हम ही बिगाड़ रहे अपना पर्यावरण,
थाम लो वरना खत्म हो जाएगा जीवन
धरती, जल, वायु और वन। जीवन के लिए अनिवार्य इन तत्वों में से कोई शुद्ध नहीं बचा। धरती बंजर हो रही है, पानी जहरीला होता जा रहा है। हवा दूषित है और आकाश में धुआं दौर धूलकण हैं। केन्द्र सरकार की स्टेट ऑफ इंवायरमेंट रिपोर्ट 2009 इसी कड़वी हकीकत को बयान करती है। रिपोर्ट के अनुसार देश की 328.73 मिलियन हेक्टेयर जमीन बंजर हो रही है। इसमें से 93.68 मिलियन हेक्टेयर पानी के क्षरण तथा 16.03 मिलियन हेक्टेयर पानी की अम्लता के कारण जमीन बंजर हुई है। इसी प्रकार खेतों में नरवाई जलाने से श्वसंन तंत्र बिगड़ रहा है तो फ्लोराइडयुक्त पानी हड्डियों को टेढ़ा बना रहा है।
धरती
* आजादी के बाद भारत की कुल आबादी तो तीन गुना बढ़ गई, लेकिन कृषि भूमि क्षेत्र में मामूली वृद्धि हुई। 1951 में खेती का रकबा 118.75 मिलियन हेक्टेयर था जो 2005-06 में 141.89 हुआ।
* ज्यादा उपज की लालच में प्रति हेक्टेयर रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल में इजाफा हुआ है। 1991-92 में 69.8 किलोग्राम उर्वरकों का उपयोग किया जाता था जो 2006-07 में बढ़ कर 113.3 किग्रा हो गया। इस कारण मिट्टी की उर्वरता खत्म हो रही है।
* खेतों में नरवाई जलाने के कारण न केवल जमीन का उपजाऊपन खत्म हो रहा है, बल्कि हवा प्रदूषित हो रही है और तापमान में इजाफा हो रहा है। अकेले पंजाब में 23 मिलियन टन चावल और 17 मिलियन टन गेहूँ की नरवाई होती है। चावल की 80 प्रतिशत यानि 18.4 मिलियन टन और गेहूँ की 5.5 मिलियन टन नरवाई जला दी जाती है।
* नरवाई जलाने से खेतों की मिट्टी का कार्बन का कार्बन डाई ऑक्साइह में तथा नाइट्रोजन का नाइट्रेट में परिवर्तन हो जाता है। यह 0.824 मिलियन टन उर्वरक के खत्म होने के बराबर है, यानि पंजाब में कुल उर्वरकों की खपत का आध्ाा।
* नरवाई से बिगड़ा पर्यावरण बड़े क्षेत्र में श्वाँस, चर्म और नेत्र रोग का कारण बनता है।
जल
* पर्यावरण में बदलाव के कारण देश में बारिश का अनुपात गड़बड़ा गया है। अनुमान है कि 2050 तक पश्चिम और मध्य भारत के बारिश के 15 दिन घट जाएँगे। दूसरी तरफ हम अभी औसतन बारिश का 45 प्रतिशत पानी संभाल नहीं पाते। यह व्यर्थ बह जाता है।
* मप्र के प्रथम श्रेणी के 25 शहरों में 1560.91 मिलियन लीटर प्रतिदिन पानी प्रदान किया जाता है। इसमें से 1248.726 एमएलडी पानी सीवेज के रूप में निकल जाता है।
* दूसरी श्रेणी के 23 शहरों में 163.64 एमएलडी पानी प्रदान किया जाता है। इन शहरों में 130 लीटर पानी मैला कर बहा दिया जाता है।
* प्रदेश के 19 जिलों में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा है। इस कारण बच्चों में दाँत के क्षरण और हड्डियों के टेढ़ा होने की बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही है।
हवा
* हमारे वाहनों और कारखानों ने ऑक्सीजन को कार्बन डाई ऑक्साइड में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। केवल दिल्ली का उदाहरण देखें तो यहाँ प्रतिवर्ष हवा में 3 हजार टन प्रदूषण घुल रहा है जिसमें 66 प्रतिशत वाहनों के कारण है।
* 2006-07 में भारत के कोयले का उपयोग कर रहे विद्युत क्षेत्र ने 495.54 मिलियन टन कॉर्बन का उत्सर्जन किया।
* भारत में 60 फीसदी घरों में ईध्ान के रूप में जलाऊ लक ड़ी और कोयला और कंडे का इस्तेमाल होता है।
* द इंटरोगर्वनमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज 2007 की रिपोर्ट कहती है कि 2080 तक तापमान में 2.7 से 4.3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो जाएगी।
वन
* यूँ तो देश की हरियाली में इजाफे के संकेत हैं लेकिन 2003 से 2005 के बीच कुल वन क्षेत्र में 728 वर्गकिमी की कमी आई थी। वन क्षेत्र घटने वाले प्रमुख राज्यों में मप्र भी शामिल है। यहाँ 132 वर्गकिमी वन घटा। तीन सालों में बड़े पैमाने पर वनक्षेत्र का कम होना, खतरनाक चेतावनी है।
* बदलते पर्यावरण के कारण ही राजस्थान का जलसंकट झेल रहा 92 प्रतिशत क्षेत्र रेगिस्तान में तब्दील हो रहा है। गुजरात में 91 फीसदी क्षेत्र रेगिस्तान बन रहा है।
Showing posts with label जल. Show all posts
Showing posts with label जल. Show all posts
Sunday, June 6, 2010
Monday, May 31, 2010
आपका पानी कौन सा है?
आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है,
फिर उभरता है, फिर से बहता है,
न समंदर निगला सका इसको, न तवारीख तोड़ पाई है,
वक्त की मौज पर सदा बहता - आदमी बुलबुला है पानी का।
गुलजार साहब का यह गीत जिंदगी के साज पर इंसान के हौंसलों का राग है। पृथ्वी और हमारे शरीर में सबसे ज्यादा मात्रा में मौजूद यह तत्व पानी, कला माध्यमों में भी बहुतायत में मिलता है। बचपन से जब कल्पनाएँ परवान चढ़ने लगती है अभिव्यक्ति के लिए मन बैचेन हो उठता है, तब से पानी हमारी अभिव्यक्ति का केन्द्र बनता है। एक बच्चा जब कूची थामता है तो कुछ अभ्यास के बाद नदी, पहाड़, फूल और पेड़ की आकृति की उकेरता है। छुटपन के गिनेचुने खेलों में से एक है-'मछली-मछली कितना पानी।"
स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही रूपों में पानी सृजनधर्मियों का सहायक रहा है। चाहे वह शिल्प हो, संगीत हो, वास्तु या चित्रकला, नाट्य या वक्तृत्व कला। औजारों को धार देने का मामला हो या रोशनाई को घोलने का उपक्रम। बिना पानी सब सूना है, अधूरा है।
पानी के जितने स्वाद और प्रकार है, जीवन के भी उतने ही रूप है और उतनी कला में अभिव्यक्ति भी। ठहरा हुआ पानी, गहरा पानी, उथला पानी, गंदला पानी, साफ पानी, बदली में काला पानी, समंदर में नीला पानी, बाढ़ का उपद्रवी पानी, झीर का सूखता पानी...।
नैनों से झलकता पानी, मेहनतकश के शरीर का खारा पानी, शर्म का पानी, चेहरे का पानी...।
रंगों में घुलता पानी, दूध में मिलता पानी, कड़ाही पर पकता पानी, रोटी में फूलता पानी...।
चातक की प्यास बुझाता पानी, सीप में मोती बनता पानी...।
इन सभी में से एक पानी हमारा भी है। हमारा पानी एक समय में कई रंग दिखालाता है। अपनों के लिए मीठा होता है तो दूसरों के लिए खारा। प्यासे के लिए गंदला पानी भी मीठा हो जाता है और तृप्त कंठ के लिए मीठा पानी भी अर्थहीन। भेद भरे सृजन का पानी लोगों को बाँटता है, विभाजित करता है। वैमनस्यपूर्ण कला मनभेद रचती है और पानीदार कला मेल कराती है। ऐसी कला पानी की उन दो-चार बूँदों की मानिंद होती है जो उफनते दूध को शांत कर देती है।
सवाल यह है कि आपका पानी कौन-सा है?
और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है,
फिर उभरता है, फिर से बहता है,
न समंदर निगला सका इसको, न तवारीख तोड़ पाई है,
वक्त की मौज पर सदा बहता - आदमी बुलबुला है पानी का।
गुलजार साहब का यह गीत जिंदगी के साज पर इंसान के हौंसलों का राग है। पृथ्वी और हमारे शरीर में सबसे ज्यादा मात्रा में मौजूद यह तत्व पानी, कला माध्यमों में भी बहुतायत में मिलता है। बचपन से जब कल्पनाएँ परवान चढ़ने लगती है अभिव्यक्ति के लिए मन बैचेन हो उठता है, तब से पानी हमारी अभिव्यक्ति का केन्द्र बनता है। एक बच्चा जब कूची थामता है तो कुछ अभ्यास के बाद नदी, पहाड़, फूल और पेड़ की आकृति की उकेरता है। छुटपन के गिनेचुने खेलों में से एक है-'मछली-मछली कितना पानी।"
स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही रूपों में पानी सृजनधर्मियों का सहायक रहा है। चाहे वह शिल्प हो, संगीत हो, वास्तु या चित्रकला, नाट्य या वक्तृत्व कला। औजारों को धार देने का मामला हो या रोशनाई को घोलने का उपक्रम। बिना पानी सब सूना है, अधूरा है।
पानी के जितने स्वाद और प्रकार है, जीवन के भी उतने ही रूप है और उतनी कला में अभिव्यक्ति भी। ठहरा हुआ पानी, गहरा पानी, उथला पानी, गंदला पानी, साफ पानी, बदली में काला पानी, समंदर में नीला पानी, बाढ़ का उपद्रवी पानी, झीर का सूखता पानी...।
नैनों से झलकता पानी, मेहनतकश के शरीर का खारा पानी, शर्म का पानी, चेहरे का पानी...।
रंगों में घुलता पानी, दूध में मिलता पानी, कड़ाही पर पकता पानी, रोटी में फूलता पानी...।
चातक की प्यास बुझाता पानी, सीप में मोती बनता पानी...।
इन सभी में से एक पानी हमारा भी है। हमारा पानी एक समय में कई रंग दिखालाता है। अपनों के लिए मीठा होता है तो दूसरों के लिए खारा। प्यासे के लिए गंदला पानी भी मीठा हो जाता है और तृप्त कंठ के लिए मीठा पानी भी अर्थहीन। भेद भरे सृजन का पानी लोगों को बाँटता है, विभाजित करता है। वैमनस्यपूर्ण कला मनभेद रचती है और पानीदार कला मेल कराती है। ऐसी कला पानी की उन दो-चार बूँदों की मानिंद होती है जो उफनते दूध को शांत कर देती है।
सवाल यह है कि आपका पानी कौन-सा है?
Thursday, May 27, 2010
पानी गए न ऊबरे//
पानी को न जाना कुछ भी
मीरा बाई ने बरसों पहले एक भजन में कुछ सवाल पूछे थे। उनका पहला प्रश्न था- जल से पतला कौन है? सभी जानते हैं कि जल से पतला ज्ञान बताया गया था। बात इतनी सी है कि जल की इस तरलता को समझने में हमने बरसों लगा दिए, फिर भी अज्ञानी ही रहे।
वेद जल को विष्णु का पर्याय कहते हैं। हो भी क्यों न, विष्णु सृष्टा हैं और जल जीवन का आधार। विज्ञान कहता है कि साधारण माना जाने वाला पानी उत्तम विलायक भी है। हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक परमाणु से बने पानी की विशेषता है कि इसका ठोस रूप (बर्फ) द्रव रूप से हलका होता है। पानी का कमजोर ही सही लेकिन विशेष हाइड्रोजन बंध इसे कई गुण देता है। पानी के इस विज्ञान में भी कितना बड़ा अध्यात्म छुपा है। जीवन में देखें तो पानी जोड़ने का काम ही करता है। जन्म, विवाह और मृत्यु सहित तमाम संस्कारों के आवश्यक तत्व पानी को महाकवि तुलसीदास जी ने उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने के लिए उपयोग किया था। उन्होंने रामेश्वर में शिवलिंग की स्थापना के बाद श्री राम के मुख से कहलवाया कि जो गंगोत्री से गंगाजल ला कर यहाँ अभिषेक करेगा वह मुक्ति पाएगा। पानी देश के दो छोर को जोड़ने का ही नहीं बल्कि अंचलों को जोड़ने का माध्यम भी बना। जगह-जगह निकलने वाली कावड़ यात्राएँ, नर्मदा यात्राएँ और नदी में नहाने का महत्व धार्मिक कम पानी के प्रति आदरांजलि ज्यादा है। इस्लाम में भी पानी की अहम भागीदारी है। इस्लाम का मूल नमाज है और नमाज का मूल वजू है। बिना वजूके नमाज नहीं हो सकती और बिना पानी के वजू नामुमकिन है। यहाँ भी पानी के संरक्षण की बात कही गई है। माना जाता है कि कयामत के दिन जिसे नेकी के साथ रखा जाएगा वह वजू का पानी है। यानि ज्यादा से ज्यादा नमाज हो। और वजू में एक भी बूँद पानी की बर्बादी की तो आखिर में उसका हिसाब देना होगा। आज पानी जब कम हो रहा है तो उत्तर-दक्षिण ही नहीं, अड़ोस-पड़ोस के विवाद का कारण बन रहा है।
...बर्फ के हल्के होने का भी अपना संदेश हैं। आप चाहे जितना कठोर हो जाएँ, यह आपका हलकापन (उथलापन) ही होगा। आप तरल हैं तो सहज हैं। तभी वस्तुत: भारी भी हैं।
...सभ्यताओं और संस्कृति के जलस्त्रोतों के किनारे होने की वजह पानी का बहुपोग होना ही तो है। हम भी जितना बहुपयोगी, बहुगुणी और बहुआयामी होगें, उतना ही विस्तार और महत्व पाएँगे।
...पानी जहाँ जाता है, जिसमें मिलता, वैसा हो जाता है।
...पानी का एक गुण और है। यह राह बनाना जानता है। पत्थरों में रूकता नहीं, अवरोधों से सिमटता नहीं। दबकर, पलटकर, कुछ देर ठहरकर यह अपनी राह खोज लेता है। और यही पगडंडी धीरे-धीरे दरिया का रास्ता बनती है। देख लीजिए जिन्होंने अपनी पगडंडी चुनी, जो पानी की तरह तरल,सहज और विलायक हुए वही समाज के पथप्रदर्शक भी बने। उन्हें ही सुकून भी मिला।
हम हर बार कहते हैं, पढ़ते हैं- पानी गए न ऊबरे। लेकिन हर बार जब आकलन करते हैं तो पाते हैं कि पानी के बारे में जितना भी जाना, न जाना कुछ भी। और जिसने पानी को जान लिया वह पानी-पानी हो गया। जिसमें पानी को समझ लिया वह पानीदार हो गया।
मीरा बाई ने बरसों पहले एक भजन में कुछ सवाल पूछे थे। उनका पहला प्रश्न था- जल से पतला कौन है? सभी जानते हैं कि जल से पतला ज्ञान बताया गया था। बात इतनी सी है कि जल की इस तरलता को समझने में हमने बरसों लगा दिए, फिर भी अज्ञानी ही रहे।
वेद जल को विष्णु का पर्याय कहते हैं। हो भी क्यों न, विष्णु सृष्टा हैं और जल जीवन का आधार। विज्ञान कहता है कि साधारण माना जाने वाला पानी उत्तम विलायक भी है। हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक परमाणु से बने पानी की विशेषता है कि इसका ठोस रूप (बर्फ) द्रव रूप से हलका होता है। पानी का कमजोर ही सही लेकिन विशेष हाइड्रोजन बंध इसे कई गुण देता है। पानी के इस विज्ञान में भी कितना बड़ा अध्यात्म छुपा है। जीवन में देखें तो पानी जोड़ने का काम ही करता है। जन्म, विवाह और मृत्यु सहित तमाम संस्कारों के आवश्यक तत्व पानी को महाकवि तुलसीदास जी ने उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने के लिए उपयोग किया था। उन्होंने रामेश्वर में शिवलिंग की स्थापना के बाद श्री राम के मुख से कहलवाया कि जो गंगोत्री से गंगाजल ला कर यहाँ अभिषेक करेगा वह मुक्ति पाएगा। पानी देश के दो छोर को जोड़ने का ही नहीं बल्कि अंचलों को जोड़ने का माध्यम भी बना। जगह-जगह निकलने वाली कावड़ यात्राएँ, नर्मदा यात्राएँ और नदी में नहाने का महत्व धार्मिक कम पानी के प्रति आदरांजलि ज्यादा है। इस्लाम में भी पानी की अहम भागीदारी है। इस्लाम का मूल नमाज है और नमाज का मूल वजू है। बिना वजूके नमाज नहीं हो सकती और बिना पानी के वजू नामुमकिन है। यहाँ भी पानी के संरक्षण की बात कही गई है। माना जाता है कि कयामत के दिन जिसे नेकी के साथ रखा जाएगा वह वजू का पानी है। यानि ज्यादा से ज्यादा नमाज हो। और वजू में एक भी बूँद पानी की बर्बादी की तो आखिर में उसका हिसाब देना होगा। आज पानी जब कम हो रहा है तो उत्तर-दक्षिण ही नहीं, अड़ोस-पड़ोस के विवाद का कारण बन रहा है।
...बर्फ के हल्के होने का भी अपना संदेश हैं। आप चाहे जितना कठोर हो जाएँ, यह आपका हलकापन (उथलापन) ही होगा। आप तरल हैं तो सहज हैं। तभी वस्तुत: भारी भी हैं।
...सभ्यताओं और संस्कृति के जलस्त्रोतों के किनारे होने की वजह पानी का बहुपोग होना ही तो है। हम भी जितना बहुपयोगी, बहुगुणी और बहुआयामी होगें, उतना ही विस्तार और महत्व पाएँगे।
...पानी जहाँ जाता है, जिसमें मिलता, वैसा हो जाता है।
...पानी का एक गुण और है। यह राह बनाना जानता है। पत्थरों में रूकता नहीं, अवरोधों से सिमटता नहीं। दबकर, पलटकर, कुछ देर ठहरकर यह अपनी राह खोज लेता है। और यही पगडंडी धीरे-धीरे दरिया का रास्ता बनती है। देख लीजिए जिन्होंने अपनी पगडंडी चुनी, जो पानी की तरह तरल,सहज और विलायक हुए वही समाज के पथप्रदर्शक भी बने। उन्हें ही सुकून भी मिला।
हम हर बार कहते हैं, पढ़ते हैं- पानी गए न ऊबरे। लेकिन हर बार जब आकलन करते हैं तो पाते हैं कि पानी के बारे में जितना भी जाना, न जाना कुछ भी। और जिसने पानी को जान लिया वह पानी-पानी हो गया। जिसमें पानी को समझ लिया वह पानीदार हो गया।
Subscribe to:
Posts (Atom)
