Tuesday, July 20, 2010

भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल में होगा ट्रस्टियों का मुफ्त इलाज

जाते-जाते खुद का भला कर गया ट्रस्ट
सीएस और पीएस के विरोध को किया दरकिनार


भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट जाते-जाते भी खुद का भला कर गया। अस्पताल में ट्रस्ट के सदस्यों का उपचार बिल्कुल निशुल्क होगा। इलाज का सारा खर्च गैस पीड़ितों के उपचार के मिली राशि से किया जाएगा। ट्रस्ट ने यह स्वात: सुखाय फैसला पिछले दिनों हुई बैठक में ले लिया। जबकि प्रदेश के मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव ने इस प्रस्ताव को कड़ा विरोध करते हुए इसे फिजूलखर्ची करार दिया था।

'द भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल ट्रस्ट" ने यह फैसला मार्च में उस वक्त लिया था, जब गैस त्रासदी के दोषियों के मामले की सुनवाई अंतिम चरण में थी। भोपाल गैसकांड के आरोपियों पर से धारा 304 'ए" हटाने के लिए गैस पीड़ितों की नाराजगी झेल रहे सुप्रीम कोर्ट के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एएम अहमदी की अध्यक्षता में यह निर्णय लिया गया। हाँलाकि इस पद से इस्तीफे की उनकी पेशकश को लगभग नौ माह बीत चुके थे। ट्रस्ट की अंतिम बैठक नई दिल्ली में हुई थी। इस बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि ट्रस्टियों को भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल में मुफ्त इलाज की सुविधा प्रदान की जाए। इस इलाज का सारा खर्च गैस पीड़ितों के इलाज के लिए मिली राशि से दिया जाएगा। बैठक में मुख्य सचिव अवनि वैश्य और प्रमुख सचिव स्वास्थ्य एसआर मोहंती शामिल नहीं हुए थे। जब बैठक का पत्र उनके पास अनुमोदन के लिए पहुँचा तो दोनों ने यह कहते हुए प्रस्ताव का विरोध किया कि यह गैस पीड़ितों के पैसों की बर्बादी है। ट्रस्ट सदस्य अपने इलाज का खर्च खुद उठाने में सक्षम हैं। इन आला अफसरों के विरोध के बावजूद यह प्रस्ताव बहुमत के आध्ाार पर पारित कर दिया गया। इस बारे में जब ट्रस्टी सुश्री के. अरोन्देकर से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे इस बैठक में शामिल ही नहीं हुई थी, जबकि वर्किंग ट्रस्टी अधिवक्ता अजीज अहमद सिद्दीकी के नईदिल्ली में होने से उनसे सम्पर्क नहीं हो सका।

ट्रस्ट के फैसलों की समीक्षा हो

ट्रस्ट के इस फैसले से भी गैस पीड़ित संगठनों में नाराजी है। भोपाल ग्रुप फॉर इंफर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा और गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति की साधना कर्णिक ने माँग की है कि नए निजाम में ट्रस्ट द्वारा लिए गए निर्णयों की पुर्नसमीक्षा होना चाहिए। उनका आरोप है कि पिछले कई दिनों से भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल में गैस पीड़ितों के इलाज में लापरवाही हो रही है। बाहरी मरीजों को तवज्जो दी जा रही है, क्योंकि उससे ट्रस्ट को पैसा मिलता है। जबकि इस अस्पताल का निर्माण केवल गैस पीडितों के इलाज के लिए ही कराया गया था।

दस साल पहले शुरु हुआ था अस्पताल

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन ने लंदन में 20 मार्च 1992 को 'द भोपाल हॉस्पिटल ट्रस्ट" की स्थापना की। इस चैरिटेबल ट्रस्ट के एकमात्र ट्रस्टी सर इयान पर्सीवल थे। मप्र सरकार ने अस्पताल निर्माण के लिए ट्रस्ट को लगभग 80 एकड़ जमीन मुफ्त प्रदान की। सर पर्सीवल की मृत्यु के बाद 1998 में 'द भोपाल मेमोरियरल हॉस्पिटल ट्रस्ट" की स्थापना की गई। ट्रस्ट ने छह अस्पताल सहित कम से कम 32 स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए थे। इस अस्पताल का संचालन जुलाई 2000 से शुरू हो गया था।

कौन हैं ट्रस्टी

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एएम अहमदी ट्रस्ट के अध्यक्ष बनाए गए। पूर्व राज्यपाल मोहम्मद शफी कुरैशी को उपाध्यक्ष बनाया गया। ट्रस्ट में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा की पत्नी श्रीमती विमला शर्मा, लंदन के बैरिस्टर राबर्ट पर्सीवल, केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव, डीजी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, निदेशक पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च चंडीगढ़ प्रो. केके तलवार, मुख्य सचिव मप्र, आईडीबीआई के पूर्व अध्यक्ष एसएच खान शामिल किए गए। भोपाल के अधिवक्ता अजीज अहमद सिद्दीकी को वर्किंग ट्रस्टी बनाया गया। वर्किंग कमेटी में प्रमुख सचिव स्वास्थ्य मप्र , केन्द्रीय रसायन और पेट्रोकेमिकल्स विभाग के संयुक्त सचिव, डॉ संतोख सिंह पूर्व डीएमई मप्र, जीबी पंत अस्पताल नईदिल्ली के पूर्व निदेशक डॉ. एम खलीलुल्ला, भोपाल के चार्टर्ड अकाउंटेंट एसएल छाजेड़ और महिला चेतना मंच की उपाध्यक्ष सुश्री के. अरोन्देकर को शामिल किया गया।

Sunday, July 11, 2010

मप्र व केन्द्र में टकराव के बीज

बीज के दाम भी तय करेगा बाजार



पेट्रोलियम पदार्थों के दाम नियंत्रण का अधिकार बाजार को दे चुकी केन्द्र सरकार की योजना है कि वह शकर के दाम बढ़ाने की ताकत भी बाजार को दे दे। इसकी मार आम आदमी पर पड़ेगी, लेकिन इससे एक कदम और आगे जाते हुए केन्द्र सरकार चाहती है कि बीजों के दामों पर भी बाजार का नियंत्रंण हो। वह बीज-2010 विधेयक पास करवाकर बीजों को पेट्रोलियम पदार्थों की तरह नियंत्रण से मुक्त करना चाहती है। दूसरी तरफ राज्य सरकारों का मानना है कि बीजों के दामों को बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसका सीधा सम्बन्ध किसानों के हितों से जुड़ा है। इन राज्य सरकारों में मप्र सरकार भी है। वह खुद बीज कीमतों को काबू करने वाला विधेयक लाने जा रही है। आंध्र प्रदेश सरकार इस तरह का बिल पहले ही पास कर चुकी है।

उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा बीज एक्ट 1966 में संशोधन के लिए बीज विधेयक -2004 लाया गया था। यह तीन बार संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन तीनों बार इसे पारित नहीं कराया जा सका। इस बार भी केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने विधेयक को स्वीकृति दे दी है और सरकार कोशिश है कि मानसून सत्र में ही बीज विधेयक 2010 पारित हो जाए। लेकिन सचाई यह है कि तमाम सामाजिक संगठन, प्रबुद्ध नागरिक और किसान संगठन इस विधेयक को किसान विरोधी और बीज कंपनियों के हित में बता रहे हैं। किसान संगठन बीजों के दामों पर नियंत्रण की पैरवी कर रहे हैं, लेकिन केन्द्र सरकार विधेयक में संशोधन पर राजी नहीं है।

मप्र सरकार ने भी इस विधेयक की एक खामी गिनाते हुए इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। हाल में मप्र कैबिनेट ने सामाजिक और किसान संगठनों की बात से सहमति जताते हुए राज्य में कपास के बीजों के मूल्य पर नियंत्रण के लिए विधेयक लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। विशेषज्ञों के अनुसार यह 7 वीं अनुसूची का मसला है। इस विषय पर दोनों सरकारें बिल ला सकती हैं, लेकिन जब किसी बिंदु केन्द्र और राज्य सरकार के नियमों में टकराव हो तो केन्द्र सरकार की बात मानी जाएगी। हाँलाकि ऐसा हुआ तो बीजों के दाम नियंत्रण के मामले में केन्द्र के बिल को महत्व मिलेगा।

मुआवजे के उपबंध भी जोड़ें

राज्य सरकार और सामाजिक संगठनों का कहना है कि केन्द्र सरकार बीज अध्ािनियम 2010 में बीज कंपनियों की जवाबदेही भी तय करें। वह मूल्य नियंत्रण और घटिया बीज से हानि पर किसानों को पर्याप्त मुआवजे का उपबंध भी जोड़े। गौरतलब है कि केन्द्र सरकार ने 10 जून को बिनौले के उत्पादन और वितरण का नियमन और छह महीने करने का फैसला किया है । संसद में बीज विधेयक पारित होने के बाद बिनौले का नियंत्रण विधेयक के प्रावधानों के तहत होगा और उसके बाद आवश्यक वस्तु कानून के तहत बिनौले को लेकर जारी अधिसूचना वापस ले ली जाएगी ।

बीज कमेटी ने की सिफारिशें

28 नवंबर 2006 को प्रोफेसर राम गोपाल यादव की अध्यक्षता में गठित कृषि पर स्टैंडिंग कमेटी ने अपने सुझाव में बीज विधेयक में अनेक संशोधन किए जाने की सिफारिश की है। कमेटी ने कहा कि किसानों द्वारा उपयोग किए जाने व बेचे जाने वाले बीजों का पंजीकृत बीज संबंधी न्यूनतम मानकों के अनुरूप होना किसानों के अधिकार में बाधा है। इसलिए कमेटी इस प्रावधान को रद्द करने की सिफारिश करती है। किसान की परिभाषा को और व्यापक करते हुए इसमें उन्हें भी शामिल किया जाए जो पारंपरिक बीजों का संरक्षण कर रहे हैं। बीज विधेयक में किसानों को बीज उगाने और उनके लेन-देन की अनुमति होनी चाहिए। विधेयक में मूल्य नियामक का प्रावधान होना चाहिए, जिससे कि किसानों से बीज उत्पादक/सप्लायर मनमाफिक दाम नहीं वसूल सकें।




' बीज विधेयक 2010 किसान विरोधी  है। मप्र सरकार बीजों के मूल्य पर सरकारी नियंत्रण के पक्ष में है। हम केन्द्र सरकार से माँग कर रहे हैं कि वह विधेयक में बदलाव करे।"

डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया, कृषिमंत्री, मप्र शासन



' बीजों के दाम के नियंत्रण का मामला 7 वीं अनुसूची से जुड़ा है। इसके तहत केन्द्र और राज्य सरकार अपने नियम बना सकती है लेकिन विवाद के बिंदु पर केन्द्र के विधेयक की बात ही मानी जाएगी।"

विश्वेन्द्र मेहता, संविधान विशेषज्ञ और पूर्व सचिव मप्र विस



' जब प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटी एंड फार्मर्स राइट एक्ट (पीपीवीएफआर) मौजूद है, तो बीज अधिनियम लाने की जरूरत ही नहीं है। दरअसल 90 फीसदी किसान अपने बीज ही उपयोग में लाते हैं। किसान अधिक बीज खरीदें और कंपनियों को फायदा हो, इसलिए सरकार बीज विधेयक पारित करने की कोशिश में है। बीज विधेयक 2010 में दो महत्वपूर्ण बदलाव की जरूरत है। पहला तो यह कि बीज मूल्यों का नियमन जरूर हो। साथ ही नियमों के उल्लघंन पर कड़े दंड का प्रावधान हो।"

डॉ. देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ

Saturday, June 26, 2010

बेटा नहीं मौत लेने आई

बेटे के छल का सदमा झेल नहीं पाए 72 वर्षीय बुजुर्ग

भोपाल में 20 जून को फादर्स डे पर पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जा रही थी, आनंदधाम वृद्धाश्रम में मायूसी छाई थी। मायूसी की वजह बुजुर्गों के प्रति बेटों का अनादर नहीं बल्कि बीते पखवाड़े हुई एक बुजुर्ग की मौत है। दस साल से वृद्धाश्रम में रह रहे 72 वर्षीय दाते साहब को लेने बेटे को आना था लेकिन बेटे ने आने से इंकार किया तो वे सदमे में मौत के साथ चले गए।



पिता यानि जीवन का सहारा और बेटा बुढ़ापे का भरोसा। यह धारणा आधुनिक जीवन में बार-बार टूट रही है। इस बार इस धारणा के टूटने का गवाह बना आनंदधाम वृद्धाश्रम। फादर्स-डे के दिन आमतौर पर यहाँ के सहायक और संचालक बुजुर्गों को अकेलापन महसूस नहीं होने देते। इस दिन को खास बनाने के लिए कुछ विशेष रचा जाता है, लेकिन इस बार यहाँ विशेष में भी जोश और उत्साह नहीं था। चाह कर भी बुजुर्ग अपने साथी दाते साहब को नहीं भुला पा रहे थे, वहीं दाते साहब जो अपने बेटे द्वारा छले गए थे। यहाँ की देखरेख करने वाली माधुरी मिश्रा बताती हैं कि दाते साहब करीब दस साल से यहाँ रह रहे थे। पिछले महीने उनकी बेटी ने पटना में रहने वाले अपने भाई पर दबाव बनाया कि वह पिता को अपने साथ ले जाए। बहन के दबाव और जिद ने भाई को झुकने पर मजबूर कर दिया। पिता को भी बेटी ने ही जाने के लिए तैयार किया। आखिर बेटे ने दाते साहब को ले जाने के लिए सहमति दे दी। दाते साहब ने खुशी-खुशी बेटे के पास जाने की तैयारी की थी। वृद्धाश्रम में उनके जाने का गम तो था लेकिन खुशी थी कि वे दस सालों बाद अपने परिवार के पास जा रहे थे। तय कार्यक्रम के अनुसार पिछले हफ्ते उनके जाने का दिन आ गया। सारी तैयारी हो चुकी थी, सामान पैक था। काफी इंतजार के बाद बेटा नहीं आया तो पड़ताल की गई। सुश्री मिश्रा ने बताया कि बेटे ने आने में असमर्थता जता दी। बेटे का यह विश्वासघात दाते साहब झेल नहीं पाए। उन्हें इतनी निराशा हुई कि वे खामोश हो गए। इस गहरे सदमे में उन्हें हार्ट अटैक हुआ और वे दुनिया से कूच कर गए।

बेटे के छल से उनके साथी नाराज हैं। वे कहते हैं कि जब नहीं ले जाना था तो वादा क्यों किया? दस सालों से वृद्धाश्रम में रह रहे थे। उनके इस परिवार को अभी उनकी और जरूरत थी।

Tuesday, June 15, 2010

हार गई हरियाली

भोपाल के नाम बरगद की चिठ्ठी


' आज जो मैं एक ठूँठ दिखाई दे रहा हूँ, पिछले साल तक मैं भी हरा-भरा पेड़ था। मेरी पहचान सूखा तना नहीं, जमीन को छूती डालियाँ और घनी छाँव देता विस्तार था। तब सभी मुझे बरगद कहते थे। आज मैं अपना यह परिचय देने में शरमा जाता हूँ। कहाँ भरा-पूरा विस्तार और कहाँ यह सूखे ठूँठ? मुझे बरगद से ठूँठ बना देने के दोषी आप हैं। आप ही ने साल भर पहले मेरी जमीन और मेरा आसमान छीन लिया था। मुझे एक अनजान जगह ला कर रोप दिया, यहाँ न मुझे वैसा खाद-पानी मिला और न परवरिश। आपने मुझे कटने से बचाया लेकिन यहाँ किश्तों में मरने के लिए छोड़ दिया। पहले मेरे पत्ते गए, फिर शाखाएँ काट दी गई। अब तने के अलावा कुछ भी नहीं बचा। मैं हीं नहीं उजड़ा, मेरी गोद में समाया पक्षियों का पूरा संसार उजड़ गया। मेरे जैसे कई वृक्षों के साथ हरियाली हार गई और हार गई आपकी साँसें।'




प्रिय भोपालवासियो,


आप खुश हैं कि मिसरोद से बैरागढ़ तक सिक्स लेन सड़क बन रही है। आपको चौड़ी सड़क मिलेगी तो आवाजाही में कठिनाई नहीं होगी। जाम से मुक्ति मिलेगी। सोचता हूँ इसी लालच में आपने मुझ जैसे हरे पड़ों को काटा जाना मंजूर किया होगा। लेकिन क्या आपने सोचा है कि इतने पेड़ों के कटने से आपकी साँसें जाम हो सकती है, जब भविष्य में ऑक्सीजन नहीं मिलेगी? ऐसी ही चिंता के चलते मुझ जैसे करीब 80 पेड़ों का ठिकाना बदला गया। मुझे पता चला कि आप जैसे कई पर्यावरण प्रेमी उस दिन बड़े प्रसन्ना हुए थे, जब 50 साल पुराने वृक्षों की जगह बदल कर उन्हें नए ठिकाने दिए गए थे। उम्मीद थी कि नई जगह में भी हम खूब हरियाएँगे, लहलहाएँगे, छाँव और फल देंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।


आप जानते हैं, नगर निगम ने मिसरोद से बैरागढ़ तक बनने वाले करीब 16.5 किलोमीटर लंबे सिक्स लेन रोड के बीच में आने वाले 2333 पेड़ों में से करीब 602 पेड़ों का ठिकाना बदलने की योजना बनाई थी। इनमें बरगद, पीपल, गूलर, आम, जामुन, शीशम, सप्तपर्णी, करंज, अर्जुन, गुलमोहर सभी शामिल हैं। पहले महीने मिसरोद क्षेत्र से करीब डेढ़ दर्जन पेड़ों को हटाया गया। 13 पेड़ मिसरोद श्मशान घाट में रोपे गए, जबकि 6 पेड़ सुरेन्द्र लैंडमार्क के पास स्थित नटबाबा मंदिर प्रांगण में पहुंचाए गए। कुछ पेड़ बावड़िया कला श्मशान घाट में लगाए गए थे। जब हमारा ठिकाना बदला जा रहा था, तब मेरी जड़ें काफी गहरी जमी थीं। मेरी हर डाल पत्तियों से लदी हुई थी। मेरे साथी गुलमोहर के फूल गर्मी में खिलखिलाते थे। हर डाल लाल-लाल फूलों से भर जाती थी। हमारी ही छांव में लोग सुस्ताते थे, सावन में हमारी ही डालियों पर झूले डाले जाते थे। इन्हीं शाखाओं पर किस्म-किस्म के पंछियों का बसेरा था। इन सबका न मैंने कभी किराया लिया और न कभी घोंसले हटा लेने का नोटिस दिया।


लेकिन एक दिन आपने ही मेरे तने को छील कर उस पर नंबर लिख दिया। तब मैंने किसी को यह कहते हुए सुना था कि मेरी जड़ों को हटाया जाने वाला है। मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा था। कभी सुना भी नहीं था कि बरगद को कोई डिगा भी सकता है। मुझसे तो बड़े व्यक्तित्व वाले इंसानों की तुलना होती है। फिर लगा, तरक्की पसंद इंसान ने कोई नई तकनीक ईजाद की होगी। सच बताऊँ तो उस दिन मेरी गोद में पलने वाले पंछियों ने खूब नाराजी जताई थी। कई ने तो खाना छोड़ चिल्ला-चिल्ला कर अपना गुस्सा दिखाया था, पर आपको वह सब सुनने की फुर्सत कहाँ थी?


मुझे पता चला कि इंदौर के पेड़ शिफ्टिंग विशेषज्ञ प्रेम जोशी हमारा ठिकाना बदलेंगे। उन्होंने कलकत्ता में 12 बीघा क्षेत्रफल में फैला बरगद का पेड़, शुक्रवासा (देवास) में 12 बीघा में फैले करीब तीन हजार साल पुराने बरगद के अलावा गुजरात और नेपाल में भी बरसों पुराने पेड़ों को दूसरी जगह ले जाकर लगाया था। दक्षिण भारत में इमली के पेड़ की अहमियत ज्यादा है, जिसके चलते वहां उन्होंने कई पेड़ शिफ्ट कराने में मदद की है।


इतना पता चलने के बाद हम भी खुश थे। सोचा था, नई जगह होगी तो क्या, परिंदें फिर आशियाना बना लेंगे। राहगीर छाँव तलाश लेंगे। मुझे श्मशान में लगाया जाना था। लगा था वहाँ पहुँचने वाले लोगों के दुख को पनाह दूँगा। लेकिन मेरी किस्मत कलकत्ता के बरगद जैसी नहीं निकली। साल भर बाद भी नई कोंपल फूटना तो दूर तने की छाल भी नहीं रही। यूँ लग रहा है जैसे पैरहन (कपड़े) के साथ मेरी आबरू जाती रही। अब बरगद के नाम पर दो सूखे तने बचे है। मैं ही क्यों आ कर देखो तो मेरे जैसे कई पेड़ तिल-तिल कर मर रहे हैं। पत्तियों और शाखाओं के साथ इनका पेड़ होने का सम्मान जाता रहा। श्मशान में मैं पनप नहीं पाया और अब तो लगता है मेरी शाखाएं पंछियों को घोसला बनाने या इंसानों को छांव देने के बजाय शायद किसी पार्थिव देह को भस्म करने के ही काम आ जाएगी।


फूटी कोंपलें
वो कहते हैं ना कि सभी की किस्मत एक जैसी नहीं होती। पेड़ों के साथ भी यही हुआ। बावड़ियाँ कला श्मशान घाट में लगाए पेड़ों में अंकुरण हो गया है। यह मरणासन्ना बुजुर्ग की साँसें फिर चलने जैसा है। यहाँ आ कर देखिये तो। सूखे तने में फूट रहे नए हरे पात कितने अच्छे लग रहे है। लेकिन इन पीपल और गुलमोहर के पेड़ों को अपने पुराने स्वरूप में आने में बरसों लगेंगे। तब तक शायद इन्हें यहाँ से भी हटाने की बारी आ जाए। हमारी इनके जैसी किस्मत कहाँ? हम बचे रह गए ठूँठ, हरे पत्तों को तरस रहे हैं।


शिफ्टिंग के हालात :


0 काम : मिसरोद से बैरागढ़ तक सिक्स लेन रोड
0 बाधा : 2333 पेड़
0 हटेंगे : 602 पेड़
0 कटेंगे : 1731 पेड़
0 अब तक हटे : करीब 80 पेड़
0 कितना खर्च : प्रति पेड़ ढाई से दस हजार स्र्पए तक
0 यह पेड़ हुए शिफ्ट : बरगद, पीपल, गूलर, आम, जामुन, शीशम, सप्तपर्णी, करंज, अर्जुन, गुलमोहर आदि।
0 यहां पहुंचाए : मिसरोद विश्राम घाट परिसर, नटबाबा मंदिर परिसर, बावड़िया कला श्मशान घाट, नूतन कालेज के सामने ग्रीन बेल्ट की जमीन, दुर्गा पेट्रोल पंप के सामने।