Thursday, May 25, 2023

दाग देहलवी: जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं

 


हजारों काम मोहब्बत में हैं मजे के दाग

जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं.

मोहब्‍बत दाग देहलवी ने जब यह शेर कहा तो बहुत मशहूर हुआ क्‍योंकि उनके पहले मिर्जा गालिब कह चुके थे, ‘इश्क ने ‘गालिब’ निकम्मा कर दिया, वर्ना हम भी आदमी थे काम के.’ अपनी शायरी से मिर्जा गालिब, मौमिन, जौक जैसे बुजुर्ग शायरों की तारीफ पाने वाले दाग देहलवी ने उर्दू का इतना सहज इस्‍तेमाल किया कि अवाम के प्रिय शायर हो गए. उनकी शायरी मोहब्‍बत की शायरी मानी जाती है मगर उनके जीवन का भी अजीब रंग था कि मोहब्‍बत पाने के लिए उन्‍होंने तवायफे काम पर रखी हुई थी.

दाग देहलवी का असली नाम नवाब मिर्जा खां था. उनका जन्‍म 25 मई 1831 को दिल्ली में हुई था. दाग देहलवी के पिता शम्सुद्दीन खां ने नाइंसाफी के लिए अंग्रेजों के खि‍लाफ आवाज उठाई. ब्रिटिश रेजिडेंट के कत्ल की भी साजिश के आरोप में उसे 1835 फांसी दे दी गई. पिता की फांसी के समय दाग देहलवी मात्र चार साल और चार महीने के थे. अंग्रेजों के भय से दाग देहलवी की मां वजीर बेगम कई वर्षों तक छिप कर रहीं और इस दौरान दाग देहलवी अपनी मौसी के यहां रहे.

संदर्भ बताते हैं कि कई वर्षों के भटकाव के बाद जब दाग की मां वजीर बेगम ने आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के पुत्र और उत्तराधिकारी मिर्जा फखरू से विवाह कर लिया. इस शादी के बाद दाग देहलवी भी लाल किले में आ गए यहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई. मिर्जा फखरू के देहांत के बाद इन्‍हें लाल किले से बाहर कर दिया गया. लेकिन लाल किले में बीते 12-14 सालों में दाग देहलवी ने उर्दू शायरी में नाम पा लिया था. ऐसे समय में जब फारसी में शायरी की जा रही थी तब दाग ने उर्दू को खास अंदाज से अपनी शायरी में आजमाया. लाल किले से निकलने के अगले साल ही 1857 की क्रांति हो गई. आशियाना बिखरने के बाद वे दर-बदर के हो गए. दिल्‍ली से वे रामपुर पहुंचे और कुछ बरस बाद वहां से हैदराबाद.

हैदराबाद का शुरुआती जीवन तकलीफों में गुजरा फिर नवाब से राहत मिली. बीवी के देहांत के बाद दाग अकेले हो गए थे और मन बहलाने के लिए उन्होंने एक साथ कई तवायफों को नौकर रखा था. दाग देहलवी से इन तवायफों का रिश्ता शाम की महफिलों तक ही था. दाग देहलवी की गज़लों की शौहरत में इन सुरीली आवाज़ों का भी बड़ा योगदान था. दाग देहलवी की शायरी के प्रसिद्ध होने का एक और कारण था कि उन्‍होंने वक्‍त के हिसाब से न केवल गजलें लिखी, बल्कि धुन तैयार कर उन्‍हें तब की नामचीन तवायफों और कोठेवालियों को याद करवाया. इस तरह अगले ही दिन उनकी गजलें शहर में मशहूर हो जाती. उस वक्‍त की मशहूर गायिकाओं से चर्चित हुई दाग की गजलों का कारवां समकालीन गजल गायकों नूरजहां, बेगम अख्तर, फरीदा खानम, आबिदा परवीन, गुलाम अली, मेहदी हसन, जगजीत सिंह, पंकज उधास की आवाज के जरिए हम तक पहुंचा है. हैदराबाद में ही साल 17 मार्च 1905 में उनका देहांत हो गया.

दाग देहलवी ने अपने जीवन में खूब लिखा है. बताते हैं कि उनका एक ‘दीवान’ 1857 में लूट लिया गया था, जिसकी कोई खबर नहीं मिली. जब वे हैदराबाद में रह रहे थे तब दूसरा दीवान कोई चुरा ले गया मगर इसके बावजूद दाग देहलवी के पांच दीवान ‘गुलजारे दाग’, ‘महताबे दाग’, ‘आफ़ताबे दाग’, ‘यादगारे दाग’, ‘यादगारे दाग- भाग-2’ प्रकाशित हुए जिनमें 1038 से ज्‍यादा गजलें, रुबाईयां, सलाम मर्सिये आदि शामिल हैं. उन्होंने कम से कम फारसी लफ्जों का इस्तेमाल करके उर्दू शेर लिखे. दाग को अपने वक्त का सबसे बेहतरीन रोमांटिक शायर कहते हुए माना जाता है कि दाग वो शायर हैं जिन्होंने उर्दू गजल को निराशा से निकाल कर मोहब्बत के रास्ते पर ला खड़ा किया. उनके बहुचर्चित कुछ शेर यूं हैं:

आप पछताएं नहीं जौर से तौबा न करें

आप के सर की कसम ‘दाग’ का हाल अच्छा है.

आशिकी से मिलेगा ऐ जाहिद

बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता.

अभी आई भी नहीं कूचा-ए-दिलबर से सदा

खिल गई आज मेरे दिल की कली आप ही आप.

अदम की जो हकीकत है वो पूछो अहल-ए-हस्ती से

मुसाफिर को तो मंजिल का पता मंजिल से मिलता है.

इलाही क्यूं नहीं उठती कयामत माजरा क्या है

हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं.

राह पर उनको लगा लाए तो हैं बातों में

और खुल जाएंगे दो-चार मुलाकातों में.

ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा

ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा.

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं

हम देखने वालों की नजर देख रहे हैं.

ये तो कहिए इस खता की क्या सजा

मैं जो कह दूं आप पर मरता हूं मैं.

जिन को अपनी खबर नहीं अब तक

वो मिरे दिल का राज क्या जानें.

आइना देख के कहते हैं संवरने वाले

आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले.

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे

जो रंज की घड़ी भी खुशी से गुजार दे.

वफा करेंगे, निबाहेंगे, बात मानेंगे

तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था.

मिलाते हो उसी को खाक में जो दिल से मिलता है

मिरी जां चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है.

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता

वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता.

फलक देता है जिन को ऐश उन को गंम भी होते हैं

जहां बजते हैं नक़्क़ारे वहां मातम भी होता है.


(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग) 


Wednesday, May 17, 2023

फड़के स्‍टूडियो: अंग्रेज पत्रकार के कमेंट ने मोम को पत्‍थर में बदल दिया

मांडव जा रहे हो तो धार के फड़के स्‍टूडियो जरूर जाना. बाज बहादुर और रानी रूपमति के प्रेम के किस्‍सों के लिए मशहूर मांडू जाने वाले हर शख्‍स को यह सलाह जरूर दी जाती है. बचपन में हमें भी मिली थी जब कक्षा पांचवी के बच्‍चों को स्‍कूल की ओर से शैक्षणिक भ्रमण पर ले जाया गया था. खांडेराव पहाड़ी पर बना तीन कमरों का स्‍टूडियो जहां के बारे में कुछ पता नहीं था मगर ज्‍यों ही दरवाजा खुला हम बच्‍चों की आंखें फटी की फटी रह गईं. रोशन केबिन में रखी मूर्तियां इतनी सजीव की आंखों को मल-मल कर देखा गया वाकई में मूर्तियां हैं या किसी को बुत बना कर बैठा दिया गया है. बोलती सी आंखें, मुस्‍कुराने को तत्‍पर होंठ, उम्र की गवाह झुर्रियां, कपड़ों पर सिलवटों की तराश ऐसी कि मन करें हथेली घूमा कर ठीक कर दें. सब यूं खामोश की यदि गलत हरकत हुई तो बुजुर्ग जो मूर्ति बने बैठे हैं बोल ही पड़ेंगे एकदम.



वह 80 के दशक की बात थी जब पहली बार फड़के स्‍टूडियो गया था और आज 21 वीं सदी के 22 साल गुजर गए हैं. फड़के स्‍टूडियो का रंग रोगन जरूर बदल गया है मगर जो नहीं बदला वह है इन प्रतिमाओं का जीवंत होने का अहसास. पत्‍थरों में प्राण फूंक देना यदि कहावत है तो दावे से कहा जा सकता है कि यह कहावत ऐसी शिल्‍प को देख कर कही गई होगी.

धार के फड़के स्‍टूडियो जो भी गया है वह ऐसे मनोभावों और इन प्रतिमाओं के रचियता के प्रति श्रद्धा भाव से भरे बिना नहीं लौटा है. इन प्रतिमाओं के शिल्‍पकार रघुनाथ कृष्ण फड़के की 17 मई को पुण्‍यतिथि है. रघुनाथ कृष्ण फड़के का जन्‍म 27 जनवरी 1884 को मुंबई के पास वसई में एक साधारण परिवार में हुआ था. उनके पिता कृष्णा जी वसई के दरबार में कार्यरत थे. साधारण परिवार में जन्‍मे रघुनाथ के मूर्तिकार होने के पीछे की कहानी भी दिलचस्‍प है. रघुनाथ‍ को बचपन से ही मूर्तिकला का शौक था. पेंटर श्रीनिवासराव हरपनहल्ली उनके पहले शिक्षक थे. उन्होंने रघुनाथ में मूर्तिकला की गुणवत्ता को पहचाना. उनके प्रोत्साहन से फड़के ने एक बूढ़े आदमी की पहली मूर्ति बनाई. उसी मूर्ति को बॉम्बे आर्ट सोसाइटी प्रदर्शनी में राज्यपाल द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था. फड़के की इसी मूर्ति को बाद में भारत सरकार ने इंग्लैंड के वेम्बली और अमेरिका के फिलाडेल्फिया में प्रदर्शनियों के लिए भेजा था.

मराठी विश्‍वकोश के अनुसार  1917 के दौरान रघुनाथ फड़के ने मुंबई में ‘मूविंग वैक्स पेंटिंग्स’ की एक प्रदर्शनी आयोजित की. इस चित्र प्रदर्शनी को काफी प्रतिसाद मिला. उन्हें अच्छी आमदनी भी हुई. उन्होंने अपने मोम के पुतलों को 1925 में वेम्बली इंग्लैंड में प्रदर्शनी के लिए भेजा. प्रदर्शनी भी वहां बहुत लोकप्रिय हुई. उन्होंने 1917 से 1927 तक दस वर्षों तक ऐसी प्रदर्शनियों का आयोजन किया. भारत की आजादी के दौर में भी उन्‍होंने अपनी प्रदर्शनियों में उन्होंने हिंदमाता के शोक, लाला लाजपतराय, लोकमान्य तिलक, दादाभाई नवरोजी और उनके आसपास के अन्य नेताओं के साथ-साथ महात्मा गांधी की कैद आदि विषयों को प्रस्तुत किया. मोम के इन पुतलों को देखकर लोग हैरान रह जाते थे. अंग्रेजी अखबार हेराल्ड ने भी उनकी कला की प्रशंसा की लेकिन ब्रिटिश पत्रकार और द बॉम्बे क्रॉनिकल के संपादक बीजी हॉर्निमैन की टिप्‍पणी ने उनकी जिंदगी बदल दी. पत्रकार हॉर्निमैन ने फड़के के  एक मोम शिल्पकार होने पर उपहास करते हुए सुझाव दिया कि उन्हें तो मूर्तिकार बनना चाहिए. इस आलोचना से रघुनाथ फड़के का दिल टूट गया. इतना उदास हुए कि मोम की प्रतिकृति की अपनी प्रदर्शनी को सफलता की ऊंचाई पर बंद कर दिया.

तभी लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी से उनकी पहचान हुई. लोकमान्य तिलक ने उन्हें पुणे में शिवाजी मंदिर के लिए शिव छत्रपति की एक प्रतिमा बनाने का काम सौंपा. शिव राय की यह पहली संगमरमर की स्मारक मूर्ति 1923 में शिवाजी मंदिर में स्थापित की गई थी. फिर 1932 में फड़के को गिरगांव चौपाटी पर लोकमान्य तिलक की आदमकद मूर्ति लगाने का काम मिला. लोकमान्य तिलक की इस मूर्ति को देखने के बाद ब्रिटिश पत्रकार बीजी हॉर्निमैन ने मूर्तिकार के रूप में फड़के की भी प्रशंसा की. जिस पत्रकार से आलोचना मिली थी उसी से मूर्तिकार के रूप में तारीफ सुन कर रघुनाथ कृष्‍ण फड़के किस संतोष का अनुभव किया होगा समझा जा सकता है.

वे केवल मूर्तिकार नहीं थे बल्कि संपूर्ण सर्जक थे. उन्‍होंने रत्नाकर पत्रिका के अप्पासाहेब गोखले के कारण साहित्य की ओर रुख किया. उन्होंने रत्नाकर, नवनीत, मनोरंजन पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया; और वे ‘टीकाकर फड़के’ के नाम से प्रसिद्ध हुए. 1937 में वे धार में आयोजित मध्य भारतीय साहित्य सम्मेलन की कला और कविता परिषद के अध्यक्ष थे. साहित्य के साथ-साथ उन्होंने संगीत, नाटक, ज्योतिष में भी रुचि ली. फड़के का नाट्यपरमर्ष संग्रह बहुत लोकप्रिय हुआ. उन्होंने तरुण साहित्य माले (1937) द्वारा प्रकाशित हास्य रचनाओं की एक पुस्तक ‘स्वालविराम’ भी लिखी. उन्होंने तबले पर भास्करबुवा बखले, बालकृष्णबुवा इचलकरंजीकर, अमन अली खान जैसे प्रसिद्ध गायकों के साथ संगत की.

जब उनकी मूर्तिकला की प्रशंसा धार तक पहुंची तो धार नरेश उदाजीराव पवार की घुड़सवारी की मूर्ति का काम मिला. यह प्रतिमा धार के प्रवेश द्वार पर स्थापित है. कहा तो यह भी जाता है कि 1930 में धार के महाराज उदाजीराव ने अपनी मां लक्ष्मीबाई की प्रतिमा बनाने के लिए उन्हें धार बुलाया था. 1933 में धार में स्टूडियो बनाकर उन्होंने मूर्तिकला का प्रशिक्षण देना शुरू किया. शिष्यों शंकरराव दवे, दिनकरराव दवे, राजाभाऊ मेहुणकर और श्रीधर मेहुणकर ने अपने गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाया है. 1961 में भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया. 1971 में उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई. 17 मई 1972 को धार के खांडेराव हिल स्थित अपने स्‍टूडियो में उनका निधन हो गया.

कलामर्मज्ञ रघुनाथ कृष्ण फड़के के निधन को 51 बरस हो गए हैं मगर उनके शिल्‍प आज भी दर्शकों को वैसा ही अचंभित, चमत्‍कृत और स्‍तब्‍ध करते हैं जैसा निर्माण के वक्‍त करते थे. राजा भोज की नगरी धार इतने बरसों से रघुनाथ कृष्ण फड़के के शिल्‍प के कारण भी ख्‍यात है.


(न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)