Monday, December 31, 2012

बेटी को तो बेटा खूब कहा, कभी बेटे को लाड़ से बेटी कह कर तो देखिए...


हमारे देश में गर्भ से ही लड़कियों के साथ भेदभाव शुरू हो जाता है। हम कहते जरूर हैं कि बच्चियां देवी का रूप  होती है लेकिन जब वह हमारे घर में आने वाली होती है तो उसकी राह रोक देते हैं। डॉक्टर गर्भ परीक्षण करते हैं और कन्या भ्रूण होने पर उसे गिरा देते हैं। वे कहते हैं कि उनका यह काम नहीं है लेकिन वे तो ऐसा समाज की मांग को पूरा करने के लिए करते हैं! वही, अर्थशास्त्र का मांग और पूर्ति का नियम। खास बात तो यह है कि यह काम पढ़े लिखे तबके में शहरी इलाकों में सबसे ज्यादा होता है। जहां जांच के लिए सोनोग्राफी मशीन जितनी ज्यादा है, उस इलाके में लिंगानुपात का अंतर उतना ज्यादा है। जन्म से लेकर मौत तक कन्या के साथ भेदभाव की मूल वजह हमारी सोच और यहां जमी पुरुषवादी सोच ही है। हम कहते भले ही हैं कि महिला ही महिला की दुश्मन है, जबकि महिला में यह सोच पुरुष अहम् को पूरा करने प्रतिस्पर्धा  और अपना महत्व कम होने के डर की वजह से पनपती है। सास केवल इसलिए बहू की राह में कांटे बिछाने लगती है कि उसे बेटे और घर पर अपना अधिकार  खोने का डर लगने लगता है। बहू का अपडेट होने भी इसलिए अखरता है और उसे कमतर व नीचा दिखाने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। 
कितनी बड़ी विडंबना है कि पढ़े लिखे पति के लिए कई सालों के रिश्ते के बाद भी पत्नी की गाइनिक प्राब्लम 'लेडिस की बीमारी' रहती है जिसके बारे में वह कुछ नहीं जानता। यह अंतर वैसा ही जैसे लाड़ से बेटी को बेटा कहने वाला समाज कभी बेटे को प्यार से बेटी नहीं पुकारता क्योंकि यह पुरुषवादी सोच को चोट है। 
दिल्ली में गैंगरेप के बाद देश में ऐसे ही कई सवाल उठ खड़े हुए हैं और अलग-अलग स्तर पर इनके जवाब खोजे जा रहे  हैं। बड़ वर्ग है जो यह मानता है कि बलात्कार के बाद फांसी या कोई सख्त सजा एकदम से ऐसी घटनाओं को रोक नहीं देगी। इन घटनाओं खासकर छेड़छाड़ से लेकर रोजाना के भेदभाव को रोकने लिए समाज की सोच में परिवर्तन जरूरी है। इन्हीं बातों को लेकर  भोपाल में संस्था सरोकार और पापुलेशन फर्स्ट ने दो दिन की कार्यशाला में समाज में जेंडर के मसलों पर बात की। महिला एवं बाल विकास विभाग आयुक्त डॉ मनोहर अगनानी ने यहां इस बात को रेखांकित किया कि हम गरीबों और निरक्षरों को पिछड़ा मानते हैं लेकिन असल में लिंग भेदभाव करने में वे पिछड़े हैं और पढ़ा लिखा समाज आगे। उन्होंने कहा कि जब हम  यह कहते हैं कि बेटी को जन्म नहीं लेने दोगे तो बहू कहां से लाओगे तो भी हम लड़कियों का अधिकार छिन रहे होते हैं। उन्हें बेटा या किसी भूमिका का पर्याय ही माना जाता है। कभी स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में नहीं देखा जाता। तभी तो अच्छा काम करने पर शाबाशी में कहा जाता है कि तू तो मेरा बेटा है। कभी किसी लड़के के घर में अच्छा काम करने पर कह कर देखिए कि तू तो मेरी बेटी है। बखेड़ा खड़ा हो जाएगा। यह कैसा पैमाना है कि बेटी को बेटा कहना उसका पारितोषिक माना जाता है और  पुरूष को स्त्री संबोधन देना उसकी मर्दानगी पर चोट?
यह सोच हमारे भीतर कितनी गहरी जमी है, इसका उदाहरण वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान ने दिया। उन्होंने बताया कि उनके एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र अस्पताल में मिले। पूछने पर बताया कि उनकी श्रीमती को कोई 'लेडिज की बीमारी' है इसलिए वह भर्ती हैं। सवाल यह है कि जिसे बेटर हाफ कहा जाता है और जिसके साथ 15-20 सालों का नाता रहा, पति उसी पत्नी की बीमारी से अनजान है। उसने कभी यह जानने की कोशिश ही नहीं कि पत्नी को समस्या क्या है। सवाल यह भी है कि पत्नी के मन की बात भले मत जानो लेकिन जिस शरीर की जरूरत महसूस होती है कभी उसकी तकलीफों को भी तो समझो। 
महिलाओं का स्तर जब तक हमारी सोच में नहीं बदलेगा तब तक समाज में उनकी स्थिति नहीं बदलेगी। न किसी कानून से और न किसी सख्त सजा से। कहां-कहां और किस-किस को हम सजा देंगे? जब लड़कियां अपने साथ हो रहे अपराधों  को गिनाना शुरू कर देंगी तो हममें से कोई नहीं बचेगा। 

Wednesday, December 19, 2012

हादसों के बीच अमेरिका जैसा आपदा प्रबंधन यहां भी दिखेगा?


अमेरिका के कनेक्टिकट के न्यूटाउन शहर के एक स्कूल में बरसाई गईं गोलियों के कारण 18 बच्चों की मौत ने पूरी दुनिया को हिला दिया। इस जघन्य हत्याकांड का एक मानवीय पक्ष भी था। स्कूल के शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों ने सतर्कता, कर्मठता और मानवता की अनूठी मिसालें पेश कीं। इसी वजह से स्कूल के कई बच्चों की जान बचाई जा सकी। यह सवाल उठना अस्वावाभिक नहीं है कि यदि ऐसा कोई  दुर्भाग्यपूर्ण हादसा अगर हमारे देश में हो तो क्या यहां भी मानवीय आपदा प्रबंध्ान का वैसा ही कौशल देखने को मिलेगा?
अमेरिका के सैंडी हुक एलिमेंट्री स्कूल की प्राचार्या डॉन हॉकस्प्रंग जब एक मीटिंग के बाद कमरे से निकलीं तो उन्होंने एक 20 वर्षीय युवक को हाथों में बंदूक लिए देखा। वे उसका इरादा भांप चुकी थी। उन्होंने तुरंत अपने साथी शिक्षकों को बाहर न निकलने के लिए कहा। वे दरवाजा बंद करने की चेतावनी दे कर मुड़ी ही थी कि उन्हें गोली मार दी गई। प्राचार्य ने खुद भागने की जगह पहले अपने साथियों की जान बचाने के लिए उन्हें चेतावनी देना जरूरी समझा। स्कूल की शिक्षिका विक्टोरिया सोटो ने बच्चों को बचाने के लिए हमलावर से झूठ बोला कि बच्चे जिम में हैं, जबकि उन्होंने छात्रों को बाथरूम में छिपा दिया था। इस तरह कई बच्चों की जानें तो बच गईं, लेकिन वो खुद को नहीं बचा सकीं।
अमेरिकी मीडिया ने खुलासा किया है कि स्कूल के ही एक प्रमुख अध्ािकारी ने गोलियों की बरसात के बीच सभी कक्षाओं में जा कर यह देखा कि वहां के दरवाजे बंद है या नहीं। स्कूल के पुस्तकालय में भी कई बच्चे थे। वहां के कर्मचारियों को स्कूल के आध्ाुनिक पब्लिक इंफर्मेशन सिस्टम से जानकारी मिली थी कि स्कूल परिसर में एक बंदूकधारी घुस आया है। कर्मचारियों ने हड़बड़ी में कोई गलत कदम उठाने की जगह समझदारी से काम लिया और छात्रों को पुस्तकालय के अंदर ही सुरक्षित रखने की व्यवस्था की।
दिखने में ये प्रयास छोटे लगें, लेकिन इन छोटी-छोटी साहसी घटनाओं ने इस हादसे के हताहतों की संख्या को कम रखा। मुंबई पर 26/11 को हुए हमले भी कुछ ऐसे ही साहस के कारनामे सामने आए थे लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे यहां ऐसा कोई हादसा हो जाए तो हम ज्यादा जान बचा पाने में सक्षम हैं? क्या हमारे यहां सतर्कता का यह स्तर देखने को मिलेगा? इस सवाल को उठाने के पीछे मेरा मकसद किसी व्यक्ति की सूझबूझ या कर्मठता पर सवाल उठाने का नहीं बल्कि इस सवाल के पीछे उस सच को उजागर करने की कोशिश है, जो हमारी व्यवस्था को पंगु बनाता है। मसलन, उन परिवारों के घाव अभी तक हरे हैं जिनके बच्चों की दो माह पहले भोपाल के कमला नेहरू अस्पताल में गलत इंजेक्शन लगाए जाने से मौत हो गई थी। अक्टूबर में कोलकाता के सरकारी अस्पताल में 13 बच्चों की मौत होती है तो वहीं के बर्दमान मेडिकल कॉलेज में उसी हफ्ते 12 नवजात दम तोड़ देते हैं।
लापरवाही का यह स्तर बार-बार सामने आता है। हालांकि अमेरिका और भारत की परिस्थितियों में बड़ा अंतर है। वहां एक हमलावर बंदूक लेकर स्कूल में घुस जाता है जबकि भारत में बच्चों की जान लेने के लिए बेटे की चाह, हमारे अस्पतालों का लचर तंत्र, जर्जर स्कूल भवन, कंडम स्कूल वाहन, तेज रफ्तार में गाड़ी चलाने के शौकीन स्कूल बस और वेन चालक जैसे कारण ही काफी हैं । मनोचिकित्सक मानते हैं कि भारत में भी तनाव का स्तर बढ़ रहा है और यह लोगों को आक्रामक और हिंसक बना रहा है। स्कूल के शिक्षक भी इससे अछूते नहीं हैं । यही कारण है कि स्कूलों में बच्चों को मौत होने जाने तक बेरहमी से पीटा जाता है।
सुधार की तमाम कोशिशें तंत्र की चौखट पर जा कर दम तोड़ देती हैं। अमेरिका के एक स्कूल में हादसे की क्या बात करें, हमने तो विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड से भी कोई सबक नहीं लिया है। गैस कांड के बाद भोपाल में आपदा प्रबंधन संस्थान स्थापित किया गया जो मप्र सहित सात से ज्यादा राज्यों में आपदा प्रबंधन की सलाह और सुझाव देता है लेकिन इस संस्थान की कई अनुशंसाएं  कभी मानी नहीं गईं। जैसे, कारखानों और सावर्जनिक दफ्तरों के कर्मचारियों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए लेकिन किसी को भी प्रशिक्षण नहीं दिया गया। पिछले दिनों आगजनी की घटनाओं के बाद जब भोपाल नगर निगम ने बड़ी इमारतों की जांच की तो नामचीन व्यावसायिक और रहवासी बहुमंजिला इमारतों में आग सहित अन्य आपदाओं से निपटने के साध्ान नहीं मिले। लोगों को पता ही नहीं है कि अगर वहां कभी कोई दुर्घटना हो जाए तो सतर्कता बरतते हुए कौन से कदम उठाए जाना चाहिए? फिर,मानवीय गलतियों और सोची समझी वारदातों से निपटने का व्यवहारिक ज्ञान और कौशल कहां  से आएगा?

Monday, December 10, 2012

कैसा नेतृत्व चाहिए अनुभवी युवा या जवां बुढ़ापा


अमेरिकी राष्ट्रपति बने बराक ओबामा ने पिछले चुनाव प्रचार की तरह इस बार भी खुद को युवा दिखाने की पूरी कोशिश की। स्टेज पर दौड़ कर चढ़ना और चुस्ती-फुर्ती के साथ हर व्यवहार करना इसलिए भी जरूरी था कि अमेरिका अपने राष्ट्रपति या नेता को बुजुर्ग नहीं देखना चाहता। यह कोई आज की भावना नहीं है। अमेरिका के 35 वें राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी को सबसे युवा राष्ट्रपति का दर्जा दिया गया था लेकिन 1961 में बुजुर्गों को पीछे छोड़ राष्ट्रपति बने कैनेडी की मौत के बाद राज खुला कि स्वास्थ्य के लिहाज से वे उतने युवा थे नहीं जितने माने जा रहे थे। उन्हें 13 साल की उम्र में कोलाइटिस हुआ था और राष्ट्रपति बनने के पहले पीठ के दो ऑपरेशन असफल हो चुके थे। दर्द से बचने के लिए उन्हें भारी मात्रा में स्टेराइड लेना पड़ता  था। लेकिन जनता के सामने झूठी छवि बनाए रखने के लिए उन्होंने जीते जी यह सच सामने नहीं आने दिया।

इस भूमिका के साथ इस मुद्दे पर बहस की शुरूआत की जाना चाहिए कि हमारे यहां राजनीति दलों के संगठन और सरकारों का नेतृत्व कैसा हो? यह सवाल इसलिए भी जरूरी हो जाता है कि गुजरात में चुनाव की प्रक्रिया जारी है और जल्द ही केन्द्र के लिए भी नई सरकार चुनना है। हरबार तत्कालीन नेतृत्व को खारिज करने के लिए गिनाए जाने वालों कारणों में जो एक उभय कारण होता है- उम्र। युवा नेतृत्व की मांग हर समय में की जाती रही है और परिवार से लेकर राजनीति तक पीढ़ियों का यह विवाद खुल कर सामने आता रहा है। दोनों पीढ़ियां एक-दूसरे को कमतर दिखाने और खारिज करने में कोई कसर नहीं छोड़ती।

सवाल यह है कि युवा नेतृत्व के नाम पर क्या दशकों के अनुभव, व्यवस्था से काम करवाने के कौशल, जनता की भावना को समझने और उसके अनुरूप काम करने की कुशलता, पार्टी की विचारधारा की समझ जैसे तमाम गुणों को भूला देना चाहिए? युवा होना क्या उम्र से कम होना ही है? क्या उम्र से छोटा दिखने की जगह विचारों से युवा होना ज्याद जरूरी नहीं है? क्या समय के अनुरूप खुद को और काम करने के ढंग को बदलने की ललक और क्षमता व्यक्ति को हमेशा युवा नहीं बनाए रखती?

विचारों का उम्र से क्या संबंध? अगर यह माना जाए कि उम्र के कारण व्यक्ति की ऊर्जा घट जाती है और मामलों को समझने-हल करने के तरीके में जड़ता आ जाती है तो 'बुजुर्ग" प्रधानमंत्री  मनमोहन सिंह आर्थिक विकास के लिए सुधार जैसे युवा फैसले क्यों ले पा रहे हैं?

ज्यादा दिन नहीं हुए जब भाजपा अपने अधिकांश फैसलों के लिए लालकृष्ण आडवाणी पर निर्भर हुआ करती थी। आज भी उनके बदले पार्टी युवा नेतृत्व खोज रही हैं लेकिन वैसा युवा चेहरा मिल नहीं रहा।

असल में युवा विचारों और क्रियाकलापों से हुआ जाता है, उम्र से नहीं। हमारे बीच में कम उम्र के ऐसे कई साथी मिल जाएंगे जिनमें कुछ नया करने या प्रचलित में बदलाव करने का जरा सामर्थ्य नजर नहीं आता है और ऐसे कई बुजुर्ग मिल जाएंगे जो समय के अनुरूप क्रांतिकारी बदलाव करने की क्षमता रखते हैं। एक छोटा से उदाहरण ही देंखे-अधिकांश बुर्जुग नेताओं ने जरूरत समझते हुए तत्काल मोबाइल और संवाद-संचार की आधुनिक तकनीक को अपनाया और खुद को आत्मनिर्भर भी बना लिया लेकिन जब पूछा जाए कि कितने युवाओं ने खासकर राजनीति में वरिष्ठों-सी परिपक्व सोच का नमूना पेश किया है तो जवाब देने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

तमाम पार्टियां नेतृत्व की सेकेण्ड और थर्ड लाइन को लेकर संकट में है और यह संकट केवल मुख्य पार्टी का ही नहीं बल्कि विद्यार्थी और युवा जैसे अनुषांगिक संगठनों का भी है। वर्तमान नेतृत्व को हटाने और टिकट पाने के लिए खुद को युवा बताने की होड़ लगती है लेकिन नेतृत्व तय करते समय हमें यह सोचना होगा कि हम विचारों से युवा नेता चुन रहे हैं या युवा दिख रहे नेतृत्व में बुढ़ापा आगे बढ़ा रहे हैं। यह चुनौती दलों के लिए भी है और हमारे लिए भी।

Saturday, November 10, 2012

'जब तक है जान' के बहाने खूब याद आएंगे यशजी


'कुछ सुरीले बेसुरे गीत मेरे/कुछ अच्छे बुरे किरदार/वो सब मेरे हैं., उन सबमें मैं हूँ/बस भूल न जाना, रखना याद मुझे..जब तक है जान।"

हिन्दी फिल्म जगत के पर्याय बन गए फिल्मकार यश चोपड़ा ने आखिरी बार सार्वजनिक रूप से यही शब्द कहे थे । किसे पता था कि 13 नंवबर को रिलीज हो रही जिस फिल्म 'जब तक है जान" के साथ यशजी अपनी सेवानिवृत्ति की तैयारी कर रहे थे वह फिल्म उनकी आखिरी फिल्म बन जाएगी। इस दीपावली यशजी जैसी शख्सियत के बिना रोशनी कुछ कम होगी, हां उनकी फिल्म उनकी मौजूदगी का अहसास जरूर करवाएगी।
यशजी को प्रेम का चितेरा । इसका कारण यह है कि उनक फिल्मों में जीवन ध्ाड़कता है। कलाकार और उनके संवाद ही नहीं, शूटिंग लोकेशन, गाने, फिल्मांकन का तरीका और नजरिया, उन्हें सबसे अलग खड़ा करता है। साहसी और प्रयोगशील फिल्मकार। 1973 में प्रकाश मेहरा ने 'जंजीर" बनाकर अमिताभ बच्चन को एक गुस्सैल नौजवान की छवि तो प्रदान की लेकिन यशजी ने ही 'दीवार", 'त्रिशूल" और 'काला पत्थर" बना कर अमिताभ की इस छवि को पुख्ता किया था। दूसरी तरफ, अमिताभ को 'कभी-कभी" और 'सिलसिला" जैसी रोमांटिक फिल्में भी यश चौपड़ा ने ही दीं। इन दोनों फिल्मों में भी अमिताभ का गुस्सा और गुरूर था लेकिन उसे यशजी ने अलग सांचे से बुना था।
'चांदनी" भी प्रयोग के लिए जानी जाती है। स्टार जूही चावला को महज ढाई मिनट का रोल दिया तो एक्शन हीरो विनाद खन्ना नए चेहरे के साथ प्रस्तुत हुए।  श्रीदेवी को भी हाल ही में आई फिल्म 'इंग्लिश विंग्लिश" से पहले इतना 'परफेक्ट" फिल्म चांदनी में ही माना गया। शाहरुख खान के लिए वे गॉड फादर थे। 'दिल तो पागल है" ने शाहरुख के करियर को नई ऊंचाइयां दी थीं। वही शाहरूख आज जब लड़खड़ाते करियर से परेशान हैं तो फिर यशजी ही साथ हैं 'जब तक हैं जान" ले कर। माना जा रहा है कि 'दिल तो पागल है" ने जिस तरह माधुरी दीक्षित के करियर को नई जिंदगी दी थी, वैसे ही यह फिल्म शाहरुख को संजीवनी देगी।
फिल्म चाहे जो परिणाम दे लेकिन असल बात यह है कि अब के बाद यशजी और उनका काम नजर नहीं आएगा। उनका जाना असल में उस प्रयोगवादी सिनेमा की क्षति है जिसे उन्होंने कमर्शियल होते हुए भी बुना और सफल किया।

Sunday, October 7, 2012

ये हरियाली धोखा है, तू जल्दी चला जा



प्यारे तेंदुए
मेरा नाम टोनी है... मैं तुझ से पहले जंगल में आया था इसलिए मुझे अपना बड़ा भाई समझ। इनदिनों वन विहार में हूँ। जब से पता चला है कि तू इंसानों की बस्ती की ओर चला आया है तब से चिंता हो रही है। 
मुझे लगता है तू बच्चा ही है, जो इतनी बड़ी बात भी नहीं समझ पाया कि अपना घर सिमट गया। अरे नादान! अब इतना बड़ा जंगल हमारे लिए कहाँ? हमारे घर में इंसान का कब्जा हो गया है। तू यहाँ से जल्दी चला जा, वरना ये पशुभक्षी इंसान तुझे भी मार डालेंगे या मेरी तरह तुझे भी पकड़ कर वन विहार जैसे बड़े से कैद खाने में बंद कर देंगे। तू आजाद है, आजाद रह। अपनी जान की परवाह कर। मत मान कि जितना जंगल है वह सब अपना है। प्रकृति पर हमारा बराबरी का हक है लेकिन इंसान सब हड़पना चाहता है तो हमें ही समझना होगा। भोजन न मिले तो थोड़े में गुजारा कर...लेकिन बस्ती की तरफ मत आया कर। 

एक बात बता, तूझे अचरज नहीं हुआ जब मैंने कहा कि मैं टोनी हूँ। अरे! हमारे नाम होते हैं क्या? यह नाम रखना तो इंसानों की फितरत है। दो साल पहले वन विहार लाया गया हूँ तब से मुझे यह नाम मिला है। क्या पूछते हो? कैसे आया वन विहार? मैं भी तुम्हारी तरह था, थोड़ा नासमझ। एक दिन बहुत भूख लगी। कई दिनों से शिकार नहीं मिला तो खोज में चला आया कलियासोत की तरफ। मुझे क्या खबर थी कि इतने जंगल में भी इंसान आ बसे हैं। मुझे देख जो हल्ला हुआ कि मैं घबरा गया। तुरंत एक पहाड़ी पर चढ़ गया। क्या बताऊँ उस दिन क्या हुआ। जोर की आवाजें मुझे डरा रही थी। मैं बुरी तरह घबरा गया था। करीब आ रहे एक इंसान को भगाने के लिए हमला किया तो भीड़ मेरे पीछे पड़ गई। मुझे कुछ समझ ही नहीं आया। बौखला कर फिर पहाड़ी पर जा छिपा। मेरे निकलने के सारे रास्ते बंद थे। भूख भी बहुत लग रही थी। लग रहा था, वहाँ से न निकला तो मर ही जाऊँगा। रात में हिम्मत कर बाहर निकला। कोई नहीं था। मैं रास्ता खोज रहा था कि एक स्वादिष्ट बकरा दिखाई दिया। मानो मेरी को मुराद पूरी हो गई। पर मुझे क्या पता था, वह धोखा है। बकरा मिला जरूर लेकिन उस दिन खाने के लालच में मैं पिंजरे में कैद हो गया। तब से यहाँ वन विहार में लाया गया हूँ।

कहने को तो वन विहार जैसी जगहों पर आराम ही आराम है। समय पर खाना मिलता है लेकिन भाई वो जंगल सी मौज कहाँ? यहाँ घूमने आने वाले लोग हमें परेशान करते हैं। वन विभाग का अमला भी हमें सुरक्षा नहीं दे पाता। कई बाघ लीवर की खराबी से चल बसे। डर लगता है मुझे ही यहाँ का माँस खाने से कोई बीमारी न हो जाए। मैं तो यहाँ आ कर शिकार करना ही भूल ही गया। मुझे एक बाड़ा मिला है जो लगता तो जंगल जैसा है लेकिन पिंजरे से कम नहीं है। जहाँ चाहूँ वहाँ जाने की आजादी नहीं। अहा! कैसे थे वे जंगल के दिन। काश, मैं आजाद होता, अपने वन में। 
मैं जानता हूँ, इंसान कभी हमारा भोजन नहीं रहा। हम तो कभी उसे खाना पसंद नहीं करते लेकिन हमारा भोजन जिन घास के मैदानों और जंगल में होता था उन्हें उजाड़ दिया गया। इंसान खुद जंगल तक आ गया। अंग्रेज जब हमारे जंगलों और वन्यजीवों का खत्म कर रहे थे, तब हम तेंदुओं को आवास और भोजन दोनों की ही कमी महसूस हुई। मजबूरन हमें मानव बस्तियों के आसपास आना पड़ा। इन्हें क्या पता, बस्तियों के पास रहना और इंसानों के साथ तालमेल बिठाने में हमें कितनी परेशानी हई। हम तो अब भी इंसानों को खाना पसंद नहीं करते लेकिन वह हम पर हमले करता है, हमें घेर कर मारता है।
तू भी जल्दी से चला जा। भीड़ बहुत खराब होती है। तू मासूम है। जब तुझ पर चारों तरफ से हमले होंगे तो बौखला जाएगा। घबराहट में किसी पर हमला कर देगा तो लोग तुझे भी आदमखोर करार देंगे और तुझे मारने का आदेश जारी हो जाएगा। अरे! मैं भी क्या कह रहा हूँ। अब आदेश कहाँ जारी होते हैं, अब तो लोग खुद तुझे मार देंगे और तेरी लाश को तमाशा बना देंगे।
मेरी बातें सुन इस बार ज्यादा बारिश हुई तो हरियाली भी खूब हुई है। समरधा , रातापानी, कोलार, केरवा से लेकर सीहोर की वीरपुर रेंज तक जैसे पुराना जंगल लौट आया। यह हरियाली हमें भटका रही है। हम नासमझ जानवर, अपनी सीमा तय करने में भूल कर बैठते हैं। तू भदभदा के पास पनपे जंगलों को भी अपना ठिकाना मान बैठा लेकिन यह अब हमारा घर नहीं रहा। अब तो यहाँ इंसान आ गए हैं। यहीं क्यों, सीहोर की वीरपुर रेंज में शिकारियों की पौ-बारह है। तुझे पता है पाँच माह पहले वीरपुर रेंज के कठौतिया में पानी पीने आया एक बाघ शिकारियों के बिछाए करंट से मारा गया था। यहीं पिछले दिनों एक बाघ शावक और मारा गया। केरवा-कलियासोत-कोलार की तरफ तेजी से शहर बढ़ रहा है। करीब 980 वर्गकिलोमीटर का रातापानी अभ्यारण्य और रायसेन की समरधा  रेंज के किनारे भी महफूज नहीं रहे। उस तरफ से इध्ार आना अब सुरक्षित नहीं है। रास्ते में बड़े लोगों के कब्जे हैं। इन्हें प्रकृति पसंद है और ये हरियाली के बीच रहना चाहते हैं। इन्हें इसकी फिक्र कहाँ कि इस सब में प्रकृति के एक अंग हम वन्य प्राणी मुसीबत से घिर जाएँगे और खत्म हो जाएँगे? इनके सुख के आगे हमारे जीवन के क्या मायने? 
क्या हुआ जो आईआईएफएम और मानव संग्रहालय की हरियाली बार-बार हमें ललचाती है। ये जंगल नहीं धोखा  है। यहाँ आ कर हम 'पशुभक्षी" इंसान का शिकार ही बनेंगे। इसलिए तुम केरवा या कोलार की ओर घने जंगलों में जाना। 
तू फिर भी न समझा हो तो एक बात बताता हूँ। तुझे पता है, नेपाल के चितवन पार्क में बाघ का रास्ता भी इंसानों ने हथिया लिया है। दिन में इंसान बाघ की पगडंडी का इस्तेमाल कर रहे हैं। बाघ कभी दिन-रात में भेद नहीं करता। वह अपने बनाए रास्ते पर ही चलता है। कभी अपनी लीक नहीं छोड़ता लेकिन इंसानों ने जब उसकी राह को अपनी पगडंडी बना ली तो बाघ केवल रात में निकलने को मजबूर हुआ। इस शोध में दो साल लगे। जब से यह शोध 'प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साईंस जरनल" में प्रकाशित हुआ है तब ही से वन्य प्राणी विशेषज्ञ चिंता में हैं। वे भी रह मानते हैं कि यह संसाधनॉ का बँटवारा नहीं वन्य प्राणियों के क्षेत्र पर बेजा कब्जा है। 
तुझे तो पता है न कि अपना सबसे पसंदीदा आवास घना वन है। पर प्रकृति ने हमें सामर्थ्य दिया कि हम कहीं भी रह सकते हैं। हमें रेगिस्तान में भी बस तन छिपाने के लिए थोड़ी हरियाली और खाने के लिए कुछ छोटे प्राणी चाहिए। 
ये बात इंसान नहीं समझने वाला। तू ही समझ। जंगल के जितना अंदर रह सकता है, उतना भीतर रह। वरना, चीते और बाघ की तरह हम भी लुप्त हो जाएँगे या पिंजरों में बंद सजावट का सामान बन जाएँगे।  
अभी तेरे पास वक्त है। चला जा नहीं तो तेरी भी आजादी खत्म हो जाएगी या तू भी मार दिया जाएगा।
तेरी फिक्र में हूँ।

टोनी तेंदुआ
वन विहार

Thursday, October 4, 2012

रेप के लिए क्या लड़की खुद दोषी है?




मित्रों, बात किसी एक समाज और उसकी सोच की नहीं है। यह व्यक्तिगत सोच का मामला है जो अंतत: समाज की सोच बनती है। यह बहस का विषय हो सकता है कि व्यक्ति की सोच से समाज की सोच बनती है या समाज की सामूहिक राय व्यक्तिगत धारणा बनाती है लेकिन कठघरे में तो दोनों ही की पक्षपाती सोच है। क्या कोई लड़की खुद अपने बलात्कार के लिए अकेली जिम्मेदार है? ऐसा इसलिए पूछ रहा हूँ कि किसी भी बलात्कार के बाद थोड़ी सहानुभूति दिखलाने के तुरंत बाद कमेंट होता है -'वह थी ही ऐसी। कोई ऐसे कपड़े पहनता है भला?" या कहेंगे 'खूब हवा में उड़ती थी अब भुगतो।" अगर हम पीड़ित को जानते हैं तो कहेंगे-'बेचारी। उसे शाम को घर के बाहर निकलना ही न था। क्या जरूरत थी नौकरी करने की।" खूब दुख जताते हुए यहाँ तक कह देगें कि माँ-बाप की बात मान कॉलेज न जा कर शादी कर लेती तो यह न भोगना पड़ता। या यह निष्कर्ष हवा में उछाल देते हैं कि लड़कियों को तो पढ़ाना ही पाप है।
अब आप ही बताइये क्या यह हमारी पक्षपात और एकतरफा क्रर सोच नहीं है? लड़की का शारीरिक बलात्कार तो एक बार हुआ लेकिन मानसिक बलात्कार इस तरह पल-प्रतिपल होता है। ऐसी सहानुभूति दिखला कर हम उसका भला नहीं  कर रहे होते बल्कि समूची स्त्री समाज की प्रगति में बाधा  बन रहे होते हैं। एक साथ घटना घटी तो उसकी हमउम्र हजारों लड़कियों को घर में रहने की नसीहतों और दर्जनों पाबंदियों से गुजरना पड़ता है। क्या बलात्कार के लिए लड़की के कपड़ें या उसका काम के लिए घर से बाहर निकलना दोषी है? क्या वह निठल्ला आवारा दोषी नहीं है जो रात दिन कुत्सित विचारों के साथ जीता है? पहले मानस में और फिर शारीरिक तौर पर किसी मासूम को हवस का शिकार बनाता है? फिर घर में रहने या रखने की सलाह लड़कियों को ही क्यों  दी जाती है? क्या ऐसे पुरूषों को खुले रहने का हक है? क्या हम अब भी रेप के लिए लड़की को ही दोष देंगे?

Wednesday, October 3, 2012

आखिर लड़कियों पर ही पाबन्दी क्यों?


गुना के जैन समाज ने फैसला किया है कि मंदिरों में जींस पहन कर नहीं आया जा सकेगा। इस निर्णय का दूसरा पहलू यह कि यह सख्ती केवल युवतियों के लिए है। सवाल यह कि पाबंदी केवल लड़कियों के लिए ही क्यों? मंदिर में अगर अनुशासन चाहिए तो यह नियम सब पर लागू होना चाहिए लेकिन घेरे में आयीं केवल लड़कियाँ। मुझे  यकीन है यह फैसला लेने वालों में स्त्रियाँ होती तो वे पुरुषों को इस दायरे से बाहर नहीं रखती। यहाँ यह बताना जरूरी है कि इनदिनों भागीदारी के नाम पर महिलाओं को शामिल किया तो जाता है लेकिन ये भागीदारी महज दिखावा साबित होती है क्योंकि साजिशन उन्हीं महिलाओं को रखा  जाता है जो हर बात पर सहमति जताए। असहमति जता सकने वाली महिलाओं को फैसला लेने कि स्थिति तक साथ रखा ही नहीं जाता। यह केवल एक समाज में नहीं होता बल्कि हर जगह का यही आलम है। 
तो बात पाबंदी कि गुना ही नहीं समाज कहीं का भी हो वह ऐसे फैसले लेता है और महिलाओं पर दबाव बनाता है कि वे बिना जिरह हर बात मान लें। खैर, फतवे हर बार ही बहस को जन्म देते हैं लेकिन हरबार ही एक बड़े वर्ग की स्वतंत्रता पर आदेश की बेड़ियाँ लगा दी जाती है। अनुशासन तोड़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती लेकिन अनुशासन के नाम पर तानाशाही या पक्षपात कैसे सहन हो? क्या यह उचित है कि पुरूष अधनंगे हो कर घूमते रहे लेकिन उनकी गलत दृष्टि से बचने के लिए महिलाएँ स्वयं को लबादे में ढ़ँक कर रखे? क्या महिलाएँ यह माँग नहीं कर सकती कि पुरूष अपनी हद में रहे, यह हद कपड़े पहनने से लेकर चौराहों पर घंटों टाइम पास करने तक की है। लेकिन ऐसा होगा नहीं। फतवे जारी करने वाला समाज भी युवकों के आगे नतमस्तक है। वह लड़कों के मोबाइल प्रयोग करने पर पाबंदी नहीं लगा सकता क्योंकि जानते है कि लड़के उसकी बातें हवा में उड़ा देंगे और इस तरह खुद का मखौल बनना किसी समाज को पसंद नहीं आता। वह तो उसी पर लगाम कसता है जो उसकी सुनता है।
क्या किसी व्यक्ति को अपनी पसंद के कपड़े पहनने का भी अधिकार नहीं है? जरा गहराई से विचार करें तो व्यक्ति अपने कपड़ों सहित रोजमर्रा के साधनों  का चयन अपनी सुविधा  के मद्देनजर करता है। इसीलिए लगभग हर काम के लिए स्वत: ही परिधान  तय से हो गए हैं। दूसरा, व्यक्ति चाहता है कि वह ज्यादा खूबसूरत दिखने के लिए परिधान का  एक टूल के रूप में इस्तेमाल करे। वैश्विकरण के साथ हर तरह के परिधान  हमारी पहुँच  में आ गए हैं और लोग फैशन के बहाने कई तरह के प्रयोग अपनी रोजमर्रा के परिधान में भी कर रहे हैं। यह बहस शाश्वत है कि वेस्टर्न ठीक है या भारतीय लेकिन कमोबेश अधिकांश  लोग जानते हैं कि उन्हें कब क्या पहनना है। बेडोल शरीर को अगर वेर्स्टन नहीं फब्ता तो वह कुछ प्रयोग के बाद इस तरह के कपड़े पहनना बंद कर देता है। यानि पूरा मामला व्यक्तिगत पसंद और नापसंद का है। कुछ नियम स्वत: तैयार हो जाते हैं और लोगों पर निर्भर करता है कि वह कपड़े पहनने के अघोषित नियमों का पालन करता है या नहीं। 
मेरी आपत्ति केवल इतनी है कि युवतियों के मोबाइल प्रयोग, जींस पहनने, बुरका न पहनने, जोर से हँसने, देर रात बाहर घूमने जैसे कामों पर प्रतिबंध लगाने वाला समाज जरा युवकों की हरकतों पर भी लगाम लगाने का साहस दिखाए, और अगर वह यह नहीं कर सकता तो  कम से कम जो उसकी बात सुन-मान रहा है उस महिला वर्ग पर बेवजह की पाबंदियाँ लादना बंद करे। 
सुन रहे हैं आप?
क्रमश:

Monday, September 17, 2012

मालिक से नौकर बना देगा एफडीआई



खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश के निर्णय से स्वरोजगार के जरिए अपने कारोबार के मालिक बन गए छोटे-छोटे व्यापारियों का नुकसान ही होगा। उनके मालिक से नौकर बन जाने का खतरा है। क्या यह लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति जैसा नहीं है जिसने बाबूओं की फौज खड़ी की? हम कैसे मानलें कि रोजगार बढ़ाने का ख्वाब दिखा कर एफडीआई की पैरवी कर रही सरकार इस बात को सुनिश्चित करेगी कि यह रोजगार बढ़ाएगा लेकिन स्वरोजगार खत्म नहीं करेगा।?
पिछली बार जब सरकार ने खुदरा व्यवसाय में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से कदम पीछे ले लिए थे तो तत्काल बाद अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय ने एक रिपोर्ट जारी कर दावा किया था कि एफडीआई की मंजूरी से कृषि वस्तुओं की खरीद और भंडारण व्यवस्था में सुधार होगा और इससे मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। चीन का उदाहरण देते हुए कहा गया था कि वहाँ ने खुदरा क्षेत्र में एफडीआई की मंजूरी 1992 में दी। उसके बाद से वहां खुदरा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ, लेकिन इसका छोटे या घरेलू खुदरा श्रृंखला पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा। इस अमेरिकी स्वार्थ वाले शोध के पीछे हम यह कैसे भूल जाएँ कि चीन ने अपने उत्पादों के लिए विश्व बाजार में गहरी जड़ें जमा ली है। चीनी सामान हमारे अपने देशी उत्पादों के लिए खतरा बन गए हैं। जीएम फूड और विदेशी का आगमन हमारे देशी उत्पादों को खत्म करके ही दम लेगा। जैसे मालवा गेहूँ, देशी टमाटर, मक्का जैसी तमाम फसलें हमारी कृषि का हिस्सा नहीं रही।
भारत में एफडीआई जरूरी है लेकिन बड़ा सवाल होगा कि किस क्षेत्र में? क्या हम अपनी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले स्थानीय और ग्रामीण अर्थतंत्र को तोड़ने की कीमत पर एफडीआई मंजूर करें? यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि पिछली वैश्विक आर्थिक मंदी में जब अमेरिका जैसा सूरमा ध्वस्त हो गया था, भारत अपनी इसी अर्थतंत्र की खासीयत के कारण अप्रभावित रहा था।
भारतीय खुदरा कारोबार का तंत्र अनोखा है। यह किराना दुकानों से लेकर कपड़े-जूते और दैनिक जीवन की जरूरी तमाम चीजों तक फैला है। यही कारण है कि कृषि पर निर्भर भारत दुकानदारों का देश बन गया। किराना में इक्यावन फीसदी विदेशी निवेश से करीब डेढ़ करोड़ खुदरा कारोबारियों के काम पर विदेशी चकाचौंध का संकट है। ये कुल बिक्री का 94 सामान अपनी छोटी-मोटी दुकानों से बेचते है। डिपार्टमेंटल स्टोर संस्कृति ने नुक्कड़ की दुकानों का कारोबार समेटा। अब डिर्पाटमेंटल स्टोर पर विदेशी कम्पनियों का कब्जा होगा। अभी भारत में बिग बाजार, रिलायंस, मोर और स्पेंसर जैसी कंपनियां किराना स्टोर का कारोबार कर रही हैं। जाहिर है किराना में विदेशी निवेश का रास्ता खुलने से इन कंपनियों को फायदा होगा न कि छोटे दुकानदारों को।
विमानन जैसे क्षेत्र में एफडीआई फायदेमंद हो सकता है लेकिन यह भी तब जब इसे लागू करने के तौर तरीके सही हों। सरकार को अगर विदेशी कंपिनयों को बुलाना ही है टेक्नीकल और इन्फ्रास्ट्रचर क्षेत्र में बुलाए। न कि उन कम्पनियों को जो हमारे उत्पादों को खत्म कर दे और मालिक दुकानदारों को सेल्समेन बना दे।




Wednesday, August 22, 2012

बड़े दिनों बाद मिली ऐसी ईदी


हर साल ईद आती है लेकिन ऐसी ईदी तो कभी-कभार ही मिलती है जब अतुल जलराशि छलक उठती है और भदभदा के गेट को खोलना पड़ता है...। हर साल मेघ आते हैं, छा कर हर्षाते हैं लेकिन जी भर कर बरसते नहीं। मन और धरा, कुछ प्यासे रह जाते हैं। ऐसे ही अतृप्त रह जाता है अपना बड़ा ताल। पहले तो ये मौके बहुत आते थे। हर साल बार-बार आते थे लेकिन जब से इंसान ने अपनी दुनिया का विस्तार किया है बड़ा तालाब छोटा होता गया है। मानो अग्रज ने अनुजों के लिए अपना विस्तार समेट लिया। राजा भोज के ताल ने अपनी प्रजा के 'सुख" के लिए खुद को छोटा कर लिया जैसे। 
हर साल ताल के साथी बादल आते तो है लेकिन वे भी इसे रीता ही छोड़ जाते हैं। मेघ अपना नेह बरसाते ही नहीं और हमारे ताल की लहरें लचकती भी नहीं। न धरती वैसी हरियाती है, जैसी इस बार धानी  चादर ओढ़ हर्षित वसुंधरा इठला रही है। मेघ कलश से बरसे नीर ने तालाब को यौवन दे दिया है। लहरें बल खाने लगी हैं और दौड़-दौड़ कर शहर की ओर आने लगी है। जैसे हमें बुलाती हो अपने उत्सव में शामिल होने...।
प्रकृति के इस मुखर निमंत्रण को कौन संवेदनशील मन ठुकरा सकता है भला? तभी तो जब पता चला कि अपना ताल छलक उठा है और वह भदभदा के तटबंध तोड़ने को आतुर है, लोग टूट पड़े इस खूबसूरत नजारे को अपनी स्मृतियों में कैद करने। छह बरस बाद आया ऐसा मौका, जब बड़े तालाब के पानी ने भदभदा का दायरा लांघा है। 
कितना मनोरम दृश्य...तालाब की सीमाओं में उफनती जल राशि को ज्यों ही मार्ग मिला वे किलक उठीं। छन-छन छमकती, बूँदें उड़ाती लहरें अपना रास्ता तलाशती दौड़ पड़ी कलिया सोत की ओर। भदभदा के पुल के एक ओर मर्यादा में भोजताल और दूसरी तरफ कूदती-फांदती लहरें। पहाड़ों की फुनगी पर टीकी रूई जैसे बादल और हरी धरती के बीच ताल की रजत संपदा। ऐसे दृश्यों को देख चिहुँकते-मुस्काते चेहरे और उनकी तृप्त आत्मा। 
हे मेघ, तुम हर साल ऐसे बरसो कि मरूथल मेरा, मधुवन हो जाए। 

 

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Sunday, July 1, 2012



कम्प्यूटर पर रोजाना
घंटों अपनी ऊँगलियाँ थिरकाने वाले
क्यों जिंदगी के साफ्टवेयर से परेशान हो?
क्या तुम नहीं जानते
 ऐसे तो हार्डवेयर को होगा नुकसान?

क्यों भूल जाते हो
केवल रीबूट करने से नहीं चलता काम
जिंदगी के सिस्टम को भी करना होता है फार्मेट
सिस्टम की रफ्तार को बढ़ाने के लिए
बेवजह जमा कूकीज को करना होता है डिलिट।
क्यों भूल जाते हो
हटा दी गई ड़वी बातें
जमा हो जाती है रीसाइकल बीन में
समय-समय पर खाली करना होता है
रीसाइकिल बीन भी।

जानते हो ना
अपनी अच्छाइयों को बार-बार सेव करते रहना जरूरी है
तभी अचानक हेंग हुआ जीवन
बिगाड़ नहीं पाएगा कोई फाइल।
निराशाओं को शिफ्ट के साथ डिलिट करोगे
तो नहीं बची रहेंगी ये किसी भी जगह।
क्यों भूल जाते हो कि
कम्प्यूटर सी हो गई जिंदगी में
कुछ कीज को याद रखना जरूरी है
जैसे कंट्रोल, अल्टर और डिलिट को एक साथ दबाए
बिना शुरू नहीं होता कोई भी सिस्टम


वैसे ही अपने जीवन का पीसी भी
खुद पर कंट्रोल, अल्टर और डिलिट
के बगैर शुरू नहीं हो सकता।

बोर्ड पर इन तीनों की दो-दो कीज होने का अर्थ भी यही है
जीवन के दायें रहो या बायें
जब भी पहुँच में होगीं ये तीन कीज
बहुत मुश्किल नहीं रह जाएगा कुछ भी।
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Monday, April 2, 2012

...और साँसें बची रह गईं


फिर हटा लेना मिरे माथे से तू भी अपना साथ
मैं भी चुप हो जाऊँगा बुझती हुई शम्ओं के साथ
और कुछ लम्हें ठहर ! ऐ जिंदगी ! ऐ जिंदगी !


मकबूल शायर अहमद फराज की ये पंक्तियाँ अकसर याद आ जाती है जब जिंदगी को जीतते देखता हूँ। वो कहते हैं ना कि मौत तो महबूबा है संग लेकर जाती है। बहुत बार मौत को देखा है मेरे अपनों को संग ले जाते हुए। कभी सीना तान कर तो कभी चकमा दे कर चोरों की तरह...कभी मौत ने बाज की मानिंद ऐसा झपटा मारा कि कोई  संभल तक ना पाया। लेकिन जनाब, जिंदगी तो जिंदगी है। वह जब बचती है तो देखने वाले स्तब्ध रह जाते हैं। समझ ही नहीं पाते कौन ताकतवर है- जिंदगी या मौत? 


बात हाल ही की एक  रात  की है। रात गहराए कुछ  ही वक्त हुआ था। भोपाल की व्यस्त सड़कों पर गाड़ियाँ रोज  ही की भाँति तेज रफ्तार भागी जा  रही थीं, उतनी ही तेज जितनी रफ्तार से दौड़ रही थी जिंदगी। मैं भी  इस कारवाँ का एक हिस्सा था तभी नजर पड़ी सड़क पार  करने की कोशिश कर रहे एक पिल्ले पर। ख्याल आया, ये नादान क्या जाने सड़क पार करने की भी कुछ नियम होते हैं। दूसरे ही पल विचार आया जिन्हें पता है वे भी कहाँ पालन  करते हैं नियमों का। इसी उधेड़बुन में खोया था कि अचानक एक कार से किसी के टकराने की आवाज आई।  पें-पें-पें की कातर आवाज सुनते ही माजरा समझ में आ गया। कार से  वह कुत्ता टकराया था। पूरे वातावरण में टक्कर की आवाज  के बाद उस कुत्ते की कराह भर कायम थी जो वाहनों के हार्न  के शोर में भी रह-रह कर दबी नहीं थी। मेरे साथ कुछ और लोगों ने जगह बना कर सड़क किनारे गाड़ियाँ लगाई बाकी गाड़ियों को दौड़ना था सो वे दौड़ती रही। हादसे की जगह देखने पर पाता हूँ कि टक्कर मारने वाली गाड़ी जा चुकी थी लेकिन बीच सड़क पर प्राणहीन प्राणी दिखाई दे रहा था। मन में ढ़ेरों विचार...कसक... दुख... पीड़ा और मौत की जीत का दर्द।
 कितनी ही बातें याद हो आई, कितने ही अपने चेहरे याद हो  आए जिन्हें मौत यूँ ही ले गई थी अपने साथ झपट कर। कुछ साथी कुत्ते उसके पास गए और कुछ सूँघ कर भाग गए। तभी क्या देखता हूँ उस पिल्ले ने अपनी गर्दन  उठाई। हे भगवान! ये क्या? क्या इसका केवल पिछला हिस्सा कुचला है? ओह!  दारूण रूदन कब  थमेगा? क्या कोई और वाहन इसे कुचलेगा तब तक... ख्याल मेरे कदमों से तेज चल रहे थे। मैं कुछ कदम पीछे रह गया था तभी एक  मिनी बस सड़क पर पड़े कुत्ते के करीब जाती दिखाई दी। अरे! अब तो कोई बचा नहीं सकता। रात के अंधेरे में तो वह मिनी बस इसे जरूर कुचलेगी। तभी जैसे एक देवदूत प्रकट हुआ। मुझ से पहले दौड़ कर एक छात्र उस कुत्ते के पास पहुँच चुका था। उसके वहाँ पहुँचते ही मिनी बस चालक ने गाड़ी काटी और रवाना हो  गया। लगा मौत दूसरी बार हार गई। पर ख्याल आया, क्या पता पहली टक्कर में कितना शरीर बचा होगा। अच्छा होता कुचल ही गया होता तो इतनी पीड़ा तो नहीं होती। इसके कितने ही वंशज ऐसे ही तो गए हैं। यह क्यूँ रह गया? लगा कुछ पल पहले सड़क पर दिखे एक प्राणी से जैसे मुझे लगाव हो गया। 
तभी क्या देखता हूँ उस छात्र ने जैसे ही हाथ बढ़ाया वह पिल्ला तो खड़ा हो गया...एक बार  फिर चौंकने की बारी थी...अरे! यह तो बच गया! चोट लगी होगी, शायद। उसके बच जाने की खुशी के बीच मैं, वह छात्र और कुछ  लोग उसके शरीर पर घाव खोजने लगे। उस सहमे प्राणी को सड़क किनारे ले गए। देखा तो पाया कि मामूली रगड़ के अलावा उसे कोई बाहरी चोट नहीं लगी थी।  पास की ही दुकान से पानी लेकर उसे दिया गया। कुछ मिनटों बाद वह अपने साथी कुत्ते के साथ उछलकूद कर रहा था। 
मैं सुखद आश्चर्य में खो गया...जिंदगी ऐसी ही होती है। जब जीतती है तो पूरी शान से जीतती है। 


एक बात सच है, चाहे मौत जीते या जिंदगी, आँसू दोनों ही बार आते हैं फर्क केवल इतना है कि जिंदगी की जीत के बाद निकले आँसू खारे नहीं होते। 

Monday, February 13, 2012


कहाँ मिलेगा अलखजी जैसा गुरु
अलखजी नहीं रहे...यह खबर एक बेहतर इंसान के जाने की सूचना ही नहीं है बल्कि संभावनाशील कलाकारों के लिए सफलता का एक द्वार बंद होने जाने की अनचाही घटना है। अलखजी के रूप में एक और 'गुरु" का चले जाना है जो सीखने के लिए शिष्य को पूरी स्वतंत्रता देता था। जो पल भर में शिष्य की पूरी क्षमताओं का आकलन कर लेता था और फिर उसे अभिव्यक्ति के आकाश पर सबसे ऊँचा उड़ने की आजादी दे देता था।
अलखजी के व्यक्तित्व के अनगिनत पहलू हैं जिन पर बात की जानी चाहिए लेकिन उनका 'गुरु" पद ही इतना विराट है कि उसका 'खो जाना" समाज के लिए प्राणतत्व का मिट जाना है। वे सही मायनों में उस गुरु की तरह से थे जो बाहर से कठोर और भीतर से नर्म दिल होता है। खरी-खरी कहने वाला 'दबंग" गुरु। शिष्यों से पूछिए, वे बताएँगे कि अलखजी का गुरुरूप कितना विराट था-'दादा, तब तक अभ्यास करवाते थे जब तक कि अभिनय से संतुष्ट नहीं हो जाते... वे फटकारते थे और तब तक मेहनत करते जब तक कि मनचाहा काम पा न लेते... तारीफ भले कम मिले लेकिन अलखजी की डाँट जरूर मिल जाती थी...।"
इसी रूप ने 'नट बुंदेले" खड़ा किया। संगीतकार ओमप्रकाश चौरसिया, इरफान सौरभ जैसे वरिष्ठ सर्जकों से लेकर उनके पुत्र अंशपायन और हेमंत देवलेकर जैसे नवागत कलाकारों ने अलखजी में कोई एक बात समान पाई तो वो थी शिष्यों को खुलापन देने वाला रूप। पं. चौरसिया ने अलखजी के साथ तब काम किया था जब अलखजी भोपाल आए थे यानि 1983-86 के दौरान। इसी दौरान इरफान सौरभ भी जुड़े जो कारंतजी के बाद 'महानिर्वाण" का चर्चित पात्र 'भाऊराव" के लिए अलखजी की पहली पसंद बन गए थे। दोनों बताते हैं कि अलखजी ने कभी हमारे काम में दखल नहीं दिया। वे इतनी आजादी देते थे कि आप कम से समझौता नहीं कर पाते और यादगार सृजन हो जाता। नए कलाकारों ने उनके संग पिछले नवंबर में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं को मंचित किया था। वे अलखजी की शिक्षा कभी भूल नहीं पाएँगे।
नए और पुराने की साझेदारी के हिमायती अलखजी ने भोपाल में तीन दशकों की यात्रा में कई पड़ाव रचे हैं। शिष्यों के रूप में खड़े किए गए उनके 'माइलस्टोन" उनकी इस यात्रा की गवाही देते रहेंगे। 'नट बुंदेले" के जरिए रंग जगत में लोक संस्कृति को स्पंदन करने वाला 'कबीरा" अपने 'महानिर्वाण" के बाद बहुत याद आएगा...।