आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है,
फिर उभरता है, फिर से बहता है,
न समंदर निगला सका इसको, न तवारीख तोड़ पाई है,
वक्त की मौज पर सदा बहता - आदमी बुलबुला है पानी का।
गुलजार साहब का यह गीत जिंदगी के साज पर इंसान के हौंसलों का राग है। पृथ्वी और हमारे शरीर में सबसे ज्यादा मात्रा में मौजूद यह तत्व पानी, कला माध्यमों में भी बहुतायत में मिलता है। बचपन से जब कल्पनाएँ परवान चढ़ने लगती है अभिव्यक्ति के लिए मन बैचेन हो उठता है, तब से पानी हमारी अभिव्यक्ति का केन्द्र बनता है। एक बच्चा जब कूची थामता है तो कुछ अभ्यास के बाद नदी, पहाड़, फूल और पेड़ की आकृति की उकेरता है। छुटपन के गिनेचुने खेलों में से एक है-'मछली-मछली कितना पानी।"
स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही रूपों में पानी सृजनधर्मियों का सहायक रहा है। चाहे वह शिल्प हो, संगीत हो, वास्तु या चित्रकला, नाट्य या वक्तृत्व कला। औजारों को धार देने का मामला हो या रोशनाई को घोलने का उपक्रम। बिना पानी सब सूना है, अधूरा है।
पानी के जितने स्वाद और प्रकार है, जीवन के भी उतने ही रूप है और उतनी कला में अभिव्यक्ति भी। ठहरा हुआ पानी, गहरा पानी, उथला पानी, गंदला पानी, साफ पानी, बदली में काला पानी, समंदर में नीला पानी, बाढ़ का उपद्रवी पानी, झीर का सूखता पानी...।
नैनों से झलकता पानी, मेहनतकश के शरीर का खारा पानी, शर्म का पानी, चेहरे का पानी...।
रंगों में घुलता पानी, दूध में मिलता पानी, कड़ाही पर पकता पानी, रोटी में फूलता पानी...।
चातक की प्यास बुझाता पानी, सीप में मोती बनता पानी...।
इन सभी में से एक पानी हमारा भी है। हमारा पानी एक समय में कई रंग दिखालाता है। अपनों के लिए मीठा होता है तो दूसरों के लिए खारा। प्यासे के लिए गंदला पानी भी मीठा हो जाता है और तृप्त कंठ के लिए मीठा पानी भी अर्थहीन। भेद भरे सृजन का पानी लोगों को बाँटता है, विभाजित करता है। वैमनस्यपूर्ण कला मनभेद रचती है और पानीदार कला मेल कराती है। ऐसी कला पानी की उन दो-चार बूँदों की मानिंद होती है जो उफनते दूध को शांत कर देती है।
सवाल यह है कि आपका पानी कौन-सा है?
Monday, May 31, 2010
Thursday, May 27, 2010
पानी गए न ऊबरे//
पानी को न जाना कुछ भी
मीरा बाई ने बरसों पहले एक भजन में कुछ सवाल पूछे थे। उनका पहला प्रश्न था- जल से पतला कौन है? सभी जानते हैं कि जल से पतला ज्ञान बताया गया था। बात इतनी सी है कि जल की इस तरलता को समझने में हमने बरसों लगा दिए, फिर भी अज्ञानी ही रहे।
वेद जल को विष्णु का पर्याय कहते हैं। हो भी क्यों न, विष्णु सृष्टा हैं और जल जीवन का आधार। विज्ञान कहता है कि साधारण माना जाने वाला पानी उत्तम विलायक भी है। हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक परमाणु से बने पानी की विशेषता है कि इसका ठोस रूप (बर्फ) द्रव रूप से हलका होता है। पानी का कमजोर ही सही लेकिन विशेष हाइड्रोजन बंध इसे कई गुण देता है। पानी के इस विज्ञान में भी कितना बड़ा अध्यात्म छुपा है। जीवन में देखें तो पानी जोड़ने का काम ही करता है। जन्म, विवाह और मृत्यु सहित तमाम संस्कारों के आवश्यक तत्व पानी को महाकवि तुलसीदास जी ने उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने के लिए उपयोग किया था। उन्होंने रामेश्वर में शिवलिंग की स्थापना के बाद श्री राम के मुख से कहलवाया कि जो गंगोत्री से गंगाजल ला कर यहाँ अभिषेक करेगा वह मुक्ति पाएगा। पानी देश के दो छोर को जोड़ने का ही नहीं बल्कि अंचलों को जोड़ने का माध्यम भी बना। जगह-जगह निकलने वाली कावड़ यात्राएँ, नर्मदा यात्राएँ और नदी में नहाने का महत्व धार्मिक कम पानी के प्रति आदरांजलि ज्यादा है। इस्लाम में भी पानी की अहम भागीदारी है। इस्लाम का मूल नमाज है और नमाज का मूल वजू है। बिना वजूके नमाज नहीं हो सकती और बिना पानी के वजू नामुमकिन है। यहाँ भी पानी के संरक्षण की बात कही गई है। माना जाता है कि कयामत के दिन जिसे नेकी के साथ रखा जाएगा वह वजू का पानी है। यानि ज्यादा से ज्यादा नमाज हो। और वजू में एक भी बूँद पानी की बर्बादी की तो आखिर में उसका हिसाब देना होगा। आज पानी जब कम हो रहा है तो उत्तर-दक्षिण ही नहीं, अड़ोस-पड़ोस के विवाद का कारण बन रहा है।
...बर्फ के हल्के होने का भी अपना संदेश हैं। आप चाहे जितना कठोर हो जाएँ, यह आपका हलकापन (उथलापन) ही होगा। आप तरल हैं तो सहज हैं। तभी वस्तुत: भारी भी हैं।
...सभ्यताओं और संस्कृति के जलस्त्रोतों के किनारे होने की वजह पानी का बहुपोग होना ही तो है। हम भी जितना बहुपयोगी, बहुगुणी और बहुआयामी होगें, उतना ही विस्तार और महत्व पाएँगे।
...पानी जहाँ जाता है, जिसमें मिलता, वैसा हो जाता है।
...पानी का एक गुण और है। यह राह बनाना जानता है। पत्थरों में रूकता नहीं, अवरोधों से सिमटता नहीं। दबकर, पलटकर, कुछ देर ठहरकर यह अपनी राह खोज लेता है। और यही पगडंडी धीरे-धीरे दरिया का रास्ता बनती है। देख लीजिए जिन्होंने अपनी पगडंडी चुनी, जो पानी की तरह तरल,सहज और विलायक हुए वही समाज के पथप्रदर्शक भी बने। उन्हें ही सुकून भी मिला।
हम हर बार कहते हैं, पढ़ते हैं- पानी गए न ऊबरे। लेकिन हर बार जब आकलन करते हैं तो पाते हैं कि पानी के बारे में जितना भी जाना, न जाना कुछ भी। और जिसने पानी को जान लिया वह पानी-पानी हो गया। जिसमें पानी को समझ लिया वह पानीदार हो गया।
मीरा बाई ने बरसों पहले एक भजन में कुछ सवाल पूछे थे। उनका पहला प्रश्न था- जल से पतला कौन है? सभी जानते हैं कि जल से पतला ज्ञान बताया गया था। बात इतनी सी है कि जल की इस तरलता को समझने में हमने बरसों लगा दिए, फिर भी अज्ञानी ही रहे।
वेद जल को विष्णु का पर्याय कहते हैं। हो भी क्यों न, विष्णु सृष्टा हैं और जल जीवन का आधार। विज्ञान कहता है कि साधारण माना जाने वाला पानी उत्तम विलायक भी है। हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक परमाणु से बने पानी की विशेषता है कि इसका ठोस रूप (बर्फ) द्रव रूप से हलका होता है। पानी का कमजोर ही सही लेकिन विशेष हाइड्रोजन बंध इसे कई गुण देता है। पानी के इस विज्ञान में भी कितना बड़ा अध्यात्म छुपा है। जीवन में देखें तो पानी जोड़ने का काम ही करता है। जन्म, विवाह और मृत्यु सहित तमाम संस्कारों के आवश्यक तत्व पानी को महाकवि तुलसीदास जी ने उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने के लिए उपयोग किया था। उन्होंने रामेश्वर में शिवलिंग की स्थापना के बाद श्री राम के मुख से कहलवाया कि जो गंगोत्री से गंगाजल ला कर यहाँ अभिषेक करेगा वह मुक्ति पाएगा। पानी देश के दो छोर को जोड़ने का ही नहीं बल्कि अंचलों को जोड़ने का माध्यम भी बना। जगह-जगह निकलने वाली कावड़ यात्राएँ, नर्मदा यात्राएँ और नदी में नहाने का महत्व धार्मिक कम पानी के प्रति आदरांजलि ज्यादा है। इस्लाम में भी पानी की अहम भागीदारी है। इस्लाम का मूल नमाज है और नमाज का मूल वजू है। बिना वजूके नमाज नहीं हो सकती और बिना पानी के वजू नामुमकिन है। यहाँ भी पानी के संरक्षण की बात कही गई है। माना जाता है कि कयामत के दिन जिसे नेकी के साथ रखा जाएगा वह वजू का पानी है। यानि ज्यादा से ज्यादा नमाज हो। और वजू में एक भी बूँद पानी की बर्बादी की तो आखिर में उसका हिसाब देना होगा। आज पानी जब कम हो रहा है तो उत्तर-दक्षिण ही नहीं, अड़ोस-पड़ोस के विवाद का कारण बन रहा है।
...बर्फ के हल्के होने का भी अपना संदेश हैं। आप चाहे जितना कठोर हो जाएँ, यह आपका हलकापन (उथलापन) ही होगा। आप तरल हैं तो सहज हैं। तभी वस्तुत: भारी भी हैं।
...सभ्यताओं और संस्कृति के जलस्त्रोतों के किनारे होने की वजह पानी का बहुपोग होना ही तो है। हम भी जितना बहुपयोगी, बहुगुणी और बहुआयामी होगें, उतना ही विस्तार और महत्व पाएँगे।
...पानी जहाँ जाता है, जिसमें मिलता, वैसा हो जाता है।
...पानी का एक गुण और है। यह राह बनाना जानता है। पत्थरों में रूकता नहीं, अवरोधों से सिमटता नहीं। दबकर, पलटकर, कुछ देर ठहरकर यह अपनी राह खोज लेता है। और यही पगडंडी धीरे-धीरे दरिया का रास्ता बनती है। देख लीजिए जिन्होंने अपनी पगडंडी चुनी, जो पानी की तरह तरल,सहज और विलायक हुए वही समाज के पथप्रदर्शक भी बने। उन्हें ही सुकून भी मिला।
हम हर बार कहते हैं, पढ़ते हैं- पानी गए न ऊबरे। लेकिन हर बार जब आकलन करते हैं तो पाते हैं कि पानी के बारे में जितना भी जाना, न जाना कुछ भी। और जिसने पानी को जान लिया वह पानी-पानी हो गया। जिसमें पानी को समझ लिया वह पानीदार हो गया।
Sunday, May 16, 2010
आपके पड़ोस में भी है एक 'आनंदी"
अबके जन्म मुझे बिटिया न कीजो"। खेलने-पढ़ने की उम्र में बहू बना दी गई बच्चियाँ कुछ इसी अंदाज में अपनी किस्मत को कोसती हैं। वे बहती आँखों से उन्हीं माँ-बापू पर गुस्से का इजहार करती हैं जिन्होंने उसे कच्ची उम्र में जिम्मेदारियों के दलदल में धकेल दिया। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी झुग्गी बस्तियों में बाल विवाह होते हैं। केवल विवाह ही नहीं होते कम उम्र में माँ बनने के कारण बच्चियाँ मौत के मुँह में समा रही है। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास विभाग ने 2005 में तय किया था कि 2010 तक बाल विवाह प्रथा को खत्म कर देंगे। यह संभव नहीं हुआ।
धारावाहिक 'बालिका वधू" में बाल विवाहिता आनंदी की तकलीफें देख भले ही दर्शकों की आँखें भर आती है लेकिन असल जीवन में बाल विवाह रोकने के लिए विरोध् का स्वर तेज नहीं होता। हकीकत यह है बाल विवाह के मामले में प्रदेश चौथे नंबर पर है। बड़वानी, शाजापुर, राजगढ़ और श्योपुर में आधी महिलाओं की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हुआ है। आपके आस-पड़ोस में भी आनंदी की तरह बालिका वधू है जो बालपन में बड़े सदमें झेल रही है।
अगर आप यह सोचते हैं कि धारावाहिक में दिखाए जाने वाले बाल विवाह और बालिका वधुओं की पीड़ा गुजरे जमाने की बात हो गई तो आप गलत है। असल में हमारे प्रदेश सहित देशभर के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बालिका विवाह बदस्तूर जारी है। बाल विवाह की पैठ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केरल जैसे साक्षर प्रांत में भी 15.4 बालिकाओं का विवाह 18 वर्ष से कम उम्र में हुआ है। इसका अर्थ यह है कि बाल विवाह रोकने में शिक्षा से ज्यादा जरूरी समझ और जागरूकता बढ़ना है। सरकारी आँकड़े बताते हैंै कि देश में 47.7 फीसदी महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की उम्र से पहले हो गया। इस मामले में मध्यप्रदेश चौथे स्थान पर है। यहाँ बाल विवाह का प्रतिशत 57.3 है। बिहार (69%) अव्वल है। फिर राजस्थान (65.2%) तथा झारखंड (63.2%) का नंबर आता है।
क्यों करें विरोध
बाल विवाह का विरोध करने का सबसे बड़ा कारण बालिकाओं का स्वास्थ्य है। यह तर्क बेमानी है कि शादी भले ही जल्दी कर दी जाए गोना तो बाद में होता है। इस तर्क को खारिज करने में एक बार फिर आँकड़े ही सहारा बनते हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार देश में 15 से 19 वर्ष की 16 फीसदी युवतियाँ या तो माँ बन चुकी थी या पहली बार गर्भवती थी। कम उम्र में गर्भध्ाारण के कारण गर्भपात, कम वजन के बच्चे का जन्म, बच्चों और माँ में कुपोषण, रक्त की कमी, और माँ की मृत्यु तक हो सकती है। अध्ययनों में सिद्ध हो चुका है कि 15 वर्ष में माँ बनने पर मातृ मृत्यु की संभावना 20 वर्ष की उम्र में माँ बनने से पाँच गुना ज्यादा होती है।
धारावाहिक 'बालिका वधू" में बाल विवाहिता आनंदी की तकलीफें देख भले ही दर्शकों की आँखें भर आती है लेकिन असल जीवन में बाल विवाह रोकने के लिए विरोध् का स्वर तेज नहीं होता। हकीकत यह है बाल विवाह के मामले में प्रदेश चौथे नंबर पर है। बड़वानी, शाजापुर, राजगढ़ और श्योपुर में आधी महिलाओं की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हुआ है। आपके आस-पड़ोस में भी आनंदी की तरह बालिका वधू है जो बालपन में बड़े सदमें झेल रही है।
अगर आप यह सोचते हैं कि धारावाहिक में दिखाए जाने वाले बाल विवाह और बालिका वधुओं की पीड़ा गुजरे जमाने की बात हो गई तो आप गलत है। असल में हमारे प्रदेश सहित देशभर के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बालिका विवाह बदस्तूर जारी है। बाल विवाह की पैठ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केरल जैसे साक्षर प्रांत में भी 15.4 बालिकाओं का विवाह 18 वर्ष से कम उम्र में हुआ है। इसका अर्थ यह है कि बाल विवाह रोकने में शिक्षा से ज्यादा जरूरी समझ और जागरूकता बढ़ना है। सरकारी आँकड़े बताते हैंै कि देश में 47.7 फीसदी महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की उम्र से पहले हो गया। इस मामले में मध्यप्रदेश चौथे स्थान पर है। यहाँ बाल विवाह का प्रतिशत 57.3 है। बिहार (69%) अव्वल है। फिर राजस्थान (65.2%) तथा झारखंड (63.2%) का नंबर आता है।
क्यों करें विरोध
बाल विवाह का विरोध करने का सबसे बड़ा कारण बालिकाओं का स्वास्थ्य है। यह तर्क बेमानी है कि शादी भले ही जल्दी कर दी जाए गोना तो बाद में होता है। इस तर्क को खारिज करने में एक बार फिर आँकड़े ही सहारा बनते हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार देश में 15 से 19 वर्ष की 16 फीसदी युवतियाँ या तो माँ बन चुकी थी या पहली बार गर्भवती थी। कम उम्र में गर्भध्ाारण के कारण गर्भपात, कम वजन के बच्चे का जन्म, बच्चों और माँ में कुपोषण, रक्त की कमी, और माँ की मृत्यु तक हो सकती है। अध्ययनों में सिद्ध हो चुका है कि 15 वर्ष में माँ बनने पर मातृ मृत्यु की संभावना 20 वर्ष की उम्र में माँ बनने से पाँच गुना ज्यादा होती है।
Tuesday, May 11, 2010
पानी गए न ऊबरे//
तालाब के कई रंग
तालाब या झील के मायने क्या हैं? मिट्टी की दीवारों के बीच सहेजा गया पानी। कहीं प्राकृतिक संरचना तो कहीं इंसानी जुनून का परिणाम। यही तालाब, पोखर, झील आज सूख रहे हैं... देखभाल के अभाव में रीत रहे हैं और कहीं मैदान, कहीं कूड़ागाह के रूप में तब्दील हो रहे है। कितना दुखद पहलू है कि जिन झीलों में जहाज चला करते थे... जिनको नाप लेने के लिए भुजाएँ आजमाईश किया करती थीं...जो प्यास बुझाते थे...जो मवेशियों का आसरा बनते थे...जो पर्यटकों को लुभाते थे...हम जिनमें ाान कर पुण्य कमाते थे, वे ही सरोवर आज सूख रहे है।
कितनी बड़ी विडंबना है कि जिनका निर्माण ही हदों में हुआ उनकी ही सारी हदें मिटाई जा रही हैं! इंसान अपनी हदों को तोड़ रहा है।
पहले किसी गाँव-कस्बे में प्रवेश करते थे तो सीमाओं के पास नदी या तालाब नजर आते थे। गाँवों की जीवनरेखा थे ये तालाब। भोपाल-उदयपुर जैसे शहरों के लिए तो तालाब का होना पर्यटन उद्योग का पर्याय है। पुष्कर का सरोवर पुण्य कमाने वालों का तीर्थ है और डल झील ख्वाबों का सैरगाह। ये विरासतें सिमटने लगी हंै। हर साल यह सच और ज्यादा कड़वाहट के साथ पेश आता है।
अब किसी भी शहर में प्रवेश करें, सबसे पहले दिखाई देता है पन्निायों से अटा पड़ा कचरे का ढ़ेर और तंगहाल झुग्गियाँ। तालाब जो गाँवों में शीतलता बाँटते थे, गाँव का आईना थे। कूड़े के ढ़ेर और झुग्गियाँ जो समस्याएँ है, शहर का यथार्थ हैं। और करीब से देखें तो पाएँगे कि बदली हुई परिस्थितियाँ हमारे जीवन से गायब होती तरलता और पोलीथिन की तरह न मिटने वाले तनाव का द्योतक हंै। तालाब सूख रहे हैं तो हमारी पहचान मिट रही है। तालाब किनारे साँस लेने वाला जीवन मिट रहा है। पनघट किनारे की खट्टी-मीठी बातें मिट रही है और परम्पराओं और आस्थाओं का संसार सिमट रहा है। जरा अपने बचपन को टटोलिए तो...या अपने बुजुर्गों से दो पल बतियाइए, तालाब से जुड़ी यादों का पूरा अलबम जीवंत हो उठेगा।
तालाब के भी अपने कई रंग हैं। गाँव में यह परिवार के बुजुर्ग सा कई समस्याओं का समाधान बनता है तो शहरों में कई चेहरों वाला किरदार बन जाता है। जो लोग शहर में अकेले हैं, उनके लिए कचोटती साँझ बिताने का उपक्रम हैं तालाब। प्रेमी जोड़ों के लिए ख्वाब बुनने का स्थल है तालाब। गरीबों के लिए पेट भरने जितनी कमाई का जरिया है तालाब। कवियों के लिए सुकुमार कल्पना तो साहसिक खेलों के शौकिनों के लिए अपनी बाहों की ताकत तौलने का पैमाना है तालाब।
किसी झील किनारे बिताई साँझ याद तो कीजिए। यह जानकर तकलीफ होगी कि तालाबों की हदें सिमट रही हैं। पानी की परम्परा सूख रही है।
तालाब या झील के मायने क्या हैं? मिट्टी की दीवारों के बीच सहेजा गया पानी। कहीं प्राकृतिक संरचना तो कहीं इंसानी जुनून का परिणाम। यही तालाब, पोखर, झील आज सूख रहे हैं... देखभाल के अभाव में रीत रहे हैं और कहीं मैदान, कहीं कूड़ागाह के रूप में तब्दील हो रहे है। कितना दुखद पहलू है कि जिन झीलों में जहाज चला करते थे... जिनको नाप लेने के लिए भुजाएँ आजमाईश किया करती थीं...जो प्यास बुझाते थे...जो मवेशियों का आसरा बनते थे...जो पर्यटकों को लुभाते थे...हम जिनमें ाान कर पुण्य कमाते थे, वे ही सरोवर आज सूख रहे है।
कितनी बड़ी विडंबना है कि जिनका निर्माण ही हदों में हुआ उनकी ही सारी हदें मिटाई जा रही हैं! इंसान अपनी हदों को तोड़ रहा है।
पहले किसी गाँव-कस्बे में प्रवेश करते थे तो सीमाओं के पास नदी या तालाब नजर आते थे। गाँवों की जीवनरेखा थे ये तालाब। भोपाल-उदयपुर जैसे शहरों के लिए तो तालाब का होना पर्यटन उद्योग का पर्याय है। पुष्कर का सरोवर पुण्य कमाने वालों का तीर्थ है और डल झील ख्वाबों का सैरगाह। ये विरासतें सिमटने लगी हंै। हर साल यह सच और ज्यादा कड़वाहट के साथ पेश आता है।
अब किसी भी शहर में प्रवेश करें, सबसे पहले दिखाई देता है पन्निायों से अटा पड़ा कचरे का ढ़ेर और तंगहाल झुग्गियाँ। तालाब जो गाँवों में शीतलता बाँटते थे, गाँव का आईना थे। कूड़े के ढ़ेर और झुग्गियाँ जो समस्याएँ है, शहर का यथार्थ हैं। और करीब से देखें तो पाएँगे कि बदली हुई परिस्थितियाँ हमारे जीवन से गायब होती तरलता और पोलीथिन की तरह न मिटने वाले तनाव का द्योतक हंै। तालाब सूख रहे हैं तो हमारी पहचान मिट रही है। तालाब किनारे साँस लेने वाला जीवन मिट रहा है। पनघट किनारे की खट्टी-मीठी बातें मिट रही है और परम्पराओं और आस्थाओं का संसार सिमट रहा है। जरा अपने बचपन को टटोलिए तो...या अपने बुजुर्गों से दो पल बतियाइए, तालाब से जुड़ी यादों का पूरा अलबम जीवंत हो उठेगा।
तालाब के भी अपने कई रंग हैं। गाँव में यह परिवार के बुजुर्ग सा कई समस्याओं का समाधान बनता है तो शहरों में कई चेहरों वाला किरदार बन जाता है। जो लोग शहर में अकेले हैं, उनके लिए कचोटती साँझ बिताने का उपक्रम हैं तालाब। प्रेमी जोड़ों के लिए ख्वाब बुनने का स्थल है तालाब। गरीबों के लिए पेट भरने जितनी कमाई का जरिया है तालाब। कवियों के लिए सुकुमार कल्पना तो साहसिक खेलों के शौकिनों के लिए अपनी बाहों की ताकत तौलने का पैमाना है तालाब।
किसी झील किनारे बिताई साँझ याद तो कीजिए। यह जानकर तकलीफ होगी कि तालाबों की हदें सिमट रही हैं। पानी की परम्परा सूख रही है।
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