Sunday, January 30, 2011

उनकी दुनिया या उनके सपने का डर

इंसान भी कितना डरपोक है...। सॉरी, मुझे लगता है मैं बात को कुछ घुमा कर कह रहा हूँ। साफ-साफ कहता हूँ कि पुरूष कितना डरपोक है। हर संभावना, सपने और ख्याल से भी डर जाता है। किसी ने अगर अपने सपने का जिक्र किया तो डरने लगता है, कहीं खतरा मुझे तो नहीं, जैसे हर सपना उसके अस्तित्व को खत्म करने के लिए ही देखा जाता है। कोई अगर तरक्की का ख्याल बुन ले तो उसका पड़ोसी (मानसिक/शारीरिक) इंसान डर जाता है। और अगर सपने देखने और ख्याल बुनने वाला उस वर्ग का हो जिसे आजकल आधी  दुनिया कहा जाता है तो यह आदमी, ताकतवर आदमी थर-थर काँपने लगता है। उसे लगता है बरसों से, सदियों से जिसे उसने दबा कर रखा, दोयम दर्जे पर रखा, कहीं वह मुख्य धारा में आ गई तो?  इस तो से यह भयभीत रहता है। यही कारण है कि वह हर सपने की तलाशी लेना चाहता है, हर उस शख्स की दुनिया में ताकझाँक करना चाहता है, जिससे वह डरता है।

आदमी के इसी डरपोक रूप से इस हफ्ते मेरा दो बार सामना हुआ। पहला, बालिका दिवस पर एक संस्था सरोकार द्वारा रखे गए कार्यक्रम की बात है। वहाँ जब बेटियों को देवी बना कर पूजे जाने की बात हो रही थी तो मेरी एक साथी ने कह दिया कि बेटियों को देवी बना कर उसे आदर्श की कसौटी पर मत कसो। उसे सामान्य इंसान रहने दो, गलतियाँ करने का हक दो। बात कई लोगों को चुभना स्वाभाविक थी। हुआ भी यही। आखिरकार एक पंडितजी से रहा नहीं गया और वे सनातन परम्परा का बखान कर यह सिद्ध कर गए कि लड़कियों को लड़की/इंसान के अलावा सबकुछ समझने की आदत जल्दी जाने वाली नहीं है। कुल जमा दो घंटे चले कार्यक्रम में मेरी साथी ने केवल 2 मिनट अपनी बात रखी थी लेकिन उनकी यह बात पूरे कार्यक्रम में रखे गए विचारों पर भारी पड़ी। जिन्हें यह बात पसंद आई थी वे तारीफ में जुट गए और जिन्हें ख्याल देखती औरत बुरी लगती हैं, वे खंडन में जुट गए।

दूसरा वाकिया। हमारे संस्थान द्वारा महिला क्लब के गठन के दौरान का है। आयोजन की जिम्मेदारी होने के कारण मैं कुछ आगंतुकों और सहकर्मियों के साथ बाहर ही खड़ा था। कार्यक्रम महिलाओं के लिए एकाग्र था तो पुरूष इस तरह बर्ताव कर रहे थे, जैसे उन्हें किसी दोयम आयोजन में जाना पड़ रहा है। वे पहले तो कार्यक्रम को हल्का और महिलाओं के ज्ञान को फौरी बता कर इसे वक्त जाया करने की गतिविधि करार देते रहे। फिर जब महिलाओं को माइक पर बात कहने को आमंत्रित करते देखा तो कहने लगे- लो, अब तो घंटे भर की फुर्सत हो गई। इनकी चटर-पटर कभी बंद होती है?"

मैं सारी दुनिया पर आतंक का सिक्का जमाने वाले पुरूष को डरते देख रहा था। तभी एक ने आकर सूचना दी-पता है, अंदर क्या चल रहा है।?" हमें जिज्ञासु बनाते हुए वह व्यक्ति कुछ देर रूका और फिर बोला-'लड़कों को छेड़ने की बात हो रही है। गंभीर चर्चा होना थी, यह क्या स्तर आ गया!"

विस्तार से जानने पर पता चला कि एक वक्ता ने अपना 'वाइल्ड ड्रीम" बताते हुए यह कह दिया कि वह बचपन से लड़कों को छेड़ने के इरादे रखती थी और बड़े होने पर ज्यों ही यह आजादी मिली, उन्होंने अपनी यह तमन्ना पूरी भी की। एक वक्ता ने बताया कि वे चाहती हैं कि घोड़ी चढ़ कर अपने दुल्हे को ब्याहने जाए।

हम जानते हैं कि जब तक डरपोक पुरूष जिंदा है, ये सपने हकीकत में नहीं बदल सकते लेकिन इस जानकारी के बाद भी पुरूष मन विचलित हुआ। महिला जो उनके लिए किसी भी समय चटकारे ले कर बात करने का विषय होती है,   इस  आयोजन में, डर का सबब लग रही थी। मुझे लगा वहाँ महिलाओं का नहीं ऐसे आतंकियों का जमावड़ा हुआ है जिनसे सभी को डरना चाहिए। एक लड़की जिसे हर कोई, किसी भी जगह, किसी भी वक्त, कैसा भी कमेंट कर सकता है, वह लड़की यदि सपना देख ले कि वह किसी राह चलते लड़के पर फब्ती कसेगी तो पुरूष डरने लगता है। वह काँपने लगता है क्योंकि उसे अपनी सत्ता छिनती महसूस होती है। और भयभीत पुरूष षड्यंत्र करने लगता है, सपने में सेंधमारी करने लगता है, उसके दिमाग को छोटा और अछूत दिखाने की कोशिश करने लगता है जिसकी देह उसे बहुत प्यारी लगती है। जब भी कोई स्त्री सपना देखती है, डरपोक पुरूष हाँका लगा कर अपनी कौम को आगाह कर देता है- 'डरो, वह आती है।"

Friday, January 7, 2011

कोई भी काम, एनी टाइम, मैं हूँ ना

मैं पत्रकार हूँ। यह आपके लिए रहस्योघाटन नहीं है। नये व्यक्ति से परिचय करते हुए मैं अमूमन अपना नाम, संस्थान का नाम और पद जरूर बताता हूँ। आज भी यही हुआ। दफ्तर जाने के दौरान एक अधेड़ शख्स ने मुझसे लिफ्ट माँगी। मैंने उन्हें अपनी गाड़ी पर बैठा लिया जो मैं अकसर करता हूँ। सो मैंने यह कहते हुए कि मैं नईदुनिया कार्यालय तक जा रहा हूँ , पूछ लिया कि आपको कहाँ जाना हैं? उन्होंने बताया कि अयोध्या नगर जाना है, लेकिन आप तो मुझे छोड़ेगें नहीं? जी हाँ कहते हुए मैंने असमर्थता जता दी।

उन्होंने लोक परिवहन न होने पर पहले तो शासन को कोसा मेरे यह कहने पर कि कुछ हद तक तो हम भी दोषी हैं, उन्होंने मुझसे सहमति जताई। बातचीत चल पड़ थी तो कुछ और बातें हुईं। बात बढ़ती मँहगाई और आम आदमी के खर्च की कम सीमा तक आ गई। मैंने कहा पैसे की जरूरत तो सभी को होती है लेकिन आज कल घोटाले कई सौ करोड़ में होते हैं। यह जरूरत नहीं, लोभ है। उन्होंने फिर मेरी बात से सहमति जताई।

इतनी देर में हम मेरे दफ्तर तक आ पहुँचे। गाड़ी से उतरते हुए उन्होंने कहा कि मैं भी एक पत्रकार हूँ। जिस अखबार/पत्रिका का नाम लिया वह नामालूम सी है। मैं अगला कोई बात सोच पाता इसके पहले उन्होंने कहा कि मैं हर तरह का काम करवा सकता हूँ। कहीं का भी। किसी राज्य या केन्द्र के किसी विभाग में कोई तबादला, नियुक्ति, जाँच सब। पैसा बाद में लेता हूँ। आप केस बताएँगे तो आपको भी हिस्सा मिल जाएगा। आखिर पैसों की जरूरत तो आपको भी होगी?
मैं हतप्रभ था...कुल जमा 2 किमी की यात्रा में इतना लंबा परिचय कैसे हो गया कि व्यक्ति ने सारे बंध्ान, सारे लिहाज तोड़ते हुए साफ सौदेबाजी शुरू कर दी।

मैं खड़ा रहा, उन्होंने मोबाइल नंबर बताया और कहा- आप भोपाल को देखते हैं। मैं केन्द्र के काम करवा सकता हूँ। मुझे मेरी सीमाएँ नजर आ रही थीं और भ्रष्टाचार का खत्म होता शिष्टाचार दिखाई दे रहा था। मैं इस धुँधलके में अपना अक्स खोज रहा था।

 खैर है, मैं साबूत हूँ, अपने साथ।

Sunday, January 2, 2011

बिनायक किस पार्टी से हैं?

भोपाल में बिनायक के लिए जन समूह इकट्ठा हुआ था। इस कार्यक्रम की पड़ताल करने आए आईबी के लोग पड़ताल करते नजर आए कि बिनायक किस पार्टी से जुड़े हैं?
उन नासमझो का यह सवाल इसलिए था कि वहाँ सरकार के खिलाफ नारे लग रहे थे और नारे लगाने वाले वे चेहरे थे जो जनसंघर्ष की पतवार थामते हैं। हम, मैं और जिनसे सवाल पूछा गया था सचिन जैन, एक पल असमंजस में रहे कि क्या जवाब दें? क्या बताएँ कि बिनायक किस पार्टी के हैं?



क्या आप जानते हैं, बिनायक सेन कौन है? बिनायक सेन...राजद्रोही या जनसेवी? अगर इस सवाल पर विचार नहीं किया तो सच मानिये समय आपका भी अपराध्ा लिख रहा है। क्यों? भारतेन्दुजी कह गए है-'समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र। जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध्ा।" अपराध्ा इस बात का नहीं होगा कि हमने बिनायक सेन का साथ क्यों न दिया, अपराध्ा तो यह है कि हमने बिनायक के 'अपराध्ा" को जानने तक की तकलीफ नहीं उठाई।

बिनायक की बात करने के पहले आपको एक किस्सा सुना चाहता हूँ। किस्सा कुछ यूँ हैं कि गुरू गोविंद सिंह के भाई घनैयाजी संघर्ष के दिनों में गुरू सेना को पानी पिलाया करते थे। इस दौरान जब विरोधी सेना का प्यासा सिपाही मिल जाता तो वे उसे भी पानी पिला देते थे। गुरू गोविंदसिंह से शिकायत हुई तो भाई घनैयाजी ने जवाब दिया मुझे तो केवल प्यासा दिखाई देता है। अपने या दुश्मन में भेद कैसे करूँ?

इस नजीर को ध्यान में रख कर मेरी बात सुनियेगा, जानियेगा और फिर बताईयेगा कि क्या बिनायक दोषी हैं?

बिनायक सेन को छत्तीसगढ़ के ट्रायल-कोर्ट द्वारा उम्रकैद की सजा देना इसलिये नही चौंकाता है कि हमें राजसत्ता से उनके लिये रियायत की उम्मीद है। अचरज और डर तो इस बात का है कि न्याय का मंदिर सवालों के घेरे में आ गया। आम आदमी की क्या मजाल कि वह न्यायपालिका पर सवाल उठाए, ये सवाल तो न्यायपालिका के पूर्व अगुआ भी उठा रहे हैं।

बिनायक के काम को करीब से देखने वाले जानते हैं कि वे गरीबों की चिकित्सा, उनके स्वास्थ्य हालातों को बदलने में विश्वास करते थे। गुस्सा इसलिए भी है कि एक सैन्य अफसर का बेटा, गोल्ड मेडलिस्ट छात्र पूंजीपति सत्ता का चारण न बन कर जन संवेदनाओं का वाहक बना और बदले में उसे भी सत्ता का वही आचरण झेलना पड़ा जो लोकतंत्र के तमाम समर्थकों को पूरे विश्व में झेलना पड़ता है। बहुत ज्यादा को थोड़े में बताने की जो समस्या हमारे समक्ष होती है वैसी उलझन इस वक्त मेरे सामने बिनायक के काम को बताने को ले कर है। कुछ लफ्जों में कहूँ तो बिनायक ने उन बच्चों की परवाह की जिन्हें सरकार ने मरने के छोड़ दिया था।

बिनायक का जुर्म इतना कि आदिवासियों के लिए काम करते हुए उनके अधिकारों की बात की।

सत्ता की मंशा बिनायक को खत्म करना नहीं है। वो तो बिनायक को कैद रख, न्याय की प्रक्रिया पूरी कर, दंड दे कर असल में जन श्रद्धा को तोड़ना चाहती है।