Wednesday, September 1, 2010

घोर (अ) सामाजिक हम!

आशी मनोहर नहीं रहे।
यह खबर भोपाल की सांस्कृतिक थाती को समझने वाले हर व्यक्ति को प्रभावित कर गई। लेकिन एक शख्स के दुनिया से चले जाने से ज्यादा दुख इसलिए हुआ कि एकमात्र अखबार नवदुनिया को छोड़ शहर के किसी भी अखबार ने इस संस्कृतिकर्मी के निधन पर चार लाइन का समाचार तक प्रकाशित नहीं किया! (ऐसे में श्रृद्धांजलि लेख की उम्मीद तो फिजूल है।)


...और रंज तब हुआ जब हमारे एक वरिष्ठ साथी से पता चला कि सभी अखबारों के कला संवाददाताओं ने आशी की मृत्यु की जानकारी पर उनसे जुड़े तमाम संदर्भ खंगाले थे लेकिन किसी ने भी एक लाइन नहीं लिखी!

हो सकता है पत्रकार मित्रों ने लिखी हो और डेस्क ने हर बार की तरह अपनी कैंची चला दी हो लेकिन कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि शहर के एक रचनात्मक व्यक्ति के निधन पर उसे सार समाचार में भी एक सूचना की तरह स्थान नहीं मिला।

यहाँ मुझे माँ पर लिखी एक कविता याद आ रही है जिसमें माँ की मृत्यु तो चार दिन पहले हो जाती है लेकिन बेटे की स्मृतियों में या यूँ कह लें बेटे के लिए वह तब तक जीवित रहती हैं जब तक उसे मौत का समाचार नहीं मिल जाता। यानि आशी अपने कई प्रशंसकों के लिए तब तक जीवित हैं जब तक की किसी माध्यम से उन तक निधन की सूचना नहीं पहुँच जाती। (क्योंकि सूचना पहुँचाने के आम माध्यम अखबारों ने अपनी यह भूमिका भी नहीं निभाई।)

यह सब सोचते वक्त एक बात बार-बार अखर रही है कि हमारी संवेदना और चयन का स्तर किस कदर गिरा है कि हम सामाजिक हो कर भी घोर असामाजिक प्राणी है। ठीक उस प्रतिक्रिया की तरह जब दुर्घटना की खबर बता रहे पत्रकार से सीनियर पूछ लेता है कि कोई मरा या नहीं? जितनी जाने गई होंगी, उतनी 'बड़ी" खबर होगी।

वैसे यहाँ यह बताना मौजूँ होगा कि अपनी संस्था के माध्यम से बच्चों के लिए पहला बाल समारोह प्रारम्भ करने आशी उम्र मे अंतिम चरण में भी नई पौध को संस्कारवान बनाने के प्रयत्न में जुटे रहे। उन्होंने विवाह की बाहरी नहीं आंतरिक तैयारियों के लिए कोचिंग संस्थान प्रारम्भ किया। यह अनूठा संस्थान परिवार जैसी संस्था को टूटने से बचाने का प्रयत्न था।

मूल रूप से उदयपुर के निवासी आशी का परिवार 1954 में भोपाल आया था। उन्होंने 'प्रेक्षक" रंग समूह बनाया था जिसने सत्तर-अस्सी के दशक में काफी रंग-गतिविधियां की थीं। किसी निजी संस्था की ओर से प्रदेश का ही नहीं बल्कि पूरे देश का पहला बाल समारोह 'बखत राम उत्सव" का कई सालों तक सफल आयोजन किया। वे 'रंग संधान" नामक पत्रिका निकालते थे। विरासत को सहेजने के लिए वे इसमें बड़ी दुर्लभ कालजयी कृतियों का नए कलेवर में प्रस्तुत करते थे। श्री आशी ने इस पत्रिका के नाम पर 'रंग संधान फाउंडेशन" की भी स्थापना की थी। उन्होंने 'दिगन्त" नामक अखबार भी निकाला।

वे अभिनय रंगनिर्देशन, रंग शिविर का आयोजन, रंग संस्था का संचालन आदि बहुआयामी कार्यों में सक्रिय थे। उनकी बनाई फिल्मों में 'सूरज का अंश" शामिल है। पण्डवानी तीजन बाई पर बनने वाली इकलौती फिल्म का निर्माण उन्होंने किया।

पिछले साल उन्होंने कोचिंग की बेहद नई परिभाषा गढ़ी थी और 'सर्वोत्तम संस्थान" प्रारंभ किया इसमें विवाह पूर्व तैयारियां, पर्सनालिटी डेवलपमेंट, अंग्रेजी बोलने का प्रशिक्षण आदि दिया जाता है। उनका सबसे आखिरी प्रोजेक्ट था लैण्ड मार्क जिसमें प्रापर्टी डीलिंग के लिए काउंसलिगि, प्रोमोशन आदि का प्रशिक्षण दिया जाता है। आशी ने अपने जीवन के कैनवास पर इतने रंग बिखराएँ कि जीवन का कोई मोड़ हो, मित्रों और प्रशंसकों को वे बहुत याद आएँगे।