Sunday, January 29, 2023

जन कवि गोरख पांडेय पुण्‍यतिथि: आएंगे, अच्छे दिन आएंगे

 


दु:ख की रेखाएं मिट जाएंगी

खुशियों के होंठ मुस्कुराएंगे

सपनों की सतरंगी डोरी पर

मुक्ति के फरहरे लहराएंगे

आएंगे, अच्छे दिन आएंगे …

उम्‍मीद की ऐसा कविता लिखने वाले जन कवि गोरख पांडेय की आज पुण्‍यतिथि है. आज से 34 साल पहले दिल्‍ली के जेएनयू में अपनी मानसिक बीमारी से तंग आ कर इस कवि अपना जीवन खत्‍म कर लिया था. उम्‍मीद और हक की बातें करने वाला कवि निराशा की राह चल पड़ा लेकिन आज भी उनकी कविताएं और भोजपुरी गीत हौसला और आस में गाई जा रही हैं.

गोरख पांडेय का जन्म उत्‍तर प्रदेश के देवरिया जिले के मुंडेरवा गांव में सन् 1945 में हुआ था. वे बनारस‍ हिंदु विश्‍वविद्यालय से होते हुए उच्‍च शिक्षा के लिए जेएनयू तक पहुंच गए थे. गोरख पांडेय ने 1969 से ही नक्सलवाड़ी आंदोलन के प्रभाव में आ कर जनसंघर्ष के गीत लिखे. ब्राह्मण परिवार में जन्‍मे गोरख पांडेय ने अपनी जनेऊ उतार दी थी. वे गांव की गरीब बस्तियों में जाते थे. गरीबों के साथ रह कर उनकी पीड़ा को समझते, उनके साथ खाते-पीते और उनकी भाषा में प्रतिरोध का साहित्‍य रचा करते थे. वे इन विचारों को लिखते और गाते ही नहीं थे बल्कि जीते भी थे. जब वे गांव आते तो अपने खेतों में काम करने आने वाले मजदूरों से कहते थे कि खेत पर कब्जा कर लो. पिता ललित पांडेय जब रोकते तो कहा करते थे कि इतने खेतों का क्या करेंगे? गरीबों में बांट दीजिए.

यह बात वे कविताओं और गीतों में लिखते भी रहे. उनकी कविताएं हर तरह के शोषण से मुक्त दुनिया की चाह की आवाज बनती रही है. जब गोरख पांडेय ने अपना जीवन खत्‍म किया तब वे जेएनयू में रिसर्च एसोसिएट थे. मृत्यु के बाद उनकी रचनाओं के तीन संग्रह प्रकाशित हुए हैं –स्वर्ग से विदाई (1989), लोहा गरम हो गया है (1990) और समय का पहिया (2004).

उनके लेखन को जन गीत की दिशा किसान आंदोलन से मिली थी. एक साक्षात्‍कार में उन्‍होंने बताया था कि नवगीत आंदोलन के दौर में मैंने पहला गीत ‘आंगन में ठहरा आकाश, धीरे-धीरे धुंधला हो गया, लिखा था. ये गीत रूमानी भावनाओं, अजनबियत और अलगाव के अस्तित्ववादी चिंतन के मेल-जोल से बने थे. सन् 1968 में किसान-आंदोलन से जुड़ा. वहां ऐसे गीतों की क्या आवश्यकता थी? मुझे अपनी रचना अप्रासंगिक और व्यर्थ होती दिखाई पड़ी. तब मैंने ‘नक्सलबाड़ी के तुफनवा जमनवा बदली’ जैसे गीत लिखे. 1976 में दिल्ली आया, उसके बाद के कई साल क्रांतिकारी-लोकप्रिय रचना की तलाश के रहे.

तभी समाजवाद जैसा गीत लिखा गया जो आज भी गाया जा रहा है:

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई, घोड़ा से आई

अंगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद…

अपने समय की गरीबी, छुआछूत, भेदभाव के खिलाफ मुखर हुए गोरख पांडेय के जीवन खत्‍म कर देने का कारण भले ही मानसिक अस्थिरता रही हो मगर वे भावनात्मक रूप से उद्वेलन झेल रहे होंगे तब ही अपनी मानिसक स्थिति के आगे झुक गए. वह भावनात्‍मक सघनता का पात उनकी इस रचना में देखा जा सकता है जो अपनी प्रिय बुआ के नाम लिखी थी:

‘लेकिन बुआ

तुम अब भी छुआछूत क्यों मानती हो?

पिता के सामंती अभिमान के हमलों से कवच की तरह

हमारी हिफाजत करने के बावजूद

रामधनी चमार को नीच क्यों समझती हो

जो जिंदगी भर हमारे घर हल चलाता रहा

हमेशा गरीब रहा

और पिता का जुल्म सहता रहा? क्यों?

आखिर क्यों सबकी बराबरी में तुम्हें यकीन नहीं होता?

बोलो

चुप मत रहो बुआ।’

‘गोरख पांडेय: संकलित गद्य रचनाएं’ पुस्‍तक में उनके इंटरव्‍यू प्रकाशित हुए हैं. ‘गोरख पांडेय से मनोहर नायक की बातचीत’ शीर्षक से प्रकाशित इंटरव्‍यू में मनोहर नायक के सवाल पर गोरख पांडेय ने कविता को लेकिर अपनी चिंता जाहिर की थी. उन्‍होंने कहा था कि कविता मनुष्य की भाषिक अभिव्यक्ति का बुनियादी रूप है. इस बीच समस्या यह रही है कि कविता देश के आम जीवन की धारा से कटती चली गयी. गीत को ऐतिहासिक तौर पर अप्रासंगिक बताने की कोशिश की गयी. यह कविता के ढांचे को योरोपीय कविता के ढांचे में ढालने की कोशिश थी. यह स्थिति भारतीय जीवन-हलचल में शामिल होने की भूमिका नहीं निभाती. कविता धीरे-धीरे चंद साहित्यकारों या कुलीन लोगों के बीच की चीज़ होकर रह गई. मेरी चिंता यही है, कि कैसे कविता को फिर से जनता के जीवन और उसकी आजादी के संघर्षों का वाहक बनाया जाए.

जब उनसे पूछा गया कि कविता से आप समाज में किस तरह के काम लेना चाहते हैं? तब गोरख पांडेय ने कहा था कि कविता एक आध्यात्मिक, वेदांत नहीं है. वह रचना होती है. जनता में आवेग और विचार बिखरे होते हैं. चिंतक उन्हें एक सूत्र में बांधता है. कविता भी बिखरी भावनाओं को सौंदर्य-बोध से संगठित दिशा की ओर ले जाने की कोशिश करती है. कविता प्रमाणिक रूप से जनांदोलन की जमीन तैयार कर सकती है. यदि वह परिवर्तन की बजाय यथास्थिति की तरफदार होगी तो समाज में वैसा ही असर पैदा करेगी.

गोरख पांडे के जीवन आचरण को देखना, समझना हो तो उनकी रचनाओं को ही देखना काफी है. उनकी कुछ चर्चित कविताओं पर एक नजर :

ये आंखें हैं तुम्हारी

तकलीफ का उमड़ता हुआ समुंदर

इस दुनिया को

जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए


उनका डर

वे डरते हैं

किस चीज से डरते हैं वे

तमाम धन-दौलत

गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद?

वे डरते हैं

कि एक दिन

निहत्थे और ग़रीब लोग

उनसे डरना

बंद कर देंगे.


कुर्सी

जब तक वह जमीन पर था

कुर्सी बुरी थी

जा बैठा जब कुर्सी पर वह

जमीन बुरी हो गई.

2

उसकी नजर कुर्सी पर लगी थी

कुर्सी लग गई थी

उसकी नजर को

उसको नजरबंद करती है कुर्सी

जो औरों को

नजरबंद करता है।

3

महज ढांचा नहीं है

लोहे या काठ का

कद है कुर्सी

कुर्सी के मुताबिक वह

बड़ा है छोटा है

स्वाधीन है या अधीन है

खुश है या गमगीन है

कुर्सी में जज्ब होता जाता है

एक अदद आदमी.


आशा का गीत

आएंगे, अच्छे दिन आएंगे

गर्दिश के दिन ये कट जाएंगे

सूरज झोपड़ियों में चमकेगा

बच्चे सब दूध में नहाएंगे.

जालिम के पुर्जे उड़ जाएंगे

मिल-जुल के प्यार सभी गाएंगे

मेहनत के फूल उगाने वाले

दुनिया के मालिक बन जाएंगे

दु:ख की रेखाएं मिट जाएंगी

खुशियों के होंठ मुस्कुराएंगे

सपनों की सतरंगी डोरी पर

मुक्ति के फरहरे लहराएंगे.


(29 जनवरी 23 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)

Wednesday, January 25, 2023

कृष्‍णा सोबती: ‘मित्रो’ की छवि बचाने के लिए रचा दिया दूसरा पात्र

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कृष्णा सोबती की आज पुण्‍यतिथि है. 2010 में यदि वे पद्मभूषण पुरस्‍कार ठुकराती नहीं तो हम इस अलंकरण के साथ उन्‍हें संबोधित कर रहे होते. देश की पहली फेमिनिस्‍ट लेखिका कही जाने वाली कृष्‍णा सोबती स्‍वयं को लेखिका कहलाना पसंद नहीं करती थी. वे मानती थी कि लेखक स्‍त्री या पुरूष नहीं होता है, वह लेखक होता है. अशोक वाजपेयी के शब्‍दों में कहें तो ऐसे लोग कम होते हैं जिनके लिखे और जीने में बहुत कम अंतर होता है. ऐसे बहुत कम लोगों में एक नाम है कृष्‍णा सोबती.

कृष्णा सोबती का जन्म अविभाजित भारत में पंजाब के गुजरात जनपद (जो अब पकिस्तान में है) में 18 फरवरी, 1925 को हुआ था. विभाजन के बाद वे भारत आ गईं. उन्‍हें जिंदगीनामा (1979) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. उन्हें 1981 में शिरोमणि अवार्ड, 1982 में हिंदी अकादमी अवार्ड, 1996 में साहित्य अकादमी फैलोशिप, 2017 में भारतीय साहित्य का सर्वश्रेष्ठ सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला.

वे उसूलों की पक्‍की थीं और खुद्दार इंसान थीं. इतनी खुद्दार की कभी कोई सरकारी पद नहीं लिया और सम्‍मान, पुस्‍तकों की रॉयल्‍टी से मिली राशि रजा फाउंडेशन आदि को सौंप दी. कृष्णा सोबती ने एक करोड़ रुपए से अधिक की रजा फाउंडेशन के अशोक वाजपेयी को दी. इसी तरह ज्ञानपीठ पुरस्कार की ग्यारह लाख की राशि भी रजा फाउंडेशन को प्रदान की. अपनी वसीयत में अपनी सहायिका के घर और जीवनयापन का पुख्‍ता इंतजाम किया. 94 वर्ष के लंबे जीवन में सबकुछ सुखमय नहीं था. कई संघर्ष थे. समय के थपेड़े थे मगर इस सबसे लड़ती-भिड़ती कृष्‍णा सोबती के चेहरे पर मासूम मुस्‍कान हमेशा कायम रही. उनके हिस्‍से में ‘जिंदगीनामा’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘ऐ लड़की’ और ‘हम हशमत’ जैसी रचनाओं को मिला पाठकों का प्‍यार ही नहीं आया बल्कि एक लंबी कानूनी लड़ाई भी आई. अमृता प्रीतम जैसी ख्‍यात समकालीन पंजाबी साहित्‍यकार के साथ उनकी यह लड़ाई साहित्‍य जगत का एक अनचाहा प्रसंग है.

यह विवाद किताब के शीर्षक को लेकर था. कृष्‍णा सोबती का उपन्‍यास ‘जिंदगीनामा’ आने के करीब चार साल बाद ‘हरदत्‍त का जिंदगीनामा’ शीर्षक से अमृता प्रीतम की भी किताब का विज्ञापन छपा. आवरण पर हरदत्‍त छोटे अक्षरों में था जबकि जिंदगीनाम बड़े अक्षरों में. इस पर कृष्‍णा सोबती केा ऐतराज हो गया. वे शीर्षक के कॉपीराइट का मामला लेकर कोर्ट में चली गई. हाईकोर्ट ने मामला दिल्ली के जिला अदालत में भेज दिया. वह मुकदमा 27 साल तक चला. फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में ही आया मगर तब तक उनका देहांत हो चुका था. फैसले के बाद कृष्‍णा सोबती ने कहा था कि लड़ाई लंबी खींच गई और मजाक बनकर रह गई. मगर वे इसे ताउम्र सिद्धांत की लड़ाई कहती रही.

सिद्धांत के लिए अगर वे लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकती थी जिस दौरान उनके तीन घर बिक गए तो अपने पात्र के लिए संवेदनाओं के शिखर पर भी खड़ी दिखाई देती हैं. अपने उपन्‍यास ‘मित्रो मरजानी’ की पात्र मित्रो के लिए वे इतनी संवेदनशील थीं कि फिल्‍म में मित्रो के चरित्र से छेड़छाड़ रोकने के लिए उन्‍होंने दूसरा पात्र गढ़ दिया. कृष्णा सोबती की जीवनी ‘दूसरा जीवन’ में गिरधर राठी इस प्रसंग का जिक्र करते हैं. वे लिखते हैं कि फिल्मकार राम माहेश्वरी ने ‘मित्रो मरजानी’ पढ़ा तो इस पर फिल्‍म बनाने का विचार आया. आरंभिक चर्चा के बाद अनुबंध की बात हो गई. फिल्म के स्‍क्रीन प्‍ले के दौरान सुझाव आया कि मित्रो को बिकिनी पहना कर गांव में तैराने का दृश्य फिल्माया जाए.

कृष्‍णा सोबती कहती हैं, ‘बिकनी पहने मित्रो! यह जुमला और इससे उभरती छवि दोनों ने मेरे दिल-दिमाग़ में खलबली मचा दी. मैं मित्रो के लिए खासी परेशान हुई. मैं चौकस हुई. लेखक होने के नाते मेरा कर्तव्य बनता है कि बनता है कि मैं मित्रो जैसे पात्र से इतनी छेड़छाड़ न होने दूं.”

तब कृष्णा सोबती ने दो रात और एक दिन में बिकिनी में नहाने योग्य पात्र जैनी रच डाला. अगली बैठक में उन्‍होंने जैनी की कहानी सुना दी. उन्‍होंने प्रस्‍ताव रखा कि मित्रो के बदले सुनहरे बालों वाली कनाडा में जन्मी जैनी पर ही फिल्म बनाई जाए. मगर न जैनी पर फिल्म बनी न मित्रो पर. ‘मित्रो मरजानी’ पर फिल्‍म नहीं बन सकी मगर रंगमंच पर यह कथा नुमाया हुई और देश भर में शहरों में सौ से अधिक नाट्य प्रस्तुतियां हुईं. कृष्णा सोबती ने लेखक गिरधर राठी को बताया था कि कहानी लेखक के तौर पर उन्‍हें पांच हजार रुपए का चेक भेजा गया था. मगर उन्‍होंने पैसा लेने से इंकार कर दिया था. कोई फिल्‍म बनाए, नाटक प्रस्‍तुत करे इतना ही बहुत है. इसके लिए पैसा लेना क्या जरूरी है?

कृष्‍णा सोबती का जीवन संयोगों से भरा हुआ है. कई संयोगों में एक संयोग यह भी कि उन्‍होंने रिटायर्ड आईएएस और अनुवादक शिवनाथ के साथ विवाह का भी है. दोनों की जन्मतिथि और जन्म वर्ष एक, दोनों की माताओं का नाम एक, दोनों पढ़े भी लाहौर में. 1983 में पत्नी के निधन के बादशिवनाथ अकेले 1989 में दिल्‍ली की आनंदलोक सोसाइटी के अपार्टमेंट बी-505 में रहने आ गए थे. कृष्णा सोबती ने 1990-91 में आनन्दलोक सोसाइटी का बी-503 नंबर का फ्लैट खरीदा था. सोसाइटी के पुस्तकालय का उद्घाटन करने आईं कृष्णा सोबती को सोसायटी अध्‍यक्ष शिवनाथ ने पहली बार देखा था. इसके बाद इंडियन लिटरेचर के संपादक के आग्रह पर शिवनाथ ने कृष्‍णा सोबती के उपन्‍यास ‘ऐ लड़की’ का अंग्रेजी अनुवाद किया. इसके बाद ‘डार से बिछुड़ी’ का अनुवाद शुरु किया. तब से लेकर सन् 2000 तक शिवनाथ सुख-दु:ख में कृष्‍णा सोबती के साथ रहे. अंतत: 24 नवंबर 2000 को दोनों ने मैरिज रजिस्‍ट्रार के समक्ष विवाह कर लिया.

लेखक कृष्णा सोबती और अनुवादक शिवनाथ का विवाह दोनों की 75 वर्ष की आयु में हुआ. वास्‍तव में यह मन का मिलाप था. कृष्णा सोबती के ही शब्दों में, ‘वे अपने कमरे में. मैं अपने कमरे में. मेरी आदत रात-रात भर काम करने की, सुबह देर से उठने की. उनका दिन प्रातः से शुरु. हम दोनों के स्वभाव अलग लेकिन एक दूसरे को पूरी तरह समझने वाले.’

इस संयोग जैसा ही एक और संयोग है पहली किताब का सबसे अंत में छपना. यह भी बेहद दिलचस्‍प प्रसंग है. कृष्णा सोबती ने 1954 में एक उपन्यास लिखा था ‘चन्ना’. यह उनका पहला उपन्यास था. ‘लीडर प्रेस’ इलाहाबाद ने इसे छापने का निर्णय किया. कोई 350 पेज छापने के बाद उसकी प्रति कृष्‍णा सोबती को भेजी गई. उन्‍होंने देखा कि कुछ शब्दों को बदल दिया गया है. जैसे ‘वृक्ष’ को मैंने रूख लिखा था इसीतरह शाहनी को शाहपत्नी कर दिया. स्थानीय भाषा के शब्दों को बदलने पर वे परेशान हो गईं. उन दिनों लीडर प्रेस बहुत चर्चित था. उन्होंने सोचा होगा कि पहला उपन्यास है तो बदलाव कर सकते हैं मगर कृष्‍णा सोबती अड़ गईं. बात बनी नहीं और कृष्णा सोबती ने कागज तथा छपाई का खर्चा चुका कर उपन्‍यास वापस ले लिया. तब उनके पास छोटी सी नौकरी थी फिर भी उन्होंने ऐसा निर्णय लिया था.

इस घटना के करीब 65 साल बाद राजकमल प्रकाशन ने ‘चन्‍ना’ उपन्‍यास को प्रकाशित किया. 11 जनवरी 2019 को ‘चन्ना’ उपन्यास का विमोचन हुआ और 25 जनवरी 2019 को सुबह 8 बजे कृष्णा सोबती का दिल्ली में लंबी बीमारी के बाद देहावसान हो गया. कृष्‍णा सोबती जैसे इंसान कम ही होते हैं, अपने समय के सबसे ‘बोल्‍ड’ किरदार रचने वाली कृष्‍णा सोबती जितनी साहसी लेखक थीं, विचारधारा के मामले में उतनी ही स्‍पष्‍ट भी. निर्णय पर अडिग रहने वाली कृष्‍णा सोबती को लोग बेहद संवेदनशील व्‍यक्तित्‍व और सौम्‍य मुस्‍कान के लिए याद करते हैं.

(25 जनवरी 2023 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)

Friday, January 20, 2023

कुर्रतुलऐन हैदर: लेखक के नजरिए से देखिए हिंदुस्‍तान का अतीत और विभाजन की त्रासदी


आज ऐनी आपा के नाम से चर्चित कुर्रतुलऐन हैदर की जयंती है. माना जाता है कि उर्दू अदब की एक धारा वहां से शुरू होती है जहां से कुर्रतुलऐन हैदर ने लिखना शुरू किया था. वे विभाजन के समय पाकिस्‍तान गईं, वहां से लंदन और फिर भारत लौटी. यहां आ कर पत्रकारिता की, साहित्‍य लेखन किया. उनके लिखे को पाठकों ने खूब प्‍यार दिया तो दिया ही संस्‍थाओं और सरकार ने साहित्‍य अकादेमी, ज्ञानपीठ, पद्मश्री, पद्मभूषण सम्‍मान भी प्रदान किए. तमाम रचनाओं के अलावा कुर्रतुलऐन हैदर को सबसे ज्‍यादा 1959 में प्रकाशित उपन्‍यास ‘आग का दरिया’ के लिए जाना जाता है. इस उपन्‍यास की जितनी प्रशंसा हुई है उतनी ही इसके बारे में गलतबयानी भी. इतना कुछ कहा गया कि आ‍पत्तियों के बाद माफियां मांगी गईं. कुर्रतुलऐन हैदर हर गलत बयान का विरोध करती रहीं. मगर झूठ के सौ पैर होते हैं और वे गलतबयानी आज भी जारी है.

कुर्रतुलऐन हैदर का जन्म 20 जनवरी 1927 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था. ऐनी आपा यानी कुर्रतुलऐन हैदर का पूरा नाम मुसन्निफा क़ुर्रतुल ऐन हैदर था. उनके पिता सज्जाद हैदर यलदरम कुर्अतुल नहटौर के रहने वाले थे लेकिन हैदर के जन्म के समय वे अलीगढ़ विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार थे. पिता सज्जाद हैदर यलदरम खुद उर्दू के अच्छे लेखक थे. कुर्अतुल ऐन की मां नजर जहरा भी लेखिका थी. अदब के संस्‍कार परिवार में ही थे तभी कुर्रतुलऐन हैदर ने छह साल की उम्र से से लिखना शुरू किया. 1945 में उनका पहला कहानी संकलन ‘शीशे का घर’ छपा. तब उनकी उम्र 18 साल थी. वे लेखिका थी और उन्‍होंने ताउम्र खूब लिखा. कभी साहित्‍य रचा तो कभी पत्रकारिता की. निधन के समय 21 अगस्त 2007 तक वे लगातार लिखाती रहीं.

भारत के विभाजन पर सबसे चर्चित उपन्‍यासों में से एक ‘आग का दरिया’ पर बात करने से पहले जान लें कि कुर्रतुलऐन हैदर उन लोगों में शामिल हैं जो विभाजन के वक्‍त पाकिस्‍तान चले गए थे और बाद में भारत लौट आए. उनके बारे में कहा गया कि ‘आग का दरिया’ उपन्‍यास पाकिस्‍तान में सेंसरशिप का शिकार हुआ. कट्टरपंथियों ने उनके लिखे पर हंगामा किया. उन पर पाबंदियां लगाई गईं. मगर उपन्‍यास के हिंदी अनुवाद की भूमिका में वे इन सारी बातों को खारिज करती हैं. कहा जाता है कि पाकिस्‍तान में विरोध से परेशान हो कर वे ब्रिटेन गई थीं और फिर अपने पिता के खास दोस्‍त मौलाका अबुल कलाम आजाद के कहने पर भारत लौट आईं. यह आधी बात सच है और आधी झूठ.

कुर्रतुलऐन हैदर ने खुद लिखा है कि वे अपनी मां का इलाज करवाने ब्रिटेन गई थीं, न कि कट्टरपंथियों या सेंसरशिप से परेशान हो कर. हां, यह सच है कि पिता के मित्र अबुल कलाम आजाद के कहने पर ही वे लंदन में न रह कर भारत लौट आई थीं. भारत आने के बाद उन्‍होंने ‘द टेलीग्राफ’ में रिपोर्टिंग की. ‘इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’ में संपादन किया. ‘इम्प्रिंट’ की प्रबंध संपादक रहीं. उन्होंने लगभग बारह उपन्यास और ढेरों कहानियां लिखीं. उनकी प्रमुख कहानियां में ‘पतझड़ की आवाज’, ‘स्ट्रीट सिंगर ऑफ लखनऊ एंड अदर स्टोरीज’, ‘रोशनी की रफ्तार’ जैसी कहानियां शामिल हैं. उन्होंने ‘हाउसिंग सोसायटी’, ‘सफीने गमे दिल’, ‘आखि‍रे- शब के हमसफर’, ‘कारे जहां दराज है’ जैसे उपन्यास भी लिखें. ‘आखि‍रे- शब के हमसफर’ के लिए इन्हें 1967 में साहित्य अकादमी और 1989 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला. साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें 1984 में पद्मश्री और 1989 में उन्हें पद्मभूषण से पुरस्कृत किया गया.

मगर जिस उपन्‍यास के कारण वे हमेशा चर्चा में रही वह है, ‘आग का दरिया’. 1959 में इतिहास को समेटते वर्तमान की त्रासदी पर एक उपन्‍यास लिखा जाना क्रांतिकारी ही कहा जाएगा. इसकी शैली वैसी है जैसी बाद में हिंदी में कमलेश्वर ने ‘कितने पाकिस्तान’ उपन्यास में अपनाई थी. विभाजन की रक्तरंजित घटनाओं पर यशपाल ने ‘झूठा सच’, भीष्म साहनी ने ‘तमस, राही मासूम रज़ा ने ‘आधा गांव” जैसे उपन्यास लिखे हैं. इन सबमें प्रसिद्धि का चरम कुर्रतुलऐन हैदर के उर्दू उपन्यास ‘आग का दरिया’ ने छूआ है. यह उपन्यास में भारत के तीन हजार वर्ष के इतिहास को विभाजन की त्रासदी से जोड़ता है.

पुस्तक के अनुवादक नंद किशोर विक्रम कहते हैं कि आग का दरिया की कहानी बौद्ध धर्म के उत्थान और ब्राह्मणत्व पतन से शुरू होती है. ये तीन काल में विभाजित है, किंतु इसके पात्र गौतम, चंपा, हरिशंकर और निर्मला तीनों काल में मौजूद रहते हैं कहानी बौद्धमत और ब्राह्मणत्व के टकराव से शुरू हो कर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के टकराव तक पंहुचती है. उपन्यास देश के विभाजन की त्रासदी पर समाप्त होता है. यहां यह बात बतानी बेहद जरूरी है कि लेखिका ने विभाजन की त्रासदी को मानव त्रासदी के रूप में देखा है. मानव पीड़ा से सरोकार का यह पक्ष ‘चांदनी बेगम’, ‘चाय के बाग’ और ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ में भी दिखाई देता है.

पात्र गौतम और चंपा की एक ही इच्छा है कि वे बनारस पहुंच जाएं. उपन्यास में चंपा कहती है जब वह बनारस में पढ़ती थी तो कभी दो कौमों के सिद्धांत् पर गौर नही किया. काशी की गलियां, शिवालय और घाट मेरे भी इतने ही थे, जितने मेरी दोस्त लीना भार्गव के. फिर क्या हुआ कि जब मैं बड़ी हुई तो मुझे पता चला कि इन शिवालयों पर मेरा कोई हक नहीं, क्योंकि मैं माथे पर बिंदी नही लगाती. कुर्रतुलऐन हैदर लिखती हैं कि यहां हजारों देवी−देवता हैं. आप चाहे किंतु जिसे माने. इस्लाम में ऐसा नहीं है, वहां आपके लिए कोई आजादी नही दी गई है.

लेखक हमें अतीत से साक्षात्‍कार करवाते हैं और इस आधार पर हम भविष्‍य की इबारत लिख सकते हैं. विभाजन की त्रासदी को भी कुर्रतुलऐन हैदर की नजर से ‘आग का दरिया’ के रूप में जरूर देखा जाना चाहिए.

(20 जनवरी 2023 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)