Friday, July 30, 2010

सड़ा देंगे, पर खाने नहीं देंगे

2.50 रूपए बचाने 14.50 रु. का घाटा मंजूर
गोदामों में सड़ रहा गेहूँ, पर सरकारें गरीबों को देने तैयार नहीं
केन्द्र और राज्य सरकार बचाना चाहती है सबसिडी का खर्च

यह वाकई शर्मनाक स्थिति है। सरकारी गोदामों में गेहूँ सड़ रहा है, लेकिन गरीब भूखों मर रहे हैं। लोगों की मौत से ज्यादा केन्द्र व राज्य सरकारों के लिए सबसिडी बचाना महत्वपूर्ण है। मप्र सरकार बीपीएल गेहूँ एपीएल के भाव इसलिए नहीं खरीदना नही चाहती क्योंकि इसे गरीबों को बाँटने में उसे ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे। केन्द्र सरकार खराब होता सस्ता गेहूँ एपीएल के भाव इसलिए नहीं बेचना चाहती, क्योंकि इसके लिए उसे ज्यादा सबसिडी देनी पड़ेगी। यानी कि एपीएल गेहूँ भंडारण का ढाई रुपया बचाने के लिए उसे 14.50 रु. का गेहूँ बर्बाद होना मंजूर है।

उल्लेखनीय है कि ग्लोबल हंगरी इंडेक्स (वैश्विक भूख सूचकांक) में भारत का दुनिया के 88 देशों में 66 वाँ स्थान है। केवल मप्र में ही 67 लाख बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) परिवार हैं, लेकिन केन्द्र केवल 41 लाख 15 हजार परिवारों के हिसाब से ही गेहूँ का आवंटन करता है। इस कारण बीपीएल परिवारों को प्रतिमाह 35 की जगह 25 किलो गेहूँ ही मिलता है। बाकी गरीब सस्ते अनाज के लिए तरस जाते हैं। यह स्थिति तब है, जब भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की गेहूँ खरीदी 60 मिलियन मीट्रिक टन को पार कर चुकी है। नियमानुसार बफर जोन की मात्रा करीब 21 मिलियन टन है, लेकिन भारतीय खाद्य निगम ने इससे दो गुना बफर स्टॉक कर रखा है।

3 लाख टन गेहूँ खुले में
अकेले मप्र में ही इस साल 83 लाख टन गेहूँ की रिकॉर्ड पैदावार और 35 लाख टन की खरीद हुई है। जबकि राज्य में भंडारण की व्यवस्था केवल 30 लाख मीट्रिक टन की ही है। तमाम इंतजाम के बाद भी 3 लाख मीट्रिक टन गेहूँ अभी भी खुले आसमान के तले पॉलिथिन में पड़ा है। विदिशा में 45 हजार टन, सीहोर में 20 हजार टन, हरदा और होशंगाबाद में 10 हजार टन गेहूँ खराब होने की स्थिति में है। अगर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार प्रति परिवार 35 किलो गेहूँ भी बाँट दिया जाए तो खुले में पड़ा 3 लाख टन गेहूँ 7.15 लाख परिवारों का एक साल का राशन है। राज्य सरकार बीपीएल परिवारों को 25 किलोग्राम गेहूँ या चावल प्रदान कर रही है।
मुनाफाखोरी कर रही सरकार
मप्र सरकार ने तय दर 11 रूपए के अलावा किसानों को एक रुपया बोनस भी दिया है। इस हिसाब से गेहूँ खरीदी दर 12 रु. प्रति किलो हुई। इसके भंडारण पर 2.50 रूपए खर्च किए गए। इस तरह एक किलो गेहूँ 14.50 रुपया का पड़ा। केन्द्र सरकार राज्यों को बीपीएल गेहूँ 5 रूपए किलो की दर पर देती है। यदि वह खराब हो रहे गेहूँ को 7.50 रु. प्रति किलो के भाव से दे तो भी राज्य सरकारें उसे नहीं खरीदती क्योंकि इसके लिए उन्हें 5 के बजाए 7.50 रुपए प्रति किलो खर्च करने पड़ेंगे। मप्र सरकार तो अन्नापूर्णा योजना के तहत बीपीएल परिवारों को 3 रूपए किलो के भाव से गेहूँ देती है। यानी प्रति दो रु. प्रति किलो सबसिडी देती है। मप्र सरकार को तो एक किलो गेहूँ पर 4.50 (2+ 2.50) रूपए ज्यादा खर्च करना पड़ेंगे। इसलिए उसकी भी एपीएल गेहूँ खरीदने में रुचि नहीं है। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार को एपीएल की दर पर गेहूँ देने पर भी घाटा उठाना पड़ता, इसलिए वह भी खामोशी से 14.50 रूपए प्रति किलो कीमत वाला गेहूँ खराब होते देख रही है।

सड़ना मंजूर पर पेट भरना नहीं
केन्द्र सरकार को पता था कि गेहूँ सड़ने वाला है लेकिन खाद्य मंत्रालय की सलाह के बाद भी मंत्रियों के समूह ने सब्सिडी बचाने के लिए प्रस्ताव को नकार दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार केन्द्रीय खाद्य विभाग और एफसीआई ने गेहूँ खराब होने के आशंका को देखते हुए मार्च 2010 में प्रस्ताव दिया था कि 50 लाख टन गेहूँ एपीएल (गरीबी रेखा से ऊपर) के दाम पर राज्यों को दे देना चाहिए। लेकिन मंत्रियों के समूह ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए नकार दिया कि ऐसा करने पर 5000 करोड़ की अतिरिक्त सबसिडी देना होगी।
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' मौजूदा मँहगाई और भूख की स्थिति सूखे या खाद्यान्ना संकट के कारण नहीं, सरकार की नीतियों और राजनीतिक व्यवस्था के कारण है। हम न्यायालय के आदेश के बाद भी गरीबों को प्रतिमाह 35 किलो अनाज नहीं दे पा रहे है। यह कोर्ट की अवमानना के साथ गरीबों को भूखा रखने का षड़यंत्र भी है। आखिर सरकार गोदामों में रखा गेहूँ लोगों में  क्यों नहीं बाँट देती।"
सचिन जैन, सर्वोच्च न्यायालय के राज्य सलाहकार
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यह है हकीकत
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प्रदेश में बीपीएल परिवार - 67 लाख
केन्द्र से अनाज आवंटन- 41 लाख 15 हजार परिवारों के लिए
बीपीएल गेहूँ की कीमत- 5 रु.किलो (प्रदेश सरकार 3 रूपए किलो में दे रही हैं)
एपीएल की दर - 7.50 रूपए
खराब हो रहे गेहूँ की कीमत- 14.50 रू.(12 रूपए में खरीदी + 2.50 रू. में भंडारण)