Friday, July 30, 2010

सड़ा देंगे, पर खाने नहीं देंगे

2.50 रूपए बचाने 14.50 रु. का घाटा मंजूर
गोदामों में सड़ रहा गेहूँ, पर सरकारें गरीबों को देने तैयार नहीं
केन्द्र और राज्य सरकार बचाना चाहती है सबसिडी का खर्च

यह वाकई शर्मनाक स्थिति है। सरकारी गोदामों में गेहूँ सड़ रहा है, लेकिन गरीब भूखों मर रहे हैं। लोगों की मौत से ज्यादा केन्द्र व राज्य सरकारों के लिए सबसिडी बचाना महत्वपूर्ण है। मप्र सरकार बीपीएल गेहूँ एपीएल के भाव इसलिए नहीं खरीदना नही चाहती क्योंकि इसे गरीबों को बाँटने में उसे ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे। केन्द्र सरकार खराब होता सस्ता गेहूँ एपीएल के भाव इसलिए नहीं बेचना चाहती, क्योंकि इसके लिए उसे ज्यादा सबसिडी देनी पड़ेगी। यानी कि एपीएल गेहूँ भंडारण का ढाई रुपया बचाने के लिए उसे 14.50 रु. का गेहूँ बर्बाद होना मंजूर है।

उल्लेखनीय है कि ग्लोबल हंगरी इंडेक्स (वैश्विक भूख सूचकांक) में भारत का दुनिया के 88 देशों में 66 वाँ स्थान है। केवल मप्र में ही 67 लाख बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) परिवार हैं, लेकिन केन्द्र केवल 41 लाख 15 हजार परिवारों के हिसाब से ही गेहूँ का आवंटन करता है। इस कारण बीपीएल परिवारों को प्रतिमाह 35 की जगह 25 किलो गेहूँ ही मिलता है। बाकी गरीब सस्ते अनाज के लिए तरस जाते हैं। यह स्थिति तब है, जब भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की गेहूँ खरीदी 60 मिलियन मीट्रिक टन को पार कर चुकी है। नियमानुसार बफर जोन की मात्रा करीब 21 मिलियन टन है, लेकिन भारतीय खाद्य निगम ने इससे दो गुना बफर स्टॉक कर रखा है।

3 लाख टन गेहूँ खुले में
अकेले मप्र में ही इस साल 83 लाख टन गेहूँ की रिकॉर्ड पैदावार और 35 लाख टन की खरीद हुई है। जबकि राज्य में भंडारण की व्यवस्था केवल 30 लाख मीट्रिक टन की ही है। तमाम इंतजाम के बाद भी 3 लाख मीट्रिक टन गेहूँ अभी भी खुले आसमान के तले पॉलिथिन में पड़ा है। विदिशा में 45 हजार टन, सीहोर में 20 हजार टन, हरदा और होशंगाबाद में 10 हजार टन गेहूँ खराब होने की स्थिति में है। अगर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार प्रति परिवार 35 किलो गेहूँ भी बाँट दिया जाए तो खुले में पड़ा 3 लाख टन गेहूँ 7.15 लाख परिवारों का एक साल का राशन है। राज्य सरकार बीपीएल परिवारों को 25 किलोग्राम गेहूँ या चावल प्रदान कर रही है।
मुनाफाखोरी कर रही सरकार
मप्र सरकार ने तय दर 11 रूपए के अलावा किसानों को एक रुपया बोनस भी दिया है। इस हिसाब से गेहूँ खरीदी दर 12 रु. प्रति किलो हुई। इसके भंडारण पर 2.50 रूपए खर्च किए गए। इस तरह एक किलो गेहूँ 14.50 रुपया का पड़ा। केन्द्र सरकार राज्यों को बीपीएल गेहूँ 5 रूपए किलो की दर पर देती है। यदि वह खराब हो रहे गेहूँ को 7.50 रु. प्रति किलो के भाव से दे तो भी राज्य सरकारें उसे नहीं खरीदती क्योंकि इसके लिए उन्हें 5 के बजाए 7.50 रुपए प्रति किलो खर्च करने पड़ेंगे। मप्र सरकार तो अन्नापूर्णा योजना के तहत बीपीएल परिवारों को 3 रूपए किलो के भाव से गेहूँ देती है। यानी प्रति दो रु. प्रति किलो सबसिडी देती है। मप्र सरकार को तो एक किलो गेहूँ पर 4.50 (2+ 2.50) रूपए ज्यादा खर्च करना पड़ेंगे। इसलिए उसकी भी एपीएल गेहूँ खरीदने में रुचि नहीं है। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार को एपीएल की दर पर गेहूँ देने पर भी घाटा उठाना पड़ता, इसलिए वह भी खामोशी से 14.50 रूपए प्रति किलो कीमत वाला गेहूँ खराब होते देख रही है।

सड़ना मंजूर पर पेट भरना नहीं
केन्द्र सरकार को पता था कि गेहूँ सड़ने वाला है लेकिन खाद्य मंत्रालय की सलाह के बाद भी मंत्रियों के समूह ने सब्सिडी बचाने के लिए प्रस्ताव को नकार दिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार केन्द्रीय खाद्य विभाग और एफसीआई ने गेहूँ खराब होने के आशंका को देखते हुए मार्च 2010 में प्रस्ताव दिया था कि 50 लाख टन गेहूँ एपीएल (गरीबी रेखा से ऊपर) के दाम पर राज्यों को दे देना चाहिए। लेकिन मंत्रियों के समूह ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए नकार दिया कि ऐसा करने पर 5000 करोड़ की अतिरिक्त सबसिडी देना होगी।
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' मौजूदा मँहगाई और भूख की स्थिति सूखे या खाद्यान्ना संकट के कारण नहीं, सरकार की नीतियों और राजनीतिक व्यवस्था के कारण है। हम न्यायालय के आदेश के बाद भी गरीबों को प्रतिमाह 35 किलो अनाज नहीं दे पा रहे है। यह कोर्ट की अवमानना के साथ गरीबों को भूखा रखने का षड़यंत्र भी है। आखिर सरकार गोदामों में रखा गेहूँ लोगों में  क्यों नहीं बाँट देती।"
सचिन जैन, सर्वोच्च न्यायालय के राज्य सलाहकार
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यह है हकीकत
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प्रदेश में बीपीएल परिवार - 67 लाख
केन्द्र से अनाज आवंटन- 41 लाख 15 हजार परिवारों के लिए
बीपीएल गेहूँ की कीमत- 5 रु.किलो (प्रदेश सरकार 3 रूपए किलो में दे रही हैं)
एपीएल की दर - 7.50 रूपए
खराब हो रहे गेहूँ की कीमत- 14.50 रू.(12 रूपए में खरीदी + 2.50 रू. में भंडारण)

Friday, July 23, 2010

बलि ले रहा है सूचना का अधिकार

सात माह में छह कार्यकर्ताओं की हत्या, छह पर हमले
महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 3 की ली जान

सूचना का अधिकार (आरटीआई) भले ही भ्रष्टाचार के खिलाफ ब्रह्मास्त्र कहा जाता हो, लेकिन यह आरटीआई कार्यकर्ताओं की बलि लेने लगा है। ये कार्यकर्ता भ्रष्टाचारियों और माफिया के निशाने पर हैं। यही वजह है कि पिछले सात माह में देश में 6 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई और इतने ही स्थानों पर जानलेवा हमले हुए। मारे गए कार्यकर्ताओं में 3 महाराष्ट्र, 2 गुजरात और 1 बिहार से हैं।

देश में 2005 में लागू हुआ सूचना का अधिकार से भ्रष्टाचारी बौखला गए हैं। लिहाजा वे पोल खुलने की डर से अब सामाजिक कार्यकर्ताओं की जान लेने से भी नहीं चूक रहे हैं। पिछले मंगलवार को अहमदाबाद उच्च न्यायालय के बाहर हुई सामाजिक कार्यकर्ता अमित जेठवा की हत्या इस बात का ताजा सबूत है। इस अधिकार का इस्तेमाल करने के कारण इस साल श्री जेठवा सहित छह कार्यकर्ता जान गँवा बैठे हैं। ये सभी कार्यकर्ता भू माफिया के साथ शासन-प्रशासन के भ्रष्टाचारियों की पोल खोलने में लगे हुए थे। गौरतलब है कि श्री जेठवा ने जूनागढ़ के गिर के जंगल में अवैध खनन के खिलाफ आवाज उठाई थी। सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारियों के आधार  पर ही उन्होंने वन विभाग के खिलाफ गुजरात उच्च न्यायालय में अनेक याचिकाएँ लगाई थी। इससे पहले 13 जनवरी को महाराष्ट्र में जमीन घोटाले उजागर करने पर 39 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता सतीश शेट्टी की हत्या कर दी गई थी। वे तेलगाँव, लोनावला और पिम्परी-चीन्चवाड़ में जमीन घोटालों को सामने लाए थे। 13 जनवरी को सुबह जब वे सैर पर गए थे तो घर से करीब 7 किमी दूर उनपर तलवार सहित धारदार  हथियारों से हमला हुआ। कई जमीन घोटालों को उजागर करने वाले शेट्टी ने अपने लिए सुरक्षा की माँग भी की थी लेकिन इसके पहले ही उनकी जान ले ली गई।

अहमदाबाद के विश्राम लक्ष्मण डोडिया ने टोरेंट पॉवर से दिए गए अवैध कनेक्शन की जानकारी देने के लिए आवेदन किया था। उन्हें कोई सूचना नहीं मिली लेकिन 11 फरवरी को कम्पनी अधिकारियों  से मुलाकात के कुछ देर बाद वे मृत पाए गए। 14 फरवरी को बिहार के प्रसिद्ध कार्यकर्ता शशिधर मिश्रा की घर के बाहर अज्ञात बदमाशों ने गोली मार कर हत्या कर दी। वह स्थानीय लोक कल्याणकारी योजनाओं में गड़बड़ियों को उजागर कर रहे थे। अप्रैल में महाराष्ट्र के ग्रामीण स्कूलों की गड़बड़ियों की पोल खोलने वाले कार्यकर्ता विट्ठल गीते और उनके साथी ब्रजमोहन मिश्रा पर एक स्कूल संचालक के समर्थकों ने हमला कर दिया। इस हमले में विट्ठल की मौत हो गई। पुलिस के अनुसार स्कूल की अनियमितताओं की खबर अखबार में छपने के बाद दोनों के बीच विवाद बढ़ गया था। 22 मई को कोल्हापुर जिले के सामाजिक कार्यकर्ता दत्ता पाटिल का शव मिला। उनकी हत्या का एकमात्र कारण भ्रष्टाचार का खुलासा बताया गया।



महाराष्ट्र में खास आदेश
महाराष्ट्र सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले कार्यकर्ताओं पर ज्यादा हमले हुए हैं। यहाँ कार्यकर्ताओं की शिकायतें थी कि पुलिस सुनवाई नहीं करती है। इन शिकायतों और बढ़ते हमलों को देखते हुए पुलिस महानिदेशक ने विशेष आदेश जारी कर निर्देश दिए थे कि ऐसे हमलों की सुनवाई हो और शिकायत दर्ज की जाए।

मप्र में चिंता
सामाजिक कार्यकर्ताओं पर बढ़ते हमलों के कारण प्रदेश के कार्यकतों भी चिंता में है। ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के सदस्य अजय दुबे ने मप्र डीजीपी एसके राउत को ज्ञापन देकर आग्रह किया है कि प्रदेश में भी सूचना का अधिकार इस्तेमाल करने वाले कार्यकर्ताओं की सुरक्षा की योजना तैयार की जाए। अन्य कार्यकर्ता प्रशांत दुबे और रोली शिवहरे कहते हैं कि कार्यकर्ता इन हमलों से डरने वाले नहीं है। वे यूँ ही अपना काम जारी रखेंगे।

इन पर हुए हमले
-1 अप्रैल 2010 को महाराष्ट्र के जलगाँव जिले की पचोरा तालुका एडवोकेट अभय पाटिल पर जानलेवा हमला।
-लोक निर्माण विभाग के भ्रष्टाचार की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत माँगने पर 14 जुलाई को पीडब्ल्यूडी कार्यालय के बाहर ही आरटीआई कार्यकर्ता अशोक कुमार शिंदे की पिटाई।
-16 मार्च को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में सुमेरा अब्दुलानी, नसीर जलाल व पत्रकारों के दल पर हमला, गाड़ी में तोड़फोड़।
- जम्मू कश्मीर सूचना का अधिकार आंदोलन के प्रमुख डॉ मुजफ्फर बट पर 27 फरवरी को बरनवार में सूचना का अधिकार कानून पर जागरूकता कार्यशाला के दौरान हमला।
- 12 जनवरी को दिल्ली में कार्यकर्ता अजय कुमार और साथियों पर राड, लाठी से हमला कर दिया।
- 8 जनवरी को मुबंई के चर्चगेट पर ओवल मैदान के सामने स्वस्तिक बिल्डिंग निवासी 65 वर्षीय बुजुर्ग कार्यकर्ता नयना कथपालिया को डराने के लिए सुबह 6.45 बजे घर के बाहर फायरिंग

Tuesday, July 20, 2010

भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल में होगा ट्रस्टियों का मुफ्त इलाज

जाते-जाते खुद का भला कर गया ट्रस्ट
सीएस और पीएस के विरोध को किया दरकिनार


भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट जाते-जाते भी खुद का भला कर गया। अस्पताल में ट्रस्ट के सदस्यों का उपचार बिल्कुल निशुल्क होगा। इलाज का सारा खर्च गैस पीड़ितों के उपचार के मिली राशि से किया जाएगा। ट्रस्ट ने यह स्वात: सुखाय फैसला पिछले दिनों हुई बैठक में ले लिया। जबकि प्रदेश के मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव ने इस प्रस्ताव को कड़ा विरोध करते हुए इसे फिजूलखर्ची करार दिया था।

'द भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल ट्रस्ट" ने यह फैसला मार्च में उस वक्त लिया था, जब गैस त्रासदी के दोषियों के मामले की सुनवाई अंतिम चरण में थी। भोपाल गैसकांड के आरोपियों पर से धारा 304 'ए" हटाने के लिए गैस पीड़ितों की नाराजगी झेल रहे सुप्रीम कोर्ट के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एएम अहमदी की अध्यक्षता में यह निर्णय लिया गया। हाँलाकि इस पद से इस्तीफे की उनकी पेशकश को लगभग नौ माह बीत चुके थे। ट्रस्ट की अंतिम बैठक नई दिल्ली में हुई थी। इस बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि ट्रस्टियों को भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल में मुफ्त इलाज की सुविधा प्रदान की जाए। इस इलाज का सारा खर्च गैस पीड़ितों के इलाज के लिए मिली राशि से दिया जाएगा। बैठक में मुख्य सचिव अवनि वैश्य और प्रमुख सचिव स्वास्थ्य एसआर मोहंती शामिल नहीं हुए थे। जब बैठक का पत्र उनके पास अनुमोदन के लिए पहुँचा तो दोनों ने यह कहते हुए प्रस्ताव का विरोध किया कि यह गैस पीड़ितों के पैसों की बर्बादी है। ट्रस्ट सदस्य अपने इलाज का खर्च खुद उठाने में सक्षम हैं। इन आला अफसरों के विरोध के बावजूद यह प्रस्ताव बहुमत के आध्ाार पर पारित कर दिया गया। इस बारे में जब ट्रस्टी सुश्री के. अरोन्देकर से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे इस बैठक में शामिल ही नहीं हुई थी, जबकि वर्किंग ट्रस्टी अधिवक्ता अजीज अहमद सिद्दीकी के नईदिल्ली में होने से उनसे सम्पर्क नहीं हो सका।

ट्रस्ट के फैसलों की समीक्षा हो

ट्रस्ट के इस फैसले से भी गैस पीड़ित संगठनों में नाराजी है। भोपाल ग्रुप फॉर इंफर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा और गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति की साधना कर्णिक ने माँग की है कि नए निजाम में ट्रस्ट द्वारा लिए गए निर्णयों की पुर्नसमीक्षा होना चाहिए। उनका आरोप है कि पिछले कई दिनों से भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल में गैस पीड़ितों के इलाज में लापरवाही हो रही है। बाहरी मरीजों को तवज्जो दी जा रही है, क्योंकि उससे ट्रस्ट को पैसा मिलता है। जबकि इस अस्पताल का निर्माण केवल गैस पीडितों के इलाज के लिए ही कराया गया था।

दस साल पहले शुरु हुआ था अस्पताल

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन ने लंदन में 20 मार्च 1992 को 'द भोपाल हॉस्पिटल ट्रस्ट" की स्थापना की। इस चैरिटेबल ट्रस्ट के एकमात्र ट्रस्टी सर इयान पर्सीवल थे। मप्र सरकार ने अस्पताल निर्माण के लिए ट्रस्ट को लगभग 80 एकड़ जमीन मुफ्त प्रदान की। सर पर्सीवल की मृत्यु के बाद 1998 में 'द भोपाल मेमोरियरल हॉस्पिटल ट्रस्ट" की स्थापना की गई। ट्रस्ट ने छह अस्पताल सहित कम से कम 32 स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए थे। इस अस्पताल का संचालन जुलाई 2000 से शुरू हो गया था।

कौन हैं ट्रस्टी

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एएम अहमदी ट्रस्ट के अध्यक्ष बनाए गए। पूर्व राज्यपाल मोहम्मद शफी कुरैशी को उपाध्यक्ष बनाया गया। ट्रस्ट में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा की पत्नी श्रीमती विमला शर्मा, लंदन के बैरिस्टर राबर्ट पर्सीवल, केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव, डीजी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, निदेशक पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च चंडीगढ़ प्रो. केके तलवार, मुख्य सचिव मप्र, आईडीबीआई के पूर्व अध्यक्ष एसएच खान शामिल किए गए। भोपाल के अधिवक्ता अजीज अहमद सिद्दीकी को वर्किंग ट्रस्टी बनाया गया। वर्किंग कमेटी में प्रमुख सचिव स्वास्थ्य मप्र , केन्द्रीय रसायन और पेट्रोकेमिकल्स विभाग के संयुक्त सचिव, डॉ संतोख सिंह पूर्व डीएमई मप्र, जीबी पंत अस्पताल नईदिल्ली के पूर्व निदेशक डॉ. एम खलीलुल्ला, भोपाल के चार्टर्ड अकाउंटेंट एसएल छाजेड़ और महिला चेतना मंच की उपाध्यक्ष सुश्री के. अरोन्देकर को शामिल किया गया।

Sunday, July 11, 2010

मप्र व केन्द्र में टकराव के बीज

बीज के दाम भी तय करेगा बाजार



पेट्रोलियम पदार्थों के दाम नियंत्रण का अधिकार बाजार को दे चुकी केन्द्र सरकार की योजना है कि वह शकर के दाम बढ़ाने की ताकत भी बाजार को दे दे। इसकी मार आम आदमी पर पड़ेगी, लेकिन इससे एक कदम और आगे जाते हुए केन्द्र सरकार चाहती है कि बीजों के दामों पर भी बाजार का नियंत्रंण हो। वह बीज-2010 विधेयक पास करवाकर बीजों को पेट्रोलियम पदार्थों की तरह नियंत्रण से मुक्त करना चाहती है। दूसरी तरफ राज्य सरकारों का मानना है कि बीजों के दामों को बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसका सीधा सम्बन्ध किसानों के हितों से जुड़ा है। इन राज्य सरकारों में मप्र सरकार भी है। वह खुद बीज कीमतों को काबू करने वाला विधेयक लाने जा रही है। आंध्र प्रदेश सरकार इस तरह का बिल पहले ही पास कर चुकी है।

उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा बीज एक्ट 1966 में संशोधन के लिए बीज विधेयक -2004 लाया गया था। यह तीन बार संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन तीनों बार इसे पारित नहीं कराया जा सका। इस बार भी केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने विधेयक को स्वीकृति दे दी है और सरकार कोशिश है कि मानसून सत्र में ही बीज विधेयक 2010 पारित हो जाए। लेकिन सचाई यह है कि तमाम सामाजिक संगठन, प्रबुद्ध नागरिक और किसान संगठन इस विधेयक को किसान विरोधी और बीज कंपनियों के हित में बता रहे हैं। किसान संगठन बीजों के दामों पर नियंत्रण की पैरवी कर रहे हैं, लेकिन केन्द्र सरकार विधेयक में संशोधन पर राजी नहीं है।

मप्र सरकार ने भी इस विधेयक की एक खामी गिनाते हुए इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। हाल में मप्र कैबिनेट ने सामाजिक और किसान संगठनों की बात से सहमति जताते हुए राज्य में कपास के बीजों के मूल्य पर नियंत्रण के लिए विधेयक लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। विशेषज्ञों के अनुसार यह 7 वीं अनुसूची का मसला है। इस विषय पर दोनों सरकारें बिल ला सकती हैं, लेकिन जब किसी बिंदु केन्द्र और राज्य सरकार के नियमों में टकराव हो तो केन्द्र सरकार की बात मानी जाएगी। हाँलाकि ऐसा हुआ तो बीजों के दाम नियंत्रण के मामले में केन्द्र के बिल को महत्व मिलेगा।

मुआवजे के उपबंध भी जोड़ें

राज्य सरकार और सामाजिक संगठनों का कहना है कि केन्द्र सरकार बीज अध्ािनियम 2010 में बीज कंपनियों की जवाबदेही भी तय करें। वह मूल्य नियंत्रण और घटिया बीज से हानि पर किसानों को पर्याप्त मुआवजे का उपबंध भी जोड़े। गौरतलब है कि केन्द्र सरकार ने 10 जून को बिनौले के उत्पादन और वितरण का नियमन और छह महीने करने का फैसला किया है । संसद में बीज विधेयक पारित होने के बाद बिनौले का नियंत्रण विधेयक के प्रावधानों के तहत होगा और उसके बाद आवश्यक वस्तु कानून के तहत बिनौले को लेकर जारी अधिसूचना वापस ले ली जाएगी ।

बीज कमेटी ने की सिफारिशें

28 नवंबर 2006 को प्रोफेसर राम गोपाल यादव की अध्यक्षता में गठित कृषि पर स्टैंडिंग कमेटी ने अपने सुझाव में बीज विधेयक में अनेक संशोधन किए जाने की सिफारिश की है। कमेटी ने कहा कि किसानों द्वारा उपयोग किए जाने व बेचे जाने वाले बीजों का पंजीकृत बीज संबंधी न्यूनतम मानकों के अनुरूप होना किसानों के अधिकार में बाधा है। इसलिए कमेटी इस प्रावधान को रद्द करने की सिफारिश करती है। किसान की परिभाषा को और व्यापक करते हुए इसमें उन्हें भी शामिल किया जाए जो पारंपरिक बीजों का संरक्षण कर रहे हैं। बीज विधेयक में किसानों को बीज उगाने और उनके लेन-देन की अनुमति होनी चाहिए। विधेयक में मूल्य नियामक का प्रावधान होना चाहिए, जिससे कि किसानों से बीज उत्पादक/सप्लायर मनमाफिक दाम नहीं वसूल सकें।




' बीज विधेयक 2010 किसान विरोधी  है। मप्र सरकार बीजों के मूल्य पर सरकारी नियंत्रण के पक्ष में है। हम केन्द्र सरकार से माँग कर रहे हैं कि वह विधेयक में बदलाव करे।"

डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया, कृषिमंत्री, मप्र शासन



' बीजों के दाम के नियंत्रण का मामला 7 वीं अनुसूची से जुड़ा है। इसके तहत केन्द्र और राज्य सरकार अपने नियम बना सकती है लेकिन विवाद के बिंदु पर केन्द्र के विधेयक की बात ही मानी जाएगी।"

विश्वेन्द्र मेहता, संविधान विशेषज्ञ और पूर्व सचिव मप्र विस



' जब प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटी एंड फार्मर्स राइट एक्ट (पीपीवीएफआर) मौजूद है, तो बीज अधिनियम लाने की जरूरत ही नहीं है। दरअसल 90 फीसदी किसान अपने बीज ही उपयोग में लाते हैं। किसान अधिक बीज खरीदें और कंपनियों को फायदा हो, इसलिए सरकार बीज विधेयक पारित करने की कोशिश में है। बीज विधेयक 2010 में दो महत्वपूर्ण बदलाव की जरूरत है। पहला तो यह कि बीज मूल्यों का नियमन जरूर हो। साथ ही नियमों के उल्लघंन पर कड़े दंड का प्रावधान हो।"

डॉ. देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ