Monday, May 6, 2013

ये पुलिस मसखरी क्यों लगती है?


अगर थोड़ा फिल्मी अंदाज अपना लिया जाए तो अपनी बात शुरू करने के पहले यह सूचना जाहिर करना चाहूँगा कि इस लेख का उद्देश्य किसी पक्ष का बचाव करना या उसके दोषों को नजरअंदाज करना नहीं है। मेरा उद्देश्य है कि इससे कर्ताधर्ताओं को कष्ट पहुंचे और वे तिलमिला कर ही सही लेकिन कुछ जरूरी कदम उठाने को मजबूर हो। उन्हें सक्रिय करने के अलावा मेरा और कोई उद्देश्य नहीं है।
शनिवार को राष्ट्रीय  महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा भोपाल में थीं और उन्होंने कहा कि पुलिस असंवेदनशील है और वह अकसर ही पीड़ितों की तकलीफ बढ़ाती है। अब शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म ‘शूटआउट एट वडाला’ का संवाद पढ़ लीजिए। इसमें इंस्पेक्टर बने अनिल कपूर का कहना है- ‘वे खाकी वर्दी इसलिए पहनते हैं क्योंकि कोई पॉटी भी कर दे तो दिखाई न दे। ’पहली बात चिंता जाहिर करती है तो दूसरी बात मखौल उड़ाती है। हाल में बैठा दर्शक अभिनेता के संवाद पर तालियां पीटता है और बाहर आ कर लगभग इसी अंदाज में पुलिस से बर्ताव भी करता है। मुझे कोफ्त होती है ऐसी पुलिस देख कर और गुस्सा भी आता है कि फिल्मों में विदेशी पुलिस का फिल्मांकन इतना अच्छा क्यों और हमारी पुलिस मसखरी और भ्रष्ट क्यों? क्या पुलिस के शीर्ष से फर्श तक के अफसरों को बैचेनी नहीं होती? होती भी हो तो क्या करें? फिल्मों में सबकुछ गलत थोड़े ही बताया जा रहा है। यह भी उतना ही बड़ा सच है कि हमारी पुलिस 20 से 50 रुपयों के लिए चौराहों पर बिक सी जाती है। अपराधियों और नेताओं के चरणों में बिछ जाती है। आम नागरिक को गरियाती है और रसूखदार को सलाम ठोकती है।
मेरा सवाल केवल इतना है क्या इस सबका दोषी केवल पुलिसकर्मी है? क्या नया-नया भर्ती हुआ रंगरूट असंवेदनशील होता है? क्या वह यह सोच कर पुलिस बल का हिस्सा बनता है कि आते ही रिश्वत से घर भरना है? वह सोच कर नहीं आता लेकिन जब गरीब परिवार के युवा को रिश्वत दे कर नौकरी मिलती है तो सबसे पहले वह रिश्वत में दिए गए पैसे की वसूली करता है और तब तक इतनी ‘मोटी  चमड़ी’ का हो चुका होता कि किसी काम के लिए पैसे लेने में गुरेज नहीं करता। क्या कोई जिम्मेदार यह बताने का कष्ट करेगा कि इस सिस्टम को बदलने के लिए क्या किया गया? क्या आप जानते हैं कि प्रदेश और देश में जनसंख्या के मुताबिक पुलिस बल आधा ही है और यह बल भी साधनों, वाहनों और उनमें र्इंधन की कमी से जूझ रहा है। थानों में रिपोर्ट लिखवाने के लिए स्टेशनरी नहीं मिलती। फरियादी से ही कागज मंगवाने की मजबूरी चाय-नाश्ते का दरवाजा खोलती है। जमाना 3 जी से 4 जी तक  पहुंच गया है लेकिन पुलिस की कार्यप्रणाली और शब्दावली बाबा आदम के जमाने की है। अपराधी साइबर क्राइम के मास्टर हैं और थानों में पुराने बंद कम्प्यूटर सिस्टम मुंह चिढ़ाते हैं।
क्या आपको पता है कि वेतन और अन्य सुविधाओं के मामले में सामान्य पुलिसकर्मी आज के कार्पाेरेट युग के सेलेरी स्ट्रक्चर के सबसे निम्न श्रेणी में भी नहीं आता। उसका सरकारी क्वार्टर जितना असुविधापूर्ण है उतना ही घोर अव्यवहारिक ड्यूटी श्यूड्यूल। पुलिस इसलिए भी कमजोर है कि उसके हाथ में जो डंडा है वह केवल दिखावे का है। एक सिस्टम है जो व्यक्ति को दिन-दर-दिन असंवेदनशील बनाता है। इस और कौन ध्यान देगा?  अगर यह उम्मीद  नेताओं से की जा रही है तो यह उम्मीद बेमानी है। वे अपने पिछलग्गू तंत्र को भला बदलना क्यों चाहेंगे?