Tuesday, June 4, 2013

सफलता की दौड़ में हार कर आउट होने लगी जिंदगी

फिल्मी दुनिया का एक और सितारा जिया खान निराशा के काले अंतरिक्ष में डूब गया। फिल्मी दुनिया जिसे सिल्वर स्क्रीन भी कहा जाता है, सुनहरे सपने दिखलाती है। यह ख्वाब बेचती और ख्वाबों की स्पर्धा भी करवाती है। चकाचौंध और सफलता के ‘नवाब’ अपने आनंद के लिए कलाकारों के स्वप्नों के ‘ग्लेडिएटर्स’ लड़ाते हैं और आगे निकल जाने के संघर्ष में उनको रक्तरंजित देख सुख उठाते हैं। ख्वाब सजाने वाली इस दुनिया में सपनों का संतुलन बेहद जरूरी है वरना जीवन की डोर टूट जाती है।
एक जिया ही क्यों, हमारी दुनिया में ऐसे हजारों उदाहरण मौजूद है जहां हमने सपनों के पथरीली राह पर इंसानी इरादों को दम तोड़ते देखा है। कई बेहतरीन गानों के लिए अपनी आवाज देने वाले गायक शान ने अपने खाली होने पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि अब निर्माता और संगीतकार उनकी आवाज को अपनी फिल्मों में जगह नहीं देना चाहते। शान इनदिनों कोई गाना नहीं गा रहे हैं। वे एक डांस रियलिटी शो में आने वाले हैं। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि मैं गीत नहीं चुन रहा या मैंने अपना मेहनताना बढ़ा दिया है। यदि लोग मुझे प्रस्ताव ही नहीं दे रहे तो क्या किया जा सकता है? यह अकेले शान का दर्द नहीं है। पूरी फिल्म इंडस्ट्री और हमारे आसपास का समाज इसी ‘सिंड्रोम’ से पीड़ित है।
जरा याद कीजिए, पिछले एक दशक में कितने कलाकार आए और गुमनामी के अंधेरे में खो कर रह गए। आप अगर योग्य है तो यह काफी नहीं हैं। इतना ही बल्कि इससे ज्यादा जरूरी है कि आप अपनी योग्यता और जरूरत साबित करें। यह आज के समय की सच्चाई है और इसे या तो कोई मस्त मौला ही झूठला  सकता है या वो जिसके पास अदम्य इच्छाशक्ति है। कहते हैं फिल्मी दुनिया बेहद निर्मम है। फिल्मी दुनिया की यह निर्ममता हमारे जीवन में अतिक्रमण करती जा रही है। अब जरा सी असफलता से हमारे हौंसले टूटने लगते हैं क्योंकि सफलता को ही एकमात्र उद्देश्य मान लिया गया है। हार बर्दाश्त नहीं होती क्योंकि हमारे पास हार से उबर जाने का जज्बा नहीं है। पराजय के क्षणों में कमजोर मन को कोई सहारा नहीं मिलता क्योंकि हमारे आसपास मौजूद हर इंसान सफलता की दौड़ में भाग रहा है और अगर वह किसी को सहारा देने रूकेगा तो कार्पोरेट की शब्दावली में यह समय का दुरूपयोग होगा। आज इसी में समझदारी मानी जाती है कि कोई गिर भी रहा है तो उसे उठाओ मत। ऐसा करने में आपका समय बर्बाद होगा और क्या पता आपका यही साथी कल प्रतिस्पर्धी बन जाएं! जब तक ऐसी सोच कायम रहेगी निराशा हमारे समाज की प्रतिभाओं को डसती रहेगी।