मुकाबला किया. सत्रह कम्पोजिटर और वे अकेले लेखक. सवेरे तीन बजे जागते. कम्पोजिटर नौ बजे तक आते तब तक वे बीस-पच्चीस पेज लिख लिया करते थे. होड़ लगी रहती कि कंपोजिंग पहले खत्म हो या बिज्‍जी का लिखना. लिखना पूरे दिन लगा रहता. दो गेली प्रूफ, फिर पेज प्रूफ, मशीन प्रूफ.

न लिखने से पहले सोचा, न लिखकर पढ़ा और न लिखकर कुछ काटा

बकौल बिज्जी न लिखने से पहले सोचा, न लिखकर पढ़ा और न लिखकर कुछ काटा. इधर छापे की मशीन थी, उधर कलम. मशीन के साथ मन से होड़ करते हुए सन् 1981 तक ‘बातां री फुलवाड़ी’ के चौदह भाग पूर्ण हुए. हर भाग में पांच-छह सौ पृष्ठ. आर्थिक कठिनाइयों की वजह से प्रेस बेचनी पड़ी. अगर न बेचनी पड़ती तो ‘बातां री फुलवाड़ी’ के तीस-चालीस भाग निकल जाते. इन्हीं 14 भागों में से एक ‘बातां री फुलवाड़ी’ के दसवें भाग पर 1974 में बिज्जी को राजस्थानी भाषा का पहला साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त हुआ.

‘बातां री फुलवाड़ी’ असल में राजस्‍थान की लोक कथाओं की पुनर्प्रस्‍तुति हैं. बिज्‍जी ने ताजगी के साथ गांवों में व्‍याप्‍त कथाओं को प्रस्‍तुत किया है. वे गांव-गांव, भटककर कथाओं को एकत्रित करते थे. वे गांवों और समारोह में ऐसी जगह जाते जहां महिलाएं इकट्ठी होती थीं. उनके बीच बैठ कर उनसे लोक कथाएं और उनकी बातें सुना करते थे. वे कहते थे एक महिला जब बहू बन कर दूसरे गांव आती है तो अपने साथ मायके की कथाएं, बातें, संस्‍कृति ले आती हैं. इस तरह वे महिलाओं के माध्‍यम से मारवाड़ की लुप्त हो रही लोक कथाओं को नया जीवन देने में कामयाब हुए हैं.इतना कि पंजाबी की लेखिका अमृता प्रीतम ने मुक्‍त कंठ से उनकी प्रशंसा की.

‘समकालीन भारतीय-साहित्य’ के बाईसवें अंक में गगन गिल के साथ साक्षात्कार में अमृता प्रीतम ने कहा था कि राजस्थान के लेखक हैं विजयदान देथा ‘बिज्जी’ लोक-कहानियों की सूरत में कहानी बयान करते हैं और बीच में कहीं एक स्तर पर वह ऐसी बात कह जाते हैं कि कहानी का सारा आयाम ही बदल जाता है. वह एकदम आज की कहानी हो जाती है. यह उनके पास बहुत खूबसूरत क्राफ्ट है, और यह सिर्फ क्राफ्ट ही नहीं है. इसके पीछे एक पूरी विचारधारा है, जो पुरानी बात कहते हुए भी उस कहानी को शाश्वत कर देती है- सारे समयों के लिए सच! अमृत प्रीतम ने कहा था कि अगर जबान की और स्थान की सरहद पर पांव रखकर लांघ जाऊं, तो सभी मेरे अपने हैं, जिन्होंने उस सच को छुआ है. मुझे आयन रैंड के किरदार कभी नहीं भूलेंगे. मुझे कजान जाकिस के किरदार नहीं भूल सकते. बहुत जगहों पर विजयदान देथा (बिज्जी) के भी नहीं.

अमृता प्रीतम से मिली प्रशंसा ने दिया निराश बिज्‍जी को संबल 

इस प्रशंसा के बाद 17 दिसंबर 1985 को बिज्‍जी ने अमृता प्रीतम को एक पत्र लिखा था. ‘नवनीत’ में प्रकाशित इस पत्र में बिज्‍जी ने अमृता प्रीतम के आभार जताया है. वे लिखते हैं, आदरणीय अमृता प्रीतम, एक बार आकाशवाणी जयपुर के समारोह में मित्रों ने आग्रहपूर्वक आपके भाषण की टेप सुनाई. आपने मेरे लिए शुरुआत में कुछ पंक्तियां कहीं थीं. मैंने सोचा शिष्टाचार के नाते आपने मेरी प्रशंसा कर दी है. किसी प्रांत की धरती पर सांस लेते समय वहां के किसी एक साहित्यकार का बखान करना शिष्टाचार का तकाजा है. मैंने उसे भी गंभीरतापूर्वक नहीं लिया. हाड़-मांस व रक्त-मज्जा से बना है मेरा पुतला, लाख लेखक की मर्यादा का निबाह करूं, अपनी प्रशंसा से खुशी तो होती ही है, पर उसका प्रदर्शन करने, उसे भुनाने का मन नहीं करता. किंतु ‘गगन गिल के साथ साक्षात्कार पढ़कर तो आश्चर्य-चकित रह गया. ऐसा लगा कि मेरी मुर्दा देह में पांखें उग आई हों. गांव से जोधपुर बस में जा रहा था. बहुत ही उदास व गमगीन. आर्थिक संकट के पाटों से कुचला हुआ. ऐसा हताश मैं कभी नहीं हुआ था. हालांकि तीस-पैंतीस साल से आर्थिक संकट का ऐसा ही ढर्रा चल रहा है. पर इस बार कुछ बोझ असह्य-सा हो उठा था.

बिज्‍जी लिखते हैं, दूसरे साहित्यकारों व कलाकारों की विपदा से तुलना करके अपनी विपदा को अधिक विषम समझना, मुझे अपराध-सा महसूस होता है, पर इतना ज़रूर कह सकता हूं कि सृजन की भयावह राह पर मुझे भी कम सहन नहीं करना पड़ा. मैंने एक-एक अक्षर को विपदाओं की कोख से जन्म दिया है. किसी पर एहसान नहीं है, मेरे जीवन का अर्थ यही था, मैं इसके अलावा कुछ भी अन्य कर सकने के लिए अक्षम था. अपना रोना भी अच्छा नहीं लगता. यही तो सृजन की उर्वरा कोख है. पर उस दिन मायूसी नितांत असह्य होती जा रही थी. संकट की उस त्रासदी में आपकी पंक्तियों ने जैसे मेरे अंतस को अमृत से सराबोर कर दिया हो. दूसरे ही पल सारा क्लेश हवा हो गया. लगा कि हवा मेरी ही उड़ान का अनुकरण कर रही है. मुर्दे में प्राण फूंकने का मायना अच्छी तरह समझ में आया. यह अप्रत्याशित जीवन-दान मैं कभी बिसर नहीं सकूंगा. सूखते पौधे पर जैसे बादल ही फूट पड़ा हो. अभेद्य अंधकार से भरा अंतस अविलंंब जगमगा उठा. आप से मिलने के लिये मन बार-बार अबोध बच्चे की नाईं मचल उठा. यदि दो दिन बाद ही बीमार न हो गया होता तो अब तक आपसे मिलने का उत्साह साकार हो गया होता. पत्र न लिखकर स्वयं उपस्थित होता.

जैसे मिल गया सौ हाथियों जितना बल

अपने पत्र में बिज्‍जी ने साहित्‍य की राजनीति पर लिखा था कि हिंदी के अधिकांश बड़े लेखक नितांत व्यवसायी हैं. जब तक मुनाफे का सौदा नहीं होता, वे किसी साथी लेखक की प्रशंसा नहीं कर सकते. अपनी ही देह में दुबके रहते हैं. अपने सृजन की तुलना में उन्हें सारी दुनिया ही छोटी नजर आती है. उन्हें दोष नहीं देता, उनके संस्कार ही ऐसे हैं. अपने स्वार्थ के अलावा उन्हें चांद-सूरज भी नज़र नहीं आते. फिर भी इने-गिने सामान्य लेखकों ने, (नामवरी की दृष्टि से सामान्य) मर्मज्ञ पाठकों ने मुझे अपने हृदय में उछाह से स्थान दिया है, और वही मेरी एकमात्र अखूट पूंजी है. सूखे तृषित गले को आपने अपने स्तन से जो अमृत-पान कराया है- उसकी शुभ-सूचना तो आपके पास पहुंचा दूं- यत्किंचित कृतज्ञता तो प्रकट कर दूं. मेरे लिए आपकी यह सहज आत्मीय सराहना सर्वोच्च पुरस्कार है. जिससे मुझमें सौ हाथियों जितना बल संचरित हो गया. मेरा यह निश्छल आभार आपको अंगीकार करना ही होगा. शायद मुलाकात के समय मेरी वाणी इतनी मुखर नहीं हो पाती.

लिखने का आनंद कभी नहीं मिला

समझा जा सकता है कि मशीन की तरह लिखने वाले विजयदान देथा ने कथा के मर्म और संवेदना को कहीं भी मुरझाने नहीं दिया. यह एक लेखक का सबसे बड़ा तप है. जब अपने साक्षात्‍कार में प्रेम कुमार ने उनसे लेखन के सुख के बारे में पूछा तो उन्‍होंने कहा कि लिखने में आनंद कभी नहीं मिला. लिखना सांस लेने की तरह चलता रहा. जैसे मोर का नाच, कोयल की कूक, सांस-पांव की गति सहज है – उसी तरह मेरे लिए लिखना सहज है. लिखते-लिखते धीरे-धीरे मैं ‘ग्रो’ करता गया. लिखने के बजाय पढ़ने से, दूसरों की रचनाएं पढ़ने से अधिक सुख मिलता है. कभी ऐसा नहीं सोचा कि लिखे बगैर मर जाता तो क्या होता पर ऐसा कई बार लगा कि इस कृति को बिना पढ़े मर जाता तो सद्गति न होती. चेखव, शरत, रवींद्र, उपनिषद आदि में कितनी पीढ़ियों का कैसा-कैसा अनुभव घुला है. लिखकर ऐसा महसूस नहीं होता.

बिज्‍जी यानी विजयदान देथा को पढ़ते हुए उनके जीवन संघर्ष के इन पहलुओं को याद रखते हैं तो पठन सुख में श्रद्धा का भाव स्‍वत: सम्मिलित हो जाता है.


(न्‍यूज 18 में 10 नवंबर को प्रकाशित ब्‍लॉग।)

Monday, November 7, 2022

चंद्रकांत देवताले: खून की जांच करो अपने, कहीं ठंडा तो नहीं हुआ

 वह औरत


आकाश और पृथ्वी के बीच

कब से कपड़े पछीट रही है,


पछीट रही है शताब्दियों से

धूप के तार पर सुखा रही है,

वह औरत आकाश और धूप और हवा से

वंचित घुप्प गुफा में

कितना आटा गूंध रही है?


एक औरत का धड़

भीड़ में भटक रहा है

उसके हाथ अपना चेहरा ढूंढ रहे हैं

उसके पांव

जाने कब से

सबसे

अपना पता पूछ रहे हैं. (औरत) 


इस कविता से इसके लेखक कवि चंद्रकांत देवताले के समूचे कृतित्‍व को समझा जा सकता है. उनके संवेदना के स्‍तर को जाना जा सकता है. आज उन देवताले जी की जयंती है. उनका जन्‍म 7 नवम्बर 1936 को जौलखेड़ा बैतूल में हुआ था. सेवानिवृत्ति के बाद वे उज्‍जैन में ही बस गए थे. उज्‍जैन में ही 14 अगस्त 2017 को उनका निधन हुआ. किसी के प्रिय कवि, किसी के प्रिय प्रोफेसर, किसी के लिए बेहतरीन इंसान, जाने कितनी छवियां हैं जिनके बहाने देवताले जी किसी एक दिन नहीं कभी भी एक अनूठी याद बन स्‍मृत हो जाते हैं. आज भी उन्‍हें याद करने के कई बहाने हैं.


पूरे देश के साहित्‍यकारों की क्‍या कहिए, मालवा खासकर, इंदौर, रतलाम, उज्‍जैन, भोपाल के साहित्‍यकारों के पास चंद्रकांत देवताले के साथ की अपनी यादें हैं. उनके अपने खास किस्‍से हैं. ये वे किस्‍से हैं जो हमें एक कवि के कोमल मन का साक्षात्‍कार ही नहीं करवाते हैं बल्कि हमें एक कवि ह्रदय इंसान के साथ होने के गर्व से भी भरते हैं. रतलाम कॉलेज में पढ़े कई विद्यार्थी उन्‍हें आज भी अपने प्रोफेसर के रूप में याद करते हैं तो साहित्‍यप्रेमी उनकी रचनाशीलता के किस्‍से सुनाते हैं.


रतलाम में हुए कार्यक्रमों में मुझे उनके साथ कुछ पल बिताने का मौका भी मिला है. जब वे मंच पर होते और रचना पाठ करते तो खास अंदाज में सुनाई गई कविताओं का पाठक पर विशेष प्रभाव होता था. उन्‍हें रतलाम छोड़े अर्सा हो गया था. ‘रतलाम उत्‍सव’ के लिए वे रतलाम में आए हुए थे. उस दोपहर रचना पाठ के बाद मैं उनकी काव्‍य आभा से मुग्‍ध था तभी सुनाई दिया- ‘गुजराती स्‍कूल के सामने कचौरी की दुकान है या नहीं? वहां ले चल. माणक चौक भी जाएंगे’.


तब मेरे सामने तस्‍वीर का दूसरा पहलू था.अपने आसपास के मित्रों, प्रशंसकों के घेरे को तोड़ कर कुछ समय बाद वे मेरी बाइक पर सवार थे. उनकी जानी पहचानी दुकान पर खड़े थे हम. वे कचौरियों का स्‍वाद ले रहे थे और मैं उनके संग का आनंद.


उनके व्‍यक्तित्‍व का एक पहलू वरिष्‍ठ कवि प्रोफेसर आशुतोष दुबे की याद से उभरता है. आशुतोष दुबे लिखते हैं, बहुत साल पहले की बात है. किसी प्रसंग में चंद्रकांत देवताले जी के साथ देवास जाना था बस से. समय तय हुआ जब हम दोनों को बस स्टैंड पर मिलना था. मुझे कुछ देर हो गई. देवताले जी एक पेड़ के नीचे अपनी काइनेटिक होंडा लिए खड़े थे.

मैंने कहा- आपको इंतज़ार करना पड़ा.

उन्होंने जवाब दिया- नहीं. मैंने अपने से कहा, मैं किसी का इंतजार नहीं कर रहा हूं. न कोई आने वाला है न मुझे कहीं जाना है. मैं यहां पेड़ के नीचे इस छांह में खड़ा होने के लिए आया हूं. इस छांह को, इस दोपहर को और यहां की चहल पहल को इंजॉय कर रहा हूं.


क्‍या ही बेहतरीन जीवन प्रबंधन है. इस सुलझे सूत्र के बिना जीवन के मकड़जाल से अप्रभावी रहना संभव नहीं है. उज्‍जैन के कवि नीलोत्‍पल अकसर ही देवताले जी को याद करते हुए उनके व्‍यक्तित्‍व के जाने-अनजाने रंगों से हमें रूबरू करवाते रहते हैं.


नीलोत्‍पल लिखते हैं, देवताले जी के साथ कुछ साल रहने का अवसर मिला. कई बार ऐसा होता था कि मैं किसी बात पर देवताले जी से असहमत हो जाता, वे चिकोटी की तरह भरकर कहते, ‘देख तू नहीं मान रहा पर यह सच है ज्वार माता की कसम’. यह इतना प्रिय वचन होता कि मैं उन्हें सहमति का स्वर देता. यह सहमति मुझे अपनी असहमति से ज़्यादा प्रिय थी. यह मानवीय और उद्दात्त से भरे क्षणों में हम एक-दूसरे को निथारते रहते. कभी वे बाजरे की भी कसम खाया करते, यह उनके शगल में था. प्रकृति में भरोसा भी दिलाता था यह आप्तवचन.


ऐसे कितने ही अनुभव है जिनके माध्‍यम से हम कवि चंद्रकांत देवताले को जानते हैं और ऐसी कितनी ही रचनाएं हैं जिनके जरिए श्रेष्‍ठ मानव के रूप में वे हमसे मुखातिब होते हैं. हमेशा अपनी उपस्थिति से किसी को परेशान नहीं करते हुए, प्रकृति को आत्‍मसात करते हुए, इंसानों के भावों को उकेरते हुए. कभी कभी तो लगता है, स्‍त्री जीवन के मनोभावों के कपास और संघर्ष के पात को समझना हो तो मां, बेटी, प्रेम को इंगित करते हुए लिखी गई देवताले जी की कविताओं को पढ़ लेना ही काफी है. कविता को जीने वाले और जीवन को रचने वाले देवताले जी को याद करना, उनकी रचनाओं से गुजरता वास्‍तव में हमारे श्रेष्‍ठ होने के मार्ग का अनिवार्य कदम है. आप भी पढ़िए उनकी कुछ पंक्तियां :


अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही

तो मत करो कुछ ऐसा

कि जो किसी तरह सोए हैं

उनकी नींद हराम हो जाए

हो सके तो बनो पहरुए

दुःस्वप्नों से बचाने के लिए उन्हें

गाओ कुछ शांत मद्धिम

नींद और पके उनकी जिससे

सोए हुए बच्चे तो नन्हे फरिश्ते ही होते हैं

और सोई स्त्रियों के चेहरों पर

हम देख ही सकते हैं थके संगीत का विश्राम

और थोड़ा अधिक आदमी होकर देखेंगे तो

नहीं दिखेगा सोये दुश्मन के चेहरे पर भी

दुश्मनी का कोई निशान

अगर नींद नहीं आ रही हो तो

हंसो थोड़ा, झांको शब्दों के भीतर

खून की जांच करो अपने

कहीं ठंडा तो नहीं हुआ. (अगर तुम्‍हें नींद नहीं आ रही है)



वसंत जो पृथ्वी की आंख है

जिससे वह सपने देखती है

मैं पृथ्वी का देखा हुआ सपना कहना चाहता हूं.



सीता ने कहा था- फट जा धरती

ना जाने कब से चल रही है ये कहानी

फिर भी रुकी नहीं है दुनिया

बाई दरद ले!

सुन बहते पानी की आवाज

हां! ऐसे ही देख ऊपर हरी पत्तियां

सुन ले उसके रोने की आवाज़

जो अभी होने को है

जिंदा हो जाएगी तेरी देह

झरने लगेगा दूध दो नन्हें होंठों के लिए. (बाई दरद ले)



सोई हुई है जैसे उजड़कर गिरी सूखे पेड़ की टहनी

अब पड़ी पसर कर


नींद में हँसते देखना उसे मेरा एक सपना यह भी

पर वह तो

माथे की सिलवटें तक नहीं मिटा पाती

सोकर भी. (एक सपना यह भी) 


‘नींबू मांगकर’ कविता में वे लिखते हैं:


बेहद कोफ़्त होती है इन दिनों

इस कॉलोनी में रहते हुए

जहां हर कोई एक-दूसरे को

जासूस कुत्ते की तरह सूंघता है

अपने-अपने घरों में बैठे लोग

वहीं से कभी-कभार

टेलीफोन के जरिए अड़ोस-पड़ोस

की तलाशी लेते रहते हैं

पर चेहरे पर एक मुस्कान चिपकी रहती है

जो एक-दूसरे को कह देती है-

“हम स्वस्थ हैं और सानंद

और यह भी की तुम्हें पहचानते हैं, ख़ुश रहो”,


यहां तक भी ठीक है

पर अजीब लगता है कि

घरु ज़रूरतों के मामले में

सब के सब आत्मनिर्भर और

बढ़िया प्रबंधक हो गए है

पुरानी बस्ती में कोई दिन नहीं जाता था

की बड़ी फज़र की कुंडी नहीं खटखटाई जाती

और कोई बच्चा हाथ में कटोरी लिए नहीं कहता-

‘बुआ, मां ने चाय-पत्ती मंगाई है’

किसी के यहां आटा खुट जाता

और कभी ऐन छौंक से पहले

प्याज, लहसुन या अदरक की गांठ की मांग होती


होने पर बराबर दी जाती

चाहे कुढ़ते-बड़बड़ करते हुए

पर यह कुढ़न दूसरे या तीसरे दिन ही

आत्मीय आवाज़ में बदल जाती

जब जाना पड़ता कहते हुए

भाभी! देख थोड़ी देर पहले ही खत्म हुआ दूध

और फिर आ गए हैं चाय पीने वाले


रोज़मर्रा की ऐसी मांगा-टूंगी की फेहरिस्त में

और भी कई चीज़ें शामिल रहतीं

जैसे तुलसी के पत्ते या कढ़ी-नीम

बेसन-बड़े भगोने, बाम की शीशी

और वक़्त पड़ने पर दस-बीस रुपए भी

और इनके साथ ही

आपसी सुख-दुःख भी बंटता रहता

जो इस पृथ्वी का दिया होता प्राकृतिक

और दुनिया के हत्यारों का भी


पर इस कॉलोनी में लगता है

सभी घरों में अपने-अपने बाजार हैं

और बैंकें भी

पर नींबू शायद ही मिले

हां! नींबू एक सुबह मैं इसी को मांगने दो-तीन घर गया

पद्मा जी, निर्मला जी, आशा जी के घर तो होने ही थे

नींबू क्योंकि इसके पेड़ भी है उनके यहां

पर हर जगह से ‘नहीं है’ का टका-सा जवाब मिला

मैंने फोन भी किए

दीपा जी ने तो यहां तक कह दिया

‘क्यों मांगते हैं आप मुझसे नींबू’

मै क्या जवाब देता

बुदबुदाया- इतने घर और एक नींबू तक नहीं. 


उज्जैन फोन लगाकर

कमा को बताया यह वाकया

वहीं से वह बड़बड़ाई

वहां मांगा-देही का रिवाज नहीं

समझाया था पहले ही

फिर भी तुम बाज नहीं आए आदत से अपनी

वहां इंदौर में नींबू मांगकर तुमने

यहां उज्जैन में मेरी नाक कटवा ही दी

हंसी आई मुझे अपनी नाक पर हाथ फेरते

जो कायम मुकम्मल थी और साबूत भी.

(देवताले जी की जयंती पर 7 नवंबर 2022 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)