Saturday, April 12, 2014

अपने ही गालों पर तमाचे मारती अधीरता

केजरीवाल जीतें या हारें, ये तमाचे हमारी भी गालों पर हैं। उसी तरह जैसे तमाम गंदी गालियां हमारी आत्मा में हर रोज चुभते हुए कांटे हैं। वह स्याही और वह कालिख हमारे अपने चेहरों पर है। उसी तरह जैसे 30 जनवरी 1948 को एक पिस्तौल से दागी गई गोली हमारे दिल को जख्मी कर गई थी। ईश्वर से बार बार प्रार्थना है कि हर बार सही निशाना लगाने वाले हत्यारे अब हर बार अपना निशाना चूकें और इस देश में चिड़ियां और तितलियां तक महसूस करें कि यहां किसी पेड़ पर निर्भय घोसला बनाया जा सकता है। इसके फूलों पर बैठ कर गीत गाए जा सकते हैं। यहां हमारे जैसे निहत्थे लोगों का भी बसेरा हो सकता है। प्रार्थना है कि हम कह सकें, यह हमारा भी देश है। कोई भी चुनाव जीते या हारे, यह प्रार्थना स्थगित नहीं होती।
प्रख्यात कथाकार उदय प्रकाश ने अरविंद केजरीवाल पर दिल्ली में हुए हमले पर यह प्रतिक्रिया अपनी फेसबुक  पोस्ट के माध्यम से दी है। उदय प्रकाश की प्रार्थना में हर उस भारतीय की प्रार्थना शामिल है जिसके हाथ दुआ के लिए तो उठते हैं लेकिन हमले के लिए नहीं उठ सकते। जो हक भी याचक की तरह मांगता है, हाथ फैला कर। इस प्रसंग ने कई और मुद्दों पर विचार के लिए मजबूर कर दिया है। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल पर हमले की सभी ने दलगत भावना से परे हट कर निंदा की है। अच्छा लगता कि जो कुछ और राजनीतिक बयान आए  वे भी कठोरता से ऐसे हमलों को खारिज करते। यह बात अलग है कि सोशल मीडिया पर तमाम शिष्टताओं को खूंटी पर टांग लोगों ने कई अनर्गल टिप्पणियां भी की। लोकतंत्र में जनता का ऐसे धैर्य चूकना ही डराता है। लोकतंत्र में राजनीति आम जनता के मत और धारणाओं पर ही निर्भर करती है। राजनेताओं के क्रियाकलाप और बयानों की धूरी है, जनता का रूख। यही कारण है नेता वही वादे करते हैं जो जनता को रोमांचित करे। वे वही बोलते हैं जो जनता को उत्तेजित करे। नेताओं के वादों और दिखाए गए स्वप्नों में खोई जनता के पास नाराजगी जताने का एक ही उपाय है उसका मताधिकार। लेकिन इस उपाय का इस्तेमाल करने की जगह वह हाथ उठाने लगे तो क्या इस कथित फौरी न्याय के तरीके से डरा नहीं जाना चाहिए?
देश की राजनीति में आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल कितनी दूर तक चल पाएंगे यह भविष्यवाणी करना मेरा उद्देश्य नहीं है लेकिन यह तो माना ही जाना चाहिए कि आम आदमी पार्टी के तरीकों ने देश के शांत राजनीतिक सतह पर कंकर मार कर हिलोर उठाई हैं और यह भी मानना होगा कि यह कंकर अच्छा खासा बड़ा है। आखिरी उन्होंने देश में लालबत्ती संस्कृति और सुरक्षा घेरे में रहने की राजनीति को तोड़ने की पहल की है। देश की दोनों बड़ी पार्टियों को अपनी राजनीतिक के तरीकों पर विचार करना पड़ा, लोकतंत्र की बेहतरी के लिए केजरीवाल का इतना योगदान ही रेखांकन योग्य है।
इस हमले पर अपनी प्रतिक्रियाओं में कई लोगों ने सवाल उठाए हैं और उसमें मेरी भी आवाज जोड़  लीजिए कि क्या कोई अगर अपना वादा पूरा नहीं करता है तो हमें उसे सरेराह पीटना चाहिए? आखिर इस देश में ऐसी कितनी पार्टियां या सरकारें हुई हैं जिन्होंने जनता से किए सारे वादे समय पर पूरे किए हैं? पूछा  जा रहा है कि क्या कभी जनता ने उन लोगों पर हाथ उठाया जो पहले उनके वादे पूरे नहीं कर पाए हैं? यह बात अलग है कि आम आदमी पार्टी से कम समय में ज्यादा सपने दिखाए थे और वह उन्हें पूरे नहीं कर सकी। अपने  काम के पक्ष में केजरीवाल और टीम के अलग तर्क हैं। केजरीवाल और उनके राजनीतिक तौर-तरीकों से असहमति जताई जा सकती है, लेकिन उन पर हमलों को जायज नहीं ठहराया जा सकता।
यहां जवाहर लाल नेहरू का एक प्रसंग याद आ रहा है। आजादी के बाद  एक नाराज व्यक्ति ने उनकी राह रोक कर पूछ लिया कि बहुत बातें करते थे, आजादी के बाद क्या मिला? नेहरू ने मुस्कुरा कर स्नेह से कहा-‘तुम अपने प्रधानमंत्री से इस तरह बात कर पा रहे हो, यही लोकतंत्र की देन है। क्या तुम वायसराय से ऐसे सवाल कर पाते?’ यही केजरीवाल और अन्य नेताओं की राजनीति के तरीके का अंतर है। अरविंद सुलभ है तो हर तरह की प्रतिक्रिया दी जा सकती है।  इससे फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें मुक्का मारने वाले या थप्पड़ जड़ने वाले आप के ही पूर्व कार्यकर्ता थे या यह प्रायोजित स्टंट था।  महत्वपूर्ण यह है कि ऐसा विरोध प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है। मेरी चिंता इन हमलों से ज्यादा इस बात की है कि बैलेट का प्रयोग करने की बजाए जनता ‘बुलेट’ के उपयोग जैसे तरीके क्यों आजमा रही है। क्षणिक आक्रोश व्यक्त कर सालों खामोशी से शोषण, दुर्भावना, भ्रष्ट आचरण और तानाशाही, भेदभाव झेलने की आदत अनेक सदियों से होते हुए इस युग तक आ पहुंची है। सबसे पहले अगर कुछ बदलना है तो यही आदत बदलना होगी। हमें हक को हक की तरह मांगना और नाराजी को लोकतांत्रिक तरीकों से जताने का ढंग सीखना होगा। आखिर,गंभीर लोकतंत्र में मतदाताओं की ऐसी अधीरता की कोई गुंजाईश नहीं होती है।

Tuesday, March 18, 2014

क्या एक्टिविस्ट मुख्यधारा की राजनीति करने को तैयार हैं?


यह विकल्पों की तलाश का दौर है। इस बात को साबित करने के लिए केवल आम आदमी पार्टी की सफलता का उदाहरण देना ही काफी है। सफलता के लिए कांटों भरे परिश्रम से लथपथ मार्ग पर चलने की पैरवी करने वालों के लिए आम आदमी पार्टी की राजनीतिक सफलता चौंकाने वाली रही। अरविंद केजरीवाल के लिए अपने पूर्ववर्ती नेताओं के मुकाबले यह सफलता इसलिए आसान रही, क्योंकि देश की बड़ी आबादी जिसके अगुआ पढ़े-लिखे स्मार्ट युवा हैं, परंपरागत राजनीति से अलग विकल्पों की तलाश कर रही थी। नई पौध का जहां विकल्प नजर आता है वह खुलकर अपना समर्थन प्रदान कर देती है। प्रयोग की हिमायती नई पीढ़ी को राजनीति के परंपरागत तौर-तरीकों को बदलकर नए तरीकों को स्वीकार करने में जरा भी गुरेज नहीं है। इसीलिए वह वैकल्पिक राजनीति को तवज्जो दे रही है। दूसरी तरफ देश की चुनावी राजनीति चेहरों के इर्दगिर्द सिमट सी गई है। इस बार चुनाव में चेहरों से बड़ा कोई मुद्दा नहीं है। हालांकि पहले भी ऐसा हुआ है जब व्यक्ति या परिवार के नाम पर वोट मांगे गए, लेकिन इस बार बात अलग है। बदलाव को पसंद करने वाली पीढ़ी को अपने साथ लेने के लिए कांग्रेस और भाजपा ने राजनीति के अपने ठेठ तरीके को बदला है। देखना होगा कि परिवर्तन का यह आगाज राजनीति के अंतरंग को कितना बदल पाता है।
आजादी के बाद से ही देश में कम या ज्यादा राजनीति के दो छोर देखे गए हैं। एक तरीका पारंपरिक राजनीति का और दूसरा तरीका वैकल्पिक राजनीति कर रहा एक्टिविज्म का। इस धड़े के समर्थकों के काम करने का तरीका एकदम ही अलग। पारंपरिक राजनीति से पूरी तरह उल्टा। राजनीति की यह शाखा बदलाव की पैरवी करती है और काम करने के पुरातन तरीकों को पूरी तरह बदल कर अपने समय के अनुसार बनाने की कोशिशों में जुटी रहती है। आंदोलन की यह राजनीति जनता के मुद्दों को लगातार आवाज देती रही है। यही कारण है कि अधिकांश युवाओं को राजनीति की इस धारा की सोच बहुत पसंद आती है। देखा गया है कि क्रांति की इस राजनीति ने आंदोलन तो कई खड़े किए, लेकिन वह मुख्य धारा की राजनीति यानि की सत्ता की राजनीत से दूर ही रही। हो सकता है कि पहले भी अरविंद केजरीवाल की तरह मुख्य धारा की राजनीति से जुड़कर सत्ता को अपने हाथों में लेने का प्रयास हुआ हो लेकिन एक्टीविज्म की राजनीति करने वालों का वह प्रयास इतने बड़े आकार में सफल नहीं हुआ।  अरविंद केजरीवाल के काम और अंदाज की कई तरह से कई रूपों में आलोचना की जा सकती है, लेकिन इतना तो मानना होगा कि अरविंद ने राजनेताओं और राजनीतिक दलों को लीक से हटकर सोचने पर मजबूर किया। आम आदमी पार्टी ने कुछ और किया हो या न किया हो राजनीति के ठहरे पानी में कंकर जरूर मारा है और यह कंकर इतना बड़ा है कि इसने तरंगें ही नहीं ऊंची लहरें पैदा की हैं।
देश में गिने-चुने स्थानों पर ही सही, लेकिन उन लोगों को चुनाव मैदान में उतारने का मौका दिया जो राजनीति से दूरी बनाकर चलते थे। यह राजनीति के आपदाकाल मेें वैकल्पिक राजनीति का आगाज है। आम आदमी पार्टी से ऐसे लोग जुड़ रहे हैं जो आमतौर पर अब तक किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ना पसंद नहीं करते थे। आम आदमी पार्टी ने अगर विकल्प की राजनीति का एक छोटा सा नमूना दिखाया है तो यह उस पार्टी के कर्ताधर्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे इस विकल्प की राजनीति करने के दायित्व का उचित निर्वहन करें। केवल आम आदमी पार्टी के कर्ताधर्ता ही क्यों, उस पार्टी से जुड़ने वाले हर नेता, एक्टिविस्ट की भी तो जवाबदेही है कि वे उस राजनीति को पुख्ता करें जिस पर जनता ने भरोसा जताया है। वे अपना हित साधन के लिए पार्टी में दाखिला ले लें और मंतव्य पूरा न होने पर दल को कोसने लग जाएं या पाला ही बदल लें तो यह तो क्षणिक उत्साह का क्षणिक परिणाम होगा, लेकिन यह परिणाम दूरगामी दृष्टि से नुकसादेह है। क्योंकि उनके इस आचरण से जनता का विकल्पों की राजनीति से विश्वास उठने लगेगा। यह इसलिए भी है क्योंकि बदलाव की बात करने वाली कांग्रेस और भाजपा दोनों की देश के अनेक राज्यों में सत्तासीन है और कोई ऐसा राज्य नहीं है, जहां की व्यवस्था को आदर्श कहा जा सके। जाहिर है, ऐसे में केंद्र में चाहे कांग्रेस की सरकार रहे या भाजपा की अगुआई वाले गठबंधन की, शासन का तरीका बहुत ज्यादा नहीं बदलने वाला।
साफ है देश को आज ऐसे नेताओं और पार्टियों की जरूरत है जो देश में बदलाव की राजनीति कर सकें। ऐसा नेता ही राजनीति परंपरागत ताने-बाने को तोड़ सकता  हैं और उसे जन आकांक्षा के अनुरूप बुन सकता  हैं। देश और मतदाता वैकल्पिक राजनीति को स्वीकार करने को तैयार है, लेकिन क्या वैकल्पिक राजनीति के सूत्रधार एक्टिविस्ट मानसिक रूप से मुख्यधारा की राजनीति के सूत्र संभालने को तैयार हैं? जो जनता आंदोलनों के लिए सड़क पर उतरती है वह सरकार बनाने के लिए एक्टिविस्टों को वोट भी दे सकती है। दिल्ली इसका उदाहरण है। चिंता यही है कि जिस तरह चुनावी राजनीति को मुद्दा विहीन बना दिया गया है उसी तरह कहीं जनता विकल्प की राजनीति विहीन न हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो परंपरागत राजनीति के समकक्ष विकल्प की राजनीति को खड़ा होने में अधिक समय लगेगा। देश इतना लंबा इंतजार करने के मूड में नहीं है।

Sunday, January 12, 2014

कैग की रिपोर्ट में खुलासा : मप्र राज्य पर्यटन निगम प्रदेश को हॉट टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाने में असफल

 हिंदुस्तान का दिल दिखाने के लिए न बनी योजना, न खर्च हुआ पूरा पैसा

 ‘सतपुड़ा की रानी देखो, भोपाल राजधानी देखो, राजधानी में झील देखो, बहता पानी झिलमिल देखो, धर्मों की महफिल देखो, हिंदुस्तान का दिल देखो... कहते हुए मप्र राज्य पर्यटन निगम के प्रदेश को हॉट टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाने की कोशिशें तो खूब की लेकिन कैग का मानना है कि ये कोशिशें केवल दिखावा है। निगम ने न तो प्रदेश के पर्यटन के विकास के लिए ठोस योजना बनाई न इस कार्य के लिए मिली अनुदान राशि का  उपयोग किया। यहां तक कि पर्यटकों के आने के आंकड़े भी अविश्सनीय थे।  कैग ने कंवेंशन निर्माण पर किए गए 37.47 लाख का व्यय भी निरर्थक माना।
मप्र राज्य पर्यटन विकास निगम लिमिटेड की निष्पादन लेखा परीक्षा के बाद भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कैग) ने कई कड़ी टिप्पणियां की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार ने 2010 में नई पर्यटन नीति बनाई लेकिन निगम ने राज्य में पर्यटन के विकास के लिए कोई योजना नहीं बनाई। वह संयुक्त उपक्रमों के माध्यम से निजी क्षेत्र को आमंत्रित करने में भी असफल  रहा है।
 किराए में ज्यादा बढ़ोतरी घट गए यात्री
कैग ने निगम की 9 होटलों में की गई टैरिफ बढ़ोतरी पर भी सवाल उठाए। निगम ने वर्ष 2007-08 से 2011-12 के दौरान 9 होटलों की टैरिफ दरों में 27 से 102 प्रतिशत की वृद्धि की गई। कैग ने कहा है कि उस होटलों में कम यात्री आ रहे थे। इन होटलों की भरने की दर 15 से 44 प्रतिशत के बीच थी। किराए में वृद्धि करते समय इस कम यात्री संख्या को ध्यान में नहीं रखा गया। इसके कारण पांच होटलों की यात्री संख्या में कमी आ गई और शेष चार में कम वृद्धि हुई। निगम 32 ईकाइयों में चालन अनुपात लक्ष्य के अनुसार नहीं रख पाई और न ही खाद्यान्न सीमा को मेंटेन कर सकी। इसके कारण खाद्यान्न लागत 2.81 करोड़ अधिक रही।
खराब वित्तीय प्रबंधन
कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि निगम को वर्ष 2007-08 से 2011-12 के दौरान केंद्र व राज्य सरकार तथा वित्त आयोग से 248.94 करोड़ का अनुदान मिला लेकिन इस दौरान अनुदान की उपयोगिता का अनुपात 42.52 से 56.32 प्रतिशत के बीच ही रहा। कंपनी ने खर्च किए बिना वित्त आयोग की 10 योजनाओं में 3.12 करोड़, केंद्र सरकार की 7 योजनाओं में 4.90 करोड़ तथा प्रदेश सरकार की 4 योजनाओं में 93 लाख का खर्च किए बिना उपयोगिता प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर दिए।


Thursday, January 9, 2014

कांग्रेस को चमत्कारी चेहरा चाहिए या परिवर्तन करने वाला नेतृत्व ?

क्या यह प्रश्न अब उत्तर पाने को है कि क्या प्रियंका गांधी कांग्रेस की कमान संभाल रही है? विधानसभा चुनावों की करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस और कांग्रेस कार्यकर्ता ऐसी ही किसी ‘जड़ी’ की तलाश में है जो बूढ़ी हो चली पार्टी में युवकोचित सामर्थ्य का संचार कर दे। यह उम्मीद कुछ बरस पहले तक राहुल गांधी से की जा रही थी लेकिन राहुल गांधी ने डायलिसिस पर पड़ी कांग्रेस की संजीवनी का जो रास्ता चुना वह संगठनात्मक बदलाव की जटिलताओं से घिरा है। वैकल्पिक चिकित्सा की तरह इस बदलाव के परिणाम देर से दिखाई देंगे लेकिन कांग्रेस को तो ऐसा रसायन चाहिए जो तुरंत ही उसकी मूर्च्छा दूर कर सके। देश में नरेंद्र मोदी की  लहर सी है।
अधिकांश कांग्रेसी पहले यह स्वीकार नहीं कर रहे थे लेकिन खुले तौर पर स्वीकारने लगे हैं कि मोदी एक मुद्दा है। अब तो दिल्ली में सत्ता संभाल रही ‘आप’ भी खतरा बन गई  है। ऐसे में राहुल के नेतृत्व को क्या फिर से प्रियंका का साथ मिलेगा जैसा वे बहन होने के नाते उत्तर प्रदेश के चुनावों के दौरान देती रही हैं या वे और बड़ी भूमिका संभाल  कर उन लाखों कांग्रेस कार्यकर्ताओं की उम्मीदों को पूरा करेंगी जो कांग्रेस के कर्ताधर्ताओं के तौर-तरीकों को देख कर त्रस्त हो चुके हैं? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रियंका के आने से कांग्रेस जी उठेगी या जनता चेहरे  के करिश्मे की तुलना में योजनाओं और काम को महत्व देने वाली राजनीति का समर्थन करेगी? सवाल बड़े हैं और इनके जवाब खुद कांग्रेस के पहले गांधी परिवार को खोजना है।
कांग्रेस भले ही देश की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी हो। भले ही इसमें कितने ही गुणी और क्षमतावान नेता हों लेकिन कांग्रेस की शुरुआत तो गांधी-नेहरू परिवार से ही होती है। बाकी का नंबर इनके बाद आता है। यही कारण है कि पार्टी ने इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद पार्टी ने उनके बेटे राजीव गांधी की ओर देखा। जब राजीव गांधी नहीं रहे तो सोनिया गांधी, प्रियंका और राहुल गांधी की ओर टकटकी लगाई गई। कहते हैं सोनिया अपने पति को राजनीति में नहीं आने देना चाहती थी लेकिन ऐसा हो न सका। जब स्वयं की बारी आई तो सोनिया ने कांग्रेस की कमान तो संभाली लेकिन प्रधानमंत्री के पद से स्वयं को दूर ही रखा। तब  प्रियंका की तुलना इंदिरा गांधी से की गई और उन पर दबाव बनाया कि वे कांग्रेस की पतवार थाम लें। यही कारण था कि 2004 में राहुल गांधी के चुनावी राजनीति में प्रवेश से भी पहले प्रियंका गांधी के राजनीति में सक्रिय होने की चर्चाएं होती थी। खासकर 1999 में रायबरेली के चुनाव में उनके द्वारा भाजपा प्रत्याशी अरुण नेहरु पर किए गए भावुक हमले की जिसने उस चुनाव का रुख बदल दिया। कांग्रेस प्रत्याशी कैप्टन सतीश शर्मा के समर्थन में प्रियंका ने एक सभा में कहा था-  ‘मुझे रायबरेली के लोगों से एक शिकायत है कि जिसने मेरे पिता के मंत्रिमंडल में रहते उनसे गद्दारी की, जिसने भाई की पीठ में छुरा घोपा, आपने उसे रायबरेली में घुसने कैसे दिया?’ प्रियंका के इतना कहने के बाद अरुण नेहरु न केवल हारे बल्कि चौथे स्थान पर पहुंच गए।
कांग्रेस को प्रियंका में वह सब नजर आया जो जनता को लुभा सकता था और उनकी भावुकता को वोट में बदल सकता था। प्रियंका ने राजनीति से दूरी बनाने का फैसला किया तो सारी उम्मीदें राहुल तक आ कर टिक गई। राहुल पार्टी में आए जरूर लेकिन उन्होंने पद पहले संगठन को सुधारने का काम चुना। यह ऐसी राह थी जो  कई कांग्रेसियों को पसंद नहीं आ रही है। राहुल आम आदमी और कार्यकर्ता की बात कर रहे हैं और नेताओं को तो ऐसे नेता की तलाश है जो केवल पार्टी का ‘चेहरा’ हो। वह पार्टी की ‘मांसपेशियों’ से छेड़छाड़ न करे। यही कारण है कि प्रत्यक्ष रूप से राहुल की बातों को स्वीकारने वाले नेता उन निर्णयों को लागू ही नहीं होने देते जो उन्हें पसंद नहीं है या जो उनकी राह में बाधा बनते हैं। यही कारण है कि राहुल के ‘आॅपरेशन कांग्रेस’ से अलग बड़ी संख्या में नेता ‘करिश्माई चेहरा’ प्रियंका की सक्रियता से आस लगाए बैठे हैं। मंगलवार को प्रियंका द्वारा कांग्रेस के बड़े नेताओं के साथ बैठक  का यही अर्थ निकाला गया कि वह खुलकर बड़ी भूमिका में आने की तैयारी में है। 
मोदी और ‘आप’  के दौर में प्रियंका में अपना भविष्य खोजने वाली कांग्रेस को सोचना होगा कि क्या सच में प्रियंका कांग्रेस के लिए तुरुप का इक्का  है? कांग्रेस बार-बार यह खारिज करती रही है कि प्रियंका राजनीति में आ रही है। अभी भी उसके बड़े नेता प्रियंका के बैठक लेने को सामान्य घटना ही मान रहे है लेकिन आम कांग्रेसी के लिए प्रियंका का कांग्रेस की कमान संभालना आम बात नहीं है। यह उसके लिए उसकी पंसदीदा पार्टी के जीवन मरण का प्रश्न है।  भीतर ही भीतर यह भय भी है कि कहीं प्रियंका भी असफल हो गई तो? इस तो का जवाब है कि तब पार्टी को चेहरे के करिश्मे पर निर्भरता को खत्म करना होगा। यह निर्भरता आज से नहीं है, बरसों पुरानी है। अगर पार्टी को चेहरे पर निर्भरता को खत्म करके ही आगे बढ़ना है  तो वह आज राहुल-प्रियंका के साथ ही यह कदम क्यों नहीं उठाती है? चेहरों पर निर्भरता खत्म करना ही तो आखिर पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी का एजेंडा है।

Friday, January 3, 2014

‘आप’ की वजह से बढ़ गई अन्य दलों की चुनौतियां

आम आदमी पार्टी के मुखिया से दिल्ली के मुख्यमंत्री बने अरविंद केजरीवाल ने आखिरकार अपनी सरकार का विश्वास जीत लिया। साल 2014 का दूसरा ही दिन इस ऐतिहासिक पल का गवाह बना जब एक साल पुरानी पार्टी का मुखिया देश का दिल कही जाने वाली दिल्ली का शासक बना। वह दिल्ली जो बहादुर शाह जफर की दिल्ली कही जाती है। ‘आप’ का उदय और ‘आप’ का बहुमत साबित करना कई मायनों में ऐतिहासिक है। इस सफलता को बहुत सतही शब्दों में कहा जाए तो ‘आप’ की यह सफलता कांग्रेस सरकार के कामकाज से नाराजी का परिणाम है। ईमानदारी के पक्ष में टीम केजरीवाल के काम और कहे पर लोगों ने भरोसा जताया। यह बहुत बड़ा विरोधाभास है कि जिस कांग्रेस की सरकार को कोस कर केजरीवाल ने वोट हासिल किए, वही कांग्रेस विश्वास मत हासिल करने में ‘आप’ की सीढ़ी बनी।
शपथ के पहले 48 घंटों में केजरीवाल ने उन सारे वादों को पूरा कर दिया जिनके बल पर वे सरकार में आए थे। इसके पीछे यह उद्देश्य भी था कि अगर सदन में विश्वास मत हासिल न हो तो कम से कम यह तो कहा जा सके कि हमारा मंतव्य था, कांग्रेस ने वादा खिलाफी की। अब सरकार भरोसा जीत चुकी है तो उसके पास काम करने के छह माह हैं। इन छह माह में उसके खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव नहीं आ सकता। यही छह माह अब सदन के बाद अपने विश्वास मत को साबित करने का सुनहरा अवसर और सबसे बड़ी चुनौती है। चुनौती यह भी कि लोकलुभावन बातें करना आसान हैं और उनको यर्थाथ में पूरा करना अलग बात है। कांग्रेस ने शायद यही सोच कर ‘आप’ को समर्थन भी दिया है कि बाहर रह कर बहुत विरोध किया, अब सरकार चला कर दिखाओ। इस लिहाज से वही कांग्रेस ‘आप’ की सबसे बड़ी चुनौती है जो सदन में उसके साथ बैठी है।
जनता के समर्थन के बाद मेट्रो यात्रा, लालबत्ती का तिरस्कार, मुफ्त पानी और सस्ती बिजली, मीटरों और खातों की जांच माहौल ‘आप’ के पक्ष में था। अब तो उसके साथ सदन में विश्वास भी है। अब सवाल यह है कि इस विश्वास मत के बाद अब आगे क्या? असल में दिल्ली की ‘आप’ की सरकार एक फिल्मी प्रेम कहानी के त्रिकोण की तरह है। यहां ‘सत्ता’(पॉवर) अगर प्रेमिका है तो ‘आप’ अपने उद्देश्यों और अपने वादों को साबित करने के लिए उसे पाना चाहती थी। भाजपा वह प्रेमी है जिसके हाथ प्रेमिका के पास पहुंच कर भी रीते हैं। वह विपक्ष में है और उसके दुश्मन कांग्रेस ने विरोधी से हाथ मिला कर सत्ता रूपी प्रेमिका तक उसके पहुंचने की राह रोक दी। कांग्रेस,‘आप’ और भाजपा के इस प्रेम त्रिकोण के कई कोण है। यहां पर्याप्त ईर्ष्या भी है और अबूझ सा नाता भी जिसके कारण कांग्रेस उस पार्टी का साथ दे रही है जिसका हाथ उसकी पराजय का सबब बना। ‘आप’ की ओर से बार-बार कहा गया कि हम सरकार बनाने के इच्छुक नहीं हैं। हमने किसी से समर्थन नहीं मांगा। जनता ने सरकार बनाने का आदेश दिया। हम अपना काम कर रहे हैं। विश्वासमत पर बहस के दौरान भाजपा विधायक दल के नेता हर्षवर्धन ने ‘आप’ के पहले दोनों फैसलों की आलोचना के साथ-साथ पार्टी की फंडिंग और दूसरे मसले भी उठाए। यह भाजपा की नाराजी की पहली अभिव्यक्ति थी। साफ जाहिर होता है कि अब तक चुप रही भाजपा अब तीखी प्रतिक्रिया देने से नहीं चुकेगी। यानि कि जन आशीर्वाद के नाम पर ‘आप’ का सम्मान विराम लेगा और ताकतवर विपक्ष खुल कर सत्ताधारी ‘आप’ पर हमले करेगा।
इस प्रेम तिकोण में कांग्रेस तीसरा और सबसे कमजोर पक्ष है। वह सत्ता से सबसे दूर होनी था लेकिन वही सत्ता पाने का जरिया बनी। कांग्रेस ने ‘आप’ सरकार को समर्थन देने का फैसला जिस इरादे से किया था, वह पूरा नहीं हुआ। बल्कि पार्टी ने खुद को फंसा लिया है। वह सोच रही थी कि ‘आप’ की अनुभवहीनता उसके लिए लाभदायक होगा लेकिन केजरीवाल सरकार ने जिस तेजी से शुरूआती फैसले किए हैं, उसके निहितार्थ को भी समझना चाहिए। ये फैसले विश्वासमत हासिल करने के बाद भी किए जा सकते थे। विश्वास मत गुरुवार को था, पर अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार को कहा कि मेरे पास केवल 48 घंटे का समय है क्योंकि कांग्रेस को लेकर चल रही अटकलों के कारण उनके मन में संदेह उपज चुका था। लिहाजा, कांग्रेस के पास पलटने का कोई मौका नहीं था। ‘आप’ को प्रचलित राजनीति नहीं आती, मगर उसने सबसे शातिर राजनीति का पैंतरा चला है। असल में ‘आप’ दिल्ली के बहाने दिल्ली (संसद) तक पहुंचना चाहती है। इसलिए अगले छह माह वह जनता के भरोसे पर खरा उतरने के लिए पूरे प्रयत्न करेगी। सबसे बड़ी बात यह है कि उसकी नकल के तौर पर ही सही लेकिन अन्य दलों को भी अपने कामकाज का तौर तरीका बदलना होगा। ‘आप’ की सफलता इसमें भी है कि वह देश की राजनीति की चाल बदल रही है। उसकी चुनौतियां अपनी जगह है लेकिन इससे अन्य दलों की चुनौतियां खत्म नहीं हो जाती।