आज बरबस ही चाँद याद आ रहा है। शरद पूर्णिमा पर चाँद पूरे शबाब पर होता है, अपनी 64 कलाओं के साथ। यूँ देखें तो चाँद केवल एक उपग्रह हैं और भावनात्मक दृष्टिकोण कहता हैं कि चाँद हमारा 'मामा" है। बचपन में परिवार के बाहर अगर किसी से नाता जुड़ता है तो वो चन्दा मामा ही है और युवावस्था में जब किसी से दिल जुड़ता है तो वो भी चाँद ही नजर आता है। चाँद हमारी कल्पनाओं, साहित्य, फिल्मों, विज्ञान शोध् का विषय रहा है और अब तो यहाँ ख्वाब के आशियाने की जमीन है। शायद ही कोई होगा जिसे ये प्रेम में यह जमीन चाँद से बेहतर नजर न आई होगी और माशूक चाँद से खूबसूरत न दिखलाई दी होगी। किसी ने इसमें दाग देखे, किसी ने इसे रोटी माना, कोई इसे फतह करने निकला। शायद ही कोई साहित्यकार होगा जिसने चाँद को देख कर कोई रचना न की होगी या लिखने का ख्याल न किया होगा। साहित्य में चाँद कई बिम्ब और रूपों में मुखरित हुआ है। यह प्रेम, बिछोह, मिलन का प्रतीक ही नहीं बल्कि नौ रसों की अभिव्यक्ति का माध्यम बना है। भले ही चांद साहित्य का सबसे प्राचीन विषय हो लेकिन समकालीन कवियों ने नई कविता में भी चाँद पर खूब लिखा है। नई कविता में चांद को लेकर नए और ताजा बिम्ब गढ़े गए हैं।
अशोक वाजपेयी की एक कविता में चाँद अलग प्रतीक बन कर आया है-
'चांद के तीन टुकड़े हैं/
जिनमें से एक मेरे पास है/
मेरी आंखो में, मेरे दिल में/
और एक तुम्हारे पास है/
चांद का एक टुकड़ा और है/
जिसे मैं तुमसे बचाकर/
किन्हीं और आंखों में/
धीरे से खिसकाया करता हूं।"
जबकि उदयप्रकाश अपनी कविता 'चंद्रमा" में चांद को काव्यात्मक सबजेक्टिविटी के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों के जरिए देखा है। चाँद के लिए वे लिखते हैं-
'यह रोशनी भी उसकी नहीं सूर्य की है/
वह तो है पृथ्वी से छह गुना छोटा मिट्टी का एक अंधा ढेला/
चंद्रमा की मिट्टी में नहीं पैदा होता गेहूं/
चंद्रमा में नहीं रहते किसान वहां नदियां नहीं बहती/
वहां समुद्र का नदियों का ऋतुओं का प्रेम और वीर नायकों का कोई मिथक नहीं।"
युवा कवि पवन करण अपनी कविता में चांद को कुछ यूं बयां करते हैं-
''इस चांद के बारे में तुम कुछ भी नहीं जानते/
एक नंबर का धोखेबाज है/
ये एकदम बिगड़ा नवाब/इसकी संगत ठीक नहीं/
ये तुम्हें कहीं का भी नहीं छोड़ेगा/
कहीं भी फंसा देगा/
इसका काम ही आवारागर्दी करना है।"
चाँद के साथ मैं भी आवारगर्दी करने निकल आया था। यूँ ही साथ चलते-चलते।
Friday, November 19, 2010
Tuesday, November 9, 2010
कश्मीर के युवा बंदूक नहीं पढ़ना चाहते हैं
पत्रकार दिलीप पडगांवकर सहित उनके दो साथी वार्ताकार कश्मीर समस्या का स्थायी हल ढूंढ़ने कश्मीर गए थे। दल ने कहा कि उनका ध्यान युवाओं पर होगा, क्योंकि वे ही यहां की धारा को बदल सकते हैं। इसके पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उससे भी पहले प्रधानमंत्री रहते हुए अटलबिहारी वाजपेयी ने कश्मीर के युवाओं से शांति की अपील की थी। कश्मीरी युवकों की समस्या क्या है और वे इसका समाधान कहाँ खोजते हैं, इस पड़ताल के दौरान मैंने अपने साथी मोहम्मद फैजान खान के साथ भोपाल में पढ़ रहे कश्मीरी युवाओं से चर्चा की। कश्मीरी युवाओं की राय पूरे मसले को समझने के लिए अहम हैं। वे साफ कहते हैं कि हमारी पीड़ा कोई नहीं सुनता। हम पढ़ना चाहते हैं, नौकरी करना चाहते है। भारत से अलग होना नहीं बल्कि वे बेखौफ घूमने की आजादी चाहते हैं।
जमीन का स्वर्ग कश्मीर 15 जून से लेकर अब तक हड़ताल और कर्फ्यू भोग रहा है। इसबार आंदोलन में युवाओं की भागीदारी ज्यादा हो गई है। कश्मीर के युवाओं पर आरोप लगता है कि वे पाकिस्तान की शह पर आतंकवाद फैला रहे हैं। भोपाल में पढ़ने वाले कश्मीरी युवा इस आरोप से नाराज हैं। वे कहते हैं कि कश्मीर के युवा आतंकवादी होते तो उनके हाथों में पत्थर नहीं बंदूक-बम होते। कश्मीर का युवा पत्थर फैंक रहा है क्योंकि वह व्यवस्था से तंग आ गया है। इसी साल सबसे लंबे समय तक स्कूल-कॉलेज बंद रहे। पढ़ाई होती नहीं हैं, रोजगार कहाँ से मिलेगा? पर्यटन खत्म हो चुका है। रोजगार नहीं है, घर कैसे चलेंगे? इसमें में कोई भटकने से कैसे बचे?
कश्मीर के युवा पढ़ना चाहते हैं। लेकिन वहाँ कॉलेज कम हैं और विद्यार्थी ज्यादा। 20 सीटों के लिए 2 हजार आवेदन आते हैं। पढ़ाई के लिए बाहर जाओ तो अपने ही देश में सौतेला व्यवहार झेलना पड़ता है। भोपाल में पढ़ने आए तो यहाँ कश्मीरी कह कर संदेह से देखा जाता है। कई बार भाषाई समस्या हुई और किसी ने सहायता की तो उसे भी संदिग्ध् मान लिया जाता है। तकलीफ होती है जब हमें अपने ही प्रदेश में बार-बार पहचान बताना पड़ती है। एक चेकिंग पाइंट पर घंटों खड़े हो कर जाँच से गुजरना पड़ता है। हमें जलील किया जाता है।
पाकिस्तान है जिम्मेदार
कश्मीरी युवा घाटी की बदतर स्थिति के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि अगर पाकिस्तान ने चंद कश्मीरी नौजवानों को हथियार न थमाए होते तो कश्मीर में न तो इतनी बर्बादी होती और न ही उन्हें स्पेशल पावर एक्ट का सामना करना पड़ता।
अलगाववादियों से अलग है राय
नवदुनिया से बातचीत में कश्मीरी युवाओं ने कहा कि अलगाववादी भारत से आजादी चाहते हैं। जबकि कश्मीर का आम युवा ऐसा नहीं सोचता। उन्होंने कहा-'हमारी बात नहीं सुन जा रही। हम हिन्दुस्तान से आजादी नहीं चाहते बल्कि घाटी में बेखौफ घूमने फिरने की आजादी चाहते हैं।"
विशेष कानून समस्या
कश्मीरी युवा घाटी की सबसे बड़ी समस्या आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट को मानते हैं। उनका कहना है कि इस एक्ट का सबसे ज्यादा शिकार युवा ही हो रहे हैं। हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि घाटी से लागू आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट हटा लिया जाए।
'राहुल, हमारी भी तो सुनो"
युवाओं की तकलीफ यह है कि कोई उनकी सुन नहीं रहा है। वे कहते हैं कि राहुल गाँधी युवाओं से संवाद करने देशभर में घूम रहे हैं, लेकिन कश्मीर के युवाओं की नहीं सुन रहे। उन्हें कश्मीर के युवाओं से संवाद करना चाहिए। चाहे वे कश्मीर जाएँ या कश्मीर के युवाओं को अपने पास बुलवाएँ। बात सुनी जाएगी तो पीड़ा भी कम होगी।
*हमें भारत से आजादी नहीं चाहिए। लेकिन हमें वैसी ही आजादी चाहिए जो भारत के अन्य राज्यों के लोगों को मिली हुई है। हम जब घर से बाहर निकलते हैं तो कदम-कदम पर हमसे पहचान पत्र दिखाने को कहा जाता है। चेक पाइंट पर एक-एक घंटे खड़े होकर अपनी पहचान सिद्ध करना होती है।
आबिद हुसैन, शासकीय बेनजीर कालेज
*हम पर इल्जाम लगाया जाता है कि हम पाकिस्तान के साथ मिलना चाहते हैं। जबकि यह सरासर गलत है। कश्मीरी पाकिस्तान से नफरत करते हैं। पाकिस्तान ने आतंकवादियों को भेजकर कश्मीर को जहन्नुम बना दिया है। कश्मीर घाटी में शिक्षा के नाम पर केवल एक विश्वविद्यालय है जिसमें आम कोर्सेस में भी 20 सीटों के लिए 2 हजार लोगों के बीच काम्पटीशन होता है। केन्द्र सरकार कश्मीर के विकास के लिए जो पैसा भेजती है वह राज्य सरकार के मंत्री हड़प जाते हैं। भ्रष्टाचार के कारण भी कश्मीर के हालात खराब हैं।
बिलाल अहमद लोन, शासकीय हमीदिया कॉलेज
*न तो अलगाववादियों को कश्मीरी जनता की फिक्र है और न ही राज्य सरकार को उनका ख्याल है। आम कश्मीरी उस गुनाह की सजा भुगत रहा है जो उसने किया ही नहीं। अब जबकि घाटी से आतंकवाद समाप्त हो गया है,वहां से आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट जैसा काला कानून हटा लेना चाहिए।
अराफात अहमद बट्ट, हमीदिया कालेज
*अगर कश्मीरी युवा सेना पर पत्थर फैंक रहा है तो यह उनका फ्रस्ट्रेशन है। लेकिन इससे यह बात भी सिद्ध होती है कि वह आतंकवादी नहीं है। अगर वह आतंकवादी होते तो उनके हाथ में पत्थर नहीं एके 47 होती।
मुश्ताक अहमद, आईपीसी कालेज
जमीन का स्वर्ग कश्मीर 15 जून से लेकर अब तक हड़ताल और कर्फ्यू भोग रहा है। इसबार आंदोलन में युवाओं की भागीदारी ज्यादा हो गई है। कश्मीर के युवाओं पर आरोप लगता है कि वे पाकिस्तान की शह पर आतंकवाद फैला रहे हैं। भोपाल में पढ़ने वाले कश्मीरी युवा इस आरोप से नाराज हैं। वे कहते हैं कि कश्मीर के युवा आतंकवादी होते तो उनके हाथों में पत्थर नहीं बंदूक-बम होते। कश्मीर का युवा पत्थर फैंक रहा है क्योंकि वह व्यवस्था से तंग आ गया है। इसी साल सबसे लंबे समय तक स्कूल-कॉलेज बंद रहे। पढ़ाई होती नहीं हैं, रोजगार कहाँ से मिलेगा? पर्यटन खत्म हो चुका है। रोजगार नहीं है, घर कैसे चलेंगे? इसमें में कोई भटकने से कैसे बचे?
कश्मीर के युवा पढ़ना चाहते हैं। लेकिन वहाँ कॉलेज कम हैं और विद्यार्थी ज्यादा। 20 सीटों के लिए 2 हजार आवेदन आते हैं। पढ़ाई के लिए बाहर जाओ तो अपने ही देश में सौतेला व्यवहार झेलना पड़ता है। भोपाल में पढ़ने आए तो यहाँ कश्मीरी कह कर संदेह से देखा जाता है। कई बार भाषाई समस्या हुई और किसी ने सहायता की तो उसे भी संदिग्ध् मान लिया जाता है। तकलीफ होती है जब हमें अपने ही प्रदेश में बार-बार पहचान बताना पड़ती है। एक चेकिंग पाइंट पर घंटों खड़े हो कर जाँच से गुजरना पड़ता है। हमें जलील किया जाता है।
पाकिस्तान है जिम्मेदार
कश्मीरी युवा घाटी की बदतर स्थिति के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि अगर पाकिस्तान ने चंद कश्मीरी नौजवानों को हथियार न थमाए होते तो कश्मीर में न तो इतनी बर्बादी होती और न ही उन्हें स्पेशल पावर एक्ट का सामना करना पड़ता।
अलगाववादियों से अलग है राय
नवदुनिया से बातचीत में कश्मीरी युवाओं ने कहा कि अलगाववादी भारत से आजादी चाहते हैं। जबकि कश्मीर का आम युवा ऐसा नहीं सोचता। उन्होंने कहा-'हमारी बात नहीं सुन जा रही। हम हिन्दुस्तान से आजादी नहीं चाहते बल्कि घाटी में बेखौफ घूमने फिरने की आजादी चाहते हैं।"
विशेष कानून समस्या
कश्मीरी युवा घाटी की सबसे बड़ी समस्या आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट को मानते हैं। उनका कहना है कि इस एक्ट का सबसे ज्यादा शिकार युवा ही हो रहे हैं। हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि घाटी से लागू आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट हटा लिया जाए।
'राहुल, हमारी भी तो सुनो"
युवाओं की तकलीफ यह है कि कोई उनकी सुन नहीं रहा है। वे कहते हैं कि राहुल गाँधी युवाओं से संवाद करने देशभर में घूम रहे हैं, लेकिन कश्मीर के युवाओं की नहीं सुन रहे। उन्हें कश्मीर के युवाओं से संवाद करना चाहिए। चाहे वे कश्मीर जाएँ या कश्मीर के युवाओं को अपने पास बुलवाएँ। बात सुनी जाएगी तो पीड़ा भी कम होगी।
*हमें भारत से आजादी नहीं चाहिए। लेकिन हमें वैसी ही आजादी चाहिए जो भारत के अन्य राज्यों के लोगों को मिली हुई है। हम जब घर से बाहर निकलते हैं तो कदम-कदम पर हमसे पहचान पत्र दिखाने को कहा जाता है। चेक पाइंट पर एक-एक घंटे खड़े होकर अपनी पहचान सिद्ध करना होती है।
आबिद हुसैन, शासकीय बेनजीर कालेज
*हम पर इल्जाम लगाया जाता है कि हम पाकिस्तान के साथ मिलना चाहते हैं। जबकि यह सरासर गलत है। कश्मीरी पाकिस्तान से नफरत करते हैं। पाकिस्तान ने आतंकवादियों को भेजकर कश्मीर को जहन्नुम बना दिया है। कश्मीर घाटी में शिक्षा के नाम पर केवल एक विश्वविद्यालय है जिसमें आम कोर्सेस में भी 20 सीटों के लिए 2 हजार लोगों के बीच काम्पटीशन होता है। केन्द्र सरकार कश्मीर के विकास के लिए जो पैसा भेजती है वह राज्य सरकार के मंत्री हड़प जाते हैं। भ्रष्टाचार के कारण भी कश्मीर के हालात खराब हैं।
बिलाल अहमद लोन, शासकीय हमीदिया कॉलेज
*न तो अलगाववादियों को कश्मीरी जनता की फिक्र है और न ही राज्य सरकार को उनका ख्याल है। आम कश्मीरी उस गुनाह की सजा भुगत रहा है जो उसने किया ही नहीं। अब जबकि घाटी से आतंकवाद समाप्त हो गया है,वहां से आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट जैसा काला कानून हटा लेना चाहिए।
अराफात अहमद बट्ट, हमीदिया कालेज
*अगर कश्मीरी युवा सेना पर पत्थर फैंक रहा है तो यह उनका फ्रस्ट्रेशन है। लेकिन इससे यह बात भी सिद्ध होती है कि वह आतंकवादी नहीं है। अगर वह आतंकवादी होते तो उनके हाथ में पत्थर नहीं एके 47 होती।
मुश्ताक अहमद, आईपीसी कालेज
Tuesday, November 2, 2010
लौटा लाओ कि हमेशा के लिए न चले जाएँ वे
श्मशान में सचेत करती अनिल गोयल की पंक्तियाँ
'क्रूरता से विदा किया तुमने/
वे सहजता से चले गए/
चाहो तो लौटा लाओ/
लौटा लाओ कि/
चले जाएँ ना इतनी दूर/
जहाँ से नहीं लौटता कोई।"
सुभाष नगर विश्राम घाट की दीवारों पर चित्रों के साथ टंगी ऐसी ही पंक्तियाँ बरबस रोक लेती है और सोचने को मजबूर करती हैं। कहते हैं श्मशान अस्थाई वैराग्य करवाता है। कुछ पलों के लिए ही सही लेकिन यहीं आकर व्यक्ति को अपनी ताकत और क्षणभंगुरता का अहसास होता है। यही वह पल होते हैं जब वह खालिस अपने कर्म और अपने जीवन के बारे में खरा चिंतन करता है। चिंतन के इन्हीं पलों को अनिल गोयल ने और गहरा, और भावपूर्ण, और असरकारी बना दिया है। विश्राम घाट की दीवारों, पीलर्स पर दो दर्जन से ज्यादा फ्रेम टंगी हैं। हर एक में बुजुर्गों के श्वेत-श्याम चित्रों के साथ काव्य पंक्तियाँ हैं। चिंतन के क्षणों में ये पंक्तियाँ आपको सोचने पर मजबूर करती हैं। बुजुर्गों के साथ अपने व्यवहार का आकलन करने को विवश करती हैं। शायद ही कोई होगा जिसे इन पंक्तियों ने आकृष्ट न किया हो और बिरला ही होगा जिसने इन्हें पढ़ने के बाद भी अपने बुरे बर्ताव में सुधार न किया हो।
मसलन, एक फ्रेम में लिखा है-
'प्रतिबंध था जिसके बोलने पर
उसके बारे में बोला गया
मृदुभाषी शोकसभा में।"
ये पंक्तियाँ किसी विवरण की माँग नहीं करती। सीधे दिल में उतरती हैं और दिमाग पर असर करती हैं। इन कविताओं में बेटों के बाद भी बुजुर्गों के अकेले छूट जाने की पीड़ा को देखा-समझा और महसूसा जा सकता है।
अनिलजी का जन्म 6 नवंबर 1961 को विदिशा में हुआ था। छह साल की उम्र में हुआ पोलियो 70 फीसदी विकलांगता दे गया। शरीर ने कष्ट सहे लेकिन इरादे मुरझाए नहीं, वेदना पा कर संवेदना गहरी होती गई। अनिलजी ने संघर्ष किया, खुद को कभी लेखक, कभी अभिनेता, कभी नाटकों में व्यक्त किया। बुजुर्गों खास कर माँ पर अनिलजी की अभिव्यक्ति लाजवाब है। इस अभिव्यक्ति की शुरूआत भी उन्होंने भोपाल से ही की। वैलेंटाइन डे पर जब युवा पीढ़ी अपने इश्क के इजहार में व्यस्त थी, अनिलजी ने होटल सरल में माँ के प्रति अनुराग दर्शाती फोटो-कविता प्रदर्शनी का आयोजन किया। यहाँ काफी तारीफ मिली। वे कहते हैं कि बुजुर्गों के प्रति यवाओं का व्यवहार उन्हें कष्ट पहुँचाता है। यही वजह है कि उन्होंने श्मशान घाट में चित्र-कविताएँ लगवाई। यदि इससे सबक ले कर बेटों ने माँ-बाप की सुध ले ली तो समझो मकसद पूरा हो गया। अनिलजी इसीबात को एक पोस्टर में कुछ यूँ कहते हैं-
'माँ के कर्ज की किश्त/
समय पर चुकाइये/
सुख समृद्धि और वैभव का बोनस पाइए।"
Wednesday, October 13, 2010
तीन साल से सूचना मिलने का इंतजार
पुनर्वास विभाग को नहीं पता कितने हुए विस्थापित
मप्र के पुनर्वास विभाग को नहीं पता है कि प्रदेश में विभिन्न योजनाओं के तहत कितने लोगों को विस्थापित किया गया और कितने लोगों का पुनर्वास किया गया। विभाग से जब 2006 में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी माँगी गई तो जवाब मिला-'हम बांग्लादेशी और पाकिस्तान के विस्थापितों का काम देखते हैं। प्रदेश के विस्थापन की जानकारी नहीं है।" जब राज्य सूचना आयोग ने सूचना जुटा कर देने को कहा तो पुनर्वास विभाग ने 13 विभागों से जानकारी माँगी। तब से जानकारी ही जुटाई जा रही है।
यह एक उदाहरण सूचना के अधिकार की ताकत और जरूरत बताने के लिए काफी है। 12 अक्टूबर 2007 में लगाए गए इस आवेदन के जवाब में विभाग ने जानकारी न होने बात कह दी। प्रथम अपील में भी प्रकरण खारिज कर दिया गया तो राज्य सूचना आयोग में अपील की गई। सुनवाई के बाद आयोग ने कहा कि पुनर्वास विभाग को जानकारी देना चाहिए। आयोग ने कहा कि विभाग के पास जानकारी नहीं है तो वह अन्य विभागों से जुटा कर जानकारी दे। इस आदेश के बाद पुनर्वास विभाग ने विस्थापन करने वाले राजस्व, नगरीय प्रशासन, वन एवं पर्यावरण, जल संसाधन सहित 13 विभागों से विस्थापन और पुनर्वास की जानकारी माँगी। तीन साल बाद अब तक विभागों ने जानकारी नहीं भेजी है।
आकलन है कि प्रदेश में हुए 60 से 80 प्रतिशत विस्थापन के बारे में विभागों को पता नहीं है कि विस्थापित कहाँ और किस हालत में हैं। इस आवेदन ने व्यवस्था की पोल खोलते हुए साबित कर दिया कि दफ्तरों में कामों और जानकारियों को अपडेट नहीं किया जाता। यहाँ केवल तात्कालिक जानकारियाँ ही मौजूद होती हैं। असल में यह इस कानून के अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा है। गौरतलब है कि सूचना के अधिकार कानून में अधिकांश आवेदनों को सूचना न होने की वजह से खारिज कर दिया जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता सचिन जैन कहते हैं कि सरकारी विभागों में सूचना को एकत्रित करने और संग्रह कर रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। योजनाएँ प्रारम्भ कर दी गई लेकिन उसके प्रभावितों, नुकसान और लाभ के आकलन के लिए जानकारियाँ ही नहीं है तो कैसे सफलता-असफलता जाँची जा सकेगी? आँकड़ों के बिना गरीब विस्थापितों के लिए कोई योजना कैसे चलाई जा सकेगी? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि सही तथ्य, जानकारियाँ और आँकड़ों के अभाव में सही योजना का निर्माण कैसे होगा?
एक साल बाद भी नहीं मिली कॉपियाँ
एक तरफ जहाँ विभागों के पास जानकारियाँ नहीं हैं वहीं दूसरी ओर अपील करने के बाद निर्णय और सूचना देने में इतनी देर हो जाती है कि फिर सूचना का मकसद खत्म हो जाता है। पिपरिया की सुगंधा और खुशबू माहेश्वरी का प्रकरण इसका उदाहरण है।
सुगंधा और खुशबू माहेश्वरी ने माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से दिसंबर 2008 में एमएससी कम्प्यूटर साइंस की परीक्षा दी थी। मार्च 2009 में जब परिणाम आया तो सुगंधा को दो विषय में 35-35 और दो में 45-45 नंबर मिले थे। खुशबू को दो में 45-45 और दो में 55-55 नंबर मिले। सुगंधा जहाँ दो विषयों मंे फेल होने से सकते में थीं वहीं समान नंबर मिलने से खुशबू अचरज में। उन्होंने कॉपियों की फोटोकॉपी माँगने के लिए 3 जून 2009 को आवेदन दिया। आवेदन खारिज होने पर अगस्त 2009 में राज्य सूचना आयोग में अपील की गई। आयोग में उनके प्रकरण पर सुनवाई का नंबर साल भर बाद अक्टूबर 2010 में आया। अब साल भर पास या फेल का निर्णय हो भी जाए तो समय गुजरने के बाद मिली सूचना किस काम आएगी?
मप्र के पुनर्वास विभाग को नहीं पता है कि प्रदेश में विभिन्न योजनाओं के तहत कितने लोगों को विस्थापित किया गया और कितने लोगों का पुनर्वास किया गया। विभाग से जब 2006 में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी माँगी गई तो जवाब मिला-'हम बांग्लादेशी और पाकिस्तान के विस्थापितों का काम देखते हैं। प्रदेश के विस्थापन की जानकारी नहीं है।" जब राज्य सूचना आयोग ने सूचना जुटा कर देने को कहा तो पुनर्वास विभाग ने 13 विभागों से जानकारी माँगी। तब से जानकारी ही जुटाई जा रही है।
यह एक उदाहरण सूचना के अधिकार की ताकत और जरूरत बताने के लिए काफी है। 12 अक्टूबर 2007 में लगाए गए इस आवेदन के जवाब में विभाग ने जानकारी न होने बात कह दी। प्रथम अपील में भी प्रकरण खारिज कर दिया गया तो राज्य सूचना आयोग में अपील की गई। सुनवाई के बाद आयोग ने कहा कि पुनर्वास विभाग को जानकारी देना चाहिए। आयोग ने कहा कि विभाग के पास जानकारी नहीं है तो वह अन्य विभागों से जुटा कर जानकारी दे। इस आदेश के बाद पुनर्वास विभाग ने विस्थापन करने वाले राजस्व, नगरीय प्रशासन, वन एवं पर्यावरण, जल संसाधन सहित 13 विभागों से विस्थापन और पुनर्वास की जानकारी माँगी। तीन साल बाद अब तक विभागों ने जानकारी नहीं भेजी है।
आकलन है कि प्रदेश में हुए 60 से 80 प्रतिशत विस्थापन के बारे में विभागों को पता नहीं है कि विस्थापित कहाँ और किस हालत में हैं। इस आवेदन ने व्यवस्था की पोल खोलते हुए साबित कर दिया कि दफ्तरों में कामों और जानकारियों को अपडेट नहीं किया जाता। यहाँ केवल तात्कालिक जानकारियाँ ही मौजूद होती हैं। असल में यह इस कानून के अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा है। गौरतलब है कि सूचना के अधिकार कानून में अधिकांश आवेदनों को सूचना न होने की वजह से खारिज कर दिया जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता सचिन जैन कहते हैं कि सरकारी विभागों में सूचना को एकत्रित करने और संग्रह कर रखने की कोई व्यवस्था नहीं है। योजनाएँ प्रारम्भ कर दी गई लेकिन उसके प्रभावितों, नुकसान और लाभ के आकलन के लिए जानकारियाँ ही नहीं है तो कैसे सफलता-असफलता जाँची जा सकेगी? आँकड़ों के बिना गरीब विस्थापितों के लिए कोई योजना कैसे चलाई जा सकेगी? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि सही तथ्य, जानकारियाँ और आँकड़ों के अभाव में सही योजना का निर्माण कैसे होगा?
एक साल बाद भी नहीं मिली कॉपियाँ
एक तरफ जहाँ विभागों के पास जानकारियाँ नहीं हैं वहीं दूसरी ओर अपील करने के बाद निर्णय और सूचना देने में इतनी देर हो जाती है कि फिर सूचना का मकसद खत्म हो जाता है। पिपरिया की सुगंधा और खुशबू माहेश्वरी का प्रकरण इसका उदाहरण है।
सुगंधा और खुशबू माहेश्वरी ने माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से दिसंबर 2008 में एमएससी कम्प्यूटर साइंस की परीक्षा दी थी। मार्च 2009 में जब परिणाम आया तो सुगंधा को दो विषय में 35-35 और दो में 45-45 नंबर मिले थे। खुशबू को दो में 45-45 और दो में 55-55 नंबर मिले। सुगंधा जहाँ दो विषयों मंे फेल होने से सकते में थीं वहीं समान नंबर मिलने से खुशबू अचरज में। उन्होंने कॉपियों की फोटोकॉपी माँगने के लिए 3 जून 2009 को आवेदन दिया। आवेदन खारिज होने पर अगस्त 2009 में राज्य सूचना आयोग में अपील की गई। आयोग में उनके प्रकरण पर सुनवाई का नंबर साल भर बाद अक्टूबर 2010 में आया। अब साल भर पास या फेल का निर्णय हो भी जाए तो समय गुजरने के बाद मिली सूचना किस काम आएगी?
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