Wednesday, August 17, 2022

अमृतलाल नागर: शरतचंद्र ने ऐसा क्‍या कहा कि बदल गई जिंदगी

पादप जगत के बारे में यह उक्ति चर्चित हो गई है कि बरगद के नीचे कोई दूसरा पेड़ नहीं पनप सकता है. अब प्रकृति के बारे में यह नियम कितना उचित है, यह तो नहीं कह सकते मगर हमारे जीवन में कई उदाहरण हैं जिनमें बरगद के नीचे दूसरा बरगद बनते और विकसित होते देखा है. इन उदाहरणों में एक जो सबसे अधिक जाना पहचाना नाम है वह है ‘मानस के हंस’ और ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ के लेखक अमृतलाल नागर. पद्म विभूषण नागर जी मुंशी प्रेमचंद, कथाकार शरतचंद्र, महाप्राण निराला, जयशंकर प्रसाद जैसे रचनाकारों के सानिध्‍य में अद्वितीय लेखक बने. ऐसे रचनाकार जिनकी गिनती हिंदी साहित्य के गद्य शिल्पियों में प्रेमचंद के बाद होती है.


उन्‍हीं अमृतलाल नागर की आज जयंती है. नागर जी का जन्म 17 अगस्त 1916 को आगरा के गोकुलपुरा में हुआ था. 55 वर्ष के लेखनकाल में उन्होंने बेहद विस्तृत और वैविध्यपूर्ण साहित्य रचा है. बाल साहित्य, कविताएं, कहानियां, उपन्‍यास, व्‍यंग्‍य, अनुवाद, संपादन, संस्मरण नाटक, रेडियो नाटक व फीचर, साहित्‍य की ऐसी कौन सी विधा जो नागर जी ने नहीं रची. इस रचना प्रक्रिया की शुरुआत 1932 में हुई. पहले मेघराज इंद्र के नाम से कविताएं लिखीं. ‘तस्लीम लखनवी’ नाम से व्यंग्यपूर्ण स्केच व निबंध लिखे. कहानियां मूल नाम अमृतलाल नागर से ही लिखीं. पहला कहानी संग्रह, ‘वाटिका’ वर्ष 1935 में प्रकाशित हुआ था. 1956 में प्रकाशित, ‘बूंद और समुद्र’ बड़ा उपन्यास है जो लखनऊ के चौक मोहल्लों और गलियों के किरदारों से रूबरू करवाता है. ‘अमृत और विष’ 1965 में आत्मकथा शैली में लिखा गया जिसे 1967 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्‍त हुआ है. ‘एकदा नैमिषारण्य’ में भारत के पौराणिक और ऐतिहासिक अतीत के दर्शन होते हैं. 1972 में आया ‘मानस का हंस’ और 1977 में प्रकाशित ‘नाच्‍यौ बहुत गोपाल’ नागर जी का प्रतिनिधि साहित्‍य कहा जाता है. ‘मानस का हंस’ महकवि तुलसीदास की जीवनी है. ‘नाच्यौ बहुत गोपाल’ में सफाईकर्मी समाज और नारी शोषण की संवेदनशील गाथा है. 1980 में रचा गया ‘खंजन नयन’ उपन्‍यास भक्‍त कवि सूरदास की जीवनी पर आधारित हैं.


इस कृतित्‍व पर पाठकों ने अपना स्‍नेह ही न्‍योछावर नहीं किया बल्कि अनेकों सम्‍मान प्रदान कर लेखक के प्रति अपनी कृतज्ञता व्‍यक्‍त की है. इन सम्‍मानों में ‘मानस का हंस’ पर मध्य प्रदेश सरकार ने अखिल भारतीय वीरसिंह देव पुरस्कार, वर्ष 1985 का उ.प्र. हिंदी संस्थान का सर्वोच्च भारत भारती सम्मान तथा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण सम्मान प्रमुख हैं.


अमृतलाल नागर ने काव्‍य के साथ रचना कार्य आरंभ किया था, अत: पद्य शैली होना स्‍वाभाविक है. मगर पद्य शैली में लिखे जा रहे गद्य की दिशा बदलने का प्रसंग भी रोचक है. जब हम अमृतलाल नागर जी के जीवन के बारे में पड़ताल करते हैं तो पता चलता है कि उन्‍होंने अपना पहला कहानी संग्रह ‘वाटिका’ मुंशी प्रेमचंद को भेजा था. जवाब में प्रेमचंद ने उन्हें लिखा कि वाटिका की कहानियां गद्यकाव्य जैसी चीज हैं. मैं रियलिस्टिक कहानियां चाहता हूँ जिनका आधार जीवन हो, जिनसे जीवन पर कुछ प्रकाश पड़ सके. मैंने वाटिका के दो-चार फूल सूंघे, अच्छी खुशबू है.


लेखन के शुरुआत में ही कथा सम्राट प्रेमचंद से मिली इस सलाह को नागर जी ने शिरोधार्य किया. यहीं से उनके लेखन की दिशा बदल गई. अगली रचनाओं में ‘गद्यकाव्य जैसी चीज’ संशोधित होती गई और उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार बढ़ते चले गए. स्‍वयं नागरजी ने इस बात को स्‍वीकार करते हुए लिखा है कि प्रेमचंद के इस वाक्य ने एक तरह से मेरी जन्मपत्री ही बदल दी. वे चिंतन और लेखन में मोड़ लाने का एक कारण बने!


नागर जी ने बांग्‍ला साहित्‍यकार शरतचंद्र के प्रति अपने मोह को अक्‍सर व्‍यक्‍त किया है. शरतचंद्र से मुलाकात और उनसे मिली सलाह ने भी नागर जी के साहित्‍य को नई दिशा ही है. शरत साहित्‍य पढ़ने के लिए ही नागर जी ने बांग्‍ला सीखी थी. जब वे शरत जी ने मिलने गए तो वह मुलाकात नागर जी की साहित्‍य यात्रा में मील का पत्‍थर बनी. संस्मरण “शरत के साथ बिताया कुछ समय” में स्‍वयं नागर जी लिखते हैं :

उनके दर्शन करने मैं कलकत्‍ता गया. परिचय होने के बाद, दूसरे दिन जब मैं उनसे मिलने गया, मुझे ऐसा मालूम पड़ा जैसे हम वर्षों से एक-दूसरे को बहुत अच्‍छी तरह से जानते हैं. इधर-उधर की बहुत-सी बातें होने के बाद एकाएक वह मुझसे पूछ बैठे, ”क्‍या तुमने यह निश्‍चय कर लिया है कि आजन्‍म साहित्‍य-सेवा करते रहोगे?”


मैंने नम्रतापूर्वक उत्‍तर दिया, ”जी हां.”


वे बोले, ”ठीक है. केवल इस बात का ध्‍यान रखना कि जो कुछ भी लिखो, वह अधिकतर तुम्‍हारे अपने ही अनुभवों के आधार पर हो. व्‍यर्थ की कल्‍पना के चक्‍कर में कभी न पड़ना.”


आरामकुर्सी पर इत्‍मीनान के साथ लेटे हुए, सटक के दो-तीन कश खींचने के बाद वह फिर कहने लगे, ”कॉलेज में मुझे एक प्रोफेसर महोदय पढ़ाते थे. वह सुप्रसिद्ध समालोचक भी थे. कॉलेज से बाहर आकर मैंने ‘देवदास’, ‘परिणीता’, ‘बिंदूरछेले’ (बिंदू का लड़का) आदि कुछ चीजें लिखीं. लोगों ने उन्‍हें पसंद भी किया. एक दिन मार्ग में मुझे वे प्रोफेसर महोदय मिले. उन्‍होंने मुझसे कहा, ‘शरत, मैंने सुना है, तुम बहुत अच्‍छा लिख लेते हो. लेकिन भाई, तुमने अपनी कोई भी रचना मुझे नहीं दिखलाई.”


शरत विनयपूर्वक बोले व पुस्तकें इस योग्य नहीं कि आप जैसे पंडित उन्हें पढ़े.” तब प्रोफेसर बोले और पुस्तकें तो मैं कहीं से लेकर पढ़ लूंगा, पर चूंकि अब तुम लेखक हो गए हो इसलिए मेरी तीन बातें ध्यान में रखना. एक तो जो लिखना सो अपने अनुभव से लिखना. दूसरे अपनी रचना को लिखने के बाद तुरंत ही किसी को दिखाने सुनाने या सलाह लेने की आदत मत डालना. कहानी लिखकर तीन महीने तक अपनी दराज में डाल दो और फिर ठंडे मन से स्वयं ही उसमें सुधार करते रहो. इससे जब यथेष्ठ संतोष मिल जाए, तभी अपनी रचना को दूसरों के सामने लाओ.” प्रोफेसर साहब का तीसरा आदेश यह था कि अपनी कलम से किसी की निंदा मत करो.


अपने गुरु की ये तीन बातें बताते हुए शरत जी ने नागर जी को कहा कि यदि तुम्हारे पास चार पैसे हो तो तीन पैसे जमा करो और एक खर्च. यदि अधिक खर्चीले हो तो दो जमा करो और दो खर्च. यदि बेहद खर्चीले हो तो एक जमा करो और तीन खर्च. इसके बाद भी यदि तुम्हारा मन न माने तो चारों खर्च कर डालो, मगर फिर पांचवां पैसा किसी से उधर मत मांगो. उधार की वृति लेखक की आत्मा को हीन और मलीन कर देती है.


नागर जी लिखते हैं कि मैं यह तो नहीं कह सकता कि इन चारों उपदेशों को मैं शत-प्रतिशत अमल में ला सकता हूं, फिर भी यह अवश्य कह सकता हूं कि प्रायः नब्बे फीसदी मेरे आचरण पर इन उपदेशों का प्रभाव पड़ा है.


टुकड़े-टुकड़े दास्‍तान में नागर जी लेखकों के लिए एक सूत्र देते हैं कि दूसरों की रचनाएं, विशेष रूप से लोकमान्य लेखकों की रचनाएं पढ़ने से लेखक को अपनी शक्ति और कमजोरी का पता लगता है. यह हर हालत में बहुत ही अच्छी आदत है. इसने एक विचित्र तड़प भी मेरे मन में जगाई. बार-बार यह अनुभव होता था कि विदेशी साहित्य तो अंग्रेजी के माध्यम से बराबर हमारी दृष्टि में पड़ता रहता है, किंतु देशी साहित्य के संबंध में हम कुछ नहीं जान पाते. उन दिनों हिंदीवालों में बांग्ला पढ़ने का चलन तो किसी हद तक था, लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य हमारी जानकारी में प्रायः नहीं के बराबर ही था. इसी तड़प में मैंने अपने देश की चार भाषाएं सीखी. आज तो दावे से कह सकता हूंं कि लेखक के रूप में आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए मेरी इस आदत ने मेरा बड़ा ही उपकार किया है. विभिन्न वातावरणों को देखना, घूमना भटकना, बहुश्रुत और बहुपठित होना भी मेरे बड़े काम आता है. यह मेरा अनुभवजन्य मत है कि मैदान मैं लड़नेवाले सिपाही को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए जिस प्रकार नित्य की कवायद बहुत आवश्यक होती है, उसी प्रकार लेखक के लिए उपरोक्त अभ्यास भी नितांत आवश्यक है. केवल साहित्यिक बातावरण ही में रहनेवाला कथा लेखक मेरे विचार में घाटे में रहता है. उसे निस्संकोच विविध वातावरणों से अपना सीधा संपर्क स्थापित करना ही चाहिए.


कितना ही कारगर सूत्र दिया है नागर जी ने. बेहतर लेखक बनने के लिए यथार्थवादी लेखन जितना आवश्‍यक है, उतना ही आवश्‍यक है श्रेष्‍ठ और लोक मान्‍य साहित्‍य को पढ़ा जाना.

Sunday, August 7, 2022

किस सत्‍य को गुरुदेव ने तो माना, पर आइंस्‍टीन ने नहीं

 

विज्ञान और अध्‍यात्‍म हमारी प्रकृति व जीवन को समझने की दो पद्धतियां है. ऐसी प्रक्रिया जिसमें हम अध्‍यात्‍म को विज्ञान कहते हैं तो विज्ञान का अपना एक अध्‍यात्‍म होता है. क्‍या दोनों, विज्ञान और अध्‍यात्‍म, में कोई साम्‍य है या दोनों में कोई विरोध का सूत्र भी है? इस पर अपने अपने तर्क हो सकते हैं मगर क्‍या हो जब विज्ञान और दर्शन के दो शीर्ष पुरूष यानि अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन और गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर इस पर बात करें? इन दोनों की मुलाकात हो और बात हो तो उसे दुनिया की चंद सबसे महत्‍वपूर्ण मुलाकात और चर्चा तो होना ही था.


इस मुलाकात का जिक्र आज इसलिए क्‍योंकि आज भारत के महान साहित्यकार, नाटककार, मानवतावादी और दार्शनिक, कला मनीषी गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर की पुण्‍यतिथि है. 7 मई, 1861 को कलकत्ता में जन्‍में रबींद्रनाथ टैगोर को उनकी महान रचना ‘गीतांजलि’ के लिए 1913 में साहित्य का नोबल पुरस्कार दिया गया था. वे नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय हैं. गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर को उम्र के बावनवें साल (1913) में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो आइंस्टाइन को उम्र के तैतालिसवें साल (1922) में भौतिक विज्ञान के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ.


दो नोबल पुरस्‍कार विजेताओं यानि अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन और गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर के बीच लगातार चिट्ठियों के जरिए संवाद होता रहा लेकिन पूरी दुनिया ने उस पल को सबसे ज्यादा तरजीह दी जब विज्ञान और दर्शन के दो ध्रुवों की मुलाकात व चर्चा हुई थी. 14 जुलाई 1930 वह ऐतिहासिक दिन था जब आइंस्टीन के बर्लिन स्थित निवास पर रबींद्रनाथ टैगोर पहुंचे थे और दोनों के बीच विज्ञान और भारतीय अध्‍यात्‍म परंपरा पर चर्चा हुई थी. इस चर्चा के केंद्र में विज्ञान, सौंदर्य, चेतना और दर्शन की अवधारणा थी. दिलचस्प बात यह है कि जब वे मिले थे तब टैगोर जर्मन नहीं जानते थे और आइंस्टीन की अंग्रेजी इतनी कमजोर थी कि बातचीत नहीं की जा सकती थी. इसलिए बातचीत के लिए दुभाषियों का सहारा लिया गया. बात इतनी गंभीर और महीन थी कि गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर और आइंस्टीन उस चर्चा की रिकॉर्ड से खुश नहीं थे, क्योंकि अनुवाद काफी कमजोर थे. पहले उन्होंने खुद अपने अपने हिस्सों को दुरूस्‍त किया उसके बाद इस बातचीत को सार्वजनिक किया गया.


जानते हैं, वह संवाद आखिर था क्‍या. संवाद की शुरुआत गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर ने की थी.


टैगोर: आप गणितज्ञों के साथ दो प्राचीन इकाई, समय और अंतरिक्ष की खोज में व्यस्त हैं. जबकि मैं इस देश (जर्मनी) में मनुष्य की वास्तविक दुनिया और ब्रह्माण्ड की यथार्थता पर भाषण दे रहा हूं.


आइंस्टीन: क्या आप दुनिया से अलग दिव्य सत्‍ता में विश्वास करते हैं?


टैगोर: अलग नहीं है. मनुष्य का अनंत व्यक्तित्व ब्रह्मांड को समझता है. ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है जिसे मानव व्यक्तित्व द्वारा समाहित नहीं किया जा सकता है. यह साबित करता है कि ब्रह्मांड का सत्य वास्‍तव में मानव का सत्य है.


आइंस्टीन: ब्रह्मांड की प्रकृति के बारे में दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं – एकता के रूप में दुनिया मानवता पर निर्भर है और यथार्थ रूप में दुनिया मानव कारकों से स्वतंत्र है.


टैगोर: जब हमारे ब्रह्मांड का मनुष्यों के साथ सामंजस्य होता है, तो हम इसे सत्य के रूप में जानते हैं, हम इसके सौंदर्य को अनुभूत करते हैं.


आइंस्टीन: यह ब्रह्मांड की पूरी तरह से एक मानव अवधारणा है.


टैगोर: दुनिया मानव का संसार है – इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी वैज्ञानिक मानव का ही है. इसलिए, हमारे अलावा कोई और दुनिया नहीं है; यह एक सापेक्ष दुनिया है, जिसकी वास्तविकता हमारी अपनी चेतना पर निर्भर है.


आइंस्टीन: यह मानव की अनुभूति है.


टैगोर: हां, एक शाश्वत इकाई. हमें अपनी भावनाओं और क्रियाकलापों के माध्यम से इसका अनुभव करना होगा. हम अपनी व्यक्तिगत सीमाओं में उस परम मानव की अनुभूति करते हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है. विज्ञान उस से संबंधित है जो व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं है; यह सत्य की व्यक्तित्वहीन मानव दुनिया है. धर्म इस सत्य को अनुभव करता है और उन्हें हमारी गहरी आवश्‍यकताओं के साथ जोड़ता है. इससे सत्य की हमारी व्यक्तिगत चेतना सार्वभौमिक महत्व प्राप्त करती है. धर्म सत्य को मूल्यवान बनाता है और हम इसके साथ अपने साम्‍य के माध्यम से सत्य को अच्छे रूप में जानते हैं.


आइंस्टीन: सत्य, या सौंदर्य, मनुष्य से स्वतंत्र नहीं है?


टैगोर: नहीं, मैं ऐसा नहीं कहता.


आइंस्टाइन: अगर इंसान नहीं होंगे तो अपोलो बेल्वेडियर (एक प्रख्‍यात रोमन मूर्ति) सुंदर नहीं होगा?


टैगोर: नहीं!


आइंस्टीन: मैं सुंदरता की इस अवधारणा से सहमत हूं, लेकिन सत्य के संबंध में ऐसा नहीं है.


टैगोर: क्यों नहीं? इंसान के माध्यम से सत्य का अनुभव होता है.


आइंस्टीन: मैं सिद्ध नहीं कर सकता कि मेरी अवधारणा सही है, लेकिन वह मेरा धर्म है.


टैगोर: सुंदरता पूर्ण सामंजस्य की आदर्श स्थिति है जिसका सार्वभौमिक अस्तित्व है; सत्य सार्वभौमिक मस्तिष्‍क की सही समझ है. हम मनुष्‍य इसे अपनी गलतियों और त्रुटियों, अपने संचित अनुभवों और अपनी चेतना के माध्यम से प्राप्त करते हैं. अन्यथा हम सत्‍य कैसे जानते?


आइंस्टीन: मैं साबित नहीं कर सकता, लेकिन मैं पाइथागोरियन तर्क में विश्वास करता हूं जो कहता है कि सत्य मनुष्यों से स्वतंत्र है. यही निरंतरता के तर्क की समस्या है.


टैगोर: सत्य, जो सार्वभौमिक है, अनिवार्य रूप से मानवीय होना चाहिए; अन्यथा, हम मानव सत्य के रूप में जो भी अनुभव करते हैं वह कभी भी सत्य नहीं कहा जा सकता है. कम से कम, वह सच्चाई जिसे वैज्ञानिक रूप में वर्णित किया गया है और जिसे केवल तर्क की प्रक्रिया के माध्यम से जाना जा सकता है – दूसरे शब्दों में, मानव के विचारों द्वारा. भारतीय दर्शन के अनुसार ‘एक ब्राह्मण है, जो परम सत्य है, जिसे इंसानी दिमाग की तर्क शक्ति से नहीं जाना जा सकता न ही उसे शब्दों के माध्‍यम से व्‍यक्‍त किया जा सकता है. उसके बारे तभी जाना जा सकता है जब इंसान खुद को अनंत में समाहित या विलीन कर ले और यह केवल मेडिटेशन यानि ध्यान से ही हो सकता है. लेकिन यह सच्चाई विज्ञान की नहीं हो सकती. सत्य की प्रकृति जिस पर हम चर्चा कर रहे हैं वह एक उपस्थिति है. यह कहना कि सत्य वह है जो मानव मन में सच प्रतीत होता है, माया या भ्रम कहा जा सकता है.


आइंस्टीन : यह किसी व्यक्ति का भ्रम नहीं है, बल्कि प्रजातियों (स्पीशीज) का है.


टैगोर : प्रजाति (स्पीशीज) भी एक तरह की इकाई है, यह भी मानवता के अनुभव के जरिए जुड़ी हुई है. इसलिए सभी मानव मस्तिष्‍क एक समय पर एक ही सत्य का अनुभव करते हैं. भारतीय और यूरोपीय मस्तिष्‍क समान स्‍तर पर मिलते हैं.


आइंस्टीन: जर्मन भाषा में स्पीशीज (प्रजाति) शब्द का प्रयोग संपूर्ण मानव जाति के लिए किया गया है, यहां तक कि इसमें बंदर और मेढ़कों तक को शामिल किया गया है. ऐसे में क्या सत्य हमारी चेतना से अलग है?


टैगोर:  हम जिसे सत्य कहते हैं वो वास्तविकता के वस्‍तुपरक और विषयपरक पहलुओं के बीच विवेकपूर्ण साम्य में अंतर्निहित है और ये दोनों ही परम मानव से जुड़े हैं.


आइंस्टीन: अपने दैनिक जीवन में हम कई ऐसे काम अपने दिमाग द्वारा करते हैं जिसके लिए हम जिम्मेदार नहीं होते, हमारा दिमाग बाहर की वास्‍तविकता को देखकर भी उससे अलग निरपेक्ष रहकर काम करता है. उदाहरण के लिए इस घर में कोई न भी हो तब भी यह टेबल यहीं बनी रहेगी.


टैगोर : हां, ये हमारे मानवीय दिमाग से बाहर है लेकिन यह यूनिवर्सल माइंड (परम मस्तिष्‍क) से बाहर नहीं है. टेबल वो चीज है जो हमारी चेतना द्वारा दिखाई देती है.


आइंस्टीन : अगर इस घर में कोई नहीं है, तब भी यह टेबल वहीं रहेगी, लेकिन आपके ही विचारों से यह बात पहले ही अनुचित है. क्योंकि हम यह व्याख्या नहीं कर सकते कि इसका अर्थ क्या है कि हमसे निरपेक्ष रहकर वह टेबल वहीं रखी हुई है. सत्य के अस्तित्व की व्याख्या मानव जाति से परे जा कर न तो की जा सकती है और न ही इसे साबित किया जा सकता है. लेकिन यह एक ऐसा विश्वास है जिसे कोई भी फिर चाहे वो छोटे से छोटा जीव ही क्यों न हो छोड़ना नहीं चाहता. हमने सत्य को सुपरह्यूमन ऑब्जेक्टिविटी के साथ प्रतिस्थापित कर दिया है. यह हमारे लिए परम आवश्यक है, इसका कोई विकल्प नहीं है. यह वास्तविक्ता हमारे अस्तित्व, हमारे अनुभव और हमारे मस्तिष्‍क से निरपेक्ष और स्‍वतंत्र है. हालांकि हम यह नहीं कह सकते कि इसका अर्थ क्या है.


टैगोर:  किसी भी स्थिति में अगर कोई ऐसा सत्य है जिसका मानव जाति से कोई सरोकार नहीं है, तो हमारे लिए यह पूरी तरह से अस्तित्वहीन है.


आइंस्टीन :  ऐसे में तो मैं आपसे भी ज्यादा धार्मिक और आस्थावान हो जाऊंगा.


टैगोर: स्‍वयं के व्यक्तित्व में उस सार्वभौम आत्मा यानि परमात्‍मा के साथ सामंजस्य, एक लय स्‍थापित करना ही मेरा धर्म है.


गुरुदेव के इस वाक्‍य के साथ यह चर्चा खत्‍म होती है. दोनों के बीच हुई चर्चा का केंद्र ‘सत्‍य’ का अन्‍वेषण था. सत्य और सौंदर्य का अस्तित्व क्या मानव से अलग, मानवरहित हो सकता है? गुरुदेव के विचार सुनने के दौरान आइंस्टीन ने कहा था कि ‘आपकी बातें पूरी तरह से मानवीय धारणा है, पर विज्ञान इससे अलग हटकर सोचता है.’


गुरुदेव ने उत्‍तर दिया था कि ‘प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन से मिल कर बनने वाली चीज के बीच में एक खाली जगह होती है, जो इसे बांध कर रखती है. ठीक इसी तरह ‘मानवीय संबंध व्यक्तियों को एक-दूसरे से जोड़े रखते हैं.’ आइंस्टीन कहते हैं कि ‘मैं मानवीयता को लेकर आपसे सहमत हूं, पर जिसे आप सत्य मनाते हैं, उसे मैं सच नहीं मानता.’


मानव और विज्ञान पर दोनों की बहस आगे भी जारी रही और दोनों ही अपनी-अपनी बात को सही बताते रहे. गुरुदेव रबींद्रनाथ का कहना था कि ‘सत्य और सौंदर्य के बारे में मानव के बिना सोचा ही नहीं जा सकता है.’ आइंस्टाइन सौंदर्य के बारे में गुरुदेव की बात से सहमत हुए मगर सत्य के बारे में उनकी स्‍थापना का अमान्य करते हैं. दोनों दिग्गज अपने-अपने विश्वासों पर कायम रहे.