Monday, February 13, 2023

‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान... सीने में जलन...' लिखने वाले शहरयार की जिंदगी भी रोचक दास्तां है

शहरयार का जिक्र करते ही कोई भी पूछ सकता है, कौन शहरयार? और जब कहें कि ‘उमराव जान’ के गीत ‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए’, ‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं’, ‘जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने’ लिखने वाले शहरयार. तब सामने वाला कहेगा, अच्‍छा वे शहरयार. वे शहरयार जिन्‍होंने लिखा है, ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’. वे शहरयार जो कम बोलते थे मगर उनकी शायरी जनता के सिर चढ़ कर बोलती थी. जिनकी शायरी को साहित्‍य अकादेमी, ज्ञानपाठी आदि सम्‍मानों से नवाजा गया वे शहरयार. वे उर्दू के चौथे साहित्यकार हैं जिन्हें ज्ञानपीठ सम्मान मिला. उनके पहले फिराक गोरखपुरी, कुर्रतुल ऐन हैदर और अली सरदार जाफरी को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया है. वे शहरयार जिन्‍हें हिंदी और उर्दू भाषा के बीच का पुल कहा जाता है. आज उन्‍हीं शहरयार की पुण्‍यतिथि है.

अखलाक मुहम्मद खान यानी शहरयार का जन्‍म 16 जून 1936 को अलोनी जिला बरेली में हुआ था. 1948 में उनके बड़े भाई का तबादला अलीगढ़ हुआ तो वे अलीगढ़ आ गए और वहीं के हो कर रह गए. घर परिवार में कोई शायर नहीं था. पिता पुलिस इंस्‍पेक्‍टर थे और जाहिर है वे बेटे को भी पुलिस महकमे में ही देखना चाहते थे. अखलाक खान को पढ़ाई के दौरान हॉकी से जुनून की हद तक लगाव था. मगर जिंदगी में कोई आया और शायरी भी दाखिल हो गई. शहरयार ने ही अपने साक्षात्कारों में बताया है कि अलीगढ़ में उनकी मुलाकात खलीलुल रहमान आजमी से हुई. आजमी की दोस्‍ती ने उन्‍हें शायरी से मिलवाया. खलीलुल रहमान के ही कहने पर अखलाक खान ने बतौर शायर ‘शहरयार’ नाम अपनाया.

चुनिंदा मंचों पर अपनी शायरी से मुखर रहने वाले शहरयान निजी जीवन में खामोश इंसान थे. मुशायरों में भी वे कम ही जाते थे. ‘उमराव जान’ जैसी फिल्‍म के गाने लिख कर रातोंरात चर्चित हुए शहरयार को धुन पर गीत लिखना रास नहीं आया और वे अदब की दुनिया में ही रहे. डॉ. प्रेमकुमार की किताब ‘बातों-मुलाकातों में शहरयार ने अपने जीवन के कुछ राज खोले हैं. लेखन के शुरुआती पर वे बताते हैं कि जब मैंने तय किया कि मुझे थानेदार नहीं बनना है तो घर से अलग होना पड़ा. तब मैं खलीलुर्रहमान के साथ रहने लगा. शुरू में मेरी जो चीजें छपीं, ऐक्चुअली वो मेरी नहीं हैं. बाद में अचानक कोई मेरी जिंदगी में आया…नहीं, यह कांफीडेंशियल है… कहते हुए शहरयार उस व्‍यक्ति के बारे में अपनी बात को छिपा जाते हैं. उनकी संवेदनशीलता इस कहन में झलकती है कि इस उम्र में मैं कितना ही रुसवा हो जाऊं, किसी और को रुसवा क्यों करूं?

वे इस प्रसंग को छोड़ आगे बढ़ते हैं और बताते हैं कि तब दुनिया मुझे अजीब लगने लगी और फिर मैं शायरी करने लगा. बीए के आखिरी साल में शेर लिखने की रफ्तार तेज हो गई. एमए में साइकोलॉजी में दाखिला लिया और जल्दी ही अहसास हुआ कि फैसला गलत लिया है. दिसंबर में नाम कटा लिया. फिर चार-छह महीने केवल शायरी की – खूब छपवाई. ऊपर वाले की मुझ पर…. हां, यूं मैं मार्क्सिस्ट हूं फिर भी मानता हूं कि कोई शक्ति है; कोई बड़ी ताकत है जो मेरी चीजों को तय करती रही है. उर्दू की बहुत अच्छी मैगजींस में मेरी चीजें छपने लगीं. तेज रफ्तारी से सामने आया. फिर एमए उर्दू में ज्वाइन किया.’

साफगोई देखिए कि शहरयार जोर दे कर स्‍वीकार करते हैं कि वे मार्क्‍सवादी हैं मगर एक परम सत्‍ता पर भरोसा करते हैं. शहरयार निजी जीवन के मामले में कम ही बोले हैं. शहरयार की अपनी बेगम नजमा के साथ मन नहीं मिला था. उनके एकांत और खामोश मिजाजी के पीछे इसे भी एक कारण माना जाता है. पत्‍नी नजमा के लिए वे क्‍या सोचा करते थे, उनकी नज्‍म ‘नजमा के लिए’ में दिखाई देता है. इस नज्‍म में वे लिखते हैं:

क्या सोचती हो

दीवार-ए-फरामोशी से उधर क्या देखती हो

आईना-ए-ख्‍वाब में आने वाले लम्हों के मंजर देखो

आंगन में पुराने नीम के पेड़ के साए में

भय्यू के जहाज में बैठी हुई नन्ही चिड़िया

क्यूं उड़ती नहीं

जंगल की तरफ जाने वाली वो एक अकेली पगडंडी

क्यूं मुड़ती नहीं

टूटी जंजीर सदाओं की क्यूं जुड़ती नहीं

इक सुर्ख गुलाब लगा लो अपने जूड़े में

और फिर सोचो.

शहरयार के मिजाज पर कमलेश्‍वर ने लिखा है, उन्होंने अपनी शायरी में मानवीय मूल्यों को सबसे आगे रखा. शायरी हो या अफसाना शहरयार बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि जो लिखना है जमकर लिखो और इतना लिखो कि अपने लिखे को भी जी भर के खारिज कर सको, जिससे साहित्य जो सामने आए तो खूबसूरत और असरदार बन सके. इसके साथ ही वह बहसों में न हिस्सा लेते हैं और न शरीक होते हैं क्योंकि वह किसी भी कीमत पर अपना सकून खोना नहीं चाहते.

जब फिल्‍मों में गाने खास कर ‘उमराव जान’ का जिक्र हुआ तो शहरयार ने डॉ. प्रेमकुमार को दिए अपने इंटरव्‍यू में बताया था कि मुझे जिंदगी में बहुत सी चीजें फि‍ल्म के गानों की मकबूलियत से मिलीं. वे उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वे जब इलाज के लिए ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट जाते थे तो उन्‍ळें लाइन में खड़ा नहीं होना पड़ता था. वहां डॉक्‍टर बिना कार्ड ही उनकी जांच कर लेते थे. वे बहुत खुशी से जांच करते थे. ट्रेन या हवाई जहाज में रिजर्वेशन करवाना हो या एएमयू की एक्जिक्यूटिव या कोर्ट के इलेक्शन का मसला हो ‘उमराव जान’ के गानों ने हमेशा मदद की है. मुशायरा चाहे देश का हो या विदेश का शहरयार का सिर्फ एक ही परिचय काफी होता था, ‘उमराव जान’ के गीतकार.

बाद में ‘दामन’, ‘फासले’, ‘द नेमसेक’ आदि फिल्‍मों के लिए गीत लिखे मगर मन फिल्‍मी दुनिया में रमा नहीं. इसका कारण शहरयार ने यूं बताया है, मेरा एक उसूल है कि मैं किसी ऐसी फि‍ल्म में गाने नहीं लिख सकता, जिसमें गाना कहानी का पार्ट न हो और जिसमें पोयट्री की गुंजाइश न हो. हम दनादन धुन पर तुरंत नहीं लिख सकते. उन्‍होंने बताया था कि पिता का कहना था कि यह तो आदमी को मालूम नहीं हो पाता कि वह क्या कर सकता है, लेकिन यह बहुत आसानी से मालूम हो जाता है कि वह क्या नहीं कर सकता. जब यह मालूम हो जाए तो ऐसा काम करने के बाद सिवाय जिल्लत के कुछ नहीं मिलता. शहरयार ने जान लिया था कि वे क्‍या कर सकते हैं और यह जान कर उन्‍होंने जो किया उसने उन्‍हें शायरी का शहरयार (बादशाह) बना दिया. उनके लिखे को पढ़ना हमेशा चैन देता है तो ठिठकने पर मजबूर भी करता है, जैसे आज वे नहीं है तो महसूस होता है कहीं कुछ कम है.


जिंदगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है

हर घडी होता है अहसास कहीं कुछ कम है.


अब जिधर देखिए लगता है कि इस दुनिया में

कहीं कुछ ज़्यादा है, कहीं कुछ कम है.


वो देख लो वो समंदर खुश्क होने लगा

जिसे था दावा मेरी प्यास को बुझाने का.


हर मुलाकात का अंजाम जुदाई क्यूं है

अब तो हर वक्‍त यही बात सताती है हमें


सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है

इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूं है.


शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को

मैं देखता रहा दरिया तिरी रवानी को.


दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे

फिर भी इक शख़्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे.


किस्सा-ए-दर्द में ये बात कहां से आई

मैं बहुत हंसता हूं जब कोई सुनाता है मुझे.


ख़्वाब देखने की हसरत में तन्हाई मेरी

आंखों की बंजर धरती में नींदें बोती है.


खुद को तसल्ली देना कितना मुश्किल होता है

कोई कीमती चीज अचानक जब भी खोती है.


वो बेवफा है हमेशा ही दिल दुखाता है

मगर हमें तो वही एक शख्‍स भाता है.


अजीब चीज है ये वक्‍त जिसको कहते हैं

कि आने पाता नहीं और बीत जाता है.

(न्‍यूज 18 में 13 फरवरी 2023 को प्रकाशित ब्‍लॉग।)

Monday, February 6, 2023

कवि प्रदीप: जब एक लाइन ने अंग्रेज सरकार को कर दिया था असहाय


कवि प्रदीप… यह नाम सुनते ही हमारे ख्‍याल में एक साथ कई गीत बज उठते हैं. ‘ ऐ मेरे वतन के लोगों’, ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिंदुस्‍तान हमारा है’, ‘चल चल रे नौजवान’, ‘हम लाए हैं तूफान से कश्‍ती निकाल कर’, ‘दूसरा का दुखड़ा दूर करने वाले’, ‘टूट गई है माला’. एक के बाद एक बेहद लोकप्रिय गीतों की शृंखला याद हो आती हैं. ऐसे भी गीत जो टैग लाइन बन गए हैं. जैसे फेरी वाला जब ऊंची आवाज में कहता है, चने जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार, तब उसे कहां याद रहता है कि इन पंक्तियों को कवि प्रदीप ने लिखा है. हमारे समय में मानवता के पतन से दु:खी हो कर जब हम कहते हैं कि कितना बदल गया इंसान तब बरबस कवि प्रदीप याद हो आते हैं. वहीं प्रदीप जिनके लिखे गीत को गा कर इंदिरा गांधी अपने बचपन की ‘वानर सेना’ में जोश भरती थी. प्रदीप का लिखा ‘आओ बच्‍चों तुम्‍हें दिखाएं झांकी हिंदुस्‍तान की’ बाल सभाओं में सबसे ज्‍यादा गाए जाने वाले गीतों में से एक है. बरसों तक इन्‍हीं के भजनों से जाने कितने घरों में सुबह रोशन हुआ करती थी. कवि प्रदीप का एक परिचय देशभक्ति का संचार करने वाले गीत हैं तो दूसरा परिचय वे भजन हैं जिन्‍होंने हमें समय के पहले सचेत किया.

आज उन्‍हीं कवि प्रदीप की जयंती है. 6 फरवरी 1915 में मध्य प्रदेश के उज्जैन के बड़नगर में एक बाल का जन्‍म हुआ जिसे नाम मिला रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी. घर में रामचंद्र को रामू कहा जाता था. बड़े भाई कृष्‍ण वल्‍लभ द्विवेदी अनुवादक, लेखक, कवि थे. उनकी विद्वता का असर छोटे भाई रामू पर भी हुआ. बड़े भाई गद्य के मनीषी थे तो छोटे भाई रामचंद्र ने काव्‍य को चुना. प्रदीप के नाम से लेखन शुरू किया और शुरुआती लेखन से ही श्रोताओं को मंत्रमुग्‍ध कर दिया. 15-16 बरस की उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए. अंग्रेजों की लाठियां खाईं. महीनों अस्पताल में भर्ती रहे. यहीं से देशभक्ति के गीतों का लेखन शुरू हुआ.

सुधीर निगम द्वारा लिखी गई जीवनी में कवि प्रदीप के जीवन के बारे में विस्‍तार से बताया गया है. इसके अनुसार अहमदाबाद में काव्‍य पाठ के बाद एक परिचित के साथ मुंबई जाना हुआ और संयोग ऐसा बना कि कवि प्रदीप प्रख्‍यात फिल्‍मकार हिमांशु राय से उनके दफ्तर में मिले. उस समय वहां देविका रानी, अशोक कुमार, लीला चिटनिस, निर्देशक फ्रेंज आस्टिन, शषधर मुकर्जी और अमिय चक्रवर्ती जैसी हस्तियां मौजूद थीं. हिमांशु राय ने प्रदीप से एक गीत सुनाने के लिए कहा. यह फिल्मों में उनकी प्रवेश परीक्षा थी. प्रदीप ने गाया-

तुम हो कहो, कौन?

अब तो खुलो, प्राण, मुंदकर रहो यों न! 

प्रदीप का काव्‍य और स्वर जादू कर गया. हिमांशु राय ने फिल्‍म निर्माण कंपनी बाम्बे टॉकीज में गीतकार की नौकरी की पेशकश कर दी. मासिक वेतन पर मामला अटक गया. लोग हैरत में थे कि किशोर प्रदीप कैसे दिग्‍गज हिमांशु राय को इंकार कर रहे हैं. असल में प्रदीप को दो डर थे. एक तो यह कि वे हिमांशु राय के मन का चाहा लिख पाएंगे या नहीं और दूसरा, उन्‍हें लग रहा था कि वेतन के रूप में 60-70 रुपए मिलेंगे. मगर हिमांशु राय ने 200 रुपए वेतन तय किया तो वे हैरान रह गए. इतना वेतन तो बड़े बड़े अभिनेताओं का भी नहीं था. राजकपूर का भी मासिक वेतन 170 रुपए था.

इस तरह कवि प्रदीप का फिल्‍मों में लेखन आरंभ हुआ. 1940 में आई शषधर मुकर्जी की फिल्म ‘बंधन’ (1940) में सभी 12 गीत प्रदीप ने लिखे थे. इस फिल्म का एक गीत उस समय चर्चित हुआ जो आज भी प्रेरणादायी बना हुआ है. वह गीत यूं है:

दूर तेरा गांव

और थके पांव

फिर भी तू हरदम

आगे बढ़ा कदम

रुकना तेरा काम नहीं

चलना तेरी शान

चल-चल रे नौजवान

चल-चल रे नौजवान.

देश के नवयुवकों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के लिए लिखा गया यह गीत इतना पसंद किया गया कि हर जगह गाया जाने लगा. यह गीत जन जागरण के लिए प्रभात फेरियों का मंत्र बन गया. सिंध और पंजाब की विधान सभाओं ने इस गीत को राष्ट्रीय गीत की मान्यता दी. बीबीसी. लंदन में कार्यरत बलराज साहनी ने गीत को कई बार प्रसारित किया. अहमदाबाद में महादेव भाई ने इस गीत की उपमा  ‘चरैवेति चरैवेति’ मंत्र से की. कई सिनेमा घरों में दर्शकों की मांग पर इस गीत को दोबारा दिखाना पड़ता था. संदर्भ बताते हैं कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने प्रदीप को बताया था, अपनी किशोरावस्‍था  में इंदिरा प्रभात फेरियों में ‘चल चल रे नौजव़ान’ गाकर अपनी ‘वानर सेना’ की परेड कराती थीं.

यहां बताता दूं कि जब आप कहीं सुने कि ‘चना जोर गरम लेलो’ तब याद कीजिएगा कि यह गीत 1940 की फिल्म ‘बंधन’ का है जिसे कवि प्रदीप ने लिखा है. यह भी एक तथ्‍य है कि 1941 में आई फिल्‍म ‘झूला’ के गीत ‘न जाने किधर आज मेरी नाव चली रे’ गायक अभिनेता अशोक कुमार को इतना पसंद आया था कि उन्होंने इसे अपनी अंतिम यात्रा में बजाने की इच्‍छा जताई थी.

फिर 1943 में प्रदीप और अनिल विश्वास के गीत- संगीत से सजी फिल्‍म ‘किस्‍मत’ ने एक और कीर्तिमान रच दिया. इस फिल्‍म का कालजयी गीत है

आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है,

दूर हटो ऐ दुनिया वालो ये हिंदुस्तान हमारा है.

‘चल चल रे नौजवान’ के बाद यह ऐसा गीत था जो 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का नारा बन गया था.

जनता एकजुट हो गई. ब्रिटिश सरकार को यह नागवार गुजरा. डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स की दफा 26 के तहत गीतकार प्रदीप पर जांच बैठा दी गई. अभियोजन अधिकारी धर्मेंद्र गौड़ ने मामले की जांच के बाद लिखा कि ‘इस गाने में प्रदीप ने जर्मनी और जापान को अपना निशाना बनाया है अंग्रेजों को नहीं. प्रदीप धोती कुर्ता पहनते जरूर है पर कांग्रेसी नहीं हैं और क्रांतिकारी भी नहीं हैं.’ मामला खत्म हुआ. वास्तव में प्रदीप ने चतुराई दिखाई थी। वे जानते थे कि इस गीत पर अंग्रेज हायतोबा मचाएंगे, इस कारण उन्होंने गीत में एक पंक्ति डाल दी थी- ‘तुम न किसी के आगे झुकना, जर्मन हो या जापानी.’ यही पंक्ति अभियोजन अधिकारी की रिपोर्ट का आधार बनी और चाह कर भी अंग्रेज सरकार कवि प्रदीप पर कार्रवाई नहीं कर सकी.

कवि प्रदीप ने अपने जीवन में लगभग 1700 गाने लिखे. फिल्मों और फिल्म वालों का रवैया बदलने लगा तो उन्होंने 1988 में फिल्मों में लिखना बंद कर दिया. निर्माता पहले से बनाई गई धुनों पर गीत लिखवाना चाहते थे जबकि प्रदीप का कहना था कि मुर्दे का कफन पहले खरीदोगे तो मुर्दे को उसकी साइज का काटना पड़ेगा यह मैं नहीं कर सकता. 1997 में कवि प्रदीप को सिनेमा में भारत के सर्वोच्च पुरस्कार, लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 11 दिसंबर 1998 को कवि प्रदीप की मृत्यु हो गई थी. वे आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके गीत आज भी अमर हैं. खासकर ‘ऐ मेरे वतन के लोगों… तुम खूब लगा लो नारा’.

इस गीत की रचना प्रक्रिया और प्रस्‍तुति भी एक कथा है. यह गीत भारत-चीन युद्ध के शहीदों को याद कर लिखा गया था. लता मंगेशकर ने इसे पहली बार 27 जनवरी, 1963 को दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में गाया था. यह कार्यक्रम युद्ध के बाद सैनिकों को आर्थिक मदद देने के लिए आयोजित किया गया था. सभी मशहूर संगीतकारों ने यहां अपना एक-एक देशभक्ति गीत प्रस्‍तुत किया था. संगीतकार सी. रामचंद्र के पास कोई गाना नहीं था. ऐसे गीत लिखने के आग्रह के साथ कवि प्रदीप के पास पहुंचे. इस आग्रह पर जो गीत बना वह है, ‘ऐ मेरे वतन के लोगों.’

कवि प्रदीप के अनुसार एक दिन ऐसे ही माहिम बीच पर टहल रहे थे. उनके दिमाग में एक लाइन कौंधी और एक पूरा पैरा तैयार हो गया. उस वक्‍त उनके पास कागज-पेन था नहीं. तुरंत एक राहगीर से पेन मांगा और सिगरेट का डिब्बा फाड़कर उस पर गीत लिख दिया. उन्‍होंने गीत के कुल सौ पैराग्राफ लिखे थे. गीत को गाने की बारी आई तो सी. रामचंद्र से लता मंगेशकर की बातचीत बंद थी इसलिए आशा को चुना गया. कवि प्रदीप की इच्‍छा थी कि लता इस गीत को गाए. सी. रामचंद्र तो बात करते नहीं थे, लिहाजा कवि प्रदीप ने ही पहल की. लता उनकी बात टाल नहीं सकीं. तय हुआ कि यह गीत दोनों बहनें लता और आशा गाएंगी मगर ऐनवक्‍त पर आशा भोंसले बीमार पड़ गई और लता मंगेशकर ने यह गीत गाया.

लता ने जब कवि प्रदीप का लिखा गीत गाया तो एक इतिहास बन गया. मोहम्‍मद रफी ने फिल्म ‘लीडर’ का गीत ‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं’ गाया. लग रहा था इसके आगे क्‍या कोई गीत होगा?  लेकिन लता के पहली पंक्ति गाते ही स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया. सब स्‍तब्‍ध. आंखों में आंसू. गाना पूरा होने के बाद पंडित नेहरू ने लता मंगेशकर को पास बुला कर कहा ‘लता, तुमने आज मुझे रुला दिया’.

पं. नेहरू तो क्‍या उस कार्यक्रम में कौन होगा जो यह गीत सुन कर रोया नहीं होगा? कौन होगा जो प्रदीप के गीतों को सुन कर आज भी दो पल सोचने को मजबूर न होगा?  यह सच ही है कि जो प्रदीप के गीतों को सुन पर अप्रभावी रह गया उसे अपनी संवेदना के स्‍तर को जरूर टटोलना चाहिए. कौन होगा जो आज के हालत को देख-जान कर कवि प्रदीप की पंक्तियों में न कहता होगा:

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान,

कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान,

सूरज ना बदला, चांद ना बदला, ना बदला रे आसमान,

कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.

आया समय बड़ा बेढंगा, आज आदमी बना लफंगा,

कहीं पे झगड़ा, कहीं पे दंगा, नाच रहा नर होकर नंगा,

छल और कपट के हांथों अपना बेच रहा ईमान,

कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.

राम के भक्त, रहीम के बंदे, रचते आज फरेब के फंदे,

कितने ये मक्कार ये अंधे, देख लिए इनके भी धंधे,

इन्हीं की काली करतूतों से हुआ ये मुल्क मशान,

कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.


(न्‍यूज 18 में 6 फरवरी 2023 को प्रकाशित ब्‍लॉग) 

Saturday, February 4, 2023

'फिर छिड़ी रात बात फूलों की' वाले शायर के एक शेर ने बदल दिया था निजाम

‘रात भर आपकी याद आती रही’, ‘फिर छिड़ी रात बात फूलों की’ और ‘इक चमेली के मंडुए तले’ जैसे गीत आपको याद तो होंगे. क्‍या इनके रचनाकार को जानते हैं? शायद नहीं. ये गीत शायर मखदूम मोहिउद्दीन के लिखे हुए हैं. खासबात यह है कि उन्‍होंने कभी फिल्‍मों के लिए लिखा ही नहीं था. उनकी रचनाओं की लोकप्रियता ऐसी थी कि फिल्‍मकारों ने शायरी का बतौर गीत इस्‍तेमाल किया. वे तो एक ऐसे शायर थे जो एक हाथ में कलम रखते थे तो दूसरे हाथ में बंदूक.

बंदूक? जी हां, आपने सही पढ़ा. वे ऐसे शायर थे जिन्‍होंने लिखा तो फूलों की बात को शब्‍द दिए और हैदराबाद को आजाद भारत में मिलाने की बारी आई तो निजाम के खिलाफ बंदूक थाम ली. जो इतना मजाकिया थे कि खुद के किस्‍सों को दिलचस्‍पी से सुनाते थे और मौका आने पर मुशायरे में शायरा को हमले से बचाने के लिए चीते सी फुर्ती लिए एक शख्‍स से भिड़ गए थे.

आज उन्‍हीं मखदूम मोहियुद्दीन की जयंती है और इस दिन उनकी रचनाओं और साहित्‍य जगत में फैले उनके किस्‍सों की बात करते हैं. मखदूम मोहिउद्दीन का जन्‍म 4 फरवरी 1908 को हैदराबाद रियासत के अंडोल गांव (अब जिला मेडक) में हुआ था. बचपन में पिता के देहांत के बाद चाचा ने उनकी परवरिश की. शायरी के लिए याद किए जाने वाले मखदूम मोहिउद्दीन वास्‍तव में कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के कार्यकर्ता पहले थे, शायर बाद में. लाल झंडे तले क्रां‍ति के लिए उन्‍होंने शायरी को ‘टूल’ बनाया. आजादी के संघर्ष और फिर हैदराबाद राज्य के निजाम के खिलाफ 1946-1947 के तेलंगाना विद्रोह में अपनी शायरी से क्रांति जगाने का काम किया. नर्म मिजाज शायर मखदूम मोहिउद्दीन निजाम की सेना का भी मुकाबला करने के लिए कलम के साथ बंदूक लिए भी उठाए घूमते थे.

कलम और बंदूक की धमक इतनी थी कि निजाम ने उन पर पांच हजार का इनाम घोषित किया था. इतना ही नहीं हैदराबाद के तत्कालीन निजाम मीर उस्मान अली खान ने लोगों को भड़काने का आरोप लगाकर मख़दूम को जान से मारने का आदेश दिया था.

कलम की ताकत से भी मखदूम ने निजाम को झुकने पर मजबूर कर दिया था. यह वाकया मखदूम के खास दोस्‍त मोहम्मद मेहदी ने उनके प्रशंसकों बताया है. उन दिनों हर स्कूल में पहले निजाम की शान में एक तराना पढ़ा जाता था. मखदूम ने इस तराने के खिलाफ एक शेर लिख दिया जो बहुत प्रसिद्द हो गया. लोगों ने निजाम को बताया कि मखदूम ने एक शेर लिखा है और जब जब निजाम की तारीफ में वह तराना गाया जाता है तो लोग मखदूम का शेर याद कर हंसने लगते हैं. अपनी हंसी उड़ती देख कर निजाम ने तराना गाने का नियम खत्‍म कर दिया.

मखदूम के तेलंगाना में किसानों के साथ किए गए संघर्ष को पर उर्दू के उपन्यासकार कृश्न चंदर ने ‘जब खेत जागे’ उपन्यास लिखा है. इस पर गौतम घोष ने तेलुगू में ‘मां भूमि’ फिल्म बनाई. विमल रॉय ने जब चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की मशहूर कहानी पर ‘उसने कहा था’ फिल्म बनाई तो उसमें मखदूम की नज्‍म ‘जाने वाले सिपाही से पूछो’ का उपयोग गीत के रूप में किया था. युद्ध के लिए सिपाही अपने परिवार को छोड़ कर जा रहा है. यह नज्‍म उसके जाने के समय के माहौल को बताती है.

जाने वाले सिपाही से पूछो
वो कहां जा रहा है

कौन दुखिया है जो गा रही है
भूखे बच्‍चों को बहला रही है
लाश जलने की बू आ रही है
ज़िंदगी है कि चिल्‍ला रही है.

कितने सहमे हुए हैं नजारे
कैसे डर डर के चलते हैं तारे
क्‍या जवानी का खून हो रहा है
सुर्ख हैं आंचलों के किनारे.

गिर रहा है सियाही का डेरा
हो रहा है मेरी जाँ सवेरा
ओ वतन छोड़कर जाने वाले
खुल गया इंकलाबी फरेरा.

‘सरमाया मखदूम’ पुस्‍तक में मखदूम मोहिउद्दीन के दोस्‍तों और करीबियों ने उनकी जीवन यात्रा पर अपने अनुभव लिखे हैं. ‘मखदूम मोहिउद्दीन: यादों में बसा आदमी’ शीर्षक से लेख में मुज्‍तबा हुसैन लिखते हैं कि खुद अपना मजाक उड़ाने में उनका कोई सानी नहीं था. मुज्‍तबा हुसैन उनके एक किस्से का जिक्र करते हैं.

एक बार मखदूम अलसुबह ओरिएंट होटल पहुंचे और बैरा से पूछा, निहारी है?
बैरा बोला, ‘नहीं है.‘
मखदूम ने पूछा, ‘आमलेट है?’
बैरा बोला, ‘नहीं.’
मखदूम ने फिर पूछा, ‘खाने के लिए कुछ है?’
बैरे ने जवाब दिया, ‘इस वक़्त तो कुछ नहीं है.‘
इस पर मखदूम बोले, ‘ये होटल है या हमारा घर कि यहां कुछ भी नहीं है!’

उम्र के आखिरी चरण में भी वे इंकलाबी थे. उनके इंतकाल से दो बरस पहले की बात है. हैदराबाद में एक बड़ा मुशायरा बरपा था. मखदूम डायस पर बैठे थे और एक शाइरा माइक पर कलाम सुना रही थी. डायस के नीचे एक तगड़ा शख्स नशे में धुत्त बैठा शायरा को घूरे जा रहा था. फिर उसके जी में ना जाने क्या आई कि उसने अचानक शायरा की तरफ छलांग लगाई. मखदूम ने भी चीते जैसी फुर्ती के साथ उस शख्स की तरफ़ छलांग लगाई. सेकंडों में उस शख्स को डायस से नीचे गिराया और उसके सीने पर सवार हो गए. मैं कैसे बताऊं कि बीस-पच्चीस बरस बाद मखदूम के अंदर छिपे हुए इंकलाबी को फिर एक बार देखकर कितनी खुशी हुई. लोगों ने मखदूम की इस अदा की दाद भी उसी तरह दी जिस तरह उनके कलाम पर दिया करते थे.

मखदूम अक्सर अपने परिचितों को जानबूझकर छेड़ते भी रहते थे. ऐसा ही एक किस्सा है पेंटर को दी चुनौती का. मुज्‍तबा हुसैन ने लिखा है कि एक रात सुलेमान अरीब के घर हैदराबाद के मशहूर आर्टिस्ट सईद बिन मुहम्मद आए हुए थे. मखदूम ने उनसे कहा कि शायरी पेंटिंग से कहीं ज्यादा ताकतवर माध्‍यम है.

सईद मुहम्मद ने जवाब दिया, पेंटिंग और शायरी का क्‍या मुकाबला? तुम जो चीज शायरी में नहीं कह सकते हो वह हम रंगों में कह देते हैं. तुम कहो तो सारी उर्दू शायरी को पेंट करके रख दूं.

मखदूम बोले, सारी उर्दू शायरी तो बहुत बड़ी बात है, तुम इस मामूली मिस्रे को ही पेंट कर दो. मिसरा था- ‘पंखुड़ी इक गुलाब की सी है.’

सईद बिन मुहम्मद बोले, ‘यह कौन सी मुश्किल बात है. मैं कैनवास पर गुलाब
की एक पंखुड़ी बना दूंगा.’

मखदूम बोले, ‘पंखुड़ी गुलाब की तो पेंट हो गई मगर ‘सी’ को कैसे पेंट करोगे?’ सईद बिन मुहम्मद बोले, ‘सी’ भी भला कोई पेंट करने की चीज है?’

मखदूम बोले, ‘मिस्रे की जान तो ‘सी’ ही है. सईद! आज मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा जब तक तुम ‘सी’ को पेंट नहीं करोगे.’

यह सुनते ही सईद बिन मुहम्मद वहां से भाग खड़े हुए.

जब हम मखदूम के बारे में पड़ताल करते हैं तो कई किस्‍से सुनाई देते हैं. एक और दिलचस्प वाकया है. मखदूम ने विधानसभा का चुनाव लड़ा था. इस चुनाव में उनके ही शेर का जबर्दस्‍त इस्‍तेमाल हुआ. शेर है:

हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो
चलो तो जमाने को अपने साथ ले के चलो.

चुनाव में प्रचार के दौरान इस शेर को बदल कर लिखा गया:

हयात ले के चलो, कायनात ले के चलो
चलो तो जनाने को अपने साथ ले के चलो.

यानी कि मतदान के दिन अपने साथ महिलाओं को भी लेकर चलो ताकि इस इंकलाबी शायर को ज्‍यादा से ज्‍यादा वोटों से जिताया जा सके. हैदराबाद के भारत विलय के बाद हुए चुनाव में वे जीत कर आंध्र प्रदेश विधानसभा में पहुंचे. मखदूम ने हैदराबाद में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी. वे कामरेड एसोसिएशन और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य थे. मखदूम मोहिउद्दीन की प्रकाशित कृतियों में उनके तीन काव्य-संग्रह ’सुर्ख सवेरा’, ’गुले-तर’ और ’बिसात्-ए-रक़्स’ प्रमुख हैं. ‘बिसात-ए-रक़्स’ के लिए उन्हें 1969 का साहित्य अकादमी अवार्ड भी प्राप्त हुआ है.

वे बेहद अनुशासति थे. सारा दिन पार्टी का काम करते थे और शाम का थोड़ा वक्त दोस्तों में गुजारते थे. जहां अहसास हुआ कि वक्त जाया हो रहा है, झट से उठ जाते थे और महफि‍ल से गायब. वो दुनिया से गए भी इसी तरह यानी एकदम से चल दिए. संदर्भ बताते हैं कि मखदूम मानते थे कि प्रेम और युद्ध की कविता अलग-अलग नहीं होती, आखिर हम युद्ध भी तो प्रेम के लिए करते हैं और बिना प्रेम के युद्ध भी नहीं कर सकते. शायद यही कारण है इस गैरमामूली फिलासफी को जीने वाला इंसान ने जीवन भर ही नहीं मौत के बाद भी खूब प्‍यार पाया. तारीख गवाह है कि 25 अगस्त, 1969 को जब मखदूम की मृत्यु हुई तो हजारों लोग दहाड़ें मार-मार कर रो रहे थे जैसे कि उनके परिवार के किसी अपने की मृत्यु हुई हो.

उनकी कुछ रचनाओं का जिक्र किए बगैर जयंती पर उन्‍हें याद करना अधूरा ही रहेगा.

आप की याद आती रही रात भर
चश्मे नम मुस्कुराती रही रात भर.

रात भर दर्द की शम्मा जलती रही
गम की लौ थरथराती रही रात भर.

बांसुरी की सुरीली सुहानी सदा
याद बन बन के आती रही रात भर.

याद के चांद दिल में उतरते रहे
चाँदनी जगमगाती रही रात भर.

कोई दीवाना गलियों में फिरता रहा
कोई आवाज आती रही रात भर.

फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बरात फूलों की.

फूल के हार फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की.

आप का साथ साथ फूलों का
आप की बात बात फूलों की.

नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं
मिल रही है हयात फूलों की.

कौन देता है जान फूलों पर
कौन करता है बात फूलों की.

इश्क के शोले को भड़काओ कि कुछ रात कटे
दिल के अंगारे को दहकाओ कि कुछ रात कटे.

दीप जलते हैं दिलों में कि चिता जलती है
अब की दीवाली में देखेंगे कि क्या होता है.

एक झोंका तिरे पहलू का महकती हुई याद
एक लम्हा तिरी दिलदारी का क्या क्या न बना.

(4 फरवरी 2023 को न्‍यूज 18 में प्रकाशित ब्‍लॉग)