Friday, November 6, 2009

घराने अपने दायरे तोड़ अंर्त संवाद

मुकुल शिवपुत्र का साक्षात्कार //

पंडित मुकुल शिवपुत्र- गान मनीषी पं. कुमार गंधर्व के ज्येष्ठ पुत्र। यह यायावर कलाकार पिछले दिनों चर्चा में रहा। पहले भोपाल में बदहाली में मिले। शासन ने ख्याल गुरूकुल प्रारम्भ किया लेकिन इस फक्कड़ कलाकार को वह सब रास न आया। िफर एक दिन नशा मुक्ति केन्द्र को छोड़ कूच कर गए। बाद में ग्वालियर में मिले लेकिन वहाँ कहा कि भोपाल में और शासन के बंधन  में मन नहीं लगता। इसी पूरी प्रक्रिया के दौरान एक सुबह मुकुलजी से तवील मुलाकात हो गई। इसी के कुछ अंश:-

उनका परिचय इतना भर नहीं है। कुमारजी की ख्याति का ही खयाल और ध्मार गायक हैं मुकुल शिवपुत्र। मिजाज से कलाकारों का चिरपरिचित फक्कड़पन पहली ही मुलाकात में नजर आ जाता है। मुकुलजी से मिलना, बतियाना ऐसा लगता है जैसे संगीत सरोवर में गोते लगा रहे हैं। तबीयत सूफयाना है तो यह तय नहीं कि मुकुलजी एकदम खुल कर ही मिलेंगे। हो सकता है आप घंटों बैठे रहे और सारे जहाँ की बातें हो मगर यह विरला गायक कोई तान तक न छेड़े। संभव है बीच संवाद में अचानक कोई तान सहज बहती चली आए और हमें आनंद में भिगोते हुए निकल जाए। मन न हो तो वे बात भी न करें और भाव हो तो घंटों संगीत और अपने अनुभवों के बारे में बतिया सकते हैं। वे बात करते हैं तो लगता है कि बोलते चले जाएँ और हम अभिभूत से वाचिक परम्परा का अंग बनते हुए संगीत के मर्म को जानते रहें।


कुमारजी ने शुरू किया संगीत विधाओं का अंर्त संवाद /
बकौल मुकुलजी खयाल, ठुमरी, ध्रुपद  आदि संगीत की अलग-अलग विधाएँ  हैं। इन्हें खानों में बाँटना ठीक नहीं है। ठुमरी की ही तरह खयाल गायकी भी परम्परागत है। ऐसा कैसे हो सकता है कि एक विधा  को तो हम जाने और दूसरी से दूरी बना कर रखें। खयाल केन्द्र में जो भी शिष्य आएगा उसे ठुमरी, ध्रुपद, ध्ामार आदि से वंचित नहीं रखा जाएगा। एक घराने की परम्परा को गाएँ और दूसरे के महत्व को नजरअंदाज करें, यह कैसे संभव है? यह तो ऐसे होगा कि हम हिन्दी बोलने वाले को कहे कि वह मराठी न सीखे। सभी घरानों के संगीतकारों और गायकों को अपने दायरे तोड़ कर अंर्त संवाद  करना चाहिए। इससे तुलनात्मक अध्ययन का सम्भावना बनी रहती है। कुमार गंधर्वजी ने इसी अंर्त संवाद  की शुरुआत की थी। वे ग्वालियर घराने के थे लेकिन उन्होंने रामपुर, जयपुर सहित सभी घरानों की खूबियों को जाना था। ऐसा करने वाले वे पहले कलाकार थे, क्योंकि तब तक रेडियो सहित तमाम उपकरणों का ऐसा विकास नहीं हुआ था। बचपन में बाबा (कुमारजी) ने हर घराने की गायन शैली का उसके वैशिष्ट्य के साथ करवाया था। बाबा ने अपने कमरे में जयपुर घराने के सिद्ध गायक अलादिया खाँ साहब का फोटो लगा रखा था। यह उनके कमरे में लगा किसी गायक का एकमात्र फोटो था।

वाचिक परम्परा का रहना जरूरी/
संगीत परम्पराओं और थाती को सहेजने के लिए ज्ञान को लिपिबद्ध करना कितना जरूरी है? इस सवाल के जवाब में मुकुलजी ने कहा कि वाचिक परम्परा खत्म नहीं होती। जो ज्ञान वाचिक में रहा वह अब तक बचा हुआ है, क्योंकि जो मस्तिष्क में लिख गया, वह कभी खत्म नहीं होगा। रामचरित मानस ही ले लीजिए। उसकी चौपाइयाँ याद है तो क्या फर्क पड़ता है कि उन्हें लिखा गया है या नहीं। यदि किसी ज्ञान को वाचिक परम्परा ने नहीं सहेजा तो िफर चाहे कितनी किताबें लिख लो, उसे बचाया नहीं जा सकेगा। असल वह है जो मस्तिष्क को प्रभावित करे।

पहली सभा 51 वर्ष की उम्र में! /
संगीत साधना  माँगता है। आज की पीढ़ी सब कुछ जल्दी चाहती है। ऐसे में रियलिटी शो क्या वास्तविक प्रतिभा को सामने ला पाते हैं, पूछने पर मुकुलजी ने बताया कि जयपुर घराने के सिद्ध गायक अलादिया खाँ साहब ने लयकारी और स्वरकारी का अद्भुत समन्वय किया था। उन्हीं के कारण जयपुर की गायकी में राग व ताल का सुंदर मेल मिलता है। अलादिया खाँ साहब ने कई बड़े शागिर्द तैयार किए, लेकिन उनकी पहली महिफल मुंबई में तब हुई थी, जब वे 51 वर्ष के थे। आज माता-पिता कहते हैं कि बच्चा 13 साल का हो गया, उसे मंच नहीं मिला। बाहर नहीं निकलेगा तो सपोर्ट कैसे मिलेगा, जबकि बाबा कहा करते थे कि बाहर निकलने पर सपोर्ट नहीं विरोध्ा मिलेगा बाहर कौन सहयोग करने के लिए तैयार बैठा है। पहले खुद को तैयार करो िफर मंच की चाह करो।

संगीत साधना  के लिए चाहिए निष्ठा /
मुकुलजी के मुताबिक संगीत सीखने की प्राथमिक जरूरत निष्ठा है। यह निष्ठा जो कुछ सीख रहे हैं और जो गुरू सीखा रहे हैं, उनके प्रति होना चाहिए। चाहे प्रतिभा, निरीक्षण और परीक्षण की क्षमता, स्मृति की प्रखरता, सुक्ष्म परिक्षण का कौशल, मीठा गला जैसी अनिवार्य योग्यता नहीं होगी तो भी निष्ठा के बल पर संगीत साधना की जा सकती है। संगीत सीखने की ललक ही बड़ी बात है। ऐसे ही थे उस्ताद रजब अली साहब। देवास के दरबार गायक रजब अली साहब तो अलादिया खाँ साहब की रियाज सुन-सुन कर ही गायक बन गए थे। इसी कारण वे अपने घराने का परिचय सुन्नी घराने के रूप में देते थे।


गुरू शिष्य परम्परा ही मूल /
यह कहना गलत है कि गुरू शिष्य परम्परा खत्म हो रही है। मुकुलजी कहते हैं कि यह परम्परा हमारी संस्कृति का मूल है। माँ-बच्चों का रिश्ता इस परम्परा की शुरूआत है। गुरू वह ही नहीं है जो कुछ ज्ञान दे, बल्कि वह भी गुरू है जो मार्ग दिखाता है। गायन प्रतिभा है तो पहले जो सभी नकल ही करते हैं, अच्छा गुरू उस प्रतिभा को पहचान राह दिखा देता है। मियां तानसेन तो जंगली पशुओं की आवाज की नकल किया करते थे। एक दिन गुरू हरिदास शिष्यों के साथ जंगल से गुजर रहे थे तो तानसेन ने शेर की आवाज निकाल कर उन्हें डरा दिया। पहली बार तो स्वामी हरिदास भयभीत हो गए, लेकिन दूसरी बार पहचान गए कि यह शेर की आवाज नहीं है। जंगल में मिले गुरू ने ही तानसेन को राह दिखाई। आज ऐसे ही गुरू की जरूरत है।