Wednesday, July 17, 2013

आस्था के शिखर पर लापरवाही की धूल

एक महीना हो गया जब प्राकृतिक आपदा त्रासदी ने उत्तराखंड में तबाही मचा दी थी। इस विध्वंस में सैकड़ों लोगों की जानें गई जबकि आधिकारिक तौर पर 5748 लोग अब भी लापता हैं। बाढ़ में फंसे एक लाख से अधिक लोगों को निकालने के लिए सुरक्षा बलों ने देश का अब तक का सबसे बड़ा राहत अभियान चलाया। बचाव कार्यों के दौरान करीब 20 वायुसेना कर्मियों तथा अन्य बलों के जवानों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। उत्तराखंड में अतिवृष्टि  ने जो तबाही मचाई उससे चारधाम-यात्रियों के परिजनों और स्थानीय नागरिकों को उबारने में कितना समय लगेगा, यह कहना मुश्किल है। शायद समय उनके घाव पर नई चमड़ी की परत चढ़ा दे लेकिन उसकी टीस को कभी नहीं भर पाएगा। क्या वक्त 1954 में कुंभ यात्रा के दौरान भगदड़ मच जाने के कारण मारे गाए 800 से अधिक लोगों के परिजनों के जख्म कभी भर पाए?
तब से लेकर इस साल के  इलाहाबाद कुंभ में रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ तक और फिर केदारनाथ व बोध गया जैसे मामलों में हर साल कई लोगों की असमय मौत हो जाती है। लेकिन इन धार्मिक स्थलों की व्यवस्था और प्रबंधन देख रहे ट्रस्टों और उनके कर्ताधर्ताओं से कभी सवाल नहीं होते। अगर सवाल होते तो 1989 में हरिद्वार के कुंभ मेले में भगदड़ से 350 से अधिक तीर्थयात्री नहीं मारे जाते या अगस्त 2008 में हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में भगदड़ 146 लोगों की मृत्यु का कारण नहीं बनती।  उत्तराखंड या बोध गया में जो घटा उसके लिए जिम्मेदार कौन है, यह सवाल पूछना जितना ही जरूरी यह सवाल भी है कि जिनके पास इन घटनाओं को रोक सकने वाले प्रबंधों  को करने का जिम्मा है, क्या वे अपनी भूमिकाओं पर खरे उतर रहे हैं?  इस बात से तो हर कोई सहमत होगा कि हमारे तीर्थस्थल अब तीर्थस्थल नहीं रह गए हैं, बल्कि वे पिकनिक स्पॉट बन चुके हैं। उत्तराखंड में हुए जानमाल के नुकसान का एक कारण उनका पिकनिक स्पॉट बनना भी है। तीर्थयात्राओं के नाम पर पर्यटन उद्योग आगे बढ़ रहा है। मंदिरों के इर्दगिर्द की जमीनें होटल-धर्मशाला-सड़कों आदि से पट चुकी है। यहां तक कि जिन ट्रस्टों पर यहां सुविधाओं का निर्माण करने का जिम्मा है वे भी अपना आर्थिक लाभ बढ़ाने के फेर में कमाई के नए-नए साधन तलाशने में जुटे रहते हैं जैसे, मंदिर ट्रस्ट से ही प्रसाद खरीदने की अनिवार्यता आदि।
समझ से परे है कि जिन ट्रस्टों में हर साल लाखों-करोड़ों का चढ़ावा आ रहा है, उन्हें अपनी कमाई के लिए नए-नए हथकंडों को अपनाने की क्या जरूरत है? यकीन नहीं आता तो जरा आंकड़ों पर गौर कीजिए।  तिरुमला तिरुपति देवस्थानम जिसे हम तिरुपति बालाजी के नाम से जानते हैं दुनिया का दूसरा सबसे धनी धर्मस्थल है। इस देवस्थान के रत्नों से जड़ित आभूषणों की कीमत 52 सौ करोड़ से ज्यादा है और कई सौ करोड़ का सालाना चढ़ावा है। श्री माता वैष्णो देवी मंदिर श्राइन बोर्ड को हर साल करीब एक अरब रुपए मंदिर  के चढ़ावे के रूप में मिलते हैं। महाराष्ट्र के सबसे अमीर मंदिरों में से एक शिरडी सांई मंदिर ट्रस्ट के पास 32 करोड़ रुपए के आभूषण हैं और 450 करोड़ रुपए का निवेश है। ट्रस्ट के पास 24.41 करोड़ रुपए कीमत का सोना है, 3.26 करोड़ की चांदी है। मंदिर की वार्षिक आय करीब 450 करोड़ रुपए है। करोड़ों की कमाई और लाखों श्रद्धालुओं का आना। तिरूपति, सांई बाबा मंदिर जैसे कुछ धर्म स्थलों को छोड़ दें तो अधिकांश के ट्रस्ट केवल कमाई क्यों कर रहे हैं? उनके पास श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सहायता-सुविधाओं की कोई योजना क्यों नहीं है? हजारों लोगों के आने के बाद भी वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड ने पैदल यात्रियों और घोड़ों-टट्टू  के लिए अलग रास्ता क्यों नहीं बनाया? क्या यह बुजुर्ग-महिला, बच्चों सहित  हजारों यात्रियों को अव्यवस्था और लापरवाही के बीच छोड़ देना नहीं है जहां पूरे रास्ते घोड़ों की लीद परेशान करती है तो कभी घोड़ों के अचानक दौड़ जाने से चोट लगने की आशंका बनी रहती है? क्या ऐसे मंदिरों में ट्रस्ट को ज्यादा बेहतर इंतजाम नहीं करना चाहिए?
असल में हमारी आस्था यह मानती है कि देवस्थलों पर जाने में मिलने वाला कष्ट हमारी परीक्षा है। इसी कारण हम सारी अव्यवस्था को प्रभु की इच्छा मान स्वीकार करते जाते हैं और जिम्मेदारों को कुछ न करने की छूट दे देते हैं। दूसरा, ऐसे धार्मिक स्थल जो पर्यटन की दृष्टि से अहम् हो गए हैं वहां  सुविधा के नाम  पर बाजार और मुनाफे से जुड़ी गतिविधियां तो प्रारंभ कर दी गई लेकिन यात्रियों का आराम देने के सारे मामले ताक पर रख दिए गए हैं। ट्रस्ट भी वे काम कर रहे हैं जिनसे कमाई हो रही है लेकिन इस कमाई का कुछ अंश भी वे यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के लिए व्यय नहीं कर रहे। कुछ हद तक वे किसी लालची व्यापारी की तरह व्यवहार करने लगे हैं।  बोध गया विस्फोट के बाद पूर्व आईपीएस किरण बेदी ने ट्वीट किया था कि धार्मिक स्थलों के लिए एक अलग पुलिस बल होना चाहिए जिसका खर्च करोड़ों का चढ़ावा पाने वाले ट्रस्ट उठाएं। इस विचार पर बात होनी चाहिए। बड़े आयोजनों के पहले सारी व्यवस्था का आॅडिट होना चाहिए ताकि भगदड़ और इस कारण जान की हानि को रोका जा सके। जहां लोग पूजा के लिए जल-दूध, फूल आदि ले जाते हैं क्या वहां फिसलन रोधी फर्श या कारपेट नहीं लगाया जाना चाहिए? वहां व्यवस्था के लिए ट्रस्ट को स्वैच्छिक या सवैतनिक कार्यकर्ता नियुक्त नहीं करने चाहिए? ऐसे स्थानों पर आपदा  चाहे प्राकृतिक हो या इंसानी, बचाव और प्रबंधन के पुख्ता इंतजाम आज की बड़ी जरूरत है। 

Saturday, June 29, 2013

काश्मीर में गोली का जवाब विकास की बोली

काश्मीर का जिक्र करते ही हमारे जेहन में या तो आतंक का चेहरा उभरता है या फिल्मों के दृश्य देख धरती के स्वर्ग में घूम आने की हसरत हिलौरे मारने लगती है लेकिन यह दुर्भाग्य है कि हर बार या तो पारा चढ़ने पर काश्मीर का जिक्र होता है या फिर तापमान उतरने पर। मेरा सवाल यह है कि काश्मीर सहित पूर्वोत्तर राज्यों के बारे में सामान्य दिनों में चिंता-फिक्र क्यों नहीं होती? ऐसा क्यों होता है कि जब वहां हिंसा का पारा चढ़ता है, तब सभी चिंतित होने लगते हैं और इसे देश की संप्रभुता को खतरा मान अतिसंवेदनशील हो जाते हैं? उन दिनों में जब पूरा देश तरक्की कर रहा होता है, किसी को भी इन प्रांतों में बसे ‘अपने भाइयों’की समस्याओं और उनके हालात की फिक्र क्यों नहीं होती? हम जब विकास और सुख की राह में फर्राटा भर रहें होते हैं तब वहां के नागरिकों के पैरों के छालें हमें दुख में क्यों नहीं डालते?
काश्मीर एक बार फिर चर्चा में है। एक कारण तो यहां हुए आतंकी हमले हैं, जो आम कहे जा सकते हैं और दूसरा कारण है प्रधानमंत्री की यात्रा, जो काफी महत्वपूर्ण है और जिसके कारण आतंकी हमले  हुए। दरअसल,प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी काश्मीर घाटी में जम्मू के बनिहाल से श्रीनगर के काजीकुंड के बीच रेल खंड का उद्घाटन कर रहे हैं। यह रेल मार्ग चालू हो जाने पर जम्मू से धरती के स्वर्ग यानि श्रीनगर की तरफ जाने वाला मार्ग 17 किलोमीटर कम हो जाएगा। यह सड़क मार्ग का वह खतरनाक टुकड़ा है जहां भूस्खलन होता है जो जिसके कारण घाटी में जाना सबसे ज्यादा खतरनाक है। टनल बन जाने से हर मौसम में रेल मार्ग से काश्मीर की सैर का सपना साकार हो सकेगा। यह खबर सुन कर पर्यटक जितना खुश हैं उतने ही खुश वे अमनपसंद काश्मीरी भी हैं। फिर नाराज कौन हैं? वे दहशतगर्द जो काश्मीर को हरा-भरा नहीं रहने देना चाहते। वे जो यहां की तरक्की को रोकने के लिए खून बहाना बेहद आसान तरीका मानते हैं।
आप काश्मीर जाएं तो पाएंगे कि वहां के हालात वैसे नहीं है जैसे वहां से कोसों दूर बैठ कर दिखलाई देते हैं। आम काश्मीरी न तो भारत सरकार से खुश है और न आतंकियों से। यह कठोर लग सकता है लेकिन यह खरा सच है कि काश्मीरी खुद को भारतीय कहलाने से ज्यादा काश्मीरी कहलाना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ?
क्या यह सच है? इसका जवाब खोजने के लिए हमें अतीत को समझना होगा। काश्मीरी मुसलमानों की मनस्थिति को समझना होगा। जम्मू और कश्मीर के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुल्ला ने लंबे जन संघर्ष के बाद डोगरा शासन से कश्मीर को मुक्त कराया और भारत में कश्मीर के विलय को संभव किया। लेकिन आम  काश्मीरी की जिंदगी में उतनी ही तकलीफें रही जितनी मुगलकाल या डोगरा शासनकाल में थी, बल्कि इनमें कहीं ज्यादा इजाफा ही हुआ। काश्मीरियों के दमन का सिलसिला अकबर के  समय में ही शुरू हो गया था। अकबर ने कश्मीरियों को हथियार रखने से मना कर दिया। इस फरमान का उद्देश्य यही था कि कश्मीरी अपनी खोई हुई आजादी को प्राप्त करने की कोशिश न करें। डोगरों ने कश्मीर को अपने बाहुबल से हासिल नहीं किया था, बल्कि अमृतसर संधि के तहत खरीदा था। अत: वे अपनी लगाई पूंजी को ब्याज सहित जल्दी से जल्दी वसूल लेना चाहते थे। शाल बुनकरों के किसी और धंधे में जाने की मनाही कर दी गई। साथ ही, काश्मीरी मुसलमानों के उच्च शिक्षा प्राप्त करने पर पाबंदियां लगा दीं। शिक्षा की तरह नौकरियों के द्वार भी मुसलमानों के लिए बंद थे। यही कारण था कि आजादी का काश्मीर आंदोलन आज एक आतंकवादी-अलगाववादी संघर्ष में बदल गया।
आजाद भारत में भी काश्मीर पर फतह, उस पर कब्जे के सपने देखे गए, कोशिशें हुई लेकिन उसे अपनाने और अपना बना लेने के प्रयत्न नगण्य हुए। काश्मीर की जमीन की चिंता में करोड़ों फूंक दिए गए  लेकिन वहां के बाशिंदों की शिक्षा, सेहत, रोजगार पर खर्च नाकाफी रहा। यहां तक कि उस पर्यटन की सुध भी नहीं ली गई जो सरकार की जेब भर रहा था। आज काश्मीर सुविधाओं और विकास से खाली है और इसीलिए दहशत के साये में हैं। विकास कई राहें खोलता है और आतंकी यह होने नहीं देना चाहते। आज सरकार ने रेलमार्ग की बुनियाद रखी तो आतंकियों ने बंदूकें उठा ली। वे नहीं चाहते कि काश्मीरी विकास के मायने और उसके फायदों को समझें। अगर, काश्मीर जैसे प्रांतों को भारत का अंग बनाए रखना है तो हमें हथियारों की भाषा से ज्यादा विकास की बोली बोलना होगी। तभी आम काश्मीरी खुद को भारत का अंग मान कर उसके साथ अपने हित जोड़ सकेगा। तभी आतंकियों को स्थानीय सहयोग नहीं मिलेगा। लेकिन यह देखना होगा कि डोगरा शासन की तरह विकास का मतलब अपने निवेश की ब्याज सहित वसूली नहीं होना चाहिए। घाटी का विकास वहां की प्रकृति से छेड़छेड़ा कर हमारे स्वार्थ के लिए न हो। दोहन इतना न हो कि काश्मीरी पड़ोसी देश की और सहायता के लिए ताकने लगे और वहां से मिली सहायता के लालच में छले जाएं। 

Wednesday, June 12, 2013

निर्मम सत्ता संघर्ष के सबक

भारतीय जनता पार्टी के  बूजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी भले ही मान गए है लेकिन उनकी नाराजगी और उसके बाद उन्हें मनाने की कवायद ने कई निष्कर्षों को पुनर्स्थापित किया है। भारतीय संस्कृति और आश्रम व्यवस्थ की आलोचना के तमाम कारण हो सकते हैं लेकिन भाजपा के ताजा प्रसंग में आश्रम व्यवस्था एकदम सही जान पड़ती है। यह  सिद्धांत कि जहां आपकी जरूरत न हो वहां टिके रहना आपके सम्मान को कम करता है, जीवन में बार-बार अपनी सार्थकता सिद्ध करता रहा है और इस बार भी इसने अपने सही होने को प्रमाणित किया है। आडवाणी जैसे कुशल नेता से यह आकलन करने में चूक हो गई कि भाजपा को उनकी जरूरत नहीं है और इससे पहले कि पार्टी उन्हें नकारे, वे खुद अपने लिए नई जिम्मेदारी चुन लें। लेकिन ऐसा हो न सका और जो घटा वह इस मायने में बेहद कष्टकारी है कि पार्टी को अपने जीवन रक्त से सिंचने वाले नेता कि ऐसी विदाई हुई। लेकिन सत्ता संघर्ष निर्मम होता है। भाजपा की मजबूरी यह है कि वह केवल आडवाणी के साथ नहीं रह सकती। उसे कांग्रेस से लोहा लेना है और ऐसे नेतृत्व की तलाश में थी जो मिशन 2014 को पूरा कर सके। आडवाणी का भरपूर अवसर मिले लेकिन उनके नेतृत्व में 1999 के बाद कोई चमत्कार हो न सका। यहां  तक कि आडवाणी की अंतिम रथयात्रा भी कोई कमाल नहीं दिखा पाई थी। लेकिन जैसा हर बार होता आया है सत्ता छोड़ना या सत्ता की आस छोड़ना  हर इंसान के लिए मुश्किल होता है, शायद आडवाणी के साथ भी वैसा ही हुआ। बहुत कम नेतृत्वकर्ता होते हैं जो अपनी दूसरी पीढ़ी को अपने से ज्यादा कुशल पा कर सत्ता सूत्र उसके हाथ में सौंप देते हैं। पिछले लगभग आठ वर्षो में आडवाणी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ एक हारी हुई बाजी में उलझे हुए थे। 2005 में आडवाणी की पाकिस्तान यात्रा के बाद से ही संघ ने यह साफ जता दिया था कि आडवाणी उन्हें मंजूर नहीं हैं। 2009 में आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा की चुनावी पराजय ने साफ कर दिया था कि अब पार्टी को किसी नए  नेतृत्व की तलाश है। संभवत: आडवाणी यह बात समझना नहीं चाहते थे। क्या यह कहना गलत होगा कि आडवाणी  बदले हुए समय और इस बदले समय में पार्टी की मांग को समझ नहीं पाए? दरअसल, चूक यही हुई है। आडवाणी और भाजपा का सत्ता पाने का सपना तो एक था लेकिन उसकी राह दोनों के लिए अलग थी। आडवाणी खुद के नेतृत्व में आगे बढ़ने का मोह पाले थे जबकि पार्टी उनका विकल्प खोज रही थी। अमूमन हर संस्था या परिवार में यही होता है। नई पीढ़ी तूफानी घोड़े पर सवार हो कर आती है और अपने पूर्ववर्तियों को उनके सिद्धांतों और नियमों के साथ निर्ममता से बाहर कर देती है। नई पीढ़ी संचालन के सारे सूत्र, सारे सिद्धांत अपने दृष्टिकोण से तय करती है और पुरानी पीढ़ी और उनके समर्थक हाशिए पर ठिठके सब कुछ बदलता और अपना बनाया परिवर्तित होते देखते रहते हैं।
ऐसी स्थिति में यह सवाल हमेशा खड़ा होता है क्या उस व्यक्ति का उस संस्था पर कोई हक नहीं जिसे उसने खून-पसीने से खड़ा किया है? असल में व्यक्ति सपने देखता है और अपने सपने को पूरा करने के लिए समानधर्मा लोगों को एकजूट करता चलता है। इस तरह संस्थाएं खड़ी होती है। धीरे-धीरे संस्थाएं  विराट होती जाती हैं और व्यक्ति बौने। एक समय आता है जब व्यक्ति उस संस्था के  लिए अहम् नहीं रह जाता। उसके होने या न होने के मायने नहीं रह जाते। व्यक्ति का हासिल यही है कि उसने जो सपना देखा था वह पूरा हुआ। पेड़ कोई और लगता है और  फल कोई और खाता है। माली का सुख तो पेड़ लगाने और उसने घना-विस्तारित होता देखने में हैं। लेकिन माली ही अगर अपने बोये पेड़ के फल खाने का ख्वाब देखे तो संघर्ष होना लाजमी है। हमारा इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। जिसने समय को नहीं पढ़ा, वह खारिज कर दिया गया है। दुखद यह है कि यह घटना बेहद निर्मम होती है और जश्न के स्वर में कोने में बिसूरने वालों की कराह सुनाई नहीं देती।

Monday, June 10, 2013

क्यों इतने मुतमईन हो कि वापस भी आओगे?

इनदिनों के राजनीतिक हालात देख कर एक शेर बार-बार याद आ रहा है-‘घर से निकल रहे हो, कफन साथ ले लो/ क्यूं इतने मुतमईन हो कि वापस भी आओगे?’ क्या यह सवाल भाजपा और कांग्रेस को अपने आप से पूछना चाहिए कि वे किस आधार पर यह यकीन रखे हुए है कि वे सत्ता में वापसी कर रहे हैं? भाजपा में नेतृत्व को लेकर जो घमासान मचा है उसे देख कर यही लगता है कि सारी लड़ाई सिंहासन पर बैठने की है, सिंहासन पाने के लिए की जाने वाली कवायद की चिंता किसी को नहीं है। केंद्र में
सत्ता पाने को आतुर भाजपा को मोदी में वह सारथी नजर आ रहा है जो उसके रथ को सिंहासन के करीब ले जा सकता है और इस यकीन की छांव में वह अपने सबसे अनुभवी नेता लालकृष्ण आडवाणी और सहयोगी दलों को भी किनारा करने को बेताब है। टीम मोदी यह साबित करने पर जुटी है कि मोदी के अलावा कोई और भाजपा का मसीहा है ही नहीं।  वे यह मानकर चल रहे हैं कि जनता केंद्र की कांग्रेस सरकार से नाराज है और बस मोदी का चेहरा देख कर उन्हें चुन लेने को आतुर हैं। पार्टी यह क्यों भूल रही है कि उसका अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन 1998  और 99 में मिली 182 सीट ही है। देश पर राज  करना है तो उसे 272 सीट पर ‘अपने’ सांसद चाहिए।  जब ‘अपने’ की रूठ जाएंगे तो ये आंकड़ा कैसे पूरा होगा? मोदी की कट्टर छवि एक वर्ग को पसंद आ सकती है लेकिन यह वर्ग भाजपा को कुछ हिस्सों में  एकतरफा जीत भले ही दिला दे, देशभर में 272 सीट दिलाने की ताकत नहीं रखता। पार्टी ने छह राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में अपनी राज्य इकाइयों को अकेला छोड़ दिया है। मप्र में शिवराज सिंह चौहान का जिम्मा है कि वे तीसरी बार सरकार बनवाएं, लेकिन पार्टी के अंदरूनी मसलों को हल करने में केंद्रीय नेतृत्व सहयोग में रूचि नहीं दिखाएगा फिर चाहे वह हार सकने वाले विधायकों के टिकट काटने की बात हो या नेताओं में तालमेल न होने का मसला। यही बात छत्तीसगढ़ में भी लागू होती है। कुछ यही हाल मप्र कांग्रेस का भी है। बड़े नेता एकजुट हो रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया सारे मतभेद भूला कर अपनी कार्यकारिणी में दूसरे गुट के नेताओं को जिम्मेदारियां दे रहे हैं लेकिन पदाधिकारी हैं कि काम करने को तैयार नहीं। क्यों भूरिया को बार-बार फटकारना पड़ता है कि मैदान में जाओ वरना कुंडली बिगाड़ दूंगा? असल में दोनो दलों को भरोसा है कि जनता सरकारों से नाराज है और वह उन्हें ही चुनेगी। क्या इतना भरोसा जायज है?