Monday, February 7, 2011

बसन्त

रोज देखता हूँ तुम्हारी ओर


लगता है हर दिन


बारह घण्टे पुरानी हो रही हो तुम ।


राशन, सब्जी, दूध, बिजली,


के बढ़ते दाम व्यस्त रखते हैं तुम्हें


हिसाब-किताब में ।


नई चिन्ता के साथ


केलेण्डर में ही आता है


फागुन, सावन, कार्तिक ।


जिन्दगी का गुणा-भाग


करते-करते


जब ढल आती है


कोई लट चेहरे पर


या पोंछते हुए पसीना माथे का


मुस्कुरा देती हो मुझे देख


सच समझो उतर आता है बसन्त


हम दोनों की जिन्दगी में ।

Wednesday, February 2, 2011

रिश्तों का 'धोबीघाट"


(फोटो- प्रवीण दीक्षित

भोपाल डायरिज़










किरण राव की फिल्म 'धोबीघाट" में मुझे आमिर कहीं नजर नहीं आए। हर तरफ केवल किरण की ही रोशनी दिखलाई दी। इस फिल्म में धोबीघाट केवल कपड़ों की धुलाई का स्थल नहीं रहता बल्कि यह तो रिश्तों पर जमी धूल को गलाने, पछिटने और धो कर उजला करने का प्रतीक है। फिल्म में इंसानों के आपसी संबंधों के साथ एक रिश्ता और चलता है- बाशिंदों का अपने शहर के साथ नाता। 'मुबंई डायरीज़" फिल्म का उपशीर्षक है और असल में रहवासी की अपने शहर के साथ गुजारी जिंदगी की डायरी का अंश फिल्म के अहम हिस्सा है। यह एक किरदार की जिंदगी के बहाने मुंबई के भीतर झाँकने का मौक देता है। समंदर मुंबई की पहचान है और मरीन ड्राइव और जुहू चौपाटी इसकी आत्मा। फिल्म का शुरूआती संवाद कहता है -'चौपाटी पर लोग भेल पूरी खाने आते हैं। अधिकांश लोग तो यहाँ केवल हवा खाने आते हैं।"

यह संवाद सुनते ही भोपाल का बड़ा तालाब याद हो आता है। तालाब यूँ तो पुराने शहर की प्यास बुझाता है लेकिन इसके किनारे पर बचपन कलरव करता है। प्रेम परवान चढ़ता है। बुढ़ापे का अकेलापन बँटता है और जो नौकरी या पढ़ाई खातिर अपना घर छोड़ इस शहर में चले आए हैं, उनके लिए यह शहर परिवार है। यहाँ खुशियाँ मनाई जाती हैं, दर्द बाँटा जाता है। कई हैं जो लोगों को प्रसन्नता बेच बच्चों के लिए रोटी जुटा कर घर लौटते हैं। किनारों तक दौड़-दौड़ कर आती लहरें बाहों में भींच लेने को आमंत्रित करती है। बड़े तालाब के रहते इस शहर में कौन अकेला है भला?

फिल्म में आधुनिक जिंदगी की भागदौड़ पर कहा गया है कि लोग इतना भागते जैसे स्पीड के भी मार्क्स मिलेंगे। तेज बारिश में कामवाली बाई की झोपड़ी में पानी भरने से परेशान किरदार ही रंगीन चूड़ियों और गणेश उत्सव के बहाने मुंबई की जिंदादिली बताता है।

यह सब देख-सुन याद आता है, पुराना भोपाल। यहाँ की पहचान बटुए और रंग-बिरंगी चूड़ियाँ। चौक में मनाया गया पहला गणेशोत्सव और पटियेबाजी। मेहमाननवाजी और अपनी बोली।
शहर जैसे अपना हमसफर

'तू जो नहीं तो कुछ भी नहीं है। जो तू हमसफर है तो कुछ गम नहीं है।" पुराने गाने की यह पंक्ति उन लोगों के भावों को हूबहू व्यक्त करती हैं जिनकी यादों में भोपाल साँस बन कर धड़कता है। शहर जैसे इन लोगों के साथ जुड़वा भाई की तरह बड़ा हुआ। बचपन के लड़कपन से जवां दिल की मौजूं और फिर उम्र के अंतिम पड़ाव तक की हर यात्रा का हमकदम। उन्होंने भोपाल को बढ़ते देखा, सँवरते देखा, विकास की सीढ़ियाँ चढ़ते देखा। उनके लिए भोपाल केवल शहर नहीं परिवार है। यहाँ के मोहल्ले और सड़कें घर-आँगन की तरह हैं। उन्होंने इस शहर को पहचान दी और खुद इस शहर की पहचान बन गए। 

'धोबीघाट" याद दिलाती है कि हर शहर में रिश्तों का एक धोबीघाट है।
तभी याद हो आई भोपाल पर अपनी एक कविता


झील,
तुम बुला लेती हो रोज।

तुम्हारे किनारे जमती है
महफिल अपनी

काँटा पकड़े घंटों
तुम्हारे पहलू में बैठा मैं
कब अकेला रहता हूँ?

लहरें तुम्हारी बतियाती हैं
कितना,
जैसे घंटों कहकहे लगाता है
यार अपना।

झील, तुम्हारे होते
कब अकेला रहता हूँ मैं भला?

Tuesday, February 1, 2011

सखी वे कह कर जाते?

वसंत आ रहा है...



सखी, देखो वो चला आ रहा है चुपचाप...बिना पदचाप...जैसे कोई देख ना ले...कोई सुन ना ले...उसके आने की आहट।


वसंत हाँ, वसंत ऐसे ही तो आता है, जीवन में भी। जाने कब आ कर हथेलियों पर बिखरा देता है मेंहदी।  स्वप्न कुसुम केसरिया रंग ओढ़ लेते हैं...।


वसंत का आना पता ही नहीं चलता...इस दौड़ती भागती जिंदगी में।


ऐसे ही चुपचान आया था वसंत, उस दिन, उस साल।


मानो कल ही की बात हो जैसे।


यूँ लगता था जैसे आँगन में लगा हर पौधा गुलमोहर हो गया हो और मन के भीतर तमाम तरफ बोगनवेलिया उग आए हों। रंग-बिरंगे जंगली फूलों की तरह खिले सपने, बेतरतीब जरूर थे...बेपरवाह लोगों को कहाँ अनुशासन की फिक्र ? उनका उन्मुक्त होना ही तो सौंदर्य के गुलदस्ते में बँधने से ज्यादा जरूरी था। ऐसे ही थे सपनों के नील गगन में ऊँची उड़ान भरते इरादे।


यूँ होगा तो ऐसा कह देंगे...ऐसा हुआ तो वैसा कर लेंगे।  ख्यालों के केनवास पर बनते-बिगड़ते विचार। पतंगों के पेंच की तरह लड़ते, ढील देते, काट करते विचार।


अपना धागा-अपनी पतंग। खूब उड़ाओ...न आसमान खत्म होता न ख्वाबों की डोर छोटी पड़ती।


और एक दिन जब...ख्याल सच करने की बारी आई...छोटा रह गया सबकुछ।


हाथों से छूट गई डोर, डोलने लगी पतंग, यकायक बेआब हो गए फूल सारे, छोटा पड़ गया साहस अपना।


न बोल फूटे, न हाथ बढ़े।


अरे, कहीं इसे ही तो काठ मारना नहीं कहते हैं?


बल्लियों उछलने वाले उस क्षण पाताल में जम गए थे सारे। मन ही मन जो बुना था, ख्याली साबित हुआ सबकुछ।


क्या हो गया था नैन तुमको? तुम ही रोक लेते पलछिन उनको। पर तुम्हें फुर्सत कहाँ बहने से और...


और वे चले गए जैसे गुजर जाता है हर लम्हा, अच्छा हो या बुरा।


कितना रोकना चाहा, लेकिन कहाँ मैंने कहा और कहाँ उसने सुना?


चले गए वे भी...जैसे सब जाते हैं।


अब कहने से क्या होता है- सखी वे कह कर जाते?


सचमुच अगर वे कह कर जाते तो क्या जा पाते?