Sunday, February 10, 2013

इबादत में कैसा शौर्य, यह राजनीति की शाला है


मन जब उल­झा हो तो हम बड़े-बुजुर्गों की और तकते हैं।  ऐसे ही जब धर्म संकट पैदा होता है तो बार-बार कबीर याद आते हैं।  प्रभुभक्ति पर कबीर ने ही कहा था- 
‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नांहि।
 प्रेम गली अति सांकरी, या में दो न समाहिं।।’
 लेकिन धार की भोजशाला विवाद को सम­झने के लिए कबीर के ज्ञान प्रकाश की भी जरूरत नहीं है। सामान्य सी सम­झ रखने वाला कोई भी व्यक्ति कह देगा कि सारा झगड़ा पूजा और इबादत का नहीं है। यह तो वर्चस्व और अधिकार का संघर्ष है।  संघर्ष के उसी अतीत का दोहराव जो सन् 1305 में इस्लामी आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी ने गढ़ा था। इतिहास वेत्ता बताते है कि अलाउद्दीन खिलजी ने राजा भोज की बनाई भोजशाला पर आक्रमण कर वाग्देवी सरस्वती की प्रतिमा को खंडित कर दिया। उसने भोजशाला  के कुछ भाग को ध्वस्त किया और यहां मस्जिद बना दी। हिंदू और मुसलमान इसी पर अधिकार को ले कर आमने-सामने हैं। भोजशाला के ठीक बाहर ही सटी हुई है कमाल मौला दरगाह। इसी के नाम पर भोजशाला का पूरा नाम भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद कर दिया गया है। मुसलमान इस जगह के मस्जिद होने का दावा करते हैं जबकि हिंदू इसे भोजशाला और मंदिर मानते हैं। 
कितनी अजीब बात है कि जीवन के तमाम मसलों से अलग पूजास्थल का विवाद राजनीति का केंद्र बना हुआ है। ऐसे कई लोग हैं जो दिल से चाहते हैं कि इस मसले पर विवाद नहीं होना चाहिए और मामले का निपटारा शांति से हो जाना चाहिए। दूसरी तरफ ऐसे भी लोग है जो चाहते  हैं कि विवाद का हल न निकलने पाए और दिलों में खटास बनी रहे। लोगों के दिलों की यह खटास ही उनकी ‘मिठाई’ है।  ऐसे लोग बहुत थोड़े हैं लेकिन अफसोस ज्यादा लोग इन्हीं की बातें मान रहे हैं। जो सरकार में है उसकी मुसीबत है कि वह किसी तरह शांति बरकरार रखे  और जो विपक्ष है वह कमजोर नसों की ताक में रहता है। जब बाजियां पलट जाती हैं तो भूमिकाएं भी बदल जाती हैं। क्या इस मसले का हल धार के बाशिंदें खुद नहीं खोज सकते? क्या साथ-साथ एक शहर,एक गली, एक बस्ती में रहने वाले अपने इबादतगाह साझा नहीं कर सकते? क्या जरूरी है कि प्रभु के घर ‘दो’ बन कर जाया जाए? क्या इस संकरी गली में ‘एक’ हो कर नहीं जाया जा सकता? राजनीति यह होने नहीं देगी।  पहल जनता को ही करना होगी।