Tuesday, March 18, 2014

क्या एक्टिविस्ट मुख्यधारा की राजनीति करने को तैयार हैं?


यह विकल्पों की तलाश का दौर है। इस बात को साबित करने के लिए केवल आम आदमी पार्टी की सफलता का उदाहरण देना ही काफी है। सफलता के लिए कांटों भरे परिश्रम से लथपथ मार्ग पर चलने की पैरवी करने वालों के लिए आम आदमी पार्टी की राजनीतिक सफलता चौंकाने वाली रही। अरविंद केजरीवाल के लिए अपने पूर्ववर्ती नेताओं के मुकाबले यह सफलता इसलिए आसान रही, क्योंकि देश की बड़ी आबादी जिसके अगुआ पढ़े-लिखे स्मार्ट युवा हैं, परंपरागत राजनीति से अलग विकल्पों की तलाश कर रही थी। नई पौध का जहां विकल्प नजर आता है वह खुलकर अपना समर्थन प्रदान कर देती है। प्रयोग की हिमायती नई पीढ़ी को राजनीति के परंपरागत तौर-तरीकों को बदलकर नए तरीकों को स्वीकार करने में जरा भी गुरेज नहीं है। इसीलिए वह वैकल्पिक राजनीति को तवज्जो दे रही है। दूसरी तरफ देश की चुनावी राजनीति चेहरों के इर्दगिर्द सिमट सी गई है। इस बार चुनाव में चेहरों से बड़ा कोई मुद्दा नहीं है। हालांकि पहले भी ऐसा हुआ है जब व्यक्ति या परिवार के नाम पर वोट मांगे गए, लेकिन इस बार बात अलग है। बदलाव को पसंद करने वाली पीढ़ी को अपने साथ लेने के लिए कांग्रेस और भाजपा ने राजनीति के अपने ठेठ तरीके को बदला है। देखना होगा कि परिवर्तन का यह आगाज राजनीति के अंतरंग को कितना बदल पाता है।
आजादी के बाद से ही देश में कम या ज्यादा राजनीति के दो छोर देखे गए हैं। एक तरीका पारंपरिक राजनीति का और दूसरा तरीका वैकल्पिक राजनीति कर रहा एक्टिविज्म का। इस धड़े के समर्थकों के काम करने का तरीका एकदम ही अलग। पारंपरिक राजनीति से पूरी तरह उल्टा। राजनीति की यह शाखा बदलाव की पैरवी करती है और काम करने के पुरातन तरीकों को पूरी तरह बदल कर अपने समय के अनुसार बनाने की कोशिशों में जुटी रहती है। आंदोलन की यह राजनीति जनता के मुद्दों को लगातार आवाज देती रही है। यही कारण है कि अधिकांश युवाओं को राजनीति की इस धारा की सोच बहुत पसंद आती है। देखा गया है कि क्रांति की इस राजनीति ने आंदोलन तो कई खड़े किए, लेकिन वह मुख्य धारा की राजनीति यानि की सत्ता की राजनीत से दूर ही रही। हो सकता है कि पहले भी अरविंद केजरीवाल की तरह मुख्य धारा की राजनीति से जुड़कर सत्ता को अपने हाथों में लेने का प्रयास हुआ हो लेकिन एक्टीविज्म की राजनीति करने वालों का वह प्रयास इतने बड़े आकार में सफल नहीं हुआ।  अरविंद केजरीवाल के काम और अंदाज की कई तरह से कई रूपों में आलोचना की जा सकती है, लेकिन इतना तो मानना होगा कि अरविंद ने राजनेताओं और राजनीतिक दलों को लीक से हटकर सोचने पर मजबूर किया। आम आदमी पार्टी ने कुछ और किया हो या न किया हो राजनीति के ठहरे पानी में कंकर जरूर मारा है और यह कंकर इतना बड़ा है कि इसने तरंगें ही नहीं ऊंची लहरें पैदा की हैं।
देश में गिने-चुने स्थानों पर ही सही, लेकिन उन लोगों को चुनाव मैदान में उतारने का मौका दिया जो राजनीति से दूरी बनाकर चलते थे। यह राजनीति के आपदाकाल मेें वैकल्पिक राजनीति का आगाज है। आम आदमी पार्टी से ऐसे लोग जुड़ रहे हैं जो आमतौर पर अब तक किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ना पसंद नहीं करते थे। आम आदमी पार्टी ने अगर विकल्प की राजनीति का एक छोटा सा नमूना दिखाया है तो यह उस पार्टी के कर्ताधर्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे इस विकल्प की राजनीति करने के दायित्व का उचित निर्वहन करें। केवल आम आदमी पार्टी के कर्ताधर्ता ही क्यों, उस पार्टी से जुड़ने वाले हर नेता, एक्टिविस्ट की भी तो जवाबदेही है कि वे उस राजनीति को पुख्ता करें जिस पर जनता ने भरोसा जताया है। वे अपना हित साधन के लिए पार्टी में दाखिला ले लें और मंतव्य पूरा न होने पर दल को कोसने लग जाएं या पाला ही बदल लें तो यह तो क्षणिक उत्साह का क्षणिक परिणाम होगा, लेकिन यह परिणाम दूरगामी दृष्टि से नुकसादेह है। क्योंकि उनके इस आचरण से जनता का विकल्पों की राजनीति से विश्वास उठने लगेगा। यह इसलिए भी है क्योंकि बदलाव की बात करने वाली कांग्रेस और भाजपा दोनों की देश के अनेक राज्यों में सत्तासीन है और कोई ऐसा राज्य नहीं है, जहां की व्यवस्था को आदर्श कहा जा सके। जाहिर है, ऐसे में केंद्र में चाहे कांग्रेस की सरकार रहे या भाजपा की अगुआई वाले गठबंधन की, शासन का तरीका बहुत ज्यादा नहीं बदलने वाला।
साफ है देश को आज ऐसे नेताओं और पार्टियों की जरूरत है जो देश में बदलाव की राजनीति कर सकें। ऐसा नेता ही राजनीति परंपरागत ताने-बाने को तोड़ सकता  हैं और उसे जन आकांक्षा के अनुरूप बुन सकता  हैं। देश और मतदाता वैकल्पिक राजनीति को स्वीकार करने को तैयार है, लेकिन क्या वैकल्पिक राजनीति के सूत्रधार एक्टिविस्ट मानसिक रूप से मुख्यधारा की राजनीति के सूत्र संभालने को तैयार हैं? जो जनता आंदोलनों के लिए सड़क पर उतरती है वह सरकार बनाने के लिए एक्टिविस्टों को वोट भी दे सकती है। दिल्ली इसका उदाहरण है। चिंता यही है कि जिस तरह चुनावी राजनीति को मुद्दा विहीन बना दिया गया है उसी तरह कहीं जनता विकल्प की राजनीति विहीन न हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो परंपरागत राजनीति के समकक्ष विकल्प की राजनीति को खड़ा होने में अधिक समय लगेगा। देश इतना लंबा इंतजार करने के मूड में नहीं है।