Tuesday, November 15, 2011

ख्याल

आज थोड़ा उदास था, दर्द से परेशान भी तभी एक शेर सुना जिसकी कहन कुछ यूँ थी-बचपन के वे दिन कितने मासूम थे, हर बात पर यकीं हो जाता था। हम मान लेते थे कि जाने वाले आसमान में तारे बन जाते हैं।" अचानक सुनाई दिया यह शेर मुझे अतीत में ले गया और यादों में खोने के बाद दर्द कम और दर्शन बढ़ गया।
मुझे याद आया बात 1985 की रही होगी। उस वक्त मेरी उम्र करीब 9 साल। दाँत टूट नहीं रहे थे। हर बच्चे की तरह मेरी भी इच्छा थी कि मैं जल्दी से बढ़ा हो जाऊँ। दूध के दाँतों का न टूटने का अर्थ था मेरा बच्चा रह जाना। जबकि कुछ दोस्तों के दाँत टूटना शुरू हो गए थे। मैं इसी चिंता में रहता कि कम दाँत टूटना शुरू हों और कब में बढ़ा कहलाऊँ। तभी आगे के एक दाँत ने हिलना शुरू किया। रोमांचक था दाँत गिरने का ख्याल। लेकिन अंदर एक भय भी दाँत दर्द होगा। इसी ऊहापोह में पता चला कि मेरे गृह नगर में एक शिविर लगने वाला है जहाँ एक सज्जन किसी वैकल्पिक पद्धति से दाँत निकालेंगे। चूँकि पैसे लगना नहीं थे तो मुझे किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहीं था। फिर क्या था, मैंने यह सोच कर बिना दर्द के दाँत निकाल दिया जाएगा और मेरी हसरत भी पूरी हो जाएगी बिना समय गँवाए पंजीयन करवा दिया। इंतजार के बाद वह दिन आ ही गया जब शिविर का आयोजन हुआ। मैं स्कूल जाने के लिए समय के पहले तैयार हो गया। बस्ता टाँग निकल रही था कि अपनी नानी (जो माँ ही है) को न बताने की हिम्मत न कर पाया। याद नहीं उन्होंने क्या कहा लेकिन मैं कुछ देर में शिविर स्थल पर था। कई बड़े लोगों की कतार में एक मैं ही बच्चा था जो 'बड़ा" होने आया था। इर घड़ी 11 बजे की सूचना दे रही थी उधर स्कूल की घंटी बजने और देर होने पर सर की फटकार का डर हावी हो रहा था। लेकिन इस सब पर भारी था दाँत निकलवाने की खुशी। 
आखिर मेरा नंबर भी आ गया। चिकित्सक सज्जन ने देखा और कहा-दाँत तो हिल ही रहा है। जल्दी उखड़ जाएगा। इसे निकालने की जरूरत नहीं है। मैं रूँआसा हो गया और जिद कर बैठा कि नहीं आप तो निकाल दो। मुझे दर्द होगा। वे मुस्कुराए और अपनी कला से बिना दर्द दिए मुझे 'बड़ा" बनाने की प्रक्रिया की ओर भेज दिया।
उस दिन खुशी-खुशी अपना दाँत लिए घुमता रहा। फिर किसी बुजुर्ग के कहने पर दाँत किसी मकान की छत पर फेंक दिया बेहतरी की कामना के साथ। 
करीब 27 साल बाद ऐसा ही मौका मेरे जीवन में फिर आया जब एक दाँत निकलवाने जाना पड़ा। आज बड़े होने की खुशी नहीं बल्कि ज्यादा ही बड़े हो जाने का भय सता रहा था। शरीर के कमजोर होने की शुरूआत भीतर ही भीतर खाए जा रही थी। आज ज्यों ही चिकित्सक ने कहा-'दाढ़ निकाल देते हैं।" मैं चुप हो गया। जीभ फेर कर दाढ़ को अलविदा कहते इतना साथ देने के लिए शुक्रिया कहना चाहा। आखिर इसी के कारण में इतना रस प्राप्त कर पाया था। 
खैर, दो दाँतों के जाने के बीच में मैं भरपूर जिया लेकिन इस उम्र में एक दाँत का साथ छोड़ कर जाना मुझे दार्शनिक बना रहा है। कुछ यूँ कि उम्र खत्म होने की चिंता होने लगी है और लगता है क्या कुछ कर पाया अब तक।
बचपन में सीखाया जाता था-जीभ नम्र होती है और दाँत सख्त। इसलिए जीभ अंत तक बनी रहती है और दाँत विदा हो जाते हैं असमय। सोचता हूँ, मैं कितना 'जीभ" हुआ और कितना 'दाँत"। कितना चला अब तक और कितना रहा बाकी। एक साथी के जाने का दुख तो है ही। 

Sunday, November 6, 2011

ये क्या बात हुई, आप रोज गाड़ी चलाते हैं?

एक सरकारी टाइप बयान- 
फिर पेट्रोल के दाम बढ़े और आप लगे चिल्लाने। ये क्या बात हुई? आपको लगता है, सरकार के पास और कोई काम नहीं रह गया है जो वह हर माह-पन्द्रह दिन में पेट्रोल के दाम बढ़ाने लगती है। जनाब, गाड़ी आप चलाएँ, ईधन आप फूँकें और दाम बढ़े तो सरकार को कोसें। यह तो ठीक नहीं है। भले आप सोचते रहें कि केन्द्र सरकार के करोड़पति मंत्रियों को गरीबों की फिक्र नहीं है। सरकार को केवल तेल कम्पनियों के घाटे को ही कम नहीं करना आता बल्कि वह आम आदमी की चिंता भी करती है, तभी तो जब भी कीमतें बढ़ती है कोई जिम्मेदार व्यक्ति चिंता जताने जरूर सामने आता है। उनकी फिक्र उनके बयान से ज्यादा चेहरे पर झलकती है। फिर क्या दोष अगर यह चिंता काम में नहीं दिखती।

 फिर आप भी दोष तो केवल केन्द्र सरकार को देते हैं, कभी राज्य सरकार से भी तो पूछिए। केवल हम ही थोड़े हैं जिसके खजाने में दाम बढ़ते ही पहले से ज्यादा कर आता है। राज्य सरकारें भी बैठे-ठाले मलाई खाती हैं। ईधन का दाम बढ़ा कर कोप हम झेलें और विपक्षी पार्टी की राज्य सरकारें हमारे खिलाफ पलट वार भी करें। 
वाह, भई वाह। यह क्या बात है? थोड़ी नाराजी उधर भी तो जाहिर कीजिए।

फिर हमें तो देश चलाना है। आप को क्या पता, यूरोपीय देशों में क्या हो रहा है। हमारी हिम्मत देखिए कि हम मँहगाई रोकने की चिंता तो जताते हैं। आखिर हम भी कम तक घाटा सहें? क्या कहा, इतनी रकम तो घोटालों में स्वाहा हो जाती है। देखिए, अभी आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं। अगर हुए तो हम कोशिश करेंगे कि यह राशि लौटा दी जाए।

आप भी तो अपना आकलन कीजिए। सेहत बनाने को पैदल चलेंगे। जिम में घंटों वॉकर पर दौड़ेगे। साइकिलिंग करेंगे, लेकिन 
ईधन बचाने कभी पैदल नहीं चलेंगे। ये क्या,आपको सुविधा मिली तो रोज गाड़ी चलाने लगे। कभी पैदल भी जाइए। देशहित और जेब हित में पेट्रोल बचाइए।


याद रखिए, हमसे सवाल मत कीजिए। 
हमें याद है, हम जनता के सेवक है। तभी तो उसकी फिक्र में मँहगाई के पर कतरने की बातें करते हैं। हम पर भरोसा रखिए। एक बार घाटा कम हो जाए, कीमतें जरूर घटेंगी।

Tuesday, October 11, 2011

मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो मेरी तरह तुम भी झूठे हो



बात जब जगजीत की हो तो क्यूँ न उन्हीं के शब्दों में बयाँ की जाए? आज जगजीत हमारे बीच में नहीं है लेकिन-
 'जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया/
उम्र भर दोहराऊंगा ऐसी कहानी दे गया।?"
उम्र चाहे जो हो, शायद ही कोई होगा जिसने कभी जगजीत की गजल को न सुना हो या कभी गुनगुनाया न हो। कई हैं जिन्होंने अपने प्रेम का इजहार करने के लिए जगजीत की गाई गजलों का ही सहारा लिया है। हमारे जीवन में कितनी यादें, कितनी बातें। फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई जगजीत को भूला दे-
'कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे/
मैं उतना याद आउंगा मुझे जितना भुलाओगे।"

यादें कितनी अजीब हैं...बिन बुलाए आ धमकती हैं, कहीं भी कभी भी...। जगजीत की आवाज की ऊँगली पकड़ कर कोई भी अपने बचपन में चला जाता है और कहने लगता है-
'ये दौलत भी ले लो ये शौहरत भी ले लो.../
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी.../
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन.../
वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी....।"
 उम्र के किस मोड़ पर जगजीत साथ नहीं होते? उस मकाम पर भी जहाँ सबसे ज्यादा मुश्किल होती है। जगजीत जैसे हमारी ही बात तो कह रहे थे-
'प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है।
नये परिन्दों को उड़ने में वक्त तो लगता है।
जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था/
लम्बी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है।"

जिंदगी का कोई सिरा जब उलझता है तो जगजीत राह सुझाने चले आते हैं-
'धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो/ 
जिंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो।"

जीवन की साँझ ढ़ले जब गुजरा वक्त चुभने लगता है तो 'माँ" ही राहत देती है।

वो आवाज जो कदम-कदम पर साथ निभाया करती थी, वो अब नए लिबास में सामने नहीं आएगी। काश! ऐसा हो जाए-
'कभी यूँ भी तो हो/परियों की महफिल हो/
कोई तुम्हारी बात हो/और तुम आओ। कभी यूँ भी तो हो
/सूनी हर मंजिल हो/कोई न मेरे साथ हो/और तुम आओ।"

यादें अनगिनत हैं। जो कभी जगजीत से मिले भी नहीं, उनका भी जगजीत की आवाज से गहरा नाता है। आज लगता है कितना मुश्किल रहा होगा अपने बेटे के बेवक्त चले जाने के गम को भूला कर यह गाना-'चिट्ठी न कोई संदेश, जाने कौन सा है वो देश/ कहाँ तुम चले गए।" आखिर 'कोई ये कैसे बताए कि वह तन्हा क्यूँ हैं?"जगजीत बहुत याद आएँगे।
'वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफत भी अता करे/
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो।"









Friday, September 23, 2011

'माननीय" यह संसद के कैंटिन की नहीं, गरीब की थाली है


27 बार हुआ सांसदों के वेतन-भत्तों में संशोधन और गरीब के लिए 'गरीब" ही रही सरकार



 योजना आयोग के जरिए केन्द्र सरकार ने जो गरीब होने की परिभाषा तय करने वाला का हलफनामा दिया है उसे पढ़ कर एक मित्र राहुल गामोठ ने तंज किया-'योजना आयोग के कर्ताधर्ताओं को कह दो कि वे अपना वेतन 1000 रूपए तय कर लें और शहर में गुजर कर के दिखलाए। राहुल ने कहा कि आयोग ने 965 रूपए बताया है हम तो उन्हें 35 रूपए ज्यादा दे रहे हैं।"
 'माननियों" के प्रति राहुल जैसे देश के तमाम लोगों का गुस्सा और बढ़ेगा अगर उन्हें पता चले कि 1954 के बाद से अब तक सांसदों के वेतन और भत्तों में 27 बार संशोधन हो चुका है। 2005 में उनका वेतन 12 हजार था जो अब 50 हजार रूपए प्रतिमाह है। जबकि 2004 में की दर से हर माह 579 रूपए कमाने वाले को बीपीएल माना गया था जिसकी सीमा बढ़ कर आयोग ने 965 रूपए कर दी है।

गरीब कौन है? वो सांसद जिस पर वेतन के साथ करीब 15 सुविधाओं के लिए सालाना करीब 45 लाख रूपए खर्च होता है या वो जो माह में पाँच हजार की कमाई करता है? सरकार हमेशा ही आँकड़ो में विकास नापती रही है अमीरी-गरीबी को भी आँकड़ों की बाजीगरी में उलझा दिया है। ज्यादा समय नहीं हुआ। अगस्त 2010 में हमारे सांसद इस बात से नाराज थे कि कैबिनेट ने उनका वेतन केवल 50 हजार क्यों किया, जबकि वेतन 16 हजार से बढ़ा कर 80 हजार किया जाना था। इस बात पर खूब एसएमएस चले और लोगों ने संसद की कैंटिन में रियायती दल पर मिलने वाली खाद्य सामग्री की सूची पेश कर डाली।
 गरीबों की 'अमीरी" बताते योजनाओं आयोग के हलफनामे के दौरान सांसदों की थाली से गरीब की थाली की तुलना की तो पाया कि गरीबों की दयनीय हालत स्वीकार करने में भी हम उदार नहीं है। संसद में कैंटिन के लिए कुल 5.3 करोड़ का बजट आवंटित है। यहाँ सांसदों को रियायती दर पर मात्र 12 रूपए 50 पैसे में भरपेट खाने को शाकाहार सब्जी मिल जाती है। इस खाने की गुणवत्ता पर शक करना बेकार है लेकिन एक गरीब मजदूर को बस स्टैण्ड या रेलवे स्टेशन के पास की किसी छोटी सी दुकान पर भी 20 रूपए से कम में भोजन नहीं मिलेगा।

सरकार इसलिए भी गरीबों के साथ आँकड़ों की बाजीगरी कर रही हैं क्योंकि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को रियायती योजनाओं से दूर रखना चाहती है। सामाजिक कार्यकर्ता सचिन जैन कहते हैं कि योजना आयोग द्वारा तय की गई गरीबी की रेखा निश्चित तौर पर हज़ारों हज़ार लोगों को चुपचाप मारती जाएगी। आयोग को चुनौती देते हुए वे कहते हैं-' मैं आपसे आपके ही द्वारा तय की गयी राशि पर न माह की जिन्दगी बिताने का निवेदन करता हूँ, ताकि आप सिद्ध करें कि इस राशि में जिन्दा रहना संभव है। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो गरीबों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना बंद कीजिए।"

सांसद की थाली                              गरीब की थाली


शाकाहारी थाली-12.50 रू.                  20 रूपए

एक कटोरी दाल -1.50 रू.                22 रूपए (हाफ)

रोटी - 1                                            2.5 रू. से 3 रूपए

चावल -2 रूपए प्लेट                        15 से 20 रूपए (हाफ प्लेट)

चाय-1प्रति कप                                 4 से 5 रूपए



सांसदों की वेतन वृद्धि (2010)

प्रस्तावित वेतन - 80 हजार रुपए

मूल वेतन 2005 - 16 हजार

2010 में हुआ -50 हजार रुपए

दफ्तर का खर्च बढ़ा- 20 से बढ़ कर 40 हजार रुपए

पेंशन हुई - 8 से बढ़ कर 20 हजार रुपए



वाहन के इस्तेमाल के लिए जहाँ पहले प्रति किलोमीटर 13 रुपए मिलते थे, वहीं सांसद अब 16 रुपए प्रति किलोमीटर कर दिए गए हैं।

# हर सांसद का पति या पत्नी अब पहली श्रेणी में आ जा सकेगा.



Monday, September 19, 2011

तब क्या करते कविगण

अगर चाँद मर जाता

झर जाते तारे सब

क्या करते कविगण तब?

 
खोजते सौन्दर्य नया

देखते क्या दुनिया को

रहते क्या, रहते हैं

जैसे मनुष्य सब

क्या करते कविगण तब?

 
प्रेमियों का नया मान

उनका तन-मन होता

अथवा टकराते रहते वे सदा

चाँद से, तारों से, चातक से, चकोर से

कमल से, सागर से, सरिता से

सबसे

क्या करते कविगण तब?

 
आँसुओं में बूड़-बूड़

साँसों में उड़-उड़कर

मनमानी कर- धर के

क्या करते कविगण तब?

 
अगर चाँद मर जाता

झर जाते तारे सब

क्या करते कविगण तब?
- त्रिलोचन

Thursday, April 14, 2011

कैसे बताता कि नोएडा में क्या हो रहा है

नोएडा...राजधानी के समीप का वह क्षेत्र जो सबसे तेज विकसित हो रहा है...तरक्की की इस इबारत के साथ ही नोएडा के तीन सेक्टर हाल ही में बहुत चर्चा में रहे। सेक्टर 31 निठारी के मासूमों की निर्मम हत्या के लिए, सेक्टर 25 आरूषि और हेमराज की हत्या के लिए और अब सेक्टर 29 दो बहनों की मौत के लिए जिसकी जवाबेदेही इंसानियत पर है।

यह आप तय करें कि यह सवाल है, आरोप है या सच बयानी कि नेट के जाल में खोया, चैनलों की भीड़ से घिरा इंसान दुनिया भर की ही नहीं, समूचे ब्रह्मांड की बारीक से बारीक और छोटी से छोटी जानकारी पा लेना चाहता है, लेकिन वह अपने पड़ोस से ही अनजान है। क्यों? क्यों ऐसा हो रहा है कि इंसानियत के कलंकित होने की खबर, और ज्यादा सूखने की खबर नोएडा ही आ रही है? उस नोएडा से जो हमारी तरक्की की जगमगाती तस्वीर है।

इन घटनाओं को जिसने भी देखा, जाना, पढ़ा वह दंग रह गया, मानवीयता का ऐसा लोप, इस कदर की गिरावट?  रसातल में?

क्या कहूँ, किससे सवाल करूँ कि ऐसा क्यों हुआ? दो बहनें महिनों अपने घर में कैद रहीं और किसी ने उनकी सुध्ा तक न ली। टीवी पर दिखाई दे रही कामवाली बाई बता रही है कि मुझे काम से हटा दिया गया था क्योंकि उनके पास वेतन देने को पैसे नहीं थे। किराना व्यापारी बता रहा है कि फरवरी में आखिरी बार ब्रेड मँगवाया गई थी। और सवाल हुए तो राज खोला कि पैसे चैक से देती थीं, कभी दरवाजा खोला ही नहीं कि चेहरा देख पाते। हमेशा आधा दरवाजा खोल कर सामान ले लिया जाता था।

वाह रे इंसानों। मुझे तो मेरा गाँव याद आ रहा है। काम वाली बाई परिजन से ज्यादा हमारी देखरेख और चिंता करती थी। कभी घर से दूर चले जाते तो गाँव के कोई भी परिचित काका,मामा डाँट कर सीध्ो घर जाने की हिदायत देते। कोई भी व्यापारी क्यों न हो सामान देने के बाद पैसे और सामान संभाल कर ले जाने की ताकीद करता। और कभी सूची में सामान कम ज्यादा होता तो खुद ही पूछ लेता-मेहमान आए थे क्या, जो ज्यादा सामान की जरूरत पड़ी। हमारा ऐसा समाज खो गया और किसी को दुख भी न हुआ!

अरे भले लोगों, जरा अपने मुनाफे के लिए ही सही, उन बहनों को कस्टमर समझ कर ही सही, थोड़ी सुध्ा ले ली होती तो वे कष्ट से न मरती।

अखबारों में ये खबरें, नोएडा की इस तरक्की की खबरों को पढ़ता हूँ तो एक तरह से सूकुन भी पाता हूँ कि अच्छा हुआ मैं यहाँ भोपाल में आ गया और मेरी नानी वहाँ गाँव में छूट गई। वर्ना उन्हें कैसे अखबार पढ़ कर ऐसी खबरें सुनाता? कैसे बताता कि बच्चों को कोई मार कर खा सकता है, कैसे बताता कि माँ-बाप पर ही अपनी बेटी की हत्या का संदेह है और कैसे बताता कि दो बहनें इसलिए जान गँवा रही हैं कि उनके भाई या पड़ोसी को उनके हालात जान लेने की फुर्सत न मिली?

मेरी नानी तो किसी के बहुत दिनों तक न मिलने पर चिंतित हो जाती और हमें जबरन उनके घर भेज कर उनकी खबर लाने को दौड़ा देती थी...उन्हें कैसे में निठारी के बच्चों का हाल बताता, कैसे आरूषि के हत्यारों की पहचान बताता और कैसे बताता कि अनुराधा चल बसी और पहले माता-पिता, भाई फिर प्यारा डॉगी और अब बहन खो देने वाली सोनाली का जीना कितना कष्टमय है?

कैसे बताता सबकुछ...

Tuesday, March 15, 2011

नाशुक्रा रहने का अहसास

किसी के प्रति नाशुक्रा रहने का अहसास कभी-कभी ही होता है लेकिन जब होता है तो सच पूछिए बहुत बुरा होता है। कुछ फिल्मी हो कर कहूँ तो 'माँ कसम" बहुत खराब होता है। अंदर तक चुभता हुआ। दिल को भेदता हुआ। ऐसा कम ही होता है कि छोटी-छोटी सहायताओं के बदले पूरे दिल से ध्ान्यवाद कहने से चूका होऊँ लेकिन कुछ लोग हैं, जिनके प्रति मुझे आभार जताना था लेकिन वे अचानक मेरे जीवन से चले गए। ऐसे जैसे आँख खुलते ही स्वप्न फुर्र हो जाते हैं। कई लोग इतने इत्मीनान से जुड़े थे कि लगा ही नहीं वे अचानक चले जाएँगे और मेरा आभार अनकहा ही रह जाएगा। कभी सोचा ही नहीं था कि वो जो अपने भीतर मैं रख रहा हूँ अनकहा, बिना बोला, वो मुझे इतना सताएगा, परेशान करेगा।


बात कुछ यूँ है कि नया-नया भोपाल आया था, तब एक मेहरबान ने इस शहर के रास्तों को समझने में मेरी मदद की थी। मुझे पूरी घटना याद है, केवल उस बंदें के नाम को छोड़ कर। वह खालिस भोपाली शख्स था। हमारे मार्केटिंग विभाग में किसी असाइनमेंट आधारित काम कर रहा था। मेरा भोपाल में शायद दूसरा हफ्ता था। मेरी तरह 'होम सिकनेस" पीड़ित व्यक्ति ही समझ सकता है कि पराए शहर में इतने दिनों बिना किसी अपने व्यक्ति के टिके रहने कितना जटिल होता है? क्रिकेट की भाषा में कहूँ तो ली की गेंदों को खेलने जैसा।

खैर, मुझे याद है। संगमरमर पर एक स्टोरी करना थी और मैं खाली दिमाग खड़ा था कि कैसे जिंसी तक पहुँचु और स्टोरी करुँ। तभी मियां मेरे पास आए। मेरी उलझन जान मुझे पूरा रास्ता बताया, फिर बोले काम से जा रहा हूँ वरना आपके साथ चलता। इतने से भरोसे ने जैसे मुझे आत्मविश्वास से भर दिया था। उस वक्त उस सहायता के लिए तो मैंने उनका धन्यवाद ज्ञापित किया किंतु वो जो हौंसला मुझे दे गए थे, नए शहर में दोस्त होने का अहसास दे गए थे, उस यकीन के लिए मैं उनका आभार नहीं जता पाया। इसके पहले कि मैं अपने भाव व्यक्त करता, वह अचानक चला गया, किसी ओर दफ्तर में। जो फोन नंबर मेरे पास था, वो भी बदल गया और इस एक चीज के अलावा मैं कोई ऐसी चीज या व्यक्ति को नहीं जानता जो मुझे उस तक पहुँचा दे।

यही नाशुक्रा होने का अहसास मुझे अकसर भिगो देता है। जिन्हें मैं कुछ कहना चाहता था उन लोगों का अचानक चले जाना परेशान कर देता है।

Thursday, March 10, 2011

लड़की का पिता

समय बदल रहा है और समय के साथ रिवाज भी अपना रुप बदल रहे हैं। मुझे यह बात मानने में कोई गुरेज नहीं है कि अधिकांश बदलाव खास कर परम्पराओं में परिवर्तन सुविधाओं के मद्देनजर होते हैं। घोर कर्मकांड मानने वाले भी अपनी सुविधनुसार हर परिस्थिति का तोड़ निकाल ही लेते हैं। मसलन, विवाह में लग्न की दिक्कत आ रही है तो कोई ग्रह बलवान कर जोड़ी मिला दी जाती है। ऐसी ही लाख परेशानियाँ और करोड़ समाधान। खैर, तो बात कुछ यूँ है कि महिला दिवस की साँझ एक पारिवारिक आयोजन में शामिल होने का मौका मिला। मौका था सगाई का। युवा जोड़े की उम्र यूँ तो कोई खास ज्यादा नहीं थी। किसी शोध या बड़े प्रोजेक्ट से जुड़ जाते तो शायद अभी ही पढ़ाई पूरी करते लेकिन मध्यम वर्गीय परिवार की आम कहानी की तरह इन दोनों की दास्तां भी हैं। ग्रेजुएशन करने के बाद लड़का नौकरी के लिए परिश्रम करने लगा तो लड़की सुघड़ बहू बनने के सारे कौशल सीखने में जुट गई। उम्मीद करता हूँ कि दोनों ने करीब दो साल अपने-अपने काम मुस्तैदी से किए होंगे। फिर दो साल बाद भी दोनों को जब कोई जोड़ीदार नहीं मिला तो परिवार की चिंता बड़ी और फिर समय गुजरने के साथ दोनों के ही पिताओं के माथे की लकीरें और आँखों के नीचे घेरे गहराने लगे।

चिंता दोनों को खाए जा रही थी। दोनों परिवार का एकमात्र ऐजेंडा था किसी तरह कोई लड़का/लड़की मिल जाए। दोनों के हाथ पीले हों और परिवार अपने गुरुत्तर दायित्व से मुक्त हो जाए। गंगा नहाए। मुझे नहीं लगता कि इसबीच किसी ने दोनों की रुचियों और स्वभावगत गुण दोषों की बात की होगी या दोनों के भावी संबंध  पर गौर किया होगा। खैर, योग-संयोग से इसी शहर में दोनों की मुराद पूरी हो गई। दोनों परिवार आल्हादित।

रिश्ता हो गया था तो सभी को बताना तो था। इसलिए एक आयोजन की रचना हुई। आम भाषा में इसे सगाई कहते हैं। भावी दुल्हे का परिवार वीरोचित भाव से लड़की के घर-आँगन में पहुँचा। भावी दुल्हन का पूरा परिवार हाथ जोड़े, रीढ़ झुकाए खड़ा था-स्वागतातुर।

इन सभी में एक शख्स एकदम अलग नजर आ रहा था। आँखों में अजीब सा सूनापन, होंठों पर सुकून की हँसी और दिल में बेटी की विदाई का वक्त करीब आने का दर्द। लड़की का पिता। रजत पटल पर आने वाली कमोबेश हर फिल्म साफ कर देती है कि उसकी कहानी का कोई भाग या किरदार असल जिंदगी के किसी किस्से या किरदार से कोई साम्य नहीं रखता लेकिन ऐसा क्यों होता कि हर दुल्हन या लड़की के पिता की हालत फिल्मी बेटी के पिता की हालत की तरह ही असहाय, निरुपाय होती है?

लड़के के कुछ दबंग परिजनों के अलावा माहौल को तनावरहित करने के लिए संवाद बनाए रखने की कोशिश करते लड़की के अन्य परिजन और पड़ोसियों के बीच केवल एक शख्स जो हर आवाज पर हाथ जोड़ मुस्कुराने लगता है। उसकी गर्दन हिलती है तो केवल हाँ में। यह हाँ में हिलना इतना आदतन और स्वाभाविक हो जाता है कि इंकार करते हुए भी गर्दन स्वीकृति में हिलती ही प्रतीत होती है।

वह हर मुराद पूरी करने को आतुर होता है, वह मेहमान के हर लफ्ज को  मुँह से गिरते ही हथेलियों में थाम लेता है। कितना निरीह, कितना बेबस।

उस इंसान को देख मुझे खुद पर कोफ्त हुई, क्योंकि में लड़के की ओर से था। वे जब भी मेरे पास आए मैंने उन्हें हाथ जोड़ने से रोका लेकिन अफसोस उन्हें मेरी बात सुनने की फुर्सत कहाँ थी या कहो अगले मेहमान के आतिथ्य की चिंता ही इतना थी कि वे मेरी बात सुन ही नहीं रहे थे। कल तक दो पिता चिंता में थे। आज एक पिता चिंता में है। बेटी के हाथ पीले करने की चिंता। मैं जानता हूँ, वे किसी से कह नहीं रहे हैं लेकिन चिंता एक ओर होगी-बेटी के विदा हो जाने की चिंता। परिवार के लाड़ले व्यक्ति के चले जाने की चिंता।

किताबी ज्ञान के सहारे मार्कशीट-सा स्टेट्स रखने वाले इन परिवारों के बीच पिता की खासकर बेटी के पिता की इस स्थिति ने मुझे बहुत शर्मसार किया।

Monday, February 7, 2011

बसन्त

रोज देखता हूँ तुम्हारी ओर


लगता है हर दिन


बारह घण्टे पुरानी हो रही हो तुम ।


राशन, सब्जी, दूध, बिजली,


के बढ़ते दाम व्यस्त रखते हैं तुम्हें


हिसाब-किताब में ।


नई चिन्ता के साथ


केलेण्डर में ही आता है


फागुन, सावन, कार्तिक ।


जिन्दगी का गुणा-भाग


करते-करते


जब ढल आती है


कोई लट चेहरे पर


या पोंछते हुए पसीना माथे का


मुस्कुरा देती हो मुझे देख


सच समझो उतर आता है बसन्त


हम दोनों की जिन्दगी में ।

Wednesday, February 2, 2011

रिश्तों का 'धोबीघाट"


(फोटो- प्रवीण दीक्षित

भोपाल डायरिज़










किरण राव की फिल्म 'धोबीघाट" में मुझे आमिर कहीं नजर नहीं आए। हर तरफ केवल किरण की ही रोशनी दिखलाई दी। इस फिल्म में धोबीघाट केवल कपड़ों की धुलाई का स्थल नहीं रहता बल्कि यह तो रिश्तों पर जमी धूल को गलाने, पछिटने और धो कर उजला करने का प्रतीक है। फिल्म में इंसानों के आपसी संबंधों के साथ एक रिश्ता और चलता है- बाशिंदों का अपने शहर के साथ नाता। 'मुबंई डायरीज़" फिल्म का उपशीर्षक है और असल में रहवासी की अपने शहर के साथ गुजारी जिंदगी की डायरी का अंश फिल्म के अहम हिस्सा है। यह एक किरदार की जिंदगी के बहाने मुंबई के भीतर झाँकने का मौक देता है। समंदर मुंबई की पहचान है और मरीन ड्राइव और जुहू चौपाटी इसकी आत्मा। फिल्म का शुरूआती संवाद कहता है -'चौपाटी पर लोग भेल पूरी खाने आते हैं। अधिकांश लोग तो यहाँ केवल हवा खाने आते हैं।"

यह संवाद सुनते ही भोपाल का बड़ा तालाब याद हो आता है। तालाब यूँ तो पुराने शहर की प्यास बुझाता है लेकिन इसके किनारे पर बचपन कलरव करता है। प्रेम परवान चढ़ता है। बुढ़ापे का अकेलापन बँटता है और जो नौकरी या पढ़ाई खातिर अपना घर छोड़ इस शहर में चले आए हैं, उनके लिए यह शहर परिवार है। यहाँ खुशियाँ मनाई जाती हैं, दर्द बाँटा जाता है। कई हैं जो लोगों को प्रसन्नता बेच बच्चों के लिए रोटी जुटा कर घर लौटते हैं। किनारों तक दौड़-दौड़ कर आती लहरें बाहों में भींच लेने को आमंत्रित करती है। बड़े तालाब के रहते इस शहर में कौन अकेला है भला?

फिल्म में आधुनिक जिंदगी की भागदौड़ पर कहा गया है कि लोग इतना भागते जैसे स्पीड के भी मार्क्स मिलेंगे। तेज बारिश में कामवाली बाई की झोपड़ी में पानी भरने से परेशान किरदार ही रंगीन चूड़ियों और गणेश उत्सव के बहाने मुंबई की जिंदादिली बताता है।

यह सब देख-सुन याद आता है, पुराना भोपाल। यहाँ की पहचान बटुए और रंग-बिरंगी चूड़ियाँ। चौक में मनाया गया पहला गणेशोत्सव और पटियेबाजी। मेहमाननवाजी और अपनी बोली।
शहर जैसे अपना हमसफर

'तू जो नहीं तो कुछ भी नहीं है। जो तू हमसफर है तो कुछ गम नहीं है।" पुराने गाने की यह पंक्ति उन लोगों के भावों को हूबहू व्यक्त करती हैं जिनकी यादों में भोपाल साँस बन कर धड़कता है। शहर जैसे इन लोगों के साथ जुड़वा भाई की तरह बड़ा हुआ। बचपन के लड़कपन से जवां दिल की मौजूं और फिर उम्र के अंतिम पड़ाव तक की हर यात्रा का हमकदम। उन्होंने भोपाल को बढ़ते देखा, सँवरते देखा, विकास की सीढ़ियाँ चढ़ते देखा। उनके लिए भोपाल केवल शहर नहीं परिवार है। यहाँ के मोहल्ले और सड़कें घर-आँगन की तरह हैं। उन्होंने इस शहर को पहचान दी और खुद इस शहर की पहचान बन गए। 

'धोबीघाट" याद दिलाती है कि हर शहर में रिश्तों का एक धोबीघाट है।
तभी याद हो आई भोपाल पर अपनी एक कविता


झील,
तुम बुला लेती हो रोज।

तुम्हारे किनारे जमती है
महफिल अपनी

काँटा पकड़े घंटों
तुम्हारे पहलू में बैठा मैं
कब अकेला रहता हूँ?

लहरें तुम्हारी बतियाती हैं
कितना,
जैसे घंटों कहकहे लगाता है
यार अपना।

झील, तुम्हारे होते
कब अकेला रहता हूँ मैं भला?

Tuesday, February 1, 2011

सखी वे कह कर जाते?

वसंत आ रहा है...



सखी, देखो वो चला आ रहा है चुपचाप...बिना पदचाप...जैसे कोई देख ना ले...कोई सुन ना ले...उसके आने की आहट।


वसंत हाँ, वसंत ऐसे ही तो आता है, जीवन में भी। जाने कब आ कर हथेलियों पर बिखरा देता है मेंहदी।  स्वप्न कुसुम केसरिया रंग ओढ़ लेते हैं...।


वसंत का आना पता ही नहीं चलता...इस दौड़ती भागती जिंदगी में।


ऐसे ही चुपचान आया था वसंत, उस दिन, उस साल।


मानो कल ही की बात हो जैसे।


यूँ लगता था जैसे आँगन में लगा हर पौधा गुलमोहर हो गया हो और मन के भीतर तमाम तरफ बोगनवेलिया उग आए हों। रंग-बिरंगे जंगली फूलों की तरह खिले सपने, बेतरतीब जरूर थे...बेपरवाह लोगों को कहाँ अनुशासन की फिक्र ? उनका उन्मुक्त होना ही तो सौंदर्य के गुलदस्ते में बँधने से ज्यादा जरूरी था। ऐसे ही थे सपनों के नील गगन में ऊँची उड़ान भरते इरादे।


यूँ होगा तो ऐसा कह देंगे...ऐसा हुआ तो वैसा कर लेंगे।  ख्यालों के केनवास पर बनते-बिगड़ते विचार। पतंगों के पेंच की तरह लड़ते, ढील देते, काट करते विचार।


अपना धागा-अपनी पतंग। खूब उड़ाओ...न आसमान खत्म होता न ख्वाबों की डोर छोटी पड़ती।


और एक दिन जब...ख्याल सच करने की बारी आई...छोटा रह गया सबकुछ।


हाथों से छूट गई डोर, डोलने लगी पतंग, यकायक बेआब हो गए फूल सारे, छोटा पड़ गया साहस अपना।


न बोल फूटे, न हाथ बढ़े।


अरे, कहीं इसे ही तो काठ मारना नहीं कहते हैं?


बल्लियों उछलने वाले उस क्षण पाताल में जम गए थे सारे। मन ही मन जो बुना था, ख्याली साबित हुआ सबकुछ।


क्या हो गया था नैन तुमको? तुम ही रोक लेते पलछिन उनको। पर तुम्हें फुर्सत कहाँ बहने से और...


और वे चले गए जैसे गुजर जाता है हर लम्हा, अच्छा हो या बुरा।


कितना रोकना चाहा, लेकिन कहाँ मैंने कहा और कहाँ उसने सुना?


चले गए वे भी...जैसे सब जाते हैं।


अब कहने से क्या होता है- सखी वे कह कर जाते?


सचमुच अगर वे कह कर जाते तो क्या जा पाते?




Sunday, January 30, 2011

उनकी दुनिया या उनके सपने का डर

इंसान भी कितना डरपोक है...। सॉरी, मुझे लगता है मैं बात को कुछ घुमा कर कह रहा हूँ। साफ-साफ कहता हूँ कि पुरूष कितना डरपोक है। हर संभावना, सपने और ख्याल से भी डर जाता है। किसी ने अगर अपने सपने का जिक्र किया तो डरने लगता है, कहीं खतरा मुझे तो नहीं, जैसे हर सपना उसके अस्तित्व को खत्म करने के लिए ही देखा जाता है। कोई अगर तरक्की का ख्याल बुन ले तो उसका पड़ोसी (मानसिक/शारीरिक) इंसान डर जाता है। और अगर सपने देखने और ख्याल बुनने वाला उस वर्ग का हो जिसे आजकल आधी  दुनिया कहा जाता है तो यह आदमी, ताकतवर आदमी थर-थर काँपने लगता है। उसे लगता है बरसों से, सदियों से जिसे उसने दबा कर रखा, दोयम दर्जे पर रखा, कहीं वह मुख्य धारा में आ गई तो?  इस तो से यह भयभीत रहता है। यही कारण है कि वह हर सपने की तलाशी लेना चाहता है, हर उस शख्स की दुनिया में ताकझाँक करना चाहता है, जिससे वह डरता है।

आदमी के इसी डरपोक रूप से इस हफ्ते मेरा दो बार सामना हुआ। पहला, बालिका दिवस पर एक संस्था सरोकार द्वारा रखे गए कार्यक्रम की बात है। वहाँ जब बेटियों को देवी बना कर पूजे जाने की बात हो रही थी तो मेरी एक साथी ने कह दिया कि बेटियों को देवी बना कर उसे आदर्श की कसौटी पर मत कसो। उसे सामान्य इंसान रहने दो, गलतियाँ करने का हक दो। बात कई लोगों को चुभना स्वाभाविक थी। हुआ भी यही। आखिरकार एक पंडितजी से रहा नहीं गया और वे सनातन परम्परा का बखान कर यह सिद्ध कर गए कि लड़कियों को लड़की/इंसान के अलावा सबकुछ समझने की आदत जल्दी जाने वाली नहीं है। कुल जमा दो घंटे चले कार्यक्रम में मेरी साथी ने केवल 2 मिनट अपनी बात रखी थी लेकिन उनकी यह बात पूरे कार्यक्रम में रखे गए विचारों पर भारी पड़ी। जिन्हें यह बात पसंद आई थी वे तारीफ में जुट गए और जिन्हें ख्याल देखती औरत बुरी लगती हैं, वे खंडन में जुट गए।

दूसरा वाकिया। हमारे संस्थान द्वारा महिला क्लब के गठन के दौरान का है। आयोजन की जिम्मेदारी होने के कारण मैं कुछ आगंतुकों और सहकर्मियों के साथ बाहर ही खड़ा था। कार्यक्रम महिलाओं के लिए एकाग्र था तो पुरूष इस तरह बर्ताव कर रहे थे, जैसे उन्हें किसी दोयम आयोजन में जाना पड़ रहा है। वे पहले तो कार्यक्रम को हल्का और महिलाओं के ज्ञान को फौरी बता कर इसे वक्त जाया करने की गतिविधि करार देते रहे। फिर जब महिलाओं को माइक पर बात कहने को आमंत्रित करते देखा तो कहने लगे- लो, अब तो घंटे भर की फुर्सत हो गई। इनकी चटर-पटर कभी बंद होती है?"

मैं सारी दुनिया पर आतंक का सिक्का जमाने वाले पुरूष को डरते देख रहा था। तभी एक ने आकर सूचना दी-पता है, अंदर क्या चल रहा है।?" हमें जिज्ञासु बनाते हुए वह व्यक्ति कुछ देर रूका और फिर बोला-'लड़कों को छेड़ने की बात हो रही है। गंभीर चर्चा होना थी, यह क्या स्तर आ गया!"

विस्तार से जानने पर पता चला कि एक वक्ता ने अपना 'वाइल्ड ड्रीम" बताते हुए यह कह दिया कि वह बचपन से लड़कों को छेड़ने के इरादे रखती थी और बड़े होने पर ज्यों ही यह आजादी मिली, उन्होंने अपनी यह तमन्ना पूरी भी की। एक वक्ता ने बताया कि वे चाहती हैं कि घोड़ी चढ़ कर अपने दुल्हे को ब्याहने जाए।

हम जानते हैं कि जब तक डरपोक पुरूष जिंदा है, ये सपने हकीकत में नहीं बदल सकते लेकिन इस जानकारी के बाद भी पुरूष मन विचलित हुआ। महिला जो उनके लिए किसी भी समय चटकारे ले कर बात करने का विषय होती है,   इस  आयोजन में, डर का सबब लग रही थी। मुझे लगा वहाँ महिलाओं का नहीं ऐसे आतंकियों का जमावड़ा हुआ है जिनसे सभी को डरना चाहिए। एक लड़की जिसे हर कोई, किसी भी जगह, किसी भी वक्त, कैसा भी कमेंट कर सकता है, वह लड़की यदि सपना देख ले कि वह किसी राह चलते लड़के पर फब्ती कसेगी तो पुरूष डरने लगता है। वह काँपने लगता है क्योंकि उसे अपनी सत्ता छिनती महसूस होती है। और भयभीत पुरूष षड्यंत्र करने लगता है, सपने में सेंधमारी करने लगता है, उसके दिमाग को छोटा और अछूत दिखाने की कोशिश करने लगता है जिसकी देह उसे बहुत प्यारी लगती है। जब भी कोई स्त्री सपना देखती है, डरपोक पुरूष हाँका लगा कर अपनी कौम को आगाह कर देता है- 'डरो, वह आती है।"

Friday, January 7, 2011

कोई भी काम, एनी टाइम, मैं हूँ ना

मैं पत्रकार हूँ। यह आपके लिए रहस्योघाटन नहीं है। नये व्यक्ति से परिचय करते हुए मैं अमूमन अपना नाम, संस्थान का नाम और पद जरूर बताता हूँ। आज भी यही हुआ। दफ्तर जाने के दौरान एक अधेड़ शख्स ने मुझसे लिफ्ट माँगी। मैंने उन्हें अपनी गाड़ी पर बैठा लिया जो मैं अकसर करता हूँ। सो मैंने यह कहते हुए कि मैं नईदुनिया कार्यालय तक जा रहा हूँ , पूछ लिया कि आपको कहाँ जाना हैं? उन्होंने बताया कि अयोध्या नगर जाना है, लेकिन आप तो मुझे छोड़ेगें नहीं? जी हाँ कहते हुए मैंने असमर्थता जता दी।

उन्होंने लोक परिवहन न होने पर पहले तो शासन को कोसा मेरे यह कहने पर कि कुछ हद तक तो हम भी दोषी हैं, उन्होंने मुझसे सहमति जताई। बातचीत चल पड़ थी तो कुछ और बातें हुईं। बात बढ़ती मँहगाई और आम आदमी के खर्च की कम सीमा तक आ गई। मैंने कहा पैसे की जरूरत तो सभी को होती है लेकिन आज कल घोटाले कई सौ करोड़ में होते हैं। यह जरूरत नहीं, लोभ है। उन्होंने फिर मेरी बात से सहमति जताई।

इतनी देर में हम मेरे दफ्तर तक आ पहुँचे। गाड़ी से उतरते हुए उन्होंने कहा कि मैं भी एक पत्रकार हूँ। जिस अखबार/पत्रिका का नाम लिया वह नामालूम सी है। मैं अगला कोई बात सोच पाता इसके पहले उन्होंने कहा कि मैं हर तरह का काम करवा सकता हूँ। कहीं का भी। किसी राज्य या केन्द्र के किसी विभाग में कोई तबादला, नियुक्ति, जाँच सब। पैसा बाद में लेता हूँ। आप केस बताएँगे तो आपको भी हिस्सा मिल जाएगा। आखिर पैसों की जरूरत तो आपको भी होगी?
मैं हतप्रभ था...कुल जमा 2 किमी की यात्रा में इतना लंबा परिचय कैसे हो गया कि व्यक्ति ने सारे बंध्ान, सारे लिहाज तोड़ते हुए साफ सौदेबाजी शुरू कर दी।

मैं खड़ा रहा, उन्होंने मोबाइल नंबर बताया और कहा- आप भोपाल को देखते हैं। मैं केन्द्र के काम करवा सकता हूँ। मुझे मेरी सीमाएँ नजर आ रही थीं और भ्रष्टाचार का खत्म होता शिष्टाचार दिखाई दे रहा था। मैं इस धुँधलके में अपना अक्स खोज रहा था।

 खैर है, मैं साबूत हूँ, अपने साथ।

Sunday, January 2, 2011

बिनायक किस पार्टी से हैं?

भोपाल में बिनायक के लिए जन समूह इकट्ठा हुआ था। इस कार्यक्रम की पड़ताल करने आए आईबी के लोग पड़ताल करते नजर आए कि बिनायक किस पार्टी से जुड़े हैं?
उन नासमझो का यह सवाल इसलिए था कि वहाँ सरकार के खिलाफ नारे लग रहे थे और नारे लगाने वाले वे चेहरे थे जो जनसंघर्ष की पतवार थामते हैं। हम, मैं और जिनसे सवाल पूछा गया था सचिन जैन, एक पल असमंजस में रहे कि क्या जवाब दें? क्या बताएँ कि बिनायक किस पार्टी के हैं?



क्या आप जानते हैं, बिनायक सेन कौन है? बिनायक सेन...राजद्रोही या जनसेवी? अगर इस सवाल पर विचार नहीं किया तो सच मानिये समय आपका भी अपराध्ा लिख रहा है। क्यों? भारतेन्दुजी कह गए है-'समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र। जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध्ा।" अपराध्ा इस बात का नहीं होगा कि हमने बिनायक सेन का साथ क्यों न दिया, अपराध्ा तो यह है कि हमने बिनायक के 'अपराध्ा" को जानने तक की तकलीफ नहीं उठाई।

बिनायक की बात करने के पहले आपको एक किस्सा सुना चाहता हूँ। किस्सा कुछ यूँ हैं कि गुरू गोविंद सिंह के भाई घनैयाजी संघर्ष के दिनों में गुरू सेना को पानी पिलाया करते थे। इस दौरान जब विरोधी सेना का प्यासा सिपाही मिल जाता तो वे उसे भी पानी पिला देते थे। गुरू गोविंदसिंह से शिकायत हुई तो भाई घनैयाजी ने जवाब दिया मुझे तो केवल प्यासा दिखाई देता है। अपने या दुश्मन में भेद कैसे करूँ?

इस नजीर को ध्यान में रख कर मेरी बात सुनियेगा, जानियेगा और फिर बताईयेगा कि क्या बिनायक दोषी हैं?

बिनायक सेन को छत्तीसगढ़ के ट्रायल-कोर्ट द्वारा उम्रकैद की सजा देना इसलिये नही चौंकाता है कि हमें राजसत्ता से उनके लिये रियायत की उम्मीद है। अचरज और डर तो इस बात का है कि न्याय का मंदिर सवालों के घेरे में आ गया। आम आदमी की क्या मजाल कि वह न्यायपालिका पर सवाल उठाए, ये सवाल तो न्यायपालिका के पूर्व अगुआ भी उठा रहे हैं।

बिनायक के काम को करीब से देखने वाले जानते हैं कि वे गरीबों की चिकित्सा, उनके स्वास्थ्य हालातों को बदलने में विश्वास करते थे। गुस्सा इसलिए भी है कि एक सैन्य अफसर का बेटा, गोल्ड मेडलिस्ट छात्र पूंजीपति सत्ता का चारण न बन कर जन संवेदनाओं का वाहक बना और बदले में उसे भी सत्ता का वही आचरण झेलना पड़ा जो लोकतंत्र के तमाम समर्थकों को पूरे विश्व में झेलना पड़ता है। बहुत ज्यादा को थोड़े में बताने की जो समस्या हमारे समक्ष होती है वैसी उलझन इस वक्त मेरे सामने बिनायक के काम को बताने को ले कर है। कुछ लफ्जों में कहूँ तो बिनायक ने उन बच्चों की परवाह की जिन्हें सरकार ने मरने के छोड़ दिया था।

बिनायक का जुर्म इतना कि आदिवासियों के लिए काम करते हुए उनके अधिकारों की बात की।

सत्ता की मंशा बिनायक को खत्म करना नहीं है। वो तो बिनायक को कैद रख, न्याय की प्रक्रिया पूरी कर, दंड दे कर असल में जन श्रद्धा को तोड़ना चाहती है।