Sunday, July 11, 2010

मप्र व केन्द्र में टकराव के बीज

बीज के दाम भी तय करेगा बाजार



पेट्रोलियम पदार्थों के दाम नियंत्रण का अधिकार बाजार को दे चुकी केन्द्र सरकार की योजना है कि वह शकर के दाम बढ़ाने की ताकत भी बाजार को दे दे। इसकी मार आम आदमी पर पड़ेगी, लेकिन इससे एक कदम और आगे जाते हुए केन्द्र सरकार चाहती है कि बीजों के दामों पर भी बाजार का नियंत्रंण हो। वह बीज-2010 विधेयक पास करवाकर बीजों को पेट्रोलियम पदार्थों की तरह नियंत्रण से मुक्त करना चाहती है। दूसरी तरफ राज्य सरकारों का मानना है कि बीजों के दामों को बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसका सीधा सम्बन्ध किसानों के हितों से जुड़ा है। इन राज्य सरकारों में मप्र सरकार भी है। वह खुद बीज कीमतों को काबू करने वाला विधेयक लाने जा रही है। आंध्र प्रदेश सरकार इस तरह का बिल पहले ही पास कर चुकी है।

उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार द्वारा बीज एक्ट 1966 में संशोधन के लिए बीज विधेयक -2004 लाया गया था। यह तीन बार संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन तीनों बार इसे पारित नहीं कराया जा सका। इस बार भी केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने विधेयक को स्वीकृति दे दी है और सरकार कोशिश है कि मानसून सत्र में ही बीज विधेयक 2010 पारित हो जाए। लेकिन सचाई यह है कि तमाम सामाजिक संगठन, प्रबुद्ध नागरिक और किसान संगठन इस विधेयक को किसान विरोधी और बीज कंपनियों के हित में बता रहे हैं। किसान संगठन बीजों के दामों पर नियंत्रण की पैरवी कर रहे हैं, लेकिन केन्द्र सरकार विधेयक में संशोधन पर राजी नहीं है।

मप्र सरकार ने भी इस विधेयक की एक खामी गिनाते हुए इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। हाल में मप्र कैबिनेट ने सामाजिक और किसान संगठनों की बात से सहमति जताते हुए राज्य में कपास के बीजों के मूल्य पर नियंत्रण के लिए विधेयक लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। विशेषज्ञों के अनुसार यह 7 वीं अनुसूची का मसला है। इस विषय पर दोनों सरकारें बिल ला सकती हैं, लेकिन जब किसी बिंदु केन्द्र और राज्य सरकार के नियमों में टकराव हो तो केन्द्र सरकार की बात मानी जाएगी। हाँलाकि ऐसा हुआ तो बीजों के दाम नियंत्रण के मामले में केन्द्र के बिल को महत्व मिलेगा।

मुआवजे के उपबंध भी जोड़ें

राज्य सरकार और सामाजिक संगठनों का कहना है कि केन्द्र सरकार बीज अध्ािनियम 2010 में बीज कंपनियों की जवाबदेही भी तय करें। वह मूल्य नियंत्रण और घटिया बीज से हानि पर किसानों को पर्याप्त मुआवजे का उपबंध भी जोड़े। गौरतलब है कि केन्द्र सरकार ने 10 जून को बिनौले के उत्पादन और वितरण का नियमन और छह महीने करने का फैसला किया है । संसद में बीज विधेयक पारित होने के बाद बिनौले का नियंत्रण विधेयक के प्रावधानों के तहत होगा और उसके बाद आवश्यक वस्तु कानून के तहत बिनौले को लेकर जारी अधिसूचना वापस ले ली जाएगी ।

बीज कमेटी ने की सिफारिशें

28 नवंबर 2006 को प्रोफेसर राम गोपाल यादव की अध्यक्षता में गठित कृषि पर स्टैंडिंग कमेटी ने अपने सुझाव में बीज विधेयक में अनेक संशोधन किए जाने की सिफारिश की है। कमेटी ने कहा कि किसानों द्वारा उपयोग किए जाने व बेचे जाने वाले बीजों का पंजीकृत बीज संबंधी न्यूनतम मानकों के अनुरूप होना किसानों के अधिकार में बाधा है। इसलिए कमेटी इस प्रावधान को रद्द करने की सिफारिश करती है। किसान की परिभाषा को और व्यापक करते हुए इसमें उन्हें भी शामिल किया जाए जो पारंपरिक बीजों का संरक्षण कर रहे हैं। बीज विधेयक में किसानों को बीज उगाने और उनके लेन-देन की अनुमति होनी चाहिए। विधेयक में मूल्य नियामक का प्रावधान होना चाहिए, जिससे कि किसानों से बीज उत्पादक/सप्लायर मनमाफिक दाम नहीं वसूल सकें।




' बीज विधेयक 2010 किसान विरोधी  है। मप्र सरकार बीजों के मूल्य पर सरकारी नियंत्रण के पक्ष में है। हम केन्द्र सरकार से माँग कर रहे हैं कि वह विधेयक में बदलाव करे।"

डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया, कृषिमंत्री, मप्र शासन



' बीजों के दाम के नियंत्रण का मामला 7 वीं अनुसूची से जुड़ा है। इसके तहत केन्द्र और राज्य सरकार अपने नियम बना सकती है लेकिन विवाद के बिंदु पर केन्द्र के विधेयक की बात ही मानी जाएगी।"

विश्वेन्द्र मेहता, संविधान विशेषज्ञ और पूर्व सचिव मप्र विस



' जब प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटी एंड फार्मर्स राइट एक्ट (पीपीवीएफआर) मौजूद है, तो बीज अधिनियम लाने की जरूरत ही नहीं है। दरअसल 90 फीसदी किसान अपने बीज ही उपयोग में लाते हैं। किसान अधिक बीज खरीदें और कंपनियों को फायदा हो, इसलिए सरकार बीज विधेयक पारित करने की कोशिश में है। बीज विधेयक 2010 में दो महत्वपूर्ण बदलाव की जरूरत है। पहला तो यह कि बीज मूल्यों का नियमन जरूर हो। साथ ही नियमों के उल्लघंन पर कड़े दंड का प्रावधान हो।"

डॉ. देवेंद्र शर्मा, कृषि विशेषज्ञ