Thursday, December 24, 2009

।। भविष्यवाणी ।।

ज्योतिषी ने बाँच कर कुण्डली
बताया है, वक्त बुरा है।
ठीक नहीं है ग्रहों की चाल
अभी और गहराएगा संकट।
फले-फूलेगा भ्रष्‍टाचार

अपराध बढ़ेंगे
पाखण्ड का बोलबाला होगा
चालाकी होगी सफल
झूठ आगे रहेगा सच के
अच्छाई की राह में

अभी और काँटे हैं।

पंछी से आकाश और होगा दूर

खिलने से ज्यादा मुश्किल होगा
फूल का शाख पर टिके रहना।

नदियों में नहीं होगा पानी

हवा में घुलेगा जहर।
बच्चों को नहीं मिलेगा समय
कि तैरा पाएँ कागज की कश्‍ती
वे कहानियों की जगह

गुनेंगे सामान्य ज्ञान।
बाहर तो बाहर

घर में भी महफूज
नहीं रहेंगी बच्चियाँ।

बुजुर्गों का इम्तिहान
और कड़ा होगा।

बुरे वक्त में चाहें अनुष्ठान‍ न करवाना
दान-धर्म न हो तो

कोई बात नहीं

हो सके तो बचाना

अपने भीतर सपने
भले ही हों वे

आटे में नमक जितने।

मुश्किल घड़ी में जीना

सपनों के आसपास।
देखना फिर नक्षत्र बदलेंगे

बदलेगी ग्रहों की चाल।
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नव वर्ष पर शुभकामनाएँ

Friday, December 18, 2009

धवल अनुराग

साहित्यप्रेमियों के लिए राजेन्द्र अनुरागी का नाम अपरिचित नहीं है। जो नहीं जानते उनके लिए दो विशिष्ट व्यक्तियों के कथन काफी हैं।


अपनी पुस्तक `अनंत नाम जिज्ञासा´ में अमृता प्रीतम ने लिखा है कि अनुरागी जी को देखकर लगता है, जैसे प्राचीन सूफी दरवेशों या जैन फकीरों की कहानियों का कोई पन्ना किताबों से निकलकर इंसानी सूरत में आ गया हो।`


चीन यु° के बाद सन 1963 में आयोजित कवि सम्मेलन में शिवमंगल सिंह सुमन ने कहा था- `नेहरू जी! आज लाल किले के इस मंच से, मैं आपके सामने अपनी नहीं, अपने मध्यप्रदेश के एक कवि राजेन्द्र अनुरागी की ये पंक्तियां पढ़ना चाहता हूं। देश को आज जरूरत इन्हीं पंक्तियों की है-


आज अपना देश सारा लाम पर है,

जो जहां हैं वतन के काम पर हैं।´

भोपाल में 19 दिसंबर को राजेन्द्र अनुरागी की प्रथम पुण्यतिथि पर `अनुरागी प्रसंग´ का आयोजन हो रहा है। उनके साथ मेरी भी याद जुड़ी है। जो मैं साझा कर रहा हूँ।



धवल दाड़ी में वह शख्स खिलखिलाता था तो किसी फरिश्ते से लगता था। व्यक्तित्व ऐसा कि पहली मुलाकात में किसी को भी आकषिoत कर लें, जिस जगह जाएँ वह महिफल लूट लें। भोपाल के  आयोजन में उनका होना आयोजन को सरस बनाता था। जीवटता उनके व्यक्तित्व का उजला हिस्सा थी और यही नूर उनके चेहरे से झलकता था।  एक शफ़्फाक खिलखिलाहट सारा तनाव हर लेती थी। उनके गीत ही रगों में जोश नहीं फूँकते थे बल्कि उनका होना ही जीवन को ताकत से भर देता था। िफर चाहे वह किसी चाट की दुकान पर ठहाके मारते अनुरागीजी हो या किसी सभा-गोष्ठी में उसी तान पर गीत गाते अनुरागीजी।

उनको गए एक साल हो गया है। इन 365 दिनों में कई लोगों ने उन्हें नहीं भुलाया। अनुरागीजी और ऊर्जा से सराबोर करता उनका खिलखिलाता चेहरा मुसीबतों के क्षणों में अकसर याद हो आता है। ऐसे ही लोगों में जवाहर लाल नेहरू कैंसर अस्पताल के वे मरीज भी हैं जो कैंसर के साथ अपनी लड़ाई में अनुरागीजी के गीतों को अपनी प्राण ऊर्जा मानते थे। बात कोई आठ साल पुरानी है। 2002 के जून में जवाहर कैंसर अस्पताल में एक कार्यक्रम आयोजन हुआ था। कार्यक्रम था, मौत को मात दे रहे मरीजों की जिजीविषा बढ़ाने के लिए शहर के रचनाकारों के रचना पाठ का। यहाँ वरिष्ठ कवि राजेश जोशी, आलोचक कमला प्रसाद, राजुरकर राज आदि के साथ राजेन्द्र अनुरागी भी मौजूद थे। काव्य पाठ सभागार में हुआ था। जो मरीज आ सकते थे वे सभागार में आए और जो गंभीर थे उन्होंने स्पीकर के जरिए गीतों और रचनाओं को अपने वार्ड में सुना। अनुरागीजी ने गीत `उम्र के देवता दीप धर ही दिया´ पढ़ा तो हाल में मौजूद मरीजों की आँखें चमक उठी। उन्हें इस गीत की पंक्तियों में जीवन का भारतीय आध्यात्मिक सार समझ में आ गया था। बाद में पता चला कि अनुरागी जी नियमित रूप से कैंसर अस्पताल जाते थे और कैंसर को परास्त करने के लिए मरीजों अपनी रचनाओं का `हाई पॉवर डोज´ दे कर आते थे।

राजेन्द्र अनुरागी नामक शख्स के कई परिचयों में से एक पहचान यह भी है।



उम्र के देवता

दीप धर ही दिया

कौन जाने सुबह तक जले-ना जले,

तेल कितना बचा है, हमें क्या पता

हम जहां तक जले, जगमगाते जले

लौ लुटाते जले।

जल लिये जिन क्षणों

बस, वही जिन्दगी

बुझ गये जिस जगह

बस, वहीं तक सफर

कौन कितना चलेगा, हमें क्या खबर

हम जहां तक चले, गुनगुनाते चले

गीत गाते चले।


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Wednesday, December 2, 2009

भोपाल की जुबानी गैस त्रासदी का दर्द

विश्व की सबसे ब़ड़ी औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैसकांड को हुए 25 बरस हो गए हैं। आधी रात हुए इस हादसे में 15 हजार लोगों की मौत हो गई जबकि 5 लाख से ज्यादा लोगों का जीवन दूभर कर दिया है। हालात यह है कि अब तक गैस के दुष्प्रभाव का सटीक आकलन तक नहीं किया जा सका है। 20बस्तियाँ जहरीला पानी पीने को मजबूर है और कई लोग इलाज के लिए भटक रहे हैं।

25 साल। इतने बरस में एक पीढ़ी जवान हो जाती है। लेकिन भोपाल की एक पीढ़ी इतने बरसों तक दमघोंटू तकलीफ में जिंदा रही है। यहाँ पीड़ा केवल अपनों को खोने की नहीं थी...उस रात के बाद से एक ऐसे दर्द से नाता जुड़ गया कि तकलीफ खत्म ही नहीं होती। कभी फेफड़ों ने जवाब दिया तो कभी कैंसर ने आ दबोचा। इलाज के नाम पर वादा मिला और वादे टूटते रहे।


इन 25 सालों में शहर की सूरत बदली है। िफर भी एक कोना है जो नहीं बदला। वहाँ आज भी गैस कांड की कड़वी यादें जिंदा हैं। वहाँ हर रात वही हादसा करवट लेता है और हर करवट के साथ उस रात का मंजर ताजा हो उठता है-


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25 साल पहले

आज ही की रात

गहरी नींद में था कि

मौत की धुंध् छा गई

25 सालों में िफर नहीं सोया वैसा कभी।


अपने ही दर्द से बेखबर भाइयों की तरह

मेरे दो हिस्से-

नया भोपाल सोता रहा बेपरवाह

और पुराना भागता रहा बदहवास।

पैरों तले कुचलती रही

घुटती, तड़पती रही जिंदगी।

सुबह जब जागा तो कई लोग नहीं जागे

मेरे साथ

जैसे रोज जागा करते थे

और जाया करते थे काम पर

25 सालों में िफर नहीं गया काम पर वैसा कभी।


कहते है वक्त हर दर्द का मरहम होता

मुझे नहीं मिला वह मरहम।

आज तक हरा है मेरा घाव

साँस लेता हूँ तो दम घुटता है

चलता हूँ तो लड़खड़ाता हूँ

देखता हूँ तो बिखर जाता हूँ

इन 25 सालों में

हर रोज दर्द पता पूछता रहा

और मैं बताता रहा

अपने एक-एक अंग का ठिकाना

Friday, November 6, 2009

घराने अपने दायरे तोड़ अंर्त संवाद

मुकुल शिवपुत्र का साक्षात्कार //

पंडित मुकुल शिवपुत्र- गान मनीषी पं. कुमार गंधर्व के ज्येष्ठ पुत्र। यह यायावर कलाकार पिछले दिनों चर्चा में रहा। पहले भोपाल में बदहाली में मिले। शासन ने ख्याल गुरूकुल प्रारम्भ किया लेकिन इस फक्कड़ कलाकार को वह सब रास न आया। िफर एक दिन नशा मुक्ति केन्द्र को छोड़ कूच कर गए। बाद में ग्वालियर में मिले लेकिन वहाँ कहा कि भोपाल में और शासन के बंधन  में मन नहीं लगता। इसी पूरी प्रक्रिया के दौरान एक सुबह मुकुलजी से तवील मुलाकात हो गई। इसी के कुछ अंश:-

उनका परिचय इतना भर नहीं है। कुमारजी की ख्याति का ही खयाल और ध्मार गायक हैं मुकुल शिवपुत्र। मिजाज से कलाकारों का चिरपरिचित फक्कड़पन पहली ही मुलाकात में नजर आ जाता है। मुकुलजी से मिलना, बतियाना ऐसा लगता है जैसे संगीत सरोवर में गोते लगा रहे हैं। तबीयत सूफयाना है तो यह तय नहीं कि मुकुलजी एकदम खुल कर ही मिलेंगे। हो सकता है आप घंटों बैठे रहे और सारे जहाँ की बातें हो मगर यह विरला गायक कोई तान तक न छेड़े। संभव है बीच संवाद में अचानक कोई तान सहज बहती चली आए और हमें आनंद में भिगोते हुए निकल जाए। मन न हो तो वे बात भी न करें और भाव हो तो घंटों संगीत और अपने अनुभवों के बारे में बतिया सकते हैं। वे बात करते हैं तो लगता है कि बोलते चले जाएँ और हम अभिभूत से वाचिक परम्परा का अंग बनते हुए संगीत के मर्म को जानते रहें।


कुमारजी ने शुरू किया संगीत विधाओं का अंर्त संवाद /
बकौल मुकुलजी खयाल, ठुमरी, ध्रुपद  आदि संगीत की अलग-अलग विधाएँ  हैं। इन्हें खानों में बाँटना ठीक नहीं है। ठुमरी की ही तरह खयाल गायकी भी परम्परागत है। ऐसा कैसे हो सकता है कि एक विधा  को तो हम जाने और दूसरी से दूरी बना कर रखें। खयाल केन्द्र में जो भी शिष्य आएगा उसे ठुमरी, ध्रुपद, ध्ामार आदि से वंचित नहीं रखा जाएगा। एक घराने की परम्परा को गाएँ और दूसरे के महत्व को नजरअंदाज करें, यह कैसे संभव है? यह तो ऐसे होगा कि हम हिन्दी बोलने वाले को कहे कि वह मराठी न सीखे। सभी घरानों के संगीतकारों और गायकों को अपने दायरे तोड़ कर अंर्त संवाद  करना चाहिए। इससे तुलनात्मक अध्ययन का सम्भावना बनी रहती है। कुमार गंधर्वजी ने इसी अंर्त संवाद  की शुरुआत की थी। वे ग्वालियर घराने के थे लेकिन उन्होंने रामपुर, जयपुर सहित सभी घरानों की खूबियों को जाना था। ऐसा करने वाले वे पहले कलाकार थे, क्योंकि तब तक रेडियो सहित तमाम उपकरणों का ऐसा विकास नहीं हुआ था। बचपन में बाबा (कुमारजी) ने हर घराने की गायन शैली का उसके वैशिष्ट्य के साथ करवाया था। बाबा ने अपने कमरे में जयपुर घराने के सिद्ध गायक अलादिया खाँ साहब का फोटो लगा रखा था। यह उनके कमरे में लगा किसी गायक का एकमात्र फोटो था।

वाचिक परम्परा का रहना जरूरी/
संगीत परम्पराओं और थाती को सहेजने के लिए ज्ञान को लिपिबद्ध करना कितना जरूरी है? इस सवाल के जवाब में मुकुलजी ने कहा कि वाचिक परम्परा खत्म नहीं होती। जो ज्ञान वाचिक में रहा वह अब तक बचा हुआ है, क्योंकि जो मस्तिष्क में लिख गया, वह कभी खत्म नहीं होगा। रामचरित मानस ही ले लीजिए। उसकी चौपाइयाँ याद है तो क्या फर्क पड़ता है कि उन्हें लिखा गया है या नहीं। यदि किसी ज्ञान को वाचिक परम्परा ने नहीं सहेजा तो िफर चाहे कितनी किताबें लिख लो, उसे बचाया नहीं जा सकेगा। असल वह है जो मस्तिष्क को प्रभावित करे।

पहली सभा 51 वर्ष की उम्र में! /
संगीत साधना  माँगता है। आज की पीढ़ी सब कुछ जल्दी चाहती है। ऐसे में रियलिटी शो क्या वास्तविक प्रतिभा को सामने ला पाते हैं, पूछने पर मुकुलजी ने बताया कि जयपुर घराने के सिद्ध गायक अलादिया खाँ साहब ने लयकारी और स्वरकारी का अद्भुत समन्वय किया था। उन्हीं के कारण जयपुर की गायकी में राग व ताल का सुंदर मेल मिलता है। अलादिया खाँ साहब ने कई बड़े शागिर्द तैयार किए, लेकिन उनकी पहली महिफल मुंबई में तब हुई थी, जब वे 51 वर्ष के थे। आज माता-पिता कहते हैं कि बच्चा 13 साल का हो गया, उसे मंच नहीं मिला। बाहर नहीं निकलेगा तो सपोर्ट कैसे मिलेगा, जबकि बाबा कहा करते थे कि बाहर निकलने पर सपोर्ट नहीं विरोध्ा मिलेगा बाहर कौन सहयोग करने के लिए तैयार बैठा है। पहले खुद को तैयार करो िफर मंच की चाह करो।

संगीत साधना  के लिए चाहिए निष्ठा /
मुकुलजी के मुताबिक संगीत सीखने की प्राथमिक जरूरत निष्ठा है। यह निष्ठा जो कुछ सीख रहे हैं और जो गुरू सीखा रहे हैं, उनके प्रति होना चाहिए। चाहे प्रतिभा, निरीक्षण और परीक्षण की क्षमता, स्मृति की प्रखरता, सुक्ष्म परिक्षण का कौशल, मीठा गला जैसी अनिवार्य योग्यता नहीं होगी तो भी निष्ठा के बल पर संगीत साधना की जा सकती है। संगीत सीखने की ललक ही बड़ी बात है। ऐसे ही थे उस्ताद रजब अली साहब। देवास के दरबार गायक रजब अली साहब तो अलादिया खाँ साहब की रियाज सुन-सुन कर ही गायक बन गए थे। इसी कारण वे अपने घराने का परिचय सुन्नी घराने के रूप में देते थे।


गुरू शिष्य परम्परा ही मूल /
यह कहना गलत है कि गुरू शिष्य परम्परा खत्म हो रही है। मुकुलजी कहते हैं कि यह परम्परा हमारी संस्कृति का मूल है। माँ-बच्चों का रिश्ता इस परम्परा की शुरूआत है। गुरू वह ही नहीं है जो कुछ ज्ञान दे, बल्कि वह भी गुरू है जो मार्ग दिखाता है। गायन प्रतिभा है तो पहले जो सभी नकल ही करते हैं, अच्छा गुरू उस प्रतिभा को पहचान राह दिखा देता है। मियां तानसेन तो जंगली पशुओं की आवाज की नकल किया करते थे। एक दिन गुरू हरिदास शिष्यों के साथ जंगल से गुजर रहे थे तो तानसेन ने शेर की आवाज निकाल कर उन्हें डरा दिया। पहली बार तो स्वामी हरिदास भयभीत हो गए, लेकिन दूसरी बार पहचान गए कि यह शेर की आवाज नहीं है। जंगल में मिले गुरू ने ही तानसेन को राह दिखाई। आज ऐसे ही गुरू की जरूरत है।

Tuesday, November 3, 2009

मैं, तुम्हारे आंगन का पेड़ हूं ...

मैं, तुम्हारे आंगन का पेड़ हूं। कैसे हो? आजकल बहुत मसरूफ रहते हो शायद, इसीलिए न कभी अपनी कहते हो और न कभी हमारी सुनते हो। मान लेता हूं कि सबकुछ ठीक होगा लेकिन यह मानने का मन नहीं कर रहा। आजकल तुम आते-जाते बड़ी चिंता में दिखलाई देते हो? सुना है, राशन और दफ्तर की चिंता के साथ तुम्हें बदलता मौसम भी परेशान करता है।

कल ही तो तुम अपने मित्र से कह रहे थे कि ग्लोबल वॉर्मिंग से निपटने के उपाय होने चाहिए। मुझे तो बड़ी हंसी आई तुम पर। तुम अब भी नादान ही रहे, बचपन की तरह! दुनिया बचाने की चिंता कर रहे हो अपने आँगन-मोहल्ले को भुलाए बैठे हो! अब ऐसे क्या देख रहे हो, जैसे मैंने कोई अजूबी बात कह दी हो।

तुम्हें अपने घर-आंगन की खबर ही कहां है? तुम तो यह भी भूल गए कि परसों नुक्कड़ के उस पेड़ को काट दिया गया जिसकी इमलियाँ तुम रोज अपने जेब में भर कर ले जाते थे और उन्हीं के कारण स्कूल में कई दोस्त बने थे तुम्हारे। हां, सड़क बनाने के लिए उस पेड़ को काट दिया। फुर्सत मिले तो देखना, कल तक जहां हरियाली थी आज खाली आसमान नजर आएगा। पिछले साल मुझे भी तो काट डाला था न, घर की छत बढ़ाने के लिए। तुम्हीं बताओ, अब बच्चों को झूले डालने के लिए कहां मिलती हैं हमारी शाखाएं जैसी तुम्हें मिलती थीं। 


तुम धरती बचाने की फिक्र करते हो और उन कारणों को भूल जाते हो जिनके कारण धरती का अस्तित्व खतरे में पड़ा। तुम्हीं तो खेतों में रासायनिक खाद का ढेर लगाते हो, जहरीले कीटनाशक डालते हो, वायु को प्रदूषित करते हो, पानी को बर्बाद करते हो, जंगल उजाड़ते हो और वन्य प्राणियों को खत्म करते हो। अब बताओ, ऐसे क्या पृथ्वी बची रहेगी? ऐसे क्या तुम बचे रहोगे?

तुम जानते हो, 3 हजार कागज बनाने के लिए एक पेड़ को काटा जाता है। एक टन कागज की बर्बादी रोक कर तुम 17 पेड़ों को कटने से बचा सकते हो। अपने घर को रोशन करने के लिए 41 सौ किलोवॉट बिजली बच सकती है और 26 हजार गैलन पानी बचाया जा सकता है। 

तुम्हारे आंगन में पेड़ होंगे तो उन पर गौरेया घोंसला बनाएंगी...झूले डालने को शाखाएँ बची रहेंगी...फल बचे रहेंगे...और तुम्हारे बच्चों का बचपन बचा रहेगा, संस्कृति बची रहेगी और पोषित होती रहेंगी परंपराएं जो पेड़ के साये में पल्लवित होती हैं। पेड़ बचे रहेंगे तो बची रहेगी पृथ्वी...तुम सुन रहे हो ना?

Tuesday, October 27, 2009

दद्दा की दरी दुष्यंत के घर



`जॉय ऑफ गिविंग´ में मिली भोपाल को अनूठी सौगात

एक वो दिन था जब दद्दा माखनलाल चतुर्वेदी के सम्मान समारोह के इंतजाम के लिए शायर-कवि दुष्यंत कुमार खंडवा गए थे। एक शुक्रवार की शाम थी जब दद्दा द्वारा इस्तेमाल की गई दरी भोपाल में दुष्यंत कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय की निधि बनी। यह दरी दद्दा के परिजनों ने राष्ट्रीय स्तर पर चले अभियान `जॉय ऑफ गिविंग´ के तहत संग्रहालय को भेंट की । इस आत्मीय आयोजन में दोनों रचनाकारों के व्यक्तित्व के कई जाने-अनजाने पहलू उजागर हुए। इस मौके पर संग्रहालय परिसर में दादा के भतीजे प्रमोद चतुर्वेदी, जॉय ऑफ गिविंग अभियान के तहत यह दरी पाने वाली संस्था स्पंदन के सीमा-प्रकाश तथा इस अभियान के मीडिया पार्टनर `नवदुनिया´ के स्थानीय संपादक गिरीश उपाध्याय मौजूद थे। प्रकाश ने बताया कि श्री चतुर्वेदी ने दरी यह कहते हुए प्रदान की थी कि इसका बेहतर इस्तेमाल किया जाए। जब संग्रहालय को इसका पता चला तो उसने इसे अपने यहाँ सुरक्षित रखने का निर्णय किया। प्रमोद चतुर्वेदी ने दद्दा के साथ बिताए पलों को याद करते हुए कई अनुभव सुनाए। दद्दा उन्हें मुन्ना बाबू कहते थे और हर कार्यक्रम में साथ ले जाते थे। खंडवा में पोलिटेिक्नक के उद्घाटन के समय तो दद्दा के साथ केन्द्रीय मंत्री हुमायूँ कबीर प्रमोदजी को लेने उनके प्राथमिक स्कूल गए थे। दद्दा से मिलने कई क्रांतिकारी और लेखक खंडवा आते थे। एक दिन राममनोहर लोहिया भी खंडवा पहुंचे और मुलाकात के बाद दद्दा के साथ फोटो खिंचवाने की इच्छा जताई लेकिन दुभाoग्य था कि तमाम प्रयासों के बावजूद उस दिन शहर का कोई फोटोग्राफर इस अविस्मरणीय क्षण को कैमरे में कैद करने के लिए उपलब्ध नहीं हो सका। साहित्यकार राजेन्द्र जोशी ने बताया कि छितगाँव में उनके पैतृक निवास पर ही दद्दा का बचपन गुजरा। श्री जोशी ने वहां के घर आंगन में बीती कई घटनाओं को याद किया। गिरीश उपाध्याय ने कहा कि यह देने का नहीं बल्कि छीन लेने का जमाना है। ऐसे में कोई देने की बात करता है तो सुखकर लगता है। ऐसे स्मृति चिन्ह हमें अपने समृद्ध अतीत से जोड़ते हैं। इन्हीं स्मृतियों के सहारे हम भविष्य को संवार सकते हैं। इसलिए महापु‹षों की स्मृति से जुड़ी जो चीजें सहेजी जा सकती हैं उन्हें सहेजा जाना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन करते हुए संग्रहालय के संस्थापक राजुरकर राज ने आग्रह किया कि किसी के पास साहित्य के पुरखों की कोई धरोहर हो तो उसे संग्रहालय को सौंपे। ऐसा कर हम अपना अतीत सहेज पाएँगे। प्रारम्भ में नरेन्द्र दीपक, शिवकुमार अर्चन और विनोद रायसरा ने अतिथियों का स्वागत किया।

Monday, October 12, 2009

बढ़ रही गरीबी, आधी आबादी बीपीएल

गरीबों की खाद्य सुरक्षा का लक्ष्य कठिन

सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों में एक सबसे ब़ड़ा लक्ष्य 2015 तक गरीबी मिटाना है, लेकिन भारत में गरीबी कम होने के बजाय लगातार ब़ढ़ रही है। गाँवों में 80 फीसदी और शहरों में 79 फीसदी लोगों को पौष्टिक आहार नहीं मिल रहा है। देश में 10 फीसदी आबादी प्रतिमाह महज 10 किलोग्राम अनाज का उपभोग करती है। इन संकेतकों को देखते हुए केन्द्र सरकार द्वारा बनाई गई कमेटी ने देश की 50 प्रतिशत आबादी को बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) घोषित करने की अनुशंसा की है।
देश में बीपीएल परिवारों का निर्धारण योजना आयोग द्वारा किया जाता है। यह सर्वे हर पाँच साल बाद राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएसओ) की ओर से उपभोक्ता के खर्च का आधार पर किया जाता है। जहाँ गरीबी का आकलन योजना आयोग करता है वहीं गरीब परिवारों की संख्या की गणना केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय करता है। केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 2008 में एक विशेषज्ञ समिति बनाई ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवारों की संख्या का ज्यादा सटीक आकलन हो सके। इस समिति का मानना है कि भारत में गरीबों की संख्या आधिकारिक आँक़ड़े 28.3 प्रतिशत की तुलना में कहीं ज्यादा है। समिति ने अनुशंसा की है कि बीपीएल के दायरे में आने वाले परिवारों की संख्या का िफर से निर्धारण हो और कम से कम 50 फीसदी आबादी को बीपीएल घोषित किया जाए। समिति का कहना है कि यदि यह आकलन कैलोरी के उपभोग के आधार होगा तो गरीबों की संख्या 80 प्रतिशत होगी। समिति ने कहा है कि केन्द्र सरकार बहुत सी योजनाओं का फायदा बीपीएल कार्ड होने पर मिलता है। अत: केन्द्र सरकार को यह घोषणा जल्दी कर देना चाहिए। अगर सरकार इस अनुशंसा को मान लेती है तो मध्यप्रदेश में गरीबों की संख्या 37.67 प्रतिशत से ब़ढ़ कर 66.55 प्रतिशत और छत्तीसग़ढ़ में 41.41 से ब़ढ़ कर 73.16 प्रतिशत हो जाएगा। विकसित समझे जाने वाले राज्य गुजरात में गरीबों की संख्या 19.46 फीसदी से ब़ढ़ कर 34.38 प्रतिशत हो जाएगी। गौरतलब है कि सहस्त्राब्दी लक्ष्यों के अनुसार हमें 1990 में कम कैलोरी का उपभोग कर रहे लोगों की संख्या 62.2 फीसदी से घटा कर 2015 में 31.1 फीसदी तक लाना है।

80 फीसदी आबादी पोषण से दूर
ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 और शहरों में 2100 किलो कैलोरी उपभोग का मानक तय किया गया है। गाँव हो या शहर कैलोरी उपभोग लगातार घट रहा है। देश की तीन तिहाई से भी ज्यादा आबादी प्रति व्यक्ति कैलोरी उपभोग के मानक से कम का उपयोग कर रही है। 1983 में 66.1 फीसदी ग्रामीण और 60.7 फीसदी शहरी आबादी मानक से कम कैलोरी का उपभोग कर रही थी। 2008 में जारी आँक़ड़ों के मुताबिक 2004-05 में गाँवों में 79.8 और शहरों में 63.9 प्रतिशत आबादी को पर्याप्त कैलोरी वाला भोजन नहीं मिल रहा है। गौरतलब है कि अक्टूबर 2008 में जारी एनएसएसओ के आँक़ड़ों के मुताबिक 30 सालों में गरीबों के अनाज उपयोग में भारी कमी आई है। 10 प्रतिशत आबादी हर महीने महज 10 किलो और 30 फीसदी आबादी को 12 किलो अनाज के सहारे बसर करती है।

Thursday, October 8, 2009

किसान ही कर रहे `कोख´ को बंजर

कम्पनियों के झाँसे में आ कर रसायनों के बेतहाशा इस्तेमाल


भोपाल। काली मिट्टी में `सफेद सोना´(कपास) उगाने वाले झाबुआ जिले के भोले किसान बाजार के लुभावने वादों में आकर कोख को ही बंजर रहे हैं। परम्परागत फसलों से निराश हुए किसानों को कपास, टमाटर, मिर्च जैसी नकद फसल ने सपने दिखाए। अब रसायनों के बेतहाशा इस्तेमाल के कारण उपज तो कम हो ही रहा है, वे अनजाने में समाज को बीमारी दे रहे हैं।
कभी मोटा अनाज, दलहन, तिलहन उगाने वाले झाबुआ जिले के पेटलावद तहसील क्षेत्र में अब हर तरफ सोयाबीन, कपास, टमाटर और मिर्च की फसल नजर आती है। इन फसलों में लाभ तो होता है लेकिन यह लाभ शुरूआती है। ये सभी फसलें ज्यादा खर्च, ज्यादा बीमारी की संभावना वाली तथा ज्यादा पानी पीने वाली है। इनका उत्पादन धीरे-धीरे गिर रहा और उसे बढ़ाने के लिए ज्यादा उर्वरक तथा कीटनाशकों का उपयोग किया जा रहा है।

फसल रसायनों से तरबतर
अध्ययन के दौरान हम यह देख कर दंग रह गए कि किसान तीन इंच का पाइप लगा कर स्प्रे पम्प से फसलों को कीटनाशकों से नहला रहे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार टमाटर के उन्नत बीज में ब्लाईट नामक संक्रामक रोग लग रहा है। इसे खत्म करने के लिए खेत को कीटनाशकों से तरबतर कर दिया जाता है। खरपतवार खत्म करने के लिए निंदाई-गुड़ाई करने वाले किसान अब चारा घास को नष्ट करने के लिए हबीoसाइड रसायन का वापर रहे हैं। यहाँ के 40 फीसदी किसान इस 1600 रूपए लीटर की कीमत वाले रसायन का उपयोग कर रहे हैं।

आठ गुना बढ़ गया रसायनों को उपयोग
1970 में एक हेक्टेयर में 20 किलो रसायन का उपयोग होता है। 2009 में एक हेक्टेयर खेत में 600 से 800 किलो रासायनिक उर्वरक तथा 5 से 10 किलो कीटनाशक का छिड़काव हो रहा है। कपास, मिर्च, टमाटर जैसी नकद फसलों को लेने के लिए रसायनों का इतना इस्तेमाल राष्ट्रीय औसत 94.4 किलो प्रति हेक्टेयर से छह से आठ गुना ज्यादा है। एक उर्वरक विक्रेता मुकेश चौधरी बताते हैं कि दिल्ली-मुंबई के खरीददार भी कहते हैं कि ज्यादा उर्वरक डालने से टमाटर का छिलका मोटा होगा और वह ले जाने के दौरान खराब नहीं होगा।

गिर गया उत्पादन
झाबुआ में कपास का औसत उत्पादन 151 किलो प्रति हेक्टेयर के नीचले पायदान पर पहुँच गया है। कृषि विभाग के अनुसार 2005-06 में झाबुआ में एक हेक्टेयर में औसतन 442 किलो कपास का उत्पादन होता था। 2006-07 में यह घट कर 370 किलो और 2008-09 में और घट कर 151 किलो पर आ गया। सोयाबीन उत्पादन में भी यह जिला पिछड़ता जा रहा है। मप्र का औसत सोयाबीन उत्पादन 1143 किलो प्रति हेक्टेयर है जबकि झाबुआ में एक हेक्टेयर में औसतन 775 किलो सोयाबीन हो रहा है। कुछ साल पहले टमाटर की खेती प्रारम्भ की गई थी। इसकी उपज भी लगातार घट रही है।


जहरीले हैं टमाटर!
झाबुआ में पैदा होने वाले टमाटर-मिर्च दिल्ली, मुबंई,इंदौर-भोपाल की मंडियों में भेजे जाते हैं। अत्यिध्ाक रसायनों के कारण यह टमाटर-मिर्च जहर में तब्दील हो चुकी है, लेकिन इसे उगाने और खाने वालों को इसकी जानकारी ही नहीं है। झाबुआ जैसे आदिवासी जिले में कीटनाशक और रासायनिक खाद के लिए बढ़िया बाजार मौजूद है। पिछले तीन सालों से यहाँ रसायनों का उपयोग हर वर्ष 60 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से बढ़ रहा है। रसायनों के उपयोग के कारण ग्रामीण भी बीमार हो रहे हैं। नौ गाँवों में हुए सर्वे में 26.23 फीसदी यानि 287 परिवारों में पेट से जुड़ बीमारियाँ मिलीं। इन गाँवों में 73 व्यक्ति अस्थमा के मिले।

Wednesday, September 16, 2009

कुछ अपनी: फसल हो गई खरपतवार

उत्साहवद्धन के लिए आप सभी का धन्यवाद। पंकज शुक्ला

Tuesday, September 15, 2009

बुंदेलखंड में ग्रामीणों का पलायन

भोपाल। आजाद हिन्द फौज का गठन कर सुभाष चन्द्र बोस ने नारा दिया था-`दिल्ली चलो।´ आज सूखे और बेरोजगारी से परेशान बुंदेलखंड के बाशिंदें कह रहे हैं-`दिल्ली चलो।´ वह आजादी को पाने का कूच था तो यह अपनी रोजी खत्म हो जाने के बाद मजबूरी का पलायन है। बुंदेलखंड के हर बड़ा कस्बे के बस स्टैण्ड पर इन दिनों कई परिवार नजर आ जाएँगे जो अपनी धरती -अपना गाँव छोड़ काम की तलाश में दिल्ली, गुड़गाँव और चंडीगढ़ जा रहे है। -------------------

यह केवल दो गाँवों की कहानी नहीं है। बुंदेलखंड के किसी भी बस स्टैण्ड पर इन दिनों 5 से 25 लोगों का समूह नजर आ जाएगा। इन लोगों के पास बोरी, बिस्तरों का बंडल और कुछ गृहस्थी का सामान देख कर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये लोग गाँव छोड़ कर जा रहे हैं। नए शहर में जल्दी काम न मिलने की आशंका के चलते गाँव से जाने वाला हर परिवार अपने साथ 10 से 15 दिन के भोजन का इंतजाम कर के निकलता है। शहर में 80 से 150 रूपए की मजदूरी मिलती है। इसलिए वे बहुत सा सामान जैसे गेहूँ-आटा, लकड़ी, बर्तन, कपड़े आदि अपने साथ लेकर जाते हैं। छतरपुर बस स्टैण्ड पर बस संचालन की व्यवस्था करने वाला अजय नायक के मुताबिक 20 अगस्त से हर रोज 8 से 10 हजार लोग दिल्ली- गुड़गाँव की ओर जा रहे हैं।

कर्ज़ लेकर किराए की जुगाड़ :-

सूखे के कारण गरीबों के खाने के लाले हैं। उनके पास इतना पैसा भी कहाँ कि वे दिल्ली तक का किराया और खाने-पीने का इंतजाम कर सके। कमाई की आस में वे कर्ज़ लेकर यात्रा का इंतजाम करते है। अकोना गाँव इस बात का उदाहरण है। यहाँ के 110 किसानों ने इस बार अपने खेत में तिल, उड़द और सोयाबीन बोया था। वह अब घास-खरपतवार से पट गई है। इस गाँव के 70 परिवार काम की तलाश में दिल्ली-गुड़गाँव गए हैं। इस यात्रा का खर्च भी कर्ज़ लेकर जुटाया गया है। हर व्यक्ति ने 2 से 3 हजार रूपए का कर्ज़ लेना पड़ा है।

बस संचालकों का भी शोषण :-

सूखे की मार झेल रहे गरीबों को लूटने में बस कंडक्टर-क्लीनर भी पीछे नहीं है। छतरपुर बस अÈे पर काम करने वाले युसूफ खान के अनुसार छतरपुर से जाने वाली अिध्ाकांश बसों का परमिट ग्वालियर तक का ही है। लेकिन यह बात वे ग्रामीणों को नहीं बताते और उन्हें दिल्ली जाने के लिए बैठा लेते हैं। दिल्ली तक का किराया लेने के बावजूद में वे सवारियों को ग्वालियर में ही उतार देते हैं। बीच राह में उतरने के बाद दूसरी बस में किराया चुकाना पड़ता है।

अकेले छूट गए बुजुर्ग :-

बुंदेलखंड के गाँवों में इन दिनों ज्यादातर बुजुर्ग और बच्चे ही नजर आते हैं। सबके बेटे-बहू का की तलाश में बाहर गए हैं। हरदीना अहिरवार की उम्र 67 वर्ष है। वह मजदूरी करने में सक्षम नहीं है तो बुढ़ापे में बेटे और पत्नी गाँव में अकेला छोड़ कर काम करने चले गए। हरदीना गाँव में ही जूते-चप्पल सुधार कर अपना जीवन बसर कर रहे है। छतरपुर के अकोना गाँव के गुरवा अहिरवार आज अपनी बुजुर्ग पत्नी और तीन पोतियों के साथ अकेले रह गए है। उनके दो बेटे और बहू काम की तलाश में जुलाई में दिल्ली जा चुके हैं। गुरवा ने बताया कि उनका बेटा लखन, पप्पू और बहू सील्ता अपने साथ 15 दिन का खाना साथ ले कर गए हैं। रतिया चिंता में है कि उनके बच्चों की कोई खबर नहीं है। वे दिल्ली में कहाँ हैं, कब काम मिला, कितने दिन भटके कोई खबर नहीं मिली।

पहले जाते थे कुछ दिन, अब रहेंगे साल भर :-

इस बार पलायन की तस्वीर बदली हुई है। गुरवा के परिजन 7-8 साल से काम के लिए बाहर जा रहे हैं। पहले साल ये केवल सवा महिने के लिए गए थे। 2005 में 3 माह के लिए गए। अब वे जुलाई में चले गए हैं। अब उनकी वापसी अगले साल अप्रैल-मई में होगी।

श्रमिक मिलेंगे कृषक नहीं :-

कुछ बरस तक पलायन जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब आज का किसान कल का श्रमिक बन जाएगा। बुंदेलखंड में जीवन का यह बदलाव नजर आने लगा है। जो कल तक अपने खेत में चार मजदूर रखा करते थे, वे आज बड़े शहरों में ईंट-तगारी उठा रहे हैं।

Sunday, September 13, 2009

फसल हो गई खरपतवार

हाल ही में हुई बारिश से कई चेहरे खिल उठे हैं। माना जा रहा है कि बूँदें फसलों के लिए अमृत बन बरसी हैं। लेकिन दस साल से सूखा भोग रहे बुंदेलखंड के छोटे किसानों के लिए यह अमृत भी काम नहीं आया। असल में ये किसान आस खो चुके थे और न फसल पर कीटनाशकों का छिड़काव किया और न निंदाई ही की। जब बारिश हुई तब तक खेत में फसल से ज्यादा ऊँची खरपतवार हो गई। फसल नष्ट होने के बाद इन किसानों के लिए अब बारिश किसी काम की नहीं है। टीकमगढ़ और छतरपुर जिलों में अध्ययन पता चला है कि सूखे का मतलब खाली खेत, दरकती धरती और रीते जलस्त्रोत ही नहीं होता। हरे-भरे खेत भी में किसान के सपनों को पाला मार जाता है। छतरपुर जिले के अकोना गाँव के दलित किसान गुरवा अहिरवार ने पाँच हजार का कर्ज़ ले कर अपनी सवा एकड़ जमीन पर तिल्ली और उड़द बोई थी। बकस्वाहा विकास खंड में जून के आखिरी सप्ताह में बारिश फिर जुलाई में बूँदाबाँदी के अगस्त खत्म होने तक बारिश नहीं हुई। इस दौरान गुरवा ने समझ लिया कि इस बार भी मानसून दगा ही देगा। वह आस छोड़ चुका था कि खेत में फसल भी लहलहाएगी। इस लिए बीज का पैसा बबाoद समझ उसने घास-चारा-खरपतवार निकालने के लिए निंदाई में पैसा खर्च नहीं किया। पैसा बचाने के लिए न उसने कीटनाशक पर पैसा खर्च किया। गुरवा पर पहले से ही 55 हजार का कर्ज़ है। अब बारिश ने फसल को जीवनदान दे भी दिया तो क्या फसल से बड़ी तो खरपतवार हो गई है। मझौरा के बूठा अहिरवार ने दो एकड़ जमीन पर गठुआ और गाडर गूढ़ी उग आई है। पानी जिस समय गिरा उस वक्त फसल के सुधरने और पनपने की संभावना खत्म हो चुकी थी। गाँव के ही हरिनारायण बताते हैं कि अब तो खरपतवार वाले खेत में आग लगा कर ही सफाई करना होगी। रबी की फसल भी तब मिलेगी जब जरूरत के समय बिजली मिले, लेकिन ऐसा होता नहीं है। अब उन्हें अगले मानसून से ही उम्मीद है। गाँव के ही बिरदावन ने अपनी 4 एकड़ जमीन के लिए साढ़े तीन हजार रूपए के बीज, 24 सौ रूपए के कीटनाशक और साढ़े तीन हजार का उर्वरक खरीदा। यह खरीदी उसने कर्ज़ ले कर की। इन तीन माह में फसल तो नहीं मिली, ब्याज के कारण कर्ज़ जरूर बढ़ गया। बुंदेलखंड के अकोना या मझौरा गाँव की जगह किसी भी गाँव में जाएँ छोटे किसानों की यही हालत है। खत्म हो रहे पशु :- हरियाली के पीछे का दूसरा सच यह है कि बुंदेलखंड में पशुधन खत्म हो रहा है। मझौरा के बिरदावन के पास ही आठ साल पहले 10 भैंसें और 25 गायें हुआ करती थी। सूखे के कारण अब उसके पास केवल 2 गाय और 3 भैंस ही रह गई है। आभार महिला समिति ने राजनगर विकासखंड के 10 गाँवों में सर्वे किया तो पाया कि 2003 में इन गाँवों में 95 हजार 100 पालतू पशु थे। जून 2009 में यह संख्या घट कर ५० फीसदी रह गई। अभी इन गाँवों में 45 हजार 400 पशु हैं। किसान दाना पानी न जुटा पाने के कारण पशुओं को खुला छोड़ रहे है। बारिश का सच :- बुंदेलखंड में औसत बारिश 1145.7 मिलीमीटर मानी जाती है। इस बारिश में यदि 40 फीसदी की कमी रह जाए तो ही सरकार राहत राशि प्रदान करती है। सूखे और राहत की घोषणा करते समय यह तथ्य भूला दिया जाता है कि खेती के लिए एक तय समय अंतराल में बारिश की जरूरत होती है। इस साल छतरपुर में 31 अगस्त तक 474.1 मिमी बारिश हुई थी, जबकि इस समय तक औसत बारिश 925 मिमी है। 1 सितंबर के बाद से यहाँ करीब 400 मिमी बारिश हुई है, लेकिन यह किसानों के काम नहीं है। जुलाई में 15 दिन पानी की जरूरत थी,लेकिन एक भी दिन पानी नहीं बरसा।

Thursday, July 30, 2009

जाना `हबीब´ का

यह श्रध्दांजलि 8 जून को लिखी थी जब मेरे शहर भोपाल ने चार कलाधर्मियों की मौत देखी थी। कला की सरहदें नहीं होती और इस सच को मकबूल रंग निदेशक हबीब तनवीर ने साकार किया था। उस दिन तड़के हबीबजी ही रूखसत नहीं हुए बल्कि उसी सुबह तीन कवि भी मंच को अलविदा कह गए थे....

'रंगमंच पर पड़े पर्दे की तरह/ कौन जानता है/ रात के काले परदे के पीछे कल कौन सा दृश्य खुलने वाला है।'

सोमवार सुबह जब दो फोन काल्स पर खबर मिली की रंग पुरोधा हबीबजी और शीर्षस्थ मंच कवि ओम प्रकाश `आदित्य´, नीरज पुरी और लाड़सिंह गुर्ज़र नहीं रहे, उस वक्त मुझे निमाड़ी रचनाकार प«श्री दादा रामनारायण उपाध्याय की यही पंक्तियाँ याद आई। इन सूचनाओं ने मुझे सक्रिय कर दिया और मैं जानकारी और सूचनाएँ जुटाने में व्यस्त हो गया। अपने अखबार में बेहतर सामग्री संयोजना की ख्वाहिश के बीच एक सवाल रह रह कर मुँह उठाते रहा कि चार व्यक्तित्वों का एक साथ जाना कितना सूनापन छोड़ जाएगा?हबीबजी की मौजूदगी हमें आश्वस्त करती थी कि अभी भी सबकुछ बिगड़ा नहीं है। उम्मीद जगाता यह सर्ज़क असल में दीप स्तंभ था। एक पूरी संस्था जिसने स्वप्न बुने और उन्हें साकार किया। अध्यात्म की मान ले तो आत्मा ने चोला बदला है, लेकिन बार-बार गीता सार को नकारने का मन करता है। उस देह का मोह कैसे छोड़ दें जिसकी जुम्बिशों ने इतिहास गढ़ा है।

मंच पर पढ़ी जा रही चुटकुलोंनुमां कविताओं के बीच आदित्यजी ने छंद को बरकरार रखा। उनके पास जितना शुद्ध कवित्त था, उतनी ही पवित्र भाषा भी थी। कविता पर ये भरोसा न होता तो क्या वे उम्र के 70 वें पड़ाव तक असरदार तालियों के बीच काव्य पाठ कर पाते? नीरज पुरी और लाल सिंह गुर्ज़र हमारे प्रदेश के है। इनकी कविताएँ सुन कई शहरों के काव्य प्रेमी रश्क करते थे-`काश! ये हमारे शहर के होते तो रोज मिला करते।´एक खास तरह की ख्वाहिश, एक खास तरह धुन और एक खास तरह की जिद पालने वाले चार फनकार एक साथ रूखसत हो गए।

कहते हैं, अच्छे लोगों की भगवान के घर भी जरूरत होती है, क्या वहाँ भी अच्छाई का इतना टोटा हो गया है? ऊपर वाले से नाराजी और भी है, ये क्या कि कविता रचने वालों को इतने क्रूर तरीके से बुला लिया। हास्य चाहने वालों ने अब तक मुंबई लोकल ट्रेन में श्याम ज्वालामुखी के खोने का गम भुलाया भी नहीं था कि अब ये जख्म मिल गए। मंच भले ही सूना नहीं होगा, शो चलता रहेगा लेकिन अब वैसी टेर लगाने वाले न होंगे। कवि भले ही जिंदगी को केन्द्र में रख कविताएँ लिखते हों मगर जिंदगी तो हर पल कविताएँ रचती रहती है। इस बार भी जिंदगी ने दुखांत कविता रची है।

हमारे `हबीब´ हम से छिन कर, वह फिर हमें आजमा रही है।

Friday, July 24, 2009

कुपोषण से निपटने के सरकारी इंतजाम बौने

मासूम के सीने पर गर्म सलाखों से दागा

कुपोषण से निपटने में सरकारी प्रबंधन नाकाम साबित हुए तो गाँवों में फिर से उन रीतियों पर भरोसा किया जाने लगा है जिन्हें विज्ञान कभी का नकार चुका है। मध्य प्रदेश में कुपोषण से बच्चों के मरने का सिलसिला जारी है और अब लोगों का अस्पताल और आँगनवाड़ी केन्द्रों पर विश्वास ही नहीं रहा।यह गरीब माता-पिता का दुर्भाग्य ही मानिए कि कुपोषण से मर रहे अपने बच्चे को बचाने के लिए वे निर्ममता की हद भी पार कर गए। खंडवा के डाबिया गाँव के रमेश ने अपने उस दो साल के बेटे रामनारायण की जान बचाने के लिए मासूम के सीने को पचास पर गर्म सलाखों से दागना मंजूर कर लिया। गरीब माता पिता ने यह तब किया जब बाल शक्ति केन्द्र से छुट्टी के बाद रामनारायण की हालात बिगड़ने लगी। अब उनका (अँधा) विश्वास है कि डाम (चाचुआ) देने से उनके बेटे का जीवन बच जाएगा। खंडवा के खालवा विकासखंड के डाबिया गाँव में 2 साल के रामनारायण के पेट और पीठ पर दागने के पचास निशान है। बाल शक्ति केन्द्र खंडवा से मिली जानकारी के अनुसार रामनारायण पिता रमेश (मुन्ना) को 12 सितंबर 08 को बीमार हालत में बाल शक्ति केन्द्र लाया गया था। तब रामनारायण को चौथी श्रेणी का कुपोषित पाया गया था और इलाज किया गया था। उसे 24 सितंबर 08 को केन्द्र से छुट्टी दी गई थी। तब वह तीसरी श्रेणी में आ गया था। लेकिन इसके बाद अब तक उसके स्वास्थ्य में सुधार नहीं आया। अभी भी उसका वजन मात्र छह किलो है। रामनारायण के पिता रमेश के मुताबिक गर्मी में रामनारायण की तबीयत और बिगड़ने लगी। इस बार वे उसे दिखाने एक बंगाली डॉक्टर के पास ले गए, फिर भी कुछ लाभ नहीं हुआ तो उसे डाम लगवाया। पचास बार गर्म सलाखों से दागने पर रामनारायण को पीड़ा तो बहुत हुई लेकिन रमेश मानता है कि ऐसा करने से उसका बेटा जिंदा रह जाएगा। रमेश से पूछा गया कि वह बाल शक्ति केन्द्र क्यों नहीं गया तो उसका कहना था कि वहाँ जाने से ज्यादा फायदा नहीं हुआ तो दूसरे डॉक्टर को दिखा रहा है।

बहन भी कुपोषित

रमेश के सरकारी अस्पताल पर से भरोसा उठ जाने की एक वजह यह भी है कि उसके दो बच्चे कुपोषित है। रामनारायण की बहन 18 माह की शांता भी कुपोषित है। शांता भी चौथी श्रेणी की कुपोषित है और उसे भी 28 अगस्त 08 से 10 सितंबर 08 तक बाल शक्ति केन्द्र खंडवा में भर्ती रखा गया था। उसकी हालत भी ठीक नहीं है।

स्थाई प्रबंधन नहीं

क्षेत्र में काम करने वाली संस्था स्पंदन की सीमा प्रकाश बताती है कि बाल शक्ति केन्द्र में तो बच्चों की बेहतर देखभाल होती है,लेकिन वहाँ से जाने के बाद पोषण आहार नहीं मिलता। फालोअप न होने, आँगनवाड़ी में पोषण आहार न होने, गरीब किसानों की कमजोर अर्थव्यस्था जैसे सवालों के बीच बड़ी सच्चाई यह है कि सरकार के पास कुपोषण से निपटने के लिए स्थाई व्यवस्था नहीं है।

Tuesday, February 17, 2009

बसंत

रोज देखता हूँ तुम्हारी ओर

लगता है हर दिन बारह घण्टे पुरानी हो रही हो तुम ।

राशन, सब्जी, दूध, बिजली, के बढ़ते दाम

व्यस्त रखते हैं तुम्हें हिसाब -किताब में ।

नई चिन्ता के साथ केलेंडर में ही आता

है फागुन , सावन, कार्तिक ।

जिन्दगी का गुणा-भाग करते-करते

जब ढल आती है कोई लट चेहरे पर

या पोंछते हुए पसीना माथे का

मुस्कुरा देती हो मुझे देख

सच समझो उतर आता है

बसंत हम दोनों की जिन्दगी में ।