सयानी होते ही
तू समझ गई थी
अपनी हदें और जिम्मेदारियाँ।
किस वक्त चुप रहना है
और कब जागना है
खुद ही सीख लिया था तुमने।
पिता की जेब देख
जाहिर ही नहीं की
अपनी इच्छाएँ
बाहर निकलने पर भाई
का पहरा तुझे अखरा ही नहीं
कई बार छोटे ने सिखाया
तुझे अदब का तरीका
पर तू खामोश रही
भय्या राजा की बेअदबी पर।
तेरे हिस्से आई कभी कोई खास चीज
तो तुझसे पहले झपट लिया उसने
जिस पर तू हर सुख न्यौछावर करती रही।
जिस पति के लिए तू
बिछती रही हरदम
उसने तो कभी जरूरी नहीं समझा
कि पूजा के अलावा
बैठाए कभी अपने पास।
जिसे तुमने अपने संस्कारों से सिरजा था
उस बेटे के ताने तू
भुला देती है मुस्कुराते हुए।
खीर हो या लजीज सब्जी
हर सुख पाने में अन्तिम रही तुम।
कौन जाने अपना दुख छुपाने में
क्या आनन्द मिलता है तुम्हें
जब-जब देखता हूँ तुझे
समझ ही नहीं पाता
तुमने अपने सपनों को क्यों नहीं बुना
वैसा जैसा बनाया था मेरा स्वेटर।
तुमने क्यों नहीं रचा
अपना सुख
गोल-गोल चपाती की तरह।
Sunday, March 7, 2010
Friday, February 19, 2010
एक कथा है बाघ भी
केदार नाथ सिंह की इस कविता-
कथाआें से भरे इस देश में
मैं भी एक कथा हूंॅ
एक कथा है बाघ भी
इसलिए कई बार
जब उसको छिपने को
नहीं मिलती कोई ठीक ठाक जगह
तो वो धीरे से उठता है
और जाकर बैठ जाता है
किसी कथा की ओट में
िफर चाहे जितना ढूंढो
चाहे छान डालो जंगल की पत्ती-पत्ती
वो कहीं मिलता ही नहीं
बेचारा भैंसा सांझ से सुबह तक
चुपचाप बंधा रहता है
एक पतली सी जल की रस्सी के सहारे
और बाघ है कि उसे प्यास लगती ही नहीं
कि वो आता ही नहीं है
कई-कई दिनों तक
जल में छूटी हुई अपनी
लंबी और शानदार परछाई को देखने
और जब राजा आता है तो जंगल में
पड़ता है हांका
और तान ली जाती हैं सारी बन्दूकें
उस तरफ जिधर हो सकता है बाघ
तो सच्चाई ये है कि उस समय बाघ न
यहांॅ होता है न वहांॅ
वो अपनी शिकार का खून पी चुकने के
बाद आराम से बैठा होता है
किसी कथा की ओट में।
Friday, February 12, 2010
क्या आप नन्हे बाघ को हारते देख सकते हैं?
* इन दिनों टीवी पर एक विज्ञापन आ रहा है। नन्हा बाघ...सुकुमार बाघ...जीवन के लिए लड़ता बाघ। अगर इस विज्ञापन के साथ अभिनेता कबीर बेदी की आवाज सुनाई ना भी दे तो भी दृश्य ही इतना बताने के लिए काफी है कि नन्हा बाघ संकट में। उसे सहारा नहीं जीवन का अिध्कार चाहिए......right to survive.
* बचपन में देखी एक िफल्म...तब टीवी नया-नया आया था... बाल सुलभ दिमाग समझता ही नहीं था ऐसी िफल्मों का महत्व...1989 में बनी िफल्म `बाघ बहादुर´। बुद्धदेव दास गुप्ता की यह िफल्म याद रही तो पवन मल्होत्रा के कारण। बंगाल का एक चरित्र घुनुराम जो शरीर पर पुताई कर बाघ बनता है और किसी तरह गुजर-बसर करता है। िफल्म याद रही तो बाघ के कारण...गरीब की व्यथा भुलाते हुए। 20 साल बाद यह विज्ञापन देखा तो हूक सी उठी- क्या अब `बाघ बहादुर´ में ही ज़िन्दा रहेंगे बाघ?
और `बाघ बहादुर´? क्या वे ज़िन्दा है?
* भोपाल का राष्ट्रीय उद्यान वन विहार...जून 2007... सफेद नर बाघ की दहाड़...जून के पहले पखवाड़े की तपती सांझ में सूरज भले मद्धम पड़ रहा था लेकिन जवान की तफरीह उसके बाड़े के बाहर खड़े लोगों को रोमांचित कर रही थी। बलिष्ठ बदन...सध्ाी चाल...दिल चीर देने वाली निगाहें और गजब की आक्रामकता...। साथ में मौजूद वैभव ने पूछा- यह बाहर होता तो...जवाब दिया-तब जो करना था इसे ही करना था...।
अब सोचता हूं अगर यह बाहर होता तो जो करते शिकारी करते?
* जनवरी 2008... वन विहार राष्ट्रीय उद्यान...वह बाड़ा खाली है जहां छह माह ईशू तफरीह करते दिखाई दिया था। वन विहार ही नहीं जग सूना लग रहा था ईशू के बिना। `एट पैक्स´ वाले ईशू को लीवर की बीमारी हमसे दूर ले गई। जहां उसे शिकारियों से सुरक्षा मिली थी वहां बीमारी या कहो लापरवाही उसे लील गई। याद है जब राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर ईशू के अन्तिम संस्कार के दृश्य दिखलाए जा रहे थे तब कई लोगों ने मातम मनाया था। केवल वन विहार के मामूली से वन्य प्राणी सेवक ही नहीं फफक-फफक कर नहीं रो रहे थे...केवल ईशू की प्रेमिका बाघिन ही उदास और आक्रोशित नहीं थी...पूरा अभियान, पूरे प्रयत्न निढाल थे...कई सवाल थे और प्रबंध्ान के पास रटाया-रटाया जवाब था...अपनी लापरवाही से मुंह मोड़ लेने के लिए।
* अस्पताल की नवजात उपचार यूनिट...आठ माह का गर्भस्थ शिशु तड़प रहा था...न चाहते हुए भी उसके माता-पिता ने उसे समय के पहले इस दुनिया में लाने का निर्णय लिया था...ऐसी भी क्या मजबूरी...डॉक्टर ने बताया था...रीढ़ में कुछ खलल थी... जीना मुमकिन न था। समय से पहले आया मासूम... समय के पहले जा न सका। डॉक्टर के बताए वक्त से करीब डेढ़ घंटा ज्यादा सिसकियां भरता रहा...िफर कर गया कूच। पत्नी कहती है- विज्ञापन में शिशु बाघ को देख वार्मर में सिसकता शिशु याद आता है...हम उसे तो नहीं बचा पाए क्या यह शिशु बाघ बचाया जा सकता है? ईशू तो नहीं रहा क्या यह नन्हा नहीं जी सकता भरपूर जीवन जैसे जी रहे हैं आप और हम...जैसे जी रहे हैं वे जो इन्हें मार देना चाहते हैं...अपनी स्वार्थ की गर्मी के लिए।
* सवाल बड़ा है। सवाल तो कई हैं। वन केवल पेड़ों से नहीं बनता। वन नाम लेने पर याद आता है बियाबान जंगल, उसमें घूमते मासूम और आक्रान्ता प्राणी, कल-कल बहती नदियां-झरने। रास्तों वाले पेड़ समूहों को जंगल नहीं कह सकते ना। जंगल तो वह हैं जहां पगडण्डियां है और जहां से गुजरते वक्त हावी रहता है भटक जाने का भय। हम चाहते हैं कि पेड़ न हो, नदियां-झरने न हों...सारे के सारे वन्य प्राणी न हो, लेकिन `वन´ हो !
* कुछ लोग चाहते हैं कि बाघ केवल पोस्टर में रहे, डाक्यूमेन्ट्रीस में रहे, चिन्ताओं में रहे...अफसोस ऐसा सोचने वाले थोड़े हो कर भी अपने कार्य में बहुत परिपक्व हैं और बाघ की तरफ बोलने वाले ज्यादा हो कर भी कमतर साबित हो रहे हैं।
* आंकड़ें कहते हैं कि 20 वीं सदी की शुरूआत में भारत के जंगलों में 40 हजार से ज्यादा बाघ थे। 2002 में जब पद चि—ों के आध्ाार पर बाघ की गणना की गई तो यह संख्या 3 हजार 642 निकली। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्रािध्ाकरण ने जब 2008 में कैमरों के जरिए निगरानी कर संख्या जाना चाही तो पता चला कि देश में केवल 1 हजार 411 बाघ बचे थे।
बाघ अपने दुश्मनों से अकेले लड़ रहे हैं, जैसे `बाघ बहादुर´ का घुनुराम लड़ रहा था, जैसे वन विहार का ईशु लड़ रहा था, जैसे अस्पताल में शिशु लड़ रहा था... वे नहीं बचे। बचे तो केवल आंसू।
क्या आप और आंसू देख सकते हैं ? मैं नहीं देख सकता जिन्दगी की हार।
क्या आप देख सकते हैं नन्हे बाघ को मौत से हारते हुए?
अगर आपका जवाब ना है तो यहां देखें -
Tuesday, January 19, 2010
फूल खिले तो जाना वसन्त आया
वन-वन, उपवन-उपवन, जागी छवि, खुले प्राण
जनवरी का महीना आधा गुजर गया है...दिन में गुनगुनी वासन्ती अनुभूति घुल जाना थी...लेकिन अभी तो कड़ाके की ठण्ड नित नए कीर्तमान गढ़ रही है...। पारे की गिरावट में वसन्त की पदचाप गुम हो रही है, लेकिन रंग बिरंगे फूल वसन्त के आने की खबर दे रहे हैं। हर जगह फूल ही फूल खिले हैं। खेतों में सरसों और सड़कों के किनारे पर पीले, गुलाबी, जामुनी जंगली फूल खिलखिलाने लगे हैं।
वसन्त अकेले नहीं आता। यह स्मृतियों का हरकारा है। वसन्त हमारे भीतर कल्पना का सुमन खिलाने आता है। वसन्त सूखी धरती सी धूसर मनोदशा को भी हर्ष और उत्साह की हरियाली ओढ़ा देता है। वसन्त नया होने का पर्व है। यह प्रकृति के श्रंृगार और सौन्दर्य का त्यौहार ले कर आता है। वसन्त आता है तो पीछे-पीछे फागुन चला आता है। पंचमी के बाद जो-जो पुराना है, वो सब झड़ जाता है। पतझड़ का अन्त हो जाता है। दिलों में टेसू के अंगारे दहकने लगते हैं, सरसों के फूल झूम-झूम कर गीत गाने लगते हैं। शीत में कुम्हलाए से खड़े पेड़ अब ठूंठ नहीं रह जाएंगे... यहां उम्मीद की कोंपले फूटेंगी, जीवन लहलहाएगा।
वसन्त पंचमी वाग्देवी सरस्वती का जन्मदिन भी है। इस दिन आराधक सरस्वती की पूजा करते हैं। प्रेम के पर्व पर ज्ञान की देवी की आराधना केवल संयोग नहीं है। ज्ञान और विवेक के अभाव में उत्साह निरंकुश हो जाता है। यह पर्व जोश में होश का संकेत देता है।
सीमेंट कांक्रीट के जंगलों में तब्दील होते शहरों में वसन्त का आना कोई सूचना नहीं। काम से लदी जिन्दगी दिन-रात टारगेट में उलझी रहती है। उदास चेहरों और बुझे दिलों को न वसन्त के आगमन का भान है और न प्रकृति से बतियाने की फुर्सत। प्रेमियों का वसन्त भी एसएमएस की लघु भाषा का संकेत भर बन गया है। न वैसे गीत रचने वाले रहे न उनका रसपान करने वाले। हम भले ही अपनी प्रकृति भूल जाएं। तरक्की के जूनून में अपना स्वभाव खो दें। मगर प्रकृति ने अपना ढंग नहीं छोड़ा है। आज भी कहीं न कहीं, कोयल वैसे ही कूक रही है और टेसू खिल रहे हैं। हम ही जो इनसे नाता तोड़ बैठे हैं, तनावों को न्योता दे चुके हैं। हमारे आसमान में भी चांद चमक सकता है, खुशियों का गेन्दा खिल सकता है, उल्लास की कोयल कूक सकती है और मिलन के पर्व मन सकते हैं। जरूरत है, वसन्त को अपने भीतर उतार लेने की।
भोपाल में तो यह सम्भव भी है। प्राकृतिक संपदा के धनी इस शहर में ऋतुओं का बदलाव भी साफ-साफ दिखाई देता है। यहां के लहलहाते वृक्ष मन का हरापन सूखने नहीं देते। िफर यह तो वसन्त के आगमन की सूचना है। शहर का पौर-पौर वसन्त के आने का सन्देश दे रहा है। लिंक रोड नंबर एक से गुजरें या वन विहार में तफरीह कर आएं। गुलदावदी हो या बोगनवेलिया। किस्म-किस्म के फूल चहक-चहक कर वसन्त के आने कर सन्देश दे रहे हैं। जरा सुनिए तो...।
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