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Wednesday, October 13, 2010

तीन साल से सूचना मिलने का इंतजार

पुनर्वास विभाग को नहीं पता कितने हुए विस्थापित
 मप्र के पुनर्वास विभाग को नहीं पता है कि प्रदेश में विभिन्न योजनाओं के तहत कितने लोगों को विस्थापित किया गया और कितने लोगों का पुनर्वास किया गया। विभाग से जब 2006 में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी माँगी गई तो जवाब मिला-'हम बांग्लादेशी और पाकिस्तान के विस्थापितों का काम देखते हैं। प्रदेश के विस्थापन की जानकारी नहीं है।" जब राज्य सूचना आयोग ने सूचना जुटा कर देने को कहा तो पुनर्वास विभाग ने 13 विभागों से जानकारी माँगी। तब से जानकारी ही जुटाई जा रही है।
यह एक उदाहरण सूचना के अधिकार की ताकत और जरूरत बताने के लिए काफी है। 12 अक्टूबर 2007 में लगाए गए इस आवेदन के जवाब में विभाग ने जानकारी न होने बात कह दी। प्रथम अपील में भी प्रकरण खारिज कर दिया गया तो राज्य सूचना आयोग में अपील की गई। सुनवाई के बाद आयोग ने कहा कि पुनर्वास विभाग को जानकारी देना चाहिए। आयोग ने कहा कि विभाग के पास जानकारी नहीं है तो वह अन्य विभागों से जुटा कर जानकारी दे। इस आदेश के बाद पुनर्वास विभाग ने विस्थापन करने वाले राजस्व, नगरीय प्रशासन, वन एवं पर्यावरण, जल संसाधन सहित 13 विभागों से विस्थापन और पुनर्वास की जानकारी माँगी। तीन साल बाद अब तक विभागों ने जानकारी नहीं भेजी है।
आकलन है कि प्रदेश में हुए 60 से 80 प्रतिशत विस्थापन के बारे में विभागों को पता नहीं है कि विस्थापित कहाँ और किस हालत में हैं। इस आवेदन ने व्यवस्था की पोल खोलते हुए साबित कर दिया कि दफ्तरों में कामों और जानकारियों को अपडेट नहीं किया जाता। यहाँ केवल तात्कालिक जानकारियाँ ही मौजूद होती हैं। असल  में यह इस कानून के अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा है। गौरतलब है कि सूचना के अधिकार कानून में अधिकांश आवेदनों को सूचना न होने की वजह से खारिज कर दिया जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता सचिन जैन कहते हैं कि सरकारी विभागों में सूचना को एकत्रित करने और संग्रह कर रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। योजनाएँ प्रारम्भ कर दी गई लेकिन उसके प्रभावितों, नुकसान और लाभ के आकलन के लिए जानकारियाँ ही नहीं है तो कैसे सफलता-असफलता जाँची जा सकेगी? आँकड़ों के बिना गरीब विस्थापितों के लिए कोई योजना कैसे चलाई जा सकेगी? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि सही तथ्य, जानकारियाँ और आँकड़ों के अभाव में सही योजना का निर्माण कैसे होगा?

एक साल बाद भी नहीं मिली कॉपियाँ
एक तरफ जहाँ विभागों के पास जानकारियाँ नहीं हैं वहीं दूसरी ओर अपील करने के बाद निर्णय और सूचना देने में इतनी देर हो जाती है कि फिर सूचना का मकसद खत्म हो जाता है। पिपरिया की सुगंधा और खुशबू माहेश्वरी का प्रकरण इसका उदाहरण है।

सुगंधा और खुशबू माहेश्वरी ने माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से दिसंबर 2008 में एमएससी कम्प्यूटर साइंस की परीक्षा दी थी। मार्च 2009 में जब परिणाम आया तो सुगंधा को दो विषय में 35-35 और दो में 45-45 नंबर मिले थे। खुशबू को दो में 45-45 और दो में 55-55 नंबर मिले। सुगंधा जहाँ दो विषयों मंे फेल होने से सकते में थीं वहीं समान नंबर मिलने से खुशबू अचरज में। उन्होंने कॉपियों की फोटोकॉपी माँगने के लिए 3 जून 2009 को आवेदन दिया। आवेदन खारिज होने पर अगस्त 2009 में राज्य सूचना आयोग में अपील की गई। आयोग में उनके प्रकरण पर सुनवाई का नंबर साल भर बाद अक्टूबर 2010 में आया। अब साल भर पास या फेल का निर्णय हो भी जाए तो समय गुजरने के बाद मिली सूचना किस काम आएगी?

Friday, August 13, 2010

इन पर कर सकते हैं भरोसा














पिछले साल गुना जिले के 20 गाँवों में एक दस्तक हुई थी। इसने ग्रामीणों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाया था। इस साल से प्रदेश के 200 गाँवों में स्काउट और गाइड जाकर कहेंगे-'साफ हाथों में दम है।" सफाई का महत्व बताने और प्रेरित करने के लिए ये नाटक, गीत, सभा और हठ तक का सहारा लेंगे। ये गाँव का नक्शा बनाकर बताएँगे कि गंदगी फैलने के क्या नुकसान हैं और इस समस्या से कैसे निपटा जा सकता है।
गुना के रेडक्रास भवन में जारी स्काउट-गाइड शिविर में स्कूली विद्यार्थी सेवा का पाठ नहीं पढ़ रहे बल्कि बदलाव की भूमिका तैयार कर रहे हैं। इन्हीं की तरह प्रशिक्षण लेकर निकले विद्यार्थियों ने साबित कर दिया है कि बदलाव की चाबी युवाओं के हाथों में हैं। यहाँ लगाए गए शिविरों में स्काउट-गाइड ने जीवन शिक्षा से जीवन रक्षा के सूत्र सीखे हैं और गाँवों में जाकर लोगों को सिखाया है कि भोजन से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ धोएँगे। खुले में शौच की प्रवृत्ति छोड़ेंगे। इन बच्चों के पास सफलता की कहानियाँ भी है और चुनौतियों से निपटने की तैयारी भी। आरोन गाँव के नरेश सेन और आयुष जैन ने अपने पूरे कस्बे का नक्शा बना लिया है। वे आरोन में घर-घर जाकर दस्तक देंगे और लोगों को बताएँगे कि डायरिया से बच्चों की मौत और बार-बार बीमार होने की बड़ी वजह गंदगी है। वे इस तैयारी में हैं कि सीएमओ को विकल्प बताएँ और समाधान न होने पर दबाव बनाएँ।

स्कूल में पानी और साबुन जुटाया:
शिविर संचालक रोवर सुखदेव सिंह चौहान बताते हैं कि स्काउट-गाइड शिविर से स्वच्छता, व्यक्तिगत सफाई के पाठ सीख कर जाता है और पहले अपने स्कूल के साथियों को तैयार करता है ताकि उनकी बात घर-घर तक पहुँचे। इसका परिणाम यह हुआ कि बच्चों की जिद के आगे बुजुर्गों को अपनी आदतें बदलना पड़ीं। जीवन शिक्षा से 'जीवन रक्षा अभियान" के 'जीवन मित्र" बने विद्यार्थिंयों ने हर समस्या का समाधान  खोजा है। मसलन, मध्याह्न भोजन के पहले हाथ धोना जरूरी है लेकिन स्कूल साबुन नहीं जुटा सकता तो विद्यार्थी खुद घर से साबुन लेकर आए। जिन स्कूलों में पानी की व्यवस्था नहीं थी, वहाँ बच्चे अपने साथ पानी की बोतल भी लाए।

छात्रवृत्ति से बनाएगा शौचालय:
इन जीवन मित्रों के साथ बैठो तो सफलता की कई कहानियाँ सुनाई पड़ती है। मसलन, पिछले शिविर में शामिल हुआ कक्षा सातवीं का छात्र सुनील कुमार इस कदर प्रभावित हुआ कि उसने अपने घर में अपनी छात्रवृत्ति के पैसे से शौचालय बनवाने का संकल्प ले लिया। वरिष्ठ शिक्षिका प्रभा भावे बताती हैं कि बच्चे बड़ा बदलाव लाने में समर्थ हुए हैं। वे केवल बड़ों को कोरा पाठ नहीं पढ़ाते बल्कि पहले समाधान  देते हैं, इसलिए इनकी सुनी जाती है।

10 जिलों में होगा विस्तार :
गुना में मिली इस सफलता को देखते हुए इस सत्र से प्रदेश के 10 जिलों के 20 स्कूलों के स्काउट-गाइड को जीवन मित्र बनाया जाएगा। ये गाँवों में घर-घर जाकर बदलाव की दस्तक देंगे।

Friday, July 30, 2010

सड़ा देंगे, पर खाने नहीं देंगे

2.50 रूपए बचाने 14.50 रु. का घाटा मंजूर
गोदामों में सड़ रहा गेहूँ, पर सरकारें गरीबों को देने तैयार नहीं
केन्द्र और राज्य सरकार बचाना चाहती है सबसिडी का खर्च

यह वाकई शर्मनाक स्थिति है। सरकारी गोदामों में गेहूँ सड़ रहा है, लेकिन गरीब भूखों मर रहे हैं। लोगों की मौत से ज्यादा केन्द्र व राज्य सरकारों के लिए सबसिडी बचाना महत्वपूर्ण है। मप्र सरकार बीपीएल गेहूँ एपीएल के भाव इसलिए नहीं खरीदना नही चाहती क्योंकि इसे गरीबों को बाँटने में उसे ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे। केन्द्र सरकार खराब होता सस्ता गेहूँ एपीएल के भाव इसलिए नहीं बेचना चाहती, क्योंकि इसके लिए उसे ज्यादा सबसिडी देनी पड़ेगी। यानी कि एपीएल गेहूँ भंडारण का ढाई रुपया बचाने के लिए उसे 14.50 रु. का गेहूँ बर्बाद होना मंजूर है।

उल्लेखनीय है कि ग्लोबल हंगरी इंडेक्स (वैश्विक भूख सूचकांक) में भारत का दुनिया के 88 देशों में 66 वाँ स्थान है। केवल मप्र में ही 67 लाख बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) परिवार हैं, लेकिन केन्द्र केवल 41 लाख 15 हजार परिवारों के हिसाब से ही गेहूँ का आवंटन करता है। इस कारण बीपीएल परिवारों को प्रतिमाह 35 की जगह 25 किलो गेहूँ ही मिलता है। बाकी गरीब सस्ते अनाज के लिए तरस जाते हैं। यह स्थिति तब है, जब भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की गेहूँ खरीदी 60 मिलियन मीट्रिक टन को पार कर चुकी है। नियमानुसार बफर जोन की मात्रा करीब 21 मिलियन टन है, लेकिन भारतीय खाद्य निगम ने इससे दो गुना बफर स्टॉक कर रखा है।

3 लाख टन गेहूँ खुले में
अकेले मप्र में ही इस साल 83 लाख टन गेहूँ की रिकॉर्ड पैदावार और 35 लाख टन की खरीद हुई है। जबकि राज्य में भंडारण की व्यवस्था केवल 30 लाख मीट्रिक टन की ही है। तमाम इंतजाम के बाद भी 3 लाख मीट्रिक टन गेहूँ अभी भी खुले आसमान के तले पॉलिथिन में पड़ा है। विदिशा में 45 हजार टन, सीहोर में 20 हजार टन, हरदा और होशंगाबाद में 10 हजार टन गेहूँ खराब होने की स्थिति में है। अगर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार प्रति परिवार 35 किलो गेहूँ भी बाँट दिया जाए तो खुले में पड़ा 3 लाख टन गेहूँ 7.15 लाख परिवारों का एक साल का राशन है। राज्य सरकार बीपीएल परिवारों को 25 किलोग्राम गेहूँ या चावल प्रदान कर रही है।
मुनाफाखोरी कर रही सरकार
मप्र सरकार ने तय दर 11 रूपए के अलावा किसानों को एक रुपया बोनस भी दिया है। इस हिसाब से गेहूँ खरीदी दर 12 रु. प्रति किलो हुई। इसके भंडारण पर 2.50 रूपए खर्च किए गए। इस तरह एक किलो गेहूँ 14.50 रुपया का पड़ा। केन्द्र सरकार राज्यों को बीपीएल गेहूँ 5 रूपए किलो की दर पर देती है। यदि वह खराब हो रहे गेहूँ को 7.50 रु. प्रति किलो के भाव से दे तो भी राज्य सरकारें उसे नहीं खरीदती क्योंकि इसके लिए उन्हें 5 के बजाए 7.50 रुपए प्रति किलो खर्च करने पड़ेंगे। मप्र सरकार तो अन्नापूर्णा योजना के तहत बीपीएल परिवारों को 3 रूपए किलो के भाव से गेहूँ देती है। यानी प्रति दो रु. प्रति किलो सबसिडी देती है। मप्र सरकार को तो एक किलो गेहूँ पर 4.50 (2+ 2.50) रूपए ज्यादा खर्च करना पड़ेंगे। इसलिए उसकी भी एपीएल गेहूँ खरीदने में रुचि नहीं है। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार को एपीएल की दर पर गेहूँ देने पर भी घाटा उठाना पड़ता, इसलिए वह भी खामोशी से 14.50 रूपए प्रति किलो कीमत वाला गेहूँ खराब होते देख रही है।

सड़ना मंजूर पर पेट भरना नहीं
केन्द्र सरकार को पता था कि गेहूँ सड़ने वाला है लेकिन खाद्य मंत्रालय की सलाह के बाद भी मंत्रियों के समूह ने सब्सिडी बचाने के लिए प्रस्ताव को नकार दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार केन्द्रीय खाद्य विभाग और एफसीआई ने गेहूँ खराब होने के आशंका को देखते हुए मार्च 2010 में प्रस्ताव दिया था कि 50 लाख टन गेहूँ एपीएल (गरीबी रेखा से ऊपर) के दाम पर राज्यों को दे देना चाहिए। लेकिन मंत्रियों के समूह ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए नकार दिया कि ऐसा करने पर 5000 करोड़ की अतिरिक्त सबसिडी देना होगी।
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' मौजूदा मँहगाई और भूख की स्थिति सूखे या खाद्यान्ना संकट के कारण नहीं, सरकार की नीतियों और राजनीतिक व्यवस्था के कारण है। हम न्यायालय के आदेश के बाद भी गरीबों को प्रतिमाह 35 किलो अनाज नहीं दे पा रहे है। यह कोर्ट की अवमानना के साथ गरीबों को भूखा रखने का षड़यंत्र भी है। आखिर सरकार गोदामों में रखा गेहूँ लोगों में  क्यों नहीं बाँट देती।"
सचिन जैन, सर्वोच्च न्यायालय के राज्य सलाहकार
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यह है हकीकत
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प्रदेश में बीपीएल परिवार - 67 लाख
केन्द्र से अनाज आवंटन- 41 लाख 15 हजार परिवारों के लिए
बीपीएल गेहूँ की कीमत- 5 रु.किलो (प्रदेश सरकार 3 रूपए किलो में दे रही हैं)
एपीएल की दर - 7.50 रूपए
खराब हो रहे गेहूँ की कीमत- 14.50 रू.(12 रूपए में खरीदी + 2.50 रू. में भंडारण)

Friday, July 23, 2010

बलि ले रहा है सूचना का अधिकार

सात माह में छह कार्यकर्ताओं की हत्या, छह पर हमले
महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 3 की ली जान

सूचना का अधिकार (आरटीआई) भले ही भ्रष्टाचार के खिलाफ ब्रह्मास्त्र कहा जाता हो, लेकिन यह आरटीआई कार्यकर्ताओं की बलि लेने लगा है। ये कार्यकर्ता भ्रष्टाचारियों और माफिया के निशाने पर हैं। यही वजह है कि पिछले सात माह में देश में 6 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई और इतने ही स्थानों पर जानलेवा हमले हुए। मारे गए कार्यकर्ताओं में 3 महाराष्ट्र, 2 गुजरात और 1 बिहार से हैं।

देश में 2005 में लागू हुआ सूचना का अधिकार से भ्रष्टाचारी बौखला गए हैं। लिहाजा वे पोल खुलने की डर से अब सामाजिक कार्यकर्ताओं की जान लेने से भी नहीं चूक रहे हैं। पिछले मंगलवार को अहमदाबाद उच्च न्यायालय के बाहर हुई सामाजिक कार्यकर्ता अमित जेठवा की हत्या इस बात का ताजा सबूत है। इस अधिकार का इस्तेमाल करने के कारण इस साल श्री जेठवा सहित छह कार्यकर्ता जान गँवा बैठे हैं। ये सभी कार्यकर्ता भू माफिया के साथ शासन-प्रशासन के भ्रष्टाचारियों की पोल खोलने में लगे हुए थे। गौरतलब है कि श्री जेठवा ने जूनागढ़ के गिर के जंगल में अवैध खनन के खिलाफ आवाज उठाई थी। सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारियों के आधार  पर ही उन्होंने वन विभाग के खिलाफ गुजरात उच्च न्यायालय में अनेक याचिकाएँ लगाई थी। इससे पहले 13 जनवरी को महाराष्ट्र में जमीन घोटाले उजागर करने पर 39 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता सतीश शेट्टी की हत्या कर दी गई थी। वे तेलगाँव, लोनावला और पिम्परी-चीन्चवाड़ में जमीन घोटालों को सामने लाए थे। 13 जनवरी को सुबह जब वे सैर पर गए थे तो घर से करीब 7 किमी दूर उनपर तलवार सहित धारदार  हथियारों से हमला हुआ। कई जमीन घोटालों को उजागर करने वाले शेट्टी ने अपने लिए सुरक्षा की माँग भी की थी लेकिन इसके पहले ही उनकी जान ले ली गई।

अहमदाबाद के विश्राम लक्ष्मण डोडिया ने टोरेंट पॉवर से दिए गए अवैध कनेक्शन की जानकारी देने के लिए आवेदन किया था। उन्हें कोई सूचना नहीं मिली लेकिन 11 फरवरी को कम्पनी अधिकारियों  से मुलाकात के कुछ देर बाद वे मृत पाए गए। 14 फरवरी को बिहार के प्रसिद्ध कार्यकर्ता शशिधर मिश्रा की घर के बाहर अज्ञात बदमाशों ने गोली मार कर हत्या कर दी। वह स्थानीय लोक कल्याणकारी योजनाओं में गड़बड़ियों को उजागर कर रहे थे। अप्रैल में महाराष्ट्र के ग्रामीण स्कूलों की गड़बड़ियों की पोल खोलने वाले कार्यकर्ता विट्ठल गीते और उनके साथी ब्रजमोहन मिश्रा पर एक स्कूल संचालक के समर्थकों ने हमला कर दिया। इस हमले में विट्ठल की मौत हो गई। पुलिस के अनुसार स्कूल की अनियमितताओं की खबर अखबार में छपने के बाद दोनों के बीच विवाद बढ़ गया था। 22 मई को कोल्हापुर जिले के सामाजिक कार्यकर्ता दत्ता पाटिल का शव मिला। उनकी हत्या का एकमात्र कारण भ्रष्टाचार का खुलासा बताया गया।



महाराष्ट्र में खास आदेश
महाराष्ट्र सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले कार्यकर्ताओं पर ज्यादा हमले हुए हैं। यहाँ कार्यकर्ताओं की शिकायतें थी कि पुलिस सुनवाई नहीं करती है। इन शिकायतों और बढ़ते हमलों को देखते हुए पुलिस महानिदेशक ने विशेष आदेश जारी कर निर्देश दिए थे कि ऐसे हमलों की सुनवाई हो और शिकायत दर्ज की जाए।

मप्र में चिंता
सामाजिक कार्यकर्ताओं पर बढ़ते हमलों के कारण प्रदेश के कार्यकतों भी चिंता में है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के सदस्य अजय दुबे ने मप्र डीजीपी एसके राउत को ज्ञापन देकर आग्रह किया है कि प्रदेश में भी सूचना का अधिकार इस्तेमाल करने वाले कार्यकर्ताओं की सुरक्षा की योजना तैयार की जाए। अन्य कार्यकर्ता प्रशांत दुबे और रोली शिवहरे कहते हैं कि कार्यकर्ता इन हमलों से डरने वाले नहीं है। वे यूँ ही अपना काम जारी रखेंगे।

इन पर हुए हमले
-1 अप्रैल 2010 को महाराष्ट्र के जलगाँव जिले की पचोरा तालुका एडवोकेट अभय पाटिल पर जानलेवा हमला।
-लोक निर्माण विभाग के भ्रष्टाचार की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत माँगने पर 14 जुलाई को पीडब्ल्यूडी कार्यालय के बाहर ही आरटीआई कार्यकर्ता अशोक कुमार शिंदे की पिटाई।
-16 मार्च को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में सुमेरा अब्दुलानी, नसीर जलाल व पत्रकारों के दल पर हमला, गाड़ी में तोड़फोड़।
- जम्मू कश्मीर सूचना का अधिकार आंदोलन के प्रमुख डॉ मुजफ्फर बट पर 27 फरवरी को बरनवार में सूचना का अधिकार कानून पर जागरूकता कार्यशाला के दौरान हमला।
- 12 जनवरी को दिल्ली में कार्यकर्ता अजय कुमार और साथियों पर राड, लाठी से हमला कर दिया।
- 8 जनवरी को मुबंई के चर्चगेट पर ओवल मैदान के सामने स्वस्तिक बिल्डिंग निवासी 65 वर्षीय बुजुर्ग कार्यकर्ता नयना कथपालिया को डराने के लिए सुबह 6.45 बजे घर के बाहर फायरिंग

Sunday, July 11, 2010

मप्र व केन्द्र में टकराव के बीज

बीज के दाम भी तय करेगा बाजार



पेट्रोलियम पदार्थों के दाम नियंत्रण का अधिकार बाजार को दे चुकी केन्द्र सरकार की योजना है कि वह शकर के दाम बढ़ाने की ताकत भी बाजार को दे दे। इसकी मार आम आदमी पर पड़ेगी, लेकिन इससे एक कदम और आगे जाते हुए केन्द्र सरकार चाहती है कि बीजों के दामों पर भी बाजार का नियंत्रंण हो। वह बीज-2010 विधेयक पास करवाकर बीजों को पेट्रोलियम पदार्थों की तरह नियंत्रण से मुक्त करना चाहती है। दूसरी तरफ राज्य सरकारों का मानना है कि बीजों के दामों को बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसका सीधा सम्बन्ध किसानों के हितों से जुड़ा है। इन राज्य सरकारों में मप्र सरकार भी है। वह खुद बीज कीमतों को काबू करने वाला विधेयक लाने जा रही है। आंध्र प्रदेश सरकार इस तरह का बिल पहले ही पास कर चुकी है।

उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा बीज एक्ट 1966 में संशोधन के लिए बीज विधेयक -2004 लाया गया था। यह तीन बार संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन तीनों बार इसे पारित नहीं कराया जा सका। इस बार भी केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने विधेयक को स्वीकृति दे दी है और सरकार कोशिश है कि मानसून सत्र में ही बीज विधेयक 2010 पारित हो जाए। लेकिन सचाई यह है कि तमाम सामाजिक संगठन, प्रबुद्ध नागरिक और किसान संगठन इस विधेयक को किसान विरोधी और बीज कंपनियों के हित में बता रहे हैं। किसान संगठन बीजों के दामों पर नियंत्रण की पैरवी कर रहे हैं, लेकिन केन्द्र सरकार विधेयक में संशोधन पर राजी नहीं है।

मप्र सरकार ने भी इस विधेयक की एक खामी गिनाते हुए इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। हाल में मप्र कैबिनेट ने सामाजिक और किसान संगठनों की बात से सहमति जताते हुए राज्य में कपास के बीजों के मूल्य पर नियंत्रण के लिए विधेयक लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। विशेषज्ञों के अनुसार यह 7 वीं अनुसूची का मसला है। इस विषय पर दोनों सरकारें बिल ला सकती हैं, लेकिन जब किसी बिंदु केन्द्र और राज्य सरकार के नियमों में टकराव हो तो केन्द्र सरकार की बात मानी जाएगी। हाँलाकि ऐसा हुआ तो बीजों के दाम नियंत्रण के मामले में केन्द्र के बिल को महत्व मिलेगा।

मुआवजे के उपबंध भी जोड़ें

राज्य सरकार और सामाजिक संगठनों का कहना है कि केन्द्र सरकार बीज अध्ािनियम 2010 में बीज कंपनियों की जवाबदेही भी तय करें। वह मूल्य नियंत्रण और घटिया बीज से हानि पर किसानों को पर्याप्त मुआवजे का उपबंध भी जोड़े। गौरतलब है कि केन्द्र सरकार ने 10 जून को बिनौले के उत्पादन और वितरण का नियमन और छह महीने करने का फैसला किया है । संसद में बीज विधेयक पारित होने के बाद बिनौले का नियंत्रण विधेयक के प्रावधानों के तहत होगा और उसके बाद आवश्यक वस्तु कानून के तहत बिनौले को लेकर जारी अधिसूचना वापस ले ली जाएगी ।

बीज कमेटी ने की सिफारिशें

28 नवंबर 2006 को प्रोफेसर राम गोपाल यादव की अध्यक्षता में गठित कृषि पर स्टैंडिंग कमेटी ने अपने सुझाव में बीज विधेयक में अनेक संशोधन किए जाने की सिफारिश की है। कमेटी ने कहा कि किसानों द्वारा उपयोग किए जाने व बेचे जाने वाले बीजों का पंजीकृत बीज संबंधी न्यूनतम मानकों के अनुरूप होना किसानों के अधिकार में बाधा है। इसलिए कमेटी इस प्रावधान को रद्द करने की सिफारिश करती है। किसान की परिभाषा को और व्यापक करते हुए इसमें उन्हें भी शामिल किया जाए जो पारंपरिक बीजों का संरक्षण कर रहे हैं। बीज विधेयक में किसानों को बीज उगाने और उनके लेन-देन की अनुमति होनी चाहिए। विधेयक में मूल्य नियामक का प्रावधान होना चाहिए, जिससे कि किसानों से बीज उत्पादक/सप्लायर मनमाफिक दाम नहीं वसूल सकें।




' बीज विधेयक 2010 किसान विरोधी  है। मप्र सरकार बीजों के मूल्य पर सरकारी नियंत्रण के पक्ष में है। हम केन्द्र सरकार से माँग कर रहे हैं कि वह विधेयक में बदलाव करे।"

डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया, कृषिमंत्री, मप्र शासन



' बीजों के दाम के नियंत्रण का मामला 7 वीं अनुसूची से जुड़ा है। इसके तहत केन्द्र और राज्य सरकार अपने नियम बना सकती है लेकिन विवाद के बिंदु पर केन्द्र के विधेयक की बात ही मानी जाएगी।"

विश्वेन्द्र मेहता, संविधान विशेषज्ञ और पूर्व सचिव मप्र विस



' जब प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटी एंड फार्मर्स राइट एक्ट (पीपीवीएफआर) मौजूद है, तो बीज अधिनियम लाने की जरूरत ही नहीं है। दरअसल 90 फीसदी किसान अपने बीज ही उपयोग में लाते हैं। किसान अधिक बीज खरीदें और कंपनियों को फायदा हो, इसलिए सरकार बीज विधेयक पारित करने की कोशिश में है। बीज विधेयक 2010 में दो महत्वपूर्ण बदलाव की जरूरत है। पहला तो यह कि बीज मूल्यों का नियमन जरूर हो। साथ ही नियमों के उल्लघंन पर कड़े दंड का प्रावधान हो।"

डॉ. देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ