Tuesday, November 15, 2011

ख्याल

आज थोड़ा उदास था, दर्द से परेशान भी तभी एक शेर सुना जिसकी कहन कुछ यूँ थी-बचपन के वे दिन कितने मासूम थे, हर बात पर यकीं हो जाता था। हम मान लेते थे कि जाने वाले आसमान में तारे बन जाते हैं।" अचानक सुनाई दिया यह शेर मुझे अतीत में ले गया और यादों में खोने के बाद दर्द कम और दर्शन बढ़ गया।
मुझे याद आया बात 1985 की रही होगी। उस वक्त मेरी उम्र करीब 9 साल। दाँत टूट नहीं रहे थे। हर बच्चे की तरह मेरी भी इच्छा थी कि मैं जल्दी से बढ़ा हो जाऊँ। दूध के दाँतों का न टूटने का अर्थ था मेरा बच्चा रह जाना। जबकि कुछ दोस्तों के दाँत टूटना शुरू हो गए थे। मैं इसी चिंता में रहता कि कम दाँत टूटना शुरू हों और कब में बढ़ा कहलाऊँ। तभी आगे के एक दाँत ने हिलना शुरू किया। रोमांचक था दाँत गिरने का ख्याल। लेकिन अंदर एक भय भी दाँत दर्द होगा। इसी ऊहापोह में पता चला कि मेरे गृह नगर में एक शिविर लगने वाला है जहाँ एक सज्जन किसी वैकल्पिक पद्धति से दाँत निकालेंगे। चूँकि पैसे लगना नहीं थे तो मुझे किसी की अनुमति लेने की जरूरत नहीं था। फिर क्या था, मैंने यह सोच कर बिना दर्द के दाँत निकाल दिया जाएगा और मेरी हसरत भी पूरी हो जाएगी बिना समय गँवाए पंजीयन करवा दिया। इंतजार के बाद वह दिन आ ही गया जब शिविर का आयोजन हुआ। मैं स्कूल जाने के लिए समय के पहले तैयार हो गया। बस्ता टाँग निकल रही था कि अपनी नानी (जो माँ ही है) को न बताने की हिम्मत न कर पाया। याद नहीं उन्होंने क्या कहा लेकिन मैं कुछ देर में शिविर स्थल पर था। कई बड़े लोगों की कतार में एक मैं ही बच्चा था जो 'बड़ा" होने आया था। इधर घड़ी 11 बजे की सूचना दे रही थी उधर स्कूल की घंटी बजने और देर होने पर सर की फटकार का डर हावी हो रहा था। लेकिन इस सब पर भारी था दाँत निकलवाने की खुशी। 
आखिर मेरा नंबर भी आ गया। चिकित्सक सज्जन ने देखा और कहा-दाँत तो हिल ही रहा है। जल्दी उखड़ जाएगा। इसे निकालने की जरूरत नहीं है। मैं रूँआसा हो गया और जिद कर बैठा कि नहीं आप तो निकाल दो। मुझे दर्द होगा। वे मुस्कुराए और अपनी कला से बिना दर्द दिए मुझे 'बड़ा" बनाने की प्रक्रिया की ओर भेज दिया।
उस दिन खुशी-खुशी अपना दाँत लिए घुमता रहा। फिर किसी बुजुर्ग के कहने पर दाँत किसी मकान की छत पर फेंक दिया बेहतरी की कामना के साथ। 
करीब 27 साल बाद ऐसा ही मौका मेरे जीवन में फिर आया जब एक दाँत निकलवाने जाना पड़ा। आज बड़े होने की खुशी नहीं बल्कि ज्यादा ही बड़े हो जाने का भय सता रहा था। शरीर के कमजोर होने की शुरूआत भीतर ही भीतर खाए जा रही थी। आज ज्यों ही चिकित्सक ने कहा-'दाढ़ निकाल देते हैं।" मैं चुप हो गया। जीभ फेर कर दाढ़ को अलविदा कहते इतना साथ देने के लिए शुक्रिया कहना चाहा। आखिर इसी के कारण में इतना रस प्राप्त कर पाया था। 
खैर, दो दाँतों के जाने के बीच में मैं भरपूर जिया लेकिन इस उम्र में एक दाँत का साथ छोड़ कर जाना मुझे दार्शनिक बना रहा है। कुछ यूँ कि उम्र खत्म होने की चिंता होने लगी है और लगता है क्या कुछ कर पाया अब तक।
बचपन में सीखाया जाता था-जीभ नम्र होती है और दाँत सख्त। इसलिए जीभ अंत तक बनी रहती है और दाँत विदा हो जाते हैं असमय। सोचता हूँ, मैं कितना 'जीभ" हुआ और कितना 'दाँत"। कितना चला अब तक और कितना रहा बाकी। एक साथी के जाने का दुख तो है ही। 

Sunday, November 6, 2011

ये क्या बात हुई, आप रोज गाड़ी चलाते हैं?

एक सरकारी टाइप बयान- 
फिर पेट्रोल के दाम बढ़े और आप लगे चिल्लाने। ये क्या बात हुई? आपको लगता है, सरकार के पास और कोई काम नहीं रह गया है जो वह हर माह-पन्द्रह दिन में पेट्रोल के दाम बढ़ाने लगती है। जनाब, गाड़ी आप चलाएँ, ईधन आप फूँकें और दाम बढ़े तो सरकार को कोसें। यह तो ठीक नहीं है। भले आप सोचते रहें कि केन्द्र सरकार के करोड़पति मंत्रियों को गरीबों की फिक्र नहीं है। सरकार को केवल तेल कम्पनियों के घाटे को ही कम नहीं करना आता बल्कि वह आम आदमी की चिंता भी करती है, तभी तो जब भी कीमतें बढ़ती है कोई जिम्मेदार व्यक्ति चिंता जताने जरूर सामने आता है। उनकी फिक्र उनके बयान से ज्यादा चेहरे पर झलकती है। फिर क्या दोष अगर यह चिंता काम में नहीं दिखती।

 फिर आप भी दोष तो केवल केन्द्र सरकार को देते हैं, कभी राज्य सरकार से भी तो पूछिए। केवल हम ही थोड़े हैं जिसके खजाने में दाम बढ़ते ही पहले से ज्यादा कर आता है। राज्य सरकारें भी बैठे-ठाले मलाई खाती हैं। ईधन का दाम बढ़ा कर कोप हम झेलें और विपक्षी पार्टी की राज्य सरकारें हमारे खिलाफ पलट वार भी करें। 
वाह, भई वाह। यह क्या बात है? थोड़ी नाराजी उधर भी तो जाहिर कीजिए।

फिर हमें तो देश चलाना है। आप को क्या पता, यूरोपीय देशों में क्या हो रहा है। हमारी हिम्मत देखिए कि हम मँहगाई रोकने की चिंता तो जताते हैं। आखिर हम भी कम तक घाटा सहें? क्या कहा, इतनी रकम तो घोटालों में स्वाहा हो जाती है। देखिए, अभी आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं। अगर हुए तो हम कोशिश करेंगे कि यह राशि लौटा दी जाए।

आप भी तो अपना आकलन कीजिए। सेहत बनाने को पैदल चलेंगे। जिम में घंटों वॉकर पर दौड़ेगे। साइकिलिंग करेंगे, लेकिन 
ईधन बचाने कभी पैदल नहीं चलेंगे। ये क्या,आपको सुविधा मिली तो रोज गाड़ी चलाने लगे। कभी पैदल भी जाइए। देशहित और जेब हित में पेट्रोल बचाइए।


याद रखिए, हमसे सवाल मत कीजिए। 
हमें याद है, हम जनता के सेवक है। तभी तो उसकी फिक्र में मँहगाई के पर कतरने की बातें करते हैं। हम पर भरोसा रखिए। एक बार घाटा कम हो जाए, कीमतें जरूर घटेंगी।

Tuesday, October 11, 2011

मुझसे बिछड़ के खुश रहते हो मेरी तरह तुम भी झूठे हो



बात जब जगजीत की हो तो क्यूँ न उन्हीं के शब्दों में बयाँ की जाए? आज जगजीत हमारे बीच में नहीं है लेकिन-
 'जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया/
उम्र भर दोहराऊंगा ऐसी कहानी दे गया।?"
उम्र चाहे जो हो, शायद ही कोई होगा जिसने कभी जगजीत की गजल को न सुना हो या कभी गुनगुनाया न हो। कई हैं जिन्होंने अपने प्रेम का इजहार करने के लिए जगजीत की गाई गजलों का ही सहारा लिया है। हमारे जीवन में कितनी यादें, कितनी बातें। फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई जगजीत को भूला दे-
'कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे/
मैं उतना याद आउंगा मुझे जितना भुलाओगे।"

यादें कितनी अजीब हैं...बिन बुलाए आ धमकती हैं, कहीं भी कभी भी...। जगजीत की आवाज की ऊँगली पकड़ कर कोई भी अपने बचपन में चला जाता है और कहने लगता है-
'ये दौलत भी ले लो ये शौहरत भी ले लो.../
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी.../
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन.../
वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी....।"
 उम्र के किस मोड़ पर जगजीत साथ नहीं होते? उस मकाम पर भी जहाँ सबसे ज्यादा मुश्किल होती है। जगजीत जैसे हमारी ही बात तो कह रहे थे-
'प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है।
नये परिन्दों को उड़ने में वक्त तो लगता है।
जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था/
लम्बी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है।"

जिंदगी का कोई सिरा जब उलझता है तो जगजीत राह सुझाने चले आते हैं-
'धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो/ 
जिंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो।"

जीवन की साँझ ढ़ले जब गुजरा वक्त चुभने लगता है तो 'माँ" ही राहत देती है।

वो आवाज जो कदम-कदम पर साथ निभाया करती थी, वो अब नए लिबास में सामने नहीं आएगी। काश! ऐसा हो जाए-
'कभी यूँ भी तो हो/परियों की महफिल हो/
कोई तुम्हारी बात हो/और तुम आओ। कभी यूँ भी तो हो
/सूनी हर मंजिल हो/कोई न मेरे साथ हो/और तुम आओ।"

यादें अनगिनत हैं। जो कभी जगजीत से मिले भी नहीं, उनका भी जगजीत की आवाज से गहरा नाता है। आज लगता है कितना मुश्किल रहा होगा अपने बेटे के बेवक्त चले जाने के गम को भूला कर यह गाना-'चिट्ठी न कोई संदेश, जाने कौन सा है वो देश/ कहाँ तुम चले गए।" आखिर 'कोई ये कैसे बताए कि वह तन्हा क्यूँ हैं?"जगजीत बहुत याद आएँगे।
'वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफत भी अता करे/
तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो।"









Friday, September 23, 2011

'माननीय" यह संसद के कैंटिन की नहीं, गरीब की थाली है


27 बार हुआ सांसदों के वेतन-भत्तों में संशोधन और गरीब के लिए 'गरीब" ही रही सरकार



 योजना आयोग के जरिए केन्द्र सरकार ने जो गरीब होने की परिभाषा तय करने वाला का हलफनामा दिया है उसे पढ़ कर एक मित्र राहुल गामोठ ने तंज किया-'योजना आयोग के कर्ताधर्ताओं को कह दो कि वे अपना वेतन 1000 रूपए तय कर लें और शहर में गुजर कर के दिखलाए। राहुल ने कहा कि आयोग ने 965 रूपए बताया है हम तो उन्हें 35 रूपए ज्यादा दे रहे हैं।"
 'माननियों" के प्रति राहुल जैसे देश के तमाम लोगों का गुस्सा और बढ़ेगा अगर उन्हें पता चले कि 1954 के बाद से अब तक सांसदों के वेतन और भत्तों में 27 बार संशोधन हो चुका है। 2005 में उनका वेतन 12 हजार था जो अब 50 हजार रूपए प्रतिमाह है। जबकि 2004 में की दर से हर माह 579 रूपए कमाने वाले को बीपीएल माना गया था जिसकी सीमा बढ़ कर आयोग ने 965 रूपए कर दी है।

गरीब कौन है? वो सांसद जिस पर वेतन के साथ करीब 15 सुविधाओं के लिए सालाना करीब 45 लाख रूपए खर्च होता है या वो जो माह में पाँच हजार की कमाई करता है? सरकार हमेशा ही आँकड़ो में विकास नापती रही है अमीरी-गरीबी को भी आँकड़ों की बाजीगरी में उलझा दिया है। ज्यादा समय नहीं हुआ। अगस्त 2010 में हमारे सांसद इस बात से नाराज थे कि कैबिनेट ने उनका वेतन केवल 50 हजार क्यों किया, जबकि वेतन 16 हजार से बढ़ा कर 80 हजार किया जाना था। इस बात पर खूब एसएमएस चले और लोगों ने संसद की कैंटिन में रियायती दल पर मिलने वाली खाद्य सामग्री की सूची पेश कर डाली।
 गरीबों की 'अमीरी" बताते योजनाओं आयोग के हलफनामे के दौरान सांसदों की थाली से गरीब की थाली की तुलना की तो पाया कि गरीबों की दयनीय हालत स्वीकार करने में भी हम उदार नहीं है। संसद में कैंटिन के लिए कुल 5.3 करोड़ का बजट आवंटित है। यहाँ सांसदों को रियायती दर पर मात्र 12 रूपए 50 पैसे में भरपेट खाने को शाकाहार सब्जी मिल जाती है। इस खाने की गुणवत्ता पर शक करना बेकार है लेकिन एक गरीब मजदूर को बस स्टैण्ड या रेलवे स्टेशन के पास की किसी छोटी सी दुकान पर भी 20 रूपए से कम में भोजन नहीं मिलेगा।

सरकार इसलिए भी गरीबों के साथ आँकड़ों की बाजीगरी कर रही हैं क्योंकि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को रियायती योजनाओं से दूर रखना चाहती है। सामाजिक कार्यकर्ता सचिन जैन कहते हैं कि योजना आयोग द्वारा तय की गई गरीबी की रेखा निश्चित तौर पर हज़ारों हज़ार लोगों को चुपचाप मारती जाएगी। आयोग को चुनौती देते हुए वे कहते हैं-' मैं आपसे आपके ही द्वारा तय की गयी राशि पर न माह की जिन्दगी बिताने का निवेदन करता हूँ, ताकि आप सिद्ध करें कि इस राशि में जिन्दा रहना संभव है। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो गरीबों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना बंद कीजिए।"

सांसद की थाली                              गरीब की थाली


शाकाहारी थाली-12.50 रू.                  20 रूपए

एक कटोरी दाल -1.50 रू.                22 रूपए (हाफ)

रोटी - 1                                            2.5 रू. से 3 रूपए

चावल -2 रूपए प्लेट                        15 से 20 रूपए (हाफ प्लेट)

चाय-1प्रति कप                                 4 से 5 रूपए



सांसदों की वेतन वृद्धि (2010)

प्रस्तावित वेतन - 80 हजार रुपए

मूल वेतन 2005 - 16 हजार

2010 में हुआ -50 हजार रुपए

दफ्तर का खर्च बढ़ा- 20 से बढ़ कर 40 हजार रुपए

पेंशन हुई - 8 से बढ़ कर 20 हजार रुपए



#  वाहन के इस्तेमाल के लिए जहाँ पहले प्रति किलोमीटर 13 रुपए मिलते थे, वहीं सांसद अब 16 रुपए प्रति किलोमीटर कर दिए गए हैं।

# हर सांसद का पति या पत्नी अब पहली श्रेणी में आ जा सकेगा.