Monday, February 25, 2013

जाति के अहम् में खोता व्यक्तिगत स्वाभिमान

 क्या हम मूलत: अवसरवादी लोग हैं? ताकतवरों के सामने कायर और कमजोरों के सामने शेर? क्या हम सिर्फ  सत्ता को पूजना जानते हैं? क्या समाज के अहम् के आगे व्यक्ति का स्वाभिमान कोई मायने नहीं रखता? ये सब सवाल इसलिए, क्योंकि आज चाहे देश या राज्य पर शासन की हो या समाज में अधिकार ध्रुवीकरण करना मजबूरी नहीं सुविधा हो गया है। 

खबर है कि मंडला जिले की एक महिला को इसलिए जाति के बाहर कर दिया गया क्योंकि वह अपने से छोटी जाति के लोगों से पिट गई थी!  सवाल यह है कि क्या एक निजी झगड़े से सामुदायिक अहम् को इतनी ठेस लगती है कि परिवार को जाति से बाहर कर देने जैसे कार्रवाई अनिवार्य हो गई? इससे भी बड़ा अचरज  यह है कि समाज कह रहा है कि यह बहिष्कार सामूहिक भोज के बाद ही खत्म होगा यानि पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे परिवार पर बड़े भोज की मार पड़ेगी। किसी से प्रेम विवाह कर लेने या किसी अन्य समाज के व्यक्ति से मारपीट कैसे पूरे समाज के प्रतिष्ठा का प्रश्न हो सकता है? यह तो व्यक्तिगत मामला है लेकिन हकीकत यह है कि कमजोरों का व्यक्तिगत हित जब ताकतवरों के निजी स्वार्थ से टकराता है तो यह व्यक्तिगत मामला समाज की नाक का सवाल बन जाता है।
जाति से बाहर करना और हुक्का-पानी बंद कर प्रताड़ित करना तथा फिर समाज मे वापसी के लिए तगड़ा आर्थिक जुर्माना और सामूहिक भोज करवाने की कुप्रथा कई समाजों में सदियों से जारी है।  कोई व्यक्ति चाहे जितना उन्नत हो जाए लेकिन जब वह समाज के प्रतिनिधि की भूमिका में आता है तो उसकी सोच आधुनिक से कई कदम पीछे पुरातनपंथी हो जाती है। समाज के पंच बन कर बैठे लोग सदियों पुरानी नीतियों की बेड़ियों को काटना नहीं चाहते क्योंकि इन्हीं के भरोसे उनका वर्चस्व कायम है। ऐसे ही कट्टरता काबिज होती है। आप देखिएगा,  विचार विमर्श के दौरान भी ज्यों ही धर्म,  जाति या समाज की किसी रूढ़ी का जिक्र होगा, आधुनिक विचार रखने वाले लोग भी अचानक सख्त हो जाएंगे और कट्टरता का आवरण ओढ़ लेते हैं।  
अफसोस है कि 21 वीं सदी में पहुंचा विज्ञान और हाईटेक हुई राजनीति भी इस कुपरंपरा को खत्म नहीं कर पाई है। चुनाव करीब है और जातीय समीकरणों को साधने की राजनीति एकबार फिर सारे सरोकारों और जिम्मेदारियों पर भारी पड़ेगी। असल में राजनीति कभी नहीं चाहेगी कि समाज में जातियों को वर्चस्व और भेदभव कभी खत्म हो। देश को जातियों में तोड़ कर और फिर जातियों को ताकतवरों और कमजोरों में बांट कर राज करने की नीति ही सिद्ध नीति मानी गई है। सभी जानते हैं कि हमारे राजनेता वोट भले विकास के नाम पर मांगें लेकिन टिकट वितरण का बड़ा आधार जाति समीकरण होता है और जब तक यह निर्धारक रहेगा समाज में राजनीतिक बराबरी की उम्मीद करना व्यर्थ होगी। 

Thursday, February 14, 2013

यह पेशेवर बेईमानी नहीं तो और क्या है ?


देश के सबसे बड़े घोटालों में से एक 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में नया विवाद सामने आने के बाद सरकार ने सीबीआई के वकील एके सिंह को ताबड़तोड़ तरीके से हटा दिया है। उनके स्थान पर केके गोयल को नया वकील नियुक्त किया है। वकील बदलने की प्रक्रिया कोई नहीं है, लेकिन जिस कारण से सिंह को हटाया गया है , वह देश में जड़ तक  फैले भ्रष्टाचार और पेशेवर बेईमानी की ओर इशारा करता है।
 सिंह जिस थाली में खा रहे थे, उसी में छेद कर रहे थे। वे सिंह टूजी मामले में आरोपी संजय चंद्रा को ही कानूनी काट की सलाहें देते पकड़े गए। इसका बाकायदा टेप  मौजूद है। टेप कितना प्रामाणिक है, यह अभी तय होना है, लेकिन अगर वह सही है तो यह  हमारी न्याय प्रणाली के स्याह पक्ष को उजागर करने के लिए काफी है।
विवाद सीबीआई के अभियोजक एके सिंह और घोटाले के मुख्य अभियुक्तों में से एक यूनीटेक के प्रबंध निदेशक संजय चंद्रा के बीच इस कथित बातचीत का टेप सीबीआई के कार्यालय में पहुंचाया गया है। इस टेप में रिकार्ड बातचीत में कथित रूप से सीबीआई के अभियोजक एके सिंह कानूनी रणनीति को लेकर संजय चंद्रा को सलाह देते सुनाई दे रहे हैं।
मामले की गंभीरता को इसी बात से जाना जा सकता है कि इस टेप के सामने आने के बाद सीबीआई ने तत्काल सिंह को निकाल दिया है, जबकि संजय चंद्रा ने इन आरोपों का खंडन किया है। चंद्रा ने सफाई दी है कि वह 2-जी मामले के अभियोजक से कभी भी अदालत के बाहर नहीं मिले हैं, और न ही कभी फोन पर उनसे बात की है। चंद्रा का  कहना है कि टेप में सुनाई दे रही आवाज उनकी  नहीं है। उनके मुताबिक किसी ने जानबूझकर उनकी आवाज बनाकर रिकॉर्डिंग की है और सीबीआई को भेजी है।
चंद्रा वर्ष तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा के जरिए गलत तरीके से मोबाइल नेटवर्क लाइसेंस हासिल करने के लिए धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र रचने के आरोपों के तहत संजय चंद्रा अन्य प्रमुख आरोपियों के साथ वर्ष 2011 के दौरान लगभग आठ महीने जेल में बिता चुके हैं। अगर टेप पर यकीन करें तो यह संकेत खतरनाक है कि अभियोजक विपक्ष के साथ मिल कर केस को कमजोर करने में जुटा है। यह हमारी न्याय प्रणाली को सचेत करने जैसा मामला है, क्योंकि कई मामलों में मनचाहा फैसला न आने या मामला लंबा खिंच जाने पर अकसर ही वकीलों पर अविश्वास जाहिर कर दिया जाता है, लेकिन ऐसे मामले कभी सामने नहीं आए। जो कभी ऐसा हुआ भी तो ‘हिट एंड रन’ की तरह न्यायपालिका ने कठोर संदेश दिया है। हिट एंड रन मामले में प्रख्यात वकील आरके आनंद के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने भी नरमी नहीं बरती थी। गौरतलब है कि आनंद को 1999 के बहुचर्चित बीएमडब्लू हिट एंड रन मामले में एक गवाह को प्रभावित करने के कारण न्यायालय की अवमानना का दोषी पाया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने इससे पहले आर के आनंद को न्यायालय की अवमानना करने के कारण वरिष्ठ अधिवक्ता की पदवी से वंचित कर दिया था। इस हादसे में पूर्व नौसेनाध्यक्ष एस एम नंदा के पौत्र संजीव नंदा ने 10 जनवरी, 1999 की रात में लापरवाही से बीएमडब्लू कार चलाते हुए कई व्यक्तियों को कुचल दिया था। आनंद के अलावा एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता आईयू खान को न्याय प्रदान करने की प्रक्रिया में बाधा डालने का दोषी ठहराते हुए उनके चार महीने तक अदालत में वकालत करने पर रोक लगा दी थी।
ताजा मामला और भी गंभीर है। यह देश के राजस्व और आर्थिक हानि से जुड़ा है। कैग ने  2001 में तय दर पर स्पेक्ट्रम बेचने के निर्णय से खजाने को 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान का आकलन किया है। हालांकि सीबीआई आश्वस्त है कि उसके द्वारा की गई विस्तृत जांच और एकत्र किए गए पुख्ता सबूतों के कारण इस टेप कांड से मामले की सुनवाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा। फिर भी अभियोजन और आरोपियों के बीच सांठगांठ के संकेत सीबीआई की मुसीबत बढ़ाने वाले साबित होंगे। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के साथ पूरा विपक्ष ही सीबीआई पर केंद्र सरकार के इशारों पर काम करने का आरोप लगाते रहे हैं। 2 जी घोटाले में जरा सी खामी उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाएगी। इस  प्रकरण से गंभरता से निपटना होगा।
 यह सबसे बड़ी जांच एजेंसी और न्याय तंत्र की पारदर्शिता और शुचिता पर प्रश्न है। 

Sunday, February 10, 2013

इबादत में कैसा शौर्य, यह राजनीति की शाला है


मन जब उल­झा हो तो हम बड़े-बुजुर्गों की और तकते हैं।  ऐसे ही जब धर्म संकट पैदा होता है तो बार-बार कबीर याद आते हैं।  प्रभुभक्ति पर कबीर ने ही कहा था- 
‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नांहि।
 प्रेम गली अति सांकरी, या में दो न समाहिं।।’
 लेकिन धार की भोजशाला विवाद को सम­झने के लिए कबीर के ज्ञान प्रकाश की भी जरूरत नहीं है। सामान्य सी सम­झ रखने वाला कोई भी व्यक्ति कह देगा कि सारा झगड़ा पूजा और इबादत का नहीं है। यह तो वर्चस्व और अधिकार का संघर्ष है।  संघर्ष के उसी अतीत का दोहराव जो सन् 1305 में इस्लामी आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी ने गढ़ा था। इतिहास वेत्ता बताते है कि अलाउद्दीन खिलजी ने राजा भोज की बनाई भोजशाला पर आक्रमण कर वाग्देवी सरस्वती की प्रतिमा को खंडित कर दिया। उसने भोजशाला  के कुछ भाग को ध्वस्त किया और यहां मस्जिद बना दी। हिंदू और मुसलमान इसी पर अधिकार को ले कर आमने-सामने हैं। भोजशाला के ठीक बाहर ही सटी हुई है कमाल मौला दरगाह। इसी के नाम पर भोजशाला का पूरा नाम भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद कर दिया गया है। मुसलमान इस जगह के मस्जिद होने का दावा करते हैं जबकि हिंदू इसे भोजशाला और मंदिर मानते हैं। 
कितनी अजीब बात है कि जीवन के तमाम मसलों से अलग पूजास्थल का विवाद राजनीति का केंद्र बना हुआ है। ऐसे कई लोग हैं जो दिल से चाहते हैं कि इस मसले पर विवाद नहीं होना चाहिए और मामले का निपटारा शांति से हो जाना चाहिए। दूसरी तरफ ऐसे भी लोग है जो चाहते  हैं कि विवाद का हल न निकलने पाए और दिलों में खटास बनी रहे। लोगों के दिलों की यह खटास ही उनकी ‘मिठाई’ है।  ऐसे लोग बहुत थोड़े हैं लेकिन अफसोस ज्यादा लोग इन्हीं की बातें मान रहे हैं। जो सरकार में है उसकी मुसीबत है कि वह किसी तरह शांति बरकरार रखे  और जो विपक्ष है वह कमजोर नसों की ताक में रहता है। जब बाजियां पलट जाती हैं तो भूमिकाएं भी बदल जाती हैं। क्या इस मसले का हल धार के बाशिंदें खुद नहीं खोज सकते? क्या साथ-साथ एक शहर,एक गली, एक बस्ती में रहने वाले अपने इबादतगाह साझा नहीं कर सकते? क्या जरूरी है कि प्रभु के घर ‘दो’ बन कर जाया जाए? क्या इस संकरी गली में ‘एक’ हो कर नहीं जाया जा सकता? राजनीति यह होने नहीं देगी।  पहल जनता को ही करना होगी।

Sunday, February 3, 2013

कोई कैसे सिखाए संवेदनशील होना?


जिसने भी इस समाचार को पढ़ा वह आह से भर गया कि सीहोर की दसवीं कक्षा की एक छात्रा ने छेड़छाड़ से तंग आ कर आत्महत्या कर ली है। छात्रा ने एक दिन पहले ही थाने में शिकायत की थी। इसके पहले कि पुलिस जागती, आरोपी ने छात्रा को धमकाया। आप कल्पना कर सकते हैं कि प्रताड़ना का क्या स्तर रहा होगा कि छात्रा ने खुद को आग के हवाले कर मौत का तकलीफदेह रास्ता चुन लिया। सीहोर के उस पुलिस थाने के स्टॉफ को कोई कैसे और किस भाषा में संवेदनशील होना सीखा सकता है जो कानून की धाराओं में जिंदगी कि मुश्किलों को आंकते हैं?
एक और मामला है इंदौर का। डकाच्या की मनीषा पटेल ने बाल अधिकार संरक्षण आयोग और महिला आयोग को पत्र लिख कर कहा था कि वह नाबालिग है और उसकी शादी करवाई जा रही है। वह पढ़ना चाहती है। भोपाल से बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने कार्रवाई की और प्रशासन को हस्तक्षेप के लिए कहा। प्रशासन ने मनीषा की मार्कशीट और नगर निगम द्वारा जारी जन्म प्रमाण-पत्र में जन्मतिथि में अंतर को देखते हुए भी परिवार के पक्ष में फैसला दिया और मनीषा की शादी करवा दी। अब पता चला है कि दोनों दस्तावेजों में मां के नाम भी अलग-अलग लिखे गए हैं।  महिला आयोग प्रशासन के प्रति सख्त है। अब आयोग कुछ भी करता रहे, मनीषा के मर्जी के खिलाफ शादी तो हो गई। महसूस किया जा सकता है कि परिवार के खिलाफ आवाज बुलंद करने की सजा के रूप में मनीषा को कितनी मानसिक प्रताड़ना भोगनी पड़ी होगी? उसे बार-बार अहसास करवाया गया होगा कि परिवार की ताकत के आगे उसकी आवाज कुछ भी नहीं है। मालवा के मध्यमवर्गीय परिवारों में इस तरह का विद्रोह करना बड़े साहस की बात होती है। अपनी लापरवाही से मनीषा को परास्त करने वाले प्रशासन को क्या कभी अहसास होगा कि कैसे मनीषा के इस साहस को तोड़ा और लज्जित किया गया होगा?
हम कड़े कानून बनाने की पैरवी कर रहे हैं लेकिन क्रियान्वयन के स्तर पर  इनके पालन का जिम्मा संभालने वालों की संवेदनहीनता और लापरवाह मिजाज चिंता में डालता है। हम निचले स्तर पर कैसे लोगों की मानसिकता को बदलें, यह सवाल ज्यादा जरूरी और मुश्किल नजर आता है। क्या उन्हें इस बात का कभी अहसास हो पाएगा कि समय पर कार्रवाई कर देते तो एक मासूम खुद को जिंदा आग के हवाले नहीं करती? सीहोर और इंदौर जैसा रोज होता है किसी और गांव, कस्बे या शहर में।
क्या हर बार दूसरों के दर्द का अहसास करने के लिए अपने पैरों की बिवाई फटना जरूरी है?