Monday, May 31, 2010

आपका पानी कौन सा है?

आदमी बुलबुला है पानी का
और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है,
फिर उभरता है, फिर से बहता है,
न समंदर निगला सका इसको, न तवारीख तोड़ पाई है,
वक्त की मौज पर सदा बहता - आदमी बुलबुला है पानी का।

गुलजार साहब का यह गीत जिंदगी के साज पर इंसान के हौंसलों का राग है। पृथ्वी और हमारे शरीर में सबसे ज्यादा मात्रा में मौजूद यह तत्व पानी, कला माध्यमों में भी बहुतायत में मिलता है। बचपन से जब कल्पनाएँ परवान चढ़ने लगती है अभिव्यक्ति के लिए मन बैचेन हो उठता है, तब से पानी हमारी अभिव्यक्ति का केन्द्र बनता है। एक बच्चा जब कूची थामता है तो कुछ अभ्यास के बाद नदी, पहाड़, फूल और पेड़ की आकृति की उकेरता है। छुटपन के गिनेचुने खेलों में से एक है-'मछली-मछली कितना पानी।"




स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही रूपों में पानी सृजनधर्मियों का सहायक रहा है। चाहे वह शिल्प हो, संगीत हो, वास्तु या चित्रकला, नाट्य या वक्तृत्व कला। औजारों को धार देने का मामला हो या रोशनाई को घोलने का उपक्रम। बिना पानी सब सूना है, अधूरा है।

पानी के जितने स्वाद और प्रकार है, जीवन के भी उतने ही रूप है और उतनी कला में अभिव्यक्ति भी। ठहरा हुआ पानी, गहरा पानी, उथला पानी, गंदला पानी, साफ पानी, बदली में काला पानी, समंदर में नीला पानी, बाढ़ का उपद्रवी पानी, झीर का सूखता पानी...।

नैनों से झलकता पानी, मेहनतकश के शरीर का खारा पानी, शर्म का पानी, चेहरे का पानी...।

रंगों में घुलता पानी, दूध में मिलता पानी, कड़ाही पर पकता पानी, रोटी में फूलता पानी...।

चातक की प्यास बुझाता पानी, सीप में मोती बनता पानी...।


इन सभी में से एक पानी हमारा भी है। हमारा पानी एक समय में कई रंग दिखालाता है। अपनों के लिए मीठा होता है तो दूसरों के लिए खारा। प्यासे के लिए गंदला पानी भी मीठा हो जाता है और तृप्त कंठ के लिए मीठा पानी भी अर्थहीन। भेद भरे सृजन का पानी लोगों को बाँटता है, विभाजित करता है। वैमनस्यपूर्ण कला मनभेद रचती है और पानीदार कला मेल कराती है। ऐसी कला पानी की उन दो-चार बूँदों की मानिंद होती है जो उफनते दूध को शांत कर देती है।


सवाल यह है कि आपका पानी कौन-सा है?

Thursday, May 27, 2010

पानी गए न ऊबरे//

पानी को न जाना कुछ भी
मीरा बाई ने बरसों पहले एक भजन में कुछ सवाल पूछे थे। उनका पहला प्रश्न था- जल से पतला कौन है? सभी जानते हैं कि जल से पतला ज्ञान बताया गया था। बात इतनी सी है कि जल की इस तरलता को समझने में हमने बरसों लगा दिए, फिर भी अज्ञानी ही रहे।


वेद जल को विष्णु का पर्याय कहते हैं। हो भी क्यों न, विष्णु सृष्टा हैं और जल जीवन का आधार। विज्ञान कहता है कि साधारण माना जाने वाला पानी उत्तम विलायक भी है। हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक परमाणु से बने पानी की विशेषता है कि इसका ठोस रूप (बर्फ) द्रव रूप से हलका होता है। पानी का कमजोर ही सही लेकिन विशेष हाइड्रोजन बंध इसे कई गुण देता है। पानी के इस विज्ञान में भी कितना बड़ा अध्यात्म छुपा है। जीवन में देखें तो पानी जोड़ने का काम ही करता है। जन्म, विवाह और मृत्यु सहित तमाम संस्कारों के आवश्यक तत्व पानी को महाकवि तुलसीदास जी ने उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने के लिए उपयोग किया था। उन्होंने रामेश्वर में शिवलिंग की स्थापना के बाद श्री राम के मुख से कहलवाया कि जो गंगोत्री से गंगाजल ला कर यहाँ अभिषेक करेगा वह मुक्ति पाएगा। पानी देश के दो छोर को जोड़ने का ही नहीं बल्कि अंचलों को जोड़ने का माध्यम भी बना। जगह-जगह निकलने वाली कावड़ यात्राएँ, नर्मदा यात्राएँ और नदी में नहाने का महत्व धार्मिक कम पानी के प्रति आदरांजलि ज्यादा है। इस्लाम में भी पानी की अहम भागीदारी है। इस्लाम का मूल नमाज है और नमाज का मूल वजू है। बिना वजूके नमाज नहीं हो सकती और बिना पानी के वजू नामुमकिन है। यहाँ भी पानी के संरक्षण की बात कही गई है। माना जाता है कि कयामत के दिन जिसे नेकी के साथ रखा जाएगा वह वजू का पानी है। यानि ज्यादा से ज्यादा नमाज हो। और वजू में एक भी बूँद पानी की बर्बादी की तो आखिर में उसका हिसाब देना होगा। आज पानी जब कम हो रहा है तो उत्तर-दक्षिण ही नहीं, अड़ोस-पड़ोस के विवाद का कारण बन रहा है।


...बर्फ के हल्के होने का भी अपना संदेश हैं। आप चाहे जितना कठोर हो जाएँ, यह आपका हलकापन (उथलापन) ही होगा। आप तरल हैं तो सहज हैं। तभी वस्तुत: भारी भी हैं।


...सभ्यताओं और संस्कृति के जलस्त्रोतों के किनारे होने की वजह पानी का बहुपोग होना ही तो है। हम भी जितना बहुपयोगी, बहुगुणी और बहुआयामी होगें, उतना ही विस्तार और महत्व पाएँगे।


...पानी जहाँ जाता है, जिसमें मिलता, वैसा हो जाता है।


...पानी का एक गुण और है। यह राह बनाना जानता है। पत्थरों में रूकता नहीं, अवरोधों से सिमटता नहीं। दबकर, पलटकर, कुछ देर ठहरकर यह अपनी राह खोज लेता है। और यही पगडंडी धीरे-धीरे दरिया का रास्ता बनती है। देख लीजिए जिन्होंने अपनी पगडंडी चुनी, जो पानी की तरह तरल,सहज और विलायक हुए वही समाज के पथप्रदर्शक भी बने। उन्हें ही सुकून भी मिला।


हम हर बार कहते हैं, पढ़ते हैं- पानी गए न ऊबरे। लेकिन हर बार जब आकलन करते हैं तो पाते हैं कि पानी के बारे में जितना भी जाना, न जाना कुछ भी। और जिसने पानी को जान लिया वह पानी-पानी हो गया। जिसमें पानी को समझ लिया वह पानीदार हो गया।

Sunday, May 16, 2010

आपके पड़ोस में भी है एक 'आनंदी"

अबके जन्म मुझे बिटिया न कीजो"। खेलने-पढ़ने की उम्र में बहू बना दी गई बच्चियाँ कुछ इसी अंदाज में अपनी किस्मत को कोसती हैं। वे बहती आँखों से उन्हीं माँ-बापू पर गुस्से का इजहार करती हैं जिन्होंने उसे कच्ची उम्र में जिम्मेदारियों के दलदल में धकेल दिया। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी झुग्गी बस्तियों में बाल विवाह होते हैं। केवल विवाह ही नहीं होते कम उम्र में माँ बनने के कारण बच्चियाँ मौत के मुँह में समा रही है। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास विभाग ने 2005 में तय किया था कि 2010 तक बाल विवाह प्रथा को खत्म कर देंगे। यह संभव नहीं हुआ।
धारावाहिक 'बालिका वधू" में बाल विवाहिता आनंदी की तकलीफें देख भले ही दर्शकों की आँखें भर आती है लेकिन असल जीवन में बाल विवाह रोकने के लिए विरोध् का स्वर तेज नहीं होता। हकीकत यह है बाल विवाह के मामले में प्रदेश चौथे नंबर पर है। बड़वानी, शाजापुर, राजगढ़ और श्योपुर में आधी महिलाओं की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हुआ है। आपके आस-पड़ोस में भी आनंदी की तरह बालिका वधू है जो बालपन में बड़े सदमें झेल रही है।

अगर आप यह सोचते हैं कि धारावाहिक में दिखाए जाने वाले बाल विवाह और बालिका वधुओं की पीड़ा गुजरे जमाने की बात हो गई तो आप गलत है। असल में हमारे प्रदेश सहित देशभर के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बालिका विवाह बदस्तूर जारी है। बाल विवाह की पैठ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केरल जैसे साक्षर प्रांत में भी 15.4 बालिकाओं का विवाह 18 वर्ष से कम उम्र में हुआ है। इसका अर्थ यह है कि बाल विवाह रोकने में शिक्षा से ज्यादा जरूरी समझ और जागरूकता बढ़ना है। सरकारी आँकड़े बताते हैंै कि देश में 47.7 फीसदी महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की उम्र से पहले हो गया। इस मामले में मध्यप्रदेश चौथे स्थान पर है। यहाँ बाल विवाह का प्रतिशत 57.3 है। बिहार (69%) अव्वल है। फिर राजस्थान (65.2%) तथा झारखंड (63.2%) का नंबर आता है।

क्यों करें विरोध

बाल विवाह का विरोध करने का सबसे बड़ा कारण बालिकाओं का स्वास्थ्य है। यह तर्क बेमानी है कि शादी भले ही जल्दी कर दी जाए गोना तो बाद में होता है। इस तर्क को खारिज करने में एक बार फिर आँकड़े ही सहारा बनते हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार देश में 15 से 19 वर्ष की 16 फीसदी युवतियाँ या तो माँ बन चुकी थी या पहली बार गर्भवती थी। कम उम्र में गर्भध्ाारण के कारण गर्भपात, कम वजन के बच्चे का जन्म, बच्चों और माँ में कुपोषण, रक्त की कमी, और माँ की मृत्यु तक हो सकती है। अध्ययनों में सिद्ध हो चुका है कि 15 वर्ष में माँ बनने पर मातृ मृत्यु की संभावना 20 वर्ष की उम्र में माँ बनने से पाँच गुना ज्यादा होती है।

Tuesday, May 11, 2010

पानी गए न ऊबरे//

तालाब के कई रंग
तालाब या झील के मायने क्या हैं? मिट्टी की दीवारों के बीच सहेजा गया पानी। कहीं प्राकृतिक संरचना तो कहीं इंसानी जुनून का परिणाम। यही तालाब, पोखर, झील आज सूख रहे हैं... देखभाल के अभाव में रीत रहे हैं और कहीं मैदान, कहीं कूड़ागाह के रूप में तब्दील हो रहे है। कितना दुखद पहलू है कि जिन झीलों में जहाज चला करते थे... जिनको नाप लेने के लिए भुजाएँ आजमाईश किया करती थीं...जो प्यास बुझाते थे...जो मवेशियों का आसरा बनते थे...जो पर्यटकों को लुभाते थे...हम जिनमें ाान कर पुण्य कमाते थे, वे ही सरोवर आज सूख रहे है।
कितनी बड़ी विडंबना है कि जिनका निर्माण ही हदों में हुआ उनकी ही सारी हदें मिटाई जा रही हैं! इंसान अपनी हदों को तोड़ रहा है।

पहले किसी गाँव-कस्बे में प्रवेश करते थे तो सीमाओं के पास नदी या तालाब नजर आते थे। गाँवों की जीवनरेखा थे ये तालाब। भोपाल-उदयपुर जैसे शहरों के लिए तो तालाब का होना पर्यटन उद्योग का पर्याय है। पुष्कर का सरोवर पुण्य कमाने वालों का तीर्थ है और डल झील ख्वाबों का सैरगाह। ये विरासतें सिमटने लगी हंै। हर साल यह सच और ज्यादा कड़वाहट के साथ पेश आता है।

अब किसी भी शहर में प्रवेश करें, सबसे पहले दिखाई देता है पन्निायों से अटा पड़ा कचरे का ढ़ेर और तंगहाल झुग्गियाँ। तालाब जो गाँवों में शीतलता बाँटते थे, गाँव का आईना थे। कूड़े के ढ़ेर और झुग्गियाँ जो समस्याएँ है, शहर का यथार्थ हैं। और करीब से देखें तो पाएँगे कि बदली हुई परिस्थितियाँ हमारे जीवन से गायब होती तरलता और पोलीथिन की तरह न मिटने वाले तनाव का द्योतक हंै। तालाब सूख रहे हैं तो हमारी पहचान मिट रही है। तालाब किनारे साँस लेने वाला जीवन मिट रहा है। पनघट किनारे की खट्टी-मीठी बातें मिट रही है और परम्पराओं और आस्थाओं का संसार सिमट रहा है। जरा अपने बचपन को टटोलिए तो...या अपने बुजुर्गों से दो पल बतियाइए, तालाब से जुड़ी यादों का पूरा अलबम जीवंत हो उठेगा।

तालाब के भी अपने कई रंग हैं। गाँव में यह परिवार के बुजुर्ग सा कई समस्याओं का समाधान बनता है तो शहरों में कई चेहरों वाला किरदार बन जाता है। जो लोग शहर में अकेले हैं, उनके लिए कचोटती साँझ बिताने का उपक्रम हैं तालाब। प्रेमी जोड़ों के लिए ख्वाब बुनने का स्थल है तालाब। गरीबों के लिए पेट भरने जितनी कमाई का जरिया है तालाब। कवियों के लिए सुकुमार कल्पना तो साहसिक खेलों के शौकिनों के लिए अपनी बाहों की ताकत तौलने का पैमाना है तालाब।

किसी झील किनारे बिताई साँझ याद तो कीजिए। यह जानकर तकलीफ होगी कि तालाबों की हदें सिमट रही हैं। पानी की परम्परा सूख रही है।

Monday, May 3, 2010

पानी गए न ऊबरे//

पानीदार लोग 
पानी बचाने का संकल्प भी कैसा है, जैसे खराब परीक्षा परिणाम के बाद अगले सत्र के पहले दिन से हाड़तोड़ पढ़ाई का संकल्प... जैसे बीमारी के बाद संयमित जीवन का संकल्प...दफ्तर में समय पर आने का संकल्प...नशे की लत को छोड़ देने का संकल्प...।
जल संकट के दिनों में हर कोई सोचता हैं कि अब पानी की बर्बादी न होने देंगे। चिंता ऐसी दिखाई जाती है कि जैसे इस बार तो बारिश की बूँद-बूँद सहेज ली जाएगी। लेकिन गर्मियाँ जाते ही पानी बचाने का संकल्प भी हवा हो जाता है। सहज पानी मिलता है तो संकट के दिनों को बिसरा कर इंसान पानी का दुरूपयोग शुरू कर देता है।
संकल्प की इस कमजोरी के बीच दृढ़ इरादों के धनी भी मौजूद हैं। राजस्थान के भादरा रेलवे स्टेशन पर बाल्टी लेकर यात्रियों को पानी पिला रहे नन्दलाल सिंह राठौड़ हो या एक खुरपी से तालाब खोद लेना का हौंसला रखने वाले बिहार के कमलेश्वरी सिंह, समाज में पानीदार लोगों की कमी नहीं हैं जो अपने संकल्प को निभा लेने की अनूठी मिसाल हैं। श्री राठौड़ बीते 60 सालों से रेलवे स्टेशन पर पानी पिला कर यात्रियों की प्यास बुझा रहे हैं तो कमलेश्वरी सिंह ने बुढ़ापे में सात सालों तक अकेले खुरपी के सहारे तालाब खोद दिया। इटारसी के पास तारमखेड़ा में आदिवासियों ने बहते पानी को रोक कर अपने लिए जलाोत तैयार कर लिया। ये गाथाएँ इतिहास के पन्नाों से नहीं ली गई है, बल्कि ये हमारे आसपास के लोगों के शौर्य का वृतांत हैं। खामोशी से काम कर रहे ये पानीदार लोग असल में उस संकल्प को जी रहे हैं जिसे हम समस्या से मुक्त होते ही भूला देते हैं।

खुरपी से खोदा तालाब
बूंद-बूंद से सागर कैसे भरता है इसकी मिसाल बिहार के माणिकपुर गांव में देखी जा सकती है। पटना से करीब सौ किलोमीटर दूर इस गांव के कमलेश्वरी सिंह ने सात साल तक अकेले ही खुरपी और बाल्टी की मदद से 60 फीट लंबा-चौड़ा और 25 फीट गहरा तालाब खोद डाला। 63 साल के कमलेश्वरी की तुलना दशरथ मांझी से होने लगी है जिन्होंने अकेले ही पहाड़ काटकर सड़क बनाने का असाधारण कारनामा कर दिखाया था।
कमलेश्वरी की उपलब्धि कई मायनों में असाधारण है। तेज धूप में पसीने से तरबतर एक इंसान को छोटी सी खुरपी के साथ खुदाई करते देखकर पूरा गांव हंसता था। 15 साल पहले उनके पास 12 बीघा जमीन हुआ करती थी। लेकिन गैंगवार में उनके बड़े बेटे की हत्या कर दी गई और उसके बाद कमलेश्वरी कानूनी लड़ाई के जाल में कुछ ऐसा उलझे कि इसका खर्च उठाने के लिए उन्हें सात बीघा जमीन बेचनी पड़ी। अदालतों के च-र से उकताए कमलेश्वरी ने एक दिन अचानक फैसला किया कि केस रफादफा कर किसी रचनात्मक चीज पर ध्यान लगाया जाए। क्या करना है ये सोचने में देर नहीं लगी और 1996 की गर्मियों में कमलेश्वरी ने घर के पास अपने खेत में तालाब के लिए खुदाई शुरू कर दी। खुदाई के लिए उन्होंने खुरपी इसलिए चुनी क्योंकि फावड़ा भारी होने के कारण उससे काम करना मुश्किल था। खुरपी से मिट्टी खोदी जाती और बाल्टी में भरकर उसे फेंका जाता। सुबह छह बजे से शाम के सात बजे तक काम चलता रहता था।
सात साल की मेहनत के बाद आखिरकार तालाब तैयार हो ही गया। आज गर्मियों में भी तालाब में इतना पानी रहता है कि गांव को नहाने, कपड़े धोने और जानवरों के लिए पानी का इंतजाम करने की चिंता नहीं होती।

60 सालों से जलसेवा
'जल पी लो, जल पी लो" की मनुहार राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के भादरा रेलवे स्टेशन पर हर गाड़ी के आने पर सुनाई देती है। तपती दोपहरी मंे लू भरे थपेड़े हों या हाड़ कंपा देने वाली सर्दी या फिर बारिश- स्काउट की वेषभूषा में बाल्टी लिए एक बुजुर्ग यहाँ हर मौसम में नजर आ जाएंगे। पड़ोसी गंाव सिकरोड़ी के 83 वर्षीय पूर्व जिला स्काउट मास्टर नन्दलाल सिंह राठौड़ यह जल सेवा पिछले 60 वर्षों से करते आ रहे हंै। उन्होंने कस्बे मंे संैकड़ों पौधों को पनपाया है। 1957 मंे सरकारी शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए नंदलालजी के जीवन मंे जल सेवा प्रारम्भ होने के पीछे की कहानी भी दिलचस्प है। वे बताते हंै वर्ष 1951 मंे श्र्ाीगंगानगर से वे स्काउटिंग का प्रशिक्षण लेकर लौट रहे थे। स्टेशन पर खाना खाकर जल्दबाजी मंे गाड़ी पर चढ़े तो पानी पीना भूल गए। अगले छह-सात स्टेशनों पर कहीं भी पानी नहीं मिला। प्यास से बुरा हाल हो गया। उन्होंने उसी दिन प्रण लिया कि जब तक वे स्वस्थ और जीवित रहंेगे, भादरा स्टेशन से किसी यात्री को प्यासा नहीं गुजरने दंेगे।
शिक्षण कार्य और जल सेवा का जज्बा उनके लिए घ्ारेलू जिम्मेदारियों से कम महत्त्व का नहीं रहा। इसका अनुपम उदाहरण देखने को मिला उनकी बेटी की शादी के दौरान। 22 फरवरी 1979 की शाम को उनकी पुत्री मोहन कंवर की बारात पहुंचने वाली थी। तभी शाम 7 बजे स्टेशन पर ट्रेन पहुंचने का समय भी हो गया। नन्दलाल सिंह तो बेटी की शादी छोड़कर मानव सेवा के निर्वहन के लिए चल पड़े। उनके छोटे भाई नारायण सिंह ने बारात आने की बात कह कर उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन वे यह कह कर चले गए कि बारात को कुछ समय इन्तजार कर सकती है लेकिन ट्रेन तो नहीं रूकेगी।